अगर ईमानदारी से खाने की इच्छा है, तो खाओ। भले कितना ही खाओ, कुछ भी खाओ, उसमें कुछ नहीं। ईमानदारी से, बिना किसी को तकलीफ दिए, उसमें आत्मिक नहीं गिरते। क्यों गिरेंगे? आत्मिक तो तब गिरते हैं, जब हम छीन के खाते हैं, बेईमानी से खाते हैं।
ईमानदारी में कोई निग्रह की जरूरत नहीं। और इस रस की कभी पूर्ति हो सकती है, जब खाने का रस है? हो सकती है। समझ के छोड़ देना। समझ के छोड़ देना। तो ये समझ कब आती है, छोड़ने की? ये आ तो रही है। यही तो समझ है। यही समझ है, कि हम जरूरत में जिएं। जरूरत में जिएं।
दोनों अलग-अलग हैं। गुरु और हरी एक जैसा हो गया है, लेकिन है अलग-अलग। ये शरीर में है, वो शरीर में नहीं। लेकिन है अलग-अलग। एक नहीं बोल सकते। एक जैसे बोल सकते हो। अलग-अलग है, तभी तो खोजा जा रहा है। अगर वही हरी होता, तो खोजता कैसे? भटकता कौन? तो अलग-अलग है। इसे प्रत्यक्ष समझो। एक ही होता, तो भटकने की जरूरत ही नहीं होती। कौन किसको खोजता?
हां, जहां है वहां भी तो दुखी है। अगर आगे कुछ नहीं होगा, तो इतना तो पता चल जाएगा। वहां मैं तो मिलूंगा, अपने आप से। मैं तो हूं। मैं तो हूं। और कुछ नहीं होगा, ये डर है। लेकिन मैं कहां, किसके लिए जा रहा हूं? मैं तो अपने दुखों से मुक्त होने के लिए काम कर रहा हूं। मैं कहीं और तो नहीं जा रहा। मुक्त होने के बाद मैं तो बचूंगा। मैं अपने दुखों से बचूंगा। राग, द्वेष, मोह, आसक्ति, इच्छा, अपेक्षा, मैं कर्ता, इनसे मैं परेशान हूं। इनसे मुक्त होने के लिए यात्रा कर रहा हूं। इसे पकड़ा है। छोड़ भी सकता हूं। छोड़ने के बाद तुम तो रहोगे। मैं रहूंगा। लेकिन क्या पता, आत्मिक कल्याण हो, वहां नहीं हो। मैं वही तो कह रहा हूं। आत्मिक कल्याण का क्या मतलब?
आत्मिक कल्याण का मतलब है कि जीवन में दुख नहीं हो, अशांति नहीं हो। जब ये छूट जाएगा, तो जीवन में शांति आ जाएगी, दुख खत्म हो जाएगा। इन्हीं के कारण। इनको छोड़ते ही हो गया आत्मिक कल्याण। जैसे मुझे रोग हुआ है, मैं बड़ा दुखी हूं। रोग ठीक होने के बाद क्या होगा? दुख खत्म हो जाएगा। मैं रहूंगा। मैं तो रहूंगा। बस दुख खत्म हो गया। दुख ही तो मेरी पीड़ा है। कुल मिला के इनसे छूटना, राग, द्वेष, मोह, आसक्ति, इच्छा, अपेक्षा से छूट जाना, यही आत्मिक कल्याण है। जैसे रोग से छूट जाना ही उपचार है। और कुछ मिलता नहीं। लेकिन रोग में रहना ठीक है, कि रोग से मुक्त होकर रहना ठीक है? मुक्त होना।
अब तुम बोलो, रोग से मुक्त हो जाऊंगा तो क्या मिलेगा? रोग से मुक्ति मिलेगी। वही तो चाहिए। हम दवा इसीलिए ले रहे हैं। और तुम बोलो, रोग से मुक्त होने के लिए भी बाहर कुछ चाहिए। क्या चाहिए? एक नया रोग चाहिए क्या? तो राग, द्वेष, मोह, आसक्ति, इच्छा, अपेक्षा, मैं कर्ता के भाव से मुक्त हो जाना ही आत्मिक कल्याण है।
होना में स्थित हो जाना, और प्रयास रहित स्थिति में हो जाना, यही आत्मकल्याण है। एकदम यही ठीक है।
अंगदान, पूरे शरीर का दान, आजकल लोग कर देते हैं। अगर मैं कहूं, तो कोई शरीर दान करे, एक अंगदान किया। अब पता नहीं वो अंग किसको जाएगा। पता चला, उस अंग का किस तरीके से दुरुपयोग करेगा। अगर मुझसे व्यक्तिगत पूछेंगे, तो मैं कहूंगा, हमें अगर शरीर मिला है, तो इसका उपयोग करने का अधिकार है, दान करने का नहीं। क्योंकि अगर आपने दिया, तो कहां जाएगा। अगर किसी दुष्ट व्यक्ति के हाथ में अंग लग गया, तो वो पहले दुष्टता नहीं कर पा रहा था, लेकिन आपके अंग के द्वारा करने लगा। तो उसका जिम्मेदार कौन होगा? आप होंगे। क्योंकि आपने उसे ताकत दी। ऐसा नहीं कि वो किसी महात्मा के पास जाएगा। महात्मा तो लेगा भी नहीं। महात्मा किसी के अंग को स्वीकार ही नहीं करेगा। परिस्थिति में नहीं। तो वो अंग ज्यादा से ज्यादा कहां जाएगा? सदुपयोग होने की संभावना कम है। दुरुपयोग होने की संभावना ज्यादा है। तो आप देख लो। स्वतंत्रता आपकी है। अगर मुझसे पूछोगे, तो मैं कहूंगा, इस अंग पर आपका अधिकार है सदुपयोग करने का। आप इसे कैसे उपयोग करो। आपका दान देने का अधिकार नहीं है।
उसका उपयोग कौन करे, ये पक्का नहीं है। लिखित में ये नहीं दिया जा रहा, कि ये अंग मैं दान कर रहा हूं, तो इसका उपयोग कौन करेगा। ऐसा है नहीं। और अगर किसी दुष्ट के पास मेरा अंग चला गया, तो दुष्ट दुष्टता ही करेगा। फिर उसका परिणाम मुझे भी मिलेगा। इसलिए इस अंग का सदुपयोग करो। बस मेरा इतना कहना है। मैं अपनी समझ से कह रहा हूं। बाकी आपकी मर्जी है, स्वतंत्रता है।
रक्तदान की भी वही बात है। रक्त दे किसे रहे हो? पता ही नहीं चलता। मेरा यही कहना है, आप देख किसे रहे हो। मेरी मानवता का उपयोग कहां हो रहा है? अगर मैं कुछ ताकत दे रहा हूं, उसका उपयोग कहां हो रहा है? ब्लड का कभी बच्चे के लिए भी उपयोग हो जाता है। घुमा-फिरा के यही है, कि उपयोग कहां किया जा रहा है। मेरे दिए हुए वस्तु का, मेरे दिए हुए अंग का, मेरे दिए हुए सामान का, अगर सदुपयोग हो रहा है, तो मुझे देना चाहिए। लेकिन ये पक्का कर लो। ये पक्का हो नहीं सकता। ये पक्का नहीं। फिर देख लो क्या करना है। फैसला आप लो। फैसला थोपा हुआ नहीं।
जहां उपयोग होगा, वैसी ऊर्जा आपके पास आएगी। भाव तो कोई काम का नहीं। मैं सोचूं, मेरा भाव शुद्ध है, किसी लंगड़े को मेरी हड्डी लग जाए, वो ठीक हो जाए। लेकिन उसके बाद वो करे क्या? हड्डी कहीं उपयोग हो जाए, और वो जाके किसी का मर्डर ही कर दे। जैसे सामान उपयोग हुआ। किसी ने बंदूक खरीद के मार दिया, तो भी पूछा जाएगा, कौन सी दुकान से खरीद के लाया, अथॉरिटी है कि नहीं, कहां से आया, किसने दिया। पूरी इंक्वायरी होगी। मेरी हड्डी, आंख कहां से निकली। जब आदमी फंसता है, तो पूरी इंक्वायरी होती है, कहां-कहां से आया। ऐसा नहीं कि सिर्फ मारने वाला पकड़ा जाएगा। कर्म का सिद्धांत इतना गहरा है। मैंने आंख दे दी किसी को, और उसने जाके मर्डर कर दिया, रेप कर दिया, आतंक मचा दिया, जनमानस की हानि कर दी।
एक सच्ची कहानी है। एक आदमी को आंख दी गई। देने वाले ने सोचा, मैं बूढ़ा हो गया, मेरी उम्र जाने वाली है, ये जवान है, इसको दे देता हूं। उसने दी। तो सबसे पहले उसी आदमी का मर्डर किया, जिसने आंख दी थी। कह रहा था, मैं जिंदगी में मजा लेना चाह रहा था, देख नहीं पा रहा था। ये हुआ, ले, तेरा ही तो है। तू मुझे ना देता। अब कोई बात नहीं, मैं जेल में जाऊंगा, लेकिन मैंने मजा तो ले लिया। लेकिन देने वाले के लिए सजा बन गई।
किसी को बंदूक भी चाहिए, तो उसकी पूरी इंक्वायरी होती है। पूरा कागज लिया जाता है, आईडी ली जाती है, कि कल ये कुछ करेगा तो इसे पकड़ा जाएगा। सिस्टम की व्यवस्था है। पूरी आईडी लेता है। क्यों लेता है? पहले पूछा ही जाता है। बंदूक का लाइसेंस लूं, तो मुझे क्या जरूरत है, बतानी पड़ेगी। समाज में सदुपयोग क्या करोगे। आपने अपने नाम से कुछ ले लिया, और उसका दुरुपयोग इन्होंने किया, तो पहले आप भी पकड़े जाओगे। किसके नाम से हुआ। आपने इनको क्यों दिया? अपने नाम से नहीं लेते, तो इनके हाथ में जाता ही नहीं। कर्म का सिद्धांत पीछा नहीं छोड़ता। तो आप क्या कर रहे हो, किस स्थिति में कर रहे हो, ये समझना बहुत जरूरी है। और खुद को समझना।
नहीं मिलता, वहां नहीं मिलता। जैसे यहां मैं एक पेड़ लगा के मेरा शरीर खत्म हो गया, मैं दूसरी योनि में चला गया। अब फल कोई दूसरा खा रहा है। तो वहां मुझे उसका परिणाम मिलेगा? नहीं।
पेड़ देखना है, आपने सार्वजनिक लगाया कि निजी लगाया। मानो सार्वजनिक लगा लिया। सार्वजनिक है, तो जितना उसका उपयोग होगा, उतना आपको मिलता रहेगा। जब तक होता रहेगा। जिस शरीर में हूं, वहां मिलेगा। चाहे जहां भी रहो। जैसे किसी बैंक में पैसे जमा कर दो। दुनिया के किसी कोने में रहो, उसका ब्याज चला जाएगा। आपके अकाउंट में चला जाएगा। और आप कहीं से भी निकाल सकते हो।
जब तक मूल रहेगा। जिस दिन मूल खत्म, ब्याज का कोई मतलब नहीं। मूल खत्म तो खत्म। तो जब तक वो पेड़ रहेगा, जब तक समाज में उसका उपयोग होगा, तब तक आपको उसका मिलता रहेगा।
जितना पाप किया है, उतना जाके पुण्य करे। जैसे अंगुलिमाल के साथ हुआ। राजा से उन्होंने बचा लिया। जैसे लोग बोलते हैं, कृष्ण ने कहा है, मेरी शरण में आ, मैं तेरे सारे अपराध क्षमा कर दूंगा। लोग इसका मजाक उड़ाते हैं, कि अपराध करो और कृष्ण की शरण में चले जाओ। लेकिन बुद्ध ने क्या किया? अंगुलिमाल जब गया, तो राजा खोजते-खोजते आया। क्योंकि वो सजा का अधिकारी था। उसने कई लोगों की हत्या की थी। बुद्ध ने कहा, अंगुलिमाल जा चुका है। अंगुलिमाल यहां नहीं है। बचा लिया। लेकिन वो शरण में गया। फिर क्या हुआ? अंगुलिमाल जब उस एरिया में घूमा, तो लोगों ने पत्थर मारना चालू किया। लहूलुहान हो गया। लेकिन उसने जवाब नहीं दिया। तो उन्होंने अपना बदला ले लिया। उसे सजा मिल गई। जब आप किसी महापुरुष की शरण में जाते हो, तो सजा दूसरे तरीके से दिला देता है।
ऐसा नहीं कि आप अपराध करो, शरण में जाओ, और फिर पता चले कि फिर अपराध किया। हम अपनी समझ से समझते हैं। कृष्ण भगवान ने कहा, मेरी शरण में आओ। मेरी शरण में आने का मतलब, तुम्हें पश्चाताप हो रहा है। पश्चाताप भी एक सजा है। पश्चाताप भी एक सजा है। अगर तुम्हें पश्चाताप होने लगा, सत्कर्म करने लगे, ईमानदारी से जीने लगे, तो जिस जेल में हो, वो जेलर भी तुम्हारी सजा कम करवाने का इच्छुक हो जाएगा। और करवा देता है। बहुत कैदियों की सजा समय से पहले छूट जाती है। उनके हावभाव, उनके विचार को देखते हुए छोड़ दिया जाता है।
तो ऐसे ही आप ईमानदारी और सत्कर्म अपना लो, और आगे बढ़ो।
हां, तब कर सकते हैं। जब पता हो कि अच्छा इंसान है, भला है, या अपना है, और उसका उपयोग सही करेगा, तब रक्त दे सकते हैं।
सुनते-सुनते ही आत्मज्ञान नहीं हो जाता। अब आपकी स्थिति कैसी है? जैसे अर्जुन को सुनते-सुनते हुआ, लेकिन उतने में पूरी तरह ज्ञान नहीं हुआ था। उन्हें युद्ध में ज्ञान कब हुआ? जब अभिमन्यु मारा गया, तो भी उनको मोह ग्रसित किया। जब ज्ञान दे रहे थे, उस समय ज्ञान नहीं हुआ था। विराट रूप देख चुके थे। उस समय भी पूरी तरह ज्ञान नहीं हुआ था। समझ गए थे। ज्ञान पूरी तरह नहीं हुआ था। तो सुनते-सुनते, कर्म करते-करते ज्ञान हो जाता है। लेकिन सिर्फ सुनने से नहीं होगा। करने से होगा।
मैं यही कहूंगा। कहीं न कहीं तो शादी होती। देखो, उसका जीवन था। जहां उसको शादी करनी थी, वहां शादी कर दी। और शादी करके खुशी है, तो द्वेष पालने की क्या जरूरत है? आप देखो, आपका कल्याण कैसे होगा। अब वो काम करो। जिसको जहां जाना था, जो करना था, कर दिया। बात खत्म। अगर उसकी जिंदगी पर आपका अधिकार होता, तो वो नहीं करती, या नहीं करता। तो आप देखो, आप अपना कल्याण कर लो। बात खत्म।
अध्यात्म तो यही कह रहा है कि भाई, तू जितनी तेरी बुरी आदतें हैं, छोड़ दे। बस यही है अध्यात्म, और कुछ है? तो रिस्क क्या है? बुरी आदतों को छोड़ना रिस्क है क्या? अपनी गंदी आदतों को छोड़ना रिस्क है क्या? अध्यात्म क्या सिखा रहा है? यही सिखा रहा है कि जितना अपना बुरा बर्ताव आपके द्वारा हो रहा है, वो बंद करो। तो इसमें क्या रिस्क है?
संसार किसने छोड़ा? आपको लगता है मैं संसार छोड़ दिया? आपके बीच में मैं नहीं हूं क्या? आपके बीच में नहीं जी रहा हूं? कोई संसार छोड़ ही नहीं सकता। संसार छोड़ के बस मौत है। शरीर छोड़ के निकल जाओ। ये जितने भी महापुरुष हुए, क्या अपने लिए संसार से भोजन मांग के ग्रहण नहीं किए? तो देने वाला कौन था? संसार का ही व्यक्ति था। कहीं ज्यादा आबादी है, कहीं कम आबादी है। संसार किसने छोड़ा? संसार छोड़ने की बात ही नहीं है। आपको लग रहा है कोई व्यक्ति संसार छोड़ देगा क्या? कहां रहेगा? पेट के लिए रोटी तो चाहिए। जाएगा, और जहां भी जाएगा संसार ही तो है। पूरी पृथ्वी को संसार ही बोलते हैं। तो कहां जाएगा?
यहां संसार छोड़ने की बात नहीं हो रही है। आपने बुरी आदत धारण की, उसे छोड़ने की बात हो रही है। आप अपने परम आनंद से भटक गए हो। सुख-दुख के गोते खा रहे हो। उसे छोड़ने की बात हो रही है, कि आप अपने आप में कैसे स्थिर हो जाओ। आप कहीं से सुख ढूंढ रहे हो। ये बताया जा रहा है कि आपके अंदर परम सुख है। आप किसी के द्वारा सुख हासिल करना चाहते हो। कहा जा रहा है कि उसको छोड़ो। तुम्हारे अंदर परम सुख है।
जब आपने कहा कि मुझे यहां जाना है, तो इनसे पीठ हो गई। इनके लिए तो आप मर गए। वापसी का रास्ता बंद हो गया। रिस्क सिर्फ इतना है कि अपना वापसी का रास्ता बंद करके इनको शरीर दे दो। इनको आपका शरीर चाहिए, इन्हें आप नहीं चाहिए। आप अपने आप को दे दो, इन्हें शरीर दे दो। शरीर के द्वारा कुछ पैदा हो रहा है, इनको वो चाहिए। इन्हें तुम नहीं चाहिए। इनकी हमसे यही अपेक्षा है कि जो तुम वैभव मेंटेन कर रहे हो, वो मिलता रहे। तो इनको शरीर दे दो। संसार को शरीर दे दो, और अपने आप को दे दो। बस बात खत्म। इसमें कोई रिस्क नहीं है। इनको आप चाहिए ही नहीं। आपके शरीर के द्वारा कुछ आ रहा है, वो इनको चाहिए, तो वो दे दो इनको। और अपना अध्यात्म, मानसिक यात्रा करो, अपने आप में रहो। इन्हें आपसे व्यवस्थाएं चाहिए, इन्हें आप नहीं चाहिए। अगर आपको ऐसा लगता है, तो व्यवस्थाएं छीन के देखो और बोलो, मुझे ले लो। कोई नहीं, आपको कोई नहीं पूछेगा।
बेटा छोटा वाला यही बोलता है कि अभी छोड़ तो नहीं देना, गुरुजी के साथ अभी छोड़ तो नहीं देना, मैं भी पढ़ लूं। मैंने कहा, मैं भगोड़ा नहीं हूं, तू चिंता मत कर। व्यवस्था पूरी करके ही जाऊंगा। ये सच है, प्रत्यक्ष है। देख चुका हूं। अध्यात्म कोई रिस्क का मार्ग ही नहीं है, क्योंकि अपने आचरण को बदलना है। क्या रिस्क का मार्ग है? कोई रिस्क नहीं है। और जहां मैं हूं, वहां है क्या? वहां भी तो कुछ नहीं है।
जब उस लायक हो जाओगे तो आप वो भी हो जाओगे। जैसे आप डॉक्टर भी बने, तो एक दिन में थोड़ी ना बने। पंद्रह सोलह साल की बहुत मेहनत थी। और ये भी पक्का नहीं था कि बन पाओगे। तब रिस्क तो नहीं था क्या? लेकिन फिर बन गए, अपनी योग्यता के अनुसार। बहुत लोग फेल हो गए। तो इस मार्ग में भी बहुत लोग फेल हो जाते हैं। नाम, शहरत, पैसे में फंस जाते हैं। बहुत लोग अपने आप को निकाल पाते हैं। क्योंकि जैसे इस मार्ग में चले, आपको लोग सम्मान देने लगेंगे। जैसे आपने वस्त्र धारण किए, आपको प्रणाम करने लगेंगे। तो इस मार्ग में पतन भी हो जाता है, और मार्ग में निकल भी जाते हैं लोग। जिसके अंदर मान की इच्छा नहीं है, वही निकल पाता है। मुझे मान नहीं चाहिए, ये अगर पक्का कर लिया, वही निकल पाता है। क्योंकि हर जगह बात आती है मान पे।
बहुत पास आके भी मैंने देखा, लोग गुरु से रूठ जाते हैं। कोई क्या करेगा? आप डॉक्टर हैं, आपसे पेशेंट रूठ के क्या उखाड़ लेगा आपका? वो अपना बिगाड़ेगा। आपका नहीं कुछ कर सकता। कोई पेशेंट अगर आपसे रूठ जाए, तो क्या आपकी डॉक्टरी की डिग्री चली गई?
जब कोई जगह खाली थोड़ी ना है प्रकृति में। अब तुम्हें अपने आप को संवारने का मौका मिल गया। अगर तुम संवारोगे, नहीं तो कोई और आ जाएगा। यहां लाइन लगी है। यहां हर जगह लाइन लगी है। कोई गिर गया, आप नहीं उठाओ, कोई और उठा देगा। हो सकता है आप फिर जाओ तो नहीं मिलेगा। कोई कहे आप भोजन कराओ, आपने नहीं कराया, कोई और खिला देगा। आप यह मत सोचो। आपको प्रकृति ने मौका दिया, क्योंकि आप भी कहीं लाइन में थे। जैसे टिकट काउंटर पे खड़े हो गए। अब आपके पास पैसा नहीं है। लेकिन जैसे ही आपका नंबर आया, वो बोलेगा कहां जाना है? कौन सा टिकट चाहिए? पैसे दो। तुम कहोगे पैसे नहीं हैं, तो बोलेगा अब हट जाओ। तुम कहीं ना कहीं सोचे थे कि मुझे सेवा का अवसर मिले, परोपकार करने का अवसर मिले। तुम्हें प्रकृति ने दिया, तो तुम नहीं कर पाए, तो कोई और कर दिया। हमें कोई भी काम मिला है, तो अपने आप को संवारने का मौका मिला है। अब आप अपने आप को संवारते हो या बिगाड़ते हो, आपके ऊपर है। लेकिन आप यह मत सोचो कि मैं नहीं करूंगा तो नहीं होगा। आपकी तरह कितने आए और गए। आपको तो इस कर्म के द्वारा निकलने का मौका मिला था, कि आप इस कर्म के द्वारा अपने आप को संवार लो, निकल जाओ। प्रकृति ने एक मौका दिया था, क्योंकि यह मौका आपने मांगा था।
जैसे आप डॉक्टर हैं। आपको डॉक्टर की डिग्री दी गई, तो वह डिग्री आप ही की मांग थी। अब उस डिग्री का कैसे उपयोग करते हो, वो आपको पता है। तो यहां सब लाइन में खड़े हैं। एक से बढ़कर एक है, तुमसे अच्छा। तुम ना होते तो हो सकता है और अच्छा होता। यह संसार किसी के बिना रुकता नहीं है। आप इस भ्रम में मत रहिए। आपको मौका मिला है। आप अपने आप को निकालो। आप अपने आप को संवार लो। आप अपने आप को सुधार लो। एक मौका मिला है, और एक दिन ये मौका जाने वाला है। तो आपको देखना है कि आपको क्या करना है। यह हमें खुद तय करना है। और रिस्क कुछ नहीं है। अपने पास है क्या? कुछ नहीं। कोई अगली सांस का पता नहीं। तो फिर क्या रिस्क है?
