नहीं, तो उसके लिए काम भी तो करना पड़ेगा; ये तो परिणाम है। धारणा, ध्यान, समाधि, तुम, ब्रह्म — तो धारणा बनाई है, तो उस पे काम भी तो करना पड़ेगा भाई। हमने कह दिया कि मैंने फसल बोनी है, इतना खेत है, इतना क्विंटल होगा, हमने पूरा नापतोल कर दिया, अब हम इंतजार कर रहे हैं — तो क्या फसल तैयार मिलेगी? उसके बाद अपने कर्म में भी उतारना पड़ेगा — ले जा के निराई-गुड़ाई, फसल बोना, देखभाल, फिर काटना। तो धारणा के बाद काम करना पड़ेगा, मेहनत करनी पड़ेगी; सिर्फ धारणा बनाने से काम थोड़ी ना हो जाएगा।
नहीं, कल्याण तो ईमानदारी, सत्कर्म और सत्संग से होगा। अगर आप पूजा-पाठ भी कर रहे हो, और आप इसलिए कर रहे हो कि मैं सतमार्ग पर चलूं, तो उससे भी कुछ ऊर्जाएं मिलती हैं, सहायक होती हैं।
वो ऐसे ही निर्विकार नहीं (होगा); निर्विकार होने के लिए तो सत्कर्म करना पड़ेगा ना। अगर आप कर्म में उतारे ही नहीं, तो आप बेईमान थोड़ी ना कहलाओगे। आपके अंदर बेईमानी आई, ठीक है, लेकिन आपने कर्म में बेईमानी नहीं की, तो आप बेईमानी अंदर आने से बेईमान थोड़ी ना हो जाओगे। फल तो तभी मिलेगा ना, जब मैं एक्शन में (करूंगा)।
(एक होती है सोच, एक होती है मानसिक प्लानिंग —) अगर आप मानसिक प्लानिंग कर रहे हो, तब तो गलत हो। लेकिन सोच आ रही है, और आप एक जगह इच्छा भी रखो कि यार, ऐसी सोच क्यों आ रही है, मैं (इन) सोचों से परेशान हूं — तब तो आप निर्दोष हो; पश्चाताप भी हुआ ना कि यार, ऐसी सोच मुझे नहीं आनी चाहिए थी। जैसे एक पागल किसी को मार दे, क्या उसे दंड है? नहीं। लेकिन समझदार आदमी प्रयास भी कर दे, तो दंड है। तो आप देखिए कि विचार अपने आप आ रहे हैं और आप चाह रहे हो कि ऐसे विचार ना आएं, तब तो ठीक है। लेकिन विचारों को आप बढ़ावा दे रहे हो, उस पर मानसिक काम कर रहे हो, तो कहीं ना कहीं फिर (दोष है)।
नहीं, शरीर तो आपके द्वारा ही कार्य करता है; शरीर के द्वारा आप ही कार्य करने वाले हो। शरीर अलग से कार्य नहीं करता। अगर आप यहां हाथ रखे हो, तो आप ही रखे हो; अब यहां उठा के आप ही रखोगे। शरीर के कुछ हिस्सों में आपका अधिकार नहीं है — जैसे बाल यहां से उड़ के यहां आ जाएगा; लेकिन यहां से यहां आने में भी कारण है — जब उसे कहीं कोई रखने वाला है, तभी आएगा, चाहे हवा हो चाहे कुछ हो; ऐसे नहीं आएगा। आप नहीं रख रहे हो, तो कोई और रख रहा है। जहां कुछ भी होता है, उसके पीछे होने का (कारण होता है)।
तो सत्संग का भंडारा कराओ ना। प्रेरणा अगर ली, तो जैसे गोयल जी ने दिल्ली में सत्संग कराया, आपने लाभ लिया, तो आप भी सत्संग कराओ, और लोग भी लाभ लें। तो आपको अगर भंडारा ही कराना है, तो ज्ञान का भंडारा कराओ, जिससे समाज के लोगों को लाभ मिले। जैसे आपने लाभ लिया, तो आप अगर कराओगे तो अन्य लोग लाभ लेंगे। यही सत्कर्म है।
हां, आप आराम से रह सकते हैं — यहां के नियम में। मैं आपको बता दूं, मुझे हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई — किसी से मतलब नहीं है। आप यहां के नियम में अपने आत्मिक कल्याण के लिए रह सकते हो, बात खत्म। जैसे लोग रह रहे हैं, वैसे आपको रहना है, बस।
तो आप एक काम करो — आप धारणाएं बनाना छोड़ दो, अनुमान लगाना ही छोड़ दो। आप जब उसका उपयोग करोगे, तब पता चलेगा वो कैसा है; तो आप उससे बातचीत करो। कोई भी हो — चाहे वो वस्तु हो, चाहे आदमी — हम यहां एक-दूसरे का उपयोग ही कर रहे हैं, उस उपयोग में ही पता चलता है कौन कैसा है। तो जब तक उपयोग ना कर पाओ, तब तक (अनुमान मत लगाओ)।
आने दो ना। आप बस सात्विक कर्म करो, बस आने दो। और आप शरीर से ऐसा काम मत करो। देखो, जैसे मान लीजिए मैला पानी है; अब आप उसमें कुछ नहीं मिला रहे हो, आप उसे ऐसे ही छोड़ दो — तो आप देखोगे कि वो धीरे-धीरे और भी सड़ने लगेगा, और एक दिन ऐसा हो जाएगा कि (वह गंदगी) खत्म हो जाएगी। तो इस व्यक्ति को जैसे ही विचार और गंदे आ रहे हैं, इसका मतलब वो सफाई हो रही है। बस शरीर से मत करना, ऐसी गलती मत करना। और (अगर) पता चला कि वो आधे से ज्यादा सड़ गया, और बहुत ज्यादा बास मार रहा है, तो अब कुछ मिला दूं — तो (बदबू) कम तो हो जाएगी, लेकिन वो (गंदगी फिर) जिंदा हो जाएगी। (जैसे) गोबर को डालते हैं, तो वो सड़-सड़ के खाद हो जाता है, फिर वो बदबू भी नहीं मारता; नया-नया गोबर जब सड़ता है, तब बास मारता है।
शांति तो आपकी समझ से होगी ना। शांति कहां से होगी? आपकी समझ से होगी। अब समझ ही विकसित नहीं हो रही है, और आप सेवा कर रहे हो किसी की, तो कोई मतलब नहीं है। समझ को विकसित करो।
देखिए, 10% या 20% या 2% — ऐसा मत करो, नहीं तो फंस जाओगे। आप ईमानदारी से कमाओ, अपने परिवार की जरूरत पूरी करते हुए; अगर कुछ बचता है, तब दो। परसेंटेज में अपने आप को मत बांधो। वो चाहे एक (रुपया) क्यों ना हो — लेकिन अपनी क्षमता और यहां की जरूरत (देखो)। तो आप अपने परिवार का भरण-पोषण ईमानदारी से करने के बाद, जरूरत-पूर्ति करने के बाद, अगर कुछ बचता है, तब देना — इस बात का ख्याल रखना।
ऐसा नहीं कि 10% बांध लिया, और पता चला कि इस महीने ज्यादा खर्चा आ गया, कोई बीमार हो गया, लेकिन मैंने कसम खा ली है — तो मेरी धारणाएं मुझे फिर परेशान करेंगी कि मैंने संकल्प लिया था, ये भी एक पाप लग गया। और पता चला कि वो बीमार आदमी एक साल तक बीमार रहेगा, डॉक्टर ने कहा इसका इलाज-कोर्स एक साल तक चलेगा, और 10% बच ही नहीं रहा, कम पड़ रहा है — अब क्या होगा? तुम उसकी भरपाई तो करोगे, लेकिन इस संकल्प के लिए आपको पीड़ा हो जाएगी। तो ऐसा संकल्प कतई मत लेना; जितना हो सके, आप सहयोग करते रहना।
तो पहुंच जाओ ना। क्या वीजा नहीं पास हो रहा है? और (आना) नहीं हो रहा है, तो मुझे बुला लो। जिस देश में हो, जिस प्रांत में हो — एक काम करो, मुझे बुला लो, अगर नहीं आ पा रहे हो।
आपने दृश्य देखा होगा — पहले बच्चे आते थे, उनको एक बिस्किट, दो बिस्किट दो; जब ज्यादा दे दो तो रोने लगते थे, (क्योंकि) वो गिरता था ना। एक छोटी सी बालिका थी, तो मैंने उसे एक चॉकलेट दिया, दो दिया; उसकी मुट्ठी में दो भर गए, और जैसे ही दोनों मुट्ठी भर के गिरने लगे, वो चिल्ला के रोने लगी, और बहुत दिनों तक मुझे देख के डरने लगी। क्यों डरने लगी? क्योंकि उतना कभी मिला ही नहीं था — तो यह मुझे क्यों दे रहा है? बहुत दिनों तक उसका आना-जाना रहा, तो मुझे देख के डरती थी। अब क्यों डरती थी? इसलिए कि योग्यता से ज्यादा मिल गया, तो उसको लगा क्यों दिया, ऐसा तो कोई दिया ही नहीं था।
वही तो — जब योग्यता से ज्यादा मिलेगा, तो आपको पता ही चल जाएगा; आप लेने में दब जाओगे, फिर उस आदमी के सामने आप खुल के बोल नहीं सकते। सामने वाला, जिससे भी आप योग्यता से ज्यादा लोगे, फिर आप उसके सामने खुल के बोल नहीं पाओगे। इसलिए योग्यता से ज्यादा पकड़ो ही मत भैया।
नहीं-नहीं, ये ज्ञान आप लिए हो, वहां से अपने आप को छुड़ाना चाहते हो। लायक हो, तभी तो बैठे हो। ज्ञान का अधिकारी तो हर व्यक्ति है। बात यहां वस्तुओं की है, आवरण की है, व्यावहारिक जगत की है। ज्ञान का कभी बोझ होता है क्या? देखो ना, कोई रास्ता दिखाता है, तो क्या उसका एहसान होता है? क्या हम उस आदमी से दब के बोलते हैं? क्योंकि हमने भी अनेकों को (रास्ता) बताया है — ये हमारा-आपका काम ही है। ज्ञान का कोई बोझ नहीं होता; ज्ञान सारे बोझों से मुक्त करता है।
नहीं, आप जैसे हो, जहां हो, ईमानदारी-सत्कर्म की शुरुआत कर दो — तुरंत। उसी में योग्यता बढ़े, तो करते रहो। लेकिन आप बस मेन पॉइंट ये रखो — ईमानदारी, सत्कर्म और सत्संग।
नहीं, फोन पे सब बातें होती ही नहीं। या तो लाइव में पूछ सकते हो, या तो प्रत्यक्ष यहां अपनों की कुटिया में आकर पूछ सकते हो, या तो जिस क्षेत्र में, जिस प्रांत में, जिस जिले में सत्संग होगा, वहां पूछ सकते हो। फोन पे सिर्फ यहां आने के लिए पता पूछ सकते हो, और यहां के बारे में जानकारी।
ना ना ना। लालच — ज्यादा चाहिए में; योग्यता से ज्यादा (पाने) में (उसका) जन्म होता है। और डर तब आता है जब आप योग्यता से ज्यादा ले लिए हो, और जिससे लिए हो, उससे आपको डर (लगता है)।
ये सत्य है। हमारी समझ कहां तक? हमारा मन कहां तक? शरीर तक। तो हम रूप तक, रंग तक ही समझ सकते हैं; हम शब्द, दृश्य, गंध, रस, स्पर्श तक समझ सकते हैं, (उसी की) बात हो सकती है। वही औजार हैं ना हमारे पास — उसी के थ्रू समझ सकते हैं, उतनी ही हमारी बात हो सकती है। और इसी में हम फंसे भी हैं। और जब हम इससे निकल गए, तो फिर हमें शब्दों की जरूरत ही नहीं है; शब्द तो वहां खत्म हो जाते हैं।
आप कौन सा सामान खरीदते हो, वो देख लो। जिस कंपनी का आप माल खरीद रहे हो, क्या वो माल समाज हित में है? तो उसको आप खरीदो। और पता चला कि आप नशीली वस्तुएं, या समाज हित में नहीं — वह सामान खरीद रहे हो, तो कहीं ना कहीं आप उससे जुड़ के उसको, उसके व्यापार को बढ़ावा दे रहे हो ना। तो आप वो सामान ना खरीदें। ऐसा सामान खरीदें — खाने-पीने वाला — कि जिससे किसी को तकलीफ ना हो; उसका अगर समाज उपयोग करे, उसकी बढ़ोतरी हो, तो समाज हित में हो, बस।
जब यात्रा करते हैं ना, तभी देख लेते हैं। आत्मज्ञान के बाद की बात छोड़ो — यात्रा भी तभी शुरू होगी जब आप अपने आप को और शरीर को अलग महसूस कर पाओ। जैसे आपसे कोई कहे कि हवा है या नहीं, तो तुम कहोगे है। क्या उस हवा को देखा? लेकिन स्पर्श इंद्रिय से आपने महसूस किया, तो वो भी तो देखना है। पूरी दुनिया कह दे कि हवा नहीं है, तो आप मान लोगे? हवा आपने महसूस की; और कोई कह दे कि हवा एक ही तरह की होती है, तो आप कहोगे नहीं — ठंडी भी होती है, गर्म भी होती है। क्या ठंडी और गर्म हवा को आपने देखा है? नहीं; इस शरीर के द्वारा महसूस किया है। पांच इंद्रियां हैं, तो पांच इंद्रियों में से एक इंद्रिय द्वारा आपने उसे देखा है।
तो आध्यात्मिक यात्रा तभी शुरू होती है जब आपने अपने आप को और शरीर को अलग देख लिया है। अगर नहीं देख पाओगे, तो आप आध्यात्मिक यात्रा शुरू ही नहीं कर सकते हो। आत्मज्ञान के बाद की छोड़ो — शुरुआत ही यहीं से है।
(सांसारिक शब्दों का) उपयोग इसलिए करते हैं कि आप उन शब्दों में फंसे हो — आपके लिए करना पड़ रहा है। अगर हम उन शब्दों का उपयोग ना करें, कोई नया शब्द लाएं, तो आप समझ ही नहीं पाओगे। अगर हमें इस (पेड़) के बारे में बताना है, तो मुझे बरगद (शब्द) का ही उपयोग करना पड़ेगा, क्योंकि आपको बरगद के ही रूप में इसे बताया गया है। और अगर इसका नाम मैं कुछ और रख दूं, तो आप थोड़ी समझोगे; मैं तो हो सकता है समझ जाऊं, क्योंकि मैंने इसका नाम ये रखा — अब मुझे कहीं दिखेगा तो मैं (अकेला) समझ जाऊंगा। तो हमें उन शब्दों का उपयोग इसलिए करना पड़ रहा है कि आप उन शब्दों के द्वारा ही उसे जानते हो; तो हमें उन शब्दों के द्वारा ही आपको बताना पड़ेगा ना।
तो कुछ दिन यहां आकर रहो। अगर आपकी वहां जवाबदारी है, दायित्व है, कोई आप पर निर्भर है, और आपने उसे आश्वासन दिया है, तो आप कम से कम 12 महीने में एक महीना यहां दो, 11 महीने घर पे दो। और आप पर पूरी तरह जिम्मेदारी नहीं है, (तो ज्यादा रह सकते हो)।
और भी वीडियो देखो; ईमानदारी के बारे में मैंने बहुत समझाया है — लेनदेन, उठने-बैठने (में)। अगर आप किसी के लिए शब्दों का संबोधन कर रहे हो, तो आपने उसे एक शब्द दिया, तो एक शब्द उसके पास गया, तो वह शब्द आपके पास भी है। तो क्या सेम वही शब्द है, या पता चला कि आपने शब्द अलग रख लिया और उसे अलग दे दिया? यह भी बेईमानी है। आप जिन शब्दों को दे रहे हो — देखो, आपने जैसे ही उसे एक शब्द दिया, एक शब्द वो आपके अंदर भी है — तो आप देखो कि असली ही दे रहे हो कि नहीं। पता चला कि असली रख लिए और नकली दे दिए, तो आप फंस गए। जैसा है, वैसा दे पा रहे हो कि नहीं?
चापलूसी का मतलब — हम बिना समझे किसी की झूठी निंदा करते हैं, या किसी की बड़ाई करते हैं — तो ये चापलूसी है। (झूठी) बड़ाई भी करना, क्योंकि हम उसका बड़ा वाला काम नहीं देख रहे हैं, लेकिन मुझे कुछ लालच मिल रहा है; वो समाज के लिए कुछ नहीं कर रहा है, और मैं कह रहा हूं — बड़ा सज्जन आदमी है, बड़ा महान व्यक्ति है — तो यह झूठी चापलूसी है। ऐसी चापलूसी कतई ना करें; इसमें आप फंस जाते हैं। धूर्तता का मतलब होता है — सामने वाले ने आप पे भरोसा किया कि आप सामान का हिसाब सही-सही करोगे, और आपने ज्यादा ले लिया, उसको कम दे दिया; समय आने पे धोखा दे दिया। और पाखंड मतलब — आप हो कुछ और, और समाज वालों को कुछ और बता रहे हो, लाभ लेने के लिए; यह पाखंड है।
आप देख लो कि आपको जीवन में करना क्या है। आपको जो करना है, अगर वो आप पढ़ के कर सकते हो, तो पढ़ाई अच्छी होने लगेगी। पता चला आप करना कुछ और चाहते हो, जबरदस्ती पढ़ाया जा रहा है, तो आपका पढ़ाई में मन नहीं लगेगा। पता करो कि आपको क्या चाहिए और आप जीवन में क्या करना चाहते हो, और क्या वो जो चाहिए वो पढ़ाई से मिल पाएगा — तब आप पढ़ने लगोगे।
नहीं, यहां श्रेष्ठ की बात नहीं है। क्योंकि जहां आप हो — चाहे वो भक्ति हो, चाहे ज्ञान हो — वही माध्यम बनता है आत्मज्ञान तक पहुंचने के लिए। कहा जाता है लक्ष्य श्रेष्ठ है; लेकिन अगर मार्ग ही नहीं है, तो लक्ष्य तक कहां पहुंचोगे? आप उसे नीचे भी नहीं कह सकते, क्योंकि वही तो निमित्त बना लक्ष्य तक पहुंचने के लिए। लक्ष्य सर्वश्रेष्ठ है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि मार्ग नीचे है; क्योंकि मार्ग ही नहीं होता तो लक्ष्य तक कहां पहुंचते? तो मार्ग को भी प्रणाम, मार्ग बताने वाले को भी प्रणाम। अगर मार्ग भी है, और कोई बताने वाला नहीं है, तो भी आप कुछ नहीं कर सकते — आप चौराहे पर खड़े हो, अगर कोई रास्ता बताए ही ना। आपने दुनिया में अपने आप को ऐसी जगह खड़ा कर लिया है कि रास्ते ही रास्ते दिख रहे हैं, और हर रास्ता कहीं ना कहीं ले जाएगा; लेकिन तुम्हें समझ में नहीं आ रहा कि मेरा रास्ता कौन है। अब आपका रास्ता आपको बताने वाला श्रेष्ठ है, लेकिन रास्ता भी श्रेष्ठ है। फिर लक्ष्य पे पहुंच गए, तो सबको प्रणाम है, और लक्ष्य सर्वश्रेष्ठ है, क्योंकि लक्ष्य के लिए रास्ता है। अगर लक्ष्य ही नहीं है, तो फिर रास्ते का भी क्या मतलब आपके जीवन में? रास्ता भी तभी श्रेष्ठ है जब लक्ष्य है; नहीं तो रास्ता भी तो भटका रहा है। आप ये सबके चक्कर में ना जाके जीवन में यात्रा करिए।
ऐसा नहीं कि मैं खास पशु से प्रेम करता हूं; प्रेम सबसे है। अब कहोगे शेर को गले लगाओ, तो थोड़ी लगा लेंगे — शरीर को भी तो रखना है ना। तो प्रेम तो सबसे है।
नहीं। सच्चा इंसान है, तो कहीं झूठ में भी पड़ा है; सच-झूठ अलग-अलग है। सच्चा इंसान कभी झूठा भी हो जाएगा। देश-काल-स्थिति-परिस्थिति में व्यक्ति अगर पूरी तरह ईमानदार बन गया, तो फिर वो ईमानदार हो गया — वो सच्चे से भी आगे निकल गया। सच्चा इंसान तो समय आने पे बदल भी सकता है; सच-झूठ हमेशा बदलता रहता है। तो सच-झूठ में जीने वाला व्यक्ति कब किस तरह पलटी मार देगा, पता नहीं। लेकिन ईमानदार व्यक्ति अगर एक बार ईमानदार हो गया, तो फिर वो सच-झूठ से परे जी रहा है। क्योंकि आप देखो — कभी कोई गलत आदमी आपके लिए सही होता है, कभी सही आदमी गलत होता है; सच-झूठ हमेशा बदलता रहता है।
बेईमान कब कहलाता है? जब आदमी सच-झूठ में पड़ा रहता है। सच-झूठ से ऊपर है ईमानदारी। ईमानदार व्यक्ति सच-झूठ से ऊपर आ गया। अब ऐसा नहीं कि आपने ईमानदारी पकड़ ली थी (तो गिर नहीं सकते) — बेईमानी करोगे तो बेईमान हो जाओगे; ये आपके ऊपर है ना, सारा खेल तो आपके ऊपर है। जिस तरफ आप यात्रा कर रहे हो, आप तो कभी वहां थे। सच-झूठ में अगर कोई जी रहा है, मतलब वो अभी ईमानदार नहीं है। सच-झूठ से आगे है ईमानदारी। आपने ईमानदारी को पूरी तरह पकड़ लिया, मतलब बेईमानी का त्याग कर दिया; तब ऐसा नहीं कि (गिरने की) संभावना नहीं — वो आपके ऊपर है। आपसे कोई बेईमानी अब करवा नहीं सकता है; लेकिन अब वो आपके ऊपर है — अगर आप बेईमानी करना चाहते हो, तो आप कभी भी जा सकते हो। गिरने की संभावना कभी भी बन सकती है; आप अपने आप को कभी भी गिरा सकते हो, नहीं तो आप गुलाम हो जाओगे ना फिर।
100% ईमानदारी, सत्कर्म और सत्संग। देखो, क्या होता है — नाम जप किसको दिया गया है? जैसे अर्जुन को कर्म का सिद्धांत बताया गया; वहां कृष्ण भगवान ने नाम जप नहीं दिया। और वाल्मीकि जी रत्नाकर डाकू थे, उन्हें राम-राम का नाम दिया गया, क्योंकि वह पूरी तरह छोड़ के आ गए; अब वह कुछ नहीं करेंगे, कर्म करेंगे ही नहीं; तो वह नाम के सहारे बढ़ सकते हैं। लेकिन आपके जीवन में कर्म भी है, और आपको पार भी होना है — तब आप कर्म का सिद्धांत समझो। आपका नाम जप से कुछ नहीं होने वाला है। नाम जप किसके लिए है? (जिसने) पूरी तरह छोड़ दिया और एक जगह बैठ गया, अब वह कर्म करेगा ही नहीं। और अगर आपको कर्म भी करना है, समाज में रहना है, तो कर्म के सिद्धांत को समझो; नाम जप से कुछ नहीं होगा, नाम जप से आप आगे नहीं (बढ़ोगे)।
नहीं समझ में आ रहा है, तो अगर मैं (जो) बता रहा हूं, वहां से समझ आ जाए तो ठीक है; नहीं तो यहां कुछ दिन आके रहो। आप इतना समझो कि सच में मुझे क्या चाहिए, और उसके लिए काम करो, बस।
समझ में आ गया ना कि (यहां) कुछ नहीं है। जब आपको भी आ जाएगा, तो पैदा हो जाएगी ना। आपको भी जब (समझ) आ जाएगा कि मैं जहां हूं, यार, यहां कुछ नहीं है, इसका परिणाम मेरा पतन है, समय बर्बाद है — तो आपको भी (प्यास) आ जाएगी, जिस दिन ये बात समझ में आ जाएगी।
मात नर्मदे हर — मां नर्मदा को मां का स्वरूप माना जाता है; नर के मद को हरने वाली मां नर्मदा। लोग (उनकी) परिक्रमा करते हैं; यहां आके तप करते हैं — यह तपोभूमि है। समाज में जहां भी लोगों ने तप किया है, उनके नाम से तपोभूमि है। यहां किसी इष्ट की जरूरत नहीं होती है; यहां पे आप मेरा-कर्ता से मुक्त होने के लिए तपस्या कर सकते हो। दुनिया में कहीं भी जाओ, तो वहां पर पहले भोजन और रहने की व्यवस्था करो, फिर भजन करो; यहां पर आप (सीधे) अपने कल्याण के लिए काम करो — यहां नर्मदा तट पर व्यवस्था हो जाती है। यह तपोभूमि है।
भूलना क्यों चाहते हो? बेचैनी तभी होती है जब वो विचार हमारे लिए गलत है; और गलत विचार तब है जब हमने उसके लिए काम किया है, नहीं तो भूलना क्यों चाहते हो? तो कर्म सही से करो।
भाई, जब ये (शरीर) छोड़ेंगे, तभी पता चलेगा ना। जैसे अभी मिले हो, तो मैं जब ये शरीर छोड़ूंगा, फिर मुझे मिलना, तो मैं बता दूंगा। पहले ये शरीर छोड़ा जाए, तब ना। मैं कैसे बता दूं? ऐसे कल्पना की बात कैसे कर दूं? मुझे (शरीर) छोड़ने के बाद मिलना; मैं जहां रहूं, वहां आ जाना, जैसे अभी आए हो — तब मैं बताऊंगा कि देखो यार, छोड़ने के बाद यहां है; तभी बताऊंगा ना।
देखो भैया, हम आत्मा-परमात्मा की बात नहीं करते। मैं सीधी बात बता दूं — मैं भी आपकी तरह उस दुनिया में था; मैंने अपने आप को उस दुनिया से हटाया, और मैं एकदम खुश और प्रसन्न हूं, अपने आनंद में रहता हूं। और अगर आपको ऐसा चाहिए, तो फिर आपको वहां से हटना है, तो हटने का मार्ग मेरे पास है। आप पूछो, लेकिन आप पूछोगे अपने तरीके से, और मैं जवाब दूंगा जितना मैंने समझा है, उतना ही दूंगा ना, क्योंकि प्रत्यक्ष तो प्रत्यक्ष है। तो मैं वहां से निकला और मैं यहां हूं, और आप वहां से निकलना चाहते हो, और मैं निकल पाया हूं, तो मैं भी आपको निकलने का मार्ग बता दूंगा — बस, बात खत्म हो गई। अब वो परमात्मा जाने, आत्मा जाने।
(सूक्ष्म बॉडी होती है —) सिद्ध कैसे करोगे? (किताबों में) पढ़ा है ना — परमात्मा के बारे में भी कहीं ना कहीं पढ़ा होगा, (तो) परमात्मा को (भी) कैसे ना बोल दिए?
हां, तो मैं भी यही समझता था; जब चला था, तो (यही सोचा)। ये तो बाद में, जब यहां पहुंचा, तब पता चला कि अब तो यात्रा शुरू हुई मूल की; अभी तो यात्रा छूटने की हो रही थी। मुझे जहां तक पता था — जैसे आपको पता है, वैसे मुझे पता था — कि आत्मज्ञान, बस बात खत्म। लेकिन नहीं, आत्मज्ञान के बाद ही शुरुआत होती है मूल की यात्रा की; अभी तो इस भवसागर से छूट के आने की (यात्रा) है।
(टाइम पीरियड —) किसी का कुछ टाइम नहीं है। क्योंकि आप कितने टाइम में फंसे हो — है आपके पास फंसने का टाइम? तब निकलने का टाइम क्या पूछ रहे हो? निकलने का टाइम क्या बताया जाए?
(शिष्य गुरु को नहीं ढूंढता, गुरु शिष्य को ढूंढता है —) आप लोग भले ही हजारों किलोमीटर की यात्रा करके आए हुए हैं, लेकिन वास्तविक रूप से (बुलाया) मैंने ही आपको यहां पे। जितने लोग आए हैं, मुझे सुनकर ही तो आए हैं। अगर मैं बोलता ही नहीं, तो तुम मेरे बगल से भी निकल जाते; अगर मैंने तुम्हें बुलाया, तभी तो तुम आए, नहीं तो यहां पहुंच ही नहीं पाते। अगर मैं बोलता ही नहीं, कहीं पड़ा रहता, तो हो सकता है मैं तुम्हारे घर के बगल में ही (होता)। तो गुरु बुलाता है, तभी लोग पहुंच पाते हैं; अगर बोले ही नहीं, तो पहुंचोगे कैसे? उसने पहले पुकारा, तभी तो तुम आए; अगर वो पुकारे ही नहीं, तो तुम आओगे कहां?
क्योंकि कुछ चाहिए में समय काम करता है ना। आपको घड़ी कब देखनी होती है? जब कोई काम कर रहे हो; और काम नहीं है, तो घड़ी की क्या जरूरत है? चाहिए में समय का काम है; और कुछ नहीं चाहिए, तो समय (के) पार हो गए। (विचार है तो समय है —) नहीं, चाहिए है तो समय है। पहले जरूरत, चाहिए का जन्म होता है, तब सब — विचार, समय — आ जाते हैं। अगर चाहिए ही नहीं, तो फिर विचार का हमारे जीवन में कोई मतलब ही नहीं है।
चलो, अच्छा है। यात्रा तो चल रही है ना। बस यात्रा से मत मुड़ना, चाहे जहां भी रहो — ये लगे कि मैं अपने आप में होने की यात्रा कर रहा हूं। बहुत अच्छी बात है। बस इसे निरंतर याद रखो कि अपने आप में स्थित होना है। और अब ऐसा कोई कर्म ना हो कि मैं और कहीं फंसूं। अब तो फंस चुका जितना फंसना था; लेकिन अब ऐसा कोई कर्म ना हो कि मैं फंसूं। क्योंकि आगे (बंधन) नहीं होगा, तो छूटने वाला होगा; अगर कोई नया कर्म-बंधन नहीं बना, तो पिछले से तो अपने आप को धीरे-धीरे तुम निकालोगे।
होना है अपने आप में — बस इसको याद रखो, और इसके लिए काम करो; दोनों बातें हैं। राजा बनना है, याद है; लेकिन राजा बनने के लिए वो काम भी तो करना पड़ेगा। तो मुझे अपने आप में होना है — इसका मतलब मैं कहीं हूं, तो वहां से बिना हटे अपने आप में नहीं हो पाऊंगा। तो अब मुझे याद रखना है कि मुझे अपने आप में होना है, लेकिन मुझे यह भी याद रखना है कि मुझे वहां से हटना है। अब मुझे हटने के लिए काम करना पड़ेगा; सिर्फ याद ही रखने से कुछ नहीं होगा। ऐसा ना हो कि याद रखते-रखते हम चले जाएं। इसी बात पर बहुत गौर से चिंतन करना कि मुझे अपने आप में होना है, इसका मतलब मैं कहीं हूं, तो मैं कैसे वहां से हटूं, क्योंकि तभी मैं अपने आप में हो पाऊंगा ना; मैं जहां हूं, वहां से बिना हटे अपने आप में नहीं हो पाऊंगा। तो हटने के लिए काम जरूर करना। ऐसा ना हो कि जिंदगी में सिर्फ शब्द ही रह जाएं और मैं वहीं पड़ा का पड़ा रह जाऊं, कल्पनाओं में। तो इसका विशेष ध्यान रखना, क्योंकि ऐसे में बहुत लोग जिंदगी गुजार देते हैं।
हां, आत्मानुभूति के बाद — उसके बाद जब हम अपने आप में स्थिर हो जाएंगे — उसके बाद यात्रा शुरू होगी। कहने का अर्थ ये है कि जहां से (मूल का) रास्ता कटता है, उसकी जगह हम कहीं और घूम रहे हैं। तो अभी पहले हमें (उस) रास्ते पर आना है, एक जगह; उसके बाद फिर यहां आना। तो यहां आने के रास्ते के लिए — अभी तो हम कहीं भटक रहे हैं; वहां से मेन रास्ते पर आना है। तो अभी हम भटक रहे हैं, यहां तो पहुंचे ही नहीं, फिर आगे के रास्ते की तो बात ही छोड़ो। तो हम भटक रहे हैं और बोल रहे हैं कि अरे, ये होता है, वो होता है — बड़ी-बड़ी बातें। लेकिन मेन रास्ते तक, चौराहे तक तो पहुंच ही नहीं पाए। केंद्र उसी को कहते हैं। (अनुभूति होती है तो पता चलता है कि कहीं जाना ही नहीं है —) हां, जाने से मुक्त हो जाते हैं।
लेकिन आपस में बात करोगे, तो बोलना पड़ेगा ना; संबोधन तो करना पड़ेगा। करोगे क्या — मौन? मौन तो तभी कर पाओगे जब किसी और से नहीं बोलोगे। और अगर आप जरूरत में बोल रहे हो, तो बोल के भी मौन हो। तो जब आपस में बात करनी है, तो शब्दों का संबोधन तो करना ही पड़ेगा; बिना संबोधन के सामने वाला कैसे समझेगा, और सामने वाले को आप कैसे समझोगे? आदान-प्रदान जब होता है, तो हमें शब्दों का सहारा लेना पड़ता है; और आदान-प्रदान अगर खत्म हो गया, तो फिर शब्द आप (किसके लिए) निकालोगे? अगर आपके सामने कोई और ना हो, तो आप अपना नाम लोगे ही नहीं — लोगे कहां, किसके लिए लोगे? अगर लोगे, तो आपको हंसी आएगी। तो जब आपस में बात होती है, तो हर शब्द का संबोधन करना पड़ता है बताने के लिए। (इसमें) समस्या नहीं है — जब आपको बताना हो, तो संबोधन कर दो, और फिर अपने आप में रहो, बात खत्म।
देखिए, अगर आपसे कोई रास्ता पूछ रहा है, तो आपको लेफ्ट-राइट तो बोलना पड़ेगा। (आप कहो कि) मैं मौन हूं — तो आपके मौन होने से वो थोड़ी पहुंच जाएगा? अब तुम कहोगे, मैं मौन हूं, मेरे अंदर तो रास्ते का पता है, तुम निकाल लो — तो बिना आपके बोले थोड़ी निकलेगा? आप बोलो कि मैं मौन हूं, रास्ता मेरे अंदर है, तुम मुझे देख के निकाल लो — तो थोड़ी निकाल पाएगा। रास्ते के लिए आपको लेफ्ट-राइट बोलना ही पड़ेगा; लेकिन आप रास्ता बताने में थोड़ी ना फंस जाओगे। फंसोगे तब, जब रास्ते का पता नहीं होगा और रास्ता आप बता दोगे — तब फंस गए, क्योंकि आपको फिर आत्मग्लानि होने लगेगी ना, अगर वो चल दिया। हो सकता है आपने गलत रास्ता बता दिया, वो चला तो गया, लेकिन आत्मग्लानि ले ढोते रहोगे। और अगर आपको पता है और नहीं बताओगे, तो भी आत्मग्लानि होगी। तो बोलना तो पड़ेगा। बोलने में फंसना नहीं है; फंसना तब है जब पता नहीं है और बोलते हैं। और जब ना पता हो, तो इतना कह दो कि नहीं पता है — तब नहीं फंसोगे। मतलब, जैसा है वैसा बता दो, तब आप कभी नहीं फंसोगे। ईमानदारी ये भी है — पता है, बता दो; नहीं पता है, यह भी बोल देना कि नहीं पता है; यह भी एक ईमानदारी है।
हाथ नहीं जोड़ना चाहिए; उचित तरीके से इलाज कराना चाहिए।
(परमात्मा के शरणागत —) अब परमात्मा है ही नहीं सामने, तो शरणागत कैसे करोगे? शरणागत भी तो एक कल्पना हो जाएगी आपकी। तो रोग का इलाज (उचित तरीके से कराओ)।
हां, तो या तो जानकर मुक्त हो जाओ, या तो यह समझ में आ जाए कि जानने के लिए कुछ नहीं बचा, जानने के लिए कुछ है नहीं। क्योंकि जिसे आप जान रहे हो, वो प्रतिपल बदल रहा है, तो आप उसे क्या जानोगे? तो आप यह समझिए कि जिसे मैं जानना चाहता हूं, वो तो प्रतिपल बदल रहा है, वो तो कभी जाना ही नहीं जा सकता। तो जितने में मैं जी सकूं, जितने में मैं अपनी जरूरत पूरी कर सकूं, उतना मेरे लिए जानना जरूरी है। बस — जितने में मैं अपने बंधनों से अपने आप को छुड़ा लूं, उतना जानना जरूरी है; बस, और कुछ नहीं।
सूर्य — आपने सूर्य का बोला, तो सूर्य ऊर्जा दे रहा है, उजाला दे रहा है, धूप दे रहा है, ताप दे रहा है; तो वो भी तो किसी से (लेकर) दे रहा है, उसके पास भी तो कहीं से आ रहा है। हमें नहीं पता है कि कहां से — यही तो गड़बड़ी हो जाती है। वह स्रोत है, लेकिन स्रोत सीधा उससे नहीं है; उसमें भी (ऊर्जा का) स्रोत कहीं से आ रहा है। तो ये यहां से होके वहीं जा रहा है, बस ऐसे घूम रहा है; मेन स्रोत तक ये पहुंच रहा है। वो अग्नि बन रहा है — अग्नि, पृथ्वी, वायु, जल, आकाश; खाली स्पेस को आकाश तत्व कहते हैं — तो ये पंच तत्व में विलीन हो रहा है। सूर्य से ये सीधा थोड़ी ना आ रहा है; सूर्य भी तो कहीं से ले रहा है।
लेकिन अब ये यहां खत्म थोड़ी ना हो रहा है। कोई चीज खत्म नहीं हो सकती, रूपांतरण हो सकती है। ये घुमा-फिरा के वहीं जा रहा है। जैसे अभी हम साधन से विद्युत को मशीन में लेते हैं, फिर हम यूज़ करते हैं, तो वहीं चला जाता है ना; कहां खत्म होता है? रूपांतरण होता है। कोई चीज खत्म नहीं होती है; रूप का नाश होता है, रूपांतरण होता है, खत्म नहीं होता — इसको विशेष ध्यान रख कर लेना। ये यूज़ होकर वहीं जा रहा है।
अब आपको इसको पता लगाने के लिए कि कहां जा रहा है, तो सूर्य के पीछे जाना पड़ेगा; पहले देखना है कि ये आ कहां से रहा है; और देखोगे तो वहीं जा रहा है। उसकी यात्रा यही है कि वहां से आना और फिर वहीं जाना; ऐसे यहां हर वस्तु घूम रही है। जैसे आज आप कपड़ा पहने हो, तो आपको क्या लग रहा है — ये पहली बार आप ही पहने हो? इसके पहले कहीं वो नहीं था क्या? इस रूप में नहीं था; भिन्न-भिन्न रूपों में तत्व घूम रहा है। और (यह) चाहिए में घूम रहा है। चाहिए से मुक्त हो गए, बात खत्म — तुम रूप से मुक्त हो जाओगे। तो आप बाहर के रूप से मुक्त होगे, तो आपको आत्म का बोध होगा, आत्मज्ञान होगा; और जब आप इस रूप से — अपने पिंड से — मुक्त हो जाओगे, तो आपको ब्रह्म का ज्ञान होगा। तो अभी तो आप रूपांतरण में फंसे हुए हो। ब्रह्मज्ञान (की बात छोड़ो) — पहले तो आत्मज्ञान तक पहुंचो। अब आत्मज्ञान क्या है, ये भी पूछोगे — पहले तो आप पहुंचो, यात्रा तो करो।
भाई, हमें इसके बारे में कोई नॉलेज नहीं; हम पढ़े नहीं। आप पढ़े हो, सही है; लेकिन अगर मुझे नहीं पता है, तो मैं कैसे बता दूं? और मुझे (यह) लेना भी नहीं है। और अगर आपको इसके बारे में जानकारी चाहिए, तो अनहद नाद खोलने वाले, खुलवाने वाले बहुत लोग हैं — आप वहां जाइए।
मैं तो आपसे एक ही बात कहना चाहता हूं — इस बात को बहुत ईमानदारी से समझो। पहले तो आप खुद ईमानदार बनो। इस दुनिया में जीने के लिए दो रास्ते हैं — एक बेईमानी-दुष्कर्म, एक ईमानदारी-सत्कर्म; सीधी सी (बात)। तीसरा कोई रास्ता है? नहीं। बेईमानी-दुष्कर्म करके हम फंस गए; ईमानदारी-सत्कर्म करके हम निकल जाएंगे — बस, एकदम आसान। तीसरी बात करने की कोई आवश्यकता ही नहीं है; तीसरी बात करना मतलब समय को बर्बाद करना। अगर मेरे चक्र — चाहे सात चक्र हों, चाहे 7 लाख चक्र हों — तो क्यों बंद हुए हैं? बेईमानी-दुष्कर्म करके। सीधी सी बात समझ में भी आती है। तो ताला जिस चाबी से बंद हुआ है, उसी चाबी से खुलेगा — बस ऐसे करके घुमाना है; और (चाबी) उसी छेद में जाएगी। सोचोगे कि किसी और छेद में घुमा के कर दूं, तो नहीं होगा। तो भैया, बेईमानी-दुष्कर्म करने से हम एकदम नीचे आ गए हैं; अब हम ईमानदारी-सत्कर्म अगर करेंगे, तो हम धीरे-धीरे उठकर यहां पर आ जाएंगे, बात ही खत्म हो जाएगी। और अगर आपने यह नहीं अपनाया, तो (ताला) खुल ही नहीं सकता।
तो मेरा कहना एक ही बात है भैया — यह सब के चक्कर में ना पड़ के, अगर निकलना है, तो एकदम सीधा-सरल रास्ता है, अपना लो; और बिना ये अपनाए कल्याण नहीं है। ये प्रत्यक्ष ज्ञान में जो बताया जा रहा है, ये सबमें मिल जाएगा, (लेकिन) इसमें कोई नहीं मिलेगा — याद रखना। आप जिस मार्ग से चल रहे हो, ये सबमें सहायक है, लेकिन इसमें आप कुछ मिक्स नहीं कर सकते। इसको पकड़ लिया, तो बातें खत्म हुईं। अगर आप कुछ पकड़े हो, और इसको अपना लिया, तो वो आपको उठाने में सहायक हो जाएगा; और नहीं तो आप गिर तो रहे हो। यह मूल है — प्रत्यक्ष ज्ञान, ईमानदारी, सत्कर्म — और यह सबमें मिल जाएगा, इसमें कोई नहीं मिलेगा। अगर आपने यह पकड़ लिया, तो कुछ करने की जरूरत नहीं है; लेकिन कुछ कर रहे हो और इसको पकड़ लिया, तो कुछ भी सहायक बन जाएगा, और धीरे-धीरे वो छूट जाएगा। तो आप प्रत्यक्ष ज्ञान को समझो, और अगर निकलना है तो निकल जाओ। अगर सिद्धि के चक्कर में (चक्र) ऐसे ही खोलना है, तो खुलवाते रहो।
(ओंकार की ध्वनि आत्मज्ञान के पहले या बाद —) किताब में (लिखा है)? आप उस किताब के राइटर हो? जिसने भी लिखा, उससे मिलना पड़ेगा। और मेरे जीवन में तो इसका कोई मतलब ही नहीं है, क्योंकि अगर मुझे कोई धुन भी (सुनाई दे रही) है, तो वो मुझसे अलग है। अगर वो धुन कहीं से आ रही है, तो वो जहां से आ रही है, वो बदल जाएगा; वो धुन भी बदल जाएगी — धुन सुनने वाला, धुन, और जहां से आ रही है, सब बदल जाएगा। तो मुझे धुन से क्या मतलब? क्योंकि अगर मैं धुन सुन रहा हूं, तो धुन सुनने वाला और धुन अलग हैं ना, और जहां से धुन आ रही है, वो भी (अलग है)। इसीलिए कहा गया है — शब्द; धुन तो शब्दों में ही है ना — शब्द, दृश्य, गंध, रस, स्पर्श। क्योंकि अगर आप धुन में भी पड़े हो, तो कहीं ना कहीं रूप है। क्या बिना रूप के धुन पैदा हो सकती है? धुन कब पैदा होती है? जब कोई चीज टकराती है; और कोई चीज बिना रूप के टकराएगी ही नहीं।
(वह खुद-ब-खुद बजता है, अनाहत —) मैं आपसे वही कह रहा हूं — इस बात को बहुत गहराई से समझिए। (आप) उसको अनहद का नाम दे दो, कुछ भी नाम दे दो; लेकिन अगर धुन आ रही है, तो कुछ दो चीजें टकरा रही हैं, और दो चीजें टकरा रही हैं, तो रूप में ही टकराएंगी; बिना रूप के टकरा ही नहीं सकतीं। तो अगर मैं धुन में फंसा हूं, मतलब उस रूप में फंसा हूं; और जिस रूप से धुन आ रही है, उस रूप में बदलाव आएगा, तो वैसे धुन में बदलाव आएगा। और अगर मैं धुन का आदी हो गया, और जैसे ही धुन में बदलाव आया, तो मैं तो पागल हो जाऊंगा उस धुन के लिए — एकदम मैं आश्रित हो गया ना उस पे। इसलिए धुन के चक्कर में मत पड़ो।
देखो, जिसको जहां कुछ मिल रहा है, वहां जा रहा है। (आपको) लगता है भटक रहा है। तो मैं यह कह रहा हूं कि अगर उसको भोजन की जरूरत होगी, तो खुद पैदा कर लेगा, अगर कहीं से नहीं मिलेगा। वो भटक नहीं रहा है, कुछ खोज रहा है। हर व्यक्ति कुछ पाने में ही घूम रहा है, और ज्यादा पाने में ही वो जा रहा है। आप जहां हो, वहां से देख पा रहे हो (कि) यार, ये ज्यादा था, वो कम में घूम रहा है। ना ना — उसे वो ज्यादा लगा है, इसे ये कम लगा है, तभी वो गया। (फैमिली को छोड़कर गया और) वापस नहीं आ रहा, क्योंकि फैमिली से ज्यादा कुछ मिल गया।
देखो, मैं वही कह रहा हूं — व्यवस्था को चलाने वाला कौन है? वो जाने। मुझे तो निकलना है ना। मैं इस दुनिया का व्यवस्थापक थोड़ी ना हूं; यह तो व्यवस्था करने वाला जाने। मैं तो अपने जीवन के उद्देश्य पर काम करूंगा ना; मुझे जहां ज्यादा मिलेगा, मैं तो वहां जाऊंगा। भाई, उसको अपनी पीढ़ी नहीं चलानी है, तुमको चलानी है — तुम सोचो ना। लेकिन तुम अपने लिए उसको क्यों जिम्मेदार ठहराते हो? तुम भी पीढ़ी बढ़ाओ; उसे नहीं बढ़ानी है भाई। आप पीढ़ी बढ़ा के खुश हो, वो पीढ़ी नहीं बढ़ा के खुश है। वो व्यवस्थापक थोड़ी ना है; वो तो जिंदगी में आया है, उसे जहां समझ में आ रहा है, वहां जी रहा है। हमें ऐसा लग रहा है कि वो भटक रहा है; ना ना, वो भटक नहीं रहा है, वो कुछ ना कुछ समझ रहा है; और यहां सब अपनी समझ से ही समझेंगे। तो आप परिवार में रहकर खुश, वो परिवार छोड़ के खुश। जीव वहीं जाता है जहां उसके मन का मिलता है — याद रखना। आपके पहले क्या यह दुनिया नहीं चल रही थी?
