प्रश्नोत्तर P4-0023 · भाग 4
(लाइव) प्रणाम योगी जी। परम सत्य या निर्वाण की प्रकृति — परम ज्ञान, मोक्ष या निर्वाण के बाद की अवस्था — को शब्दों में बांधना असंभव माना गया है; इसे हमेशा ‘नेति नेति’ (यह नहीं, यह नहीं) कहकर ही समझाया जाता है, क्योंकि हमारा मन केवल सीमित चीजें ही समझ सकता है। क्या यह सत्य है?
ये सत्य है। हमारी समझ कहां तक? हमारा मन कहां तक? शरीर तक। तो हम रूप तक, रंग तक ही समझ सकते हैं; हम शब्द, दृश्य, गंध, रस, स्पर्श तक समझ सकते हैं, (उसी की) बात हो सकती है। वही औजार हैं ना हमारे पास — उसी के थ्रू समझ सकते हैं, उतनी ही हमारी बात हो सकती है। और इसी में हम फंसे भी हैं। और जब हम इससे निकल गए, तो फिर हमें शब्दों की जरूरत ही नहीं है; शब्द तो वहां खत्म हो जाते हैं।
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वीडियो: रविवार प्रश्नोत्तरी 1 मार्च 2026 #योगी · 2026-03-01