लोग कहते हैं हमने त्याग कर दिया। क्या त्याग कर दिए? बेईमानी के अलावा बस, आपने इस दुनिया में आके एक ही चीज धारण की है, बेईमानी। इसके अलावा क्या त्याग कर दोगे? अगर मैं यहां कहूं कि मैंने त्याग कर दिया, तो क्या त्याग किया? घर की जगह आश्रम में रहोगे, ईंट पत्थर वही लगा रहेगा। कपड़े का रंग बदल दोगे। खाने का तरीका बदल लोगे। घर में नमक बोलोगे, नमक दे दो, आश्रम में राम रस बोलोगे। पीछे तो वही है। कुछ त्यागा ही नहीं जा सकता। त्यागने के लिए बेईमानी के अलावा तुम्हारे पास कुछ नहीं है। यहां कोई रिस्क नहीं है। तुम्हारे पास है क्या? जो तरीका अभी तक कंडीशनिंग होकर रखा है, जो मुझे परेशान करके रखा है, वो मुझे त्यागना है। बात खत्म। मुझे भी परेशान किया है। अनेक लोगों को परेशान किया है। वो तरीका, वो व्यवहार मुझे त्यागना है। यहां त्यागने के लिए कुछ है ही नहीं। आपने धारण की है एक ही चीज, बेईमानी।
बेईमानी से आगे बढ़ने की इच्छा नहीं। आगे बढ़ने की इच्छा। बेईमानी तो आगे बढ़ने में आपने की है। आपकी गलती है। आपको आगे बढ़ना सिखाया गया था। बेईमानी के अलावा हमने कुछ नहीं धारण किया है। आप कहीं भी चले जाओ। हिमालय भी चले जाओ। क्या छोड़ोगे? छोड़ने के लिए तो कुछ है ही नहीं। बेईमानी के अलावा, चापलूसी के अलावा, और क्या है? यही सब चीजें तुमने धारण की हैं।
तो मुख्य बीमारी देखो। आप इलाज करने वाले हो तो बीमारी देखो। आप आवरण मत देखो। बैकग्राउंड मत देखो। बहुत सूझबूझ के साथ सोच समझ के जीवन जियो।
अब जैसे मान लीजिए आप बीमार हैं और डॉक्टर के पास गए, उसने टेबलेट दिया। तो जैसे जैसे आप खाओगे, उसका परिणाम भी तो कुछ है। परिणाम तुरंत है क्या? जैसे ही आपने ग्रहण किया, परिणाम आना चालू हो गया, तुरंत। लेकिन आपको कुछ घंटे बाद पता चलेगा। कोई भी टेबलेट ले रहे हो तो कुछ घंटे बाद असर करने लगता है। तो जब गुरु ज्ञान दे रहा है, तो उस ज्ञान को लेके मैं जब जी रहा हूं, तो देखना है कि मेरे में बदलाव क्या है। एक बीमार व्यक्ति को देखना है कि अगर मैं गोली खा रहा हूं, पूरा परहेज कर रहा हूं, जितना डॉक्टर ने बताया है, तो क्या मेरी बीमारी में कुछ सुधार है? क्योंकि बीमारी उसे है, तो उसे पता चलेगा कि मैं सुधर रहा हूं कि नहीं। यह तो तुरंत होने लगता है। साल दो साल तो जाओ ही मत। साल दो साल अगर गए, तो फिर गुरु के पास गुरु समझ के गए नहीं थे। शिष्यपन का भाव पूरा नहीं था। मेरा तो कहना है कि भैया, जैसे ही हमने ज्ञान लिया और मैं जीना चालू किया, तो मेरे में बदलाव आना चाहिए। तुरंत, जगह पर। जैसे मैंने दवा ली, अपने घर पर गया, और मैंने समय से खाई, और परहेज किया, तो मेरी बीमारी में सुधार होना चाहिए। मैं सालों साल इंतजार थोड़ी ना करूंगा। तो देखना ये है कि जब हम गुरु के पास जाते हैं, चाहे किसी के पास, माता-पिता हो, शिक्षक हो, क्योंकि ये देने वाले हैं, कुछ दे रहे हैं हमें, तो हमें ये देखना है कि गुरु हमें ज्ञान दे रहा है और कह रहा है कि आप इस तरीके से जियो। तो आप देखो कि उस तरीके से जीने में क्या आपके जीवन में बदलाव आ रहा है।
हमें गुरु के शरीर के साथ नहीं चलना है। अगर हम किसी को गुरु समझते हैं तो गुरु ज्ञान का प्रतीक है। मुझे ज्ञान के साथ चलना है। उस शरीर के साथ नहीं जाना है। नहीं। हम तो तुरंत समझाते हैं। मैं तो तुरंत समझाता हूं। आपने सुना भी होगा, मैं कहता हूं कि मुझ पर इतना विश्वास करना कि मुझ पर विश्वास ना करना, क्योंकि ज्ञान से कल्याण होगा, इस शरीर से नहीं। तो आप ज्ञान के साथ चलो, और ज्ञान कभी धोखा नहीं दे सकता। क्योंकि ज्ञान को आपने समझा है। हमें शरीर के साथ चलना ही नहीं है। हमें ज्ञान के साथ चलना है। और ज्ञान कभी धोखा नहीं दे सकता।
मैं आपको बता रहा हूं। काम, क्रोध, मद, लोभ, मोह, इसी का चक्कर है हर जीव का। तो जब आत्मज्ञान होता है किसी को भी, तो मद, लोभ, मोह यह हटता है। उसके अंदर काम भाव रह जाता है और क्रोध भी रह जाता है। लेकिन अगर वो आत्मज्ञान को उपलब्ध हो गया, तो गलत कभी कर ही नहीं सकता। क्योंकि उससे वो निकल गया। वो किसी के साथ गलत कर ही नहीं सकता।
ये तो जाने दो। आप यूज करो, आगे बढ़ो। वो जैसा करेगा उसे मिलेगा। मुझे यूज करना है। मुझे यूज करना सीखना है। कल क्या होगा वो छोड़ दो। आज मुझे यूज करना है। मैं तो ईमानदार रहूं। जब गड़बड़ हो तो छोड़ दो। जैसे राजा बलि ने अपने गुरु का तुरंत त्याग किया था। शुक्राचार्य का तुरंत त्याग किया, जब वो भटकाने लगे।
मेरे समझ से तो नहीं भटक सकता। जहां तक मैं समझ सकता हूं, गुरु स्थिति में कोई आ गया तो वह भटक नहीं सकता। गुरु कभी नहीं भटक सकता। वो या तो बना हुआ गुरु होगा।
लेकिन मैं आपसे एक बात कहता हूं। मुझे यूज करना है। मैं अगर कहीं गया हूं किसी के पास, चाहे वो गुरु हो, चाहे कोई भी हो, कहीं ना कहीं मैं यूज करने गया हूं। अगर मैं यूज हो रहा हूं, तो कहीं ना कहीं पहले तो मुझे यूज करना है। सबका भाव यही होता है। तो मुझे देखना है कि मैं जिस लिए गया हूं, अगर हो रहा है तो ठीक है, नहीं तो मुझे उसको छोड़ देना है। वो ये भी कहते हैं कि पीठ मत दिखाओ। गिल्ट भी इनडायरेक्टली वो कहते हैं। लेकिन मैं क्या कह रहा हूं, वो सुनिए। मैं तो ये कह रहा हूं कि आप यूज करने के लिए कहीं गए हो। अगर आप जिसके लिए गए हो वो हो रहा है, तो आप रुको, और नहीं तो उसका त्याग कर दो। मेरा यह कहना है। किसी से बंधो मत। और मैं क्या लेने गया हूं, वो मुझे पता होना चाहिए। अगर वो मुझे नहीं पता है तो मुझे कोई भी ठग लेगा। मैं अगर कुछ लेने गया हूं तो उसकी पूरी जानकारी मुझे होनी चाहिए। अगर मुझे ही जानकारी नहीं है तो मुझे कोई नकली ही दे देगा, और मैं ले चला जाऊंगा। अगर मैं कुछ लेने गया हूं तो मुझे उसके बारे में जानकारी होनी चाहिए। मुझे उससे मतलब नहीं है। मैं जिस काम के लिए गया हूं, वो मेरा काम सधना चाहिए। नहीं सध रहा है तो उसको छोड़ दो। वो जाने, उसका कर्म जाने। क्योंकि कैसे सिद्ध करोगे कि कोई पूर्ण गुरु है कि नहीं है। मैं गया हूं। अगर मुझे लाभ हो रहा है, मेरे जीवन में बदलाव आ रहा है, जिस उद्देश्य को मैं लेके गया हूं, अगर वो उद्देश्य मेरा पूरा हो रहा है, तो ठीक है, और नहीं तो फिर इसको त्याग करो। कहीं और ढूंढो। कमी तो है नहीं। मेरा ये कहना है। किसी को पकड़ मत लो कि नहीं, तुम ही करोगे। एक से बढ़कर एक घूम रहे हैं। ये तुम नहीं करोगे, तो मैं कहीं जाऊंगा। लेकिन मैं जिस उद्देश्य को लेके आया था, अगर वह पूरा होता है तो ठीक है, नहीं तो मैं आगे बढ़ जाऊंगा।
मैं अपनी एक घटना बता रहा हूं। मैं जब खोज में था, मुझे अनेक तरह के लोग मिलते थे। तो मुझे एक जन मिले, वो बीटेक किए हुए थे, बंगाल के थे। तो वो मुझे बता रहे थे कि मैं आपको प्रत्यक्ष बताऊंगा नहीं, दिखाऊंगा। अब मैं उनके साथ बहुत समय तक था। तो वो गांजा भी पीते थे। मैं बैठा रहता, वो गांजा पी रहे होते। मुझसे क्या मतलब, वो गांजा पीते थे, मैं उनके पास ऐसे बैठता रहता था। एक दिन उन्होंने ऐसे मेरे तरफ गांजा किया। तो मैंने कहा, जिस उद्देश्य को लेके मैं आया हूं, क्या इस गांजे से पूरा होगा? अगर आप कहिए तो मैं इसे पीऊंगा। मेरा उद्देश्य पूरा होना चाहिए। तो वो बोले, नहीं, ये एक नशा है। तो मैं बोला, मैं नशा करने नहीं निकला हूं। आप पर मैं भरोसा करता हूं, और आपकी बात मुझे समझ में आ भी रही है। अगर आप कहो कि इस गांजे से, मैं जिस लिए निकला हूं, जिस उद्देश्य को लेके निकला हूं, अगर वो खोज मेरी इससे पूरी होगी, तो एक हाथ से नहीं, दोनों हाथ से गांजा ही पीऊंगा। क्योंकि मुझे अपने लक्ष्य से प्रेम है। तब उन्होंने कहा, नहीं, यह एक नशा है। तो मैंने कहा, मुझे नशा नहीं करना है। तब उन्होंने अपना हाथ हटा लिया।
अगर मैं ईमानदार हूं तो मुझे कोई धोखा नहीं दे सकता। यह मेरे जीवन का व्यक्तिगत अनुभव है, और आप लोगों का भी होगा। अगर मैं पूर्णतः ईमानदार हूं तो मुझे कोई ठग नहीं सकता। और अगर मुझे कोई ठग रहा है, मैं एक साल के बाद चिल्ला रहा हूं कि इसने मुझे ठग लिया, तो एक साल तक मैं भी कोई लालच में था कि मुझ पर ये कोई कृपा कर देगा। मैं भी कल्पना में जी रहा था। मैं भी सोच रहा था, इसकी चापलूसी करके इससे कृपा ले लूंगा। हम भी कहीं ना कहीं चापलूस थे। एक साल इंतजार नहीं करते। हम जिस उद्देश्य को लेके गए थे, वह तुरंत पूरा होना चालू होता है। बात हमारी तुरंत होती है। हम एक साल इंतजार थोड़ी ना करेंगे।
साफ सुथरी बात है। हो सकता है वो आपको गलत दिख रहा हो। हो सकता है कोई, आप जिसे गुरु मान रहे हो, पता चले किसी स्त्री के साथ संबंध कर रहा है। वो तुम्हें गलत लग रहा हो। लेकिन वो दोनों खुश हैं। ये तुम्हें गलत लग रहा है। गलती तुम्हारी है। जिसके साथ वो संबंध कर रहा है, जाके उससे पूछो, ये गलत किया क्या? आपने गुरु को अपने तरीके से जीने का गुलाम बना लिया है। अगर मुझे कोई गुलाम बनाता है तो उसका त्याग करो। ना तो मैं किसी को गुलाम बनाऊंगा, ना तो मैं किसी का गुलाम बनूंगा। सीधी सी बात है। लोगों ने क्या किया है, गुरु को गुलाम बनाना चाहते हैं। सबका जीवन है। आप जिस लिए गए हो, उसकी बात करो। वो व्यक्तिगत अपने जीवन में क्या करता है, उसकी जिंदगी है।
लोगों में भ्रांतियां हैं। उसे क्लियर करना पड़ेगा। बात को पूरा करना पड़ेगा। वो क्लियर होगी। उस कुर्सी को जांचना नहीं आता। हमारे में अगर बदलाव हो रहा है, हम जिसके लिए गए हैं। एक डॉक्टर की डिग्री को हम नहीं जांच सकते। लेकिन मेरी बीमारी ठीक हो रही है, ये तो मैं जांच सकता हूं। क्योंकि वो मेरी बीमारी का इलाज कर रहा है। हमें डॉक्टर की डिग्री नहीं जांचना है।
स्टेरॉयड दे दिया। कुछ समय के लिए वो बिल्कुल ठीक हो गया। पर स्टेरॉयड देने के बाद बीमारी ठीक तो नहीं हुई। दब तो गई, पर ठीक तो नहीं हुई। वो तो छह महीने बाद, दो महीने बाद, फिर और ज्यादा बड़े लेवल पर उभरना है। उसको छोड़ के किसी और के पास जाओ। मेरा तो कहना है, व्यक्ति विशेष को मत पकड़ो। मेरा कल्याण करना है, और मुझे जहां से होगा वहां से मैं करूंगा। मेरी कंडीशन यह नहीं होनी चाहिए। जब तुम्हारे पास मेरा इलाज ही नहीं है, तो मैं तुम्हें पकड़ के क्या करूंगा? क्योंकि मैं तुम्हारे पास नहीं आया हूं। मैं अपने इलाज को लेके आया हूं। इलाज ने मुझे यहां लाया है। और जब मेरा इलाज ही नहीं होगा, तो मैं तुम्हारे पास रह के क्या करूंगा? मैं तुम्हारे शरीर को देखकर नहीं आया। आप अगर यहां बैठे हैं और मैं यहां बैठा हूं, तो आप जिज्ञासु हो, और मेरे ज्ञान को समझ के आप यहां आए हैं। मेरे शरीर को देखकर थोड़ी ना आए हैं। तो जिस लिए मैं गया हूं, अगर वो मेरा पूरा हो रहा है, ये मुझे पता चल जाएगा। उस कुर्सी को तो मैं नहीं जांच सकता। लेकिन जिसके लिए मैं गया हूं, वो हो रहा है कि नहीं हो रहा है, ये तो मैं जान सकता हूं।
वहां से यही समझना चाहिए कि गुरु है ही नहीं। गुरु हमेशा आपको देता है। लेने की तो बात ही नहीं करता। नाराज होगा जब तुम नहीं लोगे। लेने की बात वो करता ही नहीं। और लेने की बात करे तो गुरु नहीं। गुरु की पहचान करने का एकदम साफ सुथरा तरीका है। मेरी सफाई करे, वो गुरु है। अगर मेरे पास जो है उसकी सफाई करे, तो बना हुआ गुरु है। बस यही एक तरीका है। और मुझे डरना नहीं चाहिए। पहले तो अपना डर निकालो। कहीं ना कहीं हम डरे हैं, तभी वो लाभ ले रहा है। वो बना हुआ गुरु है। अगर मेरे पास है, उसकी सफाई की बात कर रहा है, तो वो फिर बना हुआ गुरु है। और मेरी सफाई की बात करे हर वक्त, तो वो गुरु है। और उसी गुरु से मेरा कल्याण होगा। गुरु जांचने का एकदम ये सरल तरीका है। और ये देखना है कि जिस उद्देश्य को मैं लेके गया हूं, मेरा उद्देश्य पूरा हो रहा है कि नहीं।
त्याग कर दो। ये गुरु है नहीं। आप लोग समझिए कि गुरु को आपके बदलाव की जरूरत है। आपके पास क्या है, उसकी जरूरत गुरु को नहीं है। और अगर आपके पास है, उसके लिए वो आपको श्राप दे रहा है, तो गुरु तो है ही नहीं। क्योंकि गुरु का तो सिर्फ एक ही काम है, आपका कल्याण करना। और फिर हर चीज को आप यही कह देते हो। अगर मैं कहूं कि आपने क्या बोला? आपने ही कहा कि संत कभी किसी को श्राप नहीं देते। और जब मैं कह रहा हूं कि आपने क्या बोला, तो आप कह रहे हो, मैं तो बोलता नहीं, वो बोलता है। नहीं तो आप त्याग तो कर दो।
इसे बहुत आराम से समझिए। त्यागोगे नहीं तो क्या करोगे, और भी समय बर्बाद करोगे। क्योंकि अब तो समझ में आ गया। और ये कैसा शिष्य था कि बीस साल तक कुछ सीखा ही नहीं। ये कौन सा शिष्य था? वो शिष्य था ही नहीं। वो टाइम पास कर रहा था। उसे जरूर कोई व्यवस्था चाहिए थी। वो शिष्य ही कैसा, कि बीस साल तक वो सीखा ही नहीं, और पढ़ा रहा। ऐसा हो सकता है। संभव है। आप उसे शिष्य कह सकती हैं? बिल्कुल नहीं सीखा। मैं तो इनसे कह रहा हूं। आपने तो कहा, मैंने सीखा है। वो तो मैं समझ गया। लेकिन क्या हो सकता है कि बीस साल तक वो पढ़ा रहा, और उसका शिष्य एक नंबर का आलसी होगा, खा पी के पढ़ा रहा। कुछ और भी उसे गुरु से मिल रहा था। वो जाने। बीस साल तक कैसे वो पढ़ा रहा, इतनी श्रद्धा के साथ, इतना समय दिया। बीस साल तक कोई रुक ही नहीं सकता। बीस साल भी, चाहे वो बीस दिन क्यों ना हो। वो कैसा शिष्य? शिष्य तो जाते ही अपनी जिज्ञासा रखेगा। शिष्य तो जाते ही, जैसे ही उससे मिलना होगा, अपनी जिज्ञासा की बात करेगा। बीस साल वो कैसे, बीस दिन कैसे इंतजार कर सकता है?
बीस साल के बाद समझ में आए, तो त्यागने के अलावा रास्ता क्या है? मैं आपसे बहस नहीं कर रहा। आप इसे समझिए। बहस की बात नहीं है। इसे समझना है। यहां बहस की बात ही नहीं है। त्यागने के अलावा कोई रास्ता है क्या? कोई रास्ता नहीं है। त्याग ही आपको आगे बढ़ा सकता है। और नहीं त्याग करोगे तो वहीं सड़ जाओगे। तो कम से कम कुछ तो जिंदगी बची है। वो तो उसे छोड़ने के बाद कहीं तो जाएगा। उसके पास एक ही चीज है, त्याग करके कहीं आगे बढ़े।
वहां पहुंचने के बाद साधक वाली हरकत, संसार वाला कर्म, कर ही नहीं सकता। गुरु स्थिति में पहुंचने वाला कभी गलत सोच भी नहीं सकता। करने की तो बात बहुत दूर की बात है। गलत कर ही नहीं सकता। वो इससे मुक्त हुआ, तभी तो स्थिति उसको मिली। यह संभव नहीं है। और मैं तो अपने जीवन में यही समझा, खोज में भी, अभी भी मैं यही कहता हूं कि आप जहां गए हो, अपने काम की बात करो। सीधी सी बात है। और अगर आपको लग रहा है कि मैं जिस उद्देश्य को लेके गया हूं, मेरा पूरा हो रहा है, तो मैं रहूंगा, नहीं तो मैं जा रहा हूं। सीधी सी बात है। क्योंकि मैं आपके पास आया था, आपके लिए नहीं आया हूं। अपने लिए आया हूं। अगर कोई कहे कि मैं आपके लिए सुबह से बैठा हूं, तो यह गलत है। आप अपने लिए बैठे हो। अगर आपको लग रहा है कि आप जिसके लिए बैठे हो वो हो रहा है, तो आप बैठो, नहीं तो चले जाओ। आप रुके क्यों हो?
पहले तो ये है कि हमें अपनी क्षमता और अधिकार से ज्यादा देना ही चाहिए। गुरु यही कहता है कि जब आपकी सारी व्यवस्था हो, आप जरूरत में जियो। अगर आपको कुछ बचता है, तब आप दो। आप सब कुछ तो देना ही नहीं चाहिए, क्योंकि आपका भी जीवन है।
ऐसी हरकत हो ही नहीं सकती। मैं तो सीधा पहले भी कहा, अभी भी कहा, हो ही नहीं सकता। अगर उस स्थिति में आ गया है, तो आप जैसी घटना बता रहे हो वो नहीं हो सकता। मैं साफ सुथरी बात कह रहा हूं। हो ही नहीं सकता। संभव ही नहीं है। क्योंकि गुरु हमेशा शिष्य का कल्याण चाहता है। वही गुरु है। ऐसा तो सोच भी नहीं सकता। वो तो अपने प्राण को भी देके उसका कल्याण चाहता है। वही गुरु है। तो देखिए कहां गड़बड़ी है। कह क्या रहा है, और व्यक्ति कर क्या रहा है, क्या वो दोनों एक हैं? पता चला कह तो कुछ और रहा है, कर कुछ और रहा है, कोई मतलब नहीं है। आप कह रहे हो वही कर रहे हो, तब तो मतलब है। पता चला कह कुछ और रहा है, कर कुछ और रहा है। क्योंकि मैं तो परिणाम देखूंगा। आप क्या कह रहे हो, उससे मुझे मतलब नहीं। आपका परिणाम क्या आ रहा है करने का, वो मैं देखूंगा। मेरा तो यही कहना है कि विश्वास करना छोड़ दो। प्रत्यक्ष ज्ञान का यही कहना है। मैं भी बहुत भ्रमण किया। मेरा यही कहना है कि आप जिसके लिए गए हो, आप अपना काम करो। बस, जिसके लिए हमारा आपका मिलना हुआ है, वो काम करो। अगर वो आपका काम होता है, तब आप उसके पास रुको। नहीं, छोड़ दो उसे। कोई और ढूंढो। मेरा तो इतना कहना है। क्योंकि हम किसी के पास जाते हैं तो हम उस व्यक्ति के लिए तो जाते नहीं हैं। हम अपने कार्य की सिद्धि के लिए जाते हैं। ना आप हमारे लिए आए हो, ना हम आपके लिए आए हैं। तो जिसके लिए हमारा आपका मिलना हुआ है, वो होना चाहिए। और वो आपके साथ हो रहा है कि नहीं हो रहा है। क्योंकि कार्य की सिद्धि आप लेके गए हो, तो आपका कार्य हो रहा है कि नहीं हो रहा है, वो तो पहले आपको पता चलेगा। आपकी बीमारी ठीक हो रही है कि नहीं हो रही है, यह डॉक्टर से पहले पेशेंट को ही पता चल जाता है।
आप जिस कार्य को लेके गए हो, आपको ये देखना है कि मेरा कार्य हो रहा है तो ये आदमी ठीक है, और नहीं हो रहा है तो हमसे क्या मतलब। मैं चला, और कहीं ढूंढ लूंगा। प्रत्यक्ष ज्ञान का यही कहना है, विश्वास मत करो। हम पहुंच गए, वहीं विश्वास खत्म हो गया। अब काम की बात करो। जिसके लिए मैं आया हूं, उसकी बात करो। अगर मेरा काम होगा तो ठीक है, नहीं तो मैं जा रहा हूं। बात खत्म। इतना साफ सुथरा आपको जीवन जीना पड़ेगा। और सीधी बात करनी पड़ेगी कि भाई, मैं आपके पास आपके लिए नहीं आया हूं। पहले तो चापलूसी हटाओ। मैं आपके पास आपके लिए नहीं आया हूं। आपके पास कुछ है, वो लेने मैं आया हूं। सीधी सी बात करो। मिलावट की बात मत करो कि मैं आपके लिए आया हूं। हम आपके पास इसलिए आए हैं, आपके पास कुछ है, वो दो, क्योंकि उसकी मुझे जरूरत है। दो तो ठीक है, नहीं तो मैं और कहीं जा रहा हूं।
इतना स्पष्ट बोलना पड़ेगा। इतना साफ सुथरा जीवन जीना पड़ेगा। क्योंकि हम कहीं जाते हैं तो लगता है कि हम किसी व्यक्ति के पास, किसी व्यक्ति के लिए जाते हैं। हम उससे कुछ लेने ही जाते हैं। तो लेने की बात करो, सीधा। क्या जरूरत है। वो कहे कि नहीं, हम तुम्हारे लिए आए हैं। भैया, हम तुम्हारे लिए नहीं आए हैं। हम अपनी जरूरत के लिए आए हैं। और अगर आप मेरी जरूरत पूरी करते हो तो ठीक है। आप मेरी जरूरत पूरी करोगे, तो आपकी भी कोई जरूरत रहेगी तो मैं भी पूरी करूंगा। सीधी सी बात है। लेनदेन है। ये लेनदेन संसार है।
ऐसे तो छोड़ दो। क्योंकि भाव भी आपकी समझ से ही पैदा होता है। समझ थी, तभी तो भाव था। आपकी समझ से भाव पैदा होता है। अगर आप में समझ नहीं है तो भाव भी पैदा नहीं होगा। आप कुछ समझे, तभी तो भाव पैदा हुआ। और जितना आप समझ रहे हो, उससे भाव पैदा हुआ। और जितना आपने समझा, वो अगर है तो ठीक है, नहीं तो त्याग करो। हमारे पास यही ऑप्शन है कि आगे बढ़ जाओ, उसका त्याग करो। जब पता चल जाए, त्याग करो। हम जिसके लिए निकले हैं, हम उसी की बात करेंगे। अगर हमारा पूरा होगा तो हम रुकेंगे, और जिस दिन पूरा होना बंद हो जाएगा, मैं आगे चला जाऊंगा। यहां पछताने की भी जरूरत नहीं है। अगर आप बीस दिन भी रुके, तो बीस दिन में कुछ तो आपको मिल रहा था। बिना कुछ मिले, मैं आपको बताऊं, एक जोंक होती है। अगर उसे खून ना मिले तो वो छोड़ देगा। बिना कुछ मिले आप कहीं रह ही नहीं सकते। जानवर तक नहीं रहता। आप तो मानव हो। अगर मैं कहीं बीस साल रहा, और बीस साल बाद कह रहा हूं कुछ नहीं मिला, बीस साल तक तुझे मिला। तू रुक ही नहीं सकता। बिना मिले आप रुक ही नहीं सकते।
तो अब उसे छोड़ दो। अब अगर मिलना बंद हो गया, तो जाने दो, छोड़ो उसे, और कहीं से लो। गुरु ज्ञान का प्रतीक होता है। अगर एक नल से पानी पी रहा था, वो खराब हो गया, तो दूसरी बोरिंग करा के पानी पी लो। क्या कसम खाए हो कि वही बोरिंग का पीऊंगा। अब वो बोरिंग खराब हो गया। छोड़ो, जाने दो। बोरिंग खराब भी हो जाती है। छोड़ दो। मूल से आदमी भटक के नीचे आ सकता है। हम आ गए यहां, मूल से नीचे आ गए। लेकिन गुरु एक ऐसी स्थिति है। गुरु कभी गलत नहीं कर सकता। ये पक्का है।
आप यहां सत्संग के लिए आए हो। बैठना है तो बैठो, नहीं तो जाओ। बाबूजी का मतलब क्या है? किस लिए आए हो यहां पे? मेरे लिए आए हो? मेरे से बात करो। आप जिसके लिए आए हो, वो बात करो। आप मेरे लिए आए हो तो मेरे से बात करो।
यही तो बात है। हम उद्देश्य से ही भटक जाते हैं। हम जिसके लिए जाते हैं, वो बात ही नहीं करते। और मेरा कहना है कि भाई, तुम्हें जरूरत है तो आओ, नहीं तो कतई मत आओ। क्योंकि तुम्हारा भी समय बर्बाद होगा, मेरा भी होगा, और तुम्हारा हो या ना हो, कई लोगों का तो बर्बाद हो जाएगा। हम जिसके लिए गए हैं, हमें सिर्फ उससे बात करनी चाहिए। अगर हम जिसके लिए गए हैं, उसके लिए बात करें, तो हमें दुनिया में कोई पैदा होकर भटका नहीं सकता। कभी कोई भटका ही नहीं सकता। ये मेरे जीवन का व्यक्तिगत अनुभव है। लेकिन हम क्या करते हैं, पता है? जाते कुछ और के लिए हैं, करने कुछ और लगते हैं। और कुछ दिन बाद कहते हैं, कुछ हुआ ही नहीं। तुम जिसके लिए गए थे, वो किया ही नहीं। नहीं तो तुम वहां रुकते ही नहीं। अगर आप रुके, तो जिस लिए गए थे वो ना करके कुछ और कर रहे थे, मिल रहा था। और बाद में पता चला कि कुछ मिला नहीं। क्योंकि उसके लिए तुमने कुछ किया ही नहीं। एकदम साफ सुथरी बात है। अगर मुझे कोई धोखा दे रहा है, कहीं ना कहीं उस धोखे का जिम्मेदार मैं हूं। कहीं ना कहीं हमने उससे कुछ और उम्मीद बना के रखी थी। मैं यही देखता हूं कि लोग जिसके लिए जाते हैं, वो छोड़ के कुछ और करने लगते हैं। आप यहां मेरे लिए आए हो तो मेरे से सिर्फ बात करो। बात खत्म। और आपको जरूरत नहीं है तो मत बैठो। क्योंकि यहां सम्मान अपमान के लिए नहीं बैठे। हम यहां कुछ समझने के लिए बैठे हैं। और समझेंगे तब, जब मूल पे बात करेंगे। जिसके लिए हम बैठे हैं, जब वो बात करेंगे। और ये मेरे जीवन का अनुभव है कि हम जिसके लिए गए हैं, अगर हम वही काम करें, तो हमें कोई ठग ही नहीं सकता। हमें कोई भटका ही नहीं सकता। अगर मैं भटक रहा हूं, मेरे साथ धोखा हुआ, उसका जिम्मेदार कहीं ना कहीं मैं हूं। और मैं कह रहा हूं, बीस साल बाद धोखा हो गया। बीस साल तक क्या कर रहे थे? बीस साल तक तुम और कुछ वहां ले रहे थे। यहां कोई किसी को धोखा नहीं दे सकता। कोई किसी को ठग नहीं सकता। ये मेरा अनुभव है। आपका क्या अनुभव है, देख लो। मेरा तो एकदम पक्का कहना है कि जिसके लिए अगर हम गए हैं, अगर वो बात करें, तो मुझे कोई भटका ही नहीं सकता।
लेकिन हम जिसके लिए गए, वो बात करें तब। हम तो बस ऐसे ही चले जाते हैं। अगर हम वो बात करें तो हमें कोई नहीं भटका सकता। हमारा काम साध देगा, नहीं तो रुकूंगा नहीं, चला जाऊंगा। लेकिन मुझे पूरा नॉलेज होना चाहिए। पूरी जानकारी होनी चाहिए कि मैं किसके लिए गया। मुझे क्या चाहिए। अगर यह मेरे जीवन में पक्का है, तब मुझे कोई भटका नहीं सकता। लेकिन मैं खुद ऑप्शन में जी रहा हूं। ये नहीं तो ये सही, ये नहीं तो ये सही। तो आप भटकते ही रह जाओगे।
जैसे आप कह रहे हो कि तुम्हें पता ही नहीं है। तुम लोग मुद्दे का ही नहीं पता था क्या? तो मुद्दे पे आओ। यह तो करना है। तो अब हो गया है, तो बस उसके अलावा कोई बात ही मत करो।
मैं एक आश्रम में गया था, खोज में। मैं उस आश्रम में गया, वो व्यक्ति नहीं मिला। तो लोगों ने कहा कि आप खा लो, आराम से सोओ। रात थी। मैंने कहा, मैं यहां नहीं रुक सकता। जब वो व्यक्ति ही नहीं मिलेगा, तो मैं यहां रुक के क्या करूंगा। मैं रात भर, ठंड के महीने में, नर्मदा तट पे सोया, बिना बिस्तर के। क्योंकि वहां अगर मैं रुक जाता, तो शरीर की व्यवस्था के लिए रुकता। मेरी खोज तो वहां पूरी हो ही नहीं रही थी। तो मैंने कहा, जब मेरी खोज ही यहां नहीं है, तो मैं यहां रह के क्या करूंगा। तो मैं रात भर नर्मदा तट पे सोया, वहां नहीं रुका। एक रात मैंने अपनी जिंदगी की बर्बाद नहीं की। मैंने कहा, जब वो व्यक्ति ही नहीं मिलेगा, तो वो जगह व्यवस्था तो दे देगी मुझे। तो मैं रात भर किनारे सोया, क्योंकि किनारे मेरी खोज थी, और वहां मेरी खोज थी नहीं।
तो हमें इस तरीके से समझ के जीना पड़ेगा। जहां मेरी खोज पूरी नहीं हो रही है, उस व्यक्ति का, उस जगह का, मुझे तुरंत त्याग करना चाहिए। त्याग ही परम सुख है, और ये त्याग आपको लेके जाएगा। कहीं दबाव में, कहीं संकोच में, हमें नहीं बैठना चाहिए। अगर मैं यहां बोल रहा हूं, आपको कुछ समझ में आ रहा है, तब तो बैठना ठीक है। लेकिन कहो नहीं कि हम ऐसे ही बैठे हैं। तब एक आदमी को आप धोखा दे रहे हो। कईयों को धोखा दे रहे हो, और कईयों को बढ़ावा भी दे रहे हो। क्योंकि आपको देखकर और लोग भी तो प्रेरणा लेंगे। उस व्यक्ति के पास जाएंगे। अगर नहीं समझ में आ रहा है तो सीधा कह देना, भाई आपकी बात मुझे नहीं समझ में आ रही है। जिसको समझ में आ रही है वो रुके। मैं तो चला। साफ सुथरी बात है। और मैं इसी में जिया हूं। मैं उस आश्रम में चाहता तो रात बिता लेता। लेकिन एक रात जिंदगी की बर्बाद हो जाती। क्योंकि वहां तो मेरी खोज खत्म। वहां तो जिसके लिए गया था, वह था ही नहीं। और तट पे मेरी खोज थी। वहां से जब निकला, तो खोज आगे बढ़ गई। कम से कम मैं अपने साथ तो था। अपनी खोज के साथ था। तो खोज मत छोड़ो। जब आप दबाव और संकोच में आते हो, तो वहां खोज छूट जाती है। अगर जरूरत है तो बैठो। या तो आप देने वाले हो, या लेने वाले। दो में से एक बनके, जहां भी हो, रहो। इसी में कल्याण है।
अब आप देख लो कि मैं देने वाला हूं कि मैं लेने वाला हूं। ये पक्का करना पड़ेगा। लेकिन आप दोनों बनके घूम रहे हो। तो दोनों बन के घूमने वाले का कल्याण नहीं होता है। आप अगर कहीं हो तो आप एक हो, या तो देने वाले, या तो लेने वाले। अब ये आप तय करो कि जिस जगह मैं हूं, मैं देने वाला हूं कि मैं लेने वाला हूं। अगर देने वाले हो तो लेने की बात कतई मत करो। और लेने वाले हो तो देने की बात मत करो। कि भैया, मैं तो लेने वाला हूं, या तो मैं देने वाला हूं। दो में से एक पक्का करो। अगर दो में से एक पक्का कर लिया, इसी में जिए, तो आपका कल्याण पक्का। अगर समझ में नहीं आएगी तो कल्याण भी नहीं होगा, क्योंकि समझ ही विकसित होगी, तभी आपका कल्याण होगा। और आप अपनी समझ से समझेंगे, तब कल्याण होगा। अगर किसी दूसरे की समझ से चलेंगे, तो आप चल नहीं पाएंगे। आपकी समझ से ही आपकी यात्रा करनी पड़ेगी। किसी ने आपको पता बताया, आप समझोगे तभी आगे बढ़ पाओगे। अगर आप नहीं समझे, वो सही भी बता रहा हो, और आप वो भाषा नहीं समझ पाए, तो आप आगे नहीं बढ़ पाओगे। आपकी भाषा में बताने वाला आपको मिलना चाहिए। तभी आपकी आगे की यात्रा होगी। अगर वो सही भी बता रहा है, और आपको नहीं समझ में आ रहा है, तो आप आगे नहीं जा सकते। और मैं जहां हूं, उसका जिम्मेदार सिर्फ मैं हूं। मुझे किसी पर थोपना ही नहीं चाहिए। अगर मेरे साथ कुछ हुआ, तो उसका जिम्मेदार मैं हूं, वो नहीं। अगर वो सिर्फ होता, तो मुझ पे प्रभाव नहीं पड़ता। अगर मुझ पे उसके करने का प्रभाव पड़ रहा है, तो कहीं ना कहीं मैंने उससे अलग तरीके से उम्मीद बना के रखी थी।
हमने उम्मीद ही क्यों बना के रखी? अगर उसने उम्मीद दी, उम्मीद तोड़ी, तो खत्म। उसने दिया, उसने तोड़ा, वो जाने। हमने उम्मीद क्यों बना के रखी थी कि वो ऐसा ही करेगा। हमारी उम्मीद ही हमारे दुखों का कारण है। हम अपने तरीके से उम्मीद क्यों बना के रखते हैं? उम्मीद ही सारे दुखों की जड़ है। अध्यात्म का आखिरी शब्द है, उम्मीद से मुक्त हो जाना। उम्मीद में ही सारा धोखा है। और उम्मीद हम अपने अपने तरीके से बना के रखते हैं। हमने क्यों अपने तरीके से उम्मीद बना के रखी? हमें उम्मीद से मुक्त होना है।
और अगर मैं कुछ लेने गया हूं, तो उसके बारे में मुझे नॉलेज होना चाहिए। असली है तो नकली है। नकली ही सिद्ध करता है कि कहीं असली है। क्योंकि नकली, असली का आधार है। नकली ऐसे पैदा नहीं हो सकता। नकली सीधा पैदा नहीं हो सकता। असली, नकली का आधार है। और नकली से ये पता चलता है कि कहीं असली है। अब मेरी योग्यता के अनुसार ही मुझे मिलेगा। अगर मुझे नकली मिल रहा है, तो मैं भी उसी लायक हूं। कहीं ना कहीं हमारे अंदर पूर्णतः ईमानदारी नहीं है। कहीं ना कहीं हमारे अंदर बेईमानी है। नकली से सिद्ध हो रहा है कि कहीं असली है। नकली ही सिद्ध करता है कि असली कहीं छिपा हुआ है। हमारी पहुंच नहीं है। मुझे असली तक पहुंचने के लिए उस लायक बनना पड़ेगा। लेकिन मुझे पूरा नॉलेज होना चाहिए। मुझे पूरी जानकारी होनी चाहिए। अगर लक्ष्य का पता ही नहीं है, तो आपको कोई मार्ग ही नहीं बता सकता। आपसे कोई पता पूछे, और लक्ष्य ना बताए। आपको पूरी दुनिया का पता मालूम हो, उसे कहां जाना है यह ना बताए, और बोले मुझे जाना है, तो क्या आपको लगता है आप उसे पता बता सकते हो? अगर उसे नहीं पता हो कहां जाना है, आप उसे पता बता सकते हो?