(अकर्मण्यता —) वो अपनी जरूरत में जी रहा है, उससे आपकी व्यवस्था कहां बिगड़ रही है? कैसे नहीं चल पाएगी? अपने जीने के लिए तो करेगा। और अपने जीने के लिए नहीं करेगा, तो व्यवस्था लेके ही क्या करेगा? जब सब ऐसे ही हो जाएंगे, और व्यवस्था किसी को नहीं चाहिए, तो व्यवस्था बिगड़ी कहां? व्यवस्था तो तब बिगड़ती जब मुझे चाहिए और व्यवस्था ना मिले। और जब सब ऐसे ही हो गए कि मुझे कुछ नहीं चाहिए, तो व्यवस्था की जरूरत कहां है? नहीं चाहिए को अगर हम मानसिक रूप से नहीं समझ पाते हैं, तब अकर्मण्यता है; अगर नहीं समझे, तो बात अलग है। मुझे देखना है कि मैं कहां हूं, मुझे यह नोट करना है कि मैं कहां हूं।
हर व्यक्ति अपनी जरूरत की पूर्ति के लिए काम (करता है)। पहले वह ज्यादा करता था, ज्यादा भोग करता था; अब वो जरूरत में ही जी रहा है, तो जरूरत से ज्यादा काम क्यों करे? आप सोच रहे हो कि वो जरूरत में जिए, लेकिन काम पहले जैसा करे — क्यों करे भाई? क्योंकि उसने अपनी जरूरतें एकदम दायरे में कर लीं, अपने आप को सिकोड़ लिया, अपनी जरूरत में जी रहा है; बहुत फैला लिया था। वो जरूरत में जीने लगा, तो ज्यादा काम क्यों करेगा? वो तो चिंतन करेगा ना अपने आप को निकालने के लिए। और यहां हर व्यक्ति — आप देख लो — अपनी जरूरत के लिए काम कर ही लेता है; कोई शरीर से करता है, कोई बातों से करता है; कोई शरीर से मेहनत करके अपनी भोजन-व्यवस्था, कपड़े, रहने की व्यवस्था कर लेता है, कोई सेवा करके कर लेता है; लेकिन अपनी जरूरत के लिए करता है। वह किसी के लिए करे या ना करे, अपने लिए तो करेगा ही करेगा। व्यवस्था कभी नहीं बिगड़ती। गड़बड़ इस बात की है कि आप तुलना में हो। व्यवस्था कभी बिगड़ ही नहीं सकती भाई; लेकिन आप ज्यादा के चक्कर में हो। वो कह रहा है कि जितनी हमारी जरूरत है, हम उसमें रहेंगे; और तुम कह रहे हो कि नहीं, बगल वाले के मकान से बड़ा मकान बनाओ — गड़बड़ी यहां इस बात की है। व्यवस्थाएं कभी नहीं बिगड़तीं, क्योंकि हर जीव — चाहे वो चींटी ही क्यों ना हो — अपना भोजन ढूंढ लेता है। यहां हर जीव अपने लिए तो काम कर ही रहा है — हम तुम्हारे लिए नहीं काम करेंगे, तुम जानो; लेकिन मैं दुनिया में कहीं भी रहूंगा, मुझे अपने लिए तो काम करना ही पड़ेगा ना। तो व्यवस्थाएं कभी नहीं बिगड़ सकतीं।
(जंगल चला गया, पर जरूरी नहीं उसे आत्मज्ञान हो जाए —) वह जाने ना। आपने कहा कि वो जंगल चला गया — क्या जंगल जाने से आत्मज्ञान हो जाएगा? तो क्या जंगल नहीं जाता तो हो जाता? क्या यहां रहने से आ जाता? वहां भी आ सकता है, यहां भी आ सकता है, क्योंकि आत्मज्ञान समझ की बात है। मेरी समझ कहां विकसित होगी, ये मैं तय करूंगा, ये तुम नहीं तय करोगे; आप तय करोगे तो मेरी समझ विकसित नहीं हो सकती। यह मैं तय करूंगा कि मेरी समझ घर में विकसित होगी या जंगल में। अगर सामने वाले ने तय कर लिया कि मेरी समझ जंगल में विकसित होगी, तो घर में कभी विकसित होगी नहीं, क्योंकि विकसित होने के लिए वो (घर में) काम ही नहीं करेगा; और उसकी समझ जंगल में विकसित हो जाएगी, क्योंकि उसने तय कर लिया है। पहले तो धारणा बना ली है कि मेरी समझ जंगल में ही विकसित होगी, यहां होगी ही नहीं; अब उसने पक्का कर लिया है, तो (यहां) उस समझ को बढ़ाने के लिए कोई काम ही नहीं करेगा। तो जिसकी समझ जहां विकसित हो रही है, वो वहां जा रहा है। आप किसी को पकड़ो मत; उसको जाने भी देना चाहिए, और जाने ही देना चाहिए। और जिसको जहां पहुंचना होता है, वो पहुंच जाता है। यह प्रकृति कल्पवृक्ष की तरह है — आपको जो चाहिए, उसके लिए आप काम करते हो; और आप आज जहां हो, अपने काम से ही हो, और आगे भी आप जहां भी जाएंगे (अपने काम से ही जाएंगे)। क्योंकि अगर देखा जाए, दो-चार साल पहले आप कहीं और थे, तो क्यों थे? आपको वो चाहिए था। अब वहां से क्यों हटे? क्योंकि आपको और कुछ चाहिए। पहले वो सही लग रहा था, तो उसके लिए खूब प्रयास किया, खूब मेहनत की; लेकिन अब लगा कि नहीं, इसमें कुछ नहीं है, तो जिसमें है, आप उसकी ओर चलिए।
तो यहां पे हर जीव अपनी जरूरत में घूम रहा है। किसी ने बस अपनी जरूरत शरीर तक देखी, किसी ने अपनी जरूरत मान तक देखी — मान, सम्मान, नाम, शोहरत, पैसा — वो भी एक जरूरत है। आपके हिसाब से कोई काम का नहीं है, लेकिन ये आपके हिसाब से है ना। कुत्ता हड्डी चूस रहा है, तो आपको लग रहा है कि यार, इसके ही मुंह से खून आ रहा है; लेकिन उसे बड़ा मजा आ रहा है। उसकी जरूरत है, तभी तो चूस रहा है, और उसे खून भी मिल रहा है। यह तो तुम्हें लग रहा है कि उसे कुछ नहीं मिल रहा है; लेकिन उसे बहुत कुछ मिल रहा है; अगर बहुत कुछ नहीं मिलता, तो चूसता ही नहीं। अज्ञान तुम्हें लग रहा है; उसे तो मिठास लग रही है; उसका ही खून सही, खून तो उसे मिल रहा है। समझना इस बात को — उसने हड्डी चूसने की शुरुआत कहां से की? खून के लिए की ना, क्योंकि कभी ना कभी उसने वो टेस्ट लिया है, उस हड्डी से कभी ना कभी खून निकला है; तो अभी भी तो निकल रहा है। वैसे हर व्यक्ति को हर चीज मिल रही है; अगर नहीं मिलता, तो पकड़ता नहीं। आप चींटी को पकड़ो — नमक भी सफेद, शक्कर भी सफेद; एक जगह नमक रख दो, एक जगह शक्कर रख दो, और आप (चींटी को) नमक पे डालो, तो रुकेगी क्या? क्योंकि उसमें उसे कुछ मिल नहीं रहा है; और शक्कर से भगाओ, तो भी नहीं जाएगी। यहां हर जीव अगर कुछ पकड़ रहा है, तो इसका मतलब उसे कुछ मिल रहा है; और वो तब तक पकड़े रहेगा जब तक मिलता रहेगा; ऐसे नहीं छोड़ने वाला है। वो तब छोड़ेगा जब उसको समझ में आ जाएगा — या तो (कहीं) इससे ज्यादा है, तब छोड़ देगा; या तो समझ में आ जाएगा कि इससे कुछ नहीं मिल रहा है, तब (जहां) मिलेगा उसके लिए छोड़ देगा। ऐसे नहीं छोड़ने वाला है; ऐसे छुड़ाओगे, तो चोरी से करेगा — तुम्हारे सामने नहीं करेगा, तो आड़ में करेगा। बात उसे समझ में आनी चाहिए; आपके समझाने से वो नहीं छोड़ेगा। उसकी जिंदगी उसकी समझ से है, और अपनी-अपनी समझ से जीव जहां है, वहां है, और उसे कुछ ना कुछ मिल रहा है।
तो व्यवस्थाएं कभी बिगड़ नहीं सकतीं, क्योंकि हर जीव किसी के लिए करे या ना करे, अपने लिए तो करेगा। यहां पे सब अपने-अपने जीने के लिए काम कर रहे हैं; जितनी जरूरत है, उतना काम कर ही (रहे हैं)। कोई शरीर से मेहनत करके अपना खा-पी रहा है, कोई दिमाग से मेहनत करके खा-पी रहा है, कोई अपने पूर्वजों का ही खा रहा है, कोई मेहनत ही नहीं कर रहा है — ऐसे लोग बहुत मिलेंगे आपको; वो कहते हैं, हमको करने की क्या जरूरत है? उसने सही-गलत अपने आप में मान रखा है; उसे मिल रहा है, ऐसे ही नहीं पकड़ा है। गड़बड़ ये है कि आपको लग रहा है कि उसे कुछ नहीं मिल रहा है, ये क्या कर रहा है; (उसे) मिल रहा है, तभी कर रहा है। और यहां व्यवस्थाएं कभी बिगड़ नहीं सकतीं, क्योंकि सबको अपने-अपने लिए तो करना ही पड़ेगा; वो चाहे जंगल भी जाए, तो खाने के लिए तो वो वही मेहनत कर रहा है ना जो तुम कर रहे हो। और अगर वो जंगल में भी है, और उस जंगल में अगर आप उसे कुछ देने जा रहे हो, तो आपको उससे कुछ मिल रहा है, ऐसे थोड़ी देने जा रहे हो। वही कह रहा हूं कि यहां पे हम एक-दूसरे के पूरक हैं, और हम अपने लिए काम कर लेते हैं; बस काम करने का तरीका अपना-अपना है — कोई शरीर के द्वारा कर रहा है, कोई मानसिक कर रहा है, तो कोई बस ऐसे ही बैठ के कर रहा है; लेकिन कर रहा है। तो अगर कोई जंगल जा रहा है, तो जाने देना।
आश्रम की व्यवस्थाओं में कोई कमी ही नहीं होती। लोग इंटरनेशनल (से भी) लगाते रहते हैं, लाखों रुपए। (अब) नंबर है, बैंक अकाउंट दे दिया हूं। जब एक साल तक नहीं दिया था, तो लोग फोन करके पूछते थे, अकाउंट में पैसे डालते थे।
कुत्ते इसलिए पाले कि यह जंगल है, और यहां तेंदुआ वगैरह भी इस क्षेत्र में रहते हैं; तो आप लोगों की सुरक्षा के लिए उन्हें पालना पड़ा। 12-13 साल नहीं पाले थे, क्योंकि मुझे इसकी जरूरत नहीं पड़ी। तो पालना इसलिए पड़ा कि एक व्यवस्था है, और उस व्यवस्था की सुरक्षा के लिए है; इसलिए इन्हें पालना पड़ा।
रूप से परे होने के बाद, रूप से मुक्त होने के बाद (वह) भगवान हो जाता है। अरे, सब एक ही से हैं। देखो, किसी ने अपने अवतार को समझा, और किसी ने नहीं समझा — इतना ही फर्क है। अवतरित तुम भी हो। आप देखो ना कि अवतरित उन्हें कब बोला गया? जब वो अपने आप को समझ लिए; उसके पहले तो तुम्हारी तरह घूम रहे थे, और आप ही की तरह जी रहे थे। तो किसी ने अपने अवतार को समझा, किसी ने नहीं समझा, क्योंकि सब एक ही से हैं ना। तो सब तो एक जैसे हैं; ऐसा थोड़ी ना है कि उनका परमात्मा अलग है, मेरा अलग है। तो अवतरित सब हैं; किसी ने अपने अवतार को समझा, किसी ने नहीं समझा। तो यहां पर यही बताया जा रहा है कि अपने अवतार को समझ लो; और आप तभी समझ पाएंगे जब ईमानदारी-सत्कर्म के साथ जीवन जिएंगे।
भाव ऐसे प्रकट होता है कि पत्नी से कुछ और मिल रहा है, मां से कुछ और मिल रहा है। उनके शरीर के द्वारा मां से कुछ और मिला है और पत्नी से कुछ और मिला है, इसलिए जब हम गले लगाते हैं, तो भाव अलग हो जाते हैं। जैसे आप आंख बंद किए रहो, देखो भी मत, और आपके हाथ में दोनों का हाथ दिया जाए — एक पत्नी का, एक मां का — और बताया जाए कि मां वाला हाथ पत्नी का है, और पत्नी वाला मां का है; तो आप दोनों हाथ से अलग-अलग फील करोगे। अगर आपको बता दिया जाए कि यह पत्नी का हाथ है, तो आप उसी हाथ से पत्नी वाली फीलिंग लोगे — समझना इस बात को — क्योंकि अभी आपने रूप को देखा नहीं ना। और पत्नी वाले हाथ को बता दिया कि मां का हाथ है, तो आप मां वाली (फीलिंग लोगे); और जैसे ही आप आंखों से देखोगे, तुरंत फीलिंग बदल जाएगी, आत्मग्लानि होने लगेगी। क्योंकि पत्नी से और कुछ मिल रहा था, मां से और कुछ मिल रहा था। हमारी जरूरतों ने ये अलग-अलग ऐसा बनाया; जैसी हमारी कोई जरूरत (जिसने) पूरी की, वो हमारे लिए वो हो गया।
वही दोस्त को कभी गले लगाते हैं, बड़ा सुकून मिलता है; और जब हमारे तरीके का नहीं होता, दुश्मन हो जाता है, तो उसको देख के भी गुस्सा आता है। सुकून कहां चला गया? उसी शरीर को देखकर एक दिन सुकून आ रहा था, और उसी शरीर को देखकर घिन आ रही है — क्यों? क्योंकि आपके तरीके से नहीं हुआ। बात यहां सिर्फ आपके तरीके की है; तरीके में भाव है। आपके तरीके से पूरा हुआ, तो वैसा भाव पैदा हो गया; नहीं पूरा हुआ, तो ऐसा भाव पैदा हो गया।
अब ये तो पैदा करने वाला बताएगा; अभी तो बायोलॉजी के स्टूडेंट वगैरह बता देंगे, तो आप जाके बायोलॉजी पढ़ लेना — ऑक्सीजन, H2O, (वह) कहां से — आखिरी में जाके (एक जगह) खड़े हो जाओगे। इसका कोई मतलब नहीं है; आप निकल जाओ, इसके लिए काम करो। बीज से वृक्ष, वृक्ष से बीज — यही घूम रहा है, इसे कभी नहीं जाना जा सकता। बस एक काम करो — इससे निकलो, क्योंकि इसके आगे कुछ है ही नहीं। तो आप बहुत करोगे — पानी कहां से, ऑक्सीजन क्या — जाते-जाते तुम एक जगह खड़े हो जाओगे; तो एक काम करो, यहीं खड़े हो जाओ। क्योंकि आप 20 साल बाद (भी) कहीं खड़े ही होने वाले हो, और प्रश्नचिन्ह ही रहेगा कि ये क्या है, कैसे बना — ये अभी भी है और आखिरी तक रहेगा। आप शुरुआत जहां से किए, 100 साल बाद आप अपने आप को वहीं पाए, तो मतलब क्या है? और मैं कह रहा हूं — जान भी लोगे कि कैसे बना, तो उससे क्या होगा? फाइनली आप पहुंच भी गए, (तो) कल्पना ही तो (है); क्या करोगे?
जो इसी क्षण, इसी समय है — उसको छोड़कर अपने आप में स्थिर हो जाओ, तो कोई बात है। सारे विचारों को छोड़कर, ईमानदारी-सत्कर्म अपनाकर, सत्संग सुनते हुए, निकल लो; बस अपना कल्याण कर लो। यह क्या है, उसका जवाब कभी नहीं मिल पाएगा। क्यों नहीं मिल पाएगा? इसका कारण है — क्योंकि जिसके बारे में पूछ रहे हो, वो प्रतिपल बदल रहा है, इसलिए नहीं मिल पाएगा। जो स्थिर है, वो मिल जाता है। स्थिर कौन है? पूछने वाला। जिसके बारे में पूछ रहे हो, वो (स्थिर) नहीं है; पूछने वाला स्थिर है। तो पूछने वाले तक पहुंच जाओ, बस बात खत्म है। अब उसके लिए उसे (जिसके बारे में पूछ रहे हो) छोड़ना पड़ेगा, बस।
अरे, उससे बहुत लोग लाभ लेंगे ना; आपको भी करवाना चाहिए। आप तो शिक्षक हो ना, इतनी पेमेंट है। पागल जैसी बात कर रहे हो — 1 लाख पगार है, और 6 लाख की ताकत नहीं है? कर्जा ज्यादा (मान) बनाने के चक्कर में ले लिया। अगर तुम अच्छे से जीते, तो कर्जा लेने की क्या जरूरत थी, बताओ — लाख रुपए पाने के बाद कर्जा? मतलब तुम बहुत ज्यादा मान के चक्कर में पड़ गए — विशाल बंगला चाहिए, यह चाहिए, हॉल चाहिए, वह चाहिए। तुम्हें तो एकदम बढ़िया से सत्कर्म करते हुए जीना चाहिए, शिक्षक की तरह जीना चाहिए; तुम तो शिक्षक से सेठ बन गए। आप शिक्षक हो, तो शिक्षक का जीवन कैसा होता है? जरूरत में जीना। आपका जीवन कितना खूबसूरत होता! आज आप कितने परेशान हो, क्योंकि आप सेठ की तरह जीने लगे। आपको तो एक शिक्षक की तरह रहना चाहिए; बच्चों को ये शिक्षा मिलती कि यह व्यक्ति जरूरत में जी रहा है। आपको इतना खड़ा करने की क्या जरूरत है, बताओ? वो (गोयल जी) 400 पेंशन पाते हैं; उन्होंने 6 लाख देकर सत्संग करवाया, और व्यवस्था अलग से की; और तुम 1 लाख के ऊपर पाकर कह रहे हो कि मैं उस लायक नहीं हूं। और इसके बाद मेरे कार्य में भी, इस व्यवस्था में, उन्होंने 10 लाख के ऊपर सहयोग दिया, वो तो अलग; उसके बाद सत्संग भी कराए, 6 लाख; उसके बाद आने-जाने का खर्च। और रहते कैसे हैं — आप लोगों की तरह; ऐसा थोड़ी ना कि (अलग ढंग से) रहते हैं — यहां वैसे ही रहते हैं गोयल जी।
भगवान का (भाग) मत निकालो, जरूरत का निकालो। आप जरूरत देखो — कहां जरूरत है, वहां दो। भगवान के नाम से तो लोग भीख मांगते हैं, क्वार्टर (दारू) मांग के पी लेते हैं; आप ऐसे लोगों को मत दो। आप देखो कि देने के पहले वो व्यक्ति क्या कर रहा है, और उसके कार्य में सहयोग दो — और (वह) आप ही के लिए तो कर रहा है। आज आप यहां पे आए हो — आप कितने अच्छे से जीवन जी रहे हो; इतने अच्छे से तो आप अपने घर पे नहीं जी रहे हो, जहां पर आपने कर्ज कर लिया। एक व्यक्ति ने इस स्थान को कैसा बना दिया है कि आपको यहां कुछ सोचना ही नहीं है — सोचो जरा। और (वह) कह रहा है — आजीवन रुको। लेकिन बड़प्पन से काम थोड़ी ना चलेगा; व्यवस्था के लिए पैसे तो चाहिए — आप वो सोचो जरा। व्यवस्था के पीछे अपना तप है; 12 साल तक हमने क्या किया — मैंने अपने आप को उस लायक बनाया ना, ज्ञान से, धन से, समझ से। तो रहो भैया, आजीवन रहो, लेकिन अपने आप को परेशान मत रखो। लाख रुपए पाने के बाद अगर परेशान हो, तो समाज के लोगों को शर्म आने लगेगी। (कहते हो) बहुत मस्ती में हो — और मस्ती में हो, तो जब सत्संग कराने को बोला, तो बोले मैं उस लायक नहीं हूं — तो मस्ती कहां गई?
जीवन में (ऐसे) सत्कर्म करो, जिससे समाज को भी लाभ हो और आपको भी लाभ हो। अब जैसे एक व्यक्ति ने कहा मैंने भंडारा कराया — तो मैंने उसे ज्ञान का भंडारा कराने के लिए बोला था। जिसको तूने खाना खिलाया, उसे क्या खाना नहीं मिल रहा था? क्या जिसको खाना खिलाया, वो भोजन नहीं कर रहे थे? और एक दिन भंडारा करने से — अगर एक दिन सब उपवास ही रख लेते, तो क्या हो जाता? तो बड़ा खुश है, बता रहा है कि मैंने भंडारा करा है — तो उस भंडारे का क्या मतलब? ऐसे ही अहंकार को लोग पोषण देते हैं। अब तुमने कहा कि तीन दिन के सत्संग का मैंने लाभ लिया — अब गोयल जी हमें ना बुलाकर, सत्संग ना करवाकर, भंडारा ही करवा देते, तो तुमको क्या लाभ होता? तो समझना चाहिए कि मैं क्या कर रहा हूं, और उससे समाज को क्या लाभ होगा। भंडारे से कुछ होने वाला नहीं है। और आपको एक बात बता दूं — भंडारे में जरूरतमंद कभी नहीं खा पाता; जरूरतमंद तो बेचारा रास्ता देखता रहता है, उसे बचा-खुचा दिया जाता है; एकदम सेठ लोग खाते हैं। भंडारे का कोई मतलब नहीं है। अगर भंडारा ही कराना है, तो ज्ञान का भंडारा कराओ, जिससे आत्मिक कल्याण हो। भंडारे में हमेशा ये (अच्छे) कपड़े पहने रहते हैं, वो खाते हैं; बचा-खुचा लास्ट में भिखारी की तरह लोग दे देते हैं, और वो लोग खिलाकर ये सोचते हैं कि हमने बहुत बड़ा पुण्य किया — हां, तेरे अहंकार को पोषण दिया, तो पुण्य किया ना! (और जो खाने आते हैं, वे) वीवीआईपी हैं, सोचेंगे कि मैं अपने घर पे खाना छोड़ के आ रहा हूं, एहसानमंद बन मेरा। तो भंडारा कराना है, तो ज्ञान का भंडारा करवाओ — या तो खुद करो, या तो कोई कर रहा है तो उसमें सहयोग दो, या तो खुद आत्मज्ञान को उपलब्ध होकर ज्ञान का भंडारा करवाओ।
नहीं, ऐसे नहीं, निःशुल्क है; मेंबरशिप वो मैंने नहीं की है। मेरे तो कितने लोग चैनल खोल लिए हैं; मैंने कॉपीराइट भी नहीं देखा; मैंने सबको बोल दिया है। मेरा चैनल है — आध्यात्मिक प्रत्यक्ष ज्ञान सत्संग। वो कोई और चलाता है, लेकिन अच्छा काम कर रहा है। कोई भी कर रहा है, तो अच्छा ही काम कर रहा है ना, चाहे कोई भी चलाए। मैं कॉपीराइट देता ही नहीं; अनेकों लोग चैनल चलाते हैं। तो मैं तो कह रहा हूं कि जितना ज्ञान को फैलाना है, फैलाओ। उनसे क्या हो रहा है कि उनको कुछ पैसे भी मिलेंगे, आगे और भी मिलेंगे, तो कम से कम वो गलत काम तो नहीं करेंगे।
(सुपर थैंक्स —) वो उनको मिलता है, लेकिन मैं कह रहा हूं, अच्छी बात है, देना चाहिए। क्यों देना चाहिए? वो चैनल किसी और का है; मैं कह रहा हूं वो सही है, क्योंकि वो चलाएगा कैसे? वो पूरा समय तभी दे पाएगा जब उसे भी पैसे मिलेंगे; और वो अगर ऐसा अच्छा काम कर रहा है, तो उसको अगर पैसे बढ़ेंगे, तो और अच्छा काम समाज के लिए करेगा। (कोई) गलत वीडियो बना के पैसा कमाता है, तब (दूसरी बात है); वो तो अच्छा काम कर रहा है — ज्ञान का भंडारा। तो मैं ये कह रहा हूं कि उसे भी मिलना चाहिए। अगर आप लोग सुपर थैंक्स में दे रहे हो, तो वो उसे ही मिल रहा है, लेकिन मिलना चाहिए; क्योंकि उसकी भी जरूरतें हैं, बेसिक जरूरतें हैं। अगर वो दो घंटा देता होगा, और उसकी जरूरत पूरी हो जाएगी, तो वो पूरी तरह देगा, तो और तेजी से (वीडियो) काट-काट के फैलाएगा। वो वीडियो को सुनता है, कम शब्दों में काट के अच्छी तरह आप तक पहुंचाता है। तो मेरा कहना है — कोई भी ऐसा काम करे, उसे सहयोग करना चाहिए।
आपकी स्थिति तो आपको पता है। नहीं पता है, तो यहां आ जाओ, कुछ दिन रहो; लेकिन आपकी स्थिति मैं बताऊंगा नहीं — आपको ही पता चल जाएगी। क्योंकि आपको ही पता चलेगी, तभी कोई मतलब होगा; मेरे बताने से क्या होगा?
उसमें कर्म फल आएगा इसलिए कि हमारे पास समझ होती है। एक होता है कि जैसे हम गाड़ी चलाते हैं, हम जा रहे हैं, एक्सीडेंट हो गया। एक होता है हम जान के किए। तो जान के करने वाला, समझ के करने वाला कर्म का बंधन बंधा, और ऐसे ही हो गया — वो कर्म बंधन नहीं बचेगा। तो कंस ने जानबूझकर किया था, पूरी समझ के साथ किया था। वो एक समझ वाला व्यक्ति था। वो कोई अबोध नहीं था, कोई पागल नहीं था, कोई मंदबुद्धि नहीं था। वो एक सम्राट था, राजा था और वो एक राज्य को चलाता था। उसके पास समझ थी अच्छे-बुरे की।
तो एक घटना तो बाद में घटी। उस घटना को टाल भी सकता था। कोई भी व्यक्ति — अगर उसे आकाशवाणी हुई, चाहे जैसे भी बातें हैं — तो अगर हमारे साथ कुछ अपराधी का व्यवहार किया जाता है तो हमारे द्वारा कुछ ऐसे कर्म किए गए होंगे। तो उसके बाद भी उसने सिर्फ अपनी मौत को रोकने के लिए अनेक बच्चों को मारा, अपने क्षेत्र में। फिर भी कृष्ण भगवान जब मारने आते हैं तो भी मारने से पहले समझाते हैं कि अभी भी अगर तू सुधरना चाहता है तो हम तुम्हें छोड़ देते हैं। लेकिन उसने कह दिया — नहीं, हम सुधरना नहीं चाहते। तो कहीं ना कहीं वो कर्म के बंधन में बंध गया। और ये (कृष्ण के माता-पिता) अपना भोग करके आगे निकल गए, क्योंकि इन्होंने कभी विरोध नहीं किया।
अब ऐसा नहीं कि हमारे साथ कोई अन्याय करे तो हम उसका विरोध ना करें। गलत तरीके से हमें नहीं करना चाहिए। एक बेईमान व्यक्ति गलत-सही दोनों तरीके से अपनी जीत करवाता है, और ईमानदार व्यक्ति उचित तरीके से जवाब देता है। तो हमें उचित तरीके से अपना बचाव रखना चाहिए, बचाव करना भी चाहिए।
बस सीधी सी बात है कि मुझे गलत व्यवहार, गलत आचरण नहीं करना है। क्योंकि जब हम कर रहे होते हैं तो हमें पता है हम क्या करने जा रहे हैं। तो यह तो आपके बस में है — मत करो। बहुत सीधी बात है।
देखिए, यहां आप क्या जानोगे, बताओ? जिसको आप जानना चाह रहे हो, प्रतिपल बदल रहा है, प्रतिपल। तो क्या जानोगे? आप जानने का प्रयास ही करते — जैसे ही आपने जानने का प्रयास किया, वो बदल चुका है। तो आप यहां कुछ जान नहीं सकते। आप सिर्फ — काश — उपयोग करते। जितना मेरे शरीर की जरूरतें हैं, जितने में मैं इस शरीर में रह सकता हूं, इस शरीर के साधन के लिए जानने का प्रयास करते, अपने लिए नहीं। इस शरीर में मैं कैसे सुरक्षित रह सकता हूं — (बस इतना)। आपके लिए यहां जानने के लिए कुछ है ही नहीं। क्या जानना चाहोगे, बताओ? इस सृष्टि में क्या ऐसा है कि आप जान के रुक (जाओ)? हमें सिर्फ इतना जानना है कि इस शरीर का भरण-पोषण मैं कैसे करूं। सिर्फ इतना जानना है, और फिर मुझे जानने से मुक्त होना है। क्योंकि जानने की इच्छा भी एक नशा है, और हम इस एक नशे के आदी हो गए हैं।
यहां तक कि हम रास्ते में चल रहे हैं — कोई मतलब नहीं है — ट्रेन में, बस में हम बगल वाले को हमेशा जानना चाहते हैं। कोई मतलब भी नहीं है, कोई बातचीत भी नहीं है, उससे कुछ मिलने वाला भी नहीं है। हम देखो तो हर वक्त जानना चाहते हैं। लेकिन क्या जानना चाहते हो? क्या करोगे जान के? तो ये एक और परिचय बनाना चाहते हो, क्यों? व्यवस्थाओं के लिए — कोई अच्छा परिचय होगा, मजबूत होगा, तो आपको कोई सपोर्ट मिलेगा। बहुत बार तो हमारी इतनी गंदी आदत हो चुकी है — ये बस हमारी खुजली है दिमाग की, वो टिकने नहीं देती है।
जैसे अभी एक फोन आया था, राजस्थान से। तो वो कहे, मैं आना चाहता हूं। आ जाओ। बोले, रहने की व्यवस्था है? तो मैं बोला — जब मैं रह रहा हूं, तो पूछने की क्या जरूरत है? मैं रह रहा हूं तो व्यवस्था में ही तो रह रहा हूं। जब तू किसी से मिलने जाएगा तो वो रह रहा है तो आपको भी रखेगा — पूछने की क्या जरूरत है? तो हम वो जानना चाहते हैं जिसका जीवन में कोई मतलब ही नहीं है।
अभी जैसे ये महाराज जी हैं — मेरा सबसे आत्मिक लगाव है, इनसे भी एक आत्मिक लगाव है। यह जब से सन्यासी हुए हैं, ये जीवन में पहली बार ऐसे बैठे होंगे। ये मैं आपसे भी बोला, मैं अभी भी बोल रहा हूं — अगर ये ऐसे शुरुआत से ही बैठे होते, तो ये क्या होता? व्यवहार में चले जाते हैं। अगर ये शुरुआत से बैठे होते, तब तक कल्याण इनका (हो जाता)। मोक्ष तो लेनदेन के बाद होगा, लेकिन आत्मज्ञान आपके बस में है। आप क्यों नहीं इस बात को समझते हैं? किस्मत, भाग्य क्या है? आपका किया गया कर्म।
जिस हिसाब से आप बैठे हो आज तक, जिस भेष को धारण किया — हमें यह देखना है कि जिस भेष को मैंने धारण किया, (क्या मैं उसके लायक हूं)। आप जिस भेष को धारण किए हो, अगर आपसे कोई गलती हो जाए तो पूरा समूह बदनाम होगा — एक नहीं, पूरा समूह। अब इस भेष से क्या होता है? बड़े आराम से हमें साधना करने के लिए व्यवस्थाएं मिल जाती हैं। अब देखना है कि हमें अगर कोई व्यवस्था दे रहा है तो हमें साधक समझ के दे रहा है, सन्यासी समझ के दे रहा है। सन्यासी का मतलब — अपने बनाए हुए अस्तित्व का नाश कर देना। हम तो और नया व्यवहार पैदा कर रहे हैं, तो कहीं ना कहीं इस भेष का दुरुपयोग कर रहे हैं।
आप ताकत की बात कर रहे थे — भेष में इतनी ताकत है कि इसको देख के परमात्मा की याद आती है। क्यों आती है? क्योंकि इस भेष के लिए लोगों ने बलिदान दिया है। लेकिन आज हम उनके बलिदान की वजह से बस रोटी खा रहे हैं। अपने आप से पूछिए कि आप सच में जिसके लिए (भेष धारण किए), वो हुआ? ये अपने आप से पूछना है। हमें किसी को जवाब नहीं देना है, मुझे अपने आप से पूछना है। हमारा कोई मालिक-उलिक नहीं, हम ही हैं, हम ही कर्ता हैं, हम ही धर्ता हैं। हुआ तो उपलब्धि क्यों नहीं हुई? नहीं हुआ तो क्यों नहीं हुआ? क्या मैं इस वस्त्र के लायक नहीं हूं? क्या मैं इस वस्त्र वाला काम कर रहा हूं?
अभी मेरे से अगर कोई गलती हो जाए तो मैं ही बदनाम होऊंगा, क्योंकि मैं किसी के समूह के द्वारा सांप्रदायिक काम नहीं कर रहा हूं। मेरे से अगर कुछ हो जाए तो सिर्फ मैं अकेला बदनाम होऊंगा, मेरे ऊपर ही उंगलियां उठेंगी, क्योंकि मैं किसी से जुड़ा ही नहीं हूं, किसी से जुड़ के काम ही नहीं कर रहा हूं। लेकिन अगर आपसे कुछ गलती हो जाए तो पूरा एक समूह बदनाम होगा, पूरी एक भीड़ बदनाम होगी, पूरी हिंदू संस्कृति। तो अपने आप से पूछो कि आप जिसके लिए भेष धारण किए थे, क्या वो कार्य आपसे हुआ? हो रहा है? और ये अपने आप को जवाब देना है, किसी और को नहीं। मैं नहीं कह रहा हूं आप यहां जवाब दो — कोई मतलब ही नहीं है। आप जवाब भी दे दोगे तो क्या वो जवाब सही है गलत है, ये पता चलेगा क्या? इसलिए जवाब का भी कोई मतलब नहीं है। ये अपने आप से पूछो कि जिस भेष को मैंने धारण किया है, उस भेष का जितना पालन है, नियम-संयम, क्या मैं वो कर पा रहा हूं? क्योंकि इस भेष को देखकर मुझे लोग व्यवस्था देते हैं — मुझे नहीं देते, मेरे भेष को देख के। क्यों देते हैं? क्योंकि समाज को यह बताया गया है कि इस भेष वाला व्यक्ति यह काम करता है। अब देखना यह है कि मैं वो काम कर रहा हूं? अगर मैं वो काम कर रहा हूं तो मेरा स्तर उठ रहा है, और वो काम नहीं कर रहा हूं तो मैं गिरते जा रहा हूं। यह अपने आप से पूछना है, नहीं तो एक काम करो — भेष निकाल दो।
हमने भी भेष पहना था। तो हमने देखा कि ये परंपरावादी भेष है, ये पवित्र भेष है, और इसके कुछ नियम बनाए गए हैं, इस भेष से लोग जुड़े हैं। इस भेष वाला खड़े होकर पानी-पूरी नहीं खा सकता — तो भैया हमको तो खाना है। खड़े होकर दुकान पर आइसक्रीम नहीं खा सकता, होटल में खाना नहीं खा सकता। जैसे अभी कल हम गए थे — दिन भर थके, हम ही लोग भोजन बनाते हैं, तो हम रात को होटल में ही खाना खा के आए। अब होटल में अगर गेरुआ कलर वाला जाएगा तो अनेक सवाल खड़े होते हैं। तो हमने कहा — भैया देखो, इस भेष को मैं प्रणाम करता हूं, अभी मैं इस भेष के लायक नहीं हूं और इसके नियम का मैं पालन भी नहीं कर सकता। तो मैंने उस भेष को प्रणाम करके छोड़ दिया। मेरा यह कहना है कि आप किसी भी भेष को — अगर भेष वाला काम नहीं करते हो — तो आप उसे प्रणाम करके छोड़ दो। एक समूह को बदनाम मत करो।
भेष में पावर है। जैसे एक पुलिस के कपड़े में पावर है — एक भीड़ में अगर एक वर्दी वाला आ जाए तो 100 लोगों को भी पीछे कर देगा। क्या आपको लगता है वो वर्दी वाले की ताकत है? नहीं। उस वर्दी वाले से बहुत लोग जुड़े हैं; उन्हें पता है कि एक फोन पे यहां गाड़ी की गाड़ी आ जाएगी। लेकिन वर्दी निकाल के वो खड़ा हो जाए तो दो आदमी भी धक्के मार के भगा देंगे। (महाराज जी,) बड़गांव में हम आप लोगों को ज्ञान दे रहे थे, एक शराबी आया, इन चारों को प्रणाम किया और हमारे सामने आके उजड्डता करने लगा, और हम हंस रहे थे — हम कहे, यार देखो, यही भेष का प्रभाव। ये जहां से ले रहा है, वो तो खुद अभी ले रहे हैं, देने लायक थोड़ी ना हैं, वो अभी दाता में तो आए ही नहीं; और जहां से इसको कुछ मिल सकता था, उसे धक्का मार रहा है। अभी मैं किसी अनजान गांव में चला जाऊं तो हमें कोई नहीं खड़ा करेगा, लेकिन महाराज जी को आराम से सारी व्यवस्थाएं मिल जाएंगी। क्यों? महाराज जी को नहीं — इस भेष को।
जैसे पुलिस की वर्दी की ताकत है, वकील के ड्रेस की ताकत है, टीटी के ड्रेस की ताकत है — लेकिन उस ताकत के पीछे कुछ काम किया है लोगों ने, ऐसे थोड़ी ना बन गई है। अब देखना ये है कि जिस भेष को आपने धारण किया, क्या वो काम भी कर रहे हो? पुलिस की वर्दी आपने धारण की, मतलब समाज की सुरक्षा की जिम्मेदारी आपकी। अगर आप किसी को सता रहे हो तो आप उस वर्दी का दुरुपयोग कर रहे हो। सुरक्षा करने में तुम्हारे प्राण भी चले जाएं तो दो — तब पुलिस वर्दी का मतलब है, नहीं तो नहीं। अब ये सन्यासी भेष अगर कोई धारण करे, तो दो से ज्यादा कपड़े नहीं रखना है; तीन दिन से ज्यादा कहीं एक स्थान पे रहना नहीं है। क्योंकि एक दिन आप अनभिज्ञ रहेंगे, दूसरे दिन नाम-वाम पूछा जाएगा, तीसरे दिन परिचय होने लगेगा। अब सबके शत्रु होते हैं, मित्र भी होते हैं। अब जो आपको भोजन-वोजन कराएगा, उसके विरोधी आपके शत्रु हो जाएंगे, और आप राग-द्वेष में फंस जाओगे। तो कहा गया है — सन्यासी दो से ज्यादा कपड़ा नहीं रख सकता, 12 साल का भ्रमण है, तीन दिन से ज्यादा कहीं रुक नहीं सकता, और मिला तो खा लिया, कभी मांग नहीं करना है। अब देखो कि गेरुआ पहनने के बाद आप इतना पालन करते हो क्या? तब तो आप गेरुआ के अधिकारी हो, तब तो वह गेरुआ आपके आत्मिक कल्याण में सहयोगी हो गया। और अगर नहीं करते हो तो वह बाधा बन गया। नहीं तो आप निकाल के, हाथ जोड़ के, प्रणाम करके उसे छोड़ दो, क्योंकि आप फिर दुरुपयोग कर रहे हो।
तो हम जब गेरुआ पहने, तो देखा तो हमने कहा — भाई, प्रणाम है तुझे, क्योंकि हम उतना पालन नहीं कर सकते, हमारी खोज कुछ अलग है। तो हम किसी समूह को क्यों बदनाम करें? बदनामी होना है तो खुद हो ना भाई। आप गेरुआ कलर पहन तो लिए, बड़े आसानी से मिल जाता है, क्योंकि लोग बैठे हैं देने के लिए — बाजार में चले जाओ, कोई इसकी लाइसेंस थोड़ी ना है। बड़े आराम से गुरु लोग तो इंतजार कर रहे हैं — आओ चेला बनो, जिंदा आदमी मेरा प्रचार करेगा, क्योंकि जहां भी जाओगे किसी आश्रम में, गुरु का नाम बताना पड़ेगा।
कहने का मतलब यह है कि अपने आप से पूछो कि जिस भेष को आपने धारण किया है, जैसा आप अपने आप को बता रहे हो, क्या वैसा काम (कर रहे हो)? अब ये मैं काम खुद कर रहा हूं — प्रत्यक्ष ज्ञान, आध्यात्मिक प्रत्यक्ष ज्ञान, अपनों की कुटिया — यह किसी से ना जुड़ा है। अगर यहां कुछ भी होगा तो उसकी जिम्मेदारी मेरी है; अगर उंगलियां उठेंगी तो एक व्यक्ति पे उठेंगी। तो भैया, कोई भी आप भेष धारण करो, उस भेष के पीछे लोगों ने बहुत त्याग किया है, ऐसे ही कोई भेष नहीं बना है। मुझे ये देखना है कि क्या मैं वो काम कर रहा हूं।
इस दुनिया में मैं आपको बताऊं — यह भेष कोई बदनाम-वदनाम नहीं हुआ है। बाप बेटी के साथ रेप कर दे रहा है। एक बताओ, कौन सा समूह बचा है? कोई ऐसा डिपार्टमेंट बता दो कि वो पूरी तरह समूह बच गया हो — आईएएस, एसडीएम, कलेक्टर, राजा, रंक, वकील, जज, प्राइम मिनिस्टर — आप एक नाम बता दो कि एक समूह का (हर) व्यक्ति बचा हो। हमें मतलब नहीं है। मुझे यह देखना है कि मैं क्या कर रहा हूं — बस, खत्म बात। कोई समूह बचा नहीं है — पुजारी से लेके, पंडा से लेके, साधु से लेके, सन्यासी से लेके, शिक्षक से लेके — कोई समूह नहीं बचा है। तो हम समूह पे ना जाके व्यक्ति-विशेष को पकड़ना चाहिए। जिसने जैसा किया उसको सजा होगी; कानून देगा, संविधान देगा। लेकिन एक बाप ने अगर बेटी का रेप किया तो सारे बाप पे थोड़ी तुम उंगली उठा सकते हो? एक भगवा वाला अगर गलत किया तो सारे पे उंगली नहीं उठाना चाहिए। अगर उसने किया तो कानून उसे दंड देगा। तो (भेष) बदनाम नहीं है। मैं तो घूमा हूं ना — आप अभी अपने साथ चलिए, आपको लोग प्रणाम करेंगे। बदनाम नहीं है, ऐसा ना बोलिए। आप देखिए कि आप वो काम करते हो कि नहीं, वो देखना है। बदनाम लोग हो जाएंगे; कपड़े कभी बदनाम नहीं होते, क्योंकि उस कपड़े के पीछे त्याग है।
जिस दिन आपको लगे कि मैं नहीं निभा पा रहा हूं, उस दिन छोड़ देना — प्रणाम करके छोड़ना, और बोल देना कि जिस दिन लायक होऊंगा, उस दिन पहनूंगा। और जिस दिन लायक बन जाओगे, जरूरत ही नहीं पड़ेगी। लायक बनने के लिए कपड़ा है। जैसे विद्यार्थी का कपड़ा कब तक? जब तक वो विद्यार्थी है। डिग्री पाने के बाद थोड़ी ना उसे उस कपड़े की जरूरत है। ये कपड़े की जरूरत तभी तक है जब तक आप साधक हैं। जिस दिन आपका परम स्तर उठ गया, आपको कपड़े से कोई मतलब ही नहीं रहेगा। ये एक आपके मार्ग में सहायक है।
(जब साधक ने कहा कि मैं इसे कपड़ा समझ के पहनूंगा, जिस दिन लगेगा कि नहीं पहनना है तो छोड़ दूंगा —) नहीं पहनना है तो क्यों नहीं पहनना है? और पहना तो क्यों? ये प्रश्न करके — ऐसे ही नहीं उतार के फेंकना है। अब तू उतार रहा है तो क्यों? किसके लिए? अब क्या करेगा, कौन सा नया नाटक रचने तू जा रहा है, ये बता? तू उतार रहा है, इसका मतलब लूट रहा था — अब किसको लूटेगा? अब कौन से भेष को धारण करेगा? ये अपने से प्रश्न करना है। ऐसे ही नहीं कि जब चाहे पहन लिया, जब चाहे उतार लिया।
(अगर वो दूर रहकर) आना चाह रहा है लेकिन आ नहीं पा रहा है — कोई विवशता है — तब गुरु कृपा कर देता है। लेकिन विवशता नहीं है, वो विवश बन के बैठा है, विवश बता रहा है, तब नहीं होती। अगर विवश है, वो नहीं आ पा रहा है, तो फिर वो कृपा वहीं से कर देता है। जैसे वो माता जी मुंबई वाली — फोन की, तो बोली कि आप बस आवाज सुना दो। स्पीकर तो ऑन ही था। वो बोली — मैं तो नहीं आ सकती, मैं विवश हूं, लेकिन मुझे पता है वो आ जाएंगे, उन्हें बस मेरी आवाज तो सुना दो। तो आवाज तो सुन ही रहा था। कुछ समय बाद माहौल ही ऐसा बना कि हम उसके करीब चले गए, उसके ही एरिया के पास, जहां तक वो आ सकती थी। देखिए, आना उसे भी पड़ा; वहां तक नहीं आ सकती थी, तो प्रकृति ने जहां तक वह आ सकती थी, मुझे भेजा, और आके मिल ली। तो आप देखो — अगर विवश हो, नहीं आ पा रहे हो, और उसके शब्दों में जी रहे हो, तो गुरु आप पर कृपा करेगा।
यह मेरा व्यक्तिगत अनुभव है। एक घटना है मेरे जीवन में — हमारे पास बहुत लोग आते थे। एक महाराज जी बहुत परेशान थे, उनकी आंखों की (रोशनी) कम थी। तो वो सुनते थे कि एक बाबा आए हैं और वो पैर से छू देते हैं, आशीर्वाद देते हैं और सब ठीक हो जाता है। तो वो मेरे आने के लिए विवश थे — लगभग 60–70 किलोमीटर होगा, जंगल में। ये तो मिलने के बाद बता रहा हूं। तो यहां से मैं एक दिन बोला कि चलो कहीं घूमने चलते हैं; मुझे जगह थोड़ी मालूम था। उन्होंने बताया कि एक जगह है, हनुमान जी का मंदिर। जब मैं वहां पहुंचा, वो बाबा भी मिले। बातें हो रही थीं, बोले — हमको भी उसी क्षेत्र में जाना है, एक बाबा आए हैं, जिसको भी छूते हैं वो ठीक हो जाता है; मैं बहुत दिन से प्रयास कर रहा हूं लेकिन कोई ले जाने वाला मिल नहीं रहा है। हम कहे — उस बाबा से मिलोगे क्या? बोले — मिलना तो चाह रहा हूं, लेकिन मिलूं कैसे? लोग हंस रहे थे; मैंने उन्हें इशारा किया, बताना मत अभी। फिर पूछा क्या तकलीफ है? बोले आंखों से बहुत कम दिखता है। फिर मैंने कहा — मिल लो, सामने है। फिर उन्होंने साष्टांग प्रणाम किया, हमारी भी आंखें भर गईं, फिर मैंने उन्हें पांव से छुआ और उनकी आंख तुरंत ठीक भी हो गई। पहले हो जाता था; मैं किसी का दुख बर्दाश्त नहीं कर पाता था; लेकिन अब छोड़ दिया। फिर मैं उस क्षेत्र में जब रहा तो उनके घर पे भी जाके मिल लेता था — गृहस्थ सन्यासी थे, बहुत सज्जन थे।
तो कहने का मेरा मतलब यह है कि अगर आप विवश हो और गुरु के शब्दों में जी रहे हो, तो गुरु आप तक पहुंच जाएगा — आप चाहे दुनिया के किसी कोने में रहो, वो आप तक किसी के द्वारा पहुंच जाएगा, निमित्त (बनाकर)।
मेरा यही कहना है कि अगर मेरे द्वारा किसी का हित हो तो मैं दुनिया में कहीं जाने के लिए तैयार हूं, लेकिन लोग लाभ लें तो ना। अब यहां 16–18 घंटे सत्संग करता था, लोग समझ नहीं पाते, इसलिए कम कर दिया। अभी तो हफ्ते में रविवार को मिल रहा है। अब कनाडा जाने की तैयारी हो रही है, यूएसए लोग वहां बुला रहे हैं, तो ये भी धीरे-धीरे कम हो जाएगा। क्योंकि विश्व लेवल पे काम करेगा व्यक्ति, तो हर व्यक्ति से थोड़ी ना मिल पाएगा। अभी तो यह है कि अभी भी मिल पा रहे हो; पहले तुम (मेरे साथ) 24 घंटे थे। एक दिन ऐसा आएगा कि हम कहीं, तुम कहीं — और आना ही आना है। तो समय रहते लाभ उठा लो।
एक समय था — इनके गांव में सेवक राम बैठे हैं — इनके साथ 24 घंटा घूमता था; जब चाहो तब इनकी बाइक पर बैठकर घूमता था, वीडियो बनाता था कि लोगों तक कैसे भी ज्ञान पहुंचे। अब इनको मिलने आना पड़ता है, 60–70 किलोमीटर; अब मैं जाके नहीं मिल पा रहा हूं। इतना काम फैल गया है — आश्रम को चलाना, सत्संग करना, इसकी पूरी व्यवस्था करना, देखरेख करना। अगर अब हर व्यक्ति से मैं मिलना भी चाहूं तो संभव नहीं है।
जैसे कल एक बाबा वहां सीढ़ी पे खड़े थे — एक बालक झाड़ू मार रहा था और ये खड़े होकर देख रहे थे। तो मैं बहुत देर तक कैमरे में देखा। ऐसा नहीं कि मैं अंदर रहता हूं तो आप लोगों को नहीं देखता — मैं सब देखता रहता हूं कौन क्या कर रहा है। एक बालक बड़ के पेड़ के पास बैठा था, उसका पांव — मैं यही पूछने वाला था कि तू इतना पांव क्यों मोड़ रहा है? एक आसन में बैठ। यहां तक बाहर जाता हूं तो भी मोबाइल से कैमरों में देखता रहता हूं। तब मैंने फोन लगाया, बोला उनको जल्दी से बोलो — जाओ आसन लगाओ, क्या करने आए हो? जिसके लिए आए हो वो करो। ये जमीन मत देखो, ये पेड़-पौधे मत देखो। मेरा इतना भाव है कि एक सेकंड भी तुम बर्बाद ना करो। तुम्हें यहां (कुछ और) सोचना ही नहीं है। ना तुम्हारा यहां कोई मालिक है — नियम में तुम हो तो तुम ही मालिक हो। यहां तुम्हें कोई रोकने-टोकने वाला ही नहीं है। एक जिज्ञासु के लिए जितनी व्यवस्था चाहिए, वो है। तो आपको तो बस इतना करना है — अपने आत्मिक कल्याण के लिए काम। एक सेकंड भी बर्बाद मत करो। (पैर छूने की भी मनाही इसलिए है —) उससे अगर कुछ लाभ होता तो (करने देता), उसमें भी समय मत बर्बाद करो।
यहां ना कोई रोक है, ना टोक है; बस जिसके लिए आए वो करो। आप जिसके लिए आए वो करो, मैं जिसके लिए आया हूं, मैं करूंगा। व्यवस्था का काम मेरा है, आपका नहीं। जब तक यह शरीर है, आपको यहां कभी कोई भी कमी नहीं पड़ेगी, क्योंकि आपके कौर में रोटी जाएगी तभी मैं उसके बाद खाऊंगा; आपकी व्यवस्था करने के बाद मैं अपनी व्यवस्था सोचता हूं। तो आत्मिकता से आप यहां रहिए, और जिसके लिए आए हो, एक क्षण भी बर्बाद मत करो। कब काल आके खड़ा हो जाएगा, मौत आ जाएगी, पता नहीं। पूरी तरह लग जाओ अपने कल्याण में। क्योंकि समझ मिली है, समय भी है — दोनों अगर मिल गए हैं तो आप सौभाग्यशाली हो; उपयोग नहीं कर पा रहे हो तो दुर्भाग्यशाली हो। क्योंकि बहुत लोगों के पास समय रहता है तो समझ नहीं, और समझ है तो समय नहीं। आपके पास अभी दोनों हैं, इंद्रियां काम कर रही हैं — तभी समझ में आ गया तो अपना कल्याण कर लो, कैसे भी।
बैठ गए तो बैठ गए। कोई फिक्स आसन मत लो, जिसमें आपको आराम लगे; लेकिन एक बार बैठ गए तो बैठ गए — एक-आध, दो घंटा जाने दो। अब हर समय पांव बदलते रहोगे तो आप बाहर आ गए ना। फिर जहां आत्मिक चिंतन भी हो रहा था, कुछ विचार भी आ रहा था, उससे भी तो हटना पड़ा, पैर के चक्कर में। तो मेरा कहना है — पैर दुख रहा है तो एक बार आप फैसला कर लो कि आपको क्या तकलीफ है और मैं किस आसन में बैठूं तो मैं उचित तरीके से बैठ सकता हूं। कोई फिक्स आसन नहीं लगाओ, लेकिन आप जिसमें बैठो, बैठ जाओ। ये मैं आपको बोलने वाला था, क्योंकि आपको मैं देख रहा था।
ऐसा नहीं कि आप लोग बाहर हो तो — यहां कोई लावारिस नहीं है। क्योंकि मेरे ऊपर किसी का अनुशासन नहीं था, मैंने खुद पे अपना अनुशासन किया है। तो लावारिस क्या होता है, मैंने जिया है; मैं नहीं चाहता आप लोगों को ऐसा कुछ फील हो। तो मेरी नजर हर वक्त रहती है आप लोगों पे, यहां पे रहने वालों पे, मैं कहीं भी रहूं। आत्मिकता से — यहां जितने लोग साधना करने आए हैं, उसकी एक मेरी जिम्मेदारी है। आप यहां लावारिस नहीं हो कि मैं चला गया तो आप घूमते रहोगे। मैं अंदर हूं तो आप बाहर क्या कर रहे हो, मुझे सब पता है, मैं पूरा देखता रहता हूं, कैमरा लगा है। ना यहां कोई कमी है। आप एकदम जिसके लिए आए हो, करो — बस एक पल भी बर्बाद मत करो। क्योंकि आपको कुछ सोचना ही नहीं है; शरीर की जितनी भी जरूरत है, यहां सारी व्यवस्था आपके लिए है — भोजन है, एकांत है, और क्या चाहिए जीवन में? कोई रोक नहीं है, कोई टोक नहीं — आप वो करो।
और हमारी नजर, जब तक मैं इस शरीर में हूं, तब तक रहेगी। यहां पे आने वाले हर जिज्ञासु की जिम्मेदारी मेरी है। आप यहां अगर आ गए और आप इस नियम में जी रहे हो, तो आत्मिक कल्याण पक्का है, कोई रोक नहीं सकता — यह जिम्मेदारी फिर मेरी है, आपकी नहीं। अगर आप मेरे बनाए हुए सिस्टम में पूरी तरह जी रहे हो, तो जवाब मुझे देना पड़ेगा; आपका स्तर उठने की जिम्मेदारी मेरी है। आपको सिर्फ इस नियम में (जीना है) और जिसके लिए आप लोग आए हैं, उस कार्य को करिए।
(सन्यासी महाराज जी से —) और आपको मैं इसलिए बोलता हूं कि आप सन्यासी जीवन अपनाए हो तो सन्यासी का पूरा काम करो, समय बर्बाद मत करो। मैं आपको बताऊं — मैं ऐसे नर्मदा तट पर घूम रहा था, उस समय खोज में ही था, और उस समय ऐसा हो गया था कि मेरे पास विश्व में रहने के लिए कोई जगह ही नहीं थी, हर जगह छूट चुकी थी। ओमकारेश्वर में एक ब्रह्मचारी मिले थे; मैं पेड़ के नीचे बैठा था, बात होने लगी, बोले — खाओ-पियो, घूमो, कोई यहां कमी नहीं है नर्मदा तट पे। मैंने बोला — ये तो आवारा कुत्तों को मिलता है। अगर मैं इसके लिए निकला हूं तो इस कुत्ते में और मुझ में क्या फर्क है? मुझे जीवन का कोई उद्देश्य ले के चला है। ये रोटी तो आवारा कुत्तों को मिलती है।
तो भेष वाला (भेष वाला) पूरा काम करोगे तो कल्याण पक्का है। अगर आप एक महापुरुष के बनाए हुए नियम में जी रहे हो तो पूरी जिम्मेदारी उसकी। लेकिन नहीं जिओगे तो फिर वो निकाल देगा, और उसका भी परिणाम आपको भोगना पड़ेगा, क्योंकि आप एक ऐसे महापुरुष को फिर दुख देके, पीड़ा देकर जा रहे हो — तो एक और दोष लग गया, कि आप उसके नियम को तोड़ के जा रहे हो, अहंकार में जा रहे हो। तो हमें बहुत सूझबूझ के साथ (जीना है) — हम जहां जा रहे हैं, क्या मैं जाने लायक हूं? क्या मैं वहां का पूरा काम कर सकता हूं? या बस मैं सामने वाले को परेशान करने चल दिया?
