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प्रश्नोत्तर P4-0074 · भाग 4

(कुटिया में सन्यासी महाराज जी के संदर्भ में) सन्यासी के भेष (गेरुआ वस्त्र) में क्या ताकत है? जिसने भेष धारण किया है, उसे अपने आप से क्या देखना है?

जिस हिसाब से आप बैठे हो आज तक, जिस भेष को धारण किया — हमें यह देखना है कि जिस भेष को मैंने धारण किया, (क्या मैं उसके लायक हूं)। आप जिस भेष को धारण किए हो, अगर आपसे कोई गलती हो जाए तो पूरा समूह बदनाम होगा — एक नहीं, पूरा समूह। अब इस भेष से क्या होता है? बड़े आराम से हमें साधना करने के लिए व्यवस्थाएं मिल जाती हैं। अब देखना है कि हमें अगर कोई व्यवस्था दे रहा है तो हमें साधक समझ के दे रहा है, सन्यासी समझ के दे रहा है। सन्यासी का मतलब — अपने बनाए हुए अस्तित्व का नाश कर देना। हम तो और नया व्यवहार पैदा कर रहे हैं, तो कहीं ना कहीं इस भेष का दुरुपयोग कर रहे हैं। आप ताकत की बात कर रहे थे — भेष में इतनी ताकत है कि इसको देख के परमात्मा की याद आती है। क्यों आती है? क्योंकि इस भेष के लिए लोगों ने बलिदान दिया है। लेकिन आज हम उनके बलिदान की वजह से बस रोटी खा रहे हैं। अपने आप से पूछिए कि आप सच में जिसके लिए (भेष धारण किए), वो हुआ? ये अपने आप से पूछना है। हमें किसी को जवाब नहीं देना है, मुझे अपने आप से पूछना है। हमारा कोई मालिक-उलिक नहीं, हम ही हैं, हम ही कर्ता हैं, हम ही धर्ता हैं। हुआ तो उपलब्धि क्यों नहीं हुई? नहीं हुआ तो क्यों नहीं हुआ? क्या मैं इस वस्त्र के लायक नहीं हूं? क्या मैं इस वस्त्र वाला काम कर रहा हूं? अभी मेरे से अगर कोई गलती हो जाए तो मैं ही बदनाम होऊंगा, क्योंकि मैं किसी के समूह के द्वारा सांप्रदायिक काम नहीं कर रहा हूं। मेरे से अगर कुछ हो जाए तो सिर्फ मैं अकेला बदनाम होऊंगा, मेरे ऊपर ही उंगलियां उठेंगी, क्योंकि मैं किसी से जुड़ा ही नहीं हूं, किसी से जुड़ के काम ही नहीं कर रहा हूं। लेकिन अगर आपसे कुछ गलती हो जाए तो पूरा एक समूह बदनाम होगा, पूरी एक भीड़ बदनाम होगी, पूरी हिंदू संस्कृति। तो अपने आप से पूछो कि आप जिसके लिए भेष धारण किए थे, क्या वो कार्य आपसे हुआ? हो रहा है? और ये अपने आप को जवाब देना है, किसी और को नहीं। मैं नहीं कह रहा हूं आप यहां जवाब दो — कोई मतलब ही नहीं है। आप जवाब भी दे दोगे तो क्या वो जवाब सही है गलत है, ये पता चलेगा क्या? इसलिए जवाब का भी कोई मतलब नहीं है। ये अपने आप से पूछो कि जिस भेष को मैंने धारण किया है, उस भेष का जितना पालन है, नियम-संयम, क्या मैं वो कर पा रहा हूं? क्योंकि इस भेष को देखकर मुझे लोग व्यवस्था देते हैं — मुझे नहीं देते, मेरे भेष को देख के। क्यों देते हैं? क्योंकि समाज को यह बताया गया है कि इस भेष वाला व्यक्ति यह काम करता है। अब देखना यह है कि मैं वो काम कर रहा हूं? अगर मैं वो काम कर रहा हूं तो मेरा स्तर उठ रहा है, और वो काम नहीं कर रहा हूं तो मैं गिरते जा रहा हूं। यह अपने आप से पूछना है, नहीं तो एक काम करो — भेष निकाल दो। हमने भी भेष पहना था। तो हमने देखा कि ये परंपरावादी भेष है, ये पवित्र भेष है, और इसके कुछ नियम बनाए गए हैं, इस भेष से लोग जुड़े हैं। इस भेष वाला खड़े होकर पानी-पूरी नहीं खा सकता — तो भैया हमको तो खाना है। खड़े होकर दुकान पर आइसक्रीम नहीं खा सकता, होटल में खाना नहीं खा सकता। जैसे अभी कल हम गए थे — दिन भर थके, हम ही लोग भोजन बनाते हैं, तो हम रात को होटल में ही खाना खा के आए। अब होटल में अगर गेरुआ कलर वाला जाएगा तो अनेक सवाल खड़े होते हैं। तो हमने कहा — भैया देखो, इस भेष को मैं प्रणाम करता हूं, अभी मैं इस भेष के लायक नहीं हूं और इसके नियम का मैं पालन भी नहीं कर सकता। तो मैंने उस भेष को प्रणाम करके छोड़ दिया। मेरा यह कहना है कि आप किसी भी भेष को — अगर भेष वाला काम नहीं करते हो — तो