जब उसने कहा पूजा करो, तो मैं पूजा कर रहा हूं। इसका परिणाम क्या है? क्योंकि कुछ करने का यहां कुछ परिणाम है। अगर आपने कुछ किया, तो उसका परिणाम भी तो है। परिणाम आए ही। जब परिणाम मिला, तो दुख किस बात का? अफसोस किस बात का? परिणाम हमने अपने तरीके से उम्मीद रखे थे। नहीं। परिणाम आया, बात खत्म। हो सकता है वो वहीं तक दे सकता था। आगे जाओ। और कोई खड़ा है। उसके आगे भी कोई है। तो अगर कोई कुछ करने के लिए बोल रहा है, तो उससे परिणाम भी पूछ लो, भाई इसका परिणाम क्या है? तो आप देख लो, करने के बाद परिणाम आया कि नहीं आया। मैं एक बार करूंगा। परिणाम आया तो ठीक है, नहीं तो छोड़ दूंगा।
लेकिन एक बार किसी की बात तो माननी पड़ेगी। यही तो जिंदगी है। एक बार तो मुझे किसी की बातों का भरोसा तो करना पड़ेगा। करने से पहले नहीं, करने के बाद परिणाम आएगा। तो करने के बाद अगर परिणाम आया, मुझे लगा कि ये ठीक है, तो मैं उस परिणाम के लिए और काम करूंगा, नहीं तो छोड़ दूंगा। इतना तो करना ही पड़ेगा। अगर आप कुछ खोज कर रहे हो, तो उसमें बहुत कुछ त्रुटियां होंगी। बहुत कुछ गलती होंगी। बहुत कुछ नुकसान भी होगा। आप बोरिंग ही कराते हो, तो क्या हर बोरिंग में पानी मिलता है? तो क्या अंदर पानी नहीं है? जहां आपने बोरिंग दो सौ, तीन सौ, चार सौ, पांच सौ, छह सौ फीट तक गई, क्या पानी नहीं है? आपकी ताकत खत्म हो गई। हो सकता है दो हजार फीट नीचे पानी था। लेकिन आप नहीं खोद पाए। अब आप वहां खोद दिए, जितनी आपकी सामर्थ्य है। हो सकता है सौ फुट पे ही पानी आ जाए। ऐसी जगह है। तो क्या वहां पानी नहीं था? पानी था, लेकिन आपकी सामर्थ्य नहीं थी। तो एक काम करो। जब आपकी सामर्थ्य नहीं है, छोड़ के, जहां आपकी सामर्थ्य है, वहां लग जाओ। मुझे अपनी सामर्थ्य के अनुसार ही मिलेगा। आपकी जैसी योग्यता है, वहां आप हो। आपकी जितनी क्षमता है, आप वहां हो। आप जहां भी खड़े हो, आप अपनी योग्यता के अनुसार वहां खड़े हो।
तो मुझे ये पता करना पड़ेगा कि मुझे जाना कहां है। ये जब तक नहीं पता करोगे, आप ऐसे ही घूमते रह जाओगे। आपको लक्ष्य पता ही करना पड़ेगा। आपके जीवन में लक्ष्य पक्का करना ही पड़ेगा। अगर लक्ष्य पक्का नहीं करोगे, तो पता क्या बताएगा? आपसे कोई बोले कि मुझे जाना है। आप तुरंत क्या पूछोगे? कहां जाना है? नहीं कि उसे पता ही बता दोगे। अब वो कहां जाना है, अगर बताने में सक्षम हुआ, तो आप पता बता दोगे। और आपको पता भी मालूम है, और वो बता ही नहीं पा रहा है कहां जाना है, तो आप कैसे पता बताओगे? जाना कहां है, आपको पक्का करना पड़ेगा। लक्ष्य आपको पक्का करना पड़ेगा। उस लक्ष्य तक पहुंचने के लिए अनेक लोग आपकी सहायता कर देंगे। लेकिन लक्ष्य का पता आपको होना चाहिए। अगर लक्ष्य का पता नहीं है, तो क्या कोई सहायता करेगा? आप घूमते ही रह जाओगे। तो क्या चाहिए, ये आपको पता करना पड़ेगा। ये जब तक नहीं पता करोगे, तब तक ऐसे ही आप भटकते रहोगे। कभी इधर, कभी उधर।
आपके प्रश्न में आया कि ऑप्शन होने चाहिए, और यह भी कि अगर मैं ऑप्शन देके चलूंगा तो मेरे अंदर स्टेबिलिटी तो आएगी नहीं। कहीं कहते हैं ऑप्शन नहीं होना चाहिए, कहीं कहते हैं ऑप्शन होना चाहिए। तो मैं आपको बता रहा हूं। अगर मेरे उद्देश्य की पूर्ति हो रही है, तो मुझे ऑप्शन की जरूरत नहीं। लेकिन अगर मेरे उद्देश्य की पूर्ति नहीं हो रही है, तो मेरे पास ऑप्शन होना चाहिए कि मैं और कहीं चला जाऊं। मेरे उद्देश्य की पूर्ति हो रही है, तो मेरे सारे ऑप्शन को लेस कर देना है। तब मुझे नहीं जाना है। और तब अगर मैं जाता हूं, तो मुझे पूछना चाहिए कि मैं क्यों जा रहा हूं। अगर मेरे उद्देश्य की पूर्ति हो रही है और मैं और जगह जा रहा हूं, इसका मतलब ये मेरा उद्देश्य नहीं है। और मेरे उद्देश्य की पूर्ति नहीं हो रही है, तो मुझे तुरंत चला जाना चाहिए। जब मेरे उद्देश्य की पूर्ति हो, तो वहां ऑप्शन लेस कर देना चाहिए, और जब मेरे उद्देश्य की पूर्ति ना हो, तो ऑप्शन पैदा कर देना चाहिए।
जाने से पहले ऑप्शन लेके नहीं जाना। मैं तो जा रहा हूं। पहले से अगर ऑप्शन लेंगे, तो वहां स्टेबिलिटी नहीं आएगी। अगर वहां मेरा पूरा नहीं हो रहा, तब मुझे ऑप्शन ढूंढना चाहिए। ऑप्शन तो तब पैदा करूंगा, जब वहां नहीं होगा। जब मेरे उद्देश्य की पूर्ति हो, तो अगर ऑप्शन है तो भी लेस करूं। और मेरे उद्देश्य की पूर्ति नहीं है, तो मुझे ऑप्शन पैदा करना पड़ेगा। जैसे मैं उस आश्रम से निकला, तो नर्मदा तट पे सोया। जब मेरे उद्देश्य की पूर्ति नहीं है, तो मैं वहां क्यों रुकूं। मैं आगे निकलूंगा, तो मुझे ऑप्शन मिलेंगे। और जब तक मैं मूल तक नहीं पहुंचूंगा, तब तक मुझे आगे बढ़ते ही रहना है। आप रुक ही नहीं सकते। अगर आप ईमानदार हो और खोजी हो, तो आपका एक दिन भी कोई बर्बाद कर ही नहीं सकता। अगर एक दिन भी बर्बाद हुआ, तो उस दिन तक आपने कुछ मजा लिया, वहां कुछ उपयोग किया, आपकी कुछ ना कुछ जरूरत पूरी हुई। ऐसे कोई रुक ही नहीं सकता।
जो गुरु है, वो पांचवा वेद है। इसलिए कि देश, काल, स्थिति, परिस्थिति में, किताबों में जो लिखा है, वो बदलता रहता है। आज अगर बीस साल पहले की किताब उठा के नक्शा देखो भारत का, तो बदल गया। तो चार वेद के ऊपर पांचवा वेद गुरु बोला गया है, कि वो देश, काल, स्थिति, परिस्थिति में जीवंत गुरु आपको, जैसी स्थिति परिस्थिति है, उसमें निकलने का मार्ग बताता है। वो किताबों में नहीं लिखा जा सकता। क्योंकि किताबों में जैसे ही लिखा गया, बदल जाता है।
कबीर को बहुत लोग मानते हैं। कबीर ने क्या कहा था? पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय। मैं ये कह रहा हूं, कबीर ने जिसको कहा, पूरा जितना भी लिखा गया था, लेकिन कबीर का भी सब लिखा पोथी हो गया। कबीर की भी बातें अब पोथी हो गईं। तो लोगों ने जोर दिया कि जीवंत गुरु ढूंढो। क्योंकि जीवंत गुरु, देश, काल, स्थिति, परिस्थिति जैसी है, उसमें से निकलने का मार्ग बताएगा। इसलिए जीवन में जीवंत गुरु जरूरी है। जीवंत गुरु को पांचवा वेद बोला गया है। वो कभी लिखा नहीं जा सकता। क्योंकि जैसे आपने लिखा, और कुछ समय में, यहां प्रतिपल हर चीज बदल रही है।
अगर बीस साल पहले का नक्शा उठा के भारत का भ्रमण करो, तो कर पाओगे? नहीं कर पाओगे। तो कबीर ने खुद कहा था कि पोथी है, इससे कुछ नहीं होगा। लेकिन अब कबीर की भी बातें पोथी हो गईं। तो हमारे जीवन में जीवंत गुरु चाहिए। उन्होंने यही लिख के आए थे, जीवंत गुरु चाहिए। क्योंकि जीवंत गुरु देश, काल, स्थिति, परिस्थिति में आपको मार्ग बताएगा। यहां प्रतिपल सब बदल रहा है। तो इसलिए पांचवा वेद गुरु को बोला गया है। गुप्त है, मतलब वो कभी लिखा नहीं जा सकता। क्योंकि जैसे आपने लिखा, अगर आपने यहां के बारे में कुछ लिखा, वैसे तो बदल गया, बदल चुका है। आप जैसे ही लिखना चालू करते हो, बदल गया। अगर आप किसी वस्तु के बारे में कुछ बोल रहे हो कि ऐसा है, उसी क्षण वह बदल गया। तो यहां ना कुछ सच है, ना झूठ है। उपयोग करो और आगे बढ़ो। इसीलिए तो कहा गया कि यहां ना सच है, ना झूठ है। इसके चक्कर में मत पड़ो। उपयोग करो और आगे बढ़ो।
गुरु ज्ञान का प्रतीक है। नल से प्यास नहीं बुझेगी। पानी से प्यास बुझेगी। तो मुझे पानी से प्यास बुझा के आगे बढ़ना है। ज्ञान के अलावा गुरु का रोल नहीं है। अगर उसके ज्ञान को नहीं अपनाए, तो उस शरीर का कोई मतलब ही नहीं। कोई मतलब नहीं है। अगर आप पानी पी ही नहीं रहे हो, तो उस नल को सोने का बना लो, क्या मतलब है? गुरु ज्ञान का प्रतीक है, तो उसके ज्ञान को लो और आगे बढ़ो। उसके शरीर को मत पकड़ो। ज्ञान के अलावा गुरु कुछ नहीं। ज्ञान है। ज्ञान पे मर मिटना है। ज्ञान को छोड़ दो तो गुरु खत्म। गुरु है किस लिए? ज्ञान। और ज्ञान नहीं है, तो गुरु तो तुम्हारे जैसा है। गुरु की मान्यता क्यों है? गुरु ज्ञान का प्रतीक है। अगर ज्ञान नहीं है, तो वो आपके जैसा है। और मेरा कल्याण ज्ञान से होगा। और ज्ञान में मैं जब जिऊंगा, उसमें होगा। अगर वो ज्ञान भी दे दिया, और मैं उसमें जिया नहीं। किसी ने भोजन दे दिया, आपने उसे ग्रहण नहीं किया, तो पोषण थोड़ी ना देगा। अगर उसने ज्ञान दिया, तो उस ज्ञान में जीने में आपका कल्याण है।
तो हमें यह समझना है कि गुरु शब्द है, शरीर नहीं। धोखा तो तब होता, जब कहा जाता कि शब्द को छोड़ो, शरीर को पकड़ो। तब धोखा हो सकता है। और ज्ञान कभी धोखा नहीं दे सकता। क्योंकि आप समझोगे तभी अपनाओगे, तो धोखा दे ही नहीं सकता। क्योंकि समझते ही पता चल जाएगा कि इससे क्या होगा। और नहीं समझ पाओगे, तो अपना ही नहीं पाओगे। तो ज्ञान कभी धोखा दे ही नहीं सकता। ज्ञान से आपका कल्याण होगा। तो ज्ञान को समझो, शरीर को पकड़ो ही मत। गुरु ज्ञान का प्रतीक है। ज्ञान हटा दो, तो वो तो आपके जैसा हो गया।
भक्ति मार्ग में गुरु शरीर को भी पकड़वाता है। अब देखना है मैं कहां खड़ा हूं। भक्ति मार्ग में भी एक इष्ट पकड़ता है, एक प्रतिमा को पकड़ लेता है। लेकिन किसी भी मार्ग से चलो, ईमानदारी से कर्म अपनाना ही पड़ेगा। और हर जगह देखा जाए, चाहे आप भक्ति मार्ग से चलो, ध्यान मार्ग से, योग मार्ग से, ज्ञान मार्ग से, किसी मार्ग से चलो, तो बिना ज्ञान के चल ही नहीं सकती। क्या बिना समझ के भक्ति हो सकती है? भक्ति भी करने के लिए समझ तो चाहिए। तो अगर कोई गुरु कह रहा है कि ऐसे भक्ति करना है, तो उसमें शब्द ही तो दे रहा है। बिना शब्द दिए वो बता सकता है क्या? शब्द तो दे रहा है। तो मूल शब्द है। तो गुरु ज्ञान का प्रतीक है। तो अब मुझे समझना है कि मुझे कौन सा शब्द दे रहा है। क्योंकि वही शब्द गाली में भी लगते हैं। वही शब्द मेरे कल्याण में भी लगते हैं। वही शब्द मेरे पतन में भी लगे हैं। बस शब्द बोलने का तरीका अलग था। तो अब देखना है कि जब गुरु हमें शब्द दे रहा है, तो इन शब्दों के द्वारा मेरा क्या होगा। ये आपको समझना पड़ेगा, और समझने के बाद फिर अपनाओ। समझने के बाद अपनाओ। तब जाके आपकी यात्रा होगी। और आपको समझ में ही नहीं आया, और आप हां में हां कह दिए। अगर आपको कोई मार्ग बताया, और आपको समझ में नहीं आ रहा, आप हां में हां कह दिए। अब उसके सामने आगे तो चल दिए, लेकिन जाओगे कब? कहां जाओगे? आपको समझ में आना चाहिए। इसीलिए मेरा कहना है कि आप अपनी समझ से समझिए। और अपनी समझ को विकसित करें। अगर आपको यात्रा करनी है तो अपनी समझ से चलिए, और यात्रा नहीं करनी है तो हां में हां मिलाते रहिए। आप बीस साल बाद भी खड़े वहीं पाएंगे।
गुरु की तो बहुत तगड़ी महिमा है। समझ में आ गया तो ठीक है। प्रश्न करने वाले आदमी को यह पता नहीं कि तू प्रश्न क्या कर रहा है। इस बात को जिसने समझा है, उसकी समझ में आ जाएगा। शब्द गुरु है। देह गुरु की कोई जरूरत नहीं है। और वो गुरु है जो शब्द गुरु को जानता है। गुरु ज्ञान का प्रतीक है। ज्ञान में शब्द है।
नहीं। कभी गुरु ने हमें बताया, तुम्हारे ऊपर कर्ज है, तुम्हें मैंने इतना समय दिया, कभी नहीं होता। कभी नहीं होता। इसलिए कि जिस गुरु के पास आप गए हो, आपके जैसे लोग ही उसे सहयोग करके गुरु स्थिति में वो आए हैं। अगर आज मैं आपको यहां ज्ञान दे रहा हूं तो इस ज्ञान तक पहुंचने के लिए मुझे समाज के बहुत लोगों ने सहायता दी है। जगह दी है, भोजन दिया है। अब वह भरपाई हो रही है। यहां कोई कर्ज नहीं है। अगर गुरु कहता है, मेरा कर्ज तुम्हारे ऊपर, तो गुरु है ही नहीं।
हां, तो दे देंगे। प्रकृति का है तो प्रकृति हमसे आके ले लेगी ना, अलग भिन्न-भिन्न रूपों में आके ले लेगी। लेकिन वो कह रहा है, नहीं, मेरा कर्ज है, तब गुरु लायक नहीं। ये शब्द नहीं। तब अगर ये बोला है प्रकृति का, तो फिर वो तो है ही।
तुम आ रहे हो, कहीं ना कहीं ये घुटन तो देती है ना एक सीकर को। भाई, एक तरफ तो गुरु कहता है कि नदी बह रही है, प्रकाश तो रोशनी दे रहा है, सूरज दे रहा है, तुम खिड़की खोलो। दूसरी तरफ आप कह रहे हो, तूने किरण ले ली और तेरे ऊपर बोझ बन गया। तो फिर तो मैं दरवाजे बंद ही रखूंगा।
नहीं, नहीं, आप समझिए, कर्ज क्या है। जैसे मान लीजिए, जितना आपने पीछे अतीत में किया है, उसकी बात वो कह रहा है। ये ज्ञान दे रहा है, उसका कर्ज कुछ नहीं है। उससे कैसे आप निकल जाओ, उसके लिए वो मार्ग बताएगा। पीछे आप जितना किए हो, ज्ञान का कोई कर्ज नहीं। ज्ञान का नहीं। ज्ञान का कोई कर्ज नहीं है। ज्ञान का भी अगर कर्ज होगा तो फिर जो परमात्मा है, निराकार है, जो प्रकृति है, जिसमें तो वो भी सौदा कर रहा है। नहीं, ज्ञान का कर्ज नहीं है। आपके कर्मों का परिणाम है। ज्ञान का कोई कर्ज नहीं।
अब जैसे आप रास्ते में जा रहे हो, या आपसे कोई रास्ता पूछा, तो क्या कर्ज हो गया? ये तो मानवता है। हम लोग कितने से रास्ता पूछते हैं? कितने के यहां पानी पी लेते हैं? उसका नाम भी नहीं पता। कितने से रास्ता पूछते हैं? वो रास्ता बता देता है। क्या उसका कर्ज हो गया? ये मानवता है। हम एक दूसरे के पूरक हैं। एक दूसरे के सहयोग करते हैं। कर्ज नहीं।
चेला से ही सिद्ध होता है, वो गुरु है कि नहीं।
देखिए, एक अच्छा डॉक्टर है कि नहीं, ये पेशेंट तय करेगा, क्योंकि उसकी बीमारी ठीक होगी तो अच्छा डॉक्टर है। और जब किसी की बीमारी ही ठीक नहीं हो रही, तो डॉक्टर अच्छा नहीं। वो अपने लिए अच्छा होगा। गुरु क्यों है? गुरु ज्ञान का प्रतीक है। उसके ज्ञान से जितने उसके पास आ रहे हैं, उनके जीवन में बदलाव आ रहा है, तब वो गुरु है। अगर किसी के जीवन में बदलाव आ ही नहीं रहा है, तो गुरु का क्या मतलब है? शिष्य तय करता है, गुरु योग्य है कि नहीं।
पेशेंट तय करते हैं कि डॉक्टर सही है कि नहीं, क्योंकि पेशेंट के पास बीमारी है और डॉक्टर के पास इलाज है। अब एक अच्छा डॉक्टर है कि नहीं, वो कैसे तय होगा? लोगों की जब बीमारियां ठीक होंगी, तब। ना कि डिग्री लेने से अच्छा डॉक्टर हो जाएगा।
देखिए, मैंने इसके पहले भी कहा है कि अगर मादा तैयार होती है तो प्रकृति की ऐसी व्यवस्था है कि नर आ ही जाते हैं, और अगर मादा तैयार नहीं है तो कितने भी नर ला दो, वापस चले जाते हैं। तो गुरु मौजूद है। अगर आपमें शिष्यपन का भाव पूरी तरह आ गया तो गुरु दरवाजा तोड़ के आपके घर के अंदर आ जाएगा। जैसे रामकृष्ण परमहंस के पास तोतापुरी आ गए। निराकार भी तो आ जाएगा। मतलब अगर आप योग्य हो गए तो आ जाएगा।
उसके लिए प्रबल जिज्ञासा। प्रबल, अपने आत्मिक कल्याण की जिज्ञासा। जैसे जिसका भाव है। जैसे द्रोपदी को भगवान बचाने कब आए? क्या पहले नहीं आ सकते थे? क्या तब याद किया, तब पुकारा? लेकिन जब उनके पास कोई ऑप्शन नहीं था। जब तक ऑप्शन था, तब तक वो नहीं आए। वो पहले भी तो आ सकते थे, लेकिन जब तक ऑप्शन था तब तक नहीं आए। जब सारे ऑप्शन खत्म हो गए, तो उन्होंने कहा कि चल, एक तू भी है, तुझे भी देख लेती हूं, क्योंकि तूने मुझसे वादा किया था। तब वो आ गए। तो कहने का मतलब, जब आत्मिक कल्याण की प्रबल इच्छा होगी, तब गुरु आपके दरवाजे पे आ जाएगा।
जैसे मैं शिष्य बन पाया, गुरु आ जाएगा। गुरु आ जाएगा। गुरु ज्ञान का प्रतीक है। गुरु आ ही जाएगा। और आपके सामने गुरु ही टिकेगा। कोई टिक ही नहीं सकता आपके सामने।
अगर आपमें शिष्यपन का पूरा भाव आ गया तो गुरु के अलावा आपके सामने कोई टिक ही नहीं सकता, क्योंकि आपको आत्मिक कल्याण के अलावा कुछ करना ही नहीं है। तो टिकेगा कौन? टिकेगा कौन? लेकिन अगर कोई और टिक रहा है तो इसका मतलब उससे और कुछ करवाना है। सीधी सी बात है। और भी आपको कुछ चाहिए।
दो महीने, चार महीने नहीं। वो बात एक जन्म की है। आप समर्पित का मतलब, प्रश्न चिन्ह खत्म। प्रश्नवाचक चिन्ह नहीं, बात खत्म। ये उसकी जवाबदारी है। हो सकता है सौ जन्म बाद आपको ज्ञान कराए। इस बात को समझना। आप जब समर्पित हो गए तो बात खत्म। तब उसकी समय सीमा, अवधि खत्म। समर्पण का मतलब बात खत्म हो गई, प्रश्न चिन्ह खत्म हो गया। अब तुम्हारी जिम्मेदारी नहीं।
लेकिन आदमी ये देखे कि भाई, मेरी ग्रोथ नहीं हो रही। फिर उसका जवाब गुरु ये देता है, तू छोड़ ना, वो बाद में देखेंगे।
अगर आपको लग रहा है मेरी समझ नहीं विकसित हो रही, तो पूछो उससे। वो बताएगा, क्यों नहीं हो रही है, कहां फंसे हो। गुरु तो हर वक्त समझाएगा आपको। गुरु तो ये कह भी नहीं सकता कि आप बैठो। ये देखो, ये मेरे साथ जब से रह रही है। ये अगर दो बजे भी इनका प्रश्न उठा है, तो हम लोग दो तीन बजे रात भी इनके प्रश्न का जवाब देते हैं। दो तीन बजे रात को भी उठ के हम इनके लिए जवाब देते हैं। तो फिर भी मान लो, ना हो रही हो। यह तो इनको पता है। मैं तो अपना काम कर रहा हूं।
गुरु समझा रहा है, समझ में नहीं आ रही है, तो गुरु बताएगा क्यों नहीं समझ में आ रही है। ये गुरु का काम है, कि आपको क्यों नहीं समझ में आ रही है। ये गुरु का काम है।
अगर आपको ये बात समझ में आ गई कि ये पूरी तरह जीवंत गुरु है, और गुरु है, तब तो उसे ना छोड़ो। अगर वो धक्का भी मारे तो ना छोड़ो। लेकिन ये बात आपको समझ में आनी चाहिए। भीड़ देखकर नहीं, और देख के नहीं। अगर एक बार पक्का हो गया कि इसमें पूरी गुरु की क्षमता है, ये मुझे भवसागर से निकाल सकता है, तो वो अगर आपको धक्के मार के भी भगाए तो मत जाओ। और अगर दुनिया को लग जाए ये गुरु है, और आपको लगा कि नहीं, इसमें कोई दम नहीं है, तो अगर वो बांध के भी रोके तो रुकना मत। मेरा यही कहना होता है। अभी आपको तय करना है। ये आपको तय करना है। ज्ञान में कोई कमी ना हो। बाकी चीजों में, जैसे मैंने डिस्कस किया, कि वहां आदमी वो है तो क्या। बाकी से क्या मतलब? मुझे ज्ञान चाहिए। बाकी से क्या मतलब?
आपको तो ज्ञान देगा। आपके साथ अगर कुछ ऐसा व्यवहार कर रहा है तो गुरु लायक नहीं है। वही तो बात है। मेरे साथ वो क्या बर्ताव करेगा, मेरे साथ वो क्या कर रहा है, ये देखना है। और मुझे अपनी समझ से समझना है, क्योंकि आप अपनी समझ से भी आगे बढ़ सकते हो। क्योंकि एक समय आएगा, गुरु भी छूट जाएगा। एक समय ऐसा आएगा, गुरु भी छूट जाएगा, वो शब्द भी छूट जाएगा। तभी तो पहुंचना होगा। तो आप अपनी समझ से ही समझ कर आगे बढ़ो।
भैया, अब नहीं दिया होगा तो फिर कभी दिया होगा। अगर मेरे साथ गलत कर रहा है तो कभी ना कभी तो दिया होगा।
तो बस ये देखना है कि जब मैं जिसके भी साथ हूं, तो मैं उसके साथ ईमानदारी से हूं कि नहीं। बस इतनी सी बात है।
नहीं, ये देखिए, मरहम नहीं। ये सच्चाई है कि अगर मेरे साथ कुछ हो रहा है तो उसका जिम्मेदार सिर्फ एक व्यक्ति है, मैं हूं। सीधी सी बात है। यही मुझे समझना चाहिए। और कोई नहीं। अगर मुझे किसी ने पीड़ा दी और मैं ईमानदार हूं पूरी तरह, तो जरूर मैंने कभी दिया था, वो लौटा दिया। बात खत्म।
हां, ईमानदारी से आपको जवाब भी देना है, सात्विक तरीके से। अगर वो तामसी तरीके से आपके साथ व्यवहार कर रहा है, तो आपको सात्विक तरीके से अपना बचाव करना है।
पागल बना के नहीं गया। वो अपना लेके चला। हां, अपना बनके मैंने भी अपनापन करके छुरा घोपा होगा। आज बराबर हुआ।
नहीं, अब मैं भी यही है कि अगर मेरे साथ कुछ हो रहा है तो कहीं ना कहीं उसका जिम्मेदार मैं हूं। मैंने किया है। क्या मैंने किया है? हां, तभी मुझे मिल रहा है। बस मुझे इतना है कि ईमानदार रहना। ईमानदार अगर मैं रहा तो आगे की तैयारी नहीं हो रही, मैं निकल रहा हूं। और अगर मैं बेईमान रहा तो मैं भी तैयारी कर रहा हूं आगे की। और बस यही है।
मैंने बस यही समझा कि भाई, यहां से निकलने के लिए एक ही सबसे सरल रास्ता है। ईमानदारी सत्कर्म। और कोई रास्ता नहीं है।
तो मेरे समझ से ईमानदारी सत्कर्म मुझे अपना ही लेना चाहिए।
दो लाइन के पीछे भी तो बहुत कुछ बोला हूं। उसको भी पकड़ना है। अब ये दो लाइन पे हम चल कैसे पाएं? हिम्मत कहां से आएगी? बल कहां से मिलेगा? और ईमानदारी है क्या? सत्कर्म है क्या? सब समझना पड़ेगा। है तो दो ही लाइन।
किसी को दोषी मत दो। आपके कर्मों का परिणाम आपको मिला। आप किसी को दोषी मत दो। किसी पे उंगली मत उठाओ। आपके कर्मों का परिणाम आपको मिला। आप किसी और पे उंगली ना उठाओ। नहीं, उसका भी परिणाम भोगना पड़ेगा। किसी निर्दोष पे उंगली मत उठाओ। बस आपके कर्मों का परिणाम आपको मिला। आप स्वीकार करके आगे किसी पे उंगली ना उठाएं।
अगर एक आदमी एक रुपया कमा रहा है और आप आगे आ जाएंगे, आपके बहुत सारे क्वेश्चन होंगे, तो आप आगे आएं। अगर मैं एक रुपया कमा रहा हूं, इधर ही आ जाओ भाई। ठीक कहते हैं, ईमानदारी से कर्म करना है।
नहीं करवाओ। पिछला कटेगा नहीं। आप रुक जाओगे। भाई, आपको वहीं रुक जाओगे। तो आपको तो निकलना है। रुक जाओगे। सत्कर्म नहीं अपनाओगे। आपने ईमानदारी अपनाई और ईमानदारी से अपना खा कमा रहे हो, लेकिन पिछला खत्म कैसे होगा? पीछे भी तो बहुत कुछ तुमने कर दिया है। उससे कैसे मुक्ति पाओगे? उससे कैसे मुक्ति पाओगे?