तुम ही थे ना, वहां से उठे, फिर वहां कुछ देर देखे, फिर आ के यहां पानी पिया, फिर ऊपर बाथरूम गए — तो हम तुम्हें देख रहे थे अंदर से। लगे रहो। लगा के रखो।
(ताकत नहीं बची —) तो उज्जैन से यहां कैसे आए? (गाड़ी थी, आ गया —) जितना है उतना उसका सदुपयोग कर लो। यहां के नियम में जियो। रहो आराम से, यहां कोई कमी तो है नहीं; संसार छोड़ ही दिए हो। वहां (संसार में) शरीर की व्यवस्था थी, आत्मिक व्यवस्था नहीं थी ना। यहां तो शरीर के साथ आत्मिक व्यवस्था है — यहां पर सत्संग मिल रहा है, आत्मा का कल्याण करने का मार्ग मिल रहा है। तो बातें करने से अच्छा है कि आराम से यहां के नियम में जियो। संसार छोड़ ही चुके हो, फिर यहां रहो। भोजन-कपड़े की व्यवस्था सारी मैं करूंगा — ये जिम्मेदारी मेरी है। बस आपको यहां के नियम में रहना है।
(साधक ने ऊर्जा, दर्द, सपने और नींद की बात कही —) यहां कम से कम तीन महीना रहो, फिर मुझसे बात कर लो। तीन महीने अपने आप को यहां से बाहर जाने मत देना, और यहां तुम कुछ मत करना — तुम्हें भोजन मिल जाएगा; भोजन बनाने में सहयोग करना, क्योंकि आप खाओगे ना। यहां के नियम एक बार और पढ़ लेना, अच्छे से समझ लेना, और यहां के नियम में तीन महीना रहो, फिर मुझसे बात करना। यहां सारी व्यवस्था है; यहां से बाहर मत जाने देना अपने आप को, अपने शरीर को।
(बाद में गुरु जी ने इसी साधक के बारे में कहा —) अपने आप पे अनुशासन करना सीखो। नहीं चल रहे तो चलाओ। जैसे मैंने उसे कहा — तीन महीना तू रुक। तेरी अगर बुद्धि काम नहीं करती तो उज्जैन से गाड़ी चला के यहां आ जाता क्या? बुद्धि पूरी काम कर रही है। खा रहा है, शौचालय की जगह शौचालय जा रहा है, नहाने की जगह नहा रहा है। बुद्धि अगर तेरी काम नहीं करती — लैट्रिन करके पानी नहीं छूता, पागल की तरह घूमता, खाना कोई देता तो फेंक देता — तब समझता कि तेरी बुद्धि काम नहीं कर रही। अगर बुद्धि काम नहीं करती तो उजड्डता करते — शौचालय की जगह नहाते, नहाने की जगह शौचालय कर देते — तो मुझे भी लगता कि यार इसकी बुद्धि काम नहीं कर रही। ऐसा तो नहीं है ना। तो तुम्हारी बुद्धि कोई शून्य नहीं है। आराम से मेहनत करो, अपना आत्मिक कल्याण करो। नहीं तो संसार में वापस चले जाओ, वहां कुछ काम-धंधा करो और वहां से अपना आत्मिक कल्याण करो। मेरी बुद्धि सुन्न हो गई, यह हो गई — यह सब फालतू चक्कर में मत पड़ो। नहीं तो ऐसे ही बढ़िया से मलाई खाते-खाते जिंदगी चली जाएगी, बाद में नर्क ही मिलेगा।
अभी तुम पैंट पहने हो, टीशर्ट पहने हो — टीशर्ट तुम्हारा नीचे होता, पैंट ऊपर होता, या आगे का भाग पीछे होता, तब मुझे समझ में आता कि बुद्धि कुछ गड़बड़ है। ये सिर्फ आपके लिए थोड़ी कह रहा हूं, ये सबके लिए कह रहा हूं, उसमें मैं भी आता हूं। मानसिकता में यहां कुछ गड़बड़ नहीं है — एकदम समझदार हो, और कल्याण कर लो। नहीं तो यही सोचते-सोचते काल आ जाएगा और निकल लोगे। तब कहोगे — नहीं, अभी मुझे नहीं मरना है, बुद्धि काम नहीं कर रही। काल कहेगा — चलो, आ गया समय। तो मत करो ये सब। इसलिए मैंने आपको कहा — तीन महीने बाद मुझसे बात करना, पहले तीन महीना यहां नियम में रहो। और हमें किसी को सफाई देने की जरूरत नहीं है। आप सिद्ध करना चाहते हो कि बुद्धि सच में (काम नहीं कर रही) — उससे हमें क्या मिलेगा? आपके लिए मैं बोल रहा हूं — आपकी बुद्धि अच्छी है; मैं बुद्धि भ्रष्ट होने का लक्षण बता रहा हूं। अगर आपकी बुद्धि कम होती तो ऐसा होता; ऐसा नहीं है, तो बुद्धि बढ़िया है। बढ़िया खा रहे हैं, पी रहे हैं, रह रहे हैं, कपड़े पहन रहे हैं, गाड़ी से घूम रहे हैं, सबसे बातचीत कर रहे हैं — बुद्धि पूरी तरह (काम कर रही है)।
नहीं, देखना है कि आती क्यों है। क्योंकि जैसा हमने किया है, वही सब आता है। तो देखना ये है कि मेरे द्वारा क्यों हुआ, मैंने क्यों किया — क्यों में जाना चाहिए, क्यों हुआ। एक समय ऐसा आएगा जब आखिरी में जाओगे तो 'क्यों' हट जाएगा, 'हुआ' रह जाएगा। 'हुआ' रह जाएगा तो 'हुआ' के बाद पता चलेगा इस कर्म का परिणाम क्या है। तो फिर आपको पता चल जाएगा, फिर अपने आप को निकाल दोगे।
नहीं जाना चाहिए, नहीं जाना चाहिए। जैसे दिल्ली का एक साधक था — वहां बात कर रहा था। मैं यहां से पहुंचा, मैंने उसे डांटा, बोला तुरंत कुटिया जाओ। (उसने कहा) इन्होंने पूछा कि आप कहां के हो? मैंने कहा दिल्ली से, बस इतना ही। (मैंने कहा) बस इतना ही नहीं है — आज दिल्ली बताए, कल आएंगे और कुछ पूछेंगे, उनका काम ही यही है। तुम और बताओगे; फिर नहीं बताओगे तो द्वेष पैदा हो जाएगा उस व्यक्ति का कि कल बात किया तो आज क्यों नहीं कर रहा है। हम कहे — अभी कुटिया से जाओ, तुरंत। फिर मैं वहां से यहां आ गया। वो व्यक्ति — लड़का था — उसकी आंखों में आंसू आ गए, रोने लगा, फिर बोला कि मुझे क्षमा करें, माफ करें। देखो, यहां तुमने मेरे साथ गलती थोड़ी नहीं की; तुम तुम्हारे साथ गलती कर रहे हो। मेरा क्या?
ये (महाराज जी) मुझे छोड़ के कुछ समय पहले चले गए थे — मेरा क्या ले गए? ये अपना ही बहुत कुछ खो दिए। मुझे क्या कोई कमी थी? तब भी कोई कमी थी क्या? मैं तो जहां भी इनके साथ बैठ जाता था, वहां सारी व्यवस्थाएं चली आती थीं। रात भर आग जलती थी, हम कभी माचिस भी नहीं मारते थे; आलू भून के खा के — हम भोजन भी नहीं करते थे — इनको ज्ञान देते थे। और ये लोग बिस्तर में रहते, हम बिना बिस्तर के। मुझे तो कुछ चाहिए ही नहीं। लेकिन जब ये गए तो हमारी आंखों में आंसू आ गए — अफसोस ये हो गया कि इसकी पूरी प्यास बुझ जाती, क्योंकि मैं इनके साथ पूरी परिक्रमा तक चलता। अगर ये सीखते तो 3600 किलोमीटर मैं इनके साथ पैदल चलता। इनके लिए — मैं कभी किसी को छोड़ता नहीं; मैं ना पकड़ता हूं, ना छोड़ता हूं। रात को इनके लिए जरा ऊंची आवाज में सत्संग कर दिया था — हम कहे, अगर सन्यासी है तो समझ लेगा, क्योंकि मुझे मालूम है भटक रहा है। ये सुबह हमसे खुद मिले। (मैंने) बोला — चलो, मैं साथ चलता हूं, तुम्हारी जरूरत है ना; तुम मेरे पीछे ना आओ, क्योंकि तुम कुछ संकल्प ले के चल रहे हो — तुम्हारा संकल्प भी ना टूटे और तुम्हें ज्ञान भी मिल जाए। तो ये छोड़ के गए तो अफसोस मुझे इस बात का हुआ कि यार, बहुत कुछ खो दिया इसने, ये बहुत कुछ खो के जा रहा है। तो मैं इन्हें क्या माफ करूं? दोबारा भी इन्होंने प्रार्थना की तो मैं दोबारा भी मिला, लेकिन दोबारा भी मेरे साथ नहीं हुए, वहां भी हाथ जोड़ के चले गए। ये खा-पी के बिस्तर में रात गुजारे, और हम एक जंगल में मंदिर में बिना खाए, ठंडी जनवरी का महीना, बिना बिस्तर के आग के सामने।
आज भी (मैंने) बोला कि यार मुझे क्या चाहिए? मैं कभी-कभी सोचता हूं — तू इतना लोगों के लिए परेशान होता है, तुझे चाहिए क्या, फाइनल? तो देखता हूं, फाइनल कुछ नहीं चाहिए — नाम भी नहीं, शोहरत भी नहीं, पैसे भी नहीं। तो सच में, और सब भागते रहते हैं — तू क्यों दौड़ रहा है लोगों के लिए? सोचने पे मजबूर हो जाता हूं कभी-कभी। हमारे साथ रहने वाले को पता भी चल जाता है कि इस व्यक्ति को कुछ नहीं चाहिए। सेवक राम मुझे कई सालों से देख रहे हैं नर्मदा तट पे — लगभग 2021 से तो वीडियो बना रहा हूं। क्या लगता है मुझे कुछ चाहिए? मैं तो अकेले 12 साल ऐसे ही घूमा; ये तो आप लोगों के लिए कुटिया बनाया, नहीं तो मुझे कुटिया की भी जरूरत है ही नहीं। मैं तो ऐसे ही कहीं पड़ा रहता था; ना बिस्तर से मतलब था, ना भोजन से। मिल जाए तो खा लिया, नहीं तो कभी-कभी पानी पी के सो जाता था।
तो जब ऐसे लोग मिलते हैं कि यार, यह जिसलिए निकले थे, इन्हें मिल रहा है और यह छोड़ के जा रहे हैं — तो हमें अफसोस होता है, किसके लिए? इनके लिए। और कहीं ना कहीं इनके कर्मों से ही मिला है। तो मुझे अफसोस ये होता है कि यार, यह क्या छोड़ के जा रहे हैं? जिसके लिए निकला था, वही तो इसको मिल रहा है, और यह उसको लात मार के जा रहा है। यह कितना पछताएगा। मुझे अगर कुछ चाहिए होता तब तो मुझे तुमसे राग-द्वेष होता, तो मैं तुम्हें क्षमा भी करता। मुझे तो अफसोस इसका — क्योंकि एक व्यक्ति के लिए 16 घंटा सत्संग। अभी भी इतना मिल रहा हूं; आने वाले समय में इतना भी नहीं मिल पाओगे, इतनी देर हम नहीं कर पाएंगे — ये बात मुझे मालूम है। तो आज मैं यही कह भी रहा था कि यार, अपने को कुछ नहीं चाहिए और हम इतने परेशान रहते हैं। लेकिन कोई बात नहीं — इस परेशानी से अगर किसी भी जीव आत्मा का कल्याण, एक का भी हो गया, तो मैं समझूंगा कि मैं परेशान नहीं हुआ। बस वही इस शरीर के द्वारा देखना चाह रहा हूं कि कोई एक व्यक्ति भी उपलब्ध हो जाए, बस मेरा काम पूरा हो गया, मेरा अफसोस खत्म हो गया।
मैं इनको पहले भी यही बात बोला था, आज भी यही बोला — भाई, जिसलिए कपड़ा पहना, वो काम कर रहे हो कि नहीं? बस इतनी सी बात है, वो अपने आप से पूछो, मुझे बताने की जरूरत नहीं। मैं कौन हूं? मैं थोड़ी ना इस कपड़े का मालिक हूं। मैं तो सिर्फ आपको एक संकेत दे सकता हूं — मानवता के नाते, हमारी समझ विकसित हो गई, इसलिए बोल रहा हूं। अब आप जैसा करोगे, आपको मिलेगा; मैं जैसा करूंगा, मुझे मिलेगा। मैं तो सिर्फ आपको मार्ग बता सकता हूं — वो भी सन्मार्ग, जिससे आपका कल्याण हो जाए। बाहर का मार्ग बताने वाले तो अनेक लोग हैं, क्योंकि उन्हें आपसे कुछ चाहिए — चाहे आपके माता-पिता हों, चाहे भाई-बंधु हों, सब ने आपको सिखाया। क्या सिखाया? बाहर की चीजें। क्यों? आपको यूज़ करने के लिए। और मैं तो जब भी आप मेरी जिंदगी में मिलोगे, मैं आत्मिक कल्याण के अलावा कोई बात ही नहीं करूंगा। इतने सालों से (सेवक राम) कभी बोल नहीं सकते कि हमने आज तक इनसे — किसी से भी — कभी एक भी मांग की हो। हम भूखे रह लिए, लेकिन हमने कभी हाथ नहीं फैलाया। हम निकले थे तभी कहे कि जिस दिन ये हाथ फैलेगा, उसके पहले मौत देना; वो मेरे स्वाभिमान का होगा। मुझे जहां भी रखना, जिसके सामने रखना, सिर्फ ऐसे रखना कि मैं देना चाहता हूं — चाहे मेरा जीवन हो, चाहे मेरे पास कुछ भी हो, मैं देते जाना चाहता हूं, मैं कभी लेना नहीं चाहता। क्योंकि जिस जीवन को मैं अपना रहा हूं, ऐसे जीवन जीने वाले को लोग महान कहते हैं, तो महान व्यक्ति का काम है देना। ये (महाराज जी) भी आश्रम चलाते हैं, इनके आश्रम में भी मैं कई बार गया; रात-रात हमारी बातें होती थीं, लेकिन कभी हमने कुछ मांग नहीं की, सिर्फ ज्ञान की बातें ही कीं; कभी भी कोई व्यवस्था की मांग नहीं की, जैसा आसन दे दिए वैसा सो गया।
तो मैं देना चाहता हूं, और आप छोड़ के जाते हो तब अफसोस (होता है) — और आपको एक दिन यहीं मुड़ना है। काश, अगर आप जहां जा रहे हो, वहां मिल जाता, तो मुझे अफसोस नहीं होता; यहां से ज्यादा उसको वहां मिला तो मैं तो बड़ा खुश हो जाता — अच्छा हुआ चला गया। लेकिन मैं यह देख पा रहा हूं कि तुम बहुत कुछ छोड़ के जा रहे हो, और कुछ समय बाद इसी के लिए लौटोगे, और वो मिलेगा नहीं। इस समय तो जबरदस्ती दिया जा रहा है। तो मुझे अफसोस इस बात का होता है कि जब व्यक्ति बहुत कुछ खोता है, और बाद में आना उसको वही है, उसी के लिए — और जब वो आया, पता चला कि प्यास लगी थी, बहुत पानी बह रहा था, और सामने वाला पिलाने के लिए तैयार था, और मैं एकदम अहंकार में छोड़ के चला गया; और जब मैं फिर वापस आया तो पानी बहुत दूर जा चुका था, सिर्फ जगह रह गई थी। पानी तो बह रहा है ना, वो आपके लिए थोड़ी रुकेगा, वो आपका इंतजार थोड़ी ना करेगा — अनेक लोग प्यासे हैं। तो यह अफसोस होता है मुझे, बाकी कुछ नहीं। मैं तो अभी भी लोगों से यही कहता हूं कि भाई, जिसके लिए निकले हो — लोग पाखंडी हैं, ढोंगी हैं — वो तुम छोड़ो, तुम ईमानदारी से अपनी यात्रा करो। बस, बात खत्म।
और प्रकृति का एक नियम है। प्रकृति में कौन जीता है? हम लोग प्रकृति में थोड़ी जीते हैं, हम प्रकृति के विरोध में जीते हैं। हमारे अलावा जितनों का जीवन है, सबका प्राकृतिक जीवन है; हमारे द्वारा कुछ भी होता है तो प्रकृति को नुकसान ही होता है। तो जैसे मादा गर्भधारण करने के लिए तैयार रहती है तो अनेक नर आ जाते हैं — आप भगाओ तो भी नहीं जाएंगे। लेकिन अगर तैयार नहीं है तो अनेक नर लाओ, वो सूंघ-सांघ के, जायजा लेंगे कि मादा तैयार है कि नहीं, और तैयार नहीं है तो चले जाएंगे। तो नर मतलब गुरु — गुरु हमेशा तैयार है। एक नर एक ही दिन में कई मादा को गर्भधारण करवा देता है, लेकिन जैसे ही गर्भ धारण हुआ, दूसरा नर उसे नहीं पूछेगा, हट जाएगा। मतलब गुरु इस सृष्टि में हमेशा तैयार है — तुम बस अपनी तैयारी कर लो। अगर शिष्यपन का भाव पूरी तरह आ गया तो गुरु आपके सामने (है)। यह जितने लोग कहते हैं ना कि यह पाखंड है — यह एक नंबर के पाखंडी खुद हैं; इनको यात्रा नहीं करना है, बस एक मौका मिल जाता है।
प्रकृति का एक सिस्टम है कि जैसे आप हो, वैसे लोग आपको मिल जाएंगे। आप राजा हो तो राजा का साथ मिल जाएगा; गरीब हो तो गरीब का साथ; शिक्षक हो तो शिक्षक के साथ आपका उठना-बैठना। यह दुनिया आप ये मत समझो जैसी दिख रही है — जैसे आप हो, वैसी दुनिया है; जैसी संगत, वैसी रंगत। जानवरों में देखो — हिरण हिरण के झुंड में, शेर शेर के झुंड में, हाथी हाथी के झुंड में, कुत्ते कुत्ते के झुंड में। वैसे ही आपका जैसा चरित्र है, जैसा आचरण है, वैसा झुंड आपका है, आप उसमें शामिल हो। आप अगर परेशान हो तो आपके जितने लोग हैं, सब परेशान हैं। इस रहस्य को समझो। तो अगर आप शिष्य हो तो गुरु उपलब्ध है — सीधी सी बात है; गुरु पहले से मौजूद है। ये लोग शिकायत करते हैं ना कि पाखंड है — ये खुद एक नंबर के धूर्त और लालची होते हैं, इनको यात्रा-वात्रा नहीं करना है, इन्हें सिर्फ मजा लेना है। और जिसको यात्रा करनी है — जैसे जिस बच्चे को पढ़ना है, कुछ बनना है, वह फालतू काम थोड़ी करता है; सिर्फ स्कूल से घर और पढ़ता रहता है। वो आकर थोड़ी कहेगा — मम्मी ये नहीं पढ़ता, वो नहीं पढ़ता, इसने ये बोला। अगर किसी के अंदर शिष्यपन का भाव है, तो उसके मुंह से अपने आत्मिक कल्याण की ही बात निकलेगी; ये निकलेगी ही नहीं कि पाखंड है। उससे क्या मतलब? पाखंड क्या पहले से नहीं है, नया है क्या? और पाखंड का जिम्मेदार कौन — समाज। आपके लालच की वजह से पाखंडी पैदा होते हैं; कोई आसमान से गिरता है क्या? मां के गर्भ से ही जन्म लेते हैं। वो आपसे ज्यादा लालची था, इसलिए वो कुर्सी पर बैठ के लूटने लगा; तुम कम थे, इसलिए लुटवाने जा रहे हो। तो किसी को जिम्मेदार मत ठहराओ। मैं जहां हूं, वहां मैं अपने कर्म से हूं, इसकी जिम्मेदारी पूरी मेरी है, और मुझे आगे जहां जाना है, उसके लिए मुझे काम करना है। यह कर्म भूमि है, यहां फ्री में कुछ मिलता नहीं है।
अगर मादा तैयार ना हो और जबरदस्ती गर्भधारण करवाओ, तो क्या गर्भधारण हो जाएगा? नहीं होगा ना। लेकिन तैयार है तो हो जाएगा। अगर आप तैयार हो तो आपका आत्मिक कल्याण पक्का है; और आप तैयार नहीं हो तो हजारों गुरु आकर क्या उखाड़ लेंगे आपका? कुछ नहीं हो जाएगा। मादा तैयार नहीं है तो हजारों नर ला के खड़ा कर दो, क्या कर लेंगे? सब नर को उठा के पटक देगी, लेकिन गर्भधारण नहीं होगा। तो शिष्यपन का भाव लाओ। जैसे आपको कहीं नहीं मिल रहा था, तो जब आखिरी में आप उतावले हो गए, व्याकुल हो गए, या फैसला ले लिया कि अब तो जंगल भाग जाऊंगा, तो आपको मिल गया। क्यों? क्योंकि प्रबल जिज्ञासा हो गई, और आपको आपकी रुचि का मिला, आपकी भाषा का मिला। बात ये है कि मैं जा रहा हूं, मुझे (कोई) पता बता रहा है, सही भी बता रहा है, लेकिन मेरी भाषा में नहीं बता रहा — मुझे उस भाषा का ज्ञान नहीं है, तो मैं उसका मुंह ही देखूंगा, उससे मेरा कल्याण नहीं होगा। आपकी भाषा वाला आपको मिलना चाहिए। तो जिस दिन आप तैयार हो जाओगे, उसके बाद गुरु मिल जाएगा और आपका कल्याण भी पक्का — पहले तैयार तो हो जाओ। एक बेईमान को सब पाखंडी ही दिखते हैं; और जिसको यात्रा करनी है, वो इन फालतू चीजों में नहीं उलझता, वो अपने लक्ष्य पे काम करेगा। तो अपने लक्ष्य पे काम करो, जिसके लिए निकले हो।
एकदम — जब कुछ नहीं चाहिए। क्योंकि 'कुछ चाहिए' में सुख है, दुख है — आपके तरीके से मिल गया तो सुख, नहीं मिला तो दुख। और 'चाहिए' से मुक्त हो गए तो ना सुख है, ना दुख है — परम आनंद है। तो ऐसी स्थिति है। सिर्फ उसमें अगर आप हो (तो)। अगर कोई और है, तो जैसा वह है, वैसा प्रभाव — जिसके साथ आप जी रहे हो, उसका भी तो प्रभाव पड़ता है हमारे ऊपर। तो आप किसके साथ हो? और अकेले भी हो तो क्या पूरे अकेले हो? पता चला शरीर से अकेले हो, लेकिन मानसिक आपकी भीड़ है अंदर, राग-द्वेष की — तब थोड़ी ना परमानंद समझ में आएगा। जब आप पूर्णतः अकेले हो जाते हो — जहां कुछ भी नहीं है, सिर्फ (आप) — (तब)।
उचित तरीके से जवाब दो। अपनी आत्मरक्षा में जवाब दो। उसे जवाब इसलिए दो कि आगे किसी के साथ ऐसा ना करे। जवाब देना बहुत जरूरी है, क्योंकि जवाब नहीं दोगे तो वह आगे भी ऐसा करेगा; कम से कम उसे रोक तो लोगे जवाब देके। तो जवाब जरूर दो, लेकिन देने का तरीका उचित हो।
जब कुछ नहीं चाहिए, अपने स्व में स्थिर होते हो, तो मूल केंद्र पे आते हो। अब तुम उस जगह पे आ गए कि इधर संसार है और इधर ब्रह्म है। और जब आप यहां से होके यहां पे आए, तब उसके बाद परमात्मा, ब्रह्म की यात्रा शुरू होती है — आत्मा की परमात्मा की यात्रा शुरू होती है। अभी क्या यात्रा चल रही है? अभी तो यात्रा चल रही है कि मैं अपने आप को कैसे छुड़ाऊं। अभी तो केंद्र पे आना है आपको; उसके बाद परमब्रह्म की यात्रा — आत्मा और परमात्मा की — शुरू होगी। अभी तो आपने जिस दुनिया का निर्माण किया है, उस दुनिया से अपने आप को छुड़ा रहे हैं। अपनी बनाई हुई दुनिया में राग-द्वेष में पूरी तरह उलझ गए हो, और अब आपको अच्छा नहीं लग रहा है, अब वहां से हटना चाह रहे हो। लेकिन लोग कह रहे हैं — जाओ तुम, लेकिन मेरा हिसाब करो। अब हिसाब-किताब (करने को) बैलेंस उतना नहीं है अपने पास कि हम एक बार में हिसाब कर दें। 20 साल से लेनदेन कर रहे थे और बड़े माइनस में चले गए; तो एक झटके में कहां से हिसाब करोगे? 20 साल का अगर दो साल में भरना है तो मेहनत भी तो वैसी (करनी होगी)। इसीलिए सत्कर्म — और ऐसा सत्कर्म कर दो कि सामने वाला, जिसका हिसाब-किताब करना है, आपके सत्कर्म से खुश हो जाए, कहे — यार, सब माफ करो इसका, इसे छोड़ो।
अब यह माफी कब होगी? जब देखा जाएगा कि आपने स्थिति-परिस्थिति के वशीभूत होकर गलत किया। सजा के पहले पूरी जांच होती है कि भाई, आपने किस स्थिति में अपराध किया, अपराध का कारण क्या है — तो माफी भी दी जा सकती है। अब अपराध किस स्थिति में किए हो, यह अपने को देखना है, क्योंकि अपराध करने वाला तो मैं हूं। कुछ तो ऐसे अपराध हैं जो मेरे अलावा कोई जानता ही नहीं — जिसके साथ किया, वो भी नहीं जानता। जैसे दो साल के बच्चे के साथ लोग गलत कर देते हैं — उस बच्चे को थोड़ी पता है उसके साथ क्या हो रहा है, अबोध है ना; वो किसी को बता भी नहीं पा रहा; लेकिन अपराधी को तो पता है। आपने पेपर में न्यूज़ में देखा होगा कि एक पागल औरत ने बच्चे को जन्म दिया — क्या उसे पता है कि उसके साथ क्या हो रहा था? किसी व्यक्ति ने ऐसा किया होगा ना, तो उस व्यक्ति को तो पता था मैं क्या कर रहा हूं। उस औरत को तो कोई पता नहीं है, वो बस एक पीड़ा से छटपटा रही है, हो सकता है वो श्राप भी ना दे पाए। तो कुछ अपराध का सिर्फ हमें ही पता रहता है — लेकिन आपके अलावा भी कोई है। इसीलिए तो लोग कहते हैं कि यार, बड़ा अच्छा आदमी है, बड़ा सज्जन आदमी है, और बहुत भोग रहा है — क्योंकि वो अपराध दिख नहीं पाया ना। ना हमारे घर वालों को पता है, ना जिसके साथ किया उसे पता है, सिर्फ मुझे पता है। और जब समझ जगती है, तब पश्चाताप की आग लगती है, और उसी का जाके हम एकांत में सामना करते हैं; फिर सामना हो नहीं पाता, छटपटाते घूमते हैं, कह भी नहीं सकते किसी से। इसीलिए मेरा कहना है कि भैया, सत्कर्म में लग जा। तूने एक नहीं, कितने अपराध किए हैं, तुझे खुद पता तो है। मेरा तो यही कहना है — भैया, ईमानदारी-सत्कर्म अपना के निकल। ज्यादा होशियारी मत करो कि यार मैंने तो कुछ नहीं किया। जज के सामने जितना भी कहोगे कुछ नहीं किया, उतना रिमांड पे जाओगे — ये कबूल ही नहीं रहा है, तो रिमांड पे रिमांड। और जब कबूल दिए तो कहेगा, एक सजा दे दो। फिर क्या करें? भोग। अब तुम जेल में जाके अगर बहुत सत्कर्म के साथ जीवन जी रहे हो, और ऐसा जीवन जी रहे हो कि जितने लोग वहां हैं, सबने कहा कि सच में सज्जन व्यक्ति है, तो हो सकता है जेलर खुश हो के कहे — यार, लेटर लिख दो, इसकी कुछ सजा माफ करो। इंक्वायरी आएगी, कुछ सजा माफ हो जाएगी।
अगर आप वैसे निकले — तो जैसे गुरु शंकराचार्य ने देखा कि शिष्य की प्रबल जिज्ञासा है। क्या जिज्ञासा? ज्ञान की नहीं — समाज कल्याण की, कि गुरु जी का ज्ञान समाज तक पहुंचेगा, समाज का कल्याण होगा। उस शिष्य का अपना कुछ नहीं था, उसे बस एक ही चिंता थी — गुरु जी का ज्ञान। पहले लिपिबद्ध नहीं था, गुरु शिष्य को कंठस्थ कराता था; अब वो शिष्य ऐसा था कि उसे कंठस्थ ही ना हो। तो उसे एक टेंशन रहती थी कि मैं गुरु जी के काम कैसे आ जाऊं; उसे ज्ञान नहीं चाहिए था। वो हमेशा गुरु के आसपास रहता था कि गुरु जी अगर आवाज करें तो मैं पहुंच जाऊं। एक दिन शंकराचार्य जी सबको ज्ञान देने के लिए बैठे थे, शिष्यों ने कहा गुरु जी शुरुआत करें, तो बोले — नहीं रुको, अभी वो नहीं है। बोले — उसके होने और न होने से क्या फर्क है, उसे तो कुछ आता ही नहीं। बोले — नहीं। फिर वहीं से वो देखे तो वो वहां पे कपड़ा धोते-धोते चिल्ला रहा है कि गुरु जी का ज्ञान कैसे पहुंचेगा, कैसे पहुंचाऊंगा, मैं क्या करूं। तो गुरु जी ने कहा — चल, मैं तुझे यहीं से ज्ञान देता हूं, और वो आया, उसे वो ज्ञान तुरंत हो गया। तो गुरु में सामर्थ्य है। जैसे आठ पिल्ले हैं, एक नहीं खा पाता, तो मैं सबको बिस्किट खिलाता हूं, पर उसको गोद में ले के खिलाता हूं। क्यों? तो गुरु की नजर जरूरतमंद पे है, वो देखता है कि जरूरत किसको है, उसके पीछे वो भागता है। आपकी चमक-धमक में पड़ने वाला नहीं है। आप ये मत समझना कि आप अपना बैकग्राउंड बता दोगे — जितना तुम अपनी चमक दिखाओगे, उतना गुरु से दूर होते चले जाओगे। गुरु आपकी जिज्ञासा को देखता है, आपकी चमक-धमक को नहीं, क्योंकि वो चमक-धमक से मुक्त हो चुका है। गुरु आपके चापलूसी भरे शब्दों को नहीं देखता — जितना तुम बोलोगे, उतना हंसेगा। वो सिर्फ आपकी जिज्ञासा को देखता है, और वो जिज्ञासु के पीछे भागता है। और ऐसा नहीं कि वो शरीर से आए — उसमें इतनी सामर्थ्य, इतना बल है कि वो कहीं से भी बैठ के कर सकता है।
आप जरा बाहरी सिस्टम को समझो। अभी ये मोबाइल आपका चल रहा है; एक ऑपरेटर वहां बैठा है, एक बटन मारे तो नेटवर्क गया — वहीं से बैठ के कनेक्शन काट दिया, आपका मोबाइल छूने की भी जरूरत उसे नहीं है। ऐसे आंतरिक शक्तियां काम करती हैं। लेकिन वह ड्यूटी उसे मिली है, उसकी योग्यता के अनुसार; आप चाहो तो काट दोगे क्या किसी का? एक सेकंड में आपके पूरे फोन का नेटवर्क खत्म — अब तुम टावर पे चढ़ के भी मिलाओगे तो नेटवर्क नहीं आएगा, कनेक्शन कट चुका है। वहां बैठ के आपके नेटवर्क को बढ़ा-घटा सकता है, जबकि मोबाइल आपके हाथ में है, सिम आपके हाथ में है। तो यहां कुछ भी चल रहा है, उसके पीछे कोई आधार, बेस काम कर रहा है — आप ये ना समझना कि ऐसे ही चल रहे हो, बोल रहे हो; इसके पीछे कोई एनर्जी काम कर रही है। और जैसे ही वहां से वो कनेक्शन (काटता) है, तो कहते हैं यार मर गया — अब हाथ नहीं हिलेगा। और देखिए, आप जितने फोन करते हो, जितना WhatsApp करते हो, पूरी जानकारी उस सिस्टम के पास है। कौन सा तार जुड़ा है आपके मोबाइल से? दिख रहा है क्या? नहीं ना? लेकिन आंतरिक कुछ जुड़ा है। यह भी तो एक तरह की यांत्रिक शक्ति है। मैंने आज कहा ना — ये पूरा ऊर्जा है। लेकिन अब नेटवर्क है और आपने फ्लाइट मोड पे मोबाइल रख दिया, फ्लाइट मोड खोल ही नहीं रहे हो, और टावर पर जाके बैठ रहे हो कि यार नेटवर्क कैसे मिले — नहीं मिलेगा। कहीं ना कहीं गड़बड़ी है।
जैसे हम कल गाड़ी में बैठे, तो हमने अपने फोन का हॉटस्पॉट चालू किया, वहां वाईफाई कनेक्शन दिखा दिया, लेकिन कुछ चल ही नहीं रहा। तो मैं बटन दबा रहा हूं, फिर रिस्टार्ट किया, फिर भी नहीं। बोला यार गड़बड़ी कहां है? तो मैंने मोबाइल को देखा — डाटा ही बंद था। जैसे ही डाटा चालू किया, उसने पकड़ लिया। मैं कितना समय परेशान था, और वो मेरे हाथ में ही था। तो तुम्हारे हाथ में ही है — हमारे अंदर बटन है, तुम्हें बस एक बार दबा देना है, और तुम परम आनंद में हो जाओगे। लेकिन तुम वहां पहुंचो तो ना दबाओ — तुम तो कहीं और हो। तुम्हें अनेकों का बटन दबाने में मजा आ रहा है; तुम बहुत लोगों का बटन दबाने के चक्कर में हो, दिन-रात किसी ना किसी का बटन दबा रहे हो, बस अपना बटन नहीं दबाना है। जब अपने में जाओगे, तब ना बटन दबाओगे। तो जब तुम्हें दूसरे से फुर्सत मिले, तब ना तुम अपने में जाओ। मतलब आत्मज्ञान — जैसे आप बल्ब चालू (करते हो)। ऐसा नहीं कि मेहनत आप नहीं कर रहे हो — कर रहे हो, लेकिन किसी और के लिए; बटन तो दबा ही रहे हो, लेकिन किसी और का। और उस बटन दबाने से हमें राग-द्वेष मिलता रहता है, और बड़ा मजा आता है — राग-द्वेष का भी अपना मजा है। तो इस मजे से जब मुक्त हो जाओगे, रस भरी बातों से जब मुक्त हो जाओगे, तब आप अपने में आओगे ना। कैसे भी अपने आप को राग-द्वेष से छुड़ाओ, और इस पर आपको आत्मिक चिंतन करना पड़ेगा। आंख बंद करने से कुछ नहीं होगा। इसके लिए आपको ईमानदारी-सत्कर्म, उसके बाद कोई काम नहीं है, तब बैठो — तब कोई मतलब है।
ईमानदारी-सत्कर्म — देखो, जहां मैं हूं, वहां मेरी जरूरत है; उस जरूरत में अगर आप काम आ गए तो कितने लोगों का आशीर्वाद मिल जाएगा, और फिर इसके बाद आपकी यात्रा और तेजी से (चलेगी)। पता चला आपकी जरूरत है, और आप कहीं और हो, और आप वो कर सकते हो, तो आप तो गिर रहे हो। क्योंकि कर्म ही बंधन और कर्म ही मुक्ति ले जाएगा ना। जिस चाबी से ताला बंद होता है, वही चाबी खोलेगी — बस बंद करते वक्त अलग तरीके से घुमाया, खोलते वक्त (उल्टा)। जैसे ले गए थे, वैसे वापस आओगे। कर्म से आप भटक गए थे, तो कर्म करके वापस आ जाओ — कितना सरल रास्ता है। लेकिन तुम्हारी आदत है — बैठूंगा। क्या करोगे बैठ के? जरूरत है, कुछ काम कर देते। अपने आप को सत्कर्म में लगाओ, सेवा में लगाओ, तब जाके कल्याण होगा। आप भटके कैसे हो? कर्म से ना? तो कर्म से ही छुटकारा मिलेगा। अगर आप काम कर लिए, तब जाके आत्मिक चिंतन करो, तब बढ़िया से होगा। लेकिन हमारी जरूरत है और मैं उसको छोड़ के आत्मिक चिंतन करूं, तो आत्मिक चिंतन थोड़ी ना होगा। तो ईमानदारी-सत्कर्म अपनाओ और अपना कल्याण करो। कर्म से अगर बंधन हुआ है तो कर्म करके ही आप छूट सकते हो। ताला अगर ऐसे बंद हुआ है तो बस ऐसे ही फिर आना है — उसी केंद्र पर आओगे, और जहां से चाबी निकाले थे, वहीं से डालना पड़ेगा; और जैसे बंद किए थे, एकदम वही करना पड़ेगा। जिस स्पीड से भागे, उसी स्पीड से वापस आना है, उसी जगह पे, यहां से फिर शुरुआत। तरीका तो वही अपनाना पड़ेगा। हो सकता है कि तुम कितने समय के बाद ताला खोलने गए हो, बहुत जंग लग गया हो, तो वो झटके से चाबी नहीं घूमने वाली है। साफ करो। जब ताला पूरी तरह साफ हो जाएगा, तब जाके खुलेगा — और साफ सत्कर्म से होगा। अब कितना जंग लगा है? कितने साल बाद खोलने जा रहे हो? (जैसे बोलते हैं ना, जन्मों-जन्मों का) — तो मैं कह रहा हूं, सफाई में तो लगो। ईमानदारी चाबी है — ईमानदारी की चाबी लगा दो और सत्कर्म अपना लो, धीरे-धीरे खुल जाएगा।
देखिए, संभावना तब होती जब सामने वाले को कुछ चाहिए होता — कि उसकी बड़ाई करके उसका उपयोग करता — तब जाके। और अगर गुरु कुछ बात कह रहा है, तो गुरु के सामने तो अहम काम ही नहीं कर सकता। जैसे शेर के सामने गीदड़ को रख दो, तो गीदड़ की क्या ताकत काम करेगी? नहीं करेगी ना। एकदम दुबक जाएगा, या तो बच के भाग जाएगा — दो में से एक; अगर भाग नहीं पाएगा तो दुबक के बैठ जाएगा। तो ऐसे गुरु के सामने अहम काम ही नहीं करता, एकदम नहीं करता।
जैसे देखो, मान लीजिए छुरा होता है — एक क्रिमिनल के हाथ में, एक डॉक्टर के हाथ में, एक रसोई घर में होता है। अब क्रिमिनल भी चलाता है, डॉक्टर भी चलाता है, और घर की महिलाएं भी चलाती हैं, पुरुष भी चलाते हैं। तो अगर क्रिमिनल का (शिकार) बच भी जाए तो भी उसे सजा होगी। डॉक्टर ने चलाया, अगर (मरीज) मर भी जाए तो भी उसे सजा नहीं, क्योंकि एक का भाव बचाने का था, क्रिमिनल का भाव मारने का था, और इधर तो भोजन बनाने का था। मेन बात — भाव क्या है? तो आप जांचने के लिए फाड़ रहे हो, तब तो फट भी जाएगा तो कुछ आपको (दंड) नहीं मिलेगा। लेकिन आप फाड़ने के लिए फाड़ रहे थे और जांचने का नाटक कर रहे थे, लेकिन किसी ने आके बचा लिया, नहीं फटा, तो भी आपको दंड मिलेगा।
हर समय सचेत रहने के लिए बस इतना समझना है कि मुझे आत्मिक कल्याण करना है। अब आत्मिक कल्याण के लिए मुझे ईमानदारी-सत्कर्म करना है। बस आत्मिक कल्याण का भाव बना रहेगा तो आप हर समय सचेत रहोगे कि मुझे ऐसा कोई काम नहीं करना है जिससे बंधन हो जाए — ऐसा कोई काम अब नहीं करना है। बस।
विचार का स्रोत बाहर है। आपको अगर कहीं से डर हुआ तो इसका मतलब वो जानकारी आपके पास पहले से मौजूद थी, नहीं तो डर होगा ही नहीं। अभी देखो, हम लोगों को हिरन से डर नहीं लगता, लेकिन छोटे सियार से डर लगता है, क्योंकि मुझे उसके बारे में जानकारी है ना। अब देखो, एक बच्चे को जानकारी नहीं रहती — वो सांप भी हाथ से उठा लेता है, कंकड़ भी उठा के खाने लगता है, मिट्टी भी। उसके सामने कुछ भी आ जाए, शेर भी आ जाए, तो डरेगा नहीं, उसको भी गले लगा ले, भले शेर मार दे — क्योंकि उसके अंदर डर नहीं है। डर क्यों नहीं है? उसे जानकारी नहीं है। तो अगर आपको डर का विचार आ रहा है, इसका मतलब उस डर के बारे में आपको जानकारी है। तो जानकारी हमें बाहर से मिल गई है, वो आधार-बेस है, उसी पे हम कल्पना करके सोचते हैं। मतलब विचार आपके अंदर नहीं है, वो आपको बाहर से मिला है।
जैसे मान लीजिए, आप बैठे हो, आंख बंद है, और बाजा बजा दिया जाए। अब जिस भाषा में गाना बज रहा है, आपको उस भाषा की जानकारी है, तो आपका भाव उसमें चला जाएगा। कैसे गया? सुन के। तो विचार कहां से आए? सोचने वाला अंदर, लेकिन सोचने का विचार कहां से आया? बाहर से ना। लेकिन आप बहरे हो, इंद्रियां काम नहीं कर रहीं, तब कुछ नहीं होगा। और अगर वो भाषा नहीं आती तो एक साउंड लगेगा। कहने का मतलब है, मेरे अंदर कोई विचार हमें बाहर से मिला है। जब हमें बाहर से — पांच इंद्रियों द्वारा — मिलना बंद हो जाता है, तो हम अंदर जितना इकट्ठा किए रहते हैं, उसके बारे में सोचते रहते हैं। मतलब हर वक्त हम काम ही करते रहते हैं। और ये कब तक करते रहेंगे? जब तक हमें कुछ चाहिए।
जैसे कहीं भीड़ लगी हो, आप जा रहे हो — अगर आपको वहां काम नहीं है तो भीड़ से आपको क्या मतलब? लेकिन भीड़ तब आपके लिए (परेशानी) है जब वो भीड़ जिसलिए खड़ी है, आपको भी उसी के लिए खड़ा होना है — तब कहोगे अरे यहां बड़ी भीड़ है। लेकिन वो भीड़ जिसके लिए खड़ी है, वो काम आपका है ही नहीं, आप कहीं और जा रहे हो, तो आपको भीड़ से कोई लेना-देना नहीं। लेना-देना कब है? जब आपको कोई काम हो। तो जब तक मुझे कुछ चाहिए, हमारे तरीके से चाहिए, तब तक हमारे विचार हमको परेशान करते रहते हैं। और अगर मैं जरूरत में आ गया तो विचार परेशान भी नहीं करेंगे। हमारे विचारों से हमें तभी तक परेशानी है जब तक हमें हमारे तरीके से चाहिए; और हमारे तरीके से नहीं चाहिए तो विचार तो आएंगे, परेशानी नहीं होगी।
ना सही है, ना गलत है। आप लाभ लीजिए — अपना आत्मिक कल्याण कैसे होगा। कहीं भी जाइए। प्यास बुझानी है, किसी भी नल का पानी पीजिए। ज्ञान लेना है मुझे — अगर कोई मिल गया, दे रहा है, तो ले लेंगे। और ज्ञान किसी एक का नहीं होता। जैसे पानी पृथ्वी के अंदर से आता है — पानी तो एक ही जगह से आता है, स्रोत अलग-अलग (दिखते) हैं। तो ज्ञान एक ही जगह से आता है, दो जगह से नहीं। हमें ऐसा लगता है कि मेरे नल का पानी है और ये उसके नल का; अगर देखा जाए तो दोनों के नल का स्रोत एक ही है। तो वैसे गुरु ज्ञान का प्रतीक होता है; ज्ञान एक ही जगह से आता है।
ज्ञान कहां से आता है, अब ये समझना है। (कोई) किताबों से भी जानकारियां उठा के दे रहा है। अब जैसे पानी पृथ्वी से भी आता है, ऊपर से भी आता है, और आपकी टंकी से आता है — तीन ही जगह से है। तो एक किताबी ज्ञान है, एक महापुरुषों की वाणियां हैं, और एक सतगुरु का ज्ञान है। अब देखिए, जमीन से (पानी) निकालो तो जब तक आपके पास ताकत है, बिजली वगैरह, तभी तक आप निकाल सकते हो। टंकी का — आपने जितना संचय किया है, उतना निकाल सकते हो। जैसे किताब से आप खूब बोलोगे, लेकिन जब तक शरीर के द्वारा पढ़ सकते हो, तभी तक बोल पाओगे; और कुछ आपने कंठस्थ किया है, फिर उतना बोल पाओगे। एक होता है आत्मज्ञान — बारिश की तरह। अगर आप किसी पेड़ की सिंचाई जमीन के पानी से करो या टंकी के पानी से, तो उसे पूरी तरह नहीं सींच सकते। लेकिन जब वर्षा होती है तो वृक्ष के कोने-कोने में जाता है। यही है सतगुरु की वाणी। (कहा है —) 'सतगुरु हमसे रीझ कर कहा एक प्रसंग, बरसा बादल प्रेम का, भीग गए सब अंग।' जब आत्मज्ञान से, आत्मा से ज्ञान निकलता है तो आपके रोम-रोम में समाता है; और जब रटा-रटाया ज्ञान निकलता है तो बस आपके कानों से जाता है, उससे बदलाव नहीं आता।
इसीलिए हमें कहा गया है कि जीवंत गुरु ढूंढो — वो वर्षा की तरह आपको भिगो देगा। अब हमें वर्षा में रहना है। पता चला बारिश तो हो रही है, लेकिन हम तल्ला-मकान बना के अंदर खिड़की बंद करके बैठे हैं। भीगने के लिए उसके सानिध्य में जीना पड़ेगा, इर्द-गिर्द रहना पड़ेगा — पता नहीं कब बरसे। जैसे तानसेन संत हरिदास जी के शिष्य थे। अकबर ने कहा — तानसेन, तुम जैसा कोई नहीं। बोले — ना ना, मैं तो बस कुछ मुद्राओं के लिए गाता हूं, मान के चक्कर में; मेरे से भी आगे कोई है — मेरा गुरु। बोले उन्हें भी बुलाओ। बोले — वो तुम्हारे लिए गाएंगे ही नहीं, वो तो उस परम सत्ता के लिए गाते हैं; जब उनकी मौज होगी, तभी गाएंगे। तब वो दोनों कई दिन तक आसपास छुप के रहते हैं, और एक समय आधी रात को (सुनने को मिलता है)। इसीलिए कहा गया है कि जीवंत गुरु की शरण में जाना और रुकना। अब तुम घर से निकले, बारिश आई, तुरंत घर में चले गए — भीगे, लेकिन पूरी तरह नहीं। भीगने के लिए उसके सानिध्य में रहना पड़ेगा ना। वर्षा हो रही है तो उस वर्षा का दर्शन करने से थोड़ी भीग जाओगे। तो इसीलिए कहा गया है कि जीवंत गुरु के सानिध्य में रहो, तर जाओ।
इतिहास में जितने भी जीवंत गुरु हुए, देखो — उनके पास आए तो लाखों-करोड़ों लोग, लेकिन टिका कोई-कोई, क्योंकि वहां पे रस नहीं मिलता ना। तो वो कहता है — आपकी कृपा है, और रस लेने मैं आगरा जा रहा हूं। अगर तू समझ ही गया कि इसके द्वारा मेरा कल्याण हो जाएगा, तो उससे दूर क्यों जा रहा है? क्या वो भगा रहा है? कोई विवशता है, व्यवस्था है, तो उसको पूरा करके आ, लेकिन गुरु को बोल के जा — तू रसपान करने मत जा। तो हमारे अंदर बड़ी चालाकियां हैं। जीवंत गुरु का सानिध्य बहुत लोगों को मिला है, इतिहास उठाओ, लेकिन कल्याण इक्का-दुक्का का हुआ है — जो चालाक नहीं था, उसने पकड़ लिया गुरु का सानिध्य कि भैया अब रहेंगे तो तरेंगे तुम्हारे साथ ही। और आप जिसका साथ पकड़ोगे, वो जहां पहुंचेगा, तुम भी पहुंचोगे। जैसे युधिष्ठिर के साथ कुत्ता — साथ मत छोड़ो। कहानी कहती है, जब गेट पे पहुंचे तो (कहा गया) तुम आ सकते हो, कुत्ता नहीं। (बोले) कुत्ता नहीं आया तो मैं भी नहीं आऊंगा, क्योंकि ये मेरे साथ था। तो आप जिसके साथ रहते हो ना, वो आपको अपने जैसा बना देगा; वो जहां जाएगा, आपकी एंट्री पक्की। तो साथ का असर इतना है — संगत से रंगत होती है।
देखो, मैं आपको बताता हूं। जैसे वाटर कहो, चाहे पानी कहो, चाहे जल कहो, चाहे नीर कहो — सबका मतलब एक ही है। दुनिया की जितनी भी आध्यात्मिक किताबें महापुरुषों ने लिखी हैं — अब तो किताब कोई भी ऐरा-गैरा लिख दे रहा है, मैं उसकी बात नहीं कर रहा, मैं महापुरुषों की बात कर रहा हूं — उन्होंने बोला अलग तरीके से है, लेकिन मतलब सिर्फ इतना था कि ईमानदारी-सत्कर्म में लगकर अपना कल्याण कर लो। बस इतने के लिए इतनी किताबें। अब या तो तुम पढ़ के समझ लो — और कुछ उसमें अलग नहीं लिखा है, फाइनल यही लिखा है: ईमानदारी-सत्कर्म अपनाकर अपना कल्याण कर लो। अब मुझे यह देखना है कि मैं ज्यादा से ज्यादा सत्कर्म कैसे कर सकूं; और मैं भटकने वाला आदमी हूं, इसलिए सत्संग भी सुनता रहूं, क्योंकि सत्संग का बल मिलेगा। नहीं तो मैं सत्कर्म तो करूंगा, फट से भटक भी जाऊंगा, ताकत नहीं मिलेगी, क्योंकि मैं भटक चुका हूं ना, मैं अपनी आदतों का गुलाम हो चुका हूं। सत्संग सुनता रहूंगा तो मुझे बल भी मिलता रहेगा। तो जितनी भी किताबें लिखी गईं, सबका मतलब यही है।
(पुनर्जन्म के बारे में —) जब हम मरेंगे, उस दिन समझ लेना। वो रिबर्थ वाला छोड़ो, तुम भी तो शरीर छोड़ोगे, तब समझ लेना। ये रिबर्थ वगैरह के चक्कर में मत पड़ो। हमें क्या मतलब? मैं कह रहा हूं — होता होगा तो क्या होगा? नहीं होता होगा तो क्या होगा? आप बताओ, कुछ होगा क्या? मैं अभी क्या कर सकता हूं, किसमें मेरा कल्याण है — वह करो। (साधक ने कहा मैंने भी कुछ किताबें पढ़ी हैं —) आप छोड़ो किताबों की बातें, आप अपना कुछ बोलो ना, मैं आपसे बात कर रहा हूं। क्या आपका कल्याण रिबर्थ जानने में है? रिबर्थ जान जाओगे तो आपका कल्याण हो जाएगा? नहीं ना। आपका कल्याण आपके कर्म से है ना? आपका कल्याण किसमें है? आपके कर्म से है।
ना दुख, ना सुख — दोनों को छोड़ना पड़ेगा। एक सिक्के के (दो) पहलू हैं। आप दुख-सुख दोनों से जब ऊपर उठोगे, तभी होगा। और दुख-सुख किसमें है? अपने तरीके से मिल गया तो सुख, नहीं मिला तो दुख। तो अपना तरीका छोड़ोगे तो सुख-दुख दोनों छूट जाएंगे। बस।
आपके अलावा भिन्न कितने लोग दिख रहे हैं? और कोई आपसे मजबूत भी हैं, कमजोर भी हैं — दोनों चीज हैं। आपसे भिन्न कितने लोग यहीं दिख रहे हैं?