आप उसे प्रणाम करके छोड़ दो। एक समूह को बदनाम मत करो। भेष में पावर है। जैसे एक पुलिस के कपड़े में पावर है — एक भीड़ में अगर एक वर्दी वाला आ जाए तो 100 लोगों को भी पीछे कर देगा। क्या आपको लगता है वो वर्दी वाले की ताकत है? नहीं। उस वर्दी वाले से बहुत लोग जुड़े हैं; उन्हें पता है कि एक फोन पे यहां गाड़ी की गाड़ी आ जाएगी। लेकिन वर्दी निकाल के वो खड़ा हो जाए तो दो आदमी भी धक्के मार के भगा देंगे। (महाराज जी,) बड़गांव में हम आप लोगों को ज्ञान दे रहे थे, एक शराबी आया, इन चारों को प्रणाम किया और हमारे सामने आके उजड्डता करने लगा, और हम हंस रहे थे — हम कहे, यार देखो, यही भेष का प्रभाव। ये जहां से ले रहा है, वो तो खुद अभी ले रहे हैं, देने लायक थोड़ी ना हैं, वो अभी दाता में तो आए ही नहीं; और जहां से इसको कुछ मिल सकता था, उसे धक्का मार रहा है। अभी मैं किसी अनजान गांव में चला जाऊं तो हमें कोई नहीं खड़ा करेगा, लेकिन महाराज जी को आराम से सारी व्यवस्थाएं मिल जाएंगी। क्यों? महाराज जी को नहीं — इस भेष को। जैसे पुलिस की वर्दी की ताकत है, वकील के ड्रेस की ताकत है, टीटी के ड्रेस की ताकत है — लेकिन उस ताकत के पीछे कुछ काम किया है लोगों ने, ऐसे थोड़ी ना बन गई है। अब देखना ये है कि जिस भेष को आपने धारण किया, क्या वो काम भी कर रहे हो? पुलिस की वर्दी आपने धारण की, मतलब समाज की सुरक्षा की जिम्मेदारी आपकी। अगर आप किसी को सता रहे हो तो आप उस वर्दी का दुरुपयोग कर रहे हो। सुरक्षा करने में तुम्हारे प्राण भी चले जाएं तो दो — तब पुलिस वर्दी का मतलब है, नहीं तो नहीं। अब ये सन्यासी भेष अगर कोई धारण करे, तो दो से ज्यादा कपड़े नहीं रखना है; तीन दिन से ज्यादा कहीं एक स्थान पे रहना नहीं है। क्योंकि एक दिन आप अनभिज्ञ रहेंगे, दूसरे दिन नाम-वाम पूछा जाएगा, तीसरे दिन परिचय होने लगेगा। अब सबके शत्रु होते हैं, मित्र भी होते हैं। अब जो आपको भोजन-वोजन कराएगा, उसके विरोधी आपके शत्रु हो जाएंगे, और आप राग-द्वेष में फंस जाओगे। तो कहा गया है — सन्यासी दो से ज्यादा कपड़ा नहीं रख सकता, 12 साल का भ्रमण है, तीन दिन से ज्यादा कहीं रुक नहीं सकता, और मिला तो खा लिया, कभी मांग नहीं करना है। अब देखो कि गेरुआ पहनने के बाद आप इतना पालन करते हो क्या? तब तो आप गेरुआ के अधिकारी हो, तब तो वह गेरुआ आपके आत्मिक कल्याण में सहयोगी हो गया। और अगर नहीं करते हो तो वह बाधा बन गया। नहीं तो आप निकाल के, हाथ जोड़ के, प्रणाम करके उसे छोड़ दो, क्योंकि आप फिर दुरुपयोग कर रहे हो। तो हम जब गेरुआ पहने, तो देखा तो हमने कहा — भाई, प्रणाम है तुझे, क्योंकि हम उतना पालन नहीं कर सकते, हमारी खोज कुछ अलग है। तो हम किसी समूह को क्यों बदनाम करें? बदनामी होना है तो खुद हो ना भाई। आप गेरुआ कलर पहन तो लिए, बड़े आसानी से मिल जाता है, क्योंकि लोग बैठे हैं देने के लिए — बाजार में चले जाओ, कोई इसकी लाइसेंस थोड़ी ना है। बड़े आराम से गुरु लोग तो इंतजार कर रहे हैं — आओ चेला बनो, जिंदा आदमी मेरा प्रचार करेगा, क्योंकि जहां भी जाओगे किसी आश्रम में, गुरु का नाम बताना पड़ेगा। कहने का मतलब यह है कि अपने आप से पूछो कि जिस भेष को आपने धारण किया है, जैसा आप अपने आप को बता रहे हो, क्या वैसा काम (कर रहे हो)? अब ये मैं काम खुद कर रहा हूं — प्रत्यक्ष ज्ञान, आध्यात्मिक प्रत्यक्ष ज्ञान, अपनों की कुटिया — यह किसी से ना जुड़ा है। अगर यहां कुछ भी होगा तो उसकी जिम्मेदारी मेरी है; अगर उंगलियां उठेंगी तो एक व्यक्ति पे उठेंगी। तो भैया, कोई भी आप भेष धारण करो, उस भेष के पीछे लोगों ने बहुत त्याग किया है, ऐसे ही कोई भेष नहीं बना है। मुझे ये देखना है कि क्या मैं वो काम कर रहा हूं।

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वीडियो: 25 जनवरी 2026 रविवार प्रश्नोत्तरी#योगी · 2026-01-25