जैसे मान लीजिए एक व्यक्ति ने अपराध कर दिया और वो भाग जाए। वो अब अपराध नहीं कर रहा है, वो ईमानदारी से जीवन जी रहा है, लेकिन पिछले अपराध का तो उसे सजा भोगना पड़ेगा। उसे पुलिस खोज भी तो रही है। जो मैंने बताया, उसमें वो रुक ही जाएगा। रुक जाएगा। यात्रा रुक गई। अब वो जाके वहां जिए और पुलिस एक दिन पहुंच जाए, पकड़ ले। कहे, नहीं, हम तो यहां ईमानदार हैं, हम तो कुछ करते ही नहीं। पिछला किया है, उसका तो भोग ले। आगे तू नहीं किया, बात छोड़। तू जितने साल बाद पकड़ा जाएगा, वो सजा मिलेगी। और पुलिस खोजती ही रहेगी। तो इस पुलिस से तो भाग जाओगे, पर किससे, कहां भागोगे?
नहीं, हमें दोनों को सेम नहीं देखना है। मुझे अपना काम देखना है कि मेरे पास आया क्यों। मुझे उसका आवरण नहीं देखना है। वो मेरे पास आया है कुछ जरूरत के लिए। वो जरूरत पर बात करनी है।
तो मत करो, मत खाओ। ना खाना तो आपके बस में है। आप हिमालय पर भी चले गए। अगर अपनी आदतों का सुधार नहीं किया, तो कुछ नहीं होगा। बात ये हो रही है, अगर मुझे कोई चीज परेशान कर रही है तो मुझे उसे नहीं करना चाहिए। पहले क्या हुआ? पहले हमने शरीर से किया। और अब नहीं कर रहा हूं, तो मानसिक याद आ रही है। शुरुआत कहां से हुई? शरीर से। अब मानसिक याद आ रही है, तो छोड़ना भी शरीर से पड़ेगा। एक समय होगा, मानसिक भी वो खत्म हो जाएगा। आधार क्या है? शरीर के द्वारा। शरीर के द्वारा करना बंद कर दो, तो मानसिक भी छूट जाएगा।
उस पर एक्ट मत करो। उसको आने दो। वो धीरे-धीरे आएगा। पहले शरीर से हमने किया, फिर आदत बनी। आदत बनी, तो मानसिक याद आने लगा। अब मैंने छोड़ दिया। शरीर से नहीं करूंगा, तो मानसिक भी एक दिन छूट जाएगा।
मन ऐसे नहीं जाता है। मन तब जाता है, जब आपको जरूरत हुई। आपको भूख लगी, आप इसी से समझो। वो आपके शरीर की जरूरत को इंगित करता है। शरीर की जरूरत क्या है? शब्द, दृश्य, गंध, रस, स्पर्श। और इसी में देखो, वो जाता है। तो जरूरत किसकी है, आपकी या मन की?
अगर आपको भूख लगी, तो मन कहां जाएगा? भोजन पर। आपको इंगित करेगा कि भूख लगी है, और जहां-जहां आपको भोजन मिल सकता है, वहां का पता फाइल खोलेगा, कि भैया यहां पता है। जाना या ना जाना आपके ऊपर है। भूखे भी मर जाओ, तो मन आपको घसीट के नहीं ले जाएगा। मन का काम है सिर्फ इंगित करना। क्लिक करता रहेगा। जितना ज्यादा होगा, उतना ज्यादा क्लिक करेगा। एक समय ऐसा आएगा, जब जैसे बाथरूम लगी और वो क्लिक कर रहा है। करते-करते आपने नहीं किया, पट कर दिया, तो फिर बाथरूम करो वाला क्लिक खत्म हो जाएगा, कुछ और जगह क्लिक करने लगेगा। मन आपका सहयोगी है।
नहीं। बस एक ही शत्रु आपका है, और वो तुम हो, और कोई नहीं। तुम सिर्फ अपने आप को बचाना चाहते हो। सारा मजा तुम लेना चाहते हो, और अपने आप को निर्दोष बताना चाहते हो। सब बात तुम्हें समझ में आ रही है, लेकिन तुम सोच रहे हो कि मैं किसी पर थोप दूं। यहां ऐसा नहीं होगा। यहां तुम बच नहीं पाओगे। ऐसी जगह तुम आए हो, यहां तुम बच नहीं पाओगे। या तो समझ पाओगे, या तो भाग जाओगे, लेकिन बच नहीं पाओगे। अपनी गंदी आदतें छोड़ो। किसी पर थोपना बंद करो। जिम्मेदारी खुद लो। जिम्मेदार इंसान बनो। अगर कुछ हो रहा है, तो इसके जिम्मेदार मैं हूं। मैंने किया है। जिम्मेदार व्यक्ति बनो। थोपो मत।
उसे छोड़ दो। उस पर एक्ट ही मत करो। बस बंद कर दो, धीरे-धीरे मानसिक भी बंद हो जाएगा। पहले शरीर से ही बंद करना पड़ेगा, क्योंकि शुरुआत शरीर से हुई है। जब शरीर से बंद कर दोगे, तो मानसिक भी बंद हो जाएगा। सब लोग सोचते हैं, मन को दोषी देकर मैं बच जाऊं, मैं निर्दोष हूं।
मन ऐसे नहीं करता है। कभी-कभी उसी समय जरूरत हुई, और आपने बहुत जमा किया है। चाहे शब्द हो, चाहे रस हो, चाहे गंध हो, चाहे दृश्य हो, चाहे स्पर्श हो। शब्द, दृश्य, गंध, रस, स्पर्श, ये जमा किया है। जब लगता है कि मुझे जरूरत है, तब सब याद आने लगता है। आपने जमा किया था, इसलिए जब जरूरत होती है तो याद आने लगता है। हमें ये देखना है कि अगर वो जरूरत शरीर की है, या आपके हित की है, तब तो उसे ग्रहण करो। और अगर उसमें आपका पतन हो रहा है, तो उसका त्याग करो। बस बात खत्म। साफ-सुथरी बात है।
मन ऐसे नहीं जाएगा। कहीं ना कहीं आपको जरूरत लग रही है, तभी मन जा रहा है। अभी भूख नहीं लगी है। मन को भोजन पर ले जाओ, जाएगा? जरूरत किसकी है? आप कह रहे हो कि वो ना शरीर की है, ना मन की। शरीर के द्वारा मजा लेने वाला कौन है? तुम ही हो। शरीर तो सिर्फ एक निमित्त है। शरीर के पीछे आप ही हो, तो जरूरत उसकी है। आपने अपनी जरूरत बना के रखी है। जब नहीं मिलता, तो आप बेचैन हो जाते हो। वो चाहिए आपको।
जब आप कहते हो जरूरत पर जीना, तो मतलब शारीरिक जरूरत पर जीना। शरीर को जितनी जरूरत हो, स्वाद की नहीं। शरीर की जरूरत में आप फसोगे कभी नहीं। जरूरत के बाद योग्यता है, और ईमानदारी से। ऐसे नहीं कि जरूरत की पूर्ति किसी का छीन के कर लूं। पूरी बात समझनी होगी। जरूरत, योग्यता, ईमानदारी, सत्कर्म, इतना लेकर चलना पड़ेगा। है तो दो ही लाइन, ईमानदारी और सत्कर्म। लेकिन इन दो लाइन को समझने में इतना बोलना पड़ेगा, क्योंकि दो लाइन के पीछे बहुत कुछ है। जैसे कहा गया, जन्म और मृत्यु। शब्द तो दो ही हैं, लेकिन इनके बीच में बहुत कुछ है।
किसी से पूछोगे, दुनिया का रहस्य क्या है, तो भैया एक रहस्य सामने है, जन्म और मृत्यु। बस खत्म। लेकिन इनके बीच में बहुत कुछ है। अब इनके बीच में जीना पड़ेगा। इनके बीच में फिक्स नहीं बोला जा सकता। फिक्स है जन्म और मृत्यु। या तो मृत्यु से निकल जाओ। ना जन्म, ना मृत्यु। लेकिन बीच में बहुत कुछ है। बीच में फिक्स थोड़ी ना बोला जाएगा। जैसा व्यक्ति आएगा, वैसा बोला जाएगा। अगर ये दो लाइन में ही समझ गए, तो इससे बात नहीं करनी है। बात करोगे तो आपका शब्द व्यर्थ जाएगा। आपका शब्द किसी काम का नहीं है, क्योंकि दो ही लाइन में वही कहा जा चुका है।
आप प्रश्न पूछ रहे हो। ये प्रश्न आप उलझाने के लिए पूछ रहे हो, या समझने के लिए? ये आप ही को पता है। और किसी को नहीं पता। समझने के लिए पूछ रहे हो, तो ईमानदार हो। उलझाने के लिए पूछ रहे हो, तो बेईमान हो। बस इतनी सी बात है। आप दर्शा ये रहे हो कि मैं समझने के लिए पूछ रहा हूं, सामने वाला आपको समझने के लिए बोल रहा है, और भाव ये है कि मैं उसे उलझाऊं, तो आप बेईमान हो।
अब देखना है, जिसके अंडर में मैं काम कर रहा हूं, उसकी स्थिति क्या है। मैं नहीं करूं तो उसको बहुत घाटा हो जाएगा, तो मानवता के नाते कर देना चाहिए। और अगर मेरी करने की स्थिति नहीं है, मेरे और भी काम हैं, तो अपना काम ईमानदारी से करके चला जाना है। लेकिन मानवता नहीं छोड़नी। जिसके द्वारा मुझे कुछ मिल रहा है, हो सकता है वो फंस गया हो। उसे मेरे सहयोग की जरूरत है, तो सहयोग करना चाहिए। लेकिन रोज अगर वो ऐसा करता है, जरूरत अगर आदत बन गई है, तो नहीं। शोषण नहीं करवाना है। ना करना है, ना करवाना है। ना शोषण करना है, ना शोषण करवाना है। ना अपमान करना है, ना अपमान करवाना है। सीधी सी बात है।
वो आपके ऊपर है। लेकिन मानवता नहीं खोनी। नहीं तो आपको भी किसी से मदद नहीं लेनी चाहिए। अगर आप किसी को मदद दे नहीं सकते, तो किसी से मदद कभी लेना भी मत। आप अगर ओवरटाइम काम नहीं कर सकते, तो किसी से जिंदगी में ओवरटाइम काम करवाना भी मत। और ये इतना आसान नहीं है। मुश्किल है। इसलिए मानवता कभी मत छोड़ना। नहीं तो दानव बनने में देर नहीं लगेगी।
देखना यह है कि उस झूठ से तुम तो बच गए, लेकिन किसी का अहित तो नहीं हुआ। तब तो तुम्हारा होना ही ठीक था। उस झूठ से एक बच जाए, लेकिन किसी का अहित भी ना हो, तो झूठ झूठ नहीं। लेकिन एक को बचाने के लिए एक का अहित हो रहा है, तब ये झूठ नहीं बोलना चाहिए।
इसीलिए सत्संग सुनो, आपको बल देगा। और कैसे जीना है, जब ये याद रखोगे, तब सुनते रहोगे, जब जियोगे तो समझ में आएगा, इसका उपयोग कर पाओगे।
हर वक्त भाव चेक करते रहो। मैं जो कर रहा हूं, उसमें मेरा भाव क्या है? भाव ईमानदारी का हो। भाव कभी झूठा नहीं बनता। कर्म झूठा कर सकते हो, लोगों को दिखाने के लिए, लेकिन भाव झूठा नहीं बना सकते। कर्म के पहले और कर्म के बाद एक भाव बनता है, उसी से फल का निर्णय होता है। कर्म तो दिखाने के लिए कुछ भी कर दोगे। किस भाव से किया, वो आपको पता है, दूसरे को नहीं। आप ये मत समझना कि फल सिर्फ कर्म से तय होता है। पहला भाव और आखिरी भाव मायने रखता है। बीच के भाव का महत्व नहीं। काम के पहले और काम के बाद जो भाव है, उसी से परिणाम तय होता है।
जैसे किसी को एक गिलास पानी पिला रहे हो। भाव पूरा पिलाने का है, शुद्ध भाव से पानी ले जा रहे थे। रास्ते में कोई मिल गया, और बोल दिया कि वो दुष्ट व्यक्ति है। उसके शब्दों से भाव बदल गया। फिर भी पानी उससे पहुंचा दिया। बीच में बदला हुआ भाव मायने नहीं रखता। पानी पिलाने का ही परिणाम मिलेगा। बीच में देश, काल, स्थिति, परिस्थिति में अनेक लोग मिलते हैं, अनेक संशय पैदा होते हैं। जिनको हम पूजनीय मानते हैं, उनके बीच भी वो मायने नहीं रखता, क्योंकि देश, काल, स्थिति, परिस्थिति में उतार-चढ़ाव होता है। आखिरी में, काम के बाद, भाव आएगा कि मैंने कैसे किया। उसी से फल मिलेगा। शुरुआत में भाव और होगा। काम में अनेक लोग मिलेंगे, अनेक भ्रांतियां पैदा होंगी। आप अपने काम पर अड़े रहो। काम पूरा होने पर जो भाव है, वही मायने रखता है। बीच में भाव में उथल-पुथल होती है, क्योंकि हम अकेले नहीं हैं। मुझे अपना भाव पकड़े रहना है। किसी की भावनाओं में नहीं बहना। अपनी समझ को पकड़ के रखना है। बीच में बह गए, तो बात खत्म। आखिरी में जैसा भाव बनेगा, वैसा कर्म होगा, और जैसा कर्म होगा वैसा भाव बनेगा। पहला और लास्ट भाव मायने रखता है।
काम पहले होता है, या भाव पहले? कर्म के पहले भाव बनता है, और कर्म के बाद का भाव मायने रखता है। कभी शुरुआत अच्छे भाव से होती है, फिर कर्म बुरे भाव में चला जाता है, तो परिणाम आखिरी भाव से मिलेगा। किसी से बहुत अच्छे से मिले, शुरुआत का भाव अच्छा रहा, फिर उसके व्यवहार से उसके साथ बुरा बर्ताव करने लगे, तो फल आखिरी भाव का आएगा। पहला भाव खत्म हो गया।
इसी को समझना है। कर्म के पहले और कर्म के बाद जो भाव बनता है, उससे फल तय होता है। हर वक्त अपना भाव चेक करो, कि ये कर्म किस भाव से हो रहा है। उस भाव में मेरी उन्नति भी हो, और किसी का अहित ना हो। झूठ भी बोल रहे हो, तो किसी का अहित ना हो। किसी को बचाने के लिए झूठ बोला, और एक को तकलीफ हुई, तो उस झूठ का परिणाम भी भोगना पड़ेगा, क्योंकि एक दुखी हुआ। भाव में कर्म है, कर्म में भाव है। कर्म करते समय उतार-चढ़ाव आते हैं, और आखिरी भाव मायने रखता है। जिस भाव से किया, आखिरी भाव मायने रखता है। इसलिए कहा गया है कि भाव में ईश्वर का वास है। भाव तुमसे है। भाव का आधार बाहर है, और भाव तुम्हारी समझ से है। जैसा सामने वाले को समझा, वैसा उसके प्रति भाव पैदा हुआ। भाव बहुत मायने रखता है। कर्म के पहले, और कर्म के बाद।
बल कमजोर है, तो कुछ ना कुछ तो कर लो। ईमानदारी अपना ली है। हां, सब में है।
मत करो। पहले ईमानदार बनो। पहले ईमानदार बनो, बस पहले ईमानदार बनो, उसके बाद बात करो।
देख लो। अभी थोड़ा धैर्य रखना पड़ेगा। विवेक जागृत करना पड़ेगा। इसके बाद ही कुछ होगा। सत्संग सुनते रहो।
देखिए, आप तो द्वार हो, लेकिन जाना आपके पार ही है। वो आपको अपने अंदर देखना है। ईमानदारी अपना लो। ये अपना लो।
उससे क्या मतलब है? अब तो बस। अपना मतलब ही नहीं है किसी से। विचार करो, क्षमता के अनुसार। बस खत्म। उठते रहो। अपने अनुसार जीना है, दूसरों के अनुसार जीना नहीं। निकलना है, तो करना पड़ेगा। सीधी सी बात है। निकलना है, तो करना पड़ेगा।
भाव की बात है। कुछ चाहिए, इसमें कर रहे हो, या ईमानदारी से है। और कुछ नहीं चाहिए, इसमें कर रहे हो, तो वो आपको आगे उठा देगा। हमारी बात को जरा गहराई से समझो।
कर्म ही पूजा है। निष्काम कर्म। आपका, आपके परिवार का भरण-पोषण कर रहे हो, वो कर्म नहीं। जब जरूरतमंद की सेवा करते हो, निष्काम सेवा, वो कर्म पूजा है। कुत्ते-बिल्ली भी अपने बच्चों को पाल-पोस कर, मुंह में दबा के पालते हैं, घोंसला बना के दाना-वादाना खिला के, ईमानदारी से पाल रहे हैं। कौन सी बेईमानी कर रहे हैं?
वही तो कर रहे हो। निष्काम सेवा, जरूरतमंद की सेवा जब करते हो, वो निष्काम सेवा है। अपने बच्चों का भरण-पोषण करो, ये थोड़ी निष्काम सेवा है। ये तो पशु भी करते हैं। वो लेन-देन है। उन्होंने आपके लिए किया, आप उनके लिए किए। और जिसके लिए आप कर रहे हो, उससे आपको कुछ मिल रहा है। चाहे पत्नी हो, चाहे पति हो, चाहे बच्चे हों। आप ईमानदारी से धन कमा रहे हो। अपने परिवार का भरण-पोषण करते हुए, समाज के जरूरतमंद की कितनी सेवा कर रहे हो, वो निष्काम सेवा है। वो कर्म पूजा है। निष्काम कर्म पूजा है। निष्काम कर्म कहां? जरूरतमंद की सेवा।
उसे तो कर्तव्य है, जिम्मेदारी है। नहीं निकालो ना। आसपास देखो। आप करते ही हो, जो भी मिलता है। कुत्ते को रोटी डालना, बहुत सारी चीजें। इसी से आपका उद्धार होगा। लेकिन पूरी तरह ईमानदारी अब भी अपनाओ। तभी कल्याण होगा। नहीं तो नाव में अगर एक भी छेद बाकी रह गई, तो नाव डूब जाएगी। किसी की 99 है, किसी की एक है। परिणाम दोनों का एक ही आएगा। एक की जल्दी डूबेगी, एक की लेट, लेकिन दोनों पहुंचेंगे एक ही जगह। नहीं तो एक भी झूठ आपको वहीं रखेगा। जहां हजार झूठ वाला है, वहां एक झूठ वाला भी दोनों एक ही जगह पहुंचेंगे। लगता है तुलना में हम इससे ठीक हैं। नहीं। तुम दोनों एक ही जगह मिलने वाले हो। थोड़ा इंतजार करो।
शरीर निमित्त बन रहा है। हो तो गई बात। ये आप ही समझो। सत्संग सुनते रहो। पहले ईमानदार बन जाओ।
कभी-कभी बैक साइड में दर्द होता है। मशीन फेल हो जाती है। दर्द का कारण पता ही नहीं चलता। वो दर्द अगले शरीर का ही है। दर्द में ही शरीर छोड़ा था, और इस शरीर में दर्द लेके ही आया। पता भी नहीं चलता। शरीर तो बदला, अंग तो सही है, लेकिन दर्द रह गया। इलाज भी नहीं हो रहा। ऐसे बहुत रोग हैं, जांच में मिलते ही नहीं। एक समय ऐसा आता है कि अपने आप ठीक हो जाता है। हम अगले शरीर में बहुत सारी चीजें लेके आते हैं।
पहले आदत नहीं बनती। पहले होती है जरूरत। शुरुआत जरूरत से होती है। उस जरूरत की पूर्ति करते-करते आदत बनती है। आदत बार-बार करने से संस्कार बन जाता है।
आदत बनने में समय लगा है। एक दिन में आदत नहीं बनती। जब रोज-रोज प्रैक्टिस हुई, तब बनी। तो रोज, जब भी उस आदत करने की बारी आए, उसी समय अपने आप को रोक लो। हर समय तो वही करते नहीं हो। कर्म में जब बुरी आदत करने की बारी आए, उसी समय रुक जाओ, मत करो। इस पर काम करोगे, तो धीरे-धीरे छोड़ पाओगे। एक दिन में नहीं छूटेगी। हर समय सचेत रहना पड़ेगा। जैसे ही वो आए, नहीं करना।
जैसे ही आए, नहीं करना है। उसी समय मार देना है। ऑटोमेटिक मूड तोड़ देना है। पहले सचेत होना है कि स्वभाव में ये गड़बड़ है। जैसे कोई बच्चा ऑटोमेटिक झूठ बोल देता है। उसे पता भी नहीं होता। कहता है अब ऐसे नहीं बोलूंगा, फिर भी मूड में बोल ही देता है। वहां मतलब भी नहीं होता। तो शुरुआत यही है कि जब बोलने का समय आए, उसी समय रोक लो, झूठ नहीं बोलना। काम उसी समय करना पड़ेगा। एक बार में नहीं रुकेगा। बनने में बहुत समय लगा है, छोड़ने में भी बहुत समय लगेगा। अभ्यास करना पड़ेगा। अभ्यास करते-करते एक दिन छूट जाएगा।
अभी भी उसमें रस ले रहे हो। रस मिल रहा है। बिना रस के कुछ करोगे ही नहीं। इतना कर भी रहे हो, कुछ मिल रहा है, वो नहीं जा रहा।
जिस समय करने की बारी आए, उस समय दिमाग में आता ही नहीं, तो मत करो। वो उस समय नहीं आता। होने के पहले ही सचेत रहना है। होने के पहले ही सचेत रहना है।
जब वो पैदा हो, उसी समय मारो। जब उसका जन्म हो, उस समय तकलीफ भी होगी, क्योंकि रस नहीं मिलेगा। मजा नहीं आएगा, क्योंकि आपने मजा लिया है। बहुत तकलीफ का सामना करना पड़ेगा। लेकिन जैसे ही जन्म हो, उसी समय मार दो।
हो सकता है उसका टोन ही वैसा हो। जैसे गोयल जी बैठे हैं, इनका टोन हरियाणा का है, पूरे दुनिया में ऐसा टोन है। टोन हो सकता है वैसा हो, तब समझ आने लगती है। आपको देखना है। हो सकता है उसका टोन ही ऐसा हो। आप लोगों का टोन तो मशहूर है दुनिया में। लट्ठमार भाषा। आप अगर प्रेम से भी बोलते हो, तो ऐसा लगता है कि सामने वाले को दबा रहे हो। आपको देखना है कि इसका टोन तो वैसा नहीं है। चुप मत हो। चुप होना भी एक कमजोरी है। आपको भी घुटन होगी।
वो अगर अपनी प्रवृत्ति बदलेगा, तब। आपके बदलने से क्या होगा? आप जिसके साथ रहे हो, उसका भी तो प्रभाव पड़ेगा। जहां आप बदल सकते हो, बदल लो। जब आप बदल के सामर्थ्यवान रहोगे, तभी किसी का प्रभाव आप पर काम नहीं करेगा। अगर आप किसी पर निर्भर हो, और सोचो कि उसका प्रभाव मुझ पर काम ना करे, तो करेगा ही करेगा। अपने आप को सामर्थ्यवान बनाओ। सबसे पहले समझ के साथ सामर्थ्यवान बनाओ।
इसमें टाइम पीरियड बढ़ाने की भी कोई जरूरत नहीं है। घंटों ध्यान बैठने की कोई जरूरत नहीं। उससे क्या होगा? मैं कह रहा हूं, उससे क्या आपके आचरण में बदलाव आ जाएगा? होगा क्या? आपके शरीर को रिलैक्स मिलेगा, एक सुकून मिलेगा। लेकिन उठने के बाद तो आप वहीं आओगे। तो आपको अपने कर्म को बदलने की जरूरत है। आप समझिए इस बात को।
उसी में आ जाओगे ना। तो पहले ध्यान को समझो कि मुझे बैठकर क्या करना है। जब मुझे बैठना है तो पहले मुझे भाव बनाना है कि भाई मुझे निकलना है। निकलना कहां से है? लोगों के पिंड में, वस्तुओं में, मैं राग में फंसा हूं। तो जब मैं बैठूं तो मुझे ध्यान करना है कि मैं कहां-कहां, क्यों फंसा हूं, और वहां से अपने आप को छुड़ाना है। तब बैठने का मतलब है।
विचारों को रोकने में यही तो गड़बड़ है। विचारों को रोकने से क्या उन विचारों से तुम मुक्ति पा सकते हो? किन विचारों को रोक रहे हो? क्या उन विचारों को रोकने से उन विचारों से मुक्ति पा सकते हो? विचार ही तो तुम्हारे कर्म के परिणाम हैं। अगर तुम्हें कोई विचार ग्रसित कर रहा है, उस विचार से आप छिप रहे हो, उस विचार को दबा रहे हो, तो उस विचार के लिए आपने कर्म किया है। तो क्या वो विचार दबाने से उस विचार से मुक्त हो गए?
किसी से कर्ज आपने लिया, तो कर्ज देने से मुक्त होगे कि उस व्यक्ति से छिपने से मुक्त होगे? कर्ज जो लिया है, उससे मुक्त होने के लिए देना पड़ेगा ना। तो फिर उसको तो जैसे लिया है वैसे देना पड़ेगा ना, कि उस कर्जदार से छुप के भाग जाओगे?