(केवल मैं ही सत्य हूं या ये भी —) जो दिख रहा है, वो ना सत्य है ना असत्य है। क्योंकि मूल में कहीं वो भी तो मूल है, क्योंकि आप किसी भी एक कण का भी नाश नहीं कर सकते। तो जो हमें दिख रहा है — रूप — उसका नाश हो जाएगा, तत्व का नहीं। तो जिसका नाश नहीं होता, वो सत्य है। तो अगर आप किसी भी कण के कण के कण को ले लो, तो आखिरी में उसका नाश नहीं; रूप का नाश है, तत्व का नहीं। अब हम जिसे देख पा रहे हैं, वह तो सत्य नहीं, लेकिन उसके पीछे वाला सत्य, जिसके द्वारा वो है — पहले हम अपने सत्य को जानेंगे, तभी दूसरे के सत्य को जान सकते हैं। तो जब तक हम जानने से मुक्त नहीं होंगे — जानने से मुक्त होने के बाद आप जान जाएंगे, क्योंकि जानने के लिए कुछ बचेगा ही नहीं; सत्य बचेगा। और सत्य को जानने से ही मुक्त हो जाओगे — सत्य को थोड़ी ना जानना है। अभी तो आपको जानने से मुक्त होने के लिए काम करना है, क्योंकि आपने बहुत कुछ जान लिया। आपको सच नहीं जानना है; आप जितना जाने हो, उससे मुक्त (होना है)।
हां, अगर वह उस जगह को स्वीकार किया जहां वह रह रहा है। (लेकिन) ऐसा हो ही नहीं सकता — उसकी समझ से जानकारी वो उठा ही लेगा, क्योंकि वो समझ तो लेके आया है ना। आपको कुछ ना कुछ जानकारी देनी ही पड़ेगी, और कुछ जानकारी वो खुद भी खोज लेगा — आपने एक पकड़ाया है तो दो खुद पकड़ेगा, क्योंकि कहेगा एक के बाद क्या — वहीं से शुरुआत हो गई। कहीं तो उसे इस दुनिया में, पृथ्वी पर रखोगे, तो जिस रूप को देखेगा, पूछ लेगा ये क्या है — (समझ) तो लेके आया है ना। हमने भी खुद ऐसी जानकारी ले ली जो मां-बाप को अभी भी नहीं है; हमने अपने इंटरेस्ट के अनुसार वो ले ली थी ना। वो जीवात्मा खुद ले लेता है। ऐसा नहीं कि आप जितना देते हो, उतना ही उसके पास है।
कर्ता भाव तभी तक है जब तक आप अनुमान लगा रहे हो। अनुमान लगाना छोड़ दो, कर्ता के भाव से आप मुक्त हो जाएंगे। और आत्मिक चिंतन में इतना करना है कि मैं कैसे मुक्त हो जाऊं, मैं अपने आप को कैसे छुड़ा लूं।
नहीं, कोशिश गलत तरीके से कर रहे हो। अब मैं कहूं कि मैं कोई वजन उठा रहा हूं लेकिन उठा नहीं पा रहा हूं — इसका मतलब आप में बल नहीं है। सीधी सी बात। नहीं तो वो एक ही बार में उठ जाता। तो आप कहीं से बल लो। हो सकता है कोई हाथ लगाए, और आपका हाथ उसका हाथ मिल के उठा दे। कहने का मतलब — आप नहीं छुड़ा पा रहे हो, मतलब आप में बल कम है, तो ज्यादा प्रयास मत करो। किसी जीवंत गुरु की शरण में जाओ। वो आपको बल देगा, तरीका देगा, और आप अपने आप को छुड़ा लोगे।
आप अगर शक्तिशाली हो तो किसी जरूरतमंद की सेवा करो। तो आप जब अपनी ताकत का सदुपयोग करोगे — क्योंकि ताकत है तो कहीं ना कहीं तो खर्च करनी पड़ेगी, नहीं तो आपकी ताकत आपको घुटन देगी — तो कहीं जरूरतमंद की (सेवा में लगाओ)।
देखो, अब बच्चों का भरण-पोषण कैसे होगा, उसके लिए देखो। तो पूरी परिस्थिति देखो, क्योंकि बच्चे आपके द्वारा हैं, तो उनका पालन-पोषण कौन करेगा? मन तो लगाना (ही पड़ेगा)।
ज्ञान आपके पास कहां है? अभी तो आपके पास जानकारियां हैं। तो कहने का मतलब — जानकारियों में जो अहम भाव है, वह त्यागना है। क्योंकि आपने दूसरे की जानकारियों को अपनी जानकारी मान बैठे हो, दूसरे के सत्य को अपना सत्य मान बैठे हो, उसके लिए लड़ाई-झगड़ा करते हो — इसलिए आप ऐसे तकलीफ में घूम रहे हो। काश, दूसरे के सत्य को अपनी जानकारी मानकर, उस सत्य तक पहुंचने के लिए काम करते, तो कभी आप सत्य तक पहुंच जाते। लेकिन आप दूसरे का सत्य अपना सत्य मानकर उसके लिए लड़ रहे हो।
ये आपको अपने आप से पूछना पड़ेगा कि आपको कहां जाना है, उसके लिए आपको काम करना पड़ेगा। संसार में देखो, दो ही काम हैं — या तो बाहर कुछ बन जाओ, या तो सत्य की खोज करो। इसके अलावा तीसरा रास्ता नहीं है। तो देख लो आपको क्या करना है। तीसरी कोई जिंदगी नहीं है, दो ही जिंदगी हैं — या बाहर के द्वारा अपने आप को बना लो (नाम, शोहरत, पैसा), या तो फिर सत्य के खोजी बन जाओ, अपने स्व की खोज करो।
हां, काफी है। लेकिन इसके अलावा और भी अगर कोई आ जाए तो हमारा कर्तव्य है कि हम उसकी भी सेवा करें। अब ये आवरण मत देखो कि नहीं, कुत्ता तो कुत्ता। आप सेवा करने निकले हो जरूरतमंद की, तो अगर कोई भी पशु ऐसा आ जाए — अब पता चला एक कुत्ता, एक गधा, दोनों सड़ रहे हैं, आपने कुत्ते को उठाया, गधे को छोड़ दिया — तो आप अपराधी बन गए। उठाते तो दोनों को उठाते ना, क्योंकि जरूरतमंद दोनों थे। तो आप आवरण मत देखना — शरीर भी एक आवरण है — आप जरूरत देखना: क्या जरूरत है? मैं इस जरूरत की पूर्ति कैसे कर सकता हूं?
कोई बात नहीं। आप बस सकारात्मक करते रहो। आपका भाव नकारात्मक में ना हो। बस, हो जाता है — कोई बात नहीं। हम एक गिलास पानी देने जा रहे थे, और मेरा भाव था कि इसकी प्यास को तृप्त कर दूं, और गिलास गिर गया — तो उसमें मैं दोषी नहीं हूं। गिर गया, मैं दूसरा ला के दूं; और अगर दूसरा नहीं भी है, तो मैं दोषी नहीं हूं, क्योंकि मेरा भाव गिराने का थोड़ी ना था। हां, अगर मेरा भाव गिराने का था कि मैं पानी तो दे रहा हूं, रास्ते में गिरा दूंगा, लेकिन किसी ने ले लिया और दे दिया, तो फिर भी मुझे दंड मिलेगा, क्योंकि मैं उसे नहीं देना चाह रहा था ना।
हां, पेड़ का भी, स्थान का भी अपना-अपना महत्व है। जैसे अब ये सब जमीन है, लेकिन एक जगह बीज डालने से अच्छा आता है। आप लोग किसान अगर हो तो आपको पता है कि वही खाद-बीज सब इधर डालो, वही उधर डालो — इसमें अच्छी फसल होती है, बंजर जमीन में कम होती है। तो ऐसे वृक्ष का, जगह का, व्यक्ति-विशेष का अपना-अपना महत्व है; उसकी ऊर्जा हमारे लिए सहायक होती है। स्थान का और पेड़-पौधों का भी हमारे जीवन में महत्व है।
देखो, आज जितना भी पता है आपको — आप चले, तभी पता लगा। कहीं ना कहीं उसके पीछे मेहनत है। तो अगर मुझे पता चला तो उसके लिए हमने काम किया, तो आप भी काम करो। सीधी सी बात है।
भीख अपने से कमजोर को दी जाती है; देते हैं, (ऊपर होने का) भाव रहता है। और दान, अपने से जहां ज्यादा सामर्थ्य है, वहां दिया जाता है — उसे दान कहते हैं। देना दोनों में है। एक को कमजोर समझ के दे रहे हैं, एक को मजबूत समझ के दे रहे हैं। भिखारी को देते हुए मालिक का भाव आता है, और अपने से सामर्थ्यवान को देते हुए दास का भाव आता है।
हां, तो देखो — जैसे परमात्मा है, परमात्मा से सृष्टि भी है, परमात्मा से आत्मा भी है। अब आत्मा या तो इस संसार को पकड़ता है, तो फिर ब्रह्म से दूर हो जाता है; ब्रह्म को पकड़ेगा तो संसार से दूर हो जाएगा। है एक ही से।
नहीं, सत्कर्म तो नहीं है। ये आप अपने लिए कर रहे हो कि समाज के लिए कर रहे हो? अगर आप सार्वजनिक कर रहे हो तो मनोरंजन है; आप कमरे में कर रहे हो तो भक्ति है। अब उसमें मांग क्या है, वो देखना है। लेकिन सत्कर्म नहीं है।
हां, चला ही जाएगा। तो हमें ये पूछना चाहिए कि इससे मुझे क्या मतलब? अपने आप से ये कहना चाहिए कि मुझे क्या मतलब था — तो फिर तुम वहीं आ जाओगे। तो कोई बात नहीं, इसको कंटिन्यू रखना। बैठ गए, अगर ऐसा कुछ आ रहा है तो बोलो — हमसे क्या मतलब? 'हमसे क्या मतलब' से तुम वहीं आ जाओगे जहां से गए थे।
इसमें थोड़ा समझना — ये मैंने आप लोगों के लिए लिखा है। 'ईमानदारी मुक्ति है' — ये पहली लाइन है; और ये आखिरी — 'बेमतलब से आना नहीं, मतलब है तो आना नहीं।' ईमानदारी वाला मैंने समझा ही दिया; और ये वाला आप समझ लो, ये आपके लिए है।
पहले रहो आराम से। (वो सब) अभी रखे रहो। अभी जिसके लिए आए हो, वो करो। आपको जो चाबी मिल गई है, आप उसी में रख दो। आप जिसके लिए आए हो, पहले उसमें लगो, उसमें पूरी तरह अपने आप को घिसो। चाहे वहां का पैसा हो, चाहे यहां का — तुम निकल लोगे तो ताला तोड़ के हम ले लेंगे, यहीं लगा देंगे, कोई छोड़ेगा नहीं। आप इसकी चिंता ना करना। ना यहां का पैसा बचेगा, ना वहां का — वहां के वो लोग लूट लेंगे, और यहां अगर तुम निकल गए तो हम ताला तुड़वा ही देंगे। तो आप अपनी चिंता करो। अरे, आप इसमें से निकल गए तो इस शरीर का भी प्रकृति उपयोग कर लेगी; यहां कुछ बचने वाला नहीं है। मेरा तो बस इतना कहना है कि आप अपनी चिंता कर लो।
यह बहुत अच्छी बात है आपकी कि भाई, यहां कार्य हो रहा है, मैं भी इस कार्य में सहयोग देना चाहता हूं — बहुत अच्छा है, इसी को सत्कर्म कहते हैं, क्योंकि आप भी समझ के बोल रहे हो। तो आप पहले अपने आप में लगो। (पैसा तो) रखा रहेगा — कभी भी, 100 साल बाद भी उपयोग हो जाएगा। अगर वो नोट चलती होगी तो ठीक है, और कैंसिल हो गई तो सरकार उपयोग कर लेगी, उसी के नंबर का नोट बना देगी। कोई ना कोई कर लेगा। यहां हर चीज का कोई ना कोई उपयोग कर लेगा। तुम तो बस अपनी चिंता करो। मेरा यही कहना है कि आप बस अपने बारे में लग जाओ और अपना कल्याण करो, फिर लगा देना — यही सेवा हो रही है।
बस वही सच — वही है। उसी को गुप्त रूप में बताया गया है, गुप्त है वो। (आदि नाम —) वो सत्कर्म है। आपको थोड़ी पता रहता है कि आप सत्कर्म करने वाले हो। जब कोई गिर गया, आप उठाते हो — तो क्या आपको पता था कि ये गिरेगा और मैं उठाऊंगा? सेवा आप कह सकते हो। सत्कर्म का मौका प्रकृति देती है — यही गुप्त है। सत्कर्म का मौका प्रकृति देती है।
आप चाह के (सत्कर्म) नहीं कर सकते। आप रास्ते में जा रहे हो, कोई गिर गया, आपने उठाया — यह सत्कर्म है, यही गुप्त है; और इसको अगर कोई समझ लिया तो निकल गया। (साधक ने कहा कि कथावाचक ये दो शब्द — ईमानदारी और सत्कर्म — खोल के नहीं बताते —) कोई बात नहीं, अब तो मिल गया ना, अब पकड़ लो। ये सत्कर्म को पकड़ लो। गुप्त रहस्य ही है सत्कर्म — यह आपको भी पता नहीं चलता कि आपको मौका मिला। (भिखारी को देना सत्कर्म नहीं —) जो जरूरत में आ जाए; ऐसे भी नहीं कि अपनी ओर से दे दे, तो वो भी कोई सत्कर्म नहीं हुआ; जहां जरूरत प्राकृतिक हो। अब ऐसा (नहीं कि) किसी को पहले मार दो, घाव लग जाए, और चलो सत्कर्म कर दिया — वो भी गलत है। और दूसरा, भाव भी नहीं होना चाहिए कि उससे फिर कुछ चाहिए। सत्कर्म का मौका प्रकृति देती है, और जब आप सत्कर्म करते हो तो उस समय इच्छा और अपेक्षा दोनों काम नहीं करतीं। और जब आपको सत्कर्म की कोई कीमत दे देता है ना, तो कहते हो — मैं बिकाऊ नहीं हूं। आप ₹200 के लिए दिन भर काम करोगे, लेकिन कोई गिर जाए और आपने उठाया, और वो कहे बेटा कुछ रख लो, तो कहोगे — ना ना, इसका पैसा हम नहीं लेंगे, हम बिकाऊ नहीं हैं। 12 घंटे काम करेंगे (पैसे के लिए) चलेगा, (लेकिन यहां नहीं) — क्योंकि सत्कर्म किए हो। सत्कर्म में इच्छा और अपेक्षा दोनों काम नहीं करतीं, और यही गुप्त रहस्य है। और जिसने सत्कर्म को पकड़ लिया, समझ लो उसने परमात्मा को पकड़ लिया।
उसका (सांस पर ध्यान का) प्रभाव सिर्फ शरीर पर पड़ता है। अगर आप सच में अपना कल्याण चाहते हो तो बस ईमानदारी-सत्कर्म अपना लो, बस इसी को पकड़ लो। और नहीं चाहते तो बहुत कुछ है, बहुत लाइनें हैं — कोई काम में आने वाली नहीं हैं। इसे पूरी तरह पकड़ लो।
(आंख बंद करके क्या करना है —) हमें ना आंख बंद करना है, ना खोलना है। मुझे सिर्फ अपने कार्य को निपटा कर एकांत में जाना है — (देखना है) कि कोई काम बाकी तो नहीं है। पता चला कहीं आपकी जरूरत है, तो पहले काम को निपटा दो, और फिर उसके बाद चले जाओ, फिर आत्मिक चिंतन ही होगा। जैसे शौचालय में चले गए, तो बैठने के बाद लैट्रिन (के लिए) थोड़ी ना (प्रयास) करना पड़ेगा, वो अपने आप होगा। अब तुम बिस्तर पे ही सोच रहे हो कि लैट्रिन हो जाए, तो वहां प्रयास करना पड़ेगा। अब शौचालय में चले गए और बैठ गए, फिर प्रयास करना पड़ेगा? अपने आप हो जाएगा। एकदम साफ-सुथरी, प्रत्यक्ष बात है। तो आप सारे काम को निपटा के जाके बैठ जाओ, आत्मिक चिंतन ही होगा। समझ के बाद — अब समझ नहीं है तो अबोध बालक कहीं भी सोया है तो भी कर देगा, उसे लैट्रिन-फैट्रिन का कोई लेना-देना नहीं है। और आप में समझ आ गई है, समझ विकसित हो गई है — अच्छे-बुरे का, राग-द्वेष, मोह-आसक्ति, इच्छा-अपेक्षा का ज्ञान हो गया है — तो आपको एक तरीके से जीना पड़ेगा, उस जगह पे जाना पड़ेगा। और आप वहां पे जाके, काम करके बैठ गए, तो आत्मिक चिंतन ही होगा, और कुछ नहीं होगा।
तो बस जाके हमें बैठ जाना है, कान में कुछ नहीं करना है। इसमें पढ़ाई-लिखाई से कोई मतलब नहीं है। आपकी जिंदगी आपको पढ़नी है। आपने जितना किया है, उससे निकलना है — इसमें क्या पढ़ाई काम आएगी? अब मैं गया और यहां फंस गया हूं, तो अब मुझे गांठ छुड़ाना भी तो आना चाहिए — इसलिए जीवंत गुरु चाहिए, सत्संग। ज्ञान की तलवार लेके आत्मिक चिंतन करना है। ऐसे भी जाके मत बैठ जाना एकांत में, डिप्रेशन के शिकार हो जाओगे। खा के बैठे हो ना — दो-चार हफ्ता खाते ना, और जाके शौचालय में बैठे तो क्या निकलेगा? दो हफ्ते से भोजन ही नहीं है और टेंशन है कि कुछ निकल ही नहीं रहा — तो जब पेट में कुछ है ही नहीं तो निकलेगा क्या? छोटी-छोटी बात लगती है, लेकिन यही सब मूल बात है। तो कहने का मतलब मेरा ये है कि जब आत्मिक चिंतन में जाना तो सत्संग ले जाना, ज्ञान की तलवार ले जाना — तब अपने आप को छुड़ा पाओगे।
नहीं, (केस) बढ़ नहीं गए। अब क्या हुआ कि (लोग) करके बता रहे हैं। (लोग इनाम लेने के लिए) एक्सीडेंट नहीं कर रहे होंगे, ऐसा नहीं कोई करेगा। आप समझिए इस बात को — करके लोग बताने लगे। ये तो मैं कह रहा हूं कि अगर कोई खाना खिलाते हुए वीडियो (बनाता है) तो दूसरे को भी तो प्रेरणा मिलेगी — अच्छे काम का ही तो बना रहा है। अगर उस वीडियो को 1 लाख लोगों ने देखा तो दो-चार को तो भाव आएगा कि मैं भी करूं। आप समझो, अच्छे काम का हमेशा वीडियो बना ही लेना चाहिए। (भाव ऐसा नहीं है —) अरे, काम तो अच्छा कर रहे हो।
(एक सन्यासी साधक ने बताया कि मंदिर में आए पैसे से उन्होंने सरकारी स्कूल के 44 बच्चों को कॉपी, पेन, स्वेटर बांटे और उसका वीडियो भी बनाया —) ये तो खुद व्यक्ति जानता है कि मैं किस भाव से बना रहा हूं; बनाने वाला तो जानता है। पहले तो हम सेवक राम को लेके जाते थे, तो बोलते थे — क्या पूछें? हम कहे — बस इतना पूछो कि ईमानदारी क्या है, तो उसके आगे हम बोलेंगे। शुरू में एक बार, दो बार में (वीडियो) नहीं बनता था। इनका अपना तो क्वेश्चन था नहीं, क्वेश्चन तो हम देते थे — पूछो, ईमानदारी क्या है? चलो आज इस पे वीडियो बनाएंगे। फिर पहले दो-दो, तीन-तीन मिनट का वीडियो बनाते — अब ईमानदारी कैसे करें, आत्मिक कल्याण क्या है, राग-द्वेष क्या है, मोह-आसक्ति क्या है। तो एक-एक प्रश्न देते थे कि आप पूछो — मोह-आसक्ति क्या है, तो मैं बताऊंगा। तो ये कैमरा चालू करते थे। एक संबोधन तो अच्छा करना पड़ेगा — 'प्रणाम गुरुदेव' — वहां प्रणाम थोड़ी ना किया जा रहा है, लेकिन जब हमारी बातें दूर तक पहुंचें, तो वो थोड़ी सुन रहे हैं कि ये नाटक हो रहा है। लेकिन नाटक भी ऐसा करो कि प्रत्यक्ष लगे, क्योंकि ज्ञान तो समझेंगे लोग। तो कहने का मतलब है कि हम समाज को कुछ बताना चाह रहे थे। अगर एक तौर से देखोगे तो एक नाटक कर रहे थे — उस नाटक ने इतना कुछ दे दिया कि आज देखो अपनों की कुटिया बन गई, आप लोग यहां मौजूद हो। तो शुरुआत ऐसे हुई थी।
ये देखो, क्या होता है — कुछ शक्तियां होती हैं। हमें ये देखना है कि वो क्या कर रहे हैं उससे मेरा (क्या मतलब) — मैं क्या कर रहा हूं, ये देखना है। मैं आपको बताऊं — मैं लोगों को छू के ठीक कर देता था; अब हमें कुछ तकलीफ होती थी, दर्द था, हम टेबलेट खा लिए थे। तो यह सब शक्तियां ज्यादा देर तक नहीं टिकी रहतीं। तो मुझे देखना है कि मैं क्या कर रहा हूं। 'जय श्री राम' तो बोल रहा हूं — क्या राम का चरित्र अपने जीवन में उतार रहा हूं? तब 'जय श्री राम' बोलने का मतलब है। अगर मेरा चरित्र रावण का है और मैं 'जय श्री राम' चिल्ला रहा हूं, तो उससे कुछ होने वाला नहीं है। सीधी सी बात है। होने वाला किससे है? कुछ करने से, चिल्लाने से नहीं। तो राम का चरित्र जीवन में उतारो। एक बात बताओ, रामायण में कहां-कहां लक्ष्मण जी ने, भरत जी ने 'जय श्री राम, जय श्री राम' बोला है? कहीं नहीं ना। तो आप बताओ, अर्जुन को कृष्ण ने 'कृष्ण-कृष्ण' जपने को दिया क्या? कृष्ण ने अर्जुन को कर्म का सिद्धांत बताया। यह 'जय श्री राम' चिल्लाने से कुछ नहीं होगा; 'जय श्री राम' वाला काम भी है कि नहीं, वो देखो, क्योंकि काम से परिणाम आएगा, चिल्लाने से थोड़ी ना आएगा।
तो आप जैसा वाक्य बोल रहे हो, जैसे शब्द बोल रहे हो, क्या उसमें जी रहे हो? राम का चरित्र जीवन में अपनाए हो? कृष्ण का, बुद्ध का, महावीर का, मीराबाई का, संत रविदास जी का, रामकृष्ण परमहंस का, स्वामी विवेकानंद का चरित्र जीवन में अपनाए हो? चरित्र अपनाने से कुछ होगा, बोलने से थोड़ी ना होगा। किसी का नाम राम रख दो तो क्या राम के गुण आ जाएंगे? वो तो सिर्फ शब्द रह गया। तो मुझे सारे प्रपंच को छोड़ते हुए ये देखना है कि मैं क्या कर रहा हूं। कहीं ऐसा तो नहीं — वो चिल्लाने में लगे हैं और मैं सुनने में लगा हूं — तो दोनों तो एक ही जगह हो। तुम कह रहे हो वो चिल्ला रहा है, तो तुम सुन भी तो रहे हो, तो दोनों तो एक ही जगह हो। नहीं, तुम आगे निकलो ना, तुम वहां चले जाओ जहां उसके शब्द सुनाई ना दें, तुम अपना काम करो। तो देखना ये है कि मैं क्या कर रहा हूं, क्योंकि मेरे करने से मेरा कल्याण होगा।
(साधक ने कहा कि लोग परिक्रमा के लिए रात 12 बजे से भागते थे और मैं सोता था —) अब तो भागने वाला चक्कर अलग हो गया ना, लेकिन जब तक (वहां) थे, तुम भी तो वही भाग रहे थे — लोग परिक्रमा करके भाग रहे थे, तुम सो के भाग रहे थे — क्योंकि कोई पकड़ नहीं मिली। चलो, मिल गई ना पकड़, तो (वहां से) भाग चले। चलो, अब अपना कल्याण कर लो।
क्या गलत, क्या सही — जब रह रहे हो तो क्या गलत, क्या सही? जब केस चल रहा है (तब)। अब देखो, महिला भी — वो आपके साथ रह रही है, कि वो भी किसी को धोखा दे रही है?
नहीं, देखना ये है कि मुझे अगर कोई कार्य मिला है, क्या मैं ईमानदारी से कर रहा हूं — बस ये देखना है। किसी को सही लगता है, गलत लगता है — मुझे उससे मतलब नहीं है। मुझे अपना काम ईमानदारी से करना है। जैसे मान लीजिए, आप (कुटिया में) घूम रहे थे, कैमरे पे आपको देख के कल मैंने वहीं से डांटा ना — तो मुझे थोड़ी मतलब कि आपको बुरा लगा; मैं अपना काम ईमानदारी से कर रहा हूं। (बाबा ने कहा कि मैं झाड़ू लगाने ही वाला था —) तो कितनी देर आप खड़े थे? क्या जरूरत थी? मैं बहुत देर से देख रहा हूं — वो बालक झाड़ू मार रहा है, तुम देख ही रहे हो। इसलिए अब देखो, मेरी ईमानदारी — मैं वहां से (रास्ते से) फोन किया कि वो बाबा वहां क्या कर रहा है, बोला स्पीकर ऑन कर, तो मैंने इनको बोला — क्या कर रहा है? उधर जा, या तो कुछ काम कर, या तो फिर जा आत्मिक चिंतन कर, ऐसे क्यों खड़ा है? तो मेरा कहना है कि मैंने अपना काम ही ईमानदारी से किया। अब आपको अच्छा लगे, बुरा लगे, उससे मुझे मतलब थोड़ी ना है; मैं अच्छे या बुरे के लिए काम नहीं कर रहा हूं। तो आप यहां रहो तो सजो (सुधरो), नहीं तो यहां का सिद्धांत है — नहीं तो भागो।
आप ये मत समझना कि मैं अंदर हूं तो आपको नहीं देख रहा हूं। मैं अभी दिल्ली जाने वाला हूं, अब तो विदेश, वहां से भी कैमरे में देखूंगा। यहां हर जगह कैमरा लगा है — आप इस आश्रम में जहां भी बैठोगे, कैमरे की नजर में हो, और साउंड के साथ भी — आप क्या बात करते हो, मैं वहां से सुनता हूं। तो मैं वहां से देखता रहता हूं, क्योंकि मुझे जीवन का महत्व समझ में आया है; अभी आपको समझ में नहीं आया। एक सेकंड की कीमत आप नहीं जानते हो, मैं समझ चुका हूं, इसलिए मैं आपका एक सेकंड बर्बाद नहीं होने देना चाहता था। अब बाबा वहां से हट के चले गए — क्या मुझे कुछ मिला? और वही शाम तक खड़े रहते तो मेरा क्या जाता? लेकिन इनका समय बर्बाद हो जाता। और ये मेरे सानिध्य में आए हैं, तो जिम्मेदारी मेरी है। लापरवाह है, तभी तो मेरे सानिध्य में आया सुधरने — तो (सुधारना) मेरा काम है। जब तक मेरी शरण में है, तब तक मेरी जिम्मेदारी बनती है इसकी देखरेख करना। ये अपनों की कुटिया से चला जाए, मुझे मतलब नहीं; लेकिन अपनों की कुटिया में रहेगा, तो कहां खाता है, कैसे उठता है, कैसे बैठता है, किससे बात कर रहा है, क्या कर रहा है, जिसके लिए आया वो काम कर रहा है कि नहीं — ये जांचने की जिम्मेदारी मेरी है, उसकी नहीं। तो मैं उसका एक पल भी बर्बाद नहीं होने दूंगा। तुम तो आ गए हो, तुम्हारी जिम्मेदारी खत्म। यहां जब तक आप रहोगे, जिम्मेदारी मेरी है; यहां जब तक रहोगे, हर क्षण आपका स्तर उठेगा। यहां मैं आपका एक भी क्षण (बर्बाद नहीं होने दूंगा), इसलिए कि मुझे जवाब देना है ना — मैं कोई काम कर रहा हूं तो मुझे जवाब देना है कि मेरा काम ईमानदारी से हो रहा है कि नहीं। (ऐसा नहीं कि) बस ऐसे ही बन गया, और मैं चला गया, या मैं अंदर बैठा हूं और आप बढ़िया से घूम रहे हो — ना ना, इसको मुझे होटल नहीं बनाना, ये साधना-स्थान है। ये जगह पे मैंने अपनी कुटिया का निर्माण किया है, यहां से आखिरी यात्रा होगी, ये आखिरी यात्रा के लिए बनाया है; यहां एक क्षण भी किसी का समय बर्बाद होने नहीं दूंगा। हम तो (नियम तोड़ने वाले को) रात को ही, तुरंत भगा देते हैं।
इसलिए कि सारा काम मैं खुद अपना करता हूं, मैं किसी पर निर्भर नहीं हूं। निर्भर आदमी चाहेगा ना कि यार मेरी सेवा करने के लिए कोई रुके। (महाराज जी,) आप मेरे साथ इतने दिन थे, कभी मैंने आपसे कोई सेवा ली क्या? मैं अपना काम खुद करना चाहता हूं, खुद करता हूं; मैं तो आपका भी कर दूं। मैं किसी पर निर्भर थोड़ी ना हूं कि मुझे सेवक चाहिए — मुझे तो जिज्ञासु चाहिए। क्योंकि मैं तो सेवा करते-करते खुद निकलना चाहता हूं, मेरा सेवा करवाने का कोई भाव ही नहीं है, और मैं अपाहिज भी नहीं हूं। तो मैं किसी का एक क्षण भी बर्बाद होते (नहीं देख सकता), इसलिए मेरी नजर हर समय यहां के जिज्ञासुओं पे ही रहती है — यहां तक कि मैं कैमरे का पूरा प्लेबैक देखता हूं। हम आपसे बात करें या ना करें, लेकिन नजर आप पे है। आप वहां राउंड मार रहे थे तो बाबूलाल को मैंने ही भेजा था कि देखो, क्यों राउंड मार रहे हो — आसन ले, बैठ। मैं जिम्मेदार व्यक्ति हूं जीवन में; आप मेरे पास आए हैं तो ऐसे थोड़ी ना आपको राउंड मारने दूंगा। आपका मुझे उपयोग थोड़ी करना है, आपको चेला बना के थोड़ी ना यहां झाड़ू मरवाना है — यहां तो कुछ ऐसा है नहीं भाई, अपना काम करो। यहां मैंने सिस्टम ही ऐसा रखा है कि आपको व्यक्तिगत सेवा में उलझाया ही नहीं जाएगा। यहां कोई रसोई का मालिक भी नहीं है; आप साथ में मिलजुलकर बना के खा सकते हो। यहां ऐसा नहीं है कि कोई पुराना है तो मालिक है — वो जरा सा एक आदमी से ऊंची आवाज में बात नहीं कर सकता, चाहे कोई भी हो, चाहे मैं ही क्यों ना रहूं; मैं जब भी बात करूंगा तो आपके हित के लिए बात करूंगा। यहां का मालिक सिर्फ सिस्टम है, बाबा, यहां कोई मालिक नहीं, चाहे कोई पुराना हो, चाहे नया। (बाबा ने पूछा कि क्या अच्छी रोटी बनाने वाला अपने लिए अलग बना सकता है —) नहीं, सब मिलके बनाओ, अलग अपने लिए नहीं। आपका भाव है तो सबको बना के खिलाओ, आराम से। यहां कोई मालिक नहीं, यहां का सिस्टम-नियम मालिक है। अगर ये (सेवादार) आपको कुछ बोलते हैं, तो उसके पीछे आवाज इनकी है, लेकिन शब्द मेरे हैं। यहां तो किसी का कुछ है ही नहीं — मेरा भी नहीं; जिसमें आपका आत्मिक कल्याण है, उसका है। यहां पूरा सिस्टम काम करता है। यहां अगर आप नियम में रह रहे हो तो कोई नाम तक नहीं पूछेगा।
फॉर्म भरना इसलिए अभी चालू किया, क्योंकि कुछ लोग घर से छुप के आए थे। तो फॉर्म इसलिए भरवा लेते हैं कि उसमें भी आपकी सुरक्षा है — कम से कम उनके घर पे फोन करके बातचीत कर ली जाए कि भाग के तो नहीं आए हैं। अभी उस दिन दो लड़के भाग के आए थे, तो दोनों को तुरंत भगाए। अब आप अगर भाग के आओगे तो आपके परिवार वाले कितने परेशान होंगे। और बाद में उसमें पढ़ा जाता है कि ये व्यक्ति किसलिए आया था, आध्यात्मिक है कि नहीं — लिखोगे तो पता चलेगा ना। हमारे पास और काम क्या है आप लोगों के अलावा? मेरा काम है — आप लोगों का कल्याण कैसे हो जाए, उसके लिए काम करना। समय रहता है तो उसको पढ़वाते हैं कि ये आते वक्त क्या लिखा, जाते वक्त क्या लिखा, और क्या सच में जितना लिख रहा है, उसमें जिया है? क्या उसके भाव हैं, या बस ऐसे ही कुछ भी लिख दिया? तो जितना भी किया जा रहा है, आप लोगों के लिए किया जा रहा है — आप लोग इसका लाभ लो।
परमात्मा से आत्मा है। तो अलग-अलग तब है — देखिए, जैसे मान लीजिए एक अंगूठी बनी है, एक चेन। अब वो अलग-अलग हैं, क्योंकि एक अंगूठी है, एक चेन है, और दोनों में सोना है, धातु है। लेकिन दोनों को पिघला दिया जाए, तब जैसे ही रूप का नाश हुआ, तत्व में आएंगे, तो आप कहोगे ये भी सोना है, ये भी सोना है — एक जैसा है; भार में कम-ज्यादा हो सकता है, लेकिन है एक जैसा। तो वैसे ही परमात्मा से आत्मा है। अब सागर में से या नदी में से एक बूंद निकालें, तो निकलने वाला जरूर कम होगा। तो हम परमात्मा से हैं; कहीं ना कहीं हमें पूर्णता के लिए परमात्मा की जरूरत है। अब वहां जाने के बाद देख लेना कि तुम दोनों एक ही जैसे हो कि नहीं। पहले यात्रा तो करो।
वहां उपलब्धि नहीं हुई — मेरा थकना वहां हो गया। वहां से तो मैं रो के निकला, थक-हार के; वहां से निकला, हाईवे पे आके रोने लगा कि अब कहां जाऊं। मतलब मेरी खोज वहां पूरी नहीं हुई, वहां से मैं थक गया। एक बात बताओ — खोज कहां पूरी होगी? इस पिंड में एक ही जगह आपको आत्मज्ञान होगा, जिस दिन आप इस जगह पे आ जाओगे। जब बाहर से आप मुक्त हो जाओगे, तभी आप इस पिंड में आ पाओगे, और इस पिंड में ही आत्मज्ञान होगा। (क्या वह स्थान उस पल का साक्षी है —) नहीं, नहीं है। जगह इसके लिए है ही नहीं; इसके लिए कहीं फिक्स जगह नहीं है कि कहा जाए फलाना जगह फिक्स है। फिक्स आपके अंदर एक ही जगह है — बस यहां। बस बाहर से तुम थक जाओ; बाहर कहीं स्थान फिक्स नहीं, फिक्स यहां है। अब बाहर से छूटने के लिए कुछ करना पड़ेगा — तो अपने आप को थका दो।
दुनिया बाहर खोज रही है, लेकिन आदत पड़ी है ना, क्या करोगे — उसकी भी गलती नहीं है, बताया गया है कि बाहर है, तो वो क्या करे। सबसे बड़ी गलती तो यही है। अब तो हो गई — गलती से तो हम पैदा हो गए हैं। सामने वाले की पैदा करने की इच्छा थोड़ी ना थी; हम तो हो गए। मैं अपने माता-पिता का नौवां लड़का — दो मर गए — तो हमारी कोई मन्नत थोड़ी ना थी, कोई घंटी थोड़ी ना बजाई कि मंदिर में दे दो। तो बाबा, गलती से हम लोग आ गए हैं। अब एक काम करो — गलती से अपना कल्याण कर लो, एक गलती और कर लो। हमने तो वो गलती कर ली, अपना कल्याण कर लिया। जितना मां-बाप ने सिखाया, मैंने वो नहीं किया — खा-कमा के (जीने) के लिए तो हम पैदा ही नहीं हुए हैं। तो एक गलती और कर लो। देखो ना, दूसरे के बच्चों को कहते हैं कि आपने अपनी सात पीढ़ी तार दी, और खुद का निकलता है तो कहते हैं भूत चढ़ा है। तो ये आप आए हो ना, तो एक गलती है आपके परिवार के लिए — लेकिन यह गलती करो। मैं कहता हूं, यह गलती कर लो। मैं गलती करके यहां आया। अगर मैं अपने परिवार का मानता, तो बंगला बनाता, गाड़ी ले के घूमता, दो-चार पैदा कर देता। आपका परिवार थोड़ी चाहेगा कि ये गलती करो — लेकिन आप ये गलती करो।
हां, ये बोल सकते हैं कि मेरा जीवन यहां से बदला है, और अगर आपको समझ में आए तो जाना — मेरा तो बदला है, लेकिन आपको समझ में आए तो जाना। हो सकता है उनको भाषा समझ में नहीं आ रही हो। जबरदस्ती मत ले आइए, नहीं तो फिर रातों-रात वो भागेंगे — उनकी इच्छा रह गई। खुद समझ के आओ। अगर आदमी खुद की समझ लेके आएगा तो उसका कल्याण होगा; लेकिन आपकी समझ से अगर वह आया, फिर उसको यहां घुटन होगी, क्योंकि इतने एकांत में कौन रहेगा? एक शब्द भी (बोल नहीं) पाएगा, यहां तक कि एक-दूसरे को देख के मुस्कुरा भी नहीं सकते, मोबाइल अलाउड नहीं है।
मैं कह रहा हूं, अगर भ्रम भी है — रस्सी देख के सर्प का भय हुआ — तो मतलब सर्प भी तो कहीं मौजूद है हमारे दिमाग में। भ्रम ही सही, भ्रम का भी तो आधार-बेस है; ऐसे थोड़ी भ्रम हो गया है। तो भ्रम टूटेगा तभी कुछ क्लियर होगा। जैसे भ्रम हुआ है, वैसे भ्रम टूटना भी चाहिए, क्योंकि भ्रम हो चुका है। जैसे मान लीजिए, आपने विवाह किया, अब आपने एक-दूसरे को स्त्री-पुरुष (पति-पत्नी) मान लिया। तब जिस रीति-रिवाज से विवाह किया है, उसी रीति-रिवाज से जब छूटेगा, तब होगा कि भाई अब मेरी पत्नी नहीं, मेरा पति नहीं। लेकिन वो रीति-रिवाज नहीं अपनाओगे, और तुम दोनों एक जगह से दूसरी जगह चले जाओ, 100 साल बाद भी बुढ़ापे में मिलना हो गया तो कहोगे यार ये तो मेरी पत्नी है, मेरा पति। और अगर आपने जिस तरीके से विवाह किया था, उस तरीके से छोड़ दिया, और 100 साल बाद मिले, तो कहोगे कि 100 साल पहले हम पति-पत्नी थे, लेकिन अब नहीं। तो जैसे आप फंसे हो, वैसे निकलोगे। जैसे भ्रम पैदा हुआ है, वैसे भ्रम टूटना भी चाहिए। भ्रम का भी आधार है, बेस है। सिर्फ इतना कह देने से कि नहीं, तुम्हें भ्रम हुआ है, छोड़ दो — अरे, भ्रम हो गया है।
नहीं, भ्रमण किस भाव में कर रहे हो (वो देखना है); और 'कुछ नहीं चाहिए' में आओगे, तब जाके उपलब्धि होगी। अब जैसे इन्होंने रमण महर्षि की बात की — रमण महर्षि ने कहा कि सब भ्रम है; लेकिन रमण महर्षि जब अपनी उपलब्धि के लिए बैठे, तो बताते हैं कि उनके पैर को चूहे (कुतर गए) — वो इतना बोले उपलब्धि के बाद; उपलब्धि के पहले मेहनत तो उनकी देखो। पहुंचने के बाद लोग कह रहे हैं जगत मिथ्या है — अरे भैया, अपने को तो सत्य लग रहा है। कहने से कोई राजा बन जाएगा क्या? कहने-सुनने से कुछ नहीं होता; उसके पीछे उनकी मेहनत देखो, काम देखो। अगर रमण महर्षि ने कहा कि ये भ्रम है, तो देखो कि उस भ्रम को तोड़ने के लिए उन्होंने क्या किया है, और उन्होंने क्या करना बताया है, क्या नई खोज लेके आए आपके लिए, कि सरल तरीके से आप समझ पाओ।
जैसे संत ज्ञानेश्वर जी ने ज्ञानेश्वरी (गीता का अनुवाद) किया — क्यों किया? क्या गीता नहीं थी? थी, लेकिन वो गीता लोग आने वाले समय में समझ नहीं पाते। तुलसीदास ने रामचरितमानस लिखा — क्यों? क्योंकि संस्कृत लोग नहीं पढ़ पाएंगे, समझ नहीं पाएंगे। तो महापुरुष क्या करते हैं? जैसे-जैसे समय आता है, आपके लिए और सरल, आसान तरीका निकाल देते हैं। अब इंजीनियर क्या करता है? एक कठिन रास्ता था, उसने पढ़ाई करके, इंजीनियरिंग करके एक सरल रास्ता बना दिया। पहले भी आप आ-जा रहे थे, लेकिन बहुत जटिलता, बहुत कम लोग उस रास्ते से आ-जा पा रहे थे; अब उसने इतना सरल कर दिया कि कोई भी आए-जाए। तो ऐसे महापुरुष आते हैं और सरल मार्ग ले आते हैं, ताकि तुम बहुत सरलता से पहुंच जाओ।
बस उठा, शौचालय गया, नहा-धो, और जा के बैठ। फिर काढ़ा पियो, और फिर 12 बजे के बाद नाश्ता, और फिर शाम को मिलजुलकर भोजन बना, खा के सो जाओ। यही है।
(सत्कर्म —) अगर कुछ मिल जाए तो कर दो — (जैसे) पेड़ लगे हैं, जाके उनकी निराई करो, लेकिन ये आप खुद करो ना, आप खुद जाके करो। और हम बोलेंगे तो जिसे उचित समझेंगे, उसे बोलेंगे। आप जिसके लिए आए, वह करो; और अगर आपको लग रहा है कि हां, मेरी जरूरत है, तो आप जाके करो — ये सत्कर्म है, और यहां है ही है। (कोई 4 बजे उठ के करता है तो) आप 3 बजे उठो — जिसको करना होगा, (करेगा)। अब आपने 3 बजे चालू कर दिया तो वो आके छीन थोड़ी ना सकता है; और वो चालू कर चुका, तो आप हाथ से थोड़ी ना ले सकते हो। और अगर उसने (काम आपको) दे दिया, तो इसका मतलब वो बस फॉर्मेलिटी कर रहा था, कर नहीं रहा था। जैसे मैं शुरुआत में — लोग (झाड़ू-)पानी ना मारें, तो मैं उठ के पानी मारने लगूं, तो लोग आए, बोले — अरे, आप मार रहे थे? तो (मैं बोला) जब 8–9 बज गए, कोई मारता ही नहीं, तो हम मारेंगे। फिर बोले — नहीं, दे दो। (मैं बोला) अब नहीं देना है, अब मैं ही मारूंगा।
तो कहने का मतलब, सत्कर्म तो बहुत है यहां। आप दुनिया में कहीं भी रहो, आपको सत्कर्म मिलेगा। आप रोड पे जा रहे हो, कोई गिर जाए — तो उस समय प्रशासन, कानून आएगा उठाने? उस समय वहां मौजूद व्यक्ति ही उठाएगा, उसका परिवार भी नहीं है। सत्कर्म कोई छीन ही नहीं सकता; सत्कर्म आप दुनिया के किसी कोने में कर सकते हो। अब अगर बाहर हो तो कम मिलेगा; अगर किसी आश्रम में हो, जीवंत गुरु की शरण में हो, वहां बहुत मिलता है। अगर उस दरवाजे पर कोई आ गया — आप तो उसे जानते नहीं — आपने उसे पानी पिलाया। यहां तो सत्कर्म ही सत्कर्म है दिन-रात — हां, आपको देखना आना चाहिए। अब पौधे में पानी देना सत्कर्म — ये पौधे का उपयोग पता नहीं कौन करेगा। बड़ का, बरगद का, पीपल का पेड़ — हजारों साल चलने वाले पौधे हैं। कितने लोग तपोभूमि पर आकर तपस्या करेंगे, कितने जीव-आत्माओं का कल्याण होगा, यहां बैठ के आश्रय लेंगे, कितने लाखों जीव बड़ के पेड़ पे भोजन करेंगे। अब जिन लोगों ने इसमें सहयोग दिया है — धन से, तन से, और अपनी समझ से — उनको जब तक ये वृक्ष रहेगा, तब तक आशीर्वाद मिलेगा। भाई, जब तक बैंक में मूल पैसा रहता है, तब तक ब्याज मिलता रहता है ना, लेकिन जब मूल खत्म तो आना खत्म; तो जब तक पेड़ रहेगा, तभी तक मिलेगा। यहां 200 के ऊपर सारे पेड़ हैं। (साधक ने कहा बाउंड्री के बाहर भी कुछ पेड़ लगे हैं, उनमें पानी दे दूं —) वही तो कह रहा हूं — दे सकते हो ना। बाहर क्यों नहीं? कहने का मतलब यही है कि सत्कर्म का मौका खूब है, अगर आप करना चाहो। अब नहीं करना चाह रहे हो, तो फिर कोई मतलब ही नहीं है। जीवंत गुरु की शरण में तो सत्कर्म ही सत्कर्म है, खूब है, क्योंकि वो तो 24 घंटे काम ही करता है — शारीरिक, मानसिक — क्योंकि वो पूरे विश्व के लिए काम कर रहा है, कोई समूह के लिए थोड़ी ना। इसीलिए तो कहा गया कि जीवंत गुरु की शरण में रहो, तर जाओगे — क्योंकि रहोगे तो करोगे; ऐसे तो रखेगा ही नहीं वो। तो उसकी शरण में रहने से ही व्यक्ति तर जाता है, (अलग से) करना कुछ नहीं पड़ता।
अब सूअर का दूध क्यों नहीं पीते — तो सूअर नहीं मारे जाते? सही होगा? (दूध) पीने से हत्या कम होगी या नहीं पीने से हत्या कम होगी? क्योंकि पैदावार तो होगी ना। पीने वाला कम से कम अपने दरवाजे पर बांध के उसका भरण-पोषण कर रहा है। अब कोई नहीं पिएगा तब तो (सब) काटे जाएंगे। अब सूअर का दूध कौन पीता है, बताओ — सूअर काटे जाते हैं कि नहीं काटे जाते समाज में? बकरी का दूध इतना तो नहीं पिया जाता — तो क्या बकरी की पैदावार बंद हो गई? फालतू चीजों में मत पड़ो, भैया।
इस पिंड के अंदर हम हैं; पिंड मेरे अंदर नहीं। लेकिन हम उसमें समा गए हैं, वह मुझ में समा गया है। जैसे दूध में पानी डाल दिया, तो क्या दूध के अंदर पानी है कि पानी के अंदर दूध? मिलने के बाद दोनों एक-दूसरे में समा गए, अब अलग नहीं हैं। तो हम इसमें समाने के बाद — कितने लोग तो अपने आप को शरीर ही मानते हैं, जैसे पानी (दूध में) गया तो पानी भी तो दूध ही बोला जा रहा है। तो कितने लोग अपने को शरीर मान के ही जीते हैं। बहुत कम लोग परमहंस होते हैं, जो अपने आप को शरीर से अलग कर पाते हैं; उन्हीं को परमहंस की उपाधि दी गई है। जैसे हंस को बोला जाता है कि हंस दूध-पानी को अलग कर देता है, इसलिए उसे हंस कहा गया है; वैसे ही परमहंस की उपाधि आत्मज्ञानी को दी गई है, कि वो अपने आप को शरीर से अलग (कर लेता है)।
देखो, ऐसा है — पहले उम्मीद को समझिए। एक होता है कि मुझे मिल जाए, एक होता है कि उसे मिल जाए। तो हमारी उम्मीदें ऐसी भी रहती हैं कि ये सुखी हो जाए, ये सुखी हो जाए, इनका ठीक हो जाए, इनका अच्छा हो जाए, ये बड़े दुखी हैं, ये बड़े निराश हैं — ये भी एक उम्मीद है। एक व्यक्ति दे रहा है, एक व्यक्ति ले रहा है, लेकिन है तो (उम्मीद ही)। हमें पूरी तरह कर्म के सिद्धांत को समझना होगा। हम प्रकृति के बदलाव को पूरी तरह स्वीकार नहीं करते; कहीं ना कहीं हम दोष देखते हैं, ज्यादातर हम इसी में उलझे रहते हैं। तो कहीं ना कहीं हमारा अटैचमेंट है कि इसकी लाइफ सही हो जाए, या मुझे किसी में दोष दिख रहा है — कई लोगों में, कई समूह में, कई संप्रदाय में। फिर मुझे पता है कि मेरे बहुत बंधन हैं, फिर भी मैं कह रहा हूं तुरंत हो जाए, और मुझे पता है नहीं होगा, क्योंकि हम सारे बंधनों को छुड़ाएंगे, तभी होगा। जैसे उस व्यक्ति ने प्रश्न तो मुझसे कर दिया कि तुरंत हो जाए, लेकिन हमने कहा उम्मीद छोड़ दो, तो क्या छोड़ पाया? एक दिन तो बीत गया।
तो मैं यह कहना चाहता हूं कि आपको उम्मीदें छोड़नी हैं, आसक्ति छोड़नी है — बड़ा-बड़ा तो दिखेगा, लेकिन सूक्ष्म नहीं दिखता। जैसे आनंद को सब तो दिख गया कि हम तो सब छोड़ दिए, लेकिन तब बुद्ध ने कहा — तुम मेरे शरीर में फंस गए हो। यह आनंद नहीं देख पा रहे थे। आनंद का सब छूट गया था, हर जगह, लेकिन बुद्ध के शरीर में लिप्त हो गए थे, आसक्ति हो गई थी; तो जब बुद्ध का शरीर गया, तब जाके उन्हें उपलब्धि हुई। तो वैसे ही कहीं ना कहीं हम लिप्त हैं, कहीं ना कहीं हम आसक्ति में फंसे हुए हैं, और इसे हमें बहुत समझदारी से (छोड़ना) पड़ेगा।
हमें पता है हम तुरंत के लायक हैं ही नहीं — क्या ये बात हमें नहीं पता है? (तुरंत वाला — वाल्मीकि की तरह बैठ जाओ —) जब पता है तो किसी से पूछने की भी जरूरत नहीं है। जब हमें ये बात पता है कि वाल्मीकि की तरह बैठ जाओ, तो हम किसी से पूछ क्यों रहे हैं? पूछ रहे हैं, इसका मतलब बैठना-वैठना नहीं है। जैसे उस बालक को हमने बता दिया उम्मीद छोड़ दो — क्या छोड़ दिया उसने उम्मीद? पूछ तो लिया तुरंत का मार्ग बताओ — क्या वो कर पाया? हमें खुद पता है कि तुरंत के लायक हम नहीं हैं। बस हमें पूछना है, तो हमारी जितनी क्षमता हो, जितना मैं कर सकूं — काश मैं उतना पूछता। जैसे एक व्यक्ति गया व्यापार करने, पैसा कमाना है, वो बस व्यापार का पता लगा रहा है कि कौन सा व्यापार करके मैं करोड़पति-अरबपति बन जाऊं। अब एक व्यापार तो है नहीं; अगर एक आदमी व्यापार ही पता करता रहे तो व्यापार पता करने में जिंदगी चली जाएगी, काम नहीं कर पाएगा। काश, वो अपनी स्थिति अनुसार व्यापार ही शुरू कर देता, सामने वाले से जाके कहता कि हमारी क्षमता के अनुसार आप मुझे मार्ग बताओ। तो सामने वाला अगर योग्य है तो फिर आपकी क्षमता (के अनुसार बताएगा)। बहुत लोग ऐसे आवेश में आकर जीभ काट लिए, कोई हाथ काट लिया — लेकिन हुआ क्या? ऐसे थोड़ी ना होता है। तुरंत (के) लायक स्थिति तो होनी चाहिए।
वाल्मीकि के सामने गुरु ने उन्हें बोध कराया कि तुम्हारा कोई नहीं है — उनकी योग्यता के अनुसार उन्हें बोध कराया। वो गुरु को बांधते हैं, परिवार के पास जाते हैं — पत्नी से पूछते हैं, बाप से, बच्चों से, मां से पूछते हैं — तब जाके वहां से उनका भ्रम टूटता है, तब जाके आके समर्पण करते हैं, तब जाके बैठ पाते हैं। ऐसे अगर कोई बैठ जाए तो (वो) संकल्प ले के बैठा, वो (खुद) जिम्मेदार है। क्योंकि वहां तो गुरु ने बोला था — जा, ये नाम लेके बैठ जा — तो गुरु जिम्मेदार होगा। तो गुरु आपकी स्थिति के अनुसार बताएगा; गुरु को बताने दो ना। आप बोलो ना कि मेरी स्थिति के अनुसार बताओ मुझे; क्योंकि वहां फिर अगर गुरु ने कह दिया 'जा बैठ', आदेश दे दिया, फिर गुरु जिम्मेदार हो जाएगा। लेकिन आप जबरदस्ती कह रहे हो — नहीं, मुझे तुरंत का बताओ — और तुरंत लायक तुम हो नहीं। अब ये बालक ने पूछ लिया, क्या कर लिया एक दिन में? समय बर्बाद होता है ना। ये मेरा समय (कितना कीमती है), आपको अभी नहीं समझ में आ रहा, क्योंकि आप प्रबल जिज्ञासु नहीं हो, आपको बस कुछ पूछना है, जितने दिन यहां रहना है। काश, अपनी स्थिति के अनुसार प्रश्न करते — वो ज्यादा आपको ऊपर लेके जाता। जेब में ₹100 है और करोड़ों की बात — मुझे करोड़ों का व्यापार बताओ! अरे बोलो भाई, जेब में ₹100 है। हमें अपनी क्षमता खूब पता है। वाल्मीकि ने थोड़ी ना कहा कि मुझे तुरंत बताओ, मैं तुरंत उपलब्ध होऊंगा। वो तो गुरु ने उसकी स्थिति देख के, जब देखा कि उसकी परिवार से आसक्ति तुरंत हट गई, तब कहा — जाओ, ये लेके बैठ जाओ, अब तुम्हारा कल्याण (होगा)। तो जिद में आके, बातों में आके 'तुरंत का मार्ग बताओ, तुरंत का मार्ग बताओ' — आदत हो गई है। हमें कभी भी अपनी स्थिति के अनुसार ही बात करनी चाहिए, और हर व्यक्ति को अपनी स्थिति का पता है। जब आप अपनी स्थिति के अनुसार चलोगे, तो आप लक्ष्य तक पहुंच ही जाओगे।
जब नहीं पता है, तो आप जहां गए हो, उसको बोलो कि मेरी स्थिति से (मुझे) मार्ग बताओ — तो वो बताएगा। अगर आपको नहीं पता है, तो जिसके पास गए हो, उससे पूछो कि मेरी स्थिति के अनुसार मुझे मार्ग बताओ। दो रास्ते होते हैं — या तो आप अपनी स्थिति समझ कर पूछो, या तो (सामने वाले पर छोड़ दो)। जब सामने वाले पर छोड़ ही दिया, फिर प्रश्न नहीं खड़ा होना चाहिए — फिर आपकी स्थिति के अनुसार जैसा बताए, अपने आत्मिक कल्याण के लिए (करो)। प्रश्न खड़ा हुआ, इसका मतलब आपको फिर स्थिति का पता है, तो फिर उससे मत पूछो, आप अपनी स्थिति के अनुसार प्रश्न करो। स्थिति के अनुसार हमें चलना है।
(अपनी स्थिति नहीं पता —) तो अब हम जिसके पास चले गए, पहले उसे समझ लो। जितनी आपके पास समझने की क्षमता है, अपनी ताकत लगा दो, और समझने के बाद बोलो — भाई, अब आप जैसा कहें, वैसा हम करें। अब वो जैसा कहे, करते चले जाओ; फिर वो (उसकी) जिम्मेदारी है। फिर आप उससे प्रश्न मत करना कि अभी कुछ नहीं हुआ — आपकी स्थिति अनुसार बताया है, आप करते रहो, चाहे एक साल लगे, चाहे 20 साल लगे। प्रश्न नहीं खड़ा होना चाहिए। (अगर बाद में डाउट हो —) मैंने क्या कहा? पूरी तरह जांच लो। डाउट में तो कल्याण हो ही नहीं सकता। मैं इसीलिए तो कहता हूं — खूब अच्छे तरीके से जांच लो, किसी को भी। जांचने के बाद वो जैसा कह रहा है, वैसे कर लो। बस डाउट नहीं होना चाहिए, संशय नहीं होना चाहिए।
(बीच में शरीर को कुछ हो जाए तो —) अगर आपने पूरी तरह जांचने के बाद पूरी तरह उस पे छोड़ दिया, और उसके मार्गदर्शन अनुसार जो भी कह रहा है, वो आप करते रहो, तो वो जिम्मेदार होगा। लेकिन अच्छे तरीके से जांच लो — जांचने में जरा सी भी कमी-कसर मत छोड़ना, हर तरीके से उसे जांच लो।
यहां तक है कि अगर गुरु पूरी तरह योग्य है — मैं एक गुरु-स्थिति की बात कर रहा हूं, क्योंकि हमें पूरी तरह जांचने के बाद, गुरु योग्य है, तभी उसके प्रति पूरी तरह समर्पण कर देना चाहिए; और जब हम समझ जाएंगे तो समर्पण हो जाएगा, करना भी नहीं पड़ेगा — तो अगर गुरु योग्य है और किसी साधक का, किसी शिष्य का शरीर छूट जाता है, तो गुरु में इतनी क्षमता है कि वो अगला शरीर उसके लिए लेगा; उसे ऐसे नहीं छोड़ेगा, उसको तार के ही रहेगा, चाहे उसे जितने जन्म लेने पड़ें, कितनी बार उसे आना पड़े। लेकिन मैंने कहा ना — डाउट, संशय एकदम नहीं। ज्यादातर हम बहुत चालाक हैं। अब (एक साधक) सामने ही हैं — इतना इनका समर्पण था, लेकिन कहीं ना कहीं डाउट था, और एक व्यक्ति के द्वारा पैदा हो गया। निमित्त वो बना, लेकिन डाउट इनके ही अंदर था; ऐसा नहीं कि उसने डाउट पैदा किया। ऐसे ही हमारे अंदर संशय रहता है, डाउट रहता है; समय आने पे पता चलता है, परिस्थितियां पैदा कर देती हैं कि देखो, डाउट था। अगर गुरु पूरी तरह योग्य है, आपने उसे पूरी तरह समझ लिया, और डाउट एकदम नहीं, संशय एकदम नहीं, आप उसके बताए हुए मार्ग पे पूरी तरह चल रहे हो — तो अगर आपका शरीर छूट भी गया, तो वो पक्का आपके लिए शरीर लेके आएगा; जहां भी आप रहोगे, वो आपका कल्याण करेगा ही करेगा, वो भी आपको नहीं छोड़ेगा।
जैसे कोई मानव है, प्रशासन से, कानून से कोई मतलब नहीं है; लेकिन अगर उसने कोई अपराध कर दिया, तो प्रशासन पूरा (उसके पीछे) रहता है — पोस्ट बदलती रहती है, लेकिन कहीं भी हो, उसे लाओ, कैसे भी करके, पूरा कानून उसके पीछे लग जाता है। वैसे ही आपके पास डाउट नहीं है, संशय नहीं है, गुरु-पद पे वो है, तो अगर आपका शरीर छूटता है तो वो फिर आपके लिए आएगा; वो आपको बिना तारे छोड़ेगा ही नहीं। ये रामकृष्ण परमहंस की भी वाणी है — उन्होंने कहा कि जैसे शेर के जबड़े में मांस आ जाए तो वो छोड़ता नहीं, वैसे गुरु के हाथ में अगर एक बार तुम आ गए, तो वो तुम्हें छोड़ेगा नहीं — अगर तुम शिष्य हो तो।
शिष्य तब है जब आपको अपने आत्मिक कल्याण के अलावा कुछ भी नहीं चाहिए; और अगर आपको कुछ और चाहिए, तो आप शिष्य नहीं। जैसे अब ये (बालक) — मैं आत्मिक कल्याण करके (लौटूंगा) — जहां आत्मिक कल्याण होगा, वो बताएगा ना कहां जाना है? ये तो तय करके आए हैं कि आत्मिक कल्याण करके (वापस जाना है)। तो इतनी अच्छी जगह थी, छोड़ा क्यों? जहां से आत्मिक कल्याण होगा, आत्म कल्याण के बाद पता चलेगा ना कि आगे कहां जाना है। तुमने तो अभी तय कर लिया। अब ये कल्याण कैसे होगा? क्योंकि ये बांध के ही तो आए हैं अपने आप को कि मैं आत्मिक कल्याण के बाद वहीं जाऊंगा — और ये कहीं ना कहीं आसक्ति भी (है, जो) दिखती नहीं। आत्मिक कल्याण के बाद तो तुम आगे जाओगे, लेकिन तुम कह के आए हो कि आत्मिक कल्याण के बाद आऊंगा, तो इसका मतलब तुमने उस जगह को छोड़ा ही नहीं है। आपको यह बोलना पड़ेगा — अब हम जा रहे हैं अपने आत्मिक कल्याण के लिए, और आत्मिक कल्याण के बाद क्या होगा, मुझे भी नहीं पता — तब जाके आत्मिक कल्याण होगा। आप तो पूरी प्लानिंग से आए हो कि हमारा आत्मिक कल्याण होते ही मैं आ रहा हूं — तो तुम आए ही कहां? आत्मिक कल्याण के बाद आगे जाओगे कि पीछे जाओगे? लेकिन आप पीछे जाने के लिए बोल के ही आए हो। शब्द ही तो बंधन है — आप क्या बोलते हो, आपका कमिटमेंट क्या है, क्या वादा करते हो, वहीं आपको जाना पड़ेगा। (साधिका ने माना कि सूक्ष्म रूप में वो विचार उसमें भी है —) आपने उस स्थान को छोड़ा कहां? आत्मिक कल्याण के बाद क्या होगा, हमें पता है? हम कैसे वादा कर दिए? (अब) रोज-रोज देखेंगे — भाई, हो रहा है कि नहीं, (हो जाए तो) मैं जाऊं। और जैसे-जैसे दिन बीतेगा, वैसे-वैसे एक व्याकुलता और बढ़ेगी कि यार, जल्दी हो, मैं जाऊंगा — क्योंकि आप बोल के आए हो, और वो भी इंतजार कर रहे हैं; कहीं ना कहीं उनको भी होल्ड कर रखा है। यही आसक्ति है, यही उम्मीद है। इसलिए शब्दों को बहुत सोच-समझ के, सूझबूझ के साथ बोलना चाहिए — कि यह शब्द बंधन है कि मुक्ति? हम किसी से बात कर रहे हैं, तो यह शब्द इस व्यक्ति को बंधन दे रहा है कि मुक्ति? ऐसा तो नहीं हम इसे कुछ वादा कर रहे हैं?
(बालक ने कहा — मैंने बोला है कि जब तक नहीं होगा, नहीं आऊंगा; होगा तो वहीं चला जाऊंगा —) फिर मैं वही हो जाऊंगा ना। मैं इस जगह को छोड़ के यहां आया, मुझे कुछ मिल गया, और इसी जगह पर (मैं) खो गया था; तो जब मैं यहां से वहां जाऊंगा, तो फिर मैं वही आ जाऊंगा ना। और अब पता चला कि जिनसे आप वादा करके आए हो, वो कहीं निपट लिए, तो फिर उनसे भी मिलना है, क्योंकि वो तो आपका इंतजार ही कर रहे थे — अब उनके लिए आपको जन्म लेना पड़ेगा। (बालक ने कहा मैंने बोला इंतजार मत करना —) नहीं, ये आपकी व्यक्तिगत बात नहीं हो रही है। यहां लाइव लोग सुन रहे हैं — हम कैसे फंस जाते हैं, मैं वो बता रहा हूं; अगर ऐसे फंसे, तो फिर कैसे मुक्त होंगे। भाई, जितने लोग मेरे हैं, आप उन्हें ये कह दीजिए — अगर आपकी जिम्मेदारी, दायित्व है, तब तो वहीं रह के कल्याण करो; और अगर आपने ऐसा कुछ (दायित्व) लिया नहीं है, तो आप ये कह दो कि अब हम जा रहे हैं अपने आत्मिक कल्याण के लिए, क्या होगा मुझे पता नहीं; ये मेरा आखिरी मिलना है मेरी तरफ से। बोलना पड़ेगा बेटा, बोलना ही पड़ेगा, नहीं तो वो तो इंतजार कर रहे हैं, कहीं ना कहीं मानसिक (बंधन है); फिर जाना पड़ेगा।
तो मैं आपको बता रहा हूं कि अपनी क्षमता के अनुसार आप प्रश्न करिए, अपनी क्षमता के अनुसार मार्ग पूछिए; और अगर आपको अपनी क्षमता नहीं पता है, तो सामने वाले को जांच कर, भैया, सौंप दो कि अब आप ही देखो — पूरी निष्ठा से, (कि) पूरी तरह मैंने आपको समझ लिया। आप उसके साथ एक दिन क्या, कई साल रहो; एक-दो दिन में फैसला मत ले लो। लेकिन जब छोड़ दो ना, तो छोड़ दो। द्रौपदी ने शुरू में भगवान को नहीं बुलाया — पहले सबका इंतजार किया, और आखिरी में बोल दिया कि अब तुम्हारी ही बारी है, तुम्हारा ही वादा था, अब तुम आखिरी हो। अगर शुरू में ही बुला लेती तो सबकी औकात पता नहीं चलती। तो मैं ये कहना चाहता हूं कि जिसको आप कहने वाले हो कि सब कुछ आपके हाथ में, तो ये तुरंत आवेश में, जज्बात में आके पहले दिन मत कह दो। उसके साथ एक महीना, एक साल, दो साल आराम से रहो, खूब समझ लो। लेकिन जिस दिन आप पूरी तरह छोड़ो, (उस दिन पूरी तरह छोड़ो)। और देखो, छोड़ने के बाद वो भी स्वीकार करता है कि नहीं। तुमने जांच कर उसे कहा कि अब आपके हाथ में — अब वो भी जांचेगा ना, अब उसकी परीक्षा चालू होगी। जब आप ये कह दोगे कि आपके हाथ में, आप जैसा कहोगे वैसा मैं करूंगा — तो अब वहां से तुम्हारी परीक्षा गई, उसकी (गुरु की) परीक्षा शुरू हो गई। अब पता नहीं वो कितने साल में आपको स्वीकार करेगा — ये भी पता नहीं। लेकिन जब वो स्वीकार करेगा, तो कल्याण उसी क्षण पक्का हो गया; अब तुम्हारी जिम्मेदारी खत्म हो गई, अब उसकी जिम्मेदारी हो गई, अब वो तुम्हारा कल्याण करके ही तुम्हें छोड़ेगा। लेकिन (गुरु के) स्वीकार करने के बाद — तुम्हारे सिर्फ स्वीकार करने से कुछ नहीं होगा।
(लंबे समय तक अगर जिज्ञासु है, तो देख लो कि सिस्टम क्या है, मेरी तासीर के अनुसार है कि नहीं — अब भक्ति मार्ग वाला आया तो उसको तो कुछ सेट नहीं बैठेगा।) पहले गुरु लोग अपने पास कोई भी आत्मिक कल्याण के लिए आता था तो 12-12 साल रखते थे — कहते थे 12 साल तक तुम्हें हम जांचेंगे, तब बोलेंगे तुम्हारा कल्याण होगा कि नहीं। तो 12 साल के बाद परीक्षा लेते थे। जैसे दो शिष्य थे, 12 साल बीते तो (गुरु ने) कहा कि जाओ, वहां से होके आओ, और रास्ते में गुरु ने कांटा बिछा दिया था। तो एक शिष्य (कांटा) लांघ गया, और एक शिष्य ने कांटा हटाया और आगे बढ़ा। दोनों वापस आए, तो जिसने कांटा हटाया था, उससे कहा — तुम अब शिष्य के लायक हो गए; और (दूसरे से) बोले — तुम 12 साल और सधो, अभी तो शिष्य के लायक नहीं हुए — शॉर्टकट मारा कि मेरे लिए हो जाए, बस, (बाकी) छोड़ो।
तो कहने का मतलब — आप ये मत समझना कि आप ही जांचोगे। आपको स्वीकार करने के लिए गुरु भी जांचेगा। इसलिए कि अगर एक शिष्य को आप स्वीकार करते हैं और उसका कल्याण करने की क्षमता आप में नहीं होती, तो 100 गौ-हत्या का पाप लगता है — क्योंकि शिष्य को तो पता नहीं है ना, शिष्य तो अबोध है। अगर आपने शिष्य रूप में उसे स्वीकार कर लिया और आप में कल्याण की क्षमता नहीं थी, तो 100 गौ-हत्या का पाप गुरु को लगेगा, शिष्य को नहीं। इसलिए गुरु पहले बहुत जांचता है, पूरी तरह, इसके बाद शिष्य के रूप में स्वीकार करता है; और गुरु ने स्वीकार कर लिया, तो बात हो गई खत्म।
तो कुछ ऐसा करो कि (गुरु स्वीकार कर ले)। आप तो गुरु को स्वीकार कर ही लोगे — उसको तो स्वीकार करने वाले करोड़ों हैं, क्योंकि वो योग्य है। (नहीं तो गुरु-घंटाल भी तो बैठे हैं — इसीलिए तो हमें कई साल, कई महीने रहना है।) आपने तो स्वीकार कर लिया, क्योंकि गुरु तो योग्य है; लेकिन शिष्य रूप में गुरु स्वीकार कर ले, यह बड़ी बात है। आप स्वीकार कर रहे हो, कोई बड़ी बात नहीं है — उसके पीछे तो करोड़ों लाइन लगाए हैं, क्योंकि सामर्थ्यवान है; आप तो अयोग्य हो। लेकिन गुरु भी कहीं ना कहीं शिष्य ही ढूंढ रहा है। लेकिन शिष्य कौन? जिसे आत्मिक कल्याण के अलावा कुछ नहीं करना है। अब जैसे इन्होंने कह दिया कि हम आत्मिक कल्याण के बाद (वापस) आएंगे — तो जिसके द्वारा आत्मिक कल्याण होगा, हमें उससे पूछना चाहिए कि अब हम क्या करें, आगे क्या? लेकिन हमने कह दिया कि हम आत्मिक कल्याण के बाद उसी नरक में आएंगे — तो कल्याण तो होगा ही नहीं, कि तुम एकदम चालाकी से आए हो। तो भाई, मैं आप लोगों से यह कह रहा हूं कि आप पहले शिष्य बन जाओ, गुरु आपको मिल जाएगा; और गुरु ने अगर स्वीकार कर लिया, तो आपका कल्याण पक्का हो गया — उसी समय पूरी जिम्मेदारी उसकी, अब आपकी नहीं रही। आपकी जिम्मेदारी यहीं तक है कि वो स्वीकार कर ले। तुम क्या अपना कल्याण कर पाओगे? तुम्हारे में क्षमता होती तो कर नहीं लेते? तुमसे कुछ नहीं होगा। तुमसे सिर्फ इतना हो जाए कि तुम शिष्य बन जाओ — अगर इतना करो तो कर लो, बस। और शिष्य बन भी ऐसे सकते हो कि भई, जो नियम हैं वहां के, उन नियमों में रहो। (वहां के नियम) तुम्हें शिष्य (बनाने) के लिए बनाए गए हैं — शिष्य में कैसे पहुंच जाओ; अभी तुम शिष्य थोड़ी ना हो, अभी तो आवारा टाइप हो, ठोकरें खा रहे हो। उन नियमों में रहोगे, तो पात्रता आ जाएगी, योग्यता आ जाएगी; और आप उस नियम में रहोगे, तो एक समय ऐसा आएगा कि गुरु कहीं ना कहीं आपको स्वीकार कर लेगा।
जैसे मान लीजिए, आज बाबूलाल नहीं थे, लेकिन बाबूलाल के लिए हमने कहा कि बाबूलाल अगर यहां रहते हैं, तो पूरी जिम्मेदारी मेरी है। लेकिन बाबूलाल एक बार घर जाके चले आते हैं, तो मेरी जिम्मेदारी नहीं है। बाबूलाल मेरे कहे अनुसार चलेंगे, तो मेरी; लेकिन बाबूलाल जाके मस्ती भी करके आएंगे, तो बाबूलाल की जिम्मेदारी मेरी थोड़ी ना है। जिम्मेदारी कब होती है? जब आप पूरी तरह उसके हो जाते हो। (इसी तरह) आपके बारे में भी बात हुई, आप वहां मौजूद नहीं थे — तो हमने यही कहा कि भाई, अगर इन्हें कुछ होता है, चाहे बीमार हों, चाहे कुछ हो, तो उसकी जिम्मेदारी मेरी — अगर ये मेरे बताए अनुसार पूरी 100 में 101% चल रहे हैं, तो पूरी जिम्मेदारी मेरी। लेकिन अगर 1% भी इधर-उधर हो गए, तो मेरी जिम्मेदारी खत्म हो गई। क्योंकि अभी मैंने पूरी तरह इन्हें स्वीकार नहीं किया, अभी तो मैंने इनको नियम में रखा है। और मैंने पहले ही बोल दिया है कि अगर तुमने कुछ इधर-उधर किया, तो मैं आगे नहीं मिलूंगा। अभी तो ये चल रहे हैं, शिष्य होने की योग्यता ला रहे हैं, नियम में रह के। अगर आप एक बार शिष्य बन गए और गुरु ने स्वीकार कर लिया, तो बात खत्म हो गई। ऐसा कुछ करो कि गुरु स्वीकार कर ले। गुरु को भी तो शिष्य चाहिए — लेकिन गुरु को शिष्य ही चाहिए, (क्योंकि) शिष्य का ही कल्याण हो सकता है। शिष्यपन आप में है ही नहीं, तो कल्याण हो ही नहीं सकता। शिक्षक कितना भी अच्छा पढ़ाता हो, लेकिन मंदबुद्धि बालक उसके पास पहुंच जाए तो वो क्या करेगा? आप प्रोफेसर हो — आपको ही अगर मंदबुद्धि बालक को पढ़ाना हो, क्या आप उसे पढ़ा सकते हो? अगर आप योग्य हो, तो आपको भी योग्य चाहिए, तभी आप उसे (लक्ष्य तक) पहुंचा सकते हो। वरना कितना भी अच्छा पढ़ा के क्या करोगे — अपनी एनर्जी वेस्ट करते रहोगे, और वो प्रेशर में आ जाए, और ज्यादा मंदबुद्धि हो जाए। तो गुरु को भी शिष्य चाहिए, उसे भी शिष्य की तलाश है, क्योंकि उसके पास कुछ है, (जो) शिष्य को ही देना चाहता है — वो ले के क्या करेगा? आप प्रोफेसर बनकर अपने लिए कुछ किए क्या? किसी को पढ़ाया ना। आपकी पढ़ाई किसके काम? जैसे आपकी वकालत है, तो किसके काम? समाज के काम ना। तो वैसे ही गुरु-पद पे अगर कोई हो गया, तो उसका ज्ञान किसके काम? समाज के काम।
जैसे रामकृष्ण परमहंस ने स्वामी विवेकानंद को सब दे दिया, औरों को क्यों नहीं दिया? और ऐसा नहीं पहले दिन दे दिया — कितना जांचा! स्वामी विवेकानंद ने भी पूरी तरह जांचने के बाद पूरी तरह (समर्पण) कर दिया, तब उन्होंने उन्हें वो दिया। तो गुरु भी तो जांचेगा। आप ये मत समझना कि आप योग्य होके गुरु को जांच रहे हो, और गुरु योग्य होके आपको नहीं जांचेगा। आप अयोग्य होके योग्य को जांच रहे हो। (जांचना भी जरूरी है —) वो तो जांचना ही चाहिए — 'पानी पियो छान के, गुरु करो जान के।' अगर पानी गंदा पिया, तो अनेक तरह के रोग पैदा कर देगा। गुरु ऐसे ही जाके बना तो लेते हैं ना — पहले दिन गए, गुरु को साष्टांग, (फिर पछताते हैं)। तो पहले तो आप पूरी तरह शिष्य हो कि नहीं, ये जांच लो — तब आपके सामने गुरु ही टिकेगा। पहली बात तो ये आपको बता दूं — अगर आप पक्के शिष्य हो, तो गुरु के अलावा किसी की ताकत नहीं है कि तुम्हारे सामने टिक जाए; और अगर आप खुद नकली हो, तो आपके सामने नकली ही टिकेगा, असली का तो काम ही नहीं है आपसे, क्योंकि असली तो साफ-साफ बोलेगा। और जिज्ञासु तेज होगा, तो वो भी तो छान देगा ना — अगर वो (गुरु) कहीं से कॉपी-पेस्ट मार रहा है, तो वो भी हिल जाएगा। एक बार जिज्ञासु अपनी असली जिज्ञासा लेके पहुंच गया, (तो नकली नहीं टिकेगा)। तो शिष्यपन का भाव पहले अपने अंदर लाओ।
मैं आपको बताऊं — आप लोगों को तो पता नहीं, प्रश्न-उत्तर के बाद भी संशय हो जाता है; मैं तो पागलों से पूछता था, भिखारियों से, बैठ जाता था; उनके ऊपर भी मुझे संशय नहीं था। मुझे आंसर सही या गलत नहीं चाहिए था — बस दे दो कुछ भी, मेरे काम का हो गया तो ठीक है, (नहीं तो) मैं चला जाता था या वो उठ के चले जाते थे। मैं पूछ लेता था — कैसे हो (आत्मज्ञान)? यही क्वेश्चन होता था। तो (कोई) मेरे से घंटों बात करते थे, फिर बोलते थे जाओ-जाओ। तो मैं बोला — मैं क्यों जाऊं, जब तुम बता ही रहे हो तो बताओ। तो वो उठ के खुद भाग जाता था।
(आत्मज्ञान क्या है —) आत्मज्ञान — खुद का ज्ञान, मेरा खुद का ज्ञान। जितनी मेरे पास जानकारियां हैं, ये जानकारियां पेट तक हैं — कहां तक? पेट तक; इससे ऊपर तो है नहीं। तो इसके आगे पहुंचना है, तो मेरा ज्ञान चाहिए। (पागल कैसे अपना ज्ञान करा सकता था —) अरे, सुना था कि जाने किस भेष में भगवान मिल जाए, कोई ना कोई सिद्ध पुरुष (हो)। तो हमने कहा, यार, समझदारों से तो पूछ लिया, तो पागलों से भी बात कर लें, भिखारियों से भी बात कर लें। तो मैं ये कहना चाहता हूं कि जब मैं उनके पास भी बैठता था, ऐसा नहीं कि उनके ऊपर संशय था। मुझे अगर कोई कहे 'बता दूंगा' — वो गांजा भी पीता था — तो मैं उसके पास बैठा रहता था, क्योंकि मुझे उसके बाहरी से क्या मतलब, वो क्या कर रहा है; उसने कहा है 'मैं बताऊंगा', ये जिम्मेदारी उसने ले ली। मेरा पहला और आखिरी क्वेश्चन यही था — आत्मज्ञान कैसे?
देखिए, पहले तो मैं निकला भगवान-परमात्मा (के लिए), शुरुआत में; फिर इसके बाद पता नहीं कैसे हो गया — अब याद भी करूं कि कहां से आ गया, मैं बोल नहीं सकता; कहीं ना कहीं जग गया होगा। मैं इसी पे रुक गया था कि आत्मज्ञान कैसे। (और) मैं यह नहीं कहता था कि (आत्मज्ञान) चाहिए, कि आत्मज्ञान करा दो। नहीं — 'आत्मज्ञान कैसे?' मैंने कभी ये नहीं कहा कि तुम करा दो। कैसे हो, पद्धति बता दो मुझे, मैं करके देखूंगा; मेरे उत्तर दो मुझे, मैं प्रश्न पूछूंगा — आत्मज्ञान कैसे हो? तो तुम बताओगे — ऐसे होगा। जैसे बता दिया 'समर्पण से', तो (मैं पूछूंगा) समर्पण कैसे हो? तो जैसे वो बताया, तो ये कैसे हो? तो आखिरी में कह देता था — चले जाओ। तो बोला, ठीक है, जा रहा हूं, और प्रश्न वही खड़ा का खड़ा रह गया। मैंने कभी ये नहीं कहा कि मुझे आत्मज्ञान करा दो। मैं कहता था — कैसे होगा? मैं करूंगा ना मेहनत, ये काम मैं करूंगा; आप मुझे बस मार्ग बताएं, मेरे प्रश्न के उत्तर दें — मेरे प्रश्न के उत्तर ही मुझे पहुंचा देंगे।
और बाहर वो कुछ भी करता था — मेरे सामने गांजा भी पीते थे लोग, (और) मुझे बताने की कहते थे — मैं कोई मतलब नहीं रखता था। तुम गांजा पियो, दारू पियो, मुझसे कोई मतलब नहीं; ये तुम्हारी पर्सनल लाइफ है। तुमने मुझे कहा है कि मैं बता दूंगा — इतना कम नहीं है मेरे लिए। अब ये जिम्मेदारी तुम्हारी है, और मैं तुमसे पूछता रहूंगा — तुम मुझे बर्दाश्त कर पाए तो बता ही दोगे; जिम्मेदारी ले ही ली है, तो तुम्हें तो निभाना पड़ेगा। मैं तो तुम्हारे भरोसे हो गया, तुम जानो, तुम्हारा काम जाने — या तो मुझे ना कहो। तो मुझे कभी 1% का भी शक नहीं हुआ, संशय नहीं हुआ। मैं कौन होता हूं संशय करने वाला? उसकी पर्सनल लाइफ है, वो कुछ भी करे, हमें क्या मतलब। बस वो हमें बता दे, प्रैक्टिकल भाई, क्या करना है — ये हम करके देखेंगे। जो चिलम पी रहे थे, हम बैठे रहते थे; उन्होंने (चिलम पी), मैं बोला — इससे क्या होगा? क्या इससे हो जाएगा, जिसके लिए मैं निकला हूं? बोले — नहीं, एक नशा है। तो मैं बोला — नशा करने के लिए मैं निकला ही नहीं हूं। अगर आप कह दो कि इससे हो जाएगा, तो एक हाथ से क्यों, दोनों हाथ से चिलम पियूंगा — हमें तो बहुत तेजी से चाहिए; फिर तो मैं चिलम ही पीता रहूंगा जब तक हो नहीं जाएगा, क्योंकि इसके अलावा मेरे पास कोई काम ही नहीं है।
(साधिका ने कहा, कोई भी बेवड़ा कुछ भी बता देगा तो वही कर लेंगे?) वो आपके लिए बेवड़ा है, मेरे लिए थोड़ी ना। मैं अपने पूरे भाव को आपको बता रहा हूं — मैं वो भी करके देखता, पूरी तरह, क्योंकि मुझे वही चाहिए था, उसके अलावा मुझे कुछ चाहिए नहीं था। मेरा जीने का कोई आधार-बेस नहीं था, और मुझे मिल नहीं रहा था। तो अगर ये व्यक्ति मुझे इस ब्रह्मांड में आश्वासन दे रहा है कि चिलम पीने से हो जाएगा, और मेरे पास कोई ऑप्शन नहीं है, तो कोई तो एक ऑप्शन दिया मुझे। (रिस्क —) रिस्क पे तो जिंदगी खड़ी है। मेरे पास है क्या? क्या आधार है, क्या बेस है? कुछ नहीं है। ये रिस्क भी नहीं है। रिस्क तो तब होता है जब ऑप्शन हो — रिस्क तब था कि भैया, इससे अच्छा रास्ता था, लेकिन वो रास्ता छोड़कर मैंने आपके कहे अनुसार रिस्क ले लिया। मेरे पास तो कुछ था ही नहीं, यार। तुम कहो चरस पिलाओ, अफीम पिलाओ — पिएंगे; और कुछ है तो है नहीं, थक तो गया हूं। कम से कम या तो मुझे ये पहुंचा देगा, या मार देगा। मेरे पास भी कोई ऑप्शन नहीं है। परिवार से लगाव नहीं, नाम-पैसा चाहिए नहीं, आश्रम बनाना नहीं है, गुरु बनना नहीं है, शिष्य बनना नहीं है, नशेड़ी भी नहीं बन पाया, गृहस्थ में जा नहीं पाया — तो (बात ना) करूं तो रिस्क है, फिर जिंदगी तो नर्क हो जाएगी; कम से कम चिलम-गांजा मुझे मार तो देगा, क्योंकि मेरे पास जीने का आधार-बेस नहीं। लेकिन ये पूर्णता से पता हो कि ये पीने से होगा, तभी पियूंगा; नशा मैं नहीं करूंगा। तो उन्होंने हटा लिया, उनकी हिम्मत नहीं हुई कि वो दे दें। मैं पियूंगा तो आत्मज्ञान के लिए ही पियूंगा — ये पक्का है, 101%। रिस्क तो तब है जब मैं बात ना मानूं — इसका मतलब मुझे उसकी चाहत ही नहीं है।
आदमी का सामान जब खोता है ना, और उस सामान की जिंदगी में सबसे ज्यादा जरूरत है, तो कहीं भी ढूंढता है — जहां नहीं खोया है, वहां भी ढूंढता है, हाथी को भी सुई की नोक में ढूंढता है। और उसके पास ऑप्शन है, तो वो नहीं ढूंढेगा, कहेगा चलो इससे काम चलाओ। तो मैं यह कहना चाहता हूं कि मेरे पास ऑप्शन ही नहीं था। अगर मैं नहीं करता तो रिस्क था; जीने का आधार-बेस नहीं था मेरे पास। मैं तो रो रहा था, चिल्ला रहा था। इतना भी समझ में आ गया था कि आत्महत्या भी पाप है, अब वो भी नहीं हो सकता। तो मैं तो कहीं के लायक नहीं रहा। तो बात नहीं मानता तो रिस्क था।
वो कभी भी हो सकता है। 12 साल भी तो उसने (लगभग) रखा — कि 12 साल लगभग हम तुम्हें जांचेंगे; हो सकता है कि मैं तुम्हें एक ही दिन में (स्वीकार कर लूं)। तो जांचने वाले के ऊपर है ना कि कब वो चढ़ा देगा; तो क्षमता को देख के चढ़ाएगा। और जांच वो हर वक्त रहा होगा।
अब देखिए, मैं आपको बता रहा हूं — आप लोग कहते हो (इनका) बहुत समर्पण है। अब जैसे ही बात हुई, ये सकपका गईं। जब इन्होंने मेरे पास समर्पण ही कर दिया था, तो सकपकाना ही नहीं चाहिए — शरीर का कुछ भी हो जाए, मुझे तो आत्मज्ञान चाहिए; शरीर सड़ जाए, सड़ जाए; हम तो आपकी शरण में हैं, आप जहां फेंक देंगे, वहां। लेकिन घबरा गईं — इसका मतलब पूरी तरह समर्पण नहीं हो पाया, समझ नहीं पाईं। (समर्पण होता तो कहतीं —) हम तो आपकी शरण में आ ही गए हैं, आप कह देंगे जाओ, तो हम चले जाएंगे। (भैया, समर्पण वाला कहेगा —) हमारा शरीर काम नहीं किया — बहुतों का शरीर सड़ेगा, हम उसे देखेंगे; अगर जिसके पास हम गए हैं, वो मुझे सड़ते हुए देखना चाहता है, तो उसकी खुशी में हमारी खुशी — ऐसे को समर्पण कहेंगे ना। लेकिन हमने तो प्रश्न खड़ा कर दिया कि आप मेरी सेवा भी करोगे? तो आपको आत्मज्ञान चाहिए कि मेरी सेवा चाहिए, ये बताओ पहले। दो में से एक फैसला करो — कि मैं आपके शरीर की सेवा की जिम्मेदारी लूं, या आपको आत्मज्ञान (कराने) की जिम्मेदारी लूं? कौन सी जिम्मेदारी लूं? अभी तो वो जुबान से कह रहे हो; परिस्थितियां बताती हैं। क्योंकि शरीर भी जर्जर होगा। अब उसके दिमाग में दो चीजें आपने डाल दीं — कि मुझे आत्मज्ञान की तरफ भी बढ़ाओ, और मेरे शरीर की सेवा भी आपको करनी है — अब वो क्या करेगा? इसका मतलब वो शिष्य-भाव आया ही नहीं; पहली बार परीक्षा ली और उसमें फेल हो गई। नहीं तो कहती कि आपकी शरण में हूं, आप मुझे कहेंगे वापस जाओ तो हम वापस चले जाएंगे, (चाहे) वो लोग स्वीकार ना करें, हम कहीं और जाएंगे, क्योंकि हो सकता है मुझे भेजने में ही मेरा कल्याण हो। और जो भेज रहा है, उसको भी तो मेरा हाल पता होगा ना कि मैं कहां जाऊंगा — मैं उसके पास लंबे समय से रह रहा हूं, तो उसको तो पता है कि मेरे पास्ट में क्या है। जहां वो भेज रहा है, वहां मैं चला जाऊंगा, भले वहां मेरा अपमान होगा — हो सकता है उसी में ज्ञान हो जाए, कुछ आसक्ति बची हो, वो सेवा में टूट जाए। तो ये तो पूरा उसके ऊपर छोड़ना चाहिए ना कि वो क्या करेगा। आप तो इतने चालाक हो कि पूरी सुरक्षा उससे ले ली — तो फिर आत्मज्ञान तो शब्दों में है, (असल में) बुढ़ापे का सहारा बन गया, बस। आत्मज्ञान हो जाए तो ठीक है, लेकिन शरीर की रक्षा-सेवा आपकी जिम्मेदारी — शरीर खुश होना चाहिए, (क्योंकि) हम शरीर पे टिके हैं। उस समय मैं आपके चेहरे को देखा — हम तो थोड़ा और (परीक्षा) लेते, लेकिन आप घबरा (गईं) — जाने दो, कि बर्दाश्त करने की क्षमता ही नहीं है; क्योंकि अभी हमारा कुछ फैसला ही नहीं आया था, तभी डगमगा गए।
मैं तो कहता हूं, व्यक्तिगत बात ही ना करो, सार्वजनिक बात करो। हम सार्वजनिक ही बता रहे थे, तो (अपनी बात) वहां रखनी ही नहीं चाहिए थी; ये कहलवाने की जरूरत ही नहीं थी। मुझसे कहलवा दिया, तो मैंने कहा — यार, तुम्हें इतना भी भरोसा नहीं है मुझ पे? मुझे कहना पड़ा कि हम तुम्हारी जवाबदारी लेते हैं — उस स्थिति में कहना पड़ा, जब (आप) ज्यादा डगमगा गईं, कि कहीं बेहोश ना हो जाएं। अगर मैं नहीं कहता तो आप तो घबरा जातीं — घबरा गई ही थीं। फिर आत्मज्ञान के लिए क्या आए थे?