हां, उसी को काटने का ईमानदारी और सत्कर्म ही रास्ता है। यही एक रास्ता है और कोई रास्ता नहीं। यही रास्ता है। बेईमानी और दुष्कर्म में भटके हैं, ईमानदारी और सत्कर्म में निकल जाएंगे। बस यही बहुत साफ सुथरा रास्ता है।
तो विचारों को दबाओ मत। विचारों में जीना सीखो। विचारों के साथ जाओ। ये विचार मुझे ग्रसित कर रहे हैं तो क्यों कर रहे हैं? क्योंकि ये विचार आज ग्रसित कर रहे हैं, लेकिन इसके पीछे कोई व्यक्ति विशेष है, कोई जीव है। नहीं तो फिर वो ध्यान में आने बंद हो जाएंगे।
जैसे आपने जिससे कर्ज लिया था, दे दिया, तो वो आपके सामने हो और वो कुछ नहीं कर सकते। अब छुपने की जरूरत नहीं है।
विचारों को कभी मत दबाओ। विचारों के साथ जाओ। विचार का जन्म कहां से हो रहा है? क्योंकि उस विचार के लिए आपने कोई काम किया है। ऐसे थोड़ी ना विचार आ गया। अगर कोई विचार आपको परेशान कर रहा है तो वो विचार आज परेशान कर रहा है, लेकिन उसका आपने कभी मजा लिया। तो आप उन विचारों के साथ जाओ, और जब आखिरी में चले जाओगे तो अपने आप को छुड़ा पाओगे। आपको पश्चाताप होगा कि नहीं, अब मुझे अपने स्वभाव को बदलना है। मुझे ऐसे लोगों से मतलब नहीं रखना है, क्योंकि मुझे निकलना है। लेकिन आखिरी तक जाना पड़ेगा। विचार दबाने से विचारों से मुक्ति नहीं मिलती, क्योंकि विचार आपके कर्म का परिणाम हैं।
वो गांठ है, जो पुरानी है। आप ये मत सोचो मैं छुप जाऊंगा। किसी विधि द्वारा, चलो एक काम करते हैं, चेहरा ही बदलवा लेते हैं, चाहे तो दूसरे स्टेट में चला जाता हूं, भारत को ही छोड़ देता हूं। लेकिन तू कर्जदार तो है, देना ही तो पड़ेगा। कब तक छिपोगे? कब तक, कहां भागोगे? जहां जाओगे, अपने आप को ही पाओगे। इसलिए विचारों का सामना करो। और मैं इसकी भरपाई कैसे करूं, उसके लिए तैयार हो जाओ। भैया, मेरे कर्म हैं। अपने आप से ही कहना है, मेरे कर्म हैं और मैं इसकी भरपाई करने के लिए तैयार हूं। बस खत्म।
एक बात बताओ। जिसको तुमने देखा नहीं, अगर मैं कहूं उसका ध्यान लगाओ, लगा सकते हो? तब, परमात्मा को देखा नहीं, तो कहां परमात्मा के ध्यान में बैठे? आप इसे गौर से समझिए। लोग कहते हैं ध्यान में बैठ जाओ परमात्मा के। परमात्मा का जिंदगी में ना अता पता है, तो कैसे हम बैठ जाएंगे? उनका तो कोई रूप ही नहीं है ना। वो रूप से परे होंगे, लेकिन वो देखा जा सकता है, तभी तो कहा गया है। रूप नहीं है, लेकिन किसी से तो देखा गया होगा। ये खुली आंखों से नहीं, किसी और से देखा गया होगा। कुछ चीजें ऐसी होती हैं हमारे जीवन में कि खुली आंखों से नहीं देख सकते। जैसे तरंग आ रही है, खुली आंखों से नहीं दिखती, लेकिन किसी के द्वारा तो देखा जा सकता है। तो कोई तो पैमाना होगा। अगर किसी ने कहा ये है, तो इसका मतलब उसने देखा। ऐसे थोड़ी बोल दिया। देखा जा सकता है, तभी तो बोला। तो अभी तो परमात्मा की बात मत करो। अभी एक काम करो। इस पर ध्यान करो कि मैं कैसे अपने आप को राग और द्वेष से छुड़ा दूं। ईमानदारी से काम करो।
तो ये भी जांचना है कि लोग सोच क्यों रहे हैं। कहीं ऐसा तो मैं हूं नहीं। ये भी जांचना है। अगर लोग मेरे बारे में सोच रहे हैं, क्या उस सोचने के पीछे कुछ आधार मिला है, बेस मिला? ऐसे तो सोचेंगे नहीं। ऐसे सोच थोड़ी ना पैदा होगी। अगर कुछ आपको लेकर कोई सोच रहा है तो कुछ तो बात है। तो देखना यह है कि क्या मैं वैसा हूं कि नहीं हूं। किसी के सोच को कभी अनदेखा नहीं करना। कभी भी अगर मेरे बारे में कोई कुछ सोच रहा है तो जरूर उसको कोई आधार मिला होगा, बेस मिला होगा। ऐसे थोड़ी सोच रहा है। तो देखना ये है कि मैं कैसा हूं।
गुरु जो है वो ज्ञान का प्रतीक है, और शब्द है। शब्द मतलब ये शब्द जो हम बोल रहे हैं, वही बोला जा रहा है।
बिल्कुल नहीं। वो अलग तरीके से समझाएगा।
शब्द तो टकराव से पैदा हुआ है। शब्द अगर देखा जाए तो शब्द हमें कब चाहिए? जब कुछ चाहिए। जब मुझे कुछ नहीं चाहिए तो क्या आपको लगता है शब्द की जरूरत है? कहा जाता है कि आत्मा को तो कुछ नहीं चाहिए। तो आपको लगता है आत्मा को शब्द की जरूरत है? शब्द चाहिए में काम करता है। और शब्द टकराव में पैदा हुआ है।
जैसे ही आप आत्मज्ञान में हो जाते हो, वहां शब्द खत्म हो जाता है। अब शब्द इसलिए बोलना पड़ रहा है। या तो वो जरूरत में बोलेगा, शरीर की जरूरत में, या तो आप आत्मज्ञान तक पहुंच जाएं, उसके लिए। नहीं तो उसे शब्द की कोई जरूरत नहीं। अब उसकी यात्रा अपने आप होगी।
उसकी यात्रा अपने आप होगी। जैसे एक मादा गर्भ को धारण कर ले तो मां बनने की यात्रा अपने आप होगी। वहां क्या शब्द की जरूरत है? आपको लग रहा है कि गर्भ धारण के बाद भी कुछ शब्द की जरूरत है तभी वो मां बनेगी। ऐसा है क्या? तो एक जगह ऐसा आता है जब आत्म तत्व में आप स्थिर हो जाते हो तो वहां शब्द का कोई मतलब ही नहीं रहता। शब्द का मतलब लेन देन में है। आपको लेन देन नहीं करना है तो आप चुपचाप बैठे रहते हो। शब्द तो आत्मज्ञान तक पहुंचने के लिए केंद्र में है। केंद्र में जैसे पहुंचे, शब्द खत्म। शब्द दो में है। दो में। आत्म तत्व में स्थिर हो गए, कोई शब्द की आवश्यकता ही नहीं है। आपकी यात्रा ब्रह्म की अपने आप होगी।
अब तो आत्म तत्व में जब स्थिर हो जाओगे। खींच के तो जो अंदर की जिज्ञासा है, जो लालच है, वही तो लेके आएगा। कुछ नहीं चाहिए, तो सब एक समान है। और जैसे ही कुछ चाहिए, सब अलग-अलग हो गए, भिन्न-भिन्न हो गए। तो जब आपको कुछ नहीं चाहिए, तो आत्म तत्व में आप स्थिर हो गए, तो सब एक समान हो जाएंगे।
जो अष्टावक्र जी ने कहा, अब ऐसा नहीं कि आत्मज्ञानी गटर का पानी पीने लगेगा। ये मत समझ लेना। आप ये ना समझना कि वो कुछ भी खाने लगेगा, कचरा। आप ये मत समझना कि वो तो सब एक समान है, गोबर खाने लगेगा। ऐसा ना समझना। उसका किसी के प्रति राग द्वेष नहीं रहता। कोई उसके लिए छोटा बड़ा नहीं रहता। कोई अमीर गरीब नहीं रहता। कोई ऊंच नीच नहीं रहता। सब एक समान।
कुछ हो तभी तो सोचना पड़ रहा है कि मैं कुछ नहीं हूं। वही तो समस्या अटकी होती है। इसका मतलब कुछ हो। भाई, सोचे बिना तो काम नहीं चल सकता। सोचना भी पड़ेगा, रखना भी पड़ेगा। मैं कुछ हूं, इससे मैं परेशान हूं, इससे मैं कैसे निकल जाऊं। अगर आपको सोचना पड़ रहा है कि मैं कुछ नहीं हूं, इसका मतलब आप कुछ हो। तो कुछ हो से छुड़ाने के लिए आप काम करो, क्योंकि आप कुछ हो से परेशान हो। तो उसके लिए काम करना पड़ेगा, मेहनत करना पड़ेगा। बातों से बात नहीं बनेगी। ईमानदारी, राग द्वेष से छूटना। ईमानदारी, सत्कर्म। ये सर्वप्रथम है। इसके बाद योग्यता से ज्यादा पाने की इच्छा का त्याग। और जरूरत में जीना। बस इतना आप अपनाओ।
बात अच्छा बुरा नहीं। जब आप योग्य ही नहीं हो तो अच्छा कैसे कर पाओगे? उस लायक बनना है। आपको योग्य होने के लिए काम करो। कोई संशय हो तो बोलना।
सत्संग को सुनते सुनते सब आ जाते हैं। एक दिन का और समय बचा है। आएंगे। उसका भी लाभ ले लो और अपने संशय को मिटाओ। कैसे भी अपना आत्मिक कल्याण करो। उसके लिए ईमानदारी से मेहनत करो। बातों से बात नहीं बनने वाली है। आपको अपने आचरण में उतारना पड़ेगा। उसमें जीना पड़ेगा। जीने में आप हो। राग, द्वेष, मोह, आसक्ति, इच्छा, अपेक्षा, मेरा, कर्ता के भाव से मुक्त होने के लिए आपको काम करना पड़ेगा। आप सोचो, मैं राजा बन गया, तो क्या राजा बन जाओगे? आप शिक्षक बने तो उसके लिए मेहनत की है ना? लेकिन आप सोचते हैं मैं शिक्षक बन गया, तो क्या आप बन जाते? आपने उसके लिए कर्म किया और आज कह पा रहे हो कि मैं शिक्षक हूं। अगर आप कुछ हो तो उसके पीछे आपने काम किया है। ऐसे नहीं हो। तो यहां काम का परिणाम है। और अगर आप फ्री में पाना चाहते हो तो वही आप थके जाओगे। तब रोओगे कि लोगों ने मुझे लूट लिया। तो फ्री में पाने की इच्छा का त्याग करो। अपना आत्मिक कल्याण करो और मेहनत करो।
मेरा कहने का मतलब है कि अगर आप अपने में स्थिर हो गए, तो प्रश्न खत्म हो जाएगा। आप हो। वहां बस स्थिर हो गए, तो बात ही खत्म। क्योंकि बाद में तो फिर बाहर आना पड़ेगा, और बाहर आकर फिर उलझ जाओगे। तो सुलझ के रुक जाओ, अपने आप को देख के।
जब आप समझे ही नहीं, तो असर कैसे करेगी? आप समझना चाहोगे तभी। आप सात घंटे में समझ भी तो रहे हो। सात घंटे बैठे क्यों? जब समझ ही नहीं आ रहा है, तो बैठे क्यों?
अगर वो समझ रहा है, तभी बैठा है। अगर वो सत्संग के लिए नहीं, किसी और के लिए बैठा हो, उसे सत्संग से मतलब ही नहीं है। उसकी समझ से ही होगा। समझ कैसे खुलेगी? अगर वो चाहेगा तो। वो चाहेगा कब? जब उसे समझना होगा। जब वो चाहेगा, तो इसका मतलब उसने अपनी जिंदगी के रस को, अपनी पूरी ऊर्जा को, अभी किसी रस में अटका रखा है। वही उसको सत्य आभास हो रहा है। वो तब समझना चाहेगा, जब उसे जरूरत लगे। अगर जरूरत नहीं है, तो आप समझाओ तो कहेगा, मुझे नहीं समझना। जब उसे लग जाएगा कि ये मेरी जरूरत है, तो बिना समझे रह नहीं पाएगा। वो तब लगती है, जब उसे जरूरत हो।
जहां आप रस ले रहे थे, या तो रस नहीं मिल रहा है, तो रस और कहीं ढूंढ लोगे। तो ऑप्शन ढूंढोगे। और आप समझ गए कि इस रस में कुछ है नहीं, तो इसमें कुछ नहीं है, तो कहां है? तो वहां निकल जाओगे। खोज वहां लेके चली जाएगी। तब जिंदगी में अध्यात्म शुरू होगा।
असल काम कोई किसी पे थोप नहीं सकता। कोई किसी को समझा भी नहीं सकता। बस समझने के लिए बोला जा सकता है। समझ लिए तो भी ठीक, नहीं समझे तो भी ठीक। समझने की क्षमता कोई आपको नहीं दे सकता। आपकी योग्यता के अनुसार, क्योंकि अगर आप चाहोगे तो उसके लिए काम भी तो करना पड़ेगा। चाहत के बाद काम, काम के बाद परिणाम। बस बात खत्म। चाहत में तो आदमी कुछ भी कर सकता है। फिर उसकी चाहत है, तो वो चाहत करवा ही लेगी उससे।
अगर आए तो कल का भी समय है। अपने संशय को मिटाओ। यात्रा करो। खूब खुद जवाबदार इंसान बनो और आगे बढ़ो। अपना ख्याल रखिए।
इतना दर्द है। दर्द की बात है कि मौत उससे ज्यादा ठीक है। प्रत्यक्ष एक दांत तोड़, तू कहेगा मौत आ जाए वो ठीक है। ये दांत मत तोड़ भाई। सही बात ये मैं कह रहा हूँ। थोड़ा में ही गड़बड़ है। जरा पूरी तरह बात को सुन। पूरे पहले सुनो। समझो क्या बोला जा रहा है। नहीं है तो पूछ लो।
तो आप इस डर से निकलिए। क्योंकि यह डर आपको गुलाम बना के रखा है। कहीं सूर्य के गुलाम हो, कहीं चाँद के गुलाम हो, कहीं पेड़ के गुलाम हो। गुलामी है ना? अगर हम डर में किसी के सामने प्रणाम कर रहे हैं तो ये गुलामी है। कहीं जानवर के सामने हम प्रणाम कर रहे हैं। आप सोचिए, वो आपसे कोई प्रार्थना नहीं कर रहा है। वो अपना जी रहा है, मस्त। मतलब आपमें पैदा करने की क्षमता है, आप गुलाम बन गए। और वो प्रकृति के हिसाब से जीता है। वो स्वतंत्र है। आप एक पक्षी को पकड़ के पिंजरा मत लगाओ। कितना भी चारा दो, वो चारा पेट भरेगा और उड़ जाएगा। वो आपके साथ नहीं रहेगा। वो आपके भोजन के लालच में आपके साथ नहीं रहने वाला है। पक्षी उड़ जाएगा। स्वतंत्रता सबको चाहिए। तो मेरे से अच्छा देखा जाए तो वो है। मतलब हम सब कुछ होते हुए भी, हमारे हाथ-पैर हैं, सब कर सकते हैं। लेकिन आप देखोगे, बस ये पेट के लिए, एक कपड़े के लिए, और एक घर के लिए हम भीख माँगते रहते हैं। पूरी जिंदगी भीख माँगने में गुजर जाती है। कभी प्रतिमा के सामने, कभी जानवर के सामने। कभी पानी के सामने, नदियों के सामने, कभी तालाब के सामने। और यहाँ तक कि अभी तो कुत्तों की भी समाधि बहुत है देश में। बहुत जगह है। वहाँ भी माँगने लगते हैं।
मेरा कहना है इससे निकालो। अगर आध्यात्मिक यात्रा करना है तो इससे निकालो। अगर प्रणाम करना है तो आप उसका कर्म देखिए। कर्म को प्रणाम करिए। लालच में प्रणाम किसी को मत करिए। उसके द्वारा अगर कर्म कुछ समाज हित के लिए हुआ है तो वो पूजनीय है। वो प्रणाम के योग्य है। तो अपने आप को डर से निकालिए। हम बहुत डरे हुए हैं। और हमारे डर का लोग फायदा उठा लेते हैं। इससे अपने आप को निकालिए।
मंदिर में पुजारी बैठा है। कह रहा है, तुम इतना ही नहीं, इतना दो। जाओ, तुम्हारा काम हो जाएगा। अगर ऐसा कुछ होता तो वो सुबह आता और बोल देता, शाम तक मुझे इतनी चाहिए। उस मूर्ति से उसे पता है, ये मूर्ति कुछ नहीं देने वाली है। लेकिन तुम देने वाले हो। अगर उस प्रतिमा से कुछ मिलता तो वो सुबह आता और बोल देता, शाम तक मुझे भैया एक हजार, दो हजार, इतना हमें दे देना। वो आपसे क्यों गिड़गिड़ाता? चल, एक सौ रुपये से शुरुआत करता है, कपड़े देख के। चल अच्छा, ग्यारह सौ दे दे। मतलब वो आपसे क्यों गिड़गिड़ा रहा है? उसे पता है ये कुछ नहीं देगा। लेकिन आप दोगे, उसे यह पता है, क्योंकि आप डरे हुए हो। आप डरे हो इसलिए उसे दे रहे हो, कि अगर ये रूठ गया तो वो भी रूठ जाएगा और मेरी हानि हो जाएगी। ऐसा कुछ भी नहीं है। ये भी रूठ के कुछ नहीं उखाड़ सकता, वो भी रूठ के कुछ नहीं उखाड़ सकता। जैसा आपने कर्म किया है, वैसा ही आपको परिणाम मिलेगा। आपके कर्म का परिणाम मिलेगा। किसी के रूठने, किसी के खुश होने से कुछ नहीं होता। आपने जैसा किया है, वैसा ही आपको मिलने वाला है। ये पक्का है।
तो इन सब बातों को समझते हुए ईमानदारी, सत्कर्म, जरूरत में जीना चालू करो। और इतना आप समझ लो कि मुझे किसी से माँगना नहीं है, और मेरे हक का छोड़ना नहीं है। बात खत्म। मैंने अगर कुछ काम किया है, तो मेरे काम का परिणाम अगर कुछ है, मुझे पता है, तो मुझे परिणाम लेना है। बात खत्म। उसके लिए चाहे मुझे कुछ भी करना पड़े। भाई, कभी-कभी ऐसा होता है ना, जहाँ हमने काम किया। अब मैं काम तो नहीं करना चाहता, लेकिन मेरा पेमेंट रुक गया है और वो नहीं दे रहा है, तो लेके ही हटो।
फटे कपड़ों में मैं कई सालों तक रहा। जैसे फटा कपड़ा नहीं, जैसे एक कपड़ा पहन लूँ। तो मैं एक कपड़े को दो-दो, तीन-तीन साल पहन लूँ। मेरे पास टाइम ही नहीं था बदलने का। मेरे पास इतना वक्त नहीं था कि मैं जा के नए कपड़े सिलवाऊँ, मैं पहनूँ। क्योंकि श्मशान में रहना है, इस जगह घूमना है। बढ़िया कपड़ा पहनोगे तो कई लोग पूछेंगे। और गंदे फटे कपड़े रहेंगे तो कोई तुम्हें आएगा ही नहीं, धक्का भी मारेगा, तो उसमें अपने राग-द्वेष का भी पता चलता है। आप एकदम वो कपड़ा पहन के जाइए जिसका प्रभाव नहीं हो। तो समाज आपको खुद खुल के दुत्कारेगा। आपसे खुल के लोग बात करेंगे। लेकिन आप एकदम बन-ठन के जाएँगे, तो जैसा आवरण मजबूत रहेगा, उस लहजे में आपसे बात करेंगे।
तो मैंने क्या किया, कि मुझे समाज के लिए काम करना था। अध्यात्म को, प्रत्यक्ष ज्ञान को, हर व्यक्ति तक पहुँचाना था, खोजना था। तो मैंने कहा कि पूरे आवरण से अपने आप को कमजोर कर दो। क्योंकि समाज के लिए काम करोगे तो पहले समाज को समझना पड़ेगा। और जब पूरी तरह सामर्थ्यवान रहोगे, तभी आप समाज के लिए काम करोगे। क्योंकि मैं आपको बताऊँ, शिष्य ही गुरु को खराब करते हैं। जैसे सचिव ने कल बोला, नहीं मत कर, मेरा लो। क्यों नहीं लोगे? जब सबके लिए लिया जा रहा है तो उनके लिए क्यों? एक तरफ आप कह रहे हो कि आप इसलिए अच्छे हो क्योंकि आप सबको एक जैसे रखते हो, और जब आपकी बारी आई तो आप वीआईपी क्यों बता रहे हो? इस बात को गहराई से समझिए।
तो मैंने कहा कि धन से, तन से, और अपनी समझ से, तू जब पूरी तरह मजबूत रहेगा, किसी पर निर्भर नहीं रहेगा, तब तू समाज के लिए काम कर पाएगा। और अगर तू कहीं से भी कमजोर है, चाहे धन से, चाहे तन से, चाहे समझ से, तब तुझे लोग दबा देंगे। तेरे लोग पहले आएँगे, तेरे बनेंगे, और तुझे दबा देंगे, और तुझे अपने जैसा चलाना चाहेंगे। इसलिए हमने तुरंत रगड़ दिया कि ना भाई, अगर कैमरे पे नहीं आओगे तो आप यहाँ नहीं बैठ सकते। सीधी सी बात है। वो आप लोगों के लिए साधारण घटना थी, मेरे लिए नहीं। आप एक तरफ ये चाहते हो कि गुरु ऐसा हो कि सबके लिए एक भाव रखे, फिर उससे जाके कोने में बतियाना चाहते हो। क्यों? तो जब यह सब मैंने देखा, तो मैंने कहा, अपने आप को पहले बलवान बना, सामर्थ्यवान बना पूरी तरह, और तब तू काम कर पाएगा समाज हित के लिए। और अगर तू कहीं से भी कमजोर रहा, तो तेरी कमजोरी का लोग फायदा उठाएँ। किसी पर निर्भर रहोगे तो उसकी बात तो माननी पड़ेगी। वो जहाँ बैठा है, वहीं से चलाएगा। हर आदमी, जहाँ जिसकी स्थिति है, वहीं से चलाएगा।
ऐसा नहीं कि सतीश की कोई प्लानिंग थी। लेकिन सतीश की कहीं न कहीं गलती थी। ऐसा नहीं कि कर्नल जिल की प्लानिंग थी। किसी की प्लानिंग नहीं थी कि वो प्लानिंग करके आए थे। लेकिन ऐसा हुआ। इसलिए मुझे कहना पड़ा कि नहीं भाई, कैमरे पर आना ही पड़ेगा, और कोई रास्ता नहीं है यहाँ। एक रास्ता और है, आप जा सकते हो। और धन की कोई कमी नहीं है। पंद्रह दिए हो, पंद्रह माँगोगे, जगह पे उसी समय दे दूँगा। मेरे जेब में एक नहीं रहता।
ये तो हमें देखती रहती है। हम जब जमीन ले रहे थे, ये सब बोली, आप करोगे कैसे, आज तक ये समझ में नहीं आया। बोला, मेरे पास धन की कमी नहीं है। मेरे पास धन की कमी है ही नहीं। ना मेरे पास ज्ञान की कमी है, ना मेरे पास शरीर के बल की कमी है। मेरे पास अथाह है। मैं अपने आप को पहले अथाह बनाया, फिर मैं काम करने निकला। और मेरा काम मुझसे है। मेरा काम किसी पर निर्भर नहीं है। मेरे काम की व्यवस्था खुद प्रकृति करती है, क्योंकि मैं काम प्रकृति के लिए करता हूँ। मुझे इस काम के बदले कुछ नहीं चाहिए। जब मुझे जरूरत होगी तो आ जाएगा। मेरे पास कोई कमी नहीं है।
और मैंने साधना करके, तपस्या करके, उस लायक अपने आप को पहले बनाया। मैं ऐसे ही नहीं चल दिया कि झोला उठाया और चल दिया, कि बाबा बनना है, लूटना है लोगों को। पहले मैंने अपने आप को बाबा का मतलब समझा, संत का मतलब समझा, साधु का मतलब समझा, सन्यासी का मतलब समझा, बैरागी का मतलब समझा, उदासी का मतलब समझा। जब उस मतलब को समझने के बाद मैंने उस पे काम किया, मेहनत किया, फिर मैं यहाँ बैठा हूँ। यह मैं अपनी मेहनत से बैठा हूँ। ये मुझे कोई फ्री में भगवान, देवी-देवता ने नहीं दे दिया। मैंने अपने इष्ट को भी यूज किया। सीधी सी बात है। अगर हम तुम्हारे पास आए तो यूज करने। तुम हमारे पास आए हो यूज करने। यूज एंड थ्रो, यही दुनिया है। और इसको मैंने स्वीकार किया है। तो हमने कहीं न कहीं अपने इस काम में इष्ट को भी यूज किया। हम इष्ट के लिए थोड़ी न गए। मुझे इस संसार में कुछ काम करना था, और मुझे लगा कि तुम सहयोग करोगे। उस सहयोग के लिए मैं भी काम करूँगा। मैं आपको दूँगा। तो मैं ऐसे यहाँ आके नहीं बैठ गया हूँ कि मैं घर से निकला, पहन लिया गेरुआ, ले लिया चिमटा, और लोगों को चल दिया अलख निरंजन जगाने। पहले अलख निरंजन के लायक मैंने अपने आप को बनाया। मैंने मेहनत किया। अगर आपके सामने हूँ और बोल रहा हूँ, तो यह मेरी मेहनत से है, और मेरा काम मेरे तरीके से होगा, आपके तरीके से नहीं। मेरा काम कैसे होगा, उसका फैसला मैं लूँगा। क्योंकि पूरी प्लानिंग मुझे पता है। काम क्या करना है, मुझे पता है। और मेरे काम से मुझे प्रेम है, बाकी किसी से नहीं।
अगर मेरे काम में आप आए हो तो आपसे भी प्रेम है, लेकिन काम मेरे तरीके से होगा, आपके तरीके से नहीं। आप दो ही चीज कर सकते हो। एक, काम का उपयोग कर सकते हो। और एक, इस काम में सहयोग कर सकते हो। बस, और कुछ नहीं। और आप सोचो कि नहीं, आपके तरीके से होगा। असंभव। क्योंकि आप जहाँ हो, वहीं से करोगे। आप अपने स्तर से ही कुछ बोलोगे। तो आपका स्तर क्या है? राग-द्वेष का। आप थोड़ी न उस स्तर पर पहुँचे हो। अगर आपका फैसला हम मानें, तो आपका फैसला कहाँ ले जाएगा? एक दलदल में ले जाएगा, और जहाँ तुम भी रोओगे, हम भी रोएँगे। दोनों रोएँगे। क्योंकि तुम मेरा लेवल तो गिराओगे।
मैं मुंबई में रहता था, तो मेरा दादर ऑफिस आना-जाना था। मेरे गाँव का एक लड़का मिल गया, नालासोपारा से। बोला, आज मेरे साथ चलो। मेरा फर्स्ट क्लास का पास था, उसका सेकंड क्लास का। तो सेकंड क्लास में गया, वो भीड़। जब हम उतरे तो मैं बोला, दोबारा मत मिलना। एक तो तू मेरे साथ चल नहीं सकता। मैं तो उसमें भी जा सकता हूँ, इसमें भी। लेकिन दोबारा अब स्टेशन पे मत मिलना। आज दुर्दशा करवा दी तूने। वैसे ही अगर मैं आपकी बात मान लूँ, तो आपकी जगह आ जाऊँगा। और आप अपनी जगह तो परेशान ही हो। आपको मेरी बात माननी पड़ेगी, मेरी जगह तक आने के लिए। अगर मैं बात मान लूँ तो आपकी जगह मैं पहुँच गया, तुरंत। और आपकी जगह कहाँ है? तो बस वही आके दोनों रोएँगे। और तुम आए थे वहाँ से निकलने के लिए। तो इसीलिए मैं उनकी बात नहीं मानी।
अगर उसके पीछे कोई कारण हो, लेकिन वो कारण पहले से बताया गया हो, और वो कारण एकदम प्रमाण हो, कि सच में ये कारण है, तो फिर देखा जाएगा। कम से कम उसे ज्ञान तो सीखने आया है, अब क्या करें, मजबूरी है, कोई नौकरी होगी। लेकिन ऐसे नहीं। एक तरीका होता है। जवाब देना पड़ता है।
और मेरा काम मुझसे है, क्योंकि मैंने अपने आप को इस लायक बनाया। मेरा काम किसी पे निर्भर थोड़ी न है। क्योंकि मैं मेहनत से यहाँ तक आया हूँ। मैं किसी कपड़े का सहारा लेकर यहाँ तक नहीं आया हूँ। मैं किसी समूह का सहारा लेकर यहाँ नहीं आया हूँ। मैं किसी सम्प्रदाय का सहारा लेकर यहाँ नहीं बैठा हूँ। मैं अगर यहाँ पे हूँ तो मैं हूँ, और मेरा काम है, और मेरा काम मेरे तरीके से है। मैं अगर इस दुनिया के लिए कुछ लेके आया हूँ, उसमें आप लोग हो, तो वो मेरे तरीके से देना होगा, वो आपके तरीके से नहीं। हम भी कभी आपकी जगह थे। ऐसा नहीं है। मैं उस जगह को समझता हूँ। लेकिन अगर उस जगह की बात मान लूँ, तो दोनों घुट-घुट के मरने लगेंगे, क्योंकि तुम दलदल में हो। मैं दलदल से निकला हूँ। तो तुम अगर मेरी बात मानोगे, तो दलदल से बाहर आ जाओगे। और अगर मैं आपकी बात मानूँ कि आ जाओ, मेरे साथ कूद जाओ, तो दोनों फँस जाएँगे, और दोनों रोने लगेंगे।
पहले ये तो ईमानदारी से बताना कि आप आए किस लिए हो। मैंने आज तक कोई शिष्य नहीं बनाया। वो मुझे गुरु मानते हैं, और मैं शिष्य उसे समझता हूँ जिसकी जिज्ञासा आत्मिक कल्याण के लिए है। वो शिष्य है।
बात ऑन कैमरा होगी, सबके सामने। गुरु से अकेले में बतियाना है, तो वो कहीं न कहीं लालच होगा। सत्संग के बाद अगर कुछ होगा, देख लेंगे। असंभव नहीं है। आप कुछ समझना चाहते हो, समझ के कुछ करना चाहते हो, अपने लिए या समाज के लिए, तो वो देखा जाएगा। और अगर ऐसे कोई प्रश्न है तो आप कर सकते हो।
पहले ये देख लो कि मैं प्रश्न के लायक हूँ कि नहीं। मैं प्रश्न तो पूछूँ, लेकिन मैं उस उत्तर के लायक हूँ कि नहीं। तभी उत्तर का मतलब होगा, नहीं तो उत्तर भी ऐसे ही चला जाएगा। जैसे एक छह-सात साल के बच्चे की शादी करा दी जाए, तो उस शादी का उसके जीवन में कोई मतलब नहीं है, बुड्ढे का खेल है। लेकिन वही जब बीस साल का हो जाता है और उसकी शादी कराई जाए, तो उस शादी का मतलब है। अगर आप प्रश्न के लायक हो कि नहीं, पहले वो आप देख लो। शोरूम में चले जाओगे, कहोगे गाड़ी दिखाओ। उसका तो बेचारे का काम है, सर लीजिए। तुम कहोगे, नहीं यार, बस देखने आया था, लेने नहीं। तब तो वो तुम्हारा दोबारा कभी हिलने नहीं देगा। तो आप गए हो तो देखो, मैं उस लायक हूँ कि नहीं। आप पूछने लायक बनो, तभी उत्तर का मतलब समझ में आएगा। अगर आप पूछने लायक नहीं हो, तो उत्तर का भी मतलब नहीं है।
आज के युवा ठीक हैं। और आज के युवा धर्म को मानते हैं। जब किसी ने कहा कि तुम आरती करो, तो उन्होंने कहा कि इस आरती से मिलेगा क्या? इसका जवाब हमारी पीढ़ियों को नहीं था, इसलिए वो नहीं मान रहे। आज के युवा कुछ करना चाहते हैं समाज के लिए, लेकिन उनके पास जवाब नहीं है। तीस साल पहले के लोग क्या थे? अगर उनको उनके बाप ने ये कह दिया, तो वो कर रहे हैं। उसका परिणाम वो नहीं पूछते थे, आए और चाहे ना आए। लेकिन करने के पहले ही युवा पूछ रहा है कि मैं ये करने के लिए तैयार हूँ, लेकिन इससे होगा क्या? ये जवाब नहीं है, इसलिए वो कर नहीं रहा। क्यों अपना समय बर्बाद करें? तो मेरे समझ से आज के युवा ठीक हैं।
धर्म क्या है? आप इतना घूमे। धर्म की परिभाषा क्या है? आप कैसे कह सकते हो कि यह व्यक्ति धार्मिक है कि नहीं? किस आधार पे? क्या भगवान को मान ले तो धार्मिक हो गया? नहीं माने तो अधार्मिक हो गया? क्या यह आधार है? यह परिभाषा नहीं है। पहले तो धर्म की परिभाषा समझना पड़ेगा कि धर्म क्या है। धर्म और अधर्म, दो हैं। जब हमारे द्वारा किसी जरूरतमंद की सेवा होती है, तो वहाँ परोपकार होता है, और जहाँ परोपकार होता है वहाँ धर्म घटित होता है। और वह जरूरतमंद की सेवा जब होती है, तो करने वाला धार्मिक बनता है। ये धर्म की परिभाषा है। अधर्म की परिभाषा क्या है? जब आप किसी को सताते हो, बिना मतलब का, ऐसा उसने कोई काम नहीं किया है, तो वहाँ अधर्म घटित होता है, और सताने वाला व्यक्ति अधार्मिक हो जाता है। धर्म करने में, मानने में नहीं। अधर्म करने में, मानने में नहीं। ये धर्म की परिभाषा है।