(साधिका ने कहा, लगा फिर फैमिली की तरफ जाना पड़ेगा —) तो हो सकता है वो उस स्थिति में आपको भेजे कि जा तू वहीं, और वहीं तेरा कल्याण होगा। जैसे बुल्ले शाह — बुल्ले शाह को घर किसने भेजा था? गुरु ने ही भेजा था, और गुरु ने ही उसे दूर किया था, क्योंकि उसे पता था इस दूरी में ही इसका कल्याण हो जाएगा। मतलब जिसके हाथों में हम अपनी जिंदगी की बागडोर दे रहे हैं, उसको पता है कब डोर फेंकनी है, कब खींचनी है, कब क्या करना है — इसी का नाम समर्पण है।
गुरु तो अपनी स्थिति से अपनाएगा ना। और जो स्थिति उसकी पहले थी, वो उसकी गलती के कारण इतना बैक चला गया था। लेकिन गलती क्या थी? सिर्फ बात नहीं किया। आप लोगों के समझ से, अगर आप लोग खड़े होते तो बोलते — मैंने गलती क्या किया, बात ही तो नहीं किया! वो कहेगा — जरा सी गलती है भाई। 12 साल अथाह मेहनत के बाद गुरु अपनाता है। और अपनाने के पहले तुम उस लायक हो कि नहीं हो, वो अनेक तरह से आपकी भी तो परीक्षा लेगा।
दिन, महीना छोड़ो, साल लग जाएं — पूरी तरह वो तुम्हें स्वीकार कर ले, वो क्षण तुम्हारे कल्याण का पक्का हो जाएगा; बस वहीं तक मेहनत करनी है। अब वो एक दिन लगता है कि 20 साल लगता है, वो आपके ऊपर है। जैसे गुरु के स्वीकार करने में कितने साल लग गए? 12 साल। गुरु स्वीकार तब करेगा जब आपका (वैसा) स्तर होगा, ऐसे स्वीकार थोड़ी ना करेगा। दो-चार दिन भूखा (बैठा) रहा गेट पे — उसे पता चल गया कि अभी तो (ये) उठ के भाग जाएगा, वो भाग ही गया। 12 साल लग गए उसे योग्य बनने में। ये 'सुबह का भूला शाम को वापस आ जाए' — ये सिर्फ सुबह-शाम नहीं थी, उस सुबह-शाम में 12 साल थे।
अब आपने कहानी सुनाई — तो उसमें गुरु ने पहले कहा कि जाओ घर पे, फिर (अपने) शिष्य को क्यों भेजा? क्या कोई काम था? वो ये जांचना चाहता था कि उसके अंदर प्रेम है कि नहीं। तो पता चला उसके अंदर प्रेम नहीं है। (तो गुरु ने कहा) अब उसे आने मत देना — क्योंकि मैं उससे प्रेम करता हूं, लेकिन जब तक उसका प्रेम जागृत नहीं होगा, उसकी उपलब्धि नहीं होगी। प्रेम पैदा कैसे होगा? अब मुझसे इसका वियोग होगा, तब पैदा होगा। तो गुरु ने वियोग किया। और जब वियोग हुआ — गुरु तो प्रेम करता था — तो उसकी कमी वो बर्दाश्त ही नहीं कर पाया। तो उसने (कहा) — गुरु मुझे बस स्वीकार कर ले; आत्मज्ञान चलो उधर गया, ब्रह्मज्ञान उधर गया, उपलब्धि उधर गई, अब मैं गुरु के बिना नहीं रह पा रहा हूं, तो गुरु मुझे स्वीकार कर ले। गुरु ने तो स्वीकार किया ही था — तू उस लायक नहीं था तो भी स्वीकार किया था — लेकिन तू परीक्षा में फेल हो गया। तो गुरु ने अस्वीकार किया, और (फिर से) स्वीकार करने में 12 साल लग गए; और उस 12 साल में वो योग्य भी हो गया, उसके अंदर से प्रेम जागृत हो गया। नहीं तो ये कहानी भी समझ में नहीं आती। (ये कहानी) मुझे कई बार सुनाई, मैं आज इस पे बोल रहा हूं — मैंने आज तक सिर्फ सुना, बोला कभी नहीं।
अब आप लोगों को ये टेंशन हो गया कि आपका क्या होगा। लेकिन देखिए, मैं किससे पूछूं, ये बताइए — ये भी तो एक शरीर है। आपको क्या लग रहा है, हमारे घर वाले सेवा करेंगे? हम इतने कड़क बोलते हैं — कभी भी फोन आता है तो (कहता हूं) अपना भोग भोग ले; तो वो भी तो कहेंगे — तू अपना भोग भोग ले। अब बताओ, हम किससे पूछें? चलो, आप तो मुझ पे निर्भर हो गए; हम किससे पूछें कि भैया, मेरा कौन करेगा? क्योंकि तुम तो (खुद को) अपाहिज (की श्रेणी) में ले ही आए, तो तुमसे तो उम्मीद नहीं रख सकते — क्योंकि तुमने तय ही कर लिया कि मेरी सेवा की जवाबदारी होनी चाहिए, और मैंने ले लिया; तो इसका मतलब तुम अपाहिज हो, ये तुमने सिद्ध कर दिया। हम किससे उम्मीद रखें, बताओ? हम किससे कहें कि अगर हमें कल कुछ हो जाए, अगले पल हो जाए, तो मुझे कौन देखेगा? अगर (घर से) निकलने के बाद (मेरा) यही प्रश्न रहता, तो मैं यहां पहुंचता ही नहीं। तो मैं आत्मज्ञान के लिए निकला हूं कि सेवा के लिए निकला हूं? आत्मज्ञान के लिए निकला हूं, तो शरीर की बात ही कहां आ गई? ये शरीर (का जो भी हो), ये मेरे कर्म का भोग है, कर्म का सिद्धांत है। मुझे तो आत्मज्ञान चाहिए। मुझे सड़ना है तो सड़ूंगा, छटपटाना है तो छटपटाऊंगा, कीड़े पड़ेंगे तो कीड़े पड़ेंगे — क्या फर्क पड़ता है? जिसकी शरण में आए हैं, वो देखेगा। (शिष्य तो कहेगा —) मुझे तो सिर्फ आत्मज्ञान तुझसे चाहिए, मुझे कीड़े पड़ें तो पड़ने देना, मुझे बचाना मत, मुझे आत्मज्ञान के लिए (रखना)।
ये भी तो एक शरीर है — तो हम किससे कहें? हम तो आपके लिए काम कर रहे हैं, और आप तो मेरे ऊपर पूरे निर्भर हो गए कि आत्मज्ञान भी और शरीर की सेवा भी; तो हम आपसे तो कह नहीं सकते। (तुम सुधर भी सकते हो, बिगड़ भी सकते हो — वो बाद की बात है, वो छोड़ दो।) तुम एक चालाक व्यक्ति हो। मैं ये कह रहा हूं कि मैं किससे कहूं? पीछे वाले तो मुझे अपना ही नहीं सकते, क्योंकि मैंने उन्हें खुद सिद्धांत समझाया कि अपने कर्म का फल भोगना; तो वो कहेंगे कि भैया, अपने कर्म का फल भोग, मेरे पास क्या आ रहा है? और सामने मेरा कोई ऐसा है नहीं। तो पहले तो मेरी फिक्र तुम्हें बतानी चाहिए थी — आपको तो मेरी फिक्र करनी चाहिए थी कि भाई, आपको कुछ हुआ तो मैं हूं; मेरा छोड़ो, क्योंकि हम तो किसी लायक नहीं हैं; आप सुरक्षित रहोगे, तो इस शरीर के द्वारा बहुत लोगों का कल्याण हो जाएगा; मैं तो किसी लायक हूं ही नहीं, मैं सड़ जाऊं, सड़ जाऊं; मैं ठीक रह के भी क्या कर रहा हूं? आपके द्वारा तो कोई कार्य हो रहा है, समाज के लाखों लोग फायदा ले रहे हैं; हमसे तो हम ही फायदा नहीं ले रहे हैं — और फिर भी उसको (अपने शरीर को) सुरक्षित रखना चाहते हैं। अभी तक इसको इतना भोग लिया शरीर के द्वारा, फिर भी हम लास्ट में भी शरीर की सुरक्षा ही चाहते हैं — इससे हमारा स्तर पता चलता है।
हमें तो कभी शरीर की चिंता नहीं हुई — वो तो आप लोग इतना ख्याल रख देते हो, नहीं तो मैं कभी ख्याल भी नहीं रखता; मुझे 1% भी शरीर की सुरक्षा का कुछ नहीं है। सड़ जाए, सड़ जाए; जब तक रहेंगे, काम करेंगे। हम इसको असुरक्षित भी नहीं करेंगे, सुरक्षित भी नहीं करेंगे, सिर्फ हम काम करेंगे। तो आपको शरीर की फिक्र छोड़नी पड़ेगी। सामने वाला आपके लिए पूरी तरह एक ही काम कर सकता है ना — आपने तो दो में उलझा दिया। आपने तो उसे शरीर की जवाबदारी दे दी — तो ठीक है, अब शरीर की सेवा करवा देगा आपकी, (और) क्या करेगा? प्रार्थना-पत्र तो आपने ही डाला है ना। तो उसने तुम्हारे शरीर की जवाबदारी ले ली कि जाओ, अगर कुछ हुआ तो डरो मत, पूरी जिम्मेदारी मेरी; तुम्हारा मल-मूत्र भी साफ करना होगा तो हम करेंगे। अब आप देखिए कि आप जिसके पास आत्मिक कल्याण के लिए आए हो, उससे ये उम्मीद रखिए कि वो मेरा मल-मूत्र साफ करे — मतलब तुम कितने गिर गए, अपने गिरेपन को देखो जरा! या तो किसी से करवाएगा, या तो खुद करेगा — दो में से एक ही बात होगी ना। ये तो हॉस्पिटल वाले भी पैसे लेके कर देते हैं। देखिए ना फिर अपने स्तर को — आप जिसे गुरु कह रहे हो, उससे उम्मीद क्या लगा रहे हो! आप यहां रहोगे तो हालातों के अनुसार आपका स्तर, आपका लेवल पता चलेगा। क्योंकि बिना मेरे विचार के तो बात ही नहीं निकलती; अगर मेरे विचार में शरीर की प्राथमिकता नहीं होती, तो शब्दों में भी नहीं निकलती।
इसलिए जब भी हम कह रहे थे कि आप लोग अपनी बात ना करो, बात तो सार्वजनिक ही हो रही थी — दो बार आपको सचेत किया कि आप लोग अपनी बात ना करो, क्योंकि मुझे पता था कि आप (अपनी बात) किए तो फंसे, क्योंकि मुझे आपका स्तर पता था, आपको नहीं था। तो मैं कह रहा था कि मत गिरो, अभी भी तुम्हें बचा रहा हूं। लेकिन तुम (माने) नहीं। इसीलिए तो मैं सचेत कर रहा था कि आप लोग अपनी बात तो ना करो, क्योंकि हम तो (तुम्हारी) जिम्मेदारी आंतरिक रूप से ले ही चुके हैं, तुम क्यों चिंता कर रहे हो? लेकिन अब तुमने मुझसे कहलवा दिया, तब तो बात ही खत्म हो गई — अब क्या बचा? वो तो मैं ले ही लिया था, आपको कहलवाने की जरूरत ही नहीं थी। और उम्मीद भी क्या लगाई? शरीर की सफाई करवाना! जिसे हम महान कह रहे हैं, जिसे गुरु कह रहे हैं, जिससे कहें कि आपके द्वारा मेरा आत्मिक कल्याण हो, उससे हम ये भी शर्त लगवा लिए कि भैया, देखो, वक्त आने पे मल-मूत्र भी मेरा आप ही साफ करोगे; उसने कहा — हां करेंगे, चिंता ना करो — और तब तुम्हारी चिंता खत्म हो गई कि अब मैं फ्री हो गई। (शरीर की जिम्मेदारी तो उसने ले ली —) उसके बाद तो आपको अच्छा ही लग रहा था, क्योंकि शरीर का ही एक प्रोटेक्शन चाहिए; तो अच्छा ही लगेगा।
(साधिका ने कहा, हमारे लिए क्या पता कितना समय लगे —) मैं तो कह रहा हूं कि बस आप चल भी तो दो — वही चलना है, बस। आपका टारगेट भी तो हो — कम से कम गुरु स्वीकार तो कर ले, मैं उस लायक तो बनूं। ये आपने अभी कहानी सुनाई तो वो थोड़ी सोच रहा था कि मैं नाचने के बाद मुझे आत्मज्ञान हो जाएगा — बस, मेरा गुरु मुझे स्वीकार कर ले यार; क्योंकि उसे पता था कि अगर ये स्वीकार किया तो बात खत्म हो जाएगी। मेरी ताकत नहीं है कि मैं अपने आप को आत्मज्ञान करा दूं, मेरी ताकत नहीं कि मैं मूल में मिला दूं अपने आप को। मेरी ताकत है कि मैं नर्क में जरूर अपने आप को ले जा सकता हूं — लेकिन नर्क में भी जगह जल्दी नहीं मिलेगी; नर्क में जगह मिलते ही अपने कर्म का लेखा-जोखा होगा, फिर निकलोगे ना। तो अभी तो नर्क में भी लाइन में खड़े रह जाओगे, क्योंकि स्वर्ग में तुम्हें रहना नहीं है — स्वर्ग में रहना होता तो घर-बार, इतनी अच्छी लग्जरी लाइफ छोड़ के नहीं आते; और मोक्ष की तो अभी कोई बात ही नहीं, क्योंकि शरीर के चक्कर में पड़े हो। नर्क के लिए भी बड़ी लंबी लाइन है, भीड़ लगी पड़ी है। गेट के अंदर नर्क में भी एंट्री हो जाए तो बात बन जाएगी, क्योंकि नर्क में एंट्री होते ही भोग चालू होगा, और हम कभी ना कभी पक्का निकल जाएंगे। और आप तो भोगने से अपने आप को बचा रहे हो — इसका मतलब अभी भोगने वाली लाइन में भी नहीं खड़े हो, अभी पूरी तैयारी ही नहीं है; ये बचाव की तैयारी थी। आत्मज्ञान से ज्यादा आपको शरीर की फिक्र है, तभी तो आपने वहां सबसे पहले महत्व से (उसे) रखा। नहीं तो आप कहतीं कि भैया, मुझे शरीर से मतलब नहीं, मुझे आत्मज्ञान चाहिए, शरीर का क्या होगा अपने को क्या पता। और जिससे आप हां भरवाईं — क्या आपको लगता है कि वो आपके बाद ही जाएगा? हो सकता है वो आपके पहले ही चला जाए। तो जितना जल्दी (हो), जो काम की बात है, वही कर लो। क्योंकि वो रहेगा तभी ना आपकी सेवा करेगा — उसका शरीर रहेगा तो शरीर के द्वारा सेवा करेगा; वो शरीर नहीं रहेगा, तो उसकी जिम्मेदारी थोड़ी ना होती है। जब सामने वाला व्यक्ति सुरक्षित रहेगा, तभी आपको उठ के एक गिलास पानी देगा; अगर वो सुरक्षित ही नहीं है, वो अपाहिज है, तो आपको दे ही नहीं सकता, और आप उसे दोषी भी करार नहीं दे सकते। जैसे — जब तक मैं नौकरी पे हूं, तभी तक मैं काम करूंगा; दो ऑप्शन हैं — या तो मुझे रिटायर कर दिया जाएगा, या तो मैं इस्तीफा दे दूंगा; मेरी जवाबदारी तब तक है, जब तक मैंने पद को स्वीकार किया है। लेकिन उस पद से मैं कभी भी इस्तीफा दे सकता हूं — ये मेरी स्वतंत्रता है, ये कोई छीन नहीं सकता। (इस्तीफे में कारण पूछा जाएगा; सज्जन व्यक्ति जो काम को काम के तरीके से कर रहा है, उसे कोई छोड़ना नहीं चाहेगा,) लेकिन वो छोड़ना चाहेगा, तो उसे कोई रोक नहीं सकता; और जैसे ही उसने छोड़ा, उसकी जिम्मेदारी खत्म हो गई।
हम तो उस समय आप लोगों को देख रहे थे और सचेत भी कर रहे थे कि जाने दो, अपनी बात मत करो — इसलिए कि मुझे पता था मैं तो जिम्मेदारी ले ही चुका हूं; लेकिन पागल, तुम अपनी बात क्यों कर रहे हो? तुम्हारी जिम्मेदारी तो इतनी ले ली है कि अगर भोजन मिलेगा तो पहले तुम्हें खिलाऊंगा, बाद में मैं खाऊंगा। तुम्हें तो पता भी नहीं कि मैंने किस तरीके से आपकी जिम्मेदारी ली है — मुझसे ज्यादा चिंता मुझे तुम्हारी है; मेरी तो चिंता मुझे कभी हुई ही नहीं। लेकिन तुम्हें ये बात समझ ही नहीं आई, इसलिए ऐसा होता है। इस लाइन में प्रैक्टिकली पढ़ने के बाद भी हमें पता चलता है कि कितना सूक्ष्म है, क्या करना, कैसे करना — ये एजुकेशन इतनी आसान नहीं है। इसलिए ऐसी घटनाएं घटती रहती हैं; (और) होने के बाद भी (यहां से) भागना नहीं — मेरी तरफ से (यही कहना है)।
ये तो प्रत्यक्ष है — आप स्वीकार करो या ना करो, करना ही पड़ेगा, ये आपके बस में नहीं है। प्रत्यक्ष ज्ञान ऐसा होता है कि ये आपके बस में नहीं है — स्वीकार करना, ना करना। करोगे क्या, अस्वीकार कर दोगे क्या? आप स्वीकार करके महान मत बनो। अब आपको ये दर्शाने की जरूरत ही नहीं कि मैंने स्वीकार किया। आप अगर कह रहे हो 'मैंने स्वीकार किया', तो ये बोलने की जरूरत ही नहीं पड़नी चाहिए — आप क्या अस्वीकार कर सकते हो? अस्वीकार करने की क्षमता है, तब आप कह सकते हो कि मैंने स्वीकार किया। जितनी भी बातें अभी हुईं, क्या आप इन्हें अस्वीकार कर सकती हैं? नहीं — तो स्वीकार की बात ही नहीं आई। फिर भी स्वीकार की बात आ रही है — कहीं ना कहीं वो जीव अपने आप को 'स्वीकार' बताकर बड़ा बनना चाहता है कि मैंने स्वीकार किया। यही बड़ापन-छोटापन है। अगर अस्वीकार करने की क्षमता थी, तब तो मैं कहता कि आपने स्वीकार किया, बहुत-बहुत धन्यवाद। आप अस्वीकार कर ही नहीं सकते, तो आप कह ही नहीं सकते कि मैंने स्वीकार किया। तो प्रत्यक्ष ज्ञान को कोई यह मत कहे कि मैं स्वीकार कर रहा हूं — प्रत्यक्ष (के लिए) तुम्हारे साइन की कोई जरूरत नहीं।
अस्वीकार और स्वीकार की बात तब आती है जब अप्रत्यक्ष रहता है — कि चलो भाई, आपने कहा तो (मैंने) स्वीकार किया, इतने दिन बाद प्रत्यक्ष होगा। लेकिन भैया, यहां तो प्रत्यक्ष है, तो स्वीकार-अस्वीकार की बात ही नहीं है। मैं तो कभी कहता भी नहीं कि आप स्वीकार करो, अस्वीकार करो — आप कौन होते हो? स्वीकार-अस्वीकार की बात तब आती है जब अप्रत्यक्ष को आप प्रत्यक्ष रूप में स्वीकार करते हैं — कि चलो भाई, आप कहते हैं तो हम मान लेते हैं, हमें समझ में नहीं आया फिर भी मान लेते हैं। जब हमें समझ में ही आ गया, तो प्रत्यक्ष हो गया। अप्रत्यक्ष तब होता है जब (समझ में नहीं) आता, तो आप कहतीं — चलो, आप गुरु योग्य हो, मैं आपकी बात मानती हूं, मुझे तो समझ में नहीं आया है, लेकिन अगर आप कहते हो तो ठीक है, करके देख लेते हैं — तब आप कहतीं कि मैं आपकी बात स्वीकार कर रही हूं, क्योंकि मुझे प्रत्यक्ष नहीं हो पा रहा है, लेकिन आप कह रहे हैं तो सही होगा; जिस दिन मुझे प्रत्यक्ष होगा, उस दिन बोलेंगे हां सही है। तो यहां तो प्रत्यक्ष है, (यहां) स्वीकार की बात नहीं आती। प्रत्यक्ष मींस — जो बोला, आप समझ गए, (मैंने) क्लियर कर दिया, आपको क्लियर हो गया। (क्लियर) होने के बाद 'मैंने स्वीकार किया' बोले, तो वो प्रत्यक्ष अहंकार है, अहम-भाव है — कि देखो, मैंने आपकी बात को स्वीकार किया, मैं एहसान जता रही हूं। प्रत्यक्ष, मींस क्लेरिटी मिलने के बाद, अगर बोल दिया कि मैं आपकी बात को स्वीकार करती हूं, तो ये मेरा अहंकार है; और आपको सबकी नजर में महान बनना है कि मैं कितनी सरल हूं, कितनी सहज हूं कि देखो, स्वीकार कर रही हूं। ये बड़प्पन (असल में) छोटापन है — आपको पता भी नहीं, लेकिन है यही।
इसीलिए तो मैं कहता हूं, अपनी समझ को विकसित करो। (समझ विकसित) कैसे होगी? ऐसे ही होगी ना — (जैसे आज हालात से हुआ)। तुम्हें पता भी नहीं चला कि तुम्हारी परीक्षा चल रही है।
(साधिका ने कहा कि ये आंतरिक एजुकेशन आसान नहीं है, आप जैसा कोई ही पता लगा सकता है —) यहां तो हालत ये है शिष्यों की कि चलो तुम नहीं तो हम जाके कोई और गुरु ढूंढ लेंगे। तुम मना तो करो, हम तो तैयार हैं जाने के लिए — मेरी क्या गलती होगी इसमें यार, गुरु भाई से ना बोलना, अभी इसमें भी आप नाराज हो रहे हो! दूसरा गुरु ढूंढ लेंगे — गुरु की कमी है क्या, ऑनलाइन गुरु हैं — इस समय यही हाल है। (ऑनलाइन में समझ में आएगा या नहीं —) नहीं, ऐसा नहीं है; हम कुछ भी समझते हैं, ऑनलाइन भी समझते हैं, ऑफलाइन भी समझते हैं, लेकिन ये ऐसा नहीं है। अब जैसे इस बालक ने कहा — हरियाणा में आ गया, गलती किया था, गलती का एहसास हुआ; इसने कहा कि अगर आप वहां नहीं रुकने दोगे, तो मैं घर तो नहीं जाऊंगा, और कहीं चला जाऊंगा। तो ये भी कह सकता था कि मैं उसी आश्रम में रहूंगा, नहीं तो कहीं नहीं रहूंगा — ये इसका आखिरी होता। तो इसने क्या ऑप्शन दिया? आप माफी दे दोगे तो सही है, नहीं तो हम और कहीं चले जाएंगे — मतलब इसका 'और कहीं' भी है। गुरु मिलना क्या खाने का काम है? जिंदगी में अगर आप कबीर की बात करते हो, तो उन्होंने कहा — गर्दन कटाने से गुरु मिले, तो सस्ता सौदा जान। तुम तो हर समय गुरु बदल रहे हो। तो इसके शब्द तो ये होते कि भाई, हमें जगह तो मिलेगी, लेकिन आप जैसा गुरु नहीं मिलेगा; हमें तो गुरु चाहिए, जगह थोड़ी ना; अगर आप नहीं मिले तो मेरा क्या होगा मुझे भी नहीं पता, और मैं आपके बिना नहीं रह सकता। ये कुटिया कल्याण कर देगी क्या? ये जगह कल्याण कर देगी? ये जगह तो पहले भी थी, बाद में भी रहेगी। कल्याण तो गुरु-स्थिति में है, उसके द्वारा होगा। ये बड़ का पेड़ आज बहुत अच्छा लगता है — क्या बड़ का पेड़ और कहीं नहीं है? बहुत हैं दुनिया में, श्मशान घाट में बहुत पुराने-पुराने खड़े हैं। जरा समझो इस बात को — अभी (ये) देवता बन गया क्या? यहां कोई बैठता भी नहीं था। हमें बड़ के पेड़ में कुछ आकर्षण दिखता है — तो बड़ का पेड़ और कहीं नहीं है क्या? बड़ का पेड़ उपलब्धि करा देगा? तो इसके शब्द तो ये होते कि जहां आप रहोगे, उसके पास ही रहने का प्रयास करूंगा, मैं आश्रम के बाहर रहूंगा, लेकिन मैं कहीं नहीं जाऊंगा — ये इसका आखिरी होता। फिर इसने ऑप्शन दिया कि अगर आप वहां नहीं आने दोगे, तो मैं और कहीं चला जाऊंगा — इसका मतलब तुम्हें अभी मैं नहीं चाहिए। तो आजकल के लोगों को बात समझ में आ रही है? ये तो बस इंतजार कर रहे हैं कि तुम मना तो करो — गुरु ऑनलाइन लिस्ट में हमारे हैं, तुम सिर्फ मना करो। परीक्षा तो दूर, परीक्षा तो मैं दूंगा नहीं, तुम बताओ — नहीं तो हम आगे जा रहे हैं, गुरुओं की कमी नहीं है। ये हाल है आज का।
अब बुल्ले शाह जिस गुरु की तलाश में (था कि) बस मुझे अपना ले — 12 साल लगे; क्या उस समय और गुरु नहीं होंगे पृथ्वी पर? तो बुल्ले शाह कहते कि छोड़ो यार, उनके जैसे कितने मिल जाएंगे — तो बुल्ले शाह, बुल्ले शाह ही नहीं बन पाते। एक के हो जाओ, तो हो जाओ; होने के पहले जांच लो। लेकिन एक के बन गए, तो बन गए, बात खत्म। रोज मुंह मार रहे हो — कभी इधर, कभी उधर। बनने से पहले जांच लो, लेकिन जब बन ही गए, तो बात खत्म करो। हमारी तो चाटने की आदत है — हम तो चाटने आए, तुम्हारे बनने थोड़ी ना आए हैं। कहा गया है — गुरु खोज लो; लेकिन पूरी तरह समर्पण के पहले पूरी तरह जांच लो, क्योंकि प्रत्यक्ष होगा तभी कुछ हो सकता है। इसलिए कहा गया है — पानी पियो छान के, गुरु करो जान के। ऐसे ही मत (करो)। मैंने आज तक (बहुतों को) 'गुरु जी' कहा, क्योंकि संस्कार में पला-बढ़ा था, लेकिन गुरु-भाव में किसी को स्वीकार नहीं किया। एक बार ट्रेन में ऐसा हो ही गया — मैं संन्यासी नहीं हुआ था, ज्योतिष का गुरु बनाया था; ट्रेन में खड़े होकर जा रहा था, गुरु जी बैठे थे, एक आदमी और बैठा था; बोले — रवि, तुम पता नहीं इनको कब तक गुरु कहोगे? मैंने कहा कि मैं इनको कुछ समझ के गुरु जी बोलता हूं — वो रहा तो कहूंगा, नहीं तो नहीं कहूंगा। हम इनके पास आए हैं तो कुछ लेने आए हैं; पहले मैं समझूंगा, पूरी तरह जांचूंगा। वो मेरी जांच नहीं — मैं उनकी जांच पहले करूंगा; मैं तो उस लायक हूं ही नहीं (कि वो मेरी जांच करें)। मैं आया हूं ना उसके पास, (तो) मैं अज्ञानता से उसे जांचूंगा, क्योंकि ज्ञान तो मेरे पास सही नहीं है ना।
अब देखो, जांच आप ही की हुई, बाबूलाल की नहीं हुई — क्योंकि बाबूलाल ने कभी कहा ही नहीं। अगर कोई कहता है ना कि बस आप ही आप, तभी जांच होती है। बाबूलाल को सीधा कह दिया गया कि जवाबदारी हम ले रहे हैं। अब उसे तो डर भी नहीं है। वो तो ये भी नहीं कहता — जैसे कल की बात थी, तो बाबूलाल ने कहा अगर मुझे अकेले ही रहना पड़ गया तो सही है, मैं रह लूंगा; इसके मुंह से दो बार आया। मैं कहता हूं कि अब तो उसके शरीर की चिंता भी चली गई है — बिना जांच किए, क्योंकि उसने कभी जताया ही नहीं कि हम आपको समर्पण करते हैं, हमें आत्मज्ञान के अलावा कुछ नहीं चाहिए; ऐसा कभी जताया ही नहीं, प्रश्न ही नहीं (किया)। आपने जताया, तो आपकी जांच हुई, उसमें आप फेल हो गईं। उसने जताया नहीं, उसको कह दिया गया — तू चिंता मत कर, तू पास है। उसने जताया नहीं, वो अपने कर्म से ही कहता है — वो कर रहा है; उसके कर्म को देखते हुए मैंने (उसके लिए) कहा, उसके काम को देख के कहा। इसकी परीक्षा भी नहीं हुई। ज्यादा कूदने वाले की परीक्षा होती है। कूदने वाले — चुप बैठने वाले नहीं — भाई, इसको ज्यादा जल्दी है, तो दे दो परीक्षा! तुझे बहुत जल्दी है? चल, आजा, पेपर तैयार रखा है, क्वेश्चन पेपर — ले बेटा, बैठ!
इसलिए यहां एक बुजुर्ग आए थे — एक माताजी आई थीं, उनके साथ उनके पति आए थे। तो हुआ क्या कि हम तो चार दिन का भी भोजन कर रहे थे, क्यों फेंकना; तो दूसरे दिन का चावल था, हमने कहा (उन्हें भी) देना। तो उन्होंने मना किया, लेकिन मेरा आदेश था कि सबको देना, सब खाएंगे; तो उन्होंने झगड़ा कर लिया, नाराज हो गए — बोले हम ऐसे-वैसे थोड़ी ना हैं, हम महका हुआ खाएंगे! भाई, हम भी खाते हैं यार, लेकिन हम भी ऐसे-वैसे नहीं — हम किसको बोलें? हम तो जरा सा मिट्टी लग जाए तो थाली ऐसे (फेंक) देते थे; पहले बर्तन मिट्टी से साफ होते थे, जरा सी मिट्टी लगी रहे तो थाली को यूं फेंक देते थे; और बासी तो मैं खाता नहीं था — आज चार दिन का खा रहा हूं, क्योंकि मुझे समाज के लिए काम करना है। मैं भी ऐसी जगह का था भाई, लेकिन स्थिति-परिस्थिति को देख के समझौता करना पड़ता है। लेकिन तुम तो मुझसे कह रहे हो — मैं किससे कहूं? तो सत्संग में बैठे तो (मैंने) पूछा — बाबा, ऐसा क्यों हुआ? बोले — हम चावल नहीं खाते। कोई बात नहीं भाई। पत्नी भी बोलीं — हम चावल नहीं खाते, चावल मुझे नुकसान करता है। बहुत अच्छी बात है भाई। पता नहीं क्या, दूसरे दिन भाव आया — दूध लेके आना — तो खीर बनवा दिया, काजू-किशमिश-बादाम-छुआरा-मुनक्का बढ़िया डाल के खीर बन गई, सब लोग प्रसादी ग्रहण किए। शाम को सत्संग में (पूछा) — बाबा, चावल तो खाते नहीं, (तो) खीर भी नहीं खाई होगी, खीर तो चावल से बनती है? बोले — नहीं, खीर तो खाई, बहुत अच्छी (थी)। बोला — क्यों, खीर में चावल नहीं था? बाबा, तुम तो कहे चावल आपको नुकसान करता है, तो खीर में भी तो चावल था! ये हालत है हमारी। (बासी नहीं खाना था, बहाना लगा रहे थे —) कुछ ना कुछ तो बोल लेंगे ना। तो परीक्षा तो देनी पड़ी।
तो परीक्षा तो देनी ही पड़ेगी ना भाई। ये रास्ता आसान नहीं है। परीक्षा देनी ही पड़ेगी — फेल होना पड़ेगा, पास होना पड़ेगा; ऐसे ही प्रयास करते रहना पड़ेगा, अंत तक। (साधिका ने कहा, इसे पीएचडी की तरह लगाएं तो कुछ होता है —) ये तो आखिरी है। आखिरी जगह आप खड़े हो — आपको लगता नहीं क्या? ये आखिरी जगह है। ये पार कर गए, तो कर गए; फिर आपको इस सृष्टि में किसी से कुछ पूछने की जरूरत नहीं पड़ेगी। (साधिका ने कहा, अंत तक यहां रहना है, कुछ भी होने दो —) लेकिन किसके लिए — आत्मज्ञान के लिए, या शरीर की सेवा के लिए? वो तो (फॉर्म) भरवा दिया! (साधिका ने कहा, शरीर का इतना लगाव है, मुझे पता नहीं था —) जो हो गया, हो गया; (हां,) अब शरीर की फिक्र थोड़ी ना है, फॉर्म तो भरवा दिया गया। (कहती थीं) चाहे शरीर अभी चला जाए — नॉर्मल रैंडम में कह देते हैं ना कि हमें शरीर से क्या मतलब — (पर हालात से ही पता चलता है)। ये बरगद के पेड़ के पीछे चुपचाप बैठ जाते, तो (स्तर) पता चलता क्या? नहीं चलता।
अब जैसे गोयल जी हैं — तो गोयल जी ने कहा कि मैं जांचूंगा; (किसी ने कुछ कहा था और कहा) अगर (वैसा) निकला तो मैं वापस (घर) चला जाऊंगा। तो मैंने कहा — गोयल जी, जितना उसने कहा है, वो तो कम ही बताया होगा, क्योंकि सामने वाला कम ही बताएगा ना, उसने कुछ ही देखा होगा — उससे भी ज्यादा है; अभी जाओ। क्योंकि गोयल जी को हम आत्मिक कल्याण में ही लगाना चाहते थे — काहे को मुझे जांच रहे हो? मैं क्यों बोला? क्योंकि यार, तुम इसमें लगो, अपने आप में लगो, क्या फालतू मुझे जांचोगे? मैं कह रहा हूं, जितना उसने कहा, उससे ज्यादा है; तुम्हें जाना है तो अभी जाओ। क्या फायदा, जांचने में ही दो-चार साल लग जाएं — क्योंकि जांचने में समय जाएगा ना आपका। उसने तो कम ही बताया होगा, क्योंकि सामने वाले को पूरी तरह थोड़ी ना पता है — कुछ ही देखा होगा, वो भी चोरी-चोरी देखा होगा। तो मैं तो कह रहा हूं उससे ज्यादा है, अब बोलो क्या करना है? तब उनको समझ में आया, बोले — नहीं, अब तो मार के भगाओगे तो भी नहीं जाऊंगा। तो बोला — हां, इसलिए कि आप लग जाओ यार अपने आप में, क्या जांचोगे मुझे? मुझसे पूछ लो — और मैं कह रहा हूं, जितना मेरे बारे में कोई बोल रहा है, उससे ज्यादा है। मुझसे भी मत पूछो, आप वहां से यहां तक भी मत आओ, क्योंकि उतना भी समय बर्बाद मत करो। जांच करके गिनीज बुक में नाम करना है? तो वही करवा लो गिनीज बुक में अपना नाम। मैं नहीं चाहता आपके जीवन का समय बर्बाद हो। मेरा कहना है — आप जिसके लिए आए हो, वो काम करो। मैंने आपको ज्ञान दिया है, (अपनी) पर्सनल लाइफ पे अधिकार नहीं दिया है, व्यक्तिगत जीवन पे अधिकार थोड़ी दिया है। आप भी तो ज्ञान के लिए आए हो ना, (मेरी) व्यक्तिगत जिंदगी (जांचने) थोड़ी आए हो — तो फिर जांचने की बात कहां से आ गई? (वो आए तो थे पूरी तरह रहने के लिए, अपने आत्मिक कल्याण के लिए) — आप इसे गहराई से समझिए कि हम दो चीजों को लेके आए — पूरी तरह रहने भी आए अपने आत्मिक कल्याण के लिए, लेकिन अब ये काम पीछे चला गया, और जांचना आगे चला गया, जांच पहले (हो गई)। तो मैं इसलिए आपको बोला कि जितना उसने बोला, उससे ज्यादा है — क्योंकि आप मुझे कभी नहीं जांच सकते। (एक दिन ये भी मुझे देख रही थीं) — मैंने फील किया, उस जांचने में जिंदगी चली जाएगी। अभी तो (आप) जांच ही नहीं पा रहे हो कि हम कितने फंसे हैं — आप अपने साथ रहते हो, फिर भी — तो आप सामने वाले को कैसे जांचोगे? वो भी आपसे योग्य है; वो भी अयोग्य होता, तो एक बार प्रयास भी करते। आप जिसके चरणों में माथा टेक दिए, उसको क्या जांचोगे? उससे तो लाभ ले सकते हो। ये नासमझी कितना गिराती है — बहुत ज्यादा गिराती है।
एक जरा सी नासमझी ने 12 साल मेहनत करवाई — गुरु ने तो पहले स्वीकार कर लिया था, (फिर) 'अब गुरु मुझे स्वीकार कर ले बस' — 12 साल लग गए। क्योंकि एक बार वो स्वीकार किया और अस्वीकार किया, तो फिर आप ये ना समझना कि वो (फिर से आसानी से) स्वीकार कर लेगा। ये छोटी गलती नहीं है। गलती भी छोटी-बड़ी नहीं होती है — गलती गलती है, और पूरा गिरा देती है हमें। इसलिए हमने आपके भ्रम को तुरंत तोड़ा। अगर मैं कहूंगा 'जांचो', तब तो इनकी जिंदगी जांचने में लग जाएगी, और ये जांच नहीं पाएंगे, ये मेरे बारे में जांच ही नहीं पाएंगे। तो मैंने इनसे कह दिया कि जितना तुमने सुना है, उससे ज्यादा है, अभी जाओ — इसलिए कि जांचने में समय ना चला जाए। अगर मैं उस पे नहीं बोलता, तब तो जांचने में ही आपकी बुद्धि लगी रहती, आपकी जांचने में ही ताकत लगती, खत्म हो जाती। जांचते-जांचते मिलता तो कुछ नहीं, और आपकी जिंदगी तो चली जाती। और मिलता भी, तो आप क्या करते उसका? जिसको जांचने आए ही हो, वो मिल भी जाता, तो आपको क्या लाभ मिलता? दोनों स्थिति में — चाहे मिलता, चाहे नहीं मिलता — जिंदगी बर्बाद हो जाती। मैं चाहता था कि आपका बचा हुआ समय बर्बाद ना हो। तो मैंने कहा कि यार, उसने तो कम बताया है, उससे ज्यादा है। अब बताओ — तब आपकी जांचने की इच्छा वहीं पे खत्म हो गई। (लेकिन) जितनी गलती है, उसका दंड तो ठोकना पड़ेगा — वो तो मैंने उसी समय खत्म कर दिया। मैं अस्वीकार करता, तो आपकी ताकत पूरी जिंदगी जांचने में लग जाती। आप इसे गहराई से समझिए — जांच तो आप पाते नहीं, लेकिन जांचने में जिंदगी लगती है, क्योंकि जब तक नहीं जानते, जा भी नहीं पाते — (मन कहता है) उसने जो कहा था, वो सही तो होगा, लेकिन पक्का अभी नहीं हुआ।
(साधिका ने कहा, खत्म तो हो गया, लेकिन पहले वाला भाव तो नहीं रहा, वो तो भारी नुकसान है —) क्या आपको लगता है कि बुल्ले शाह ने 12 साल तक इंतजार किया, तो वो गुरु इंतजार नहीं किया होगा? क्योंकि उसका प्रेम था। गुरु भी तड़पता है। आप तो कह सकते हो (अपनी बात), गुरु किससे कहे? आप लोगों ने तो मुझसे ही हामी भरवा ली — हम किससे हामी भरवाएं? आपको (अपना) जीवन दिखता है, ये जीवन नहीं दिखता — यही तो गड़बड़ है ना। आप ये मत समझना कि (बुल्ले शाह ने) 12 साल मेहनत किया; कहीं ना कहीं गुरु ने भी 12 साल इंतजार किया, क्योंकि उसने उससे प्रेम किया था, उसकी योग्यता को देख के। लेकिन गुरु किसी से (कह) नहीं सकता, गुरु प्रयास भी नहीं कर सकता, क्योंकि प्रयास से मुक्त हो चुका है — वो सिर्फ इंतजार करता है। छोटी-मोटी गलती नहीं होती है, गोयल जी, जिंदगी में। इसीलिए मैं कहता हूं, 99 पे ये आदमी गिर जाता है। इसलिए मैंने आपसे कहा — हर वक्त सचेत रहो, हर वक्त, हर क्षण। वही मूल तक पहुंच सकता है। एक सेकंड के चौथे भाग में (गिर) चले — सेकंड भी ज्यादा है। एक विचार ऐसा आया, तो उसकी तो कोई मेजरिंग भी नहीं कर सकता। और गिराने वाला कौन? आप खुद कह रहे हो सामने वाला डिप्रेशन में है। देखिए जरा, हम किसके द्वारा गिर रहे हैं — मुझसे भी उसका स्तर नीचे है; हम उसे समझाने गए थे, उसने मुझे ही समझा के गिरा दिया। हम गए थे उसको समझाने कि हमारे समझाने से उसका स्तर उठ जाएगा, उसने मुझे ही लपेट लिया — तो मेरा तो कोई लेवल ही नहीं है। एक मानसिक रुग्णता वाला भी मुझ पर काम कर गया — समझिए इस बात को।
जैसे एक बालक दीया लेके जा रहा था, तो (किसी ने) फूंक मारी, बुझ गया; बोले — बेटा, कहां गया? वो बेटे को उलझाना चाहते थे। (बालक) बोला — जहां से आया था, वहीं चला गया। बालक तो चला गया, बोल के, (लेकिन) ये जिंदगी भर उलझ गए — यार, गया कहां, आया कहां से? किसलिए निकले थे, वो हुआ ही नहीं; जिंदगी भर इसी खोज में लगे रहे कि आखिर ये उजाला गया कहां। ज्यादातर यही होता है। और सामने वाले को आप देख रहे थे, हम कितना डांट रहे थे, कितना उसे झकझोर रहे थे। ये छोटी गलती थोड़ी ना होती है — आपको लगती है जरा सी गलती; जिसलिए मैं निकला था, (वो) होने ही वाला था, (और) हम हट गए।
(वो भाव लौटने में कितना समय लगेगा —) वो तो तुम्हारे ऊपर अब है, उसके ऊपर थोड़ी ना है; अब तो तुम्हारे ऊपर है, क्योंकि तुमने तोड़ा है ना, अब तुम जोड़ोगे। (अब मैं भागा हूं तो मुझे आना पड़ेगा —) हां, वो तो बैठा है, उसका फिर इंतजार चालू; वो तो इंतजार में ही है भाई। (बल्कि उसकी मेहनत पे पानी फेर दिया —) वो तो फेर दिया। यही तो बात है कि वो जो मेहनत करे, (अगर) तुम उस लायक नहीं होते, तो बात ही नहीं होती। कितने लोग यहां से — हजारों लोग — चले गए, रात को 12 बजे भगा दिया; उनकी चर्चा मैं कभी करता हूं क्या? उस लायक थे ही नहीं, तो उनकी क्या चर्चा करना? चर्चा उसकी होती है, अगर वो कुछ लायक है, उसमें संभावना दिखती है — तब उसकी छोटी-छोटी गलतियों पर ध्यान दिया जाता है। वो छोटी गलती नहीं है, वो आपको (छोटी) लग रही है। और (जो) लायक नहीं है, तो उसकी बड़ी गलती पे भी ध्यान नहीं दिया — जा यार, तू लायक तो है ही नहीं, तेरा तो कुछ हो ही नहीं सकता, जा पहले घूम ले। जिसमें पूरी तरह संभावना दिखती है ना, उसे ही पूरी तरह जांचा जाता है — उसकी जरा सी भी गलती नहीं (चलती), क्योंकि वही छोटी सी गलती उसे रोक देती है। उसे लग रही है छोटी सी है, लेकिन ये छोटी सी गलती तेरी नैया डुबा दी। उसकी 99 (गलतियां) थीं, तेरी एक छोटी सी थी — लेकिन तुम उससे मिल गए। वो जल्दी (डूबेगा), तुम लेट; (पर) एक छोटी सी गलती से आपकी नैया वहीं डूबी, जहां उसकी थी। आप इसे छोटी सी गलती ना समझो — नैया तो उसके साथ ही डूबेगी ना; उसकी आगे, तुम्हारी पीछे, लेकिन दोनों एक ही जगह डूबोगे — पाताल में तो मिल ही लोगे। इसलिए भाई, एक छोटा सा भी छेद ना रहे, छोटी सी भी गलती की संभावना ना रहे।
मैं आपसे बोलता हूं ना कि मुझसे गलती हो ही नहीं (सकती) — मैं तो कहता हूं, वो चाहेगा तो भी नहीं हो सकती। क्योंकि अगर वो चाहेगा, तो उसकी गलती — मेरी क्या? मैं नहीं कर सकता। मैं तो अपने आप को इतना कहता हूं कि अगर परम सत्ता चाहेगी, तो भी गलती नहीं होगी। और वो चाहेगा, तो फिर उसकी गलती वो भोगेगा; हमको भटकाने वाला भोगेगा। मैं नहीं भटकूंगा; लेकिन अगर भटका, तो तू भोगेगा। मैं गलती नहीं करूंगा — मैं यह जिम्मेदारी लेता हूं। मैं थोड़ी ना कहूंगा कि तू चाहेगा तो गलती हो जाएगी — कैसे तू चाहेगा यार, करता मैं हूं। जब पूरी स्वतंत्रता दी गई है, तो गलती होगी, नहीं होगी — मेरे बस में है, तेरे बस में नहीं; और मैं पूरी जिम्मेदारी लेता हूं, गलती हो ही नहीं सकती — सीधी सी बात है। फिर अगर आप कह रहे हो कि नहीं, वो (परमात्मा) करवा दिया — तो फिर अधिकार मुझे दिया ही नहीं गया, तो मैं गुलाम हूं, मेरा रिमोट ही किसी और का; फिर तो तू जवाबदार है, और तू भोग फिर — मैं क्यों भोगूं? तो भाई, पूरी जिम्मेदारी लो। अगर आपके द्वारा कुछ हो रहा है, तो जिम्मेदारी (आपकी)। अब तुम कहोगे — नहीं, (मैं) नहीं था, परमात्मा ने चाहा — उसको क्या पड़ी है यार? या तो कर्ता तुम हो, या तो वो — दो में से एक ही है। तुम कभी कहते हो कर्ता मैं हूं, कभी कहते हो वो है — यही तो बेईमानी है; एक तरफ नहीं होते। आप पूरी तरह जिम्मेदारी लो कि मैं अगर यहां पे हूं, मैं जिम्मेदारी लेता हूं, और मैं जहां भी पहुंचूंगा, उसकी जिम्मेदारी मैं लेता हूं — सीधी सी बात है। तब आपका ग्रोथ होगा। इसीलिए मैं कहता हूं, सचेत होकर — नींद में भी सचेत रहो, जागने में तो छोड़ दो। ये भाव रखो कि मुझे नींद में भी सचेत रहना है — जागने की बात छोड़ दो, सोने पे भी मैं सचेत रहूंगा — तब जाके जागने पे सचेत हो सकते हो।
आपने अपने शरीर की सुरक्षा की जवाबदारी मुझसे लिवाई, तो ये भी तो समझ है — क्या बिना समझ के लिवाई? ये बेईमानी वाली समझ है। तो समझ नहीं है क्या? पूरी जिंदगी की जवाबदारी लिवा ली कि सेवा आपके द्वारा होगी — ये बिना समझ के हो गया क्या? (साधिका ने कहा, शरीर के लिए भाव इतना गहरा है, ये अटैचमेंट पता नहीं था —) लेकिन इसमें भी समझ चाहिए; बिना समझ के आप ये भी नहीं बोल पातीं कि अटैचमेंट कड़ा है हमारा। चलिए, पता तो चला। इसीलिए तो कहा गया है कि जीवंत गुरु की शरण में रहो।
(शरीर-भाव से बाहर आने के लिए कैसा चिंतन करें —) आज पता चला; चिंतन तो अब आगे है — होगा चिंतन, वो खुद चिंतन होगा। अगर आज आपका टेस्ट हुआ है, तो आप उस टेस्ट के योग्य हुए, तब टेस्ट हुआ। तो (अपने आप में) पड़े रहने का मतलब है — अपनी तैयारी करते रहो।
एक पॉइंट पकड़िए आप लोग — उसने कहा कि अब काट के मत लिखिए, गुरु जी समझ जाएंगे। मैं यही कहना चाहता हूं, आप इस पॉइंट को पकड़िए — उन्होंने कहा कि मैं काट के लिख देता हूं, तो (बाबूलाल ने) ये शब्द कहा ना कि वो समझ जाएंगे, आप काटिए मत। (और) फॉर्मेट तो बहुत बाद में भरा था, उससे पहले (मैंने) बोल दिया था। एक संभावना इसकी दिखती है, तो मैंने बोल दिया कि (अगर ये) गया नहीं तो (पूरी जिम्मेदारी मेरी)। क्योंकि अगर मैं ये नहीं बोलूंगा, तो ये सोचेगा कि (जिम्मेदारी) ले ही ली, तो मैं जाके आता हूं, थोड़ा इधर-उधर घूम आता हूं। लेकिन (जिम्मेदारी) तब ली है, जब तू पूरी तरह इसी स्थिति में रहेगा।
विपरीत परिस्थितियां यहां भी बनीं — बाबूलाल के (फॉर्म में) भी, कि इन्होंने लिख दिया; तो इन्होंने कहा, नहीं, मुझे ये तो नहीं लिखवाना था; तो (लिखने वाले ने) कहा मैं काट के लिखता हूं; तो बोले — नहीं, काटो मत, गुरु जी समझ लेंगे। आप लोग नहीं समझ पाओगे, क्योंकि आप पढ़ रहे हो, लेकिन वो तो समझ लेंगे; मैं तो उनके लिए लिखवा रहा हूं, वो थोड़ी ना कागज की लिखाई पे ध्यान देंगे। मैं वही कह रहा हूं कि आप इसे गहराई से (समझिए) — इस पे मैंने पहले भी बात किया, अब भी बात कर रहा हूं, इसमें बहुत गहराई है — कि लिख तो रहा था, वो लिखा गया, लेकिन सामने वाला काटने के लिए भी तैयार है, पेपर भी दूसरा मिल जाता; लेकिन उसने कहा — अब तो लिखा गया है, लेकिन इस लिखाई का कोई मतलब नहीं है; जहां पहुंचना है, पहुंच गया, वो समझ लेंगे; जिसके लिए मैं लिखवा रहा हूं, वो क्या लिखा ये नहीं देखेगा, मेरे भाव क्या हैं वो देख लेगा। इतना तो उसका स्तर है ही। और उसके पहले ही मैंने फाइनल कर दिया था। तो इस भाव में अगर कोई गुरु के पास है, तो कल्याण पक्का है, दुनिया की कोई ताकत नहीं रोक सकती। ये भाव बनाए रखें, क्योंकि इस भाव को गिराने वाले भी लोग बहुत आएंगे। (भाव पक्का है या नहीं,) ये तो परिस्थितियां पैदा करेंगी, पता करेंगी। जैसे इसके भाव को (भी) एक गिराने वाला था — उसने भी इसके भाव को तोड़ना चाहा (कहा कि गुरु जी को आत्मज्ञान नहीं है), लेकिन नहीं टूटा।
(बाबूलाल ने उसे यह समझाने की कोशिश नहीं की कि आत्मज्ञान है कि नहीं, बल्कि कहा कि गुरु जी तुम्हें तुम्हारे बाप से भी ज्यादा चाहते हैं, जाओगे तो पछताओगे —) तो जिसने इसको भटकाया, उसी को (इसने) समझा दिया। ये काम ये (दूसरे) भी कर सकते थे। और अगर आज समाज के दृष्टिकोण से आप लोगों से पूछा जाए, तो कहोगे कि आपकी समझ ज्यादा है, इसकी कम है — नहीं। (बाहरी दृष्टिकोण से देखोगे तो कहोगे इनकी समझ ज्यादा, इसकी कम — लेकिन इसकी समझ इसके काम की है।)
यहां जितनी जरूरत है आपकी जिंदगी में, दुनिया में कहीं भी रहो, वो यहां पे है; यहां कमी कुछ भी नहीं है। आपके घर पर जितनी भी व्यवस्था है, ज्यादा से ज्यादा मान के लिए है। उपयोग आप जितना यहां करते हो — इतना चार दिन में आपने किया है — वही घर पर भी करते हो; बस मान के चक्कर में आपके बिस्तर बदल गए हैं, आपके कपड़े बदल गए हैं, बोलचाल बदल गई है। यहां कम नहीं है, ना तो ज्यादा है — यहां जितनी जरूरत है, उतना है, और इतनी ही जीवन की जरूरत है। बाकी जितनी भी जरूरतें आपने बनाई हैं, वो सिर्फ आपके मान के चक्कर में हैं। जरूरत सिर्फ आपको इतनी ही है। अगर कम होता, तो फिर आपको (ये) अनुभव नहीं होता, वो कमी आप बताते। चार दिन रहे, कभी आपको लगा कि शरीर में कोई कमजोरी आई? वहां से ज्यादा (ऊर्जा की) पूर्ति आपको यहां (हुई), एनर्जेटिक (रहे) — मैं आपको बताता हूं क्यों: क्योंकि आपके शरीर को जितनी ऊर्जा चाहिए, आपको मिल जाती है चना-मूंग से और यहां के भोजन से। अब घर पर आप क्या करते थे? अपने शरीर में ज्यादा भोजन डालते थे, तो वो पचाने में ही थक जाता था, पचाने में ही ऊर्जा खर्च हो जाती थी, तो शरीर पूरा थक जाता था। यहां उतना दिया जाता है, जितनी शरीर को ऊर्जा चाहिए, (ताकि) आप सही तरीके से उसका उपयोग कर पाएं। जहां आप ज्यादा समझ रहे हो, कमी वहां है, लेकिन वो आप देख नहीं पा रहे हो, और वह व्यवस्था आपको रोगी बना रही है। ये व्यवस्था आपको साधक बनाएगी, ये व्यवस्था आपको जिज्ञासु बनाएगी, ये व्यवस्था आपका आत्मिक कल्याण करेगी — इस व्यवस्था में आप कुछ कर पाओगे।
मैं आपसे पूछ रहा हूं — आप चार दिन यहां रहे, जैसा अनुभव आपने यहां किया, क्या आप घर पर कर सकते हो? (नहीं।) वहां व्यवस्था यहां से ज्यादा है — तो व्यवस्था में अनुभव नहीं होता है। तो अगर हमने कुछ बनाया है, कुछ समझ के बनाया है। मैं इसीलिए कहता हूं कि आप ही लोगों के लिए बनाया गया है। जब भी आपको जीवन में मौका मिले, कम से कम एक महीना तो 12 महीने में अपने आप को दो; ज्यादा मिले तो भी दो; और आकर इस जगह का उपयोग करो, और बस यहां के नियम में जियो। नियम आपको सब समझ में आ जाएंगे, अगर मैं नहीं भी हूं — क्योंकि आने वाले समय में ये शरीर मेरा नहीं रहेगा। मैंने जितना ये नियम बनाया है, बस उसमें मिलावट ना हो — मिलावट ना करो। मैं जितना बचाया हूं, अगर उसमें आप रहोगे, तो उस रहने में (ही) आत्मिक (कल्याण होगा) — जैसे आपने अलग से कुछ क्रिया थोड़ी नहीं किया, आप बस इस नियम में रहे ना; हमने आपको आते ही सचेत कर दिया। यहां का जैसा सिस्टम बनाया गया है, अगर आप उसमें रह गए, तो इसमें रहने में आत्मिक कल्याण हो जाएगा — पूरी तरह, जब 101% रहोगे तब। अगर आप कहो 99 हूं, एक नहीं, तो आप फिर हो ही नहीं। तो जब भी मौका मिले, जब भी आपको छुट्टी मिले, ये जगह तो है ही, जगह कहीं जाने वाली नहीं है, मैं रहूं या ना रहूं। आप आके नियम तो समझ भी लिए हो, किसी से पूछने की जरूरत नहीं है, तो आप इसी में रहना। यहां का कोई मालिक भी नहीं है — यहां का कोई मालिक दिखा आपको? यहां का सिस्टम ही मालिक है। अगर उस सिस्टम में रहे, तो आप ही मालिक हो; और उस सिस्टम में नहीं रहे, तो आप निकाल दिए जाओगे — मतलब आप खुद अपने आप को निकाल दोगे, आपको खुद समझ में आ जाएगा कि मैं यहां रहने लायक नहीं हूं।