आप एक महीना घूमे। जिसकी खोज में निकले थे, पहली सीढ़ी का ही पता आपको नहीं है। मैं जो टॉपिक लेके चला हूँ, उस टॉपिक का ही क्या है, वो पता नहीं है, तो आप आगे जितना भी समझोगे, कोई मतलब नहीं है। गणित में जब पहला ही अंक आपने एक की जगह दो मार दिया, तो आपको लग रहा है सवाल कभी सही हो सकता है? मतलब आप जिसको लेके चले थे, पता ही नहीं लेके क्या चला हूँ। तो आपकी जिंदगी बीत जाती है और आपको कुछ समझ में नहीं आता। आपके जीवन में सिर्फ बातें रहती हैं। मेरा कहना यही है कि अगर आप कुछ खोजने चल रहे हो, तो उसके बारे में ज्ञान आपको होना चाहिए। धर्म की परिभाषा क्या है, यह आपको पता होना चाहिए। ये आपको पता नहीं था, और एक महीना बीत गया। तो किसी से बात करने के पहले, अगर आपको धर्म की परिभाषा नहीं मालूम थी, तो धर्म की परिभाषा ही पूछना चाहिए था। फिर आपको आगे बढ़ना चाहिए था। धर्म की परिभाषा तो एक ही होगी। देखने का नजरिया अलग होगा, मूल तो एक ही होगा। अगर आपको कुछ पता है तो बोलना चाहिए, तो मैं उसके बारे में फिर बताऊँगा।
जहाँ परोपकार घटित होता है, वहाँ धर्म घटित होता है, और वो आपको धार्मिक बनाता है। जिसके द्वारा परोपकार हुआ है, वो व्यक्ति धार्मिक बनता है। और परोपकार मतलब क्या? परोपकार मतलब जरूरतमंद की सेवा। जहाँ इच्छा और उपेक्षा ना हो। निष्काम से, ये परोपकार है। कोशिश से नहीं होगा। जैसे कोई गिर जाता है, आप उठाने जाते हो, वहाँ इच्छा-अपेक्षा काम करती है क्या? नहीं करती। तो ये मौका प्रकृति देती है। ये आप प्लानिंग से नहीं कर सकते। ये मौका आपको प्रकृति देती है। अपने आप को, अपनी चेतना को इतना विकसित तो कर सकते हो कि हमारे अंदर वो भाव ही ना रहे कि हम किसी लालच के लिए किसी का कुछ लें। ये आत्मज्ञान के बाद होगा, या गुरु के सानिध्य में होगा। या तो आत्मज्ञान को उपलब्ध हो जाओ, तब आप उस स्थिति में हर समय, हर पल रहोगे। या गुरु के सानिध्य में रहो, तो इच्छा-अपेक्षा काम ही नहीं करने देगा, वो उसकी ऊर्जा से, उसकी समझ से। बाकी अगर आप अकेले हो, तो आपको प्रकृति मौका देगी। आप प्लानिंग करके ये नहीं कर सकते।
गुरु के सानिध्य में रहने वाले को चौबीस घंटे मिलेगा, हर क्षण मिलेगा। उसके द्वारा कुछ भी होगा तो परोपकार होगा, सत्कर्म होगा। और अगर वो गुरु के सानिध्य में नहीं, अकेले है, तो पापी से भी परोपकार हो जाता है। आप ये ना समझना। प्रकृति आपको मौका देगी ही। चाहे वो पापी के द्वारा भी परोपकार हो जाता है। दुष्ट आदमी भी, कोई गिर गया, तो उठा ही लेता है। उठाने का तरीका भले ही अलग हो। परोपकार दुष्ट के द्वारा भी हो जाता है।
जो गृहस्थ है, वो ईमानदारी और सत्कर्म अपना ले। जब भी मौका मिले, सत्कर्म करे, और ईमानदारी से उसका इनकम हो, तो उसका विकास होता जाएगा। लेकिन गुरु के सानिध्य में रहने वाले की तरह विकास नहीं होगा। जैसे दो पौधे लगाइए। एक को खूब खाद-पानी दीजिए, और एक को बस उसके हाल पे ही छोड़ दीजिए। कौन से पौधे की उन्नति जल्दी होगी? जिसकी देखभाल की जाएगी, जिसकी निराई-गुड़ाई होगी, जिसको खाद दिया जाएगा। और अगर वो अपने हाल पे ही पड़ा रहा, तो वो भी होगा, लेकिन इसके जैसा वो तैयार नहीं होगा। उसकी संभावना थोड़ी कम है। गुरु ज्ञान का प्रतीक है। गुरु क्या है? ज्ञान का प्रतीक है। इसलिए मैं गृहस्थियों से कहता हूँ कि भाई, बारह महीने होते हैं, तो एक महीना अपने आप को दो। एक महीना जाके एकांत में रहो, या गुरु की खोज में रहो, या गुरु के सानिध्य में रहो। लेकिन एक महीना अपने आप को दो। अगर गुरु मिल गया हो, जीवंत गुरु, आत्मिक कल्याण वाला गुरु, तो गुरु के सानिध्य में एक महीना लगातार रहो। सब कुछ छोड़कर, ग्यारह महीने अपने घर वालों को दो। एक महीना अपने आप को दो। और अगर आपको गुरु नहीं मिला है, तो एक महीना भ्रमण करो, गुरु की खोज में। भ्रमण कहाँ करना है? तीर्थस्थान, क्योंकि ज्यादा वही मिलेंगे। जहाँ फैक्ट्री है, वहाँ थोड़ी न गुरु मिलेंगे। जंगलों में जाओ, तीर्थस्थानों पे जाओ, गुरु की खोज में। कोई माँग के चक्कर में नहीं, गुरु की खोज में। और अगर गुरु मिल जाए, तो उसके सानिध्य में, ग्यारह महीना घर, एक महीना गुरु, ये देना पड़ेगा, अगर निकलना है तो। और ऐसे ही रहना है, तो फिर पड़े, किसी का क्या जाता है।
सत्कर्म का मौका प्रकृति देती है। जब आप परोपकार का समय आएगा, जरूरतमंद की सेवा का समय आएगा, उस समय इच्छा-अपेक्षा काम ही नहीं करती। अब करना ना करना आपके ऊपर है। आप अवॉइड करके जाते हो, या आप प्लानिंग से करते हो, तो उसमें इच्छा-अपेक्षा काम ही करती है। लेकिन अगर मैं इच्छा और अपेक्षा में भी सही काम तो कर रहा हूँ, तो कहीं न कहीं आपको प्रकृति और भी परोपकार का मौका देगी। जैसे-जैसे आपका सेवा का भाव बढ़ेगा, कि मैं समाज के लिए कुछ करना चाहता हूँ, अगर प्लानिंग से भी तुम कर रहे हो, अब उसमें इच्छा-अपेक्षा तो काम करेगी क्योंकि प्लानिंग है, तो प्रकृति जब आपके भाव को देखेगी कि नहीं, ये व्यक्ति सत्कर्म करना चाहता है, तो आपके जीवन में ऐसे ज्यादा लोग मिलने लगेंगे। जहाँ प्लानिंग, वहाँ इच्छा-अपेक्षा। और जहाँ प्लानिंग नहीं, वहाँ इच्छा-अपेक्षा नहीं। प्लानिंग कहाँ नहीं? जब अचानक घटना घटती है। जब अचानक घटना घटती है, तो वहाँ प्लानिंग नहीं होती। तो जब आप शुद्ध भाव से सेवा करोगे, तो प्रकृति आपको मौका देगी। और हो सकता है कि आप पूरी तरह करना चाहो, तो कोई गुरु मिल जाएगा। तब आपके द्वारा पूरी तरह सत्कर्म ही होगा, और आप जल्दी से जल्दी आत्मज्ञान तक पहुँच जाओगे।
आत्मज्ञान मतलब अपने आप में हो जाना, पूरी तरह। मैं मेरा में फँसा हूँ। अनेक पिंड में फँसा हूँ, और मेरा मेरे सामने है। इसलिए मुझे कहना पड़ रहा है कि मुझे अपने आप में होना है, क्योंकि मैं और कहीं हूँ। और जब मैं अपने आप में हो जाऊँगा, तो मुझे अपने आप में होने के लिए कुछ कहना ही नहीं पड़ेगा। क्योंकि मैं और कहीं हूँ, तो मुझे, मैं जहाँ हूँ, वहाँ से हटने के लिए एक जगह का चुनाव करना पड़ेगा। जैसे एक वस्तु आप उठाते हो, तो ये उठाने के पहले आपको सोचना पड़ेगा, मैं रखूँगा कहाँ? नहीं तो लेके घूमते रह जाओगे। तो मैं कहीं और हूँ। अब मुझे वहाँ से हटना है, तो मुझे पहले ही बताना पड़ेगा कि यहाँ से हट के जाओगे कहाँ। तभी वो वहाँ से हट पाएगा। क्योंकि एक वस्तु उठाओगे, तो कोई तो रखने का आधार चाहिए। अगर आधार नहीं है, तो आप उठा ही नहीं सकते। एक जगह से उठाने के लिए, उठाने के पहले दूसरी जगह तैयार करना है, नहीं तो उठ ही नहीं सकता। वही पड़ा का पड़ा रह जाएगा। जैसे मैं घर से निकलने से पहले सोचूँ कि अगर मैं निकल रहा हूँ तो जाऊँगा कहाँ। एक वस्तु को उठाकर एक जगह से दूसरी जगह रखने के लिए आपको एक जगह पहले चाहिए। जब रखने वाली जगह पूरा पक्का हो जाएगा, कि यहाँ से मैं उठा के यहाँ रख दूँगा, ये जगह पक्की मेरी है, तब वहाँ से अपने आप को उठा के आप यहाँ रख दोगे।
और यह तभी हो पाएगा जब आप निर्भरता छोड़ो। क्योंकि आप कुछ लालच में ही तो उसके पिंड में हो। वो लालच का त्याग करोगे, तो वहाँ रहोगे ही नहीं। उस व्यक्ति से आपको तकलीफ नहीं है, उस लालच से तकलीफ है। और जैसे ही वो लालच हटी, आप वहाँ रह ही नहीं सकते। जब तक लालच है, आप कितना भी उसे हटाओ, वहाँ से वो हट ही नहीं सकता। मेरा लालच ही मुझे वहाँ अटकाए हुए है। मूल लालच का त्याग करना पड़ेगा। लेकिन ये स्वतः थोड़ी न होगा। जब तक मेरी वृत्ति उसमें फँसी है, वो लालच, वो लोभ, वो रस, जब तक कुछ चाहिए, तब तक लालच है। मैं अगर ये सिर्फ मंत्र लूँ, मुझे कुछ नहीं चाहिए, कुछ नहीं होगा। ऐसे नहीं होगा। कुछ नहीं चाहिए, इस स्थिति में आने के लिए काम करना पड़ेगा। अब देखना यह है कि मैं उसमें फँसा क्यों हूँ। वो पूरी तरह देखना पड़ेगा। जब आप फँसेपन को देख पाओगे, तब आप अपने आप को निकाल पाओगे, कि ये मुझे नहीं चाहिए। जब इस स्थिति में पहुँच जाओगे, यह देख पाओगे कि क्या मुझे चाहिए, क्यों मैं फँसा हूँ। जब देख पाओगे कि यह मुझे नहीं चाहिए, ये चाहिए की वजह से मैं फँसा, अब मुझे नहीं चाहिए, तब अपने आप को निकाल लोगे। जैसे ही आंतरिक हुआ कि अब मुझे नहीं चाहिए, आप तुरंत निकल जाओगे। तब आप रह ही नहीं सकते। लेकिन जब ये देख पाओगे, और उसके बाद मुँह से बोल रहे हो कि नहीं चाहिए, और पता चला अंदर से चाहिए, तब आप नहीं निकल पाओगे। आंतरिक होना चाहिए, पक्का, मुझे नहीं चाहिए। तभी आप वहाँ रह ही नहीं सकते।
अगर आज मैं व्यवस्था नहीं दे रहा, तो जितना भी काम है मैं स्वयं ही करूँगा। मुझे स्वीकार कर लेना चाहिए कि मुझे किसी पे निर्भर नहीं होना है। तभी उठ पाओगे, तभी आपका स्तर उठेगा। क्योंकि अगर आप निर्भर हो, तो उठना भी चाहोगे तो दबा देगा। क्योंकि मैं भी तो उससे कुछ ले रहा हूँ। वो सामने वाला दबा देगा। अगर वो स्वाभाविक कर रहा है, तो करने दो। अगर ईमानदारी से जितनी व्यवस्था आप जुटा पा रहे हो, उसमें वो खुश है, तो उसे भी आपके लिए कुछ करने दो। और अगर वो चाह रहा है कि नहीं, मुझे आपके लिए नहीं करना है, तो आप अपने शरीर के लिए खुद कार्य कर लीजिए। सीधी सी बात है। अब देखना है कि उसका भाव क्या है। हम एक-दूसरे के पूरक हैं। लेकिन सामर्थ्य होकर निर्भर रहो।
दुकानदार तुम पे निर्भर है, और तुम दुकानदार पे। वो सामान दे रहा है, वो पैसा ले रहा है, वो कमा रहा है। लेकिन आप अपनी सामर्थ्य के अनुसार जाइए। तो दुकानदार से राग-द्वेष नहीं होगा। और अगर आप उधार के चक्कर में गए हो, उधारी समय पर नहीं लौटा पाओगे, तब पहले राग होगा, क्योंकि उसने मुझे उधार दिया। अब हम समय पे उधारी नहीं लौटा पाएँगे, तो द्वेष हो जाएगा। और हमारे पास जितनी सामर्थ्य है, अगर मैंने उतना सामान लिया है, तो हम हमेशा दोनों मुस्कुरा कर मिलेंगे। ना राग होगा, ना द्वेष होगा। तो अगर आपको कुछ चाहिए, तो आप उससे योग्य रहो, मिलेगा। नहीं तो किसी और से ही।
गृहस्ती में भी यही है। बस आपका ईमानदारी से इनकम हो, उसी में भरण-पोषण हो। यही करना पड़ेगा। देखना ये है कि क्या वो नहीं करना चाहता। कौन करना चाहेगा? अगर आप ये सोचते हो कि मैं किसी का भरण-पोषण नहीं कर रहा, या अपना बाँट दिया, तो कौन करना चाहेगा? तब आप खत्म करो, आप खुद करो। क्योंकि अगर आप उसके बाद करवाओगे, तो वो तकलीफ देगा, आपको मानसिक पीड़ा देगा। सामने वाला कुछ भी उल्टा-सीधा बोलेगा, उसका प्रभाव आप पे पड़ेगा। तो अपना काम खुद करो। स्वाभाविक करता है तो बात अलग है। प्रेम से करता है तो बात अलग है। दबाव और संकोच में हमें किसी से कुछ करवाना ही नहीं चाहिए, क्योंकि दबाव और संकोच में करवाओगे तो आप गिर जाओगे।
अगर योग्यता है, और मैं इतना कमा सकता हूँ कि मैं उसको रख सकता हूँ, तो रख ही लेना चाहिए। किसी को नौकरी तो मिली। निर्भरता तब होता है जब हम उसे उसके बदले कुछ देते नहीं। तब मुझे उसके अधीन रहना पड़ता है। उसकी जरूरत मुझे है, और मेरी जरूरत उसे है। मेरे पास कुछ है, उसे चाहिए। और उसके पास कुछ है, वो दे रहा है। हम उसकी कीमत दे रहे हैं। तो व्यापार पूरा चल रहा है। देना तो पड़ेगा।
अभी यहाँ पे हम लाइव वीडियो देख रहे हैं, तो इसमें पैसे लग रहे हैं। हम उसे दे रहे हैं, वो मुझे व्यवस्था दे रहा है। अगर वो मेरी व्यवस्था छीनेगा, तो हम उसे नहीं देंगे। और हम नहीं देंगे, तो वो नहीं देगा। हम रिचार्ज नहीं कराएँ, तो लाइव नहीं बैठ के देख सकते। तो लेन-देन तो करना पड़ेगा। अगर कुछ काम करना है, तो आपको लेन-देन करना पड़ेगा। बाहर कितने लोग देख रहे हैं, इसके लिए पैसा लग रहा है। हमने रिचार्ज कराया है, और उसको भी रिचार्ज की जरूरत है, क्योंकि उसका सिस्टम कैसे चलेगा। सब एक-दूसरे के पूरक हैं। बस मुझे ये देखना है कि मेरा उपयोग, और मैं जिसका उपयोग कर रहा हूँ, सात्विकता में हो, तामसी में ना हो। दुरुपयोग ना हो, सदुपयोग हो। हम उसकी मेहनत का ही उसे दें। मजबूरी का फायदा ना उठाएँ। क्या सच में मैं जो ले रहा हूँ, उसकी सही कीमत दे पा रहा हूँ? ऐसा तो नहीं, सामने वाला भोला है और मैं उसको ठग रहा हूँ। ये देखना है।
ये सोच गलत नहीं है। एकदम सही है। मैं चाहता हूँ, कर ही लेना चाहिए। दिक्कत उसकी नहीं आती। दिक्कत ये आती है कि हमें अपने सर पे कोई नहीं चाहिए। अब तुम्हें सर पे नहीं चाहिए, तुम आराम करना चाहते हो, और मैं नौ बजे आके भी काम करूँ। वहाँ क्लैश होता है। आपकी गलत नहीं है। लेकिन सामने वाला भी कह रहा है कि नहीं, हम उसे अपने पास नहीं रख सकते, प्राइवेसी खराब होती है, सर पे कोई बैठा रहता है पूरे टाइम। वो भी अपनी जगह से ही है। अगर देखा जाए तो वो भी अपनी जगह सही है, कि वो जीना चाहता है। तो देख लो, कैसे क्या होगा।
अपनी कमजोरी पे काम करना चाहिए। प्राइवेसी खत्म हो जाएगी, क्योंकि घर पर नहीं रख सकते, तो जिस व्यक्ति को काम पर रख रहे हो, उसके लिए कोई रूम ले दो, अपने घर से दूर। अगर ये क्षमता है, तो ये करना चाहिए, कि तेरी प्राइवेसी भी रह गई और मेरा भी काम हो गया। उसको कुछ दूर रूम दिला दो, अपने रूम से दूर, कि तू यहाँ काम करेगा, यहाँ खाए-पिए। और अगर उतनी योग्यता नहीं है, तो कह दो, आप अपना काम कर लो और हम अपना कर लेंगे। बस इतनी सी बात है।
इतने में लड़ाई हो जाए, तो अगर इतना मूर्ख है सामने वाला, उसके साथ रहना ही नहीं चाहिए। अगर इतने में लड़ाई हो जाए, तो वहाँ तुरंत त्याग कर दो उसका। क्योंकि हम कुछ समझने के लिए काम कर रहे हैं। अगर ऐसा व्यक्ति इतने में लड़ ले, कि आप अपना काम कर लो। प्राइवेसी ही चाहिए, और मैं उसको रूम लेके नहीं दे सकता, और तुम्हें प्राइवेसी चाहिए, तो ठीक है। एक काम करो, आज के बाद आप अपना काम करो, मैं अपना काम करूँगा। तुम्हारी प्राइवेसी भी रह गई, और मैं अपना काम करूँगा। तो वो साधना ही रहेगा मेरे लिए। फिर उसका असर कुछ भी आए, क्या फर्क पड़ता है? उस डर के लिए तैयार रहो। परिणाम आना निश्चित है। तुम युद्ध में कूद ही गए हो, तो क्या आप सोचोगे चोट कहाँ लगेगी? लगने दो। और इतना सामने वाला मूर्ख है, तो उसके साथ जीवन ही नहीं जीना है।
क्षमता देखो। दोनों रास्ते हैं। या तो उसे रूम दे दो दूर, तब वो काम करेगा। उनकी प्राइवेसी भी हो गई, आपकी भी। पैसा गाँठ मार के तो लेके जाओगे नहीं। धन है तो उसका सदुपयोग करो। और अगर वैसी योग्यता नहीं है, तो आप अपना-अपना काम करो। वो अलग घर में रहेगा। अपना काम करेगा, अपने रूम पे जाएगा। अगर एक ही बंगले में, ऊपर रहे या नीचे रहे या बराबर वाले कमरे में रहे, और प्राइवेसी फिर भी खत्म ही हो जाती है, तो ये गले का फँदा हो गया। तब अपना-अपना काम करो। बस, खत्म बात।
आगे आने वाले परिणाम में जो भी आए, उसके लिए भी त्याग। परिणाम ये आ जाता है कि तू तो मुँह चढ़ा के देख रही है, और मैं अपना पैसा कमा रही हूँ, अपना काम। त्याग कर दो। हम अपनी उँगली तक काट देते हैं। इसमें कैंसर हो जाए, ठीक कराने का प्रयास करते हैं, और जब नहीं ठीक होता है तो कहते हैं काटो, क्योंकि मुझे रहना है। जहाँ मेरी समझ विकसित होना बंद हो जाएगा, मैं नीचे गिरूँगा, उस जगह को छोड़ दो। त्याग ही परम सुख है। जब मैं गिरने लगूँ, चाहे वो व्यक्ति हो, चाहे जगह हो, उसका तुरंत त्याग करूँ। जानवर तक चले जाते हैं। बाढ़ आती है तो जानवर भागने लगते हैं। जिस जगह के बिना वो रह नहीं सकते थे, वही जगह छोड़ देते हैं। बाढ़ आती है तो लोग अपना घर छोड़ के भागते हैं। और अगर बाढ़ ना आए, तो बोलेंगे, नहीं, ये जगह तो मैं छोड़ नहीं सकता। जब समझ की बात आए, कि मुझे अपनी उन्नति करनी है, उसमें अगर कोई भी बाधा आए, उसका त्याग करो। सारा काम छोड़कर, भोजन भी छोड़कर, अपनी समझ के लिए काम करो। अगर हमारी उन्नति में कोई भी रुकावट आए, उसको खत्म करो। क्योंकि मुझे आगे बढ़ना है। मेरा जन्म जिसके लिए हुआ है, वो मैं करूँगा। और आप रुकावट आओगे, तो हम आपको छोड़ देंगे। अपने टारगेट के लिए इतनी तत्परता तो दिखानी पड़ेगी, जो भी परिणाम आए।
अपने कल्याण के लिए मैं कुछ भी कर सकता हूँ। गुरु शब्द है। गुरु ने बताया कि आप अपने आचरण का सुधार करो। उसके लिए कुछ भी त्याग कर सकते हो।
आप तो पैसे दे रहे हो। पैसे दिए तो सेवा थोड़ी न हुई। अगर उसे नहीं दो, तभी बात और है। वो तो दे रहे हो। उसको भी तो जरूरत है। जैसे-जैसे आदमी बूढ़ा होता जाता है, वो अपनी जरूरतों पे पैसा खर्च करना और कम कर देता है, डर से कि मैं कमा नहीं रहा। पूछो तो कहते हैं, आपके लिए ही तो। कहते हैं, हमें तो चाहिए नहीं, हम तो सक्षम हैं। तो आप अपने पे खर्च करिए। ड्राइवर रखिए। कहाँ लेके जाओगे? इतना जोड़ लिया है, तो अपने ऊपर खर्चिए। हम खुद आगे की यात्रा के चक्कर में हैं।
आप अपने आप को समय दो। और उसे भी तो जरूरत है, सामने वाले को। वो भी तो आपको धन्यवाद देगा। कुछ बढ़ा के ही दो, कि काम बस अच्छे से करना।
एक जगह मैं था, तो दो लोग ऐसे बैठे थे, और भी बैठे थे, आग ताप रहे थे, चाय पी रहे थे। तो एक ने गिलास वहीं डाल दिया आग में। तो एक ने कहा, ये गलत है, ये तुमने क्या किया? तो उसने पूछा, क्या गलत है इसमें? तो देख भाई, एक डालने में फँसा है, और एक ना डालने में फँसा है। लेकिन तुम दोनों आग में ही हो। समझ के भी वही हो, क्योंकि उन्हें तो समझना नहीं है। तो आप आगे की यात्रा करो। ऐसा ना हो, जिंदगी भर पितृ समझाने में आपका जीवन चला जाए। कभी एक्चुअल में ये भूत-प्रेत है या नहीं है, ये भूत-प्रेत ही बता सकते हैं। हमें अपना आत्मिक कल्याण करना है। जिसको भूत-प्रेत के चक्कर में पड़ना है, पड़े। मुझे नहीं लगा है, इसलिए मैं इस पे बात नहीं करूँगा। और आपको अगर लगा हो, तो मैं इसका इलाज नहीं करता। समाज में है, तो समाज जाने। समाज का कल्याण समझाने के लिए नहीं। आत्मिक कल्याण के लिए मैं मार्ग बता रहा हूँ। अब भूत होंगे, भूत जाने। हमसे क्या मतलब।
वहाँ पहुँचोगे तब पता चलेगा। भटक रही हो तो मतलब वही है। शून्य से ऊपर जो है, पहले वहाँ पहुँचो। कोशिश तो करो। ऐसे समझते रहो। पहले निकलने के लिए प्रयास करो।
और मूल राग-द्वेष क्या? जब बैठो तो देखो कि विचारों में राग-द्वेष नहीं है क्या। देखो, आपके अतीत में ना राग-द्वेष हो, और आपकी माँग ना हो। क्या इस जगह आप हो गए हो? तब तो बातें खत्म हो जाएँगी। तो ये काम करो।
पूर्ण समर्पण कैसे होगा? विश्वास। जब आप कुछ नहीं चाहिए, इस स्थिति में आ जाओगे, इसी को पूर्ण समर्पण कहते हैं। जब इस स्थिति में आप आ जाओगे, कुछ नहीं चाहिए, तब ये पूर्ण समर्पण है।
स से साधु, धू से धूल। धूल का मतलब विकार। साधु एक भेष है। संत की स्थिति है। जैसे गृहस्थ जीवन में शादी के पहले कहा जाता है, यह लड़का है, ये लड़की है। लेकिन जैसे ही शादी होती है, कहा जाता है, ये पत्नी है, ये पति है। साधना करके जिसने अपने आप को निर्विकार करा लिया, वो संत हो गया।
महात्मा, महान आत्मा। चैतन्य में स्थिर अपने आप को करा दिया, उसे महात्मा कहते हैं।
बैरागी मतलब, जहाँ मैं हूँ वहाँ कुछ है नहीं। मैं यहाँ क्यों हूँ, तो पता चलेगा, राग-द्वेष में हूँ। जब राग-द्वेष समझ में आया कि मैं राग-द्वेष में हूँ, तो राग-द्वेष से छुड़ाने की जब इच्छा जगे, तो उसे वैराग्य कहते हैं।
राग मतलब, जब योग्यता से ज्यादा देगा, तो उसके प्रति लगाव हो जाएगा, तो राग कहते हैं। और जब योग्यता से ज्यादा आपने इच्छा की, और सामने वाला नहीं दिया, तो उसके प्रति द्वेष हो जाएगा। ये है राग और द्वेष।
माँ-बाप के सामने, गुरु के सामने, लेन-देन में राग-द्वेष नहीं होता।
मुझे अपना काम करते रहना चाहिए, ईमानदारी से, और सत्कर्म करते रहना चाहिए। बस। और अपने आप में रहना चाहिए। बस।
और वो मन, जब रात में स्वप्न आता है, तो हो क्या रहा है? स्वप्न आता है तो कहीं न कहीं उस स्वप्न का आधार है। कभी हमने कुछ प्लानिंग किया था, कर नहीं पा रहे। तो ऐसे स्वप्न आते हैं। धीरे-धीरे वो भी चले जाएँगे। उनको लेके कोई टेंशन नहीं। कोई मतलब नहीं।
अकेले पड़ने का जो डर आता है, उसको क्या करेंगे? अकेले ही तो यात्रा होगी, परमानंद। उसी में तो अपने आप को स्थिरता बना के रखेंगे।
फोन को काटिए मत। फोन चालू करके सुनते रहिए। आप प्रतिक्रिया नहीं दोगे, तो चिपकू टाइप के लोग कम से कम पचासों बार और कर देंगे। आप अगर प्रतिक्रिया नहीं देंगे, कोई भी व्यक्ति, जानवर तक, आप प्रतिक्रिया देना बंद कर दो, वो आपके पास आना बंद कर देंगे। आपसे अगर कुछ मिल रहा है, बस वो देना बंद कर दो। तुम्हारे अलावा तुम्हारे पास कोई नहीं बचेगा। वो बचेगा ही नहीं। हम कुछ देंगे ही नहीं, तो आएगा क्या? अगर ये कपड़ा भी तन पे है, तो इसकी सुरक्षा किए हो। अगर इसकी भी सुरक्षा बंद कर दो, तो ये भी आपको छोड़ के चला जाएगा। अगर मेरे साथ कोई है, तो कहीं न कहीं वो मेरी वजह से है।
मूर्खता का पछतावा, कोई बात नहीं, अब तो कर लिया। अब मत करो। लेकिन अब उसकी मूर्खता के लिए पछताओ भी मत। ऐसा ना हो, पछताने में जिंदगी चली जाए। एक मूर्खता करने में जिंदगी गई, अवशेष जितना बचा है उसको पछताने में किया, कुछ नहीं। ये भी मन का ट्रैप है। वो कहता है पछताने के लिए, लेकिन पछताना नहीं। कहीं भी, एकदम नहीं पछताना है। हुआ सो हुआ। अपना ख्याल रखिए। अपना आत्मिक कल्याण करिए। और पछताइए मत। पछताने में समय बर्बाद मत करो।
यहाँ बातचीत ना करें। अगर इसको वो समझा सकते थे, तो इसे यहाँ नहीं आना पड़ता। आप इसे समझिए। अगर वो समझा सकते थे, तो उसे यहाँ नहीं आना पड़ता। आप उसे समझाने दीजिए। बाकी कुछ बचा, तो घर में जा के समझा देना। बाप होने का मतलब ये थोड़ी न है। बाप हो तो क्या हुआ? ये रिश्ते तो हमें दबा के रखते हैं। कहीं बाप का दबाव, कहीं माँ का दबाव, कहीं किसके दबाव में एक आदमी की जिंदगी चली जाती है। हम इसलिए बोले चुप के, क्योंकि दो समझ रहे हैं। इनको बोलने दो। ये बात कर रहे हैं, कुछ समझ रहे हैं। इन्हें मौका दो।
आप हमारे पास आए। आप अपने प्रश्न करो। सबका व्यक्तिगत जीवन है। और आप यहाँ से जाओ, तो खूब अपने घर पे बात करो। इसका प्रश्न इसके तरीके से रखने दो। क्योंकि प्रश्न में भावनाएँ होती हैं। आप ये मत समझो, ये नहीं रख पा रही है। यही तो बात है। हम सबको अपने से कमजोर समझते हैं। जब आपने प्रश्न किया, तो इसने एक बार भी नहीं बोला। वो चाहे एक घंटा लगे, चाहे दो घंटा लगे। ये मेरा काम है। यह उसका काम है। उसे प्रश्न तो करने दो। हमें क्या होता है, बोलने ही नहीं दिया जाता। तू चुप रह, हम प्रश्न करें। लेकिन प्रश्नों के साथ भावनाएँ होती हैं। अब आपके पास समय है, आप बोलिए। उसकी गलती के कारण आपके ऊपर नहीं। उसकी गलती है, उसको रिजल्ट मिला। आप ही मत बोलो कि अब जाने दीजिए, समय आज बहुत कम है। इनको पूरा मौका दिया जाए।
गोयल जी, अगर देखें तो वो उनका बेटा ही गुरु है। लेकिन उन्होंने कभी बेटे की बात नहीं मानी। गुरु का मतलब क्या है? मेरी गलतियों पे टोकना। लेकिन अब यहाँ क्या हो गया? बाप मैं हूँ, तू क्या जाने? लेकिन वो जान रहा है कि तुम कहाँ गलती कर रहे हो। काश उसे स्वीकार करते। वो यही कहता है कि आपमें अहम है। मैं तीन दिन से देख रहा हूँ। और ये आपका हितैषी है। ये पुत्र आपका ऐसा है कि मैंने ये देखा। क्योंकि मेरे पास आज समय नहीं है, इसलिए जल्दी जाना है, तो जल्दी मतलब समय से निकल जाना है। मैं आपसे यह कह रहा हूँ कि मैं तीन दिन से देखकर बोल रहा हूँ, कि कहीं न कहीं आपका हित चाहता है, इसलिए टोकता है। लेकिन बात यह है कि ये मेरा बेटा, ये मुझे कैसे टोकेगा? बता तो रहा है गलती। गलती समझ में भी आती है। लेकिन स्वीकार करने में बड़ी तकलीफ होती है, क्योंकि मैं बाप हूँ। ये बाप वाला अहंकार होता है, वो गिरा देता है। ये बड़ा खतरनाक है, गोयल जी। ये बहुत खतरनाक है, कि मैं बाप हूँ, मैं तेरी माँ हूँ। ये गिरा देता है। काश हम सामने वाले की भावनाओं को समझें। कि वो आपको पीड़ित नहीं देख सकता। कहीं न कहीं आप अपने आचरण से पीड़ित हो। वो आपकी पीड़ा नहीं बर्दाश्त कर पा रहा है। वो आपको कुछ बताना चाहता है।
अगर कह दिया चुप, तो इसका मतलब, आप जिसके पास आए हो कुछ सीखने, अगर उसने कहा कि चुप, तो कुछ तो बात होगी, तो चुप हो जाओ। अगर उसी समय चुप हो जाते, तो इसके आँखों में आँसू नहीं होते। एक बार में चुप हो जाते। लेकिन इतना हो गया कि उन्हें हटाना पड़ा, और इसके आँखों में आँसू हो गए। तो इसके आँखों में आँसू का जिम्मेदार कौन है? उसका पिता है। आप ये ना समझना कि ये पहली घटना है। वो व्यक्ति इसका आदि नहीं है। ये पहली घटना नहीं है। जब वो व्यक्ति यहाँ नहीं चुप हो पाया, तो वो फिर अपने परिवार में, अपने जितने सदस्य उसके नीचे होंगे, उसके साथ वो क्या करता है? शोषण करता होगा। इसलिए मैं गोयल जी से कह रहा हूँ, अगर तीन दिन में उसने ये बात कही, तो तीन दिन पहले क्यों नहीं कहा? इस पर आप चिंतन करो। क्या दबाव था, क्या वो संकोच था, कि मेरे हित की बात वो मुझसे ना कह सका। कौन सा ऐसा दबाव था? और क्या दबाव तीन दिन में खत्म हो गया? तीन दिन में बोल ही दिया। आखिर ऐसा दबाव क्यों? क्यों नहीं हमारे साथ रहने वाले हमसे खुल के बात करते हैं? क्यों हम रिश्ते का जोर देते हैं? क्यों उसे दबा के रखना चाहते हैं? क्यों?
आप देखते हो, हमारे चाहे कुटिया में, चाहे मुझसे, लोग खुल के बात करते हैं। कभी आपको लगा, कोई मुझसे दबता है? यहाँ आने वाला हर व्यक्ति, चाहे जैसा भी हो। आपको लगा, कोई दबाव में मुझसे बात कर रहा है? तो ये आप अपने आप से पूछिए, कि मेरे सामने, जो भी आसपास रहे, वो खुल जाना चाहिए। इसका जवाब आप खोजिए। इतने दिन पहले क्यों नहीं बोल पाए?
आपके स्वभाव से ही दबाव पैदा हो जाता है। जो आप बोल रहे हो, यही छोड़ना है।
तीन दिन में ये बात कहा, तीन दिन पहले क्यों नहीं कह पाया? कहीं न कहीं तो कोई तो दबाव होगा। आज देखो, इसके पिता की वजह से कितना पीड़ा। लेकिन पिता को थोड़ी पता है। वो तो अलग पीड़ा में झेल रहा है, कि मुझे कितनी पीड़ा हुई, मेरा अपमान हो गया। लेकिन तेरी वजह से कितना मानसिक रोई यहाँ पे, वो नहीं देखा। आप समझ इसलिए पा रहे हो कि आप अलग हो।
हम सामाजिक प्राणी हैं। हमें माहौल को देखकर बोलना चाहिए। सारी चीज देख के। माहौल बोलने लायक है कि नहीं है? और कहीं न कहीं हमारे में गड़बड़ी है, तभी तो हम उस परम आनंद से वंचित हैं। कुछ तो है। वो गड़बड़ी निकालो। उसके लिए बातचीत हो रही है। यहाँ पे किसी को सिद्ध करने के लिए बात नहीं हो रही। कौन अच्छा है, कौन बुरा। वो गड़बड़ी निकल जाएगी। अगर कोई बात तीन दिन में इनडायरेक्ट कही, तो आखिर वो डायरेक्ट मुझसे क्यों नहीं कह पाया। इस पे चिंतन करना है। क्या ऐसा मेरा दबाव था? क्योंकि वो कहना तो चाह रहा था, मौका देखते उसने कह दिया।
ये मेरा अहम है, कि मैं एक घंटा ही बैठ सकता हूँ।
आप बहुत सज्जन व्यक्ति हो। आपकी समझ अच्छी है। आप एकदम साफ-सुथरा बोलते भी हो। आपके शब्दों में मिलावट नहीं है। आप ईमानदार व्यक्ति हो। इसीलिए मैं आपका सम्मान भी करता हूँ। लेकिन आपने कहा वो अहम, उससे हटाना बहुत जरूरी है। वो तो कमी है।
आपने उसे डांट के भगा ही दिया। अब वो राग-द्वेष से तो निकला है नहीं। एक आदमी को आपने और अपने विपरीत में खड़ा कर दिया। अभी तो औरों को तो हटा नहीं पा रहे, एक को खड़ा कर दिए। आपने एकदम सही बोला। लेकिन बोलने की जगह यह नहीं है। यहाँ तो मैं बैठा हूँ बोलने के लिए। अगर वो कुछ गलत करता, तो मैं उसे बोलता। आपने क्या किया? जल्दबाजी कर दिया। एक शत्रु और तैयार कर दिया। अब वो तो चला जाएगा, पंजाब। लेकिन पंजाब से नेगेटिव ऊर्जा फेंकता रहेगा। आप समझो। उसकी ऊर्जा काम करेगी। क्यों काम करेगी? एक व्यक्ति सीनियर बैठा था, वो मना कर रहा था, उसको इग्नोर कर दिया आपने। इसलिए काम करेगी। अगर वो मेरी भी बात नहीं मानता, और उसको धक्का भी मार के भगाते, तब आपका असर उठ जाता। उसकी नेगेटिव ऊर्जा काम ही नहीं करती। लेकिन मौका मुझे देना चाहिए, इसका ये करने का। और जब अगर मुझसे नहीं होता, मैं असफल हो जाता, और अगर आप तब करते, तो उसी समय आपका स्तर उठ जाता। मेरा उतावलापन है। ये बहुत ज्यादा है। मैं सेकंड नहीं लगाता। तीन दिन अपना निर्णय देने के लिए। और इतनी बात इसलिए हो रही है कि आपमें बदलाव आए, और आपका आत्मिक कल्याण हो, आप परम आनंद को उपलब्ध हो। इसलिए बात हो रही है। हम इसके पिता को ऐसे भगाए थोड़ी न। ऐसे भगाए, उसमें बहुत बदलाव आएगा। उसी की जरूरत थी। अगर उसको सम्मान की जरूरत होती, तो मैं इतने पे बोलता ही नहीं। वो इसी से सुधरेगा। उसे धक्का मारने वाला आदमी चाहिए।
मेरे अंदर यही कमी है कि मैं जो निकलता है, वो सेकंड भी नहीं लगाता। मेरी ऐसी आदत बनी हुई है कि मैं कोई गलत चीज देखता हूँ, तो तुरंत निकलती है। जरूरत है कि नहीं है, वो पता नहीं लगती। बस निकलती है। क्योंकि आप भी आए हो। चाहे वो आया है, मेरे लिए आएगा। अगर वो कुछ गलत करेगा, तो मैं उसे रोकूँगा। जैसे मैंने कहा, तुम जाओ। वो नहीं जा रहा था। मैंने कहा, प्रोफेसर इसे निकालो, और प्रोफेसर ने तुरंत निकाल दिया। तो कहने का मतलब है, अगर वो मेरे पास आया, आप मेरे पास आए हो, तो पहले तो मैं आपसे बात करूँगा। अगर कुछ गड़बड़ी कर रहे हो, अगर आप नहीं मानोगे, तो मैं किसी और को बोलूँगा। मेरी ड्यूटी नहीं है। आपकी ड्यूटी इतना है कि आप उसे सम्मान दो, कि इतनी दूर से वो आया है। आपने सत्संग रखा है, तो आप उसे सम्मान दो। गलती करेगा, तो मैं हूँ। तो इस तरीके से आपको नहीं बोलना चाहिए था।
आप एकदम सही किए, लेकिन थोड़ा इंतजार करते। मैं कहता तो करते। तब अच्छा था। उससे आपका असर उठ जाता। नहीं तो अभी पंजाब जाएगा। हम एक-एक को खड़ा करते रहते हैं। पहले देखो कि क्या मेरा अधिकार है वहाँ। मेरा अधिकार है, तो फिर बोल दो। कोई बात नहीं, तब तो बोलो।
जैसे मान लो हम यहाँ नहीं रहते, और आप यहाँ सत्संग के लिए निमित्त बने हो, मैं यहाँ नहीं हूँ। तब आप किसी को बोल सकते हो। अगर असभ्यता का बर्ताव करता है, तो आप बोल सकते हो कि भाई, यहाँ सत्संग चलेगा। अगर अच्छे से बैठना है, बैठो, नहीं तो जाओ। तब आप बोल सकते हो। और अगर मैं आ गया, तो बात ही खत्म। फिर तो बोलना ही नहीं चाहिए।
जैसे कल कहा, डॉक्टर साहब अब आप ही पूछोगे, कहा बंद करो। लेकिन हमने कहा, तुम चुप रहो, डॉक्टर साहब आप बोलते रहो। क्योंकि मैं हूँ, और मैंने उन्हें पूरा मौका दिया। तो आप देखो कि क्या मेरी जरूरत है। पहले ये देखो। जरूरत हो तो बोलो, नहीं तो चुप हो जाओ।
जब आने से पहले ही कहा था कि मैं तुझे हर पल दूँगा। सोलह को मैंने उस भाव को छोड़ा, और सत्रह को तुम्हारा आना हो गया। तुरंत इसने वकालत छोड़ी, और तुरंत आ गई। पहले कहा था कि कई साल लगेंगे। हमने कहा, कई साल क्यों? फिर महीना। महीना तो दिन। तो तुरंत फैसला हो गया। और आपने ये देखा, कि हर पल, जब भी आप मुझे चौबीस घंटे में पुकारते हो, मैं मौजूद हूँ।
मैं हर पल आपको देता हूँ। जब भी आप पुकार रहे होगे, आप मुझे कभी नींद में नहीं पाए होगे। कल सात घंटे के ऊपर सत्संग चला, और लगभग रात को डेढ़-दो घंटे मुश्किल सोएँगे। सोए, और प्रश्न आया, और फिर घंटों सत्संग चला। अब सोचो, मैं उसके बाद कितना सोया, और फिर यहाँ पर बोल रहा हूँ। मुझे नींद इतनी आती नहीं। मेरे काम से बहुत प्रेम है मुझे। बस एक बार मुझे कोई पुकार तो ले। मैंने इसको कहा, मैं हर पल तुझे दूँगा।
मेरे लिए तो बस इतना ही आराम है, कि जिसके लिए तू मिली है, वो हो जाए। तेरा कल्याण। बाकी आराम की तो मेरी कोई इच्छा है नहीं। मेरा भाव एक ही रहता है, कि बस आपका कल्याण कैसे हो जाए। बस यही भाव रहता है। तो हर पल पहले तुम्हारे लिए, बाद में मेरे लिए। मैंने तुमको कहा था, मेरी जिंदगी कहाँ गई? पहले खोज में, फिर बाँटने में। फिर एक साल वहाँ गई, फिर आप आए। मैंने कहा, हर पल आपको दूँगा। बस आपका कल्याण हो जाए। फिर लोगों में। तो मुझे तो आराम की इच्छा ही नहीं है। मेरी तो आराम की कोई इच्छा ही नहीं।
मेरा आराम उसी दिन होगा, जिस दिन आप पहुँच जाओगे।
एक तो इस भाव को खत्म कर दे, कि जीवन में सब कुछ था और मैं छोड़ के आई हूँ। वो नहीं है। ये तुम्हारी अज्ञानता है। बहुत अज्ञानता है। क्योंकि होता तो मैं बता देता। उसके अंदर ये है ही नहीं, कि मैं छोड़ के आई। क्योंकि उसे छोड़ना ही था। उसके पास ऑप्शन नहीं है। दूसरा, सारे ऑप्शन खत्म करने हैं। पीछे नहीं जाना। और इसके अलावा नहीं। वो पीछे जाएगी भी नहीं। तू कभी नहीं जाएगी। तू जब पहले दिन आई थी, पहली बार आई थी मेरे पास, उसी समय हो गया था, निश्चित। ये बात मैं कहता हूँ। ये कभी नहीं जाएगी। अब ये आगे ही जाएगी। पीछे जा ही नहीं सकती, क्योंकि इसके आगे-पीछे मैं हूँ। तो ये पीछे तो जा ही नहीं सकती। ये आगे ही जाएगी। इसको कोई पीछे बुला ही नहीं सकता, और यह खुद नहीं जा सकती। यह अब जाएगी तो सिर्फ आगे। वो चाहे उसके लिए इस शरीर को भी छोड़ना पड़े। ये जाएगी तो मूल में ही अब यात्रा करेगी। ये चाहे शरीर को भी इसे छोड़ना पड़े। बस, इसका जहाँ हित होगा, ये वही अब जाएगी। और ये जाएगी तो अपने आत्मिक कल्याण के लिए जाएगी। यह पीछे नहीं जा सकती। ये ऑप्शन खत्म हो गया।
पहले तो आप जागृत स्थिति समझिए कि आप जाग रहे हो। तो ये भी जागृत स्थिति नहीं है। आप इसे जागृत स्थिति ना समझिए। आप तो कामनाओं में भाग रहे हो, मान के चक्कर में भाग रहे हो। ये मत समझो कि मैं जागृत हो गया हूं।
स्वप्न भी अगर देखने वाला है तो तुम ही हो, जीवात्मा। इच्छा और अपेक्षा में ही स्वप्न देखा जा रहा है। अगर आप स्वप्न देख रहे हो तो उसमें भी आप अपनी कामनाओं की ही पूर्ति करते हो। जब हम जागते हैं तो हम ये देख पाते हैं कि हंसी आती है अपने को, वो तो झूठा था। यह उदाहरण इसलिए दिया गया है कि अभी आप जिसमें लिप्त हो, कर्ता अपने आप को समझ रहे हो। जिस दिन आपको ज्ञान होगा, अपने आप का बोध होगा, आत्मज्ञान होगा, आप राग, द्वेष, मोह, आसक्ति, इच्छा, अपेक्षा और मेरा कर्ता से मुक्त हो जाएंगे। तो जैसे स्वप्न के बाद आप ये देख पाते हो कि मैंने स्वप्न देखा लेकिन मैंने उसमें कुछ नहीं किया, वैसे ही जैसे ही आप इससे मुक्त हो जाओगे, जाग जाओगे, आप राग और द्वेष से मुक्त हो जाओगे। तब आप ये देख पाओगे कि मैं तो इतना परेशान था, लेकिन मैं परेशान ही नहीं था। परेशान का कारण कुछ और था।
जैसे स्वप्न का कारण नींद है। अगर नींद ना लगे तो स्वप्न आएगा नहीं। नींद कारण बन गई स्वप्न की। राग और द्वेष, मेरे तरीके से मुझे चाहिए, यह भी एक नींद है। यह उदाहरण इसीलिए दिया गया कि आप जागो। स्वप्न कौन देख रहा है, आप उसमें मत जाओ, नहीं तो जिंदगी बीत जाएगी। हमें तो ये देखना है कि मैं जागते हुए दुखी क्यों। दुख मेरे पास आया कहां से। दुख का कारण क्या है, दुख की वजह क्या है, उस वजह को देखना है। क्या मैंने ऐसा किया कि मैं दुखी हुआ? जैसे स्वप्न का कारण नींद है, वैसे हमारे दुख का भी कोई कारण है। जब हम नींद से जागते हैं, नींद जैसे ही हट जाती है वैसे स्वप्न भी खत्म हो जाता है। वैसे ही जैसे ही आप इस उम्मीद से मुक्त हो जाएंगे कि मेरे तरीके से ही चाहिए, उम्मीद भी एक नींद की तरह है, उम्मीद से मुक्त होते ही आपको हंसी आ जाएगी।
स्वप्न में भी आप कामनाओं की पूर्ति करते हो, इसलिए जीव कहा गया। आत्मा ही जीवात्मा है। जैसे पानी ही बर्फ है, लेकिन वो कोई कारण से बनी है, सीधी बर्फ नहीं बनी। उसके पीछे कोई कारण है। और पानी ही भाप है। मूल पानी है, लेकिन भाप भी बनी तो कोई कारण, और बर्फ भी बनी तो कोई कारण। अगर वो कारण हट जाए तो फिर किसमें आ जाएगा? पानी में। तो बर्फ झूठी हो जाएगी जब वो पानी में आ जाएगी। आप जैसे ही राग, द्वेष, मोह, आसक्ति, इच्छा, अपेक्षा और मेरा कर्ता के भाव से छूटोगे तो आपको हंसी आ जाएगी, क्योंकि मैं कारण में घूम रहा था। कारण ही दुख था। वो कारण हटाना पड़ेगा।
स्वप्न देखने वाला जीवात्मा है। ये स्थूल शरीर से अपनी कामनाओं की जब पूर्ति नहीं करता, तो सूक्ष्म शरीर से जाकर कामनाओं की पूर्ति करता है। हमें ऐसे ऐसे दृश्य दिखते हैं कि हम सोच भी नहीं सकते। स्वप्न में हमारे साथ ऐसी ऐसी घटनाएं होती हैं, ऐसे ऐसे लोग मिलते हैं, ऐसे ऐसे रूप आते हैं जिनकी हम कल्पना भी समाज में नहीं कर सकते। लेकिन वो आते हैं। कहीं ना कहीं उसका आधार हमारा कर्म है। हमारे साथ जो भी कुछ हो रहा है, उसका आधार मेरा किया गया ही कर्म है।
जीवात्मा क्या करता है? स्थूल शरीर, कारण शरीर और सूक्ष्म शरीर। कारण शरीर मतलब कारण में जीना। आप कारण से ही जी रहे हो, कारण से ही आ जा रहे हो, तो ये कारण शरीर है। जब ये स्थूल शरीर से अपनी कामना पूरी नहीं कर पाता, तो जीवात्मा स्वप्न में जाकर उसे पूरा करता है। उसे हमने स्वप्न का नाम दे दिया है, क्योंकि कुछ समझने के लिए कुछ नाम देना पड़ता है। वो जाकर अपनी इच्छा सूक्ष्म शरीर में पूरी करता है। अब देखो, कामना का ही तो पूरा कर रहा है। चाहे स्थूल शरीर से, जिसे तुम जागृत अवस्था समझ रहे हो, उसमें भाग रहे हो, चाहे स्वप्न में भाग रहे हो, लेकिन कामना ही तो पूरी कर रहे हो। आप कामनाओं से अपने आप को छुड़ाओ, अगर इस रहस्य को पूरी तरह खोलकर प्रत्यक्ष देखना है।
अभी आप किसी के द्वारा देख रहे हो। जैसे कोई कम देखने वाला है और कोई ज्यादा देखने वाला है, तो ज्यादा देखने वाला बता रहा है कि तू कहां तक देख रहा है, इसके आगे वो है। अब वो उसकी बात पर विश्वास करके धीरे-धीरे जाता है, तो उसको आगे भी दिखने लगता है। आप कामनाओं से मुक्त होने के लिए काम करो। अब इसको भी छोड़ो। स्वप्न जीवात्मा देख रहा था। जब आत्म तत्व में स्थिर हो जाओगे तो बात ही खत्म हो जाएगी।
भविष्य में नहीं जा सकते, कल्पनाओं में जाते हो। अतीत में जाकर भविष्य का निर्माण होता है। भविष्य का भी आधार आपकी जानकारी है। अतीत में जाकर भविष्य का निर्माण होता है, और भविष्य का निर्माण तब होता है जब कोई कामना होती है। प्रत्यक्ष रूप से वह पूरी नहीं हो रही, तो उसके लिए प्लानिंग होती है। जीव प्लानिंग करता है। लेकिन आधार कहां से बनाता है? अतीत का। अतीत की घटनाओं को लेकर, और जब इच्छा है, तब जाकर भविष्य का निर्माण करता है। भविष्य इच्छा पर टिका है।
थोड़ा समय बीतते ही वह अतीत हो जाता है। मन निमित्त है। प्रश्न इसके पीछे वाला करता है, जिसको जानकारी है। अगर मन को वो दिखा दो जिसकी जानकारी आपने कभी ग्रहण ही नहीं की, तो मन उसके बारे में सोच ही नहीं सकता। एक अनपढ़ को लिखा हुआ शब्द दिखा दो। मन के द्वारा वह समझ गया कि कुछ लिखा है, लेकिन वह क्या लिखा है, फील नहीं कर पाएगा, क्योंकि उसने जानकारी नहीं ली, शिक्षा नहीं ली। लेकिन अगर एक शिक्षित आदमी है, वह चाहे या ना चाहे, उसके सामने लिखा आ गया और उसने अर्थ समझ लिया, तो फील कर पाएगा। फील करने वाला मन है क्या, बुद्धि है क्या? मन मतलब बुद्धि। बुद्धि सिर्फ जानकारी का आदान प्रदान है। बुद्धि के पास फीलिंग नहीं है। फीलिंग वैसी होती है जैसी आपको जानकारी होती है।
जैसे आंख बंद करा के आपको किसी का हाथ पकड़वाया जाए। अगर कह दिया जाए कि मां का हाथ है, तो फीलिंग अलग होगी, भले वह पत्नी का हाथ हो। और अगर पत्नी का हाथ है और बता दिया जाए कि मां का है, और बताने वाले पर पूरा भरोसा हो, एक प्रतिशत संशय भी नहीं, तो पत्नी का हाथ पकड़ने पर भी मां की फीलिंग होगी, क्योंकि जानकारी मां की दी गई। अगर हाथ खुद समझ जाता तो पत्नी को पत्नी जानकर फील करता। जैसी जानकारी दी जाती है, वैसी फीलिंग आती है। कहने का मतलब यह है कि मन सिर्फ निमित्त है। मन के पीछे आप हो।
मन धोखा नहीं देता, कभी भी। आपकी जानकारी का अभाव आपको धोखा देता है। जहां जानकारी है और प्रत्यक्ष नहीं है, वहां प्रत्यक्ष का अभाव आपको धोखा देता है।
आप भूल नहीं रहे हो। कभी कहते हो यह सामान कहां है, मैंने रखा है, लेकिन याद नहीं आ रहा। आप भूले नहीं हो। जितनी जानकारी इकट्ठा की है, वहां तक जा नहीं पा रहे। ये कभी मत समझना कि मैं भूल गया हूं। आप भूलते कुछ नहीं हो। भूलने का मतलब तो यह होता कि अब कभी याद ही नहीं आएगा। सामान मुंह पर होता है, याद नहीं आता, और कुछ मिनट या कुछ घंटे बाद कहते हो याद आ गया। कहां से याद आया? क्या भूल गए थे? उस समय मेमोरी में तो था, लेकिन क्षमता नहीं हो रही थी कि वहां तक पहुंच जाऊं। कहीं ना कहीं कमजोर पड़ गया हूं। जब चिंतन किया तो पहुंच गया। भुला नहीं था।
शब्दों को बहुत सोच समझ के बोलो। कुछ कहना चाह रहे हो और सुना ही नहीं है, तो उसे व्यक्त कैसे किया जाए? व्यक्त करो, लेकिन संभावना में व्यक्त करो, जब प्रत्यक्ष मालूम नहीं है। आप ये कह सकते हो कि मुझे अभी याद नहीं आ रहा है। यह भी संबोधन है। मैं भूल गया कहोगे, और एक घंटे बाद बता दोगे। दूसरा कहे मुझे अभी याद नहीं आ रहा, तो उसका मतलब है कि कभी याद आएगा। यही शब्द की महिमा है। मुझे अभी याद नहीं आ रहा है, यह भी शब्द ही है। इन शब्दों का प्रयोग क्यों नहीं करते? अगर मान लोगे कि मैं भूल गया, तो यही गड़बड़ी है। मुझे अभी याद नहीं आ रहा है, और मैं याद कर लूंगा। इन शब्दों का उपयोग करोगे तो भीतर ताकत मिलेगी, आंतरिक बल मिलेगा।
यह पूरा फूल है, इसमें रस भी है। क्या रस यहीं है बस? नहीं, पूरे फूल में है। तो पूरे शरीर में जीवात्मा है। ऊर्जा ही है, पूरा ऊर्जा ही तो है। चाहे रूप से परे है। अगर रूप में होता तो दिख जाता। उसे रूप नहीं कह सकते। जो ये बता रहे हैं कि यहां है या यहां नहीं, वह ऊपरी ज्ञान है। रस कहां है? पूरे में है, सब जगह है। भंवरे की बात छोड़ो, अपने आप को देखो। यहां रस है तो यहां भी है, सब जगह रहेगा। पूरा गुलाब तभी बना है। सीधी सी बात है। जीवात्मा पूरे शरीर में है। ऐसा कोई स्थान नहीं जहां वह ना हो। बोलने को शब्द ही नहीं है, इसलिए ऊर्जा का नाम दिया जा रहा है।
जब किसी को नाम नहीं दे सकते, तब कहते हैं मान लो। नाम ही नहीं दिया जा सकता। गणित पढ़ाते हुए भी शिक्षक मान लो कहता है। मानना इसलिए पड़ता है कि उसका नाम दिया ही नहीं जा सकता। मानकर पहुंचना है, क्योंकि समझना चाहते हैं। अगर मानोगे नहीं तो पहुंचोगे भी नहीं। जानने के लिए पहले मानना पड़ेगा। लेकिन मानते नहीं रहना है। जानने के बाद मानना खत्म हो जाएगा। मानना एक प्रक्रिया है, जानना दूसरी। जान गए तो बात खत्म।
देखो तुम कहां हो, पहली प्रक्रिया में या दूसरी में। अगर अभी मानने में ही हो, तो किसी के द्वारा मान लिया, उसमें मेहनत नहीं हुई। मेहनत जानने में होती है। मेहनत करना नहीं चाहते, इसलिए इनसे पूछते हो, उनसे पूछते हो, काम करते नहीं, और भ्रमित हो जाते हो। भ्रम इसलिए होता है कि अपने ही गांव का रास्ता पूछो तो जितने लोग हैं, सब अलग अलग ढंग से बताएंगे। जिसकी जैसी योग्यता, जैसी क्षमता, जैसी जानकारी। अपने घर का पता पूरा परिवार आकर लिखवाए, तो भी सब अलग अलग रास्ता बताएंगे। मैच नहीं खाएगा।
साधकों को देखा है, जानकारियां इकट्ठी कर रहे हैं। उस जानकारी पर काम करना पड़ेगा। मानना, फिर जानना, फिर मानना खत्म। जानने के लिए पहले मानना पड़ेगा, क्योंकि नहीं जानते तभी पूछ रहे हो। पहले उसकी बात सुननी पड़ेगी। प्रत्यक्ष बाद में होगा। अगर जानते ही हो तो मानने और पूछने की जरूरत नहीं। शुरुआत मानने से होगी। मानने की भी अवधि है, कि यह कितने समय में होगा।
कोई चना मांगे तो सीधा दे सकते हो। भूंज के लाओ कहे तो कुछ समय और लगेगा। फूला हुआ चाहिए तो लगभग एक रात लगेगी। पौधा बना के लाओ कहे तो और समय। वृक्ष बना के लाओ कहे तो और समय। मांग कैसी है, यह देखना है। मैं क्या मांगने जा रहा हूं, और उसमें लगभग कितना वक्त लगता है।
मैं जब इस ज्ञान की खोज में निकला तो इतिहास पढ़ा। किसी को छह साल लगे, किसी को सात, किसी को बारह। देखा तो लगा, हम भी मेहनत करेंगे तो उतने साल लगेंगे, क्योंकि लोगों ने ऐसे ऐसे परिश्रम किया था। इसलिए कहता हूं, मानो, लेकिन जानने के लिए काम करो, फिर मानना खत्म हो जाएगा। काम करना पड़ेगा। काम से परिणाम आता है, मानने से नहीं।
तब समझ में आया कि आपकी समझ विकसित हुई। अगर वहां नहीं जाते तो उसने इतनी जानकारी तो दी कि यह धोखा है। इतना तो प्रत्यक्ष हुआ। शुरुआत में निमित्त वही बना। निमित्त को ठुकराओ मत। वही निमित्त बना। अगर वह निमित्त नहीं बनता तो भ्रम टूटता भी नहीं। भ्रम में यह समझ आ गई कि यह धोखा है, तो जिसने निमित्त बनाया उसे धन्यवाद है। निमित्त ही नहीं बनता तो उस भ्रम तक पहुंच नहीं होती, भ्रम नहीं टूटता, आगे का रास्ता नहीं खुलता।
आत्मा किसी के द्वारा मानी है। आपको भी प्रत्यक्ष नहीं हुआ। तो उससे कहो कि मैंने आपकी बात मान तो ली, लेकिन इसका बोध मुझे कैसे होगा।
उतनी समझ अगर वह व्यक्ति नहीं मिलता तो खिलौनों में ही लिप्त रहते। प्रकृति ने उसे निमित्त बनाया। आप यह देखो कि आप आगे बढ़ रहे हो। वह व्यक्ति मिला तभी पता चला कि यह खिलौना है। वह पूरा हो या अधूरा, मुझे उससे क्या। मेरा भ्रम टूटा, मैं आगे गया, उस व्यक्ति का धन्यवाद है, प्रकृति का धन्यवाद है।