प्रयास करो। कोई प्रश्न आता है तो पूछना। (और मोबाइल —) यहां तो पूरी तरह आपको रहना है; बोल रहे हो, तो पूरी तरह मोबाइल बंद ही कर दो। कोई बात नहीं, लगे रहो। (गलतियां तो हुईं —) आप लोग जांचने लग जाते हो ना — वो पूरे वो वाले संसार से उठ के इधर आए, तो उसी जैसा इधर देख रहे हैं; वह समझ नहीं पा रहे हैं कि ये कुछ अलग है। जांचने में जिंदगी लगा दोगे। हम सोच रहे (कि) जल्दी-जल्दी हो, और लोग जांचने में जीवन लगा दे रहे हैं। जब तुमने भाव बनाया कि गुरु जी मुझे गले लगाएं, (और) लगाया था — उसी समय बात ही खत्म हो गई; तो उसके बाद क्या जांचना रे? कितना जांचोगे भाई? किसी को भी कितना (जांचोगे)? जब सीता जी को एक बार जांचा — ठीक है; दूसरी बार (जांचने लगे तो) बोलीं — माता, अब संभाल लो, क्योंकि अब ये इस लायक ही नहीं कि मैं बार-बार परीक्षा दूं; एक बार तो दिया, कितनी बार दूं? और ये (खुद) परीक्षा देते नहीं हैं, ये बस परीक्षा लेते हैं। तो चलो, इनको तो एक बार दे दिया अपनी पवित्रता का; फिर कह रहे हैं परीक्षा दो — ये खुद गंदे हैं, अब इनके साथ ही नहीं रहना है। पवित्र होने के बाद भी परीक्षा दी, लेकिन मैंने परीक्षा देने के बाद ये नहीं कहा कि तुम परीक्षा दो, क्योंकि मुझे मालूम है अपवित्र तुम हो। लेकिन कितनी बार दे भाई, कितनी बार लोगे? तो सीता माता ने कहा कि हे मां, तू संभाल ले, अब हो गया, अब इनके साथ नहीं रहना है, क्योंकि ये बस हर समय परीक्षा में खड़ा करते हैं। इनकी जिस मशीन से ये परीक्षा ले रहे हैं, वो इनकी मशीन (ही) गड़बड़ है; मशीन तो ठीक भी हो जाए, (ये) खुद ही गड़बड़ हैं। तो फिर क्या होता है? सामने वाला छोड़ देता है — कितना देगा? तुम खुद कह रहे हो कि हमने परीक्षा में तुम्हें पास किया, फिर तुम दूसरे दिन कह रहे हो परीक्षा दो — तो कल क्या किया था, कल कैसे पास किया? और जब पास ही कर दिया, तो फिर परीक्षा का (क्या)? तो हम अपना जीवन परीक्षा देने में ही लगा दें? अब परीक्षा तो दूर की बात — तुम मत दिखना।
(सामने वाला) थक जाता है, इसमें कोई दो राय नहीं। जब गोयल जी ने कह दिया कि भाई, मुझे सेवक के रूप में स्वीकार करो, उसके बाद तो (ये) रहना नहीं चाहिए था। और जब सामने वाले ने स्वीकार ही कर लिया, फिर बात ही खत्म हो गई। अब देख लो, उस समय हमारी आंख में आंसू आ गए थे — आपको पता था कि नहीं? (आवाज से) पता तो चल ही रहा होगा।
आप देखिए कि इनके गुरु ने इन्हें भेजा। तो फिर परीक्षा की बात ही खत्म हो गई, कि जिसकी शरण में मैं था, वही (मुझे) भेज रहा है। और उसका कितना भाव था कि आपका कल्याण हो — भेजने वाले का भाव कितना पवित्र था, कि मेरी क्षमता नहीं है, लेकिन अब मैं तुझे भेज दे रहा हूं, जा, तू तो कर अपना कल्याण। लेकिन (आप जैसे कह रहे हो कि) मैंने कसम खाई है कि अपना कल्याण तो होने नहीं दूंगा, कुछ भी हो जाए। बड़ा दुर्भाग्य है हमारा — कहां से कहां! जिसकी शरण में मैं था, जब उसने ही कह दिया 'जा', तो बात तो खत्म हो गई; लेकिन हमने कसम खाई है कि हम अपना कल्याण नहीं होने देंगे। मेरे भी कुछ कर्म हैं — कर्म हैं तभी तो मैं पहुंचा, कर्म हैं तभी इतना ईमानदार गुरु मिला कि मुझे आगे भेज दिया; कुछ तो उसने देखा, नहीं तो वो अटकाए रखता अपने पास; और उसने जहां भेजा, कुछ तो देख के भेजा होगा। लेकिन मैं कह रहा हूं — तुम भी चाहो। यहां दो लोग तुम्हारा कल्याण चाह रहे हैं — जिसने आपको भेजा, और जिसके पास भेजा; दो लोग तुम्हारे पीछे पड़े हैं। लेकिन तुम क्या कह रहे हो? मैंने खुद कसम खाई है — कल्याण तो नहीं होने दूंगा; आया जरूर कल्याण के लिए हूं, लेकिन कल्याण नहीं होने दूंगा।
(हमारी जीवात्मा कहां अटकी रहती है, कैसे निकले —) यही समझ के निकलोगे। मैं कह रहा हूं कि पूरी तरह बात करो ना, आधी-अधूरी क्यों करना? जब हम कह रहे हैं कि आपने मुझे सेवक रूप में स्वीकार किया, तो बात ही खत्म हो गई। जैसे मैंने अपने आपको सेवक रूप में रखा था, तो कोई मुझे पाखंडी बोला, तो भी मैं मुस्कुराता रहा; कोई कुछ भी बोला — एक साल तक का टाइम दे दिया था। अब आके बोले, तब तो तुरंत भगा देंगे — चल हट; जब (कोई) पाखंडी (कहता) आया, कि चल यहां से हट, अब थोड़ी मौका देंगे। जिज्ञासुओं के लिए काम करेंगे ना, (या) निकलने वालों के लिए काम करेंगे? एक साल तक सबको समय दिया — किसी ने गाली दी, उसको भी समय दिया, चाहे जैसे भी आए, समय देता गया। लेकिन अब मैं उससे मुक्त हो गया। मैंने ही उसमें (अपने आप को) रखा था, और मैंने ही अपने आप को मुक्त कराया। अब जो जिज्ञासु नहीं है, तो चलो हटो, चलो जाओ। तो आप देखिए, मैं आपको भी दिखा रहा हूं — आप भी देखिए कि गुरु (आपको) भेज रहा है, और जो आप कहते हैं, 99 वाले दरवाजे तक तो पहुंच जाते हो — (उसने) फाइनल जगह भेज दिया।
अगर समझ के कर रहा है, तभी तो हो रहा है। अगर समझ के नहीं करता, तो किसी की ताकत नहीं (कि) करवा दे।
(जब) सेवक रूप में आपने उसे स्वीकार करवा लिया, तो बात ही खत्म हो गई। सेवक तो (वही है कि) वो अब जैसा कहेगा, वैसा करूं। (साधिका ने कहा कि उस समय उनका भाव सच्चा था —) सच्चा (भाव) आपने बनाया था; सच्चा था या नहीं था, वो तो विपरीत परिस्थितियों में पता चलता है। अगर सच्चा होता, तो परीक्षा में पास हो जाते। नाम लिखाने से थोड़ी पता चल जाता है। ये तो विषम परिस्थिति ही बता रही है कि (आपका) लेवल क्या है। जब विपरीत परिस्थितियां बनती हैं, तब पता चलता है आपकी स्थिति का।
मैं तो कह रहा हूं, अपना कल्याण करो — कैसे भी, अपने आप को निकालो, और जिस लिए गए हो, वही काम करो। हम बस कहीं (और) लग जाते हैं ना। जिस लिए गए हो, वही काम करो।
राजा जनक की एक कहानी है — एक महात्मा थे, उनके पुत्र ने 12 साल तक तप किया; तो आए, तब 12 साल का अहंकार (था); बोले — पिताजी, किसको गुरु बनाएं, कोई है इस संसार में? बोले — हैं, राजा जनक हैं, विदेह हैं, जाओ उन्हें बनाओ। तो जैसे ही पहुंचते हैं, दरबार में बोलते हैं, तो कक्ष के बाहर बैठा देते हैं। तो देखते ही कहता है — अरे यार, मैं किस भोगी के पास आ गया! 12 साल तपस्या किया, पिताजी ने किसके पास भेज दिया! लेकिन पिताजी ने कहा है कि जाओ, वो समझा देंगे — तो पिताजी की बात तो माननी पड़ेगी; लेकिन अंदर से खीज आ रही थी कि 12 साल का तप है, मैं ब्रह्मचारी, ये कहां भेज दिया मुझे। कुछ देर बाद राजा जनक ने अंदर बुलाया — आओ। और जैसे ही अंदर आके बैठा, (खबर आई कि) राज्य में आग लग गई। बोले — ठीक है, बुझाओ, कोई बात (नहीं)। फिर कुछ देर बाद (खबर) आई कि आपके कमरे में भी आग लग चुकी है। (इतने में वो पुत्र) तुरंत उठा; (जनक ने) गट्टा पकड़ा, बोले — कहां जा रहे हो? बोला — लुटिया-कमंडल बाहर है, जल (ना) जाए। तो (हाथ) छोड़ा, बोले — जा, 12 साल और (तप कर); लुटिया-कमंडल से भी प्राण छूटे नहीं, अभी लुटिया-कमंडल में अटका है। तो समझ रहे हो? हमारी हालत बहुत विचित्र है। हम जिसके लिए गए हैं, वो क्यों नहीं दिखता मुझे? हमें तो सिर्फ उतना ही देखना चाहिए।
पांचों पांडवों से (परीक्षा में) — सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर अर्जुन हुए, कैसे हुए? चिड़िया बनाई गई, तो पूछा कि भाई, क्या दिख रहा है? (सबको) ये दिख रहा है, वो दिख रहा है; तो (अर्जुन ने) कहा कि आंख दिख रही है; तो बोले — मार दो, हो गया। सबको इधर-उधर (दिखा), तुम्हें अपना लक्ष्य दिखा; और लोगों को क्या दिखा — ये दिखा, वो दिखा, बाद में आंख दिखी — लक्ष्य बाद में दिखा, तो लक्ष्य तक पहुंचोगे कहां? तुम्हें तो लक्ष्य बाद में दिख रहा है, पहले तो तुम्हें बहुत कुछ जांचना है। तो भैया, जिसको लक्ष्य सीधा दिखता है, और लक्ष्य के अलावा कुछ नहीं दिखता, वही लक्ष्य पे पहुंचता है। आपके पास अनेक ऑप्शन हैं। हम तो जिसके लिए आए थे, वो कर ही नहीं रहे हैं, कर कुछ और रहे हैं — इसी में हमने अपने आप को उलझाया है। जाना कहीं और है, पता कहीं और का पूछ रहे हैं; मुझे खुद नहीं पता मुझे जाना कहां है। तुम अपनी ऊर्जा कहां लगाओ — ये ऊर्जा है ना, आप अनेक जगह लगाओगे, तो आप जिसके लिए आए थे, वो कर ही नहीं रहे होगे।
जैसे उस व्यक्ति ने इनसे कहा कि उन्हें (गुरु जी को) आत्मज्ञान नहीं हुआ — वो तो मुझसे भी पूछा था — तो भैया, तू तो आत्मज्ञान के लिए आया ही नहीं था। तूने तो कहा — ना मुझे ज्ञान चाहिए, ना धन चाहिए, ना दौलत चाहिए, मुझे तो बस आपकी सेवा करनी है और आपकी सुरक्षा करनी है। उस दिन वो कार में इंदौर जाने वाला थोड़ी ना था — वो तो इसलिए गया कि (कोई) मुझे (गुरु जी को) कुछ ना कर दे, मार ना दे। हम बोले कि ये गाड़ी (वाले) चले जाएंगे, तुम मत जाओ; तो कुछ देर बाद कहा — नहीं, मैं चल रहा हूं; क्यों चल रहे हो? (कि) सुरक्षा के लिए। तो अब वो सुरक्षा करने वाला ही शत्रु बन बैठा — सबसे तगड़ा शत्रु दुनिया में वही है; हमारे 800 से ऊपर वीडियो को इसने इधर से उधर कर दिया। और सबसे ज्यादा वो (सच्चाई) दिखाता था, इसलिए मैं कहता था कि सच्चाई तो उसके अंदर है; लेकिन जब उसने खुद कहा कि मैं आपको बोलता था कि आप में ईमानदारी-पवित्रता है — तो उसको मैं कहता था कि उसके अंदर सच्चाई है, लेकिन ईमानदार मैं (नहीं कहता था)। सच-झूठ हमेशा बदलता रहता है; अगर कोई सच्चाई पे है, तो वो झूठ पे भी चल (सकता है)। आज देखो, सबसे ज्यादा नुकसान वही पहुंचा रहा है — लेकिन मुझे थोड़ी पहुंचा पाएगा; तू समाज को पहुंचा रहा है, तो उसका रिटर्न तुझे मिलेगा। क्योंकि वीडियो से समाज का कल्याण हो रहा था — आज जितने लोग यहां बैठे हैं, वो वीडियो से ही बैठे हैं ना। समाज का कितना नुकसान कर रहा है, तो लाखों-करोड़ों की बद्दुआ तुझे खा डालेगी, तुम्हें बर्बाद कर देगी। तुम्हें समझ में ही नहीं आ रहा कि मैं क्या कर रहा हूं। तो (जिस) व्यक्ति ने कहा कि तू बहुत पछताएगा — तू पछताने वाला काम भी कर रहा है।
₹100 का तो मैं मंजन मंगाता था उन लोगों के लिए; चप्पल तक मंगा के दिया हूं — जब यहां से गया, तो आश्रम की चप्पल पहन के गया, लास्ट के दिन भी आश्रम की चप्पल यूज़ करके गया।
जितने लोग सपोर्ट कर रहे हैं, वो भी भोगेंगे। गलत को सपोर्ट कर रहे हो ना — पता होते हुए भी। आप अगर एक चोर को सपोर्ट करोगे, तो जितने लोग सपोर्ट करेंगे, सब पकड़े जाएंगे, जिस दिन चोर पकड़ा जाएगा। अब ऐसे लोगों का क्या होगा? और जब ऐसे लोग दुर्गति में जाएंगे, तो कुछ लोग कहते हैं — अरे यार, ये भोग रहे हैं, इन्हें बचाओ। अरे, उसने किया क्या है, उसके पीछे जरा वो देखो! (जो) उनकी हेल्प करेगा ना, वो उसी को डसेगा — इस समय वो ऐसे हैं — हेल्प करने वाले को डसने दो; ये पीछे कितना गंदा करके आए हैं। तो भैया, इनमें फंसो ही मत। अपने-अपने कर्म (हैं) — निकल लो। अपने-अपने कर्म भोग रहे हैं; जिसने जैसा किया, वो वैसी जगह (जाएगा)।
मैं कह रहा हूं, जितना भी बिखेरा, कम से कम (उसे) छोड़ना तो चालू करो। आगे से ना (बिखेरो) — कहीं ना कहीं शुरुआत तो करो। ऐसा ना हो कि सोचते रहो और फैलाते रहो। भाई, रुक तो जाओ; रुकने से भी कम से कम आगे का तो नहीं फैलेगा। (हम तो फैलाने के आदी हो गए —) रुक गए तो छूटने लगेगा ना। रुक गए तो आगे का तो कम से कम नहीं होगा। जैसे एक वृक्ष है — उसमें कली से फूल बनता है, फूल से फिर फल बन जाता है, और फल जैसे ही अपने आकार में आता है, जब उसका बढ़ना रुक गया, फिर वहां से खत्म होना चालू होता है, और एक दिन वो खत्म हो जाता है। तुम रुक तो जाओ — रुक गए तो अपने आप में आने लगे। प्रकृति का नियम यही है — पहले वही फल बढ़ रहा था ना, उसका बढ़ना रुक गया, तो फिर वो नाश की तरफ बढ़ने लगा। तो कहने का मतलब — आप बस रुक जाओ; रुकना आपको है। क्योंकि फल का तो अंत है, लेकिन आप जहां चल रहे हो, उसका अंत ही नहीं है — भवसागर है; क्योंकि आप परिवर्तनशील में चल रहे हो, तो आप चलते रहो, उसका अंत नहीं है, (ना) आदि (है, ना अंत)। (हम वही चक्कर काटते रहते हैं —) आप रुक गए, तो फिर आप वापस आने लगे। आप जहां चल रहे हो, वहां आदि-अंत है ही नहीं, तो चलते रहो (तो चलते ही रहोगे)। मूल (में आने के लिए) आपको रुकना है। रुक गए, इसका मतलब अपने आप में होने लगे। अब अपने आप में होने तो लगे — शांति होगी, (और) छूटने का घुटन होगा। पूर्णता से अपने आप में तब हो पाओगे, जब पूरी तरह छूट जाओगे — तब पूर्णता का एहसास होगा। जब तक कहीं लगे हो, कहीं ना कहीं आप अपूर्ण हो। समझ तो बढ़ती जाएगी, शांति भी बढ़ती जाएगी, (और) एक तरफ छूटने का घुटन भी बढ़ेगा — दोनों साथ। कोई चीज निकल रही है, तो वो खाली (जगह) कोई भर भी तो रहा है ना — एक तरफ से वो छूट रहा है, तो एक तरफ आप अपने आप में आ भी तो रहे हो; ऊर्जा आप में आ रही है ना, क्योंकि ऊर्जा कहीं लग रही थी, वहां से हट गई, तो अपने आप में हो गई। कहीं ना कहीं आप शांति भी महसूस कर रहे हो, कहीं ना कहीं अशांति भी महसूस कर रहे हो — दोनों काम साथ ही।
तो लगे रहो। कब तक? जब तक उपलब्धि ना हो जाए। दिन, महीना, साल कुछ मत गिनो। ये गिन रहे हो, इसका मतलब आपको जाना है क्या? अगर हम दिन गिन रहे हैं, साल गिन रहे हैं कि यार, इतने साल तो हो गए, मुझे इतने महीने आए हो गए, नहीं हुआ — जब इसका समय निश्चित होता, तब आप समय गिनते तो ठीक था। यहां तो ये निश्चित है कि आप छोड़ोगे और हो जाएगा — छूटा कि हुआ। तो उसमें ताकत लगाओ; दिन क्यों गिन रहे हो, महीना क्यों गिन रहे हो? हमें तो अपनी पूरी ताकत अपने आप को छुड़ाने में लगानी चाहिए, क्योंकि छूटेगा तब होगा। महीना-दिन से कोई मतलब ही नहीं है। हमें तो मतलब सिर्फ इतना होना चाहिए कि छूटा तो हुआ; नहीं हुआ, तो छूटा नहीं; छुड़ाने के लिए काम करना है, बस, बात खत्म। इतना ईमानदार मुझे होना पड़ेगा, तब इस यात्रा में हम आगे जा पाएंगे; नहीं तो ऐसे तीन महीने गिनते-गिनते — चलो यार, नहीं कुछ हो रहा है। इसमें दिन-महीना, यह सब कुछ मत गिनो। इसमें बस इतना रखो कि भैया, छूटेगा तो हो जाएगा; पूरी तरह छूटेगा, हो जाएगा; हुआ नहीं, तो छूटा नहीं — बस इतनी सी बात है। अब देखो कहां फंसे हो — खोजते रहो, खोजते रहो, खोजते रहो। नहीं दिख रहा है, समझ में नहीं आ रहा — इसका मतलब फंसे तो पक्का।
(जिस दिन थक जाओगे, क्या गुरु दिखा देगा —) गुरु ऐसे नहीं दिखाने वाले। तुम जब खोजते रहोगे, खोजते रहोगे, थकने के बाद जब गिरने लगोगे, (तब हाथ पकड़ेगा)। ऐसे नहीं कि मैं कहां फंसी हूं, (वो) बता दे — क्यों बता दे? फंसाया तुमने, तुम बताओ तुम कहां फंसी हो — क्योंकि तभी तुम्हारी ऊर्जा जागृत होगी ना। फंसे तुम हो, तो तुम्हें क्यों मालूम नहीं है? तुम खोज करो ना, मेहनत करो — एक दिन लगे, चाहे कई साल लगें — आप खोजो ना। कहीं ना कहीं तो हम फंसे हैं; नहीं फंसे होते, तो उपलब्ध हो जाते, एकदम से। इस बात को समझो ना। मेरा काम है खोजने का, मैं खोजता रहूं — इतनी ईमानदारी मुझमें होनी चाहिए; (ये नहीं कि) आप ही बता दो। वो क्यों बता देगा? बता भी देगा, तो वो वैल्यू नहीं होगी मुझे उसकी, मुझे शक रहेगा कि वही बात सही है (या नहीं)। अगर मैं इनको बताता कि आप शरीर में फंसी हो, तो क्या आप मान लेतीं? अगर मैंने आज, दो दिन पहले कहा होता, तो आप कहतीं — नहीं; और आप (बाकी लोग) ही कह देते — यार, इसको शरीर की फिक्र ही नहीं है, जैसा दो वैसा खा लेती है, इसने तो कभी शरीर का ख्याल ही नहीं रखा, ये कब सोती है, कब जागती है। जिस हिसाब से आप इनको देख रहे हो, तो कहते — इसको तो शरीर की फिक्र नहीं है। लेकिन इसको सबसे ज्यादा इसके शरीर की फिक्र है — ये समझ ही नहीं। (अब) निकला, कम से कम पता चला, ये भी अच्छी बात है। पता तो चलेगा ही चलेगा, सब पता चल जाएगा, कुछ बचेगा थोड़ी ना।
चटाई-कंबल इस चीज का प्रतीक (समझा गया) कि इनको अपने शरीर से मोह ही नहीं है। (लेकिन) इन्हें गद्दा पसंद आता, रजाई आती, और ये चटाई पे आ जातीं, तब (त्याग होता)। इन्होंने कहा मुझे चटाई-कंबल पसंद आता है; और ये गद्दे के लायक हैं, इनकी योग्यता है — तो ये इनका त्याग नहीं है। त्याग तो तब होता, जब गद्दा पसंद आता, और वो त्याग करके चटाई पे आ जातीं — तब इसको त्याग कहते। ये तो इन्हें पसंद ही है, ये त्याग थोड़ी ना है। आप इसे त्याग मत समझिए। गद्दा इन्हें पसंद ही नहीं है, इन्हें पसंद चटाई है — तो त्याग कहां हुआ गद्दे का? एक आदमी को गद्दा पसंद है, एक आदमी को जमीन पसंद है — गद्दे वाला जमीन पे आ जाए, जमीन वाला गद्दे पे आ जाए — इसे त्याग कहते हैं, क्योंकि दोनों को नींद नहीं आने वाली है। (त्याग तब है) जब आप अपनी पसंद छोड़ते हो। आप तुलना मत करो — हमारी गड़बड़ी यही है, हम तुलना कर देते हैं। आप (जो) पसंद करते हो, उसे छोड़ दो। चटाई-कंबल तो इन्हें पसंद है, तो इसमें ये थोड़ी ना त्यागी होते हैं — ये तो इनकी पसंद का मिला इन्हें। अब आपने इसे त्याग समझा, मैंने तो कुछ नहीं (कहा)। हमारी चॉइस की चीजें हमें मिल ही जाएं, तो त्याग कहां? आप तुलना मत करिए, (चीज की) कीमत की तुलना मत करिए — हम इसी में तो फंस जाते हैं कि देखो कितना त्याग किया; त्याग क्या किया? अपनी चॉइस का मिला। जैसे आप प्रोफेसर हैं, पीएचडी हैं, आपकी इतनी सैलरी थी, 90,000 पेंशन है, और आपने कहा कि मुझे चटाई-कंबल पे रहना पसंद है — ये मेरी चॉइस थी; तो (लोग) आपको त्यागी समझ गए कि आपने त्याग किया, क्योंकि आप गद्दे के लायक थे। तो अब आपको आज समझ में आया, तो आप त्यागी हैं कि नहीं हैं? (नहीं —) अपनी चॉइस का मिला।
(फाइव स्टार होटल —) तो सब कुछ कहां हटा दिया? अपनी चॉइस का ले लिया। लगाने वाले को भी पता था कि ये सारा नहीं खा पाएंगी; लेकिन बहुत सारा सब लगा दो, अपनी चॉइस का ले लेंगी। तो आपकी चॉइस थी सांभर और चावल। आप सब छोड़ के उस दिन भूखी सो जातीं, तब यह त्याग होता। आप इस पॉइंट को समझिए — आप क्या सारा खा जातीं? नहीं; ये लगाने वाले को भी पता था कि आप सब नहीं खाओगे। तो आपने अपनी चॉइस का ले लिया। उस दिन आप पूरा छोड़ के ही सो जातीं, (तो) इसे छोड़ना (कहते)। एक आदमी कितना ही खाएगा, ये उसको भी पता है; एक आदमी (ने) अपनी चॉइस का ही लिया। (बहुत सी वैरायटी, नई-नई स्वीट्स थीं, पर किसी को हाथ लगाने का मन नहीं हुआ —) मैंने कहा ना, आपने अपनी चॉइस का लिया — इसी को चॉइस बोलते हैं।
मैं एक होटल में गया, खजुराहो में — मैंने रिक्शा बुक किया था, पैर से चलाने वाला; तो मैं बोला चलो नाश्ता कर लेते हैं। हमने कहा — मंचो सूप, भाई, 1/2 कर दो; लगभग ₹80 का सूप था, तो 40-40 का हो गया। उसने एक चम्मच लिया, तो उसका मुंह मैंने देखा; उसने दोबारा उठाया, तो मैंने (पूछा) क्या हुआ, अच्छा नहीं लगा? बोला क्या लेगा — बोले समोसा। समोसा दिला दिया, बोला ये कैसा है? बोले ये बहुत अच्छा है। अब ₹40 में खुश नहीं हुआ, ₹10 में खुश हो गया — समझिएगा इस बात को। कहने का मतलब है, वो (थाली में) कितना भी था, आपकी चॉइस थी चावल और सांभर — ये त्याग नहीं है। और आप गद्दे पे सो के थक गई थीं, अब आप चटाई पे सो के देखना चाहती थीं, क्योंकि थक गई थीं ना — इसे त्याग नहीं कहते। (तो त्याग क्या है?) त्याग (भी) आपको यहां समझ में आएगा। एक दिन इसकी भी परीक्षा आएगी, (आपका) त्याग देखा जाएगा। मैं आपको कह रहा हूं, ये सब अपने आप होगा — आप बस लगे रहो, बस पड़े रहो।
तो मैं ये कहना चाहता हूं कि त्याग आप जैसा समझते हो, वैसा नहीं है। इन्होंने घर छोड़ा — आपको दिख रहा है, लोगों को भी दिख रहा है। लेकिन वहां तो सिर्फ शरीर को पोषण था; यहां तो दो बात में इन्होंने घर छोड़ा — एक आत्मज्ञान के लिए, (और) शरीर की भी सुरक्षा ले ली। तो इन्होंने तो ज्यादा के चक्कर में छोड़ा। अगर आज (ये) फाइनल नहीं होता, हम कहते कि नहीं, हम (जिम्मेदारी) नहीं लेंगे, तो ये तो कहतीं कि अब भाई, अभी भी मौका है, चल दूं। (वहां तो) एक ही थी — शरीर की सुरक्षा; यहां दो चीजें हैं; और एक का इधर-उधर हुआ, तो पूरा डगमगा गए। मैं तो अपना ही लिया था — कि भाई, अगर आप लोग इस कार्य में सहयोगी हो, तो आपकी जवाबदारी मेरे ऊपर हो गई; लेकिन आपने कहलवाया।
जैसे बालक आया था — क्या भाव बना के आया था? कि मैं शिशु बन के आया हूं। तो पहली मुलाकात में इसे डांटा गया कि सच में तू शिशु है कि नहीं। इसीलिए मैंने कहा — बेटा, उस पॉइंट को देख, तेरी स्थिति क्या हुई; क्योंकि तू शिशु बन के आया था, और शिशु में कुछ होता ही नहीं है, तो डांटने पे तेरा भाव क्या था? इसीलिए मैं उस दिन इसे कह रहा था कि जब तूने ऐसे (हाथ उठाकर) किया, तो वो स्थिति देख — इसकी जांच तुरंत हो गई कि यह शिशु बना (या नहीं)। शिशु बन के आया होता, तो हाथ ऐसे नहीं होते। बात समझ रहे हो बालक? हमारे शरीर के हाथ ऐसे तभी होते हैं, जब हम सामने वाले को बता रहे हैं। अब ज्यादा जोर मत दो — ये हाथ ऐसे ही नहीं उठते हैं, शरीर (में) ऐसे ही उंगली नहीं उठ जाती है। मैं तो तुम्हें तुम्हारी स्थिति दिखाना (चाहता था) कि आप शिशु हो या नहीं; लेकिन उस समय आप शिक्षक ही थे, तभी आपका पोजीशन ऐसे हुआ। अगर अपने आप में होते, तो ऐसे भी नहीं होता। जब हम ऐसे करते हैं, तो ये होता है कि आप चुप रहो, बहुत ज्यादा हो गया — ये संकेत है। यहां तो जिस दिन से तुम आए, उसी दिन से (काम) चालू हो जाता है।
यहां एक व्यक्ति ने एक बार कमेंट किया था — कुटिया बनाने के पहले, जब मैंने पता दिया था और बनाना शुरू किया था — तो बोला, मैं आऊंगा तो क्या कपड़े भी लेके आऊंगा? तो मैं बोला — नंगे आना, कपड़े मैं दूंगा, तुम नंगे चले आना। वो व्यक्ति यहां आया था। जैसे ही आया, कुछ देर बाद मैंने कहा — जाओ, स्नान वगैरह करके आ जाओ। तो बोला — मेरा पता नहीं पूछोगे? मैं पता कर के क्या करूंगा तुम्हारा? तो उसने कहा कि मैं यह भाव बना के आया था कि अपनों की कुटिया में जा रहा हूं, जब मुझसे पता पूछेंगे, तो मैं पूछूंगा कि जब अपनों की कुटिया है तो पता (क्यों)? तो यहां पे आप अगर आए ना, तो यहां पे काम होना शुरू हो गया। और उसे भागना भी पड़ा। मैंने रात को बोला — चुप बैठो, नहीं तो मैं अभी भगा दूंगा, रात को भी भगाना मुझे आता है — इसलिए कि वो कह रहा था, मुझे अलग से व्यवस्था करो, मैं पैसे दूंगा। यहां पैसे और पद दोनों नहीं चलते। ये सृष्टि अलग है — तुम समझ नहीं पा रहे हो — यहां तुम्हारा पद, बैकग्राउंड और पैसे चलते ही नहीं। इस सृष्टि में — मैंने एक सृष्टि बनाई है — और जब तक ये शरीर रहा और मैं रहा, यहां जैसे सबके लिए व्यवस्था है, आप उसी (में रहोगे)। फिर वो दूसरे दिन चला गया। (पहले) नाश्ता-भोजन सब मैं ही देता था — ऐसा नहीं कि 12 के बाद मिल जाता था; मैं कभी 1 बजे देता था, कभी 2 बजे; और उनको खिलाने के बाद ही खाता था। तो (वो) बोलते थे जल्दी करो — मतलब जितना बोलोगे, उतना लेट होगा; जितना बोलोगे मुझे नाश्ता दो, उतना लेट होगा, क्योंकि मैं दूंगा तो अपनी मर्जी से।
आपने बीमारी तो बताई — लकवा मार जाए तो क्या करोगे? भाई, लकवे में तो मैं तो आपकी स्थिति को जांचूंगा। तो हद तक लेके जाएंगे ना क्वेश्चन को — मैं तो आपको आखिरी तक लेके जाऊंगा; मारने के बाद तो फाइनल ही बताऊंगा ना भाई, क्या बचेगा। हर बुखार-खांसी में थोड़ी ना बोलेंगे — (तब तो) पता ही नहीं चलेगा ना। जब तक अति तक नहीं करेंगे, (पता नहीं चलेगा)। हमें तो आपकी स्थिति को समझना है ना, आपके स्तर को आपको दिखाना है ना, तो फाइनल बताएंगे तभी (तो) आप बताओगी ना। आपने बीमारी ऐसी बता दी, (तो) बताना पड़ेगा ना। और संभावना भी तो है — ऐसा तो नहीं कि नहीं है; जिस बीमारी को (आपने) बताया, क्या (उसकी) संभावना नहीं है? मेरे साथ भी हो सकता है, आपके साथ भी हो सकता है।
मैं आपको गुरु के बारे में समझा रहा हूं — मैं यह बताना चाहता हूं कि गुरु-पद पर अगर कोई है, तो वो सिर्फ ये नहीं देखता कि आप उसके शरीर से कितने नजदीक हो। वो ये देखता है कि आप उसके बताए हुए में कितना जी रहे हो — वो ये देखता है; और वो आंतरिक ऊर्जा से आपकी सहायता करता है। वो जिज्ञासा देखता है, व्याकुलता देखता है, (कि) उसके बताए शब्दों में जी रहे हो कि नहीं। वो ये नहीं देखता कि आप उसके साथ हो या नहीं; वो ये देखता है कि जितना मैं बता रहा हूं, ये कर रहा है कि नहीं।
कैसे बताओगे आप? मैं आपसे ही पूछ रहा हूं — क्या बोलोगे? पूरी बात बोलो। (साधक ने कहा कि वह जाकर आना चाहिए —) वापस आ सकते हो — क्यों नहीं आ सकते? क्योंकि आप इसी काम के लिए तो जा रहे हो। जा के आ सकते हो, अच्छे तरीके से, उचित तरीके से।
जैसे मान लीजिए विद्युत है — तो खोज के पहले किसी को नहीं पता था, खोज के बाद सबको पता चल गया। क्या उन्होंने (बिजली) पैदा की? उन्होंने खोज की, वो पहले भी मौजूद थी। एक भक्त भगवान की खोज करता है — वो पहले से था, पहले से मौजूद था; उसने पैदा नहीं किया, उसने अपनी जरूरत में खोज की। आज अगर हम कुछ खोज करते हैं, तो हमारी जरूरत — आवश्यकता विकास की जननी (है); तो वो पहले से मौजूद है। हम कुछ नया खोज नहीं करते; नया हमारे लिए इसलिए है कि मैं जानता नहीं था, लोग जानते नहीं थे। उसे हमने पैदा नहीं किया। हमें लगता है मैंने खोज की। आपको पता नहीं था, अब पता चल गया। नहीं पता था, तो भी था; पता चल गया, तो भी है। (भगवान-परमात्मा के लिए) भक्त हमारे लिए एक मार्गदर्शक है, प्रेरणादायक है, प्रेरणा का स्रोत है — लेकिन वो (परमात्मा) पहले से मौजूद था।
तो भक्त हमारे लिए प्रेरणादायक हैं, और वह (परमात्मा) पहले से मौजूद था। वो रास्ता हमें पता नहीं था, हम लोगों को पता नहीं था; एक ने खोज कर दी, लेकिन वो पहले से था। उसने कुछ नया खोज नहीं की, लेकिन हम लोगों के लिए नया है। यहां सब पहले से मौजूद है, यहां कुछ नया खोज हो ही नहीं सकता — है, तभी ना खोजा। तो पहले से है, आपको बस पता नहीं था; और आप कब खोजे? जब आपको जरूरत लगी। कुछ साल पहले लकड़ी से भोजन बनता था, फिर कोयला आया; पहले तो कच्चा ही खाते थे, फिर धीरे-धीरे इधर आए; अब देखो गैस की खोज हो गई। अब धीरे-धीरे, जैसे-जैसे आपको जरूरत (होगी), एक खत्म होगा, आप एक (और) खोजने लगोगे, क्योंकि जीना है। तो पहले से मौजूद था, कोई नया खोज थोड़ी ना हुआ — हमें लगता है कि नया है; नया नहीं है, यहां नया कुछ भी नहीं है। आपको पहले जानकारी नहीं थी, अब पता चल गया।
खोजो। सीधा ना 'ना' में जाओ, ना 'हां' में जाओ। ना-हां में संख्या बहुत है, क्योंकि ना-हां में आपको एक झुंड मिलता है — चाहे ना में जाओ, चाहे हां में जाओ, किसी में तुम चले जाओ। लेकिन ना-हां से परे उठकर खोज करना — इसमें आपको अकेले चलना पड़ेगा, आपके साथ कोई नहीं आएगा। जब आप कुछ खोजना चाहोगे, तो आपको अकेला ही चलना पड़ेगा, कोई साथ नहीं आने वाला है। उनके लिए (बस) कल्पना है, क्योंकि हां-ना — बस खत्म; 99% लोग इसी में जीते हैं। (ना-हां में) झुंड का बल है ना; (पर) वो टाइम आएगा, तो देख लेंगे ना — अकेले पैदा हुए हो, अकेले मर जाओगे। ज्ञान तो सबको है — क्या लेके आए थे, क्या लेके जाओगे — तो लूट क्यों रहे हो फिर? इसीलिए तो (कहता हूं) ना और हां में भीड़ है, क्योंकि (उसमें) कुछ करना नहीं पड़ता — बस ले लिया झंडा, (और चल दिए) पीछे-पीछे।
(संत रविदास) अध्यात्म के साइंटिस्ट हैं। देखिए, जैसे संत रविदास — इन्हें तो उस परम स्थिति में देखा जाता है। आज कितने लोग बोलते हैं गंगा मां नहीं है, पानी है, तो पाखंड है; लेकिन उन्होंने खुद मां को भेंट भेजी थी और मां ने स्वीकार किया था — उन्हें कंगन भेजा, ये कहानी है। तो जब ऐसे संत ने सिद्ध कर दिया, (कि) उनके लिए थीं, तो हमारे लिए भी होंगी; नहीं तो फिर उनके लिए कैसे? लेकिन आज हम उसे क्या बोलते हैं? पाखंड। अगर आप कहते हो गंगा एक पानी है, कुछ नहीं है, तो फिर आप संत रविदास के शब्दों को झूठा कर रहे हो — कहानी तो झूठी हो गई ना, क्योंकि उन्होंने खुद सिद्ध किया था, एक कंगन उन्होंने कठौती से निकाल के दिया था।
(खोज क्यों ना करूं —) ना कहके सीधा रुक जाना — इसका कोई जीवन में मतलब ही नहीं। और इतने लोगों ने कहा है, तो कुछ तो बात होगी। अब देखिए, लोग कहते हैं मंदिर में क्या है, पत्थर की मूरत है, ये कुछ नहीं है; लेकिन फिर वही (लोग) रामकृष्ण परमहंस की कहानी सुनाते हैं कि मां को भोजन कराते थे। तो ये दोनों बातें कैसे लागू होती हैं? एक तरफ कह रहे हो सब पाखंड है, एक तरफ कह रहे हो नरसिंह मेहता के पास कृष्ण भगवान आते थे, उनके बच्चों की शादी भी कराई; मीरा के लिए आए। बात कुछ समझ में नहीं आती। इस समय हम दोहरा चलते हैं — एक तरफ कह रहे हैं गंगा मां पाखंड है, ये तो जल है; एक तरफ संत रविदास की कहानी भी सुनाते हैं। दोनों बातें मेरे जीवन में कैसे हो सकती हैं?
मेरे पास लोग आते हैं, कहते हैं राम ने ऐसा किया — रुको, रुको, रुको! राम के बारे में बात करने से पहले मैं तुमसे कुछ पूछना चाहता हूं — रामायण सच्ची घटना है, हां या ना? बोले ना, तो बोला — बात क्यों कर रहे हो फिर, राम कहां से आए? जब आपके लिए रामायण है ही नहीं, तो आप मुझसे किस आधार, किस बेस पे राम के बारे में पूछ रहे हो? पहले आप बताओ कि रामायण को आप सच्ची घटना मानते हो, तब राम के विषय पे बात की जाए; और जब रामायण सच्ची घटना है ही नहीं आपके लिए, तो रामायण पे बात क्यों करना, एक झूठी कल्पना पे क्यों बात करना? क्योंकि तुम्हारे लिए तो कल्पना है ना — तो मैं अपना समय नहीं बर्बाद करना चाहता तुम्हारे साथ। तो मैं यह कहना चाहता हूं कि संत रविदास (के बारे में) — हमारे सामने दोनों कहानियां फेंकी गई हैं, और दोनों पे हमने ताली बजाई है। एक कह रहा है कोई देवी-देवता नहीं होते; फिर वही चिल्ला के कह रहा है कि रामकृष्ण परमहंस के लिए मां काली आईं — उसमें भी हम ताली बजाते हैं। हम इतने ज्यादा सोए हैं! आप देखो, एक आदमी तुम्हारे सामने दोहरी बात कर रहा है, और दोनों में आप ही ने हां कहा। एक तरफ कह रहा है गंगा मां होती नहीं, एक तरफ फिर 'मन चंगा तो कठौती में गंगा' फेमस है। अब देखिए, वही लोग, संत रविदास जी को मानने वाले — एक तरफ कह भी रहे हैं कि मां गंगा को उन्होंने कठौती में बुलाया, और एक तरफ कह रहे हैं (वो) तो पानी है। एक ही आदमी दो बात कर रहा है — बहुत भ्रमित हैं लोग। और ये गुरु लोग कहानी सुना रहे हैं आपको — आपका गुरु (दोहरी बात कर रहा है), और आप दोनों में हां कह रहे हो।
(साधिका ने कहा, भ्रमित तो मैं ही हूं, इतनी हिम्मत नहीं कि खड़ी होकर पूछूं —) या तो अगर मां काली नहीं हैं, तो किसी के लिए नहीं हो सकतीं; गंगा अगर नहीं है, तो फिर किसी के लिए नहीं हो सकती; अगर हैं, तो सबके लिए हैं — फिर हमें उस लायक बनना पड़ेगा। (प्रश्न पूछना) क्या विरोध है? ये विरोध नहीं है — हम कुछ जानना चाहते हैं, हम कुछ समझना चाहते हैं। आप अगर बताने के लिए बैठे हो, तो बताओ; अगर नहीं बताना था, तो आप बैठे फिर क्यों? हमारा भी समय बर्बाद किया ना। ऐ डॉक्टर, क्लीनिक खोल ले और (कहे) मैं इलाज ही नहीं करता — तो तू क्लीनिक क्यों खोला है? बंद कर! क्योंकि तुम्हारे एक बोर्ड लगाने से मेरा समय इतना बर्बाद हुआ; जब तुझे कुछ आता ही नहीं, तो क्लीनिक खोलने की क्या जरूरत थी? बंद कर दे, मेरा समय तो बर्बाद नहीं होता। आप अगर कुछ बताने के लिए बोल रहे हैं, तो आपका कर्तव्य है, दायित्व है, जिम्मेदारी है — आप उसे बताओ, नहीं तो बंद करो। इसलिए तो मैं बोलता हूं कि आओ, हम आपसे प्रत्यक्ष बात करेंगे और आपके हर प्रश्न का उत्तर देंगे — जिम्मेदारी से देंगे, दायित्व से देंगे, आपका समय बर्बाद नहीं होने देंगे। लेकिन आप ऐसे ही घूमने आओगे, घूम के चले जाओगे (तो नहीं)। आपके प्रश्न में मुझे जिज्ञासा दिखनी चाहिए कि आपको उत्तर चाहिए। तो आपके सामने दोहरी कहानी सुनाई जा रही है, और अपने समाज के लोगों को बहुत समझदार कहते हैं — वो लोग दोहरी कहानी पे चल रहे हैं।
अगर आप कुछ लेने गए हो, तो उसके बारे में आपको पूरा नॉलेज, पूरी जानकारी होनी चाहिए; और जब पूरी जानकारी होगी, तो आपको कोई भटका नहीं सकता। लेकिन आप बिना जानकारी के गए, तो सही भी होगा तो आपको कैसे पता चलेगा? अगर मान लो असली होगा भी, तो आप कैसे उसे परखोगे? क्योंकि नकली उससे अच्छा दिखा के बेच रहा है, और असली वाला तो कुछ नहीं कहेगा — लो, चाहे ना लो, जाओ। नकली वाला आपको बहलाएगा, फुसलाएगा, अनेक तरह का आश्वासन देगा; और असली वाला कहेगा — आपको लेना है लो, नहीं (तो) जाओ, भागो। इसलिए कि नकली को तो कोई मेहनत करना नहीं पड़ा — वो फटाफट गया, अपना आवरण बदला, और फट से अपना (बोर्ड) लगा के बैठ गया; असली ने तो पूरी जिंदगी लगा दी। वो तुम्हें (क्यों) झेलेगा? तुम्हें भगा देगा — चलो, हम जिज्ञासुओं के लिए बैठे हैं, हमें भीड़ की जरूरत नहीं है। वो भगा देगा, क्योंकि तुमसे उसका अस्तित्व नहीं है। नकली का अस्तित्व तुमसे है — उसे भीड़ चाहिए, क्योंकि तुमसे उसका अस्तित्व है, उसे लग रहा है मैं कुछ हूं। और असली को पता चल गया कि मैं कुछ नहीं हूं, और मैं हूं तो हूं, मेरा अस्तित्व मुझसे है, इनसे नहीं है। और वो आपसे जवाब मांगेगा कि इतने दिन रहे तो क्या किए? कुछ हुआ या नहीं? नहीं हुआ तो जाओ — फिर क्या टाइम पास कर रहे हो बेमतलब का? जब आए, तब भी यही हाल था, अभी भी ये हालत — तो निकलो, फिर समय बर्बाद मत करो। और नकली कहता है — कोई बात नहीं, हम तुम्हें तारेंगे ना, तुम पड़े रहो। असली कहता है — नहीं, तुमको तरना पड़ेगा, हम तुम्हें नहीं तार सकते। नकली कहता है — कोई बात नहीं, हम तुम्हें तारेंगे, तुमको (ही) नहीं, तुम्हारी सात पीढ़ी को तारेंगे, तुम टेंशन ना लो, मैं जिम्मेदारी लेता हूं। नकली ही वहां टिकेगा ना — जिसे कुछ नहीं करना है, वो टिक जाएगा; उसे सात पीढ़ी तारने का आश्वासन देगा। और ये (असली) तो आपको (वो) भी नहीं देगा — कहेगा, देखो, मैं आपको मार्ग बता सकता हूं, तरना तुमको है।
(समझ थोड़ी होती है कि नकली-असली को पहचान लें —) समझ नहीं है, तो घर पे रहो। कह तो रहा हूं — जानकारी लेके निकलो। शादी किए हो, तो समझ के साथ शादी किए हो ना? जब (पत्नी) पहली रात आई, तो क्या किए — पिताजी से कुछ पूछने गए? उसके साथ कैसे सोना था, पता था कि नहीं? इतनी जानकारी थी ना, तभी शादी किया ना — कि जाके पिताजी से पूछे कि बीवी तो ला दिए, अब मैं इसके साथ क्या करूं? जैसे तुमने शादी किया, तो पहले पत्नी के बारे में पूरी जानकारी ले ली कि पत्नी के साथ मुझे कैसे जीना है। उसी घर में एक मां भी है, बहन भी है — उनके साथ अलग तरीके से जिए; पत्नी एक रात आई, उसके साथ अलग तरीके से व्यवहार बनाया, जिया — तो नॉलेज था ना। शरीर तो एक ही है ना — जो हमारी मां-बहन में, वही हमारी पत्नी में भी था; लेकिन हम उसके साथ किस तरीके से जिए — तो नॉलेज के बाद शादी किए ना? तो ऐसे ही नॉलेज लेके आगे बढ़ो। पहले नॉलेज लो कि कहां जाना है, और मुझे क्या लेना है, मिलेगा तो मैं कैसे पहचान करूंगा। उसके बारे में पुस्तकों में अनेक जानकारियां हैं, महापुरुषों की अनेक वाणियां हैं।
असली-नकली की पहचान तब करोगे, जब आपको, जो लेने गए हो, उसकी नॉलेज होगी — तभी होगी, नहीं तो नहीं होगी। बाजार में आलू खरीदने गए हो, तो आलू का नॉलेज होना चाहिए, और पूरी जानकारी होनी चाहिए, आधी-अधूरी नहीं। जानकारी का अगर अभाव है, तो आप ठगे जाओगे। और जानकारी बड़े आसानी से मिलती है — शास्त्र में, वेद में, उपनिषद में, वेदांत में अनेक महापुरुषों ने वाणी बोली है कि गुरु की पहचान कैसे करें, गुरु-शिष्य में क्या भेद है, शिष्य का भाव कैसा होना चाहिए — आप इसके बारे में अध्ययन करो। (वरना) तो नकली गुरु के पास भी जाएंगे, कहीं भी जाएंगे; कुछ भी मिलेगा, लेके चले आओगे।
कैसे पहचान करनी है — बता तो रहा हूं इतने दिन से, और अभी भी वहीं अटके कि मैं कैसे पहचानूं? तो इतने दिन से क्या यहां घास छील रहे हो? अभी कुछ दिन पहले मैंने बताया ना कि गुरु की पहचान कैसे करें — अगर आपके आत्मिक कल्याण की हर वक्त बात कर रहा है, तो गुरु है; अगर भौतिक बढ़ाने के लिए बात कर रहा है, तो नकली है। तो अभी भी तुम वहीं खड़े हो? यहां समय बर्बाद करने आए हो क्या? अगर यह प्रश्न नहीं पूछते, तो कुछ आगे चलते ना हम; तुमने तो वहीं लाके खड़ा कर दिया, जहां आपको बताया था। जब हम कुछ बोल रहे हैं, तो उसे पूरी तरह पकड़ो ना। वही प्रश्न दोबारा करोगे, रोज वही प्रश्न — (नकली पकड़ के रखेगा, असली कहेगा लो या आगे बढ़ो —) लेकिन क्या लेना है? क्या तेल बेच रहा है? ज्ञान ना — तो फिर वही बात आ गई ना, आत्मिक कल्याण का मार्ग; वही बात घुमा के आ गई, तरीका अलग-अलग है। अगर आत्मिक कल्याण की बात करता है, तो गुरु है; अगर भौतिक की बात करता है, तो फिर वो नकली है। अगर वही प्रश्न रोज खड़ा करोगे, तो कोई मतलब है क्या? तब तो मैं आपके साथ समय बर्बाद कर रहा हूं।
अरे, आप दिन भर चिंतन करते हो, तो आप अपने अंदर से प्रश्न पैदा करो ना। प्रश्न पूछने में अर्जुन कांप गए, रोने लगे — प्रश्न तुम्हारे अंदर से निकालना पड़ेगा। रोने लगे, चीखने लगे, चिल्लाने लगे, डर गए। आप रोज प्रश्न निकालिए ना — कोई तो हमारे सामने बोल रहा है (कि) मैं जवाब दूंगा — आप प्रश्न निकालिए ना नए-नए। आप चिंतन करते हो, तो देखो कहां खड़े हो गए, कहां रुक गए, क्यों घुटन हो रही, क्यों बेचैनी हो रही है, उसका क्या कारण है, क्या वजह है? ऐसे ही बैठ के सुन रहे हो। तुम्हें रोज एक-दो प्रश्न अपने अंदर से खोजने चाहिए, तब आत्मिक चिंतन का (आपको) उत्तर (मिलेगा)। अगर उत्तर देने वाला है, तो आप अपने सारे प्रश्न निकाल लो। आप देखिए, आपके प्रश्न कहां से खड़े हुए? समाज से खड़े हुए — ये आपके प्रश्न नहीं हैं। ऐसे ही समाज का कोई व्यक्ति उसका प्रत्यक्ष उत्तर दे देगा, तो क्या होगा? प्रश्न गिर जाएंगे, आखिर में आप बचोगे। लेकिन आप प्रश्न निकालो तो ना — प्रश्न आपको निकालना पड़ेगा, आपको खोजना पड़ेगा अपने अंदर। मैं 2011 से 19 तक प्रश्न पूछता रहा — मुझे चिल्ला के लोग भगा देते थे, रात-दिन प्रश्न ही करता था; मेरे प्रश्न ही नहीं खत्म होते थे, क्योंकि मेरे पास समय नहीं था; एक-दो दिन में, एक हफ्ते में मुझे भगा (देते थे)। आपको अंदर से प्रश्न निकालना पड़ेगा; और जब तक ये प्रश्न नहीं हटेंगे, तब तक आप मूल तक नहीं पहुंच पाओगे। इसे समझो जरा — प्रश्न आपके हैं भी नहीं, प्रश्न पैदा हो गए हैं — भ्रम। लेकिन वो प्रश्न गिरने चाहिए, हटने चाहिए; और तभी हटेंगे, जब आपको उत्तर मिलेगा। उस उत्तर का आपको कोई मतलब नहीं है — वो प्रश्न को गिराने के लिए है। आपको उत्तर नहीं चाहिए; आपके अंदर खुद ज्ञान है। आपको आत्मज्ञान खोजने की जरूरत नहीं है, आपको प्रश्न गिराने की जरूरत है। अब पूछो अपने आप से — जब प्रश्न गिर गए, तो मुझे फिर आत्मज्ञान क्यों नहीं हुआ? कहीं ना कहीं प्रश्न छिपे हुए हैं, मैं निकाल नहीं पा रहा हूं — इसके लिए मेहनत करनी पड़ेगी। आप कुछ पूछ रहे हो, तो उसका आधार-बेस होना चाहिए; और अगर पहले बता दिया गया, तो फिर (नहीं पूछना)। कुछ पूछ रहे हो, तो उसका परिणाम आना चाहिए, आपके जीवन में बदलाव आना चाहिए। ऐसे ही मत पूछो — फिर हम आपसे पूछेंगे, आपको जवाब देना पड़ेगा।
इसे समझिए — हम आपको समय दे रहे हैं, तो आप समय बर्बाद मत करिए। कल जवाब दे दिया, और पता चला आप वही पूछोगे, फिर आपके साथ हम बैठना नहीं पसंद करेंगे, क्योंकि मेरे पास समय नहीं है। 16 तक हम खूब बैठे, कोई महागुरु आया उसको भी झेला, सबको झेला; लेकिन अब नहीं। ऐसा ना हो, अब शाम को निकल रहे हैं, (फिर) पता चला हफ्ते में एक दिन कर दें। क्योंकि आप अगर समय बर्बाद करोगे, तो व्यक्ति अपनी जिंदगी जिएगा, सबकी अपनी लाइफ होती है, वो आपके साथ समय क्यों बर्बाद करेगा? आप घिसे-पिटे वही सवाल करोगे, कहीं पहुंच ही नहीं रहे, तो फिर आपके साथ समय क्यों? वो तो जिज्ञासुओं के लिए बैठा है। पहले मैं 16-18 घंटे देता था; अब देखो, शाम को निकलता हूं, क्योंकि लोगों ने उसका महत्व ही नहीं समझा। हम अपने आप में जिएंगे, या मेरे पास वो लोग रहेंगे, जो मुझे समझेंगे, जो मेरी भावनाओं को, मेरे समय को सम्मान देंगे, एक-एक सेकंड की कद्र करेंगे — हम उनके साथ रहेंगे। जब आपको हमारे समय की कीमत, सम्मान ही नहीं, तो हम आपके साथ समय क्यों बर्बाद करेंगे? कोई भी व्यक्ति वहां रहेगा, जहां वो खुश है। उसको थोड़ी नाम-पैसा चाहिए, उसे भीड़ थोड़ी खड़ी करनी है। हम जिज्ञासु के लिए काम कर रहे हैं — इसलिए कि मैं एक-एक प्रश्न के उत्तर पाने के लिए तरसा हूं, मैं समझता हूं वो व्याकुलता, वो तड़प। तब मेरे अंदर से भाव आया था कि जिसके लिए मैं इतना परेशान हुआ, इतनी तकलीफ सही, मैं जाके लोगों को दूंगा, बुला-बुला कर दूंगा — जो लोग मुझे समझेंगे, जो लोग इस ज्ञान को समझेंगे। जब आप समझोगे ही नहीं, तो हम आपके पास समय क्यों (दें)?