प्राइमरी का शिक्षक पीएचडी नहीं होता। प्राइमरी वाले को हटा दो तो पीएचडी तक पहुंच ही नहीं सकते। पीएचडी का शिक्षक ही श्रेष्ठ है, ऐसा मत सोचना। प्राइमरी का उतना महत्व है कि वह नहीं पढ़ाता तो आगे जाते ही नहीं। सबको धन्यवाद दो। वह अंत तक नहीं पहुंचाया, लेकिन कहीं तो था, तभी उसके यहां माथा टेका। चाहे वह धोखेबाज ही रहा हो, धोखे में भी वह आपसे आगे था। कम से कम इतना समझा दिया कि धोखेबाज ऐसे होते हैं, आगे ऐसे में नहीं फसोगे। कुछ दिन, कुछ महीना रहे, पता चला कि यह बेईमान है या धोखेबाज है। इतना बता दिया। वह धन्यवाद का पात्र है।
उपयोग करना सीखो तो यहां सब उपयोग के लायक है, पूरी सृष्टि। उपयोग करो, दुरुपयोग करो, या शिकायत करो। शिकायत ढूंढोगे तो सबमें शिकायत ही मिलेगी। सदुपयोग करना सीखो। यह पूरा है या अधूरा, इससे क्या। इसके द्वारा कुछ तो सीखा, कि धोखेबाज ऐसे होते हैं, अब नहीं फसूंगा। पहले धोखेबाज को पहचानने की क्षमता ही नहीं थी, तभी फंसे। उस समय यह भी पता नहीं था कि धोखा कुछ होता भी है या नहीं।
इसीलिए जब कोई महात्मा अपनी उपलब्धि को उपलब्ध होता है तो जितने लोग मिले, सबको धन्यवाद देता है। वह देख पाता है कि यह व्यक्ति मिला तभी मैं आगे गया। झापड़ मारने वाले को भी, गाली देने वाले को भी धन्यवाद। भोजन देने वाले को और नहीं देने वाले को, अपमान करने वाले को और मान करने वाले को, सबको धन्यवाद, क्योंकि इसने कुछ सिखाया और स्तर बढ़ा, तभी आज यहां तक पहुंचा।
आप अपनी समझ विकसित करो। कौन कैसा है, यह छोड़ो। जिसके लिए निकले हो, वही करो। सब मदद करेंगे। पूरी सृष्टि सहायता करेगी। कमी निकालोगे तो पूरी सृष्टि में कमी ही दिखेगी, क्योंकि कमी आपमें है। सृष्टि में कमी नहीं है। मेरे में कमी है, खालीपन भी है। मैं जैसा रहता हूं, जैसी समझ रहती है, वैसा दिखता है। जैसी दृष्टि वैसी सृष्टि। दृष्टि के पीछे वाला जैसा है, वैसा लेता है। दोनों सृष्टि देख रहे हैं, दोनों अलग अलग ले जा रहे हैं। जिसे जानकारी है वह इसी सृष्टि में आनंद में है। आप इसी सृष्टि में दुखी हो। दुख, सुख और आनंद सब अंदर है। उस आनंद तक कैसे पहुंचना है, उसके लिए काम करो।
समझ आपके हाथ में कैसे आती है? जब जिज्ञासा रखोगे तब कोई निमित्त बनेगा। जिज्ञासा ही नहीं रखोगे तो निमित्त बनकर भी वह क्या करेगा।
एक अवस्था यह है कि जैसा आपको चाहिए, वैसा विचार आएगा। फिर तो चाहतों में फंसे रह जाओगे। अब क्या करना है? एक संकल्प छोड़ने के लिए दूसरा संकल्प बनाना पड़ेगा। जैसे एक कदम छोड़ने के लिए दूसरा कदम कहां रखूंगा, यह देखना पड़ता है। जगह नहीं है तो पहला कदम हटेगा नहीं। डर है, फिसल जाएगा। जिंदगी दांव पर थोड़ी लगानी है। पहला कदम जहां रखा है, वहां से हटाने के लिए कहीं रखने की जगह चाहिए, आधार चाहिए, क्योंकि वह आधार पर टिका है। एक संकल्प तोड़ने के लिए दूसरा संकल्प बनाना पड़ेगा, नहीं तो संकल्प टूटेगा नहीं।
मुझे निर्विकार का संकल्प बनाना पड़ेगा। ऐसा संकल्प जो उस पुराने संकल्प को तोड़ भी दे और खुद बनकर फंसाए नहीं। एक ही संकल्प है, एक ही धारणा। धारणा, ध्यान, समाधि, तुम ब्रह्म। एक ही संकल्प बनाना है कि मुझे निर्विकार होना है। निर्विकार क्या है? राग, द्वेष, मोह, आसक्ति, इच्छा, अपेक्षा और मेरा कर्ता के भाव से छुटकारा। यह संकल्प वहां से हटा भी देगा और खुद खत्म भी हो जाएगा। संकल्प बनाना पड़ेगा। संकल्प बनाओगे तो ऐसे लोग मिलने लगेंगे। यह प्रकृति कल्पवृक्ष है। जैसा संकल्प, वैसे लोग मिलते हैं। संकल्प नहीं है तो मिल भी जाए तो क्या करोगे।
प्यास नहीं लगी और सामने नदी बह रही है, तो क्या फर्क पड़ता है। प्यास लगी हो तो नदी नहीं, समुद्र भी बहे तो सोचोगे इसी से प्यास बुझा लूं। प्यास नहीं बुझेगी, पर जीवित रहूंगा। जीवित रहा तो आगे कहीं प्यास बुझा लूंगा। प्यास ही नहीं है तो नदियां बहें, कोई फर्क नहीं पड़ता। कोई कहे तो जबरदस्ती पी लोगे। प्यास लगी हो और चारों तरफ समुद्र ही हो, तो प्यास नहीं बुझेगी, फिर भी जीवित रहने के लिए वह पानी पी लोगे। जो उपयोग के लायक नहीं, उसे भी जरूरत में उपयोग कर लिया।
वैसे ही जरूरत बनानी पड़ेगी कि अब आत्मिक कल्याण करना है। समझ में आ गया कि मेरी जरूरत आत्मिक कल्याण है। जितनी जरूरतें थीं, वे शरीर तक थीं। शरीर की जरूरत को अपनी जरूरत समझ लिया था। इनको अलग अलग करके देखना पड़ेगा। अलग करके देख पाओगे तो अपनी जरूरत मिटाने के लिए किसी का भी सदुपयोग कर लोगे।
निर्विकार भी रहे होंगे। तभी तो विकार हटाने का प्रयास हो रहा है।
सब कुछ नहीं भूलता। उसका ज्ञान तुम्हें नहीं है। अगर भूल ही जाता तो बुद्ध ज्ञान के बाद अपने पिता से मिलने नहीं जाते, अपनी पत्नी से मिलने नहीं जाते। याद रहता है। उसमें राग, द्वेष और उम्मीद नहीं रहती। अधूरापन रहता है, क्योंकि मेमोरी में है, उस जगह को क्लिक किया गया है। जैसे रोबोट में मेमोरी फीड होती है, उसकी रेंज वहीं तक होती है, वहीं तक जा पाता है। कारण अवस्था तक हम भी वहीं तक जा पाते हैं। जितनी जानकारी है, उतना ही लेनदेन कर पाते हैं। जितना रास्ते का पता है, वहीं जाकर खड़े हो जाते हैं कि अब कहां जाऊं। मेमोरी अनंत नहीं। जितनी जानकारी है उतना ही जा पाता हूं। अपने आप को रोबोट से अलग क्या समझ रहे हो? वही हाल है। इस रोबोटपन से हसो। आप जिंदा मशीन हो। जब तक कामनाओं में जा रहे हो, तब तक जिंदा मशीन हो।
देखो मेरी जरूरत क्या है और शरीर की जरूरत क्या है। तब मशीनपन से हटोगे। तब शरीर की जरूरत के लिए अलग काम करोगे और अपनी जरूरत के लिए अलग। अभी एक ही जरूरत बना रखी है। आध्यात्म में नहीं हो तो बस शरीर की जरूरत है, और तुम मशीन हो, भाग रहे हो। यह जरूरत किसकी है?
जागृत कहने के लिए भी शब्दों का प्रयोग करना पड़ता है। प्रकृति क्या है? जो कुछ देख रहे हो, उसमें तुम भी दिख रहे हो। तुम भी प्रकृति के हिस्से हो। उसी का हिस्सा हूं, यह मैं बता रहा हूं। जो दिख रहा है और जो देख रहा है, हिस्सा को मत देखो, अपने को देखो। हिस्सा को क्यों देख रहे हो, जब तुम ही उसी प्रकृति के हिस्से हो। इस हिस्से को समझ गए तो इसे समझ लिया।
इसे तब समझ पाओगे जब लगोगे। सामने सामने समझोगे तो इसे कैसे समझोगे। जब कारण से मुक्त हो जाते हो, तब वह अवस्था आती है। जब तक कारण में हो, तब तक उस जगत में हो। कारण से भी मुक्त हो गए, तब बात और है।
मैं हां कहूं या ना, इससे कैसे पता चलेगा? आप अपने पर बात कर रहे हो। कैसे पता चलेगा कि उसके बाद की बात में मैं ईमानदारी से बोल रहा हूं? तब पता चलेगा जब तुम पहुंचोगे। मेरी ईमानदारी या बेईमानी से तुम्हें लेना देना नहीं होना चाहिए। उतना ही पूछो जितना समझकर चल सको। मैं दो ही तरह से जवाब दे सकता हूं, या तो आते हैं या नहीं आते। कैसे पता चलेगा कि ईमानदारी से बोला? जब तुम उस स्थिति में होगे तब पता चलेगा। और उस स्थिति में होते तो पूछने की जरूरत भी नहीं पड़ती। इस बात को समझो। मेरे लिए जवाब देना कठिन नहीं है, मैं दे सकता हूं। लेकिन इस जवाब का तुम्हारे जीवन में कोई मतलब नहीं है। आत्मज्ञानी को स्वप्न आता है या नहीं, इस प्रश्न का कोई मतलब ही नहीं।
आते हैं तो क्या होगा, नहीं आते तो क्या होगा? इस प्रश्न के उत्तर से तुम्हें कुछ हुआ नहीं। तुलना की बात यहां नहीं है। ज्ञान अपना होना चाहिए। एक ने कहा आते हैं, मैं कह दूं आते हैं या नहीं आते। दो में से एक होगा। इससे तुम्हें लाभ क्या हुआ? सब लोग इस बात को समझ लें।
जिसके सानिध्य में हो, उससे यह पूछो कि मैं आत्मज्ञान की स्थिति पर कैसे पहुंचूंगा। स्वप्न आते हैं या नहीं, मुझे उससे क्या मतलब। जहां तुम हो, वहां से आत्मज्ञान की स्थिति तक कैसे पहुंचूं, उसका मार्ग बताओ। उस पर काम करो। कैसे पहुंचोगे, यह देखो। जब पहुंच जाओ तब देख लेना कि स्वप्न आता है या नहीं आता।
एक और बात में समय बर्बाद होगा, यह मैं देख रहा हूं। आपने एक से रास्ता पूछा, उसने बताया। दूसरे से पूछा, उसने बताया। अब देखना है कि मैं किस रास्ते से जा सकता हूं, मेरी क्षमता किसमें है। उन्होंने एक रास्ता बताया, जितनी उनकी समझ थी। आपने वह समझ लिया। मैंने एक रास्ता बताया। अब यह काम तुम करो। देखो मैं किस पर चल सकता हूं और कौन मुझे पहुंचा सकता है। यह तुम्हें तय करना पड़ेगा।
स्कूल में एक समय मां बाप ले जाते हैं, एडमिशन हो जाता है, स्कूल तुम पर भार नहीं डालता, पढ़ाता है। फिर समय आता है, पूछता है अब कौन से विषय से पढ़ोगे। यह स्कूल तय नहीं करेगा, तुम तय करोगे। तय नहीं करोगे तो वहीं निकाल दिया जाएगा। उस समय विकल्प दिया जाता है कि किस विषय से क्या बनना चाहते हो। तुम कहो मैं नहीं तय करूंगा, आप तय करो, तो स्कूल तय नहीं करेगा। वहीं रुक जाओगे। तुम जा जाकर देख चुके हो। अब तय करो किस मार्ग से कल्याण होगा और मेरी क्षमता किस मार्ग में है।
इतनी बुद्धि विकसित नहीं है कि कौन सा मार्ग अच्छा है, यह अभी डिसीजन नहीं ले सकते, तो रुक जाओगे। बढ़ोगे नहीं, और हर विद्यालय से भगा दिए जाओगे। विषय का चुनाव नहीं करोगे तो कहीं टिकने नहीं देंगे।
जब तक ध्वनि है, तब तक उसमें शब्द ही है। जब तक ध्वनि है तब तक पहुंच ही नहीं सकते। उस ध्वनि से भी मुक्त होना पड़ेगा। शब्द, दृश्य, गंध, रस और स्पर्श से परे है वह। यह स्थिति तब आएगी जब पूरी तरह उम्मीद से मुक्त होगे। ध्वनि की भी उम्मीद है, चाहे वह कहीं से भी आ रही हो, तो भी द्वैत में फंसे हो।
कह सकते हो कि सूक्ष्म से सुन रहा हूं, क्योंकि इतना पता नहीं। कान से सुन रहा हूं, यह जरूरी नहीं। भीतर की है, तो भी कहीं से सुन रहा हूं। बाहर हो या भीतर, बाहर और भीतर अलग अलग नहीं हैं। बाहर जो तत्व है वही अंदर है। इस फूल का एक पत्ता तोड़ो, आगे और पीछे दोनों तरफ तत्व एक ही है। नीचे वाला तत्व अलग थोड़ी है। एक ही है, दिखने में फर्क है। उसी को देखना है जो अभी नहीं देख पा रहे। मैं जैसे भी सुन रहा हूं, ये कान दिख रहे हैं, वे कान नहीं दिख रहे, पर वे भी कान ही हैं एक तरह से, जिनके द्वारा सुन रहा हूं। वह द्वारा बदलेगा और जिससे आ रहा है वह भी बदलेगा, तो भ्रम होगा। इसलिए कहा गया कि शब्द, दृश्य, गंध, रस और स्पर्श से परे। ध्वनि भी एक शब्द है। ध्वनि से भी मुक्त होना है।
यह कब होगा? जब निर्विकार हो जाओगे। जब कोई उम्मीद नहीं रहेगी। उम्मीद नहीं रहेगी तभी अपने आप में स्थिर हो पाओगे। तुम्हारी कितनी उम्मीदें हैं, तुम्हें खुद पता नहीं। इसलिए एक एक उम्मीद तोड़ो। यह उम्मीद बनी तो क्यों बनी, इसका कारण क्या है। अभी यह उम्मीद है कि आत्मज्ञान के बाद स्वप्न आते हैं या नहीं। इस उम्मीद से मिलने वाला कुछ नहीं। यह उम्मीद जिंदगी भर ज्ञान नहीं होने देगी, क्योंकि प्रश्न वह रखा जो आत्मज्ञान के बाद का है। प्रश्न यह होना चाहिए कि आत्मज्ञान तक कैसे पहुंचूं। उस स्थिति पर पहुंचने के बाद खुद देख लूंगा। दूसरा दिखाएगा नहीं, सिर्फ बता सकता है। बताने से पहुंच नहीं जाओगे। स्वप्न आता है या नहीं, यह कह देने से आत्मज्ञान नहीं होगा। तुम आत्मज्ञान के बाद की स्थिति पूछ रहे हो। आत्मज्ञान तक पहुंचने के बाद देख पाते।
स्थिति तक पहुंचने के लिए काम करो। स्थिति के बाद की बात ही मत करो। मैं उस स्थिति तक कैसे पहुंचूं, यही पूछो। वहां तभी पहुंचोगे जब शब्द, दृश्य, गंध, रस और स्पर्श से परे होगे। और यह तब होगा जब उम्मीद से मुक्त हो जाओगे। जब तक उम्मीद है तब तक इन्हीं में हो। एक एक उम्मीद तोड़ो।
आध्यात्मिक प्रश्न एक ही है। मुझे आत्मज्ञान कैसे हो जाए। स्वयं से कैसे। बस यही एक प्रश्न है, पहला भी और आखिरी भी।
जब लक्ष्य पर पहुंचोगे तो मार्ग छूट जाएंगे। जितने मार्ग हैं वहीं खत्म हो जाते हैं। मार्ग केवल लक्ष्य तक रहते हैं। जितने साधन बताए जा रहे हैं, वहां पहुंचने के हैं, बॉर्डर तक पहुंचने के हैं। लक्ष्य पर पहुंचे कि सब खत्म। ये सब एक एक मार्ग बता रहे हैं। अब देखना तुम्हें है कि कौन सा मार्ग समझ में आ रहा है।
कई लोग खड़े हैं, तुम्हें एक जगह जाना है। कोई हिंदी में बोल रहा है, कोई अंग्रेजी में, कोई मराठी में, कोई भोजपुरी में, कोई गुजराती में, कोई कर्नाटक की भाषा में। देखना है किसकी भाषा समझ में आ रही है। जिसकी भाषा समझ में आए, उससे बात करो। जिसकी भाषा का ज्ञान ही नहीं, वह सही भी बता रहा हो तो उसका सही बताना क्या करोगे। समझ में आना चाहिए। जिसकी बात समझ में आ जाए, उसी पर चलो।
जिसके बताए मार्ग पर चल रहे हो, दुविधा उठे तो उसी से पूछो। वह बताएगा। संपर्क करो, कहो कि मैं यहां से यहां तक जा रहा हूं और बड़ी दुविधाएं उठ रही हैं। जो वहां गया है उसे पता है कौन कौन से दृश्य आएंगे, कौन कौन सी चीजें आएंगी। वह बता देगा।
निर्विकार कैसे होऊंगा, यह अब देखना है। धारणा बना ली। धारणा के बाद काम ही करना पड़ेगा। संकल्प किया, अब देखो कि निर्विकार कैसे बनूंगा, और विकार कैसे बन रहे हैं। बन रहे हैं बेईमानी से। पहले बेईमानी छोड़नी पड़ेगी। निर्विकार की धारणा रखो। आगे बनना बंद हुआ, पर पिछला जमा कैसे खत्म होगा, यह भी प्रश्न है।
मेरे द्वारा बेईमानी हुई, दुष्कर्म हुआ, वह जमा हुआ। जब किसी से बेईमानी की तो श्राप मिला। अब किसी के साथ सत्कर्म करूंगा, जरूरतमंद की सेवा करूंगा, तो आशीर्वाद मिलेगा। वह आशीर्वाद उस श्राप को काटेगा। पहले यह धारणा बनानी है कि मुझे निर्विकार होना है। उसके लिए ईमानदारी अपनानी है। ईमानदारी अपना लोगे तो आगे का बंधन नहीं बंधेगा। पिछला बंधन खत्म करने के लिए सत्कर्म करना पड़ेगा। आगे बंधन न बंधे, इसके लिए सत्संग सुनते रहना पड़ेगा।
यह वैसे ही है जैसे भोजन ग्रहण करते रहते हो। आज खूब खा लूं और एक हफ्ते नहीं खाऊंगा, ऐसा नहीं चलता। उस हिसाब से काम नहीं कर पाओगे। ईमानदारी, सत्कर्म और सत्संग ग्रहण करते रहो। कब तक? जब तक वहां पहुंच नहीं जाते।
विकार पर हर क्षण ध्यान रखना है। जब भी तुम्हारे द्वारा कर्म हो रहा है, पहले विचार आता है। जरूरत होती है, विचार आता है। मेरी जरूरत, किसी और की जरूरत, या मान की जरूरत। इसी में कर्म होता है। विचार आए तो देखो, मुझे इससे क्या लाभ होगा। लाभ होगा तो किसी की हानि तो नहीं होगी। मुझे लाभ हुआ और जिसकी हानि होगी, उससे श्राप मिलेगा, फिर गिर जाऊंगा। कर्म से पहले जांच लो। ईमानदारी से ही करना है।
प्रश्न पर प्रश्न उठाते रहोगे तो मन फंसाता चला जाएगा। मन प्रश्न बहुत करता है। प्रश्न कहां करोगे। एक ही प्रश्न उठाना है। मैं कोई भी काम पूरी ईमानदारी से करूंगा, और इसका परिणाम क्या आएगा, वह देखना है। ऐसा तो नहीं कि मेरे कर्म से समाज को तकलीफ हो। ऐसा काम मत करो। भीतर प्रश्न ज्यादा नहीं उठने देने हैं। इसी पर ध्यान रखो कि जो हो रहा है, मेरी जरूरत में है, या अपने लोगों की जरूरत में, या मान की जरूरत में। इस जरूरत की पूर्ति से मेरा क्या होगा और समाज का क्या होगा। एक तुम हो, एक सामने है। दोनों को देखना है। दोनों का लाभ देखने वाला आध्यात्मिक है। केवल अपना देखने वाला भौतिकवादी है, उसी को गृहस्थी कहा गया है। दोनों का लाभ देखने वाले का कल्याण होगा। केवल अपना कल्याण देखते हो तो भौतिकवादी हो। जब भी कर्म हो, देखो कि मेरे द्वारा किसी को हानि ना हो।
ब्रह्मचर्य आपका होना चाहिए। एक होता है शरीर का ब्रह्मचर्य, एक होता है आपका ब्रह्मचर्य। आपका ब्रह्मचर्य जरूरी है। मानसिक कर्म में ईमानदारी, वही आपका ब्रह्मचर्य है। वही लोगों ने छोड़ दिया, इसीलिए ग्रसित हो गए। ईमानदारी आपका ब्रह्मचर्य है।
शरीर का ब्रह्मचर्य रखोगे तो शरीर में ताकत बढ़ेगी। बेईमान हो तो उस ताकत को कहां लगाओगे? बेईमानी और बढ़ जाएगी। दो ही रास्ते हैं। या तो वह ऊर्जा बेईमानी में लगेगी, या सही मार्ग पर लगेगी। शरीर में ताकत आ गई तो और तेजी से बेईमानी करोगे। इसलिए तुम्हारा ब्रह्मचर्य जरूरी है, और वह ईमानदारी है। ईमानदार हो तो ब्रह्मचारी हो। कृष्ण भगवान की प्रेमिका भी थी, तीन पत्नियां भी थीं, बच्चे भी हुए, फिर योगी कैसे कहलाए? ब्रह्मचर्य ईमानदारी है। यह तुम्हारे लिए जरूरी है।
जब तक बेईमानी कर रहे हो, तब तक अपने प्रति ईमानदार नहीं हो। ईमानदारी अपना ली तो आगे विकार जमा नहीं होगा। पिछला खत्म करने का उपाय चाहिए, पिछला बहुत जमा है। वह सत्कर्म से खत्म होगा। आग तब तक जलती है जब तक लकड़ी जाती रहे। डालना बंद कर दो तो आग बुझ जाएगी। ईमानदारी आग है। जितनी गंदगी है उसे जलाने के लिए कुछ डालना पड़ेगा। आग लगा दी, ईमानदारी अपनाई, पर जलेगा कैसे? ईंधन चाहिए। सत्कर्म ईंधन का काम करता है। कर्म के प्रति सचेत रहना ही ईमानदारी है। जब कर्म हो, उसमें छल, कपट, चोरी, बेईमानी, चापलूसी, मक्कारी, धूर्तता और पाखंड नहीं होना चाहिए। केवल ईमानदारी हो। पिछला जलाना है, जमा विकार खत्म करना है, तो सत्कर्म करना पड़ेगा। आग लग गई, जलाने को कुछ चाहिए, नहीं तो आग बुझ जाएगी।
कर्म तो होता ही रहेगा जब तक शरीर है। कर्ता में हो या अकर्ता में, कर्म हो ही रहा है। महात्मा के द्वारा भी कर्म होता है। एक कर्ता बनकर कर रहा है, एक अकर्ता में कर रहा है। अकर्ता कर्म करते हुए बंधन में नहीं फंसता, आनंद में है। जिसने अपने आप को कर्ता समझा, और मेरे तरीके से ही चाहिए, वह करता रहता है और बंधन में फंसता जाता है।
अपनी योग्यता देखो और अपनी जरूरत देखो। जरूरत है और योग्यता नहीं है, तो योग्य होने के बाद लो, तब नहीं फसोगे। योग्यता के बिना किसी तरीके से हासिल कर लिया तो फंस गए, क्योंकि तुम्हें पता है कि बेईमानी कर ली। जिससे मांग रहे हो, सामने वाले को पता नहीं कि जो बनकर मांग रहा है वह है भी या नहीं। मांगने वाले को पता है। मैं जो बनकर मांग रहा हूं, क्या मैं वही हूं? अगर वही हो, और सामने वाला वही समझकर दे रहा है, तो बंधन नहीं बढ़ेगा। हो कुछ और, बता कुछ और, तो देने वाले को उसके कर्म का फल मिल जाएगा, लेने वाला फंस गया, बेईमान हो गया।
जो बता रहे हो, वही होना चाहिए। यही ईमानदारी है। किसी ने रास्ता पूछा और रास्ता पता नहीं है, फिर भी बता दिया, तो बेईमानी है। तुम फंस गए, तुरंत गिर गए। इतना भी कह दिया कि मुझे पता नहीं, आगे पूछ लीजिए, तो स्तर उठ गया। भटका सकते थे, एक विकल्प था, पर ईमानदारी दिखा दी कि मुझे इसका ज्ञान नहीं है, वहां पूछ लीजिए। समझ विकसित होगी। हां हो या ना, ईमानदारी से बोलो। ना बोलने में भी स्तर उठता है, क्योंकि भटका सकते थे। कुछ कदम के लिए वह मान ही लेता, पूछा है, भरोसा है। जितने कदम तुम्हारे कहे अनुसार भटके, उसका दोष तुम्हें लगेगा।
कोई बात नहीं, अब समझकर चलो। मार्ग मिल गया। यहां मैं भरोसे और विश्वास की बात ही नहीं करता। अगर यही करना होता कि हां या ना कह दूं, स्वप्न आता है या नहीं, तो कह देता। जो मैं कहता हूं उसे काटने के लिए तुम्हारे पास अभी वह नहीं है, क्योंकि तुम वहां खड़े नहीं हो। जब तक तुम उस जगह खड़े होगे, पता नहीं मैं कहां रहूंगा और तुम कहां।
उन्होंने कहा स्वप्न नहीं आते, और मैं भी ना कह दूं, तो उनकी बात और मजबूत हो जाएगी कि यह भी सही है। मैं हां कहूं तो क्या होगा? उससे क्या होगा। इसलिए ऐसे प्रश्नों का जवाब नहीं देता जिनसे तुम और भ्रमित हो जाओ, और जिनका तुम्हारे जीवन में कोई मतलब नहीं। जिन्हें प्रत्यक्ष कराया ही नहीं जा सकता। प्रत्यक्ष स्थिति के बाद होगा। स्थिति तक पहुंचने का मार्ग चाहिए। स्थिति तक पहुंचने के लिए काम करते, यही अच्छा था।
मन भविष्य के जो प्रश्न उठा रहा है, जो वास्तविक नहीं, उन्हें हटा दो। देखो, यह प्रश्न मैं पूछ रहा हूं, इसके उत्तर से मेरा लाभ है या नहीं। कुछ देर पहले पूछा कि आत्मज्ञान के बाद स्वप्न आते हैं या नहीं। इस जवाब से लाभ है या हानि? कुछ नहीं। संतुष्टि है बस। कैसी संतुष्टि? बेवकूफी वाली। मन की संतुष्टि। यह बात आत्मज्ञान के बाद ही पक्की होगी। इससे लाभ क्या हुआ। इसे पागलपन भी कह सकते हो। पता तब लगता है जब बात समझ में आती है, जब अकेले बैठोगे। अभी तक वह समझ थी नहीं। समझ विकसित होती तो शायद प्रश्न पूछा ही नहीं जाता।
वह प्रश्न करो जिसके उत्तर से लाभ हो, जिससे लगे कि समझ विकसित होगी। और देखो, उसका जवाब है