प्रश्न अपने अंदर से निकालिए। अर्जुन प्रश्न निकाल रहे थे, तो कोई किताब नहीं (थी)। किताबों से प्रश्न नहीं आने चाहिए, आपके अंदर से आने चाहिए — आपके प्रश्न हों। किताबों में पानी नहीं है, लेकिन पानी तक पहुंचने के लिए एक मार्ग छिपा हुआ है। देश-काल-स्थिति-परिस्थिति से वो मार्ग बदल गया है, लेकिन पानी वहीं है। मार्ग जीवंत गुरु बताएगा। आज अगर भारत का 20 साल पहले का, 30 साल पहले का नक्शा लेके चलो, तो क्या आप भारत-भ्रमण कर पाओगे? नहीं। लेकिन जिस जगह पे (जो) कुछ था — रास्ते बदल गए — वो जगह अभी भी है; वहां की बनावट का रूप बदल गया, लेकिन जगह वहीं की वहीं है, जगह घिसती नहीं है। तो किताबों में पानी का रास्ता है, जहां पानी है; लेकिन रास्ता बदल गया, पानी लेकिन वही है, और मुझे मतलब पानी से ही था। अब नक्शा बदल गया, अब कोई जीवंत गुरु के पास जाओ, वो बताएगा नया रास्ता। इसलिए लोगों ने जोड़ दिया कि जीवंत गुरु जीवन में ढूंढना — क्योंकि देश-काल-स्थिति-परिस्थिति में सब (बदलेगा, पर) गुरु एक — बदलेगा नहीं, सत्य नहीं बदलेगा। गुरु ज्ञान का प्रतीक है, तो ज्ञान कभी नहीं बदलता; रूपांतरण रूप का होता है, तत्व का नहीं।
(गुरु मतलब तत्व — हमें गुरु के शरीर को नहीं देखना?) नहीं, शरीर नहीं — ज्ञान। गुरु एक है, दो है भी नहीं। जैसे पृथ्वी पर पानी आता है, तो नल अनेक हैं, निमित्त बनते हैं, लेकिन एक ही जगह से आता है। वैसे ही गुरु ज्ञान का प्रतीक है — आप उसका शरीर मत देखो; शरीर अनेक हैं, जैसे नल अनेक हैं, लेकिन ज्ञान एक ही जगह से आ रहा है। अगर हम तत्व को पकड़ें, तो आगे चल सकते हैं। आप रूप को मत पकड़ो, ज्ञान को पकड़ो, और ज्ञान एक ही है, दो नहीं। हो सकता है इस नल का कुछ स्वाद अलग हो, आगे वाले नल का कुछ अलग हो, लेकिन प्यास दोनों बुझाएंगे। कभी-कभी हमें वहां का पानी अच्छा लगता है, वहां का नहीं; लेकिन (जो) आपको अच्छा नहीं लग रहा है, वहां से (भी) कई लोग प्यास बुझा रहे हैं — आपको नहीं पसंद है। तो वैसे ही अनेक शरीर से जब ज्ञान निकलता है, तो अलग-अलग तरीके से निकलता है; तो मुझे किसी का ज्ञान समझ में आता है, किसी का नहीं आता। लेकिन जहां आपको समझ में आए, लेके निकल लो। ज्ञान एक ही होता है, दो नहीं — इस बात को समझो। जैसे मान लीजिए आप कहीं पे रास्ता पूछते हो, तो अलग-अलग भाषा में बताते हैं; तो हो सकता है जो भाषा आपको नहीं समझ में आ रही, किसी को आ गई, वो चल दिया। तो आपके लिए तो गुरु एक ही होता है, दो तो होता ही नहीं। यहां तो लोग गुरु भी 'मेरा-तेरा' बोलते हैं — मेरा गुरु, तेरा गुरु। अरे, मेरा-तेरा से मैंने जो अहंकार धारण किया, उस अहंकार से मुक्त करा दे, वो गुरु है। गुरु (अगर) मेरा-तेरा बता रहे, फिर गुरु कहां है? गुरु तत्व है, गुरु की स्थिति है, गुरु कोई व्यक्ति-विशेष थोड़ी ना है। नल से (नल का) एक बूंद पानी आता है क्या? नल निमित्त है; वैसे ही शरीर निमित्त है। मैं कह रहा हूं — कोई कथा कह रहा है, कोई प्रवचन कर रहा है, कोई सत्संग कर रहा है — उसके शरीर से नहीं आ रहा है; तीनों में — एक किताबों से बोल रहा है, एक महापुरुषों की वाणी बोल रहा है, और एक (में) सीधा उससे आ रहा है। आप ये मत समझना कि ज्ञान शरीर से आता है, ऐसा नहीं है। आप कुछ भी बोलते हो, उसका आधार-बेस है। क्या आपको लगता है आपने बोला? नहीं — अगर ये देख पाओ, तो आप कभी नहीं बोले, कभी नहीं चले; अगर आप देख पाओ, तो जब से आपका जन्म हुआ, आपने आज तक एक शब्द भी नहीं बोला। आप कहीं से लेके बोल रहे हो, आप बोल ही नहीं रहे हो — यहां कोई नहीं बोल रहा है, अगर ये देख पाओ। आप स्थिर थे, स्थिर हो, स्थिर रहोगे; आप कहीं आए-गए ही नहीं, अगर ये देख पाओ। आप कहीं से बोल रहे हो, आपका आधार-बेस है। आप तो बोल ही नहीं रहे हो।
(तो फिर इस 'आप' को कैसे समझें?) तो 'तुम' को छोड़ दो, 'मेरा' को छोड़ दो। आपको समझने के लिए 'मेरा' को छोड़ दो। 'मेरा-मेरा' आपने क्यों पकड़ा? लालच में पकड़ा। लालच को छोड़ दो — 'मेरा' भी छूट जाएगा, और अहम 'मैं' भी गिर जाएगा।
अहम आपके अंदर नहीं है — अहम आता है और जाता है। किसी भाषा में कोई आपको गाली दे दे, और भाषा समझ में नहीं आई, तो आपको अहम आएगा? नहीं आएगा। अहम आता है — आप किसी को गिराना चाहते हो, या आप किसी पे गुस्सा करना चाहते हो, तो अहम आता है, और अहंकार का रूप ले लेता है। जैसे मुंह में है, तो लार है; लेकिन जैसे ही बाहर आया, थूक हो गया। सामने वाले को गिराने की आपकी इच्छा है, और आपको बड़ा बनना है, तो अहम आता है, तो अहंकार का रूप लेता है। (तो इसको भी जानना पड़ेगा —) आपको अहम आता कब है, वो समझना है — किस स्थिति में आपको अहम आता है; वो स्थिति लानी नहीं। जैसे हमें किसी को गिराने का भाव छोड़ देना है, और हमें बड़ा बनने का भाव छोड़ देना है — तो अहम आएगा ही नहीं।
इसे मजबूत करो। ईमानदारी से आप धन कमाओ। लेकिन वो (धन) आएगा, तभी आपका वो डर हटेगा, नहीं तो नहीं हटेगा। (ईमानदारी से धन उस तरह नहीं आता —) और कोई रास्ता देखो; अर्थ कमाने के अनेक रास्ते हैं। (मेरा उद्देश्य) पैसा कमाना है, तो मुझे पैसा कहां से मिलेगा — मुझे वह काम करना है ईमानदारी से। लोगों को क्या चाहिए — झूठ चाहिए, सच चाहिए — वो छोड़ो। आपको क्या चाहिए? पैसा। तो (ऐसा न हो कि) जहां से आपके पास पैसा (आए), लेकिन आप गिर जाओ — ये ध्यान रखना। लोगों को झूठ चाहिए, सच चाहिए — मुझे वो लोगों की फिक्र नहीं है; पहले मुझे देखना है कि मुझे चाहिए पैसा, तो मुझे पैसा कहां से आएगा, उसके लिए मुझे काम करना है, पहले मैं उसके लिए काम करूं। (साधिका ने कहा, पैसे से मुक्त होना है, अपने को इतना संपन्न बना लूं कि डर ही खत्म हो जाए —) हां, ये डर (हटेगा) तब आपकी आगे की यात्रा होगी। आपके पास सेविंग होनी चाहिए। डर निकालने के लिए आपका एक टारगेट पूरा होना चाहिए कि मेरे पास इतना हो जाएगा, और मेरा डर खत्म। तो वो डर तभी निकलेगा, जब उतना हो जाएगा — तो समझ कर उतना ले लो, (उतना) करो।
मैं तो यात्रा की नहीं। (पहले) मैंने बिजनेस भी किया; आखिर में मेरा काम था ज्योतिष का, एस्ट्रोलॉजर — मुंबई में। तो मैंने उसमें देखा, देखते-देखते मैंने कहा, नहीं, इससे आगे निकलो। तो मैंने अपनी संपन्नता देख ली — कि नहीं, अब मुझे कुछ नहीं चाहिए; मैंने देख लिया नाम भी, शोहरत भी, पैसा भी — इसका कोई जीवन में मतलब नहीं, इसके आगे भी कुछ है। तो खोज में निकल गया। खोज में निकला, तो मेरे पास पहले से लोग थे; उन्होंने कहा जितना भी आपका खर्च होगा, मैं आपको दूंगा — ऐसे लोग मिलते रहे मेरी जिंदगी में। तो मुझे कभी पैसे के लिए नहीं सोचना पड़ा। अगर मैं फटे कपड़े पहन के घूमा, तो वो मेरे काम का एक ड्रेस था। मुझे तो 2010 के बाद से ही ऐसे लोग मिले कि आप आश्रम बना लो, आप क्यों इतना घूमते हो, एक काम करो, कुटिया बना लो, वहीं आदमी रख देंगे, वहीं आपको भोजन बना के खिलाएगा, आप इतना क्यों घूम रहे हो। उन्हें समझ में नहीं आता था। कभी मिल जाते थे, कहते थे — ये हालत क्या बना ली है? बहन मुझे मिली, तुरंत एक ही बात — चलो, कपड़ा लो। मेरे पास कोई कमी ही नहीं थी, लेकिन (वो) मेरे काम का ड्रेस था। मुझे अपने आप को भी समझना था, समाज को भी समझना था — इसलिए कि मैं उस सोसाइटी में जाता था, जहां एक कपड़ा पहन के भिखारी भी नहीं जाते थे। तो जब मैं उनके साथ बैठता था, तो उनकी आंखों में देखता था — क्या मुझे शर्म है, संकोच है, क्या मुझे इनसे शर्म आ रही है? तो शुरुआत में आती थी; लेकिन धीरे-धीरे मैं उस लेवल पे लाया कि लास्ट (में) मेरी शर्म (खत्म हुई) — मतलब डर को खत्म करना। तो जब आप वैसे जाओगे, तभी ना। मैं उस हाई सोसाइटी में एकदम लो क्वालिटी का कपड़ा पहन के जाता था — तो जानबूझकर किया ना, जवाब पाने के लिए कि मेरे अंदर क्या है — इनका दबाव है, संकोच है, लाज है, शर्म है?
अभी मैं इनके साथ महाबलेश्वर गया था, मेरे कपड़े ऐसे ही थे, और हम लोग अच्छे तरीके से घूम रहे थे। अब होटल लेना था, तो होटल महंगा बता रहे थे; बोला — यार हेमंत, एक काम करो, होटल 600 से ऊपर नहीं देंगे। होटल का ज्यादा बता रहे थे, बोला — इतना पैसा क्यों देना, खा-पी के चलो, अपन कहीं सो जाते हैं, एक रात तो बीत (ही जाएगी), और कुछ अलग अनुभव होगा। वहां ठंड भी खूब है। तो हम एक मंदिर में गए, (सोचा) वहां रह लेंगे। मगर 600 से ऊपर तो नहीं देंगे, कुछ भी हो जाए — ये फिक्स मेरा रेट है। वो सीजन चालू था, ठंड का, बाहर देश से भी लोग आते हैं, तो वहां एक रूम का एक नाइट का 10,000 प्लस ही रेट था। तो एक माता के मंदिर में आरती हो रही थी, (हम) पहुंच गए, आरती हुई, प्रसाद लिया; फिर नीचे उतरे तो एक व्यक्ति था, हमने कहा — क्या यहां रूम मिलेगा? बोले मिल जाएगा। बोला — मिल तो जाएगा, लेकिन 600 से ऊपर एक रुपया नहीं दूंगा। बोले मिल जाएगा, (और) लेके चल दिया, एक होटल में गया। होटल वाले मुझे देख रहे हैं — उसने मुझे बाद में बताया कि होटल वाला पूछ रहा था, ये लोग मार-झगड़ा करके तो नहीं आए — मेरे कपड़े चिथड़े। वो बोल रहा है — नहीं, ये बहुत अच्छे आदमी हैं। वो मुझे जानता भी नहीं; उसने अपने रिस्क पे — क्योंकि वहां उसका घर था — कमरा दिला दिया। फिर उसने फोन नंबर ले लिया, फिर कहा सुबह का नाश्ता मेरे यहां। अभी भी उससे बातचीत होती है। फिर मुझे पूरा महाबलेश्वर घुमाया, खर्च करने ही नहीं दे रहा था — पूरा खर्च उसने किया, जबरदस्ती भी करो तो खर्च नहीं करने दे रहा था; अपने घर पे भी ले गया, अपने बच्चों से, पत्नी से मिलाया, नाश्ता करवाया; अभी भी फोन करता रहता है कि कब आओगे। तो अगर आप ईमानदार हो ना, तो आपको दुनिया में कोई भी मिल जाएगा। आप जैसे रहते हो ना, वैसे लोग आपके प्रति आकर्षित हो जाते हैं। मैं आपको बता रहा हूं, मैं घूमा — (पहले) मैं पूरा एयर कंडीशन से घूमा, एसी के नीचे तो मैं बात ही नहीं करता था; (बाद में) मेरा रिजर्वेशन में टिकट करा दे, तो मैं कैंसिल करा देता था — शुरू में। मुझे कोई कमी ही नहीं हुई।
हां, जरूर कुछ ना कुछ होगा — ऐसे कोई किसी को थोड़ी नहीं दे सकता। लेकिन मैं उसका उपयोग क्या कर रहा हूं? क्षीण तो सब होगा, लेकिन हम उसका उपयोग क्या कर रहे हैं? अगर हम समाज के लिए कर रहे हैं, तो और बढ़ जाएगा ना, वो खत्म नहीं होगा — कैसे खत्म होगा, हम समाज को ही बांट दे रहे हैं। (और अपनी मेहनत से समाज को बांटें तो?) वो भी बढ़ेगा। आपके पास अगर कुछ भी है और आप निस्वार्थ बांटते हो, तो बढ़ेगा ही बढ़ेगा।
(सही काम में धन लगाते हुए भी अगर लगे कि गलत है —) तब तो आप गिर गए। आपको ही पहले (सही) लगना चाहिए; अगर आपको ही गलत लग गया (और फिर भी) करके करेंगे, तो आप गिर जाएंगे। पहले समझिए कि क्यों नहीं कर पाऊंगी। तो आप अपनी योग्यता को बढ़ाइए, अपनी क्षमता को बढ़ाकर करिए; ना कि आप किसी पर निर्भर करके किए। आप कोई भी काम कर रहे हैं, तो आपको उसके बारे में पूरा नॉलेज, पूरी जानकारी होनी चाहिए।
देखिए, आपको जरूरत है तो आप करिए, आपको जरूरत नहीं है तो मत करिए। (कैसे पता चले —) शारीरिक जरूरत है कि मानसिक जरूरत है, किस चीज की (जरूरत है), वो आपको देखना है — अपने आप को ही समझना पड़ेगा। विवाह पर्सनल जिम्मेदारी है। मैं तो कह रहा हूं कि अगर एक पार्टनर की जरूरत है, (तो देखो कि) पता चला आप अध्यात्म (में हो), और पता चला शरीर के लिए आपने शादी कर ली — शरीर का हार्मोन तो ज्यादा दिन टिकेगा नहीं, बाद में उसकी जिंदगी नर्क हो जाएगी। आप उसके साथ पूरी जिंदगी रहना चाहते हो, अपने साथ लेके चलना चाहते हो, तभी विवाह करना है। (अध्यात्म में विचार नहीं मिलते तो साथ नहीं चल पाते —) तो शादी के पहले बातचीत कर लो ना — कि मैं इस मार्ग में हूं, इस मार्ग में आपका साथ रहेगा, तो आप विवाह करो, और नहीं तो हम नहीं करेंगे। और अगर उसने शादी कर ली, और बाद में उसमें से कोई अनुकूल नहीं कर रहा है, तो उसका जिम्मेदार वो होगा, (क्योंकि) शादी के पहले बातचीत हो चुकी थी।
(क्या आपको पहले से समझ आ गया था?) मुझे जब से मैं समझने लायक हुआ, तब से ऐसा हो रहा था कि मुझे विवाह नहीं करना; और विवाह अगर करूंगा, तो वैसा मिल जाएगा। जैसे अपनी मां से मैंने कहा — बोलीं शादी कर — (मैंने कहा) मां, ऐसा नहीं कि शादी नहीं करूंगा; जब मुझे जरूरत पड़ेगी, तो मैं शादी कर लूंगा। फिर जरूरत ही नहीं पड़ी। मुझे लगा नहीं करना चाहिए, नहीं किया; मुझे आगे लगेगा करना चाहिए, तो मैं कर लूंगा विवाह — ऐसा कोई प्रण नहीं है कि नहीं; 80 साल बाद भी कर लूंगा, (अगर) मुझे जरूरत पड़ी। मतलब ईमानदार रहो — जो भी हो रहा है, उस चीज को बाहर व्यक्त करने में संकोच मत करो, काहे को संकोच करें? लेकिन हमें सबसे थोड़ी ना व्यक्त करना है। अगर आप मेरी पर्सनल लाइफ के बारे में पूछ रहे हैं, तो आप हो कौन — पहले मुझे यह जानना पड़ेगा। ऐसे ही कोई आ जाएगा, बोलेगा — आप बताओ, विवाह किए कि नहीं किए, आप ब्रह्मचारी हो? तुझे क्यों पता करना है, तू है कौन? (अगर) आप पूछने आओगे, तो मैं आपसे पूछूंगा कि मैंने विवाह नहीं किया, तो आप क्यों पूछना चाहते हो — तभी मैं आगे बात करूंगा ना। आप बोलोगे, नहीं, कोई बात नहीं, बस ऐसे ही — फिर क्यों पूछोगे?
अब देखना ये है कि आपका तो हो गया — उनकी क्या स्थिति है? एक आदमी आपके साथ है — देखिए, आपने विवाह किया है; अगर एक आदमी दुखी है, तो क्यों है? (आपकी) उसकी जिम्मेदारी बनती है। (अगर वो कहें कि हम ऐसे ही रहना चाहते हैं, कोई दिक्कत नहीं —) तो कोई बात ही नहीं ना। तो आप देख लो, सच में ऐसा तो नहीं हुआ — हो सकता है अंदर से दिक्कत हो; वो आपको देखना है। (अगर है भी, तो क्या करूं?) उसके लिए वो करो — शादी वाला — जिसके लिए आप उसकी बीवी हुई हो। आप बात समझिएगा, बहुत गहरी बात है — जिसके लिए वो पति हुआ है, तो फिर देखो, उसका ख्याल रखो।
देखिए, पहले आपको इसे भी जरा गहराई से समझना पड़ेगा — जब हम विवाह करते हैं, तो विवाह क्यों करते हैं? (उसका मतलब) ये कहां आ गया कि शारीरिक संबंध हमेशा ही बने रहें? हमेशा की बात नहीं होती है, बात जरूरत की होती है — उसकी जरूरत है। (बॉडी एग्री नहीं कर रही —) तो आपने जिम्मेदारी ली है। (शादी तो धोखे से हुई, अनजाने में —) मैं जो समझ के कर रहा हूं (वो कह रहा हूं) — तो आप भी उनको वहां लाइए ना; आपका भी कर्तव्य है, आप भी उन्हें लाइए। और कभी ना कभी हम अपने लिए (भी तो) उनके साथ कर रहे थे — समझिए। अब आपकी समझ बढ़ी, तो क्या हम उसके लिए भी तो (कर) सकते हैं? कभी ना कभी तो हमने किया है, तो हम उसके लिए कर सकते हैं। एक समय था, तो हम उसके साथ अपने लिए तो कर ही रहे थे; अब हमारी समझ विकसित हो गई, उसकी नहीं हुई, तो हमारा कर्तव्य है कि हम उसके लिए करके उसको यहां (तक) लाएं।
(कोई जबरदस्ती थोड़ी किसी को ला सकता है —) वो देख लो — आप कुछ बता रहे हो, उसे अपना रहा है कि नहीं। वो अगर नहीं अपना रहा, तो छोड़ दो फिर। लेकिन आप उसका सहयोग करो — अगर वो आपके बताए हुए मार्ग पे चल रहा है, जैसे आपने समझा है वो उसको फॉलो कर रहा है, तब उसे सहयोग करना चाहिए। (उसे सहयोग की जरूरत नहीं, जैसे मैं निकल गई वो भी निकल जाएगा —) आप भी निकलीं, तो कहीं ना कहीं से सहयोग हुआ है; बिना सहयोग के हम आगे नहीं जा सकते। मैं स्त्री की बात नहीं कर रहा हूं, मैं पुरुष की भी बात कर रहा हूं — मैं कोई स्त्री-पुरुष की बात नहीं (कर रहा); मैं जिसके साथ जीता हूं, अगर मैं आगे निकला, तो मेरा कर्तव्य है, जिम्मेदारी है उसको ही लेके चलना। अगर वो नहीं आता है, तो छोड़ दो, फिर उसको उसके हाल पे छोड़ दो — एकदम छोड़ दो, क्योंकि नहीं तो आप वहीं रुक जाओगे। आप उस जगह हो — अगर वो आगे नहीं आ रहा है, तो उसका त्याग कर दो; अगर आगे आ रहा है, तो उसका सपोर्ट करो, मतलब सहयोग करो। (अगर वो कहे कि इस कंडीशन में भी मैं रह लूंगा —) तो फिर तो कोई दिक्कत नहीं है। अगर वो कहता है कि मुझे किसी भी परिस्थिति में तुम्हारे साथ ही रहना है, तब तो फिर कोई दिक्कत नहीं है — वो तो प्रेम है। फिर देखो, (वो) लायक क्या है — सामने वाले का प्रेम है, या डर है। आप देख लो, क्योंकि आप वहां हो।
आप बोल दो उन्हें कि हम घर तब आएंगे, जब जिसके लिए निकली हूं, वो तो हो जाए। अगर मैं जैसे गई, वैसे ही आई, तो फिर मतलब क्या घर आने का? आप कहिए कि जिसको हम खोजने निकले, अगर उसको बिना लिए आते हैं, फिर मेरे आने का क्या मतलब, और जाने का क्या मतलब? (बोल दो) कल या परसों आप आके मिल लेना, जहां मैं रहूं; लेकिन मैं आऊंगी तभी, जब मुझे मिल जाएगा — जिसके लिए आप गए हो। आप देखो, आलू ही खरीदने गए हो, तो आलू लेके ही लौटना। आप क्या लेने गए हो, वो आप देखो — डिसाइड हमेशा करना पड़ेगा — लेकिन वो लेके आओ, बस। और नहीं तो फिर आप वैसे ही चले गए, तो फिर आपके निकलने का क्या मतलब? टाइम पास करके आ गए, (जैसे) पता नहीं था क्या लेने (गए थे) — फिर वहीं आ गए। आप बोलो — अब मैं जा रही हूं; अब जिसके लिए जा रही हूं, (वो) होगा, तभी इस दरवाजे के अंदर कदम रखूंगी; और नहीं तो एक काम करना — जहां भी रहूंगी, आपको बता दूंगी, जब भी मेरी याद आए, आके मिल लेना। अब ये कदम निकल रहा है, तो वापस आएगा तभी, (जब) लेके (आएगा), नहीं तो नहीं आएगा — फिर आप आगे ही बढ़ेंगे।
जिसके लिए उसने पूरा जीवन दे दिया, जिसके साथ (रही), और वो व्यक्ति — अभी उसका शरीर भी नहीं जला है — और कह रहा है मेरी दूसरी शादी हो जाएगी, तो वो (आत्मा) तो मोक्ष की तरफ बढ़ना ही बढ़ना है; इसको दूसरी बीवी मिले या ना मिले, लेकिन उस जीवात्मा की यात्रा जरूर आगे बढ़ जाएगी।
(पुनर्जन्म होता है क्या?) देखो, जब आप शरीर छोड़ना, (तब) देख लेना अगला जन्म होता है कि नहीं। (जो लोग कहते हैं कि उन्होंने देखा —) अगर वो देख सकते हैं, तो मैं क्यों नहीं देख सकता? यही तो उनसे पूछो कि मैं कैसे देखूं। उनके पास जाओ और बोलो — भैया, जैसे आपने देखा, मुझे भी बता दो। (और जो कहते हैं इसके बाद कुछ नहीं है —) इसके बाद जीवन नहीं, लेकिन जीवन के पीछे कोई था या नहीं? (अगर) कोई आत्मा-वात्मा नहीं है, कोई जीवात्मा नहीं, तो फिर ये सब बकवास-बाजी करने की क्या जरूरत है? खाओ, पियो, रहो, क्योंकि एक दिन खत्म हो जाएगा — तो ये खोज किसकी करें? अगर आगे कुछ है ही नहीं, पीछे कुछ है ही नहीं, (और) बोलते हैं इसी जीवन के लिए करना है — इसी जीवन में जो दर्द हो रहा, तकलीफ हो रही, दुख हो रहा, परेशानी हो रही, आगे तो जीवन ही नहीं है — तो फिर छोड़ो, इसी तकलीफ में ही जी लो; कितने लोग तो तकलीफ में ही गुजार देते हैं। जब आगे कुछ (है) नहीं, तो ये तकलीफ कहां से आई? (आपका मानना क्या है?) मेरे मानने से क्या हो जाएगा? मैं तो सिर्फ इतना आपसे कहना चाहता हूं कि इस संसार में कई बालक एक ही दिन पैदा हो रहे हैं — एक अपाहिज, एक सुंदर, एक कुरूप, एक राजा के यहां, एक रंक के यहां; उसने तो अभी कर्म की शुरुआत भी नहीं की — एक ज्ञानी, एक अज्ञानी, एक मंदबुद्धि, एक पागल — क्यों ऐसा? इसका क्या जवाब है आपके पास?
(मुझे इस प्रपंच में पड़ना ही क्यों है?) मेरा तो एक ही कहना है — आप जहां उलझे हो, वहां से अपने आप को सुलझा लो, बस; आगे क्या है, पता चल जाएगा। (ओशो के पुनर्जन्म के वीडियो आ रहे हैं, सच मानें या झूठ?) अच्छा, मान ही लो उनका पुनर्जन्म हुआ, तो क्या होगा, और नहीं हुआ तो क्या हो जाएगा? (हमें) तो अपने आप से मतलब (होना चाहिए)। एक समय ऐसा आएगा, पता चल जाएगा।
वही सूरज का ताप फूल पे गिर रहा है, (तो) सुगंध फेंक रहा है; लैट्रिन पे गिर रहा है, (तो) बास मार रहा है, बदबू आने लगी — ताप तो एक है। आपने उस दुख के लिए काम किया है, ऐसे नहीं दुख पाया है — आप ये मत समझिए। कोई भी चीज अपने से नहीं आती; आपने उसके लिए काम किया है।
(दुख की कोई चाह नहीं करता —) मैं एक व्यक्ति हूं, मैं कह सकता हूं कि मैंने दुख को चुना है जीवन में, शौक से। मैं अपने आप को उस जगह पे ले गया, जहां दुख ही था। जैसे मान लीजिए, मेरे पास व्यवस्था थी, फिर भी मैं ठंडियों में नदी किनारे बिना बिस्तर के पड़ा रहा। (साधिका ने कहा, आप खुद को जानना चाहते थे —) आपको सुख भी तो मिला ना, आनंद भी तो मिला ना — बहुत लंबे अरसे के बाद रिजल्ट आते हैं। (आप कहते हो कोई कुछ करता नहीं, फिर आपने कैसे दुख चुना?) वो आखिर में पता चल जाएगा। मैंने (वो) आखिरी स्टेटमेंट दिया है — ये अभी करने वालों के लिए नहीं है, ये आखिरी वालों के लिए है। कुछ देर पहले बोला — 'आप समझ पाओ तो' — आपने वो नहीं समझा, मैं आपको हिंट भी दे रहा था। वो शब्द इतना साधारण नहीं है समझना, इसलिए मैं कह रहा था 'समझ पाओ तो'। (वो) तब समझ पाओगी, जब आप समझने से मुक्त हो जाओगी।
मैं तो ज्यादातर समाज में उन लोगों की संख्या देखता हूं — जाना कहीं और है, पता कहीं और का पूछ रहे हैं; उन्हें खुद ही पता नहीं जाना कहां है, बस चले जा रहे हैं। (भक्ति मार्ग से भी बहुत लोग पहुंचे हैं —) ये देखना है कि आपका किसमें (मन) है, वो अपना (देखो)। (मुझे ज्ञान वाली बात ज्यादा समझ आती है —) निकल लो। सबकी समझ अलग-अलग है, सबकी तासीर अलग-अलग है, सबका नेचर अलग-अलग है।
मैं एक घटना बता रहा हूं — मैं कामाख्या जा रहा था, (एक) बंगाली बाबा (साथ थे)। तो मैंने टू-टायर एसी का टिकट करा दिया था। रास्ते में मुझे बोले — यार, बड़ी घुटन हो रही है इसमें, खिड़की भी नहीं, हवा (नहीं) है। तो कहने का मतलब है कि ज्यादा सुख में भी आदमी अगर नहीं जिया है, तो उसे नर्क लगता है। अब मुझे अगर खिड़की वाले में ले जाओ, तो मुझे नहीं जमेगा; उन्हें (एसी) नहीं जमा। और बात बता रहा हूं — उनको मैं टू-स्टार, थ्री-स्टार होटल में भोजन कराता था, बढ़िया भोजन, एक टाइम का कम से कम 500-700 लग जाते थे; हम कई दिन रहे। तो जिस दिन आना था, उसके एक दिन पहले उन्होंने कहा — आज मैं (बाहर) भोजन करके आऊं क्या? मैं बोला हां, करके आइए। वो आए, बोले — आज दिल खुश है, 50 में पेट भर के खाए! अब आपको मैं बता रहा हूं, जितने में (उन्होंने) भोजन किया, उससे ज्यादा (की) वहां (एक) रोटी थी — नान, तंदूरी रोटी 18-20 की एक; वो (वहां) पापड़ खा रहे थे, सूप पी रहे थे, आइसक्रीम खा रहे थे, तड़का दाल, दाल फ्राई, जीरा राइस — लेकिन कभी तृप्त नहीं (हुए); ₹50 में आज तृप्ति मिली, चेहरे पे खुशी भी थी — बोले आज पेट भर खिलाया, और रोटी में घी भी लगाया था। अपना-अपना स्वाद है। आपकी जहां आदत पड़ गई है, आप जिसमें जिए हो, आप किस सोसाइटी में जिए हो, कैसे रहे हो, वो देखना है।
खजुराहो में (एक) रिक्शा वाला — हमारी एक आदत है कि अगर कोई भी साथ है, चाहे रिक्शा वाला हो, कोई भी गाड़ी वाला हो, हम उसके साथ भोजन करते हैं, अकेले नहीं खा पाते, उसको साथ में खिलाते हैं। तो होटल में गए, मंचो सूप वन-बाय-टू करा दिया; उसने एक चम्मच लिया, चेहरा बिगड़ गया; बोला — मुझे अच्छा नहीं लग रहा, मुझे समोसे दिला दो। ₹80 का सूप, 1/2 ₹40 — लेकिन वो ₹10 में खुश हो गया, बोला ये बहुत अच्छा है। तो अपना-अपना टेस्ट, अपना-अपना स्वाद — आपको किसका टेस्ट जम जाता है, किसकी बात समझ में आ जाती है। लेकिन मेरा क्या कहना है? लेके निकलो — बात ये है, बस ऐसे टेस्टर मत लेते रहो। उसके आगे भी कोई काम है — अरे भाई, आप लेके आगे बढ़ो, आपकी यात्रा होनी चाहिए।
जब तक पहुंच नहीं जाते। मेरी तो बात ही खत्म हो गई। मेरे गुरु ने ही मुझे जवाब दे दिया कि जो तुझे चाहिए, मैं नहीं दे सकता, जा सद्गुरु ढूंढ। सद्गुरु मतलब जो उस परम स्थिति पे हो, और तुझे पहुंचा दे। (ऐसे मिले क्या?) मैं वो क्लियर कर देता हूं — पहले मुझे भी क्लियर नहीं था, तो सद्गुरु की परिभाषा (खोजने) मैं निकल गया, कि मैं तो ढूंढ लूंगा। गुरु ज्ञान का प्रतीक है। गुरु (के) शब्दों को लेके आप सत् — सत्य तक पहुंच जाते हो; तो फिर गुरु वहां छूट जाता है। आप सत् (में पहुंचे), और फिर आप किसी के लिए बोलते हो, तो (हो) गए सत् और गुरु। आप इसे और गहराई से समझ लीजिए — जब वो पहुंचने के बाद बोलेगा, तो सत् वो स्वयं के लिए है, (और जो) बोला, तो (वही) गुरु है। गुरु के द्वारा पहुंचे, गुरु वहां छूटा, आप पहुंच गए; फिर आप बोले, तो गुरु निकला आपके मुखारविंद से; फिर कोई उसको लेके निकलेगा, फिर उसे सद्गुरु मिलेगा। (फिर गुरु को छोड़ देना चाहिए क्या?) अरे, छूट जाएगा! छत पे चढ़ जाओगे, सीढ़ी छूट जाएगी, छोड़नी नहीं पड़ेगी; पेट भर जाएगा, थाली छूट जाएगी, छोड़नी नहीं पड़ेगी। छोड़ना पड़ रहा है, इसका मतलब पहुंचे नहीं।
(साधिका ने अपनी समझ दोहराई — गुरु मतलब ज्ञान, कोई इंडिविजुअल आइडेंटिटी नहीं; उस ज्ञान से मूल तक पहुंची, तो मेरे भीतर से जो निकलेगा वो सत्, और दूसरों के लिए वो गुरु —) सत्य तो अंदर ही है, सत्य दिखता नहीं। जिस गुरु के द्वारा आप पहुंचे, वो गुरु छूट गया। (गुरु तो ज्ञान ही था —) तो वो ज्ञान छूट गया ना; अब आपका ज्ञान प्रकट हुआ, आपके ज्ञान का जन्म हुआ — आपके लिए जन्म ही है, ये पहले नहीं था। अब आत्म-ज्ञान हो गया, तो वो छूट गया। (जो मेरे से नया निकलेगा, मेरी अपनी किताब —) वो नया ही होगा — ये एक बात ध्यान रखना — इतिहास में ऐसा नहीं होगा। जैसे एक बच्चे का जन्म होता है, (तो) इतिहास में (कोई उससे) मैच नहीं होता — उसका अंगूठा मैच नहीं होता, कितना भी जुड़वा हो, कैसे भी रहे। तो हमेशा, जब आपका सद्गुरु से मिलना होगा, तो नया ज्ञान होगा; वो फिर पीछे इतिहास में वैसा नहीं होगा। वो जब बोलेगा, तो अपने तरीके से (बोलेगा) — शब्द घुमा-फिरा के वही रहेंगे। जैसे पांच तत्व हर सब में वही हैं, लेकिन रूप अलग-अलग। तो जब भी ज्ञान मिलेगा, तो नया होगा। (ज्ञान तो एक जैसा ही होगा —) मैं वही कह रहा हूं, फिर से समझिए — शब्द वैसे होंगे, बताने का तरीका वैसा नहीं होगा, नया तरीका होगा। जैसे पांच तत्व वही हैं, जब भी किसी बच्चे का जन्म होता है, लेकिन रूप हमेशा अलग होता है। (वो अपने बताने का ढंग चेंज कर देगा?) करेगा नहीं — वो हो ही जाएगा। उसका रहना, उठना, बैठना किसी से मैच ही नहीं खाएगा। और (अगर) मैच खाया, तो फिर वो पहुंचा नहीं है, बनावटी है — (उसने) किसी की नकल की है। वो नया ही होगा, एक अनोखा होगा — उसका उठना-बैठना, कपड़े का पहनावा, उसका रहने का ढंग, बोलने का ढंग, सब अलग होगा। अगर किसी से मैच खा रहा है, तो समझ लेना वो नकल है, बनावटी है, वो अभी पहुंचा नहीं। सत्य तो एक ही है, लेकिन व्यक्त करने का तरीका अलग-अलग होगा। समझने वाले भी अलग-अलग होते हैं — आप जो मेरे सामने बैठे हो, सब अलग-अलग तरीके से समझ रहे हो; हो सकता है कोई समझ भी ना रहा हो। लेकिन मुझे उससे मतलब नहीं है कि कौन समझ रहा है, कौन नहीं समझ रहा। अगर नहीं समझ रहे हो, तो पूछो — आपकी जिम्मेदारी बनती है। मेरा काम है बोलना। अगर आपको नहीं समझ में आया, तो आप पूछो, मैं आपको अलग तरीके से बताऊंगा। नहीं पूछे, तो आपकी जिम्मेदारी है। मैं ये नहीं पूछूंगा कि आपके समझ में आया या नहीं आया, क्योंकि इतना मेरे पास समय नहीं है। मेरे पास तरीकों की कमी नहीं है। और अगर आपने नहीं बोला, तो ठीक है, (मान लूंगा) समझ में आ गया।
सत्य वचन कभी निकलता ही नहीं। झूठ निकलता है, सत्य कभी निकलता ही नहीं। (जो निकल रहा है, उसे सत्य कह रहे हैं —) बस आगे वाले के लिए एक मार्ग है। सत्य कभी बोला ही नहीं जा सकता। सत्य तक पहुंचने का मार्ग मिलता है; सत्य कभी बोला नहीं जा सकता, उस तक पहुंचने का मार्ग है। वो सिर्फ अनुभव है — वो पहुंचने के बाद पता चल जाएगा। उसे व्यक्त नहीं किया जा सकता, क्योंकि व्यक्त आप करोगे, तो कोई आधार होगा, कोई बेस होगा, और किसी के लिए व्यक्त करोगे; तो जिसके लिए व्यक्त कर रहे हो, वो जिसके द्वारा ले रहा है, वो भी बदलेगा — आधार-बेस आपका बदल जाएगा। इसलिए सत्य कभी बोला नहीं जा सकता। (तो सद्गुरु क्या बोल रहा है?) अब वो सत्य तक पहुंच गया — उस सत्य तक पहुंचने का मार्ग बता रहा है; जिस रास्ते (से) पहुंचा, (वो) बता रहा है — वो आपको मार्ग बता रहा है, इशारा कर रहा है। (हमें रास्ता मिला है, तो हमें लगता है हम भी किसी को बताएं —) एक तो आप बताएंगे ही बताएंगे।
ठीक है, लेकिन कभी-कभी हमें उनके तरीके से भी बात कर लेनी चाहिए। जैसे मैं अपनी बहन को फोन करता हूं — वो प्रणाम करती है, 'गुरु जी प्रणाम'; (मैं कहता हूं) 'हां बोल, काहे फोन किए?' 'बस ऐसे याद आई।' 'अच्छा, और का हालचाल है? खाना खाई?' 'हां महाराज, खाए।' 'अच्छा, और ठीक बा?' 'हां, ठीक बा।' 'का बताई महाराज?' (मैं कहता हूं) 'अपन आत्मिक कल्याण कर।' 'हां महाराज, करब — पहले लड़कियन के टेंशन बा।' 'हां, टेंशन ले ले; जब टेंशन दूर हो, तब आई, तो कल्याण मार्ग बता देब, नहीं तो पड़ी रहो।' हम खूब बात करते हैं। तो वो तरीका कैसे आया? क्योंकि वो तरीका मेरे पास है, क्योंकि मैं उसमें जिया हूं, वो गया थोड़ी ना है। हम अपने आप को एडवांस बनाने के लिए वो तरीका उठा नहीं रहे हैं — और (जता रहे हैं कि) मैं तुमसे हाई हूं। कहीं ना कहीं हमें ये रहता है कि हमने बहुत ज्ञान ले लिया, अब मैं उसे जता रहा हूं कि तेरे-मेरे में अंतर है। (हमें लगता है वो दुखी है, परेशान है, तो उनको भी ये रास्ता मिले —) वो परेशानी में (भी) खुश है, कुछ परेशान नहीं है, वो मजे में है, मस्त है, उसे कोई टेंशन नहीं है। जब जरूरत पड़ेगी, तो खुद ही बोलेंगी। अरे, वो खूब बढ़िया मस्त है, तुमसे ज्यादा है।
(अगर लगे कि मां है इसलिए मुझे ऐसा लग रहा है, तो ये मोह हो गया ना?) तुम्हारी मम्मी को मम्मी नहीं कहोगी, तो क्या कहोगी? है ही है। (उससे ज्यादा) दाई तो बन जाएंगे। आदि गुरु शंकराचार्य अपनी मां के लिए नहीं गए क्या? अद्वैत का प्रचार कर रहे थे, लेकिन अपनी मां को तो जलाने गए, लास्ट (में)। जिससे हम जन्म लिए, तो एक ममत्व तो रहता है। (बुद्ध) खुद नहीं गए अपने पिता के पास क्या? पिता बीमार हुए, गए — और संसार में (कोई और) पिता बीमार नहीं दिखा उन्हें? समझिएगा इस बात को। अगर बुद्ध के पास समभाव (ही था), तो संसार में जितने पिता बीमार हुए, सबके पास जाते। व्यक्तिगत अपने पिता से मिलने गए कि नहीं गए? अरे, वो (भाव) कहीं नहीं जाता, चाहे ज्ञान हो जाए, चाहे कुछ भी हो जाए। जबरदस्ती हटाने की कोशिश कर रहे हो — आप एडवांस में आ रहे हो कि अब मैं बहुत हाई चली गई हूं। अरे भैया, उनके पास एक तरीका है, वो हाई नहीं आ पाईं; तुम्हारे पास तो दोनों हैं, तो तुम उनमें घुस जाओ ना, क्योंकि तुम्हारे पास वो तरीका छिपा हुआ है। उनको उठाने का तरीका भी आसान (होगा) — जब आप उनमें होकर बात करेंगी, तो आप उन्हें उठा सकती हैं। (हमें लगता है हम उनसे झूठा कर रहे हैं —) क्यों झूठा? फिर वही बात — आप सच-झूठ का निर्णय करने वाले कौन हो? आप भी तो उसमें कभी जी रही थीं — आप भी उसमें जिए हो कि नहीं? उनका भी समय आएगा, निकल जाएंगी। आपके पास दो तरीके हैं, उनके पास तो एक ही है — आप उन्हें क्यों खींचना (चाहती हो)? उनमें हो जाइए ना। निकालना क्यों है उनको? वो मस्त हैं ना। देखो, मैं (बहन से) इतनी बात करता हूं, मैंने कभी उसको (जबरदस्ती) कहा कि आजा? (बस) बोले — एक काम कर, कर ले आत्मिक कल्याण; (वो कहे) लड़कियन के टेंशन; हम कहे — ले ले टेंशन, कोनो बात ना, पूरा कर, फिर आइए।
(क्या ये चीटिंग नहीं — उन्हें वहीं रहने देना?) कहां चीटिंग है? जब उनकी वहां से समझ बढ़ेगी, तो वो खुद निकलेंगी; और जब उन्हें मेरी जरूरत होगी, तो खुद पुकारेंगी, मैं जाऊंगा। बल्कि बात करके मैं उसको ऑप्शन तो दे रहा हूं ना कि मैं हूं — आत्मिक कल्याण करना हो, तो आ जाना मेरे पास। हम जबरदस्ती क्यों करें? (हम जैसे लोग ही जबरदस्ती करते हैं, क्योंकि खुद को महान ज्ञानी समझते हैं —) हम तो आपको बताएं — हम पिल्लों के साथ बैठते हैं; अब पिल्ले को हम क्या ज्ञान दें — चल, तू भी आत्मज्ञानी हो जा? जब हम दिन भर पिल्लों की साफ-सफाई करते रहे, तो वो मुझे खूब चाट रहे हैं, और हम उनके साथ खो गए। अब हम उनको कहें — नहीं, मुझे समझ में आया, तू भी समझ; ले डंडा, चुप, समझ ज्ञान को अब! वो कहेगा — नहीं, तुम्हें चाटना है; अरे भैया, उसे तुम्हें प्यार करना है, उसकी स्थिति वही है। अभी हम मुंबई गए थे काम से, तो (बहन) के यहां थे — हम उसकी ही बात सुन रहे थे, हम थोड़ी ना वहां ज्ञान ठोक रहे थे; उसे क्या समझ में आएगा? उसे तो अपना टेंशन है — प्रॉपर्टी है, पैसा है, नौकरी है, बिजनेस है, व्यापार है, बेटे की बीमारी है, पति की बीमारी है — सुनते रहे। हम कहें — ठीक है रे, अपने कर्म का परिणाम है, भोग ले। और (हम) कहें — का बताई रे, हम खुद भोग-भोग के आगे जात हैं; देख हमारी स्थिति — ना पास पैसा-रुपया, ना परिवार, एक कपड़े पे हम जीत हैं, बुढ़ापे में एक गिलास पानी के देई — तबो देख, हम ज्यादा खुश हैं। तो वो हंसने लगी। ये सब जब बोल दो, तो हंसने लगती है। (उल्टा बोलना सीखना पड़ेगा?) नहीं, उल्टा नहीं — आप उसकी समझ से बात करो। आपके पास दोनों (तरीके) हैं — उस स्थिति में आप जी हो, वो आपके अंदर से गया नहीं है, जा भी नहीं सकता — तो आप उनके तरीके से बात करिए ना। फिर हमें क्या जरूरत है दिखाने की कि मैं ज्ञानी हूं? और कभी-कभी वो स्थिति बात-बात में आ भी जाती है, तो उस टाइम पे आप बता सकते हैं — (जैसे) मैंने कहा, भैया, अपने कर्म का फल भोग ले; (तो वो कहती है) हां महाराज, सही कहत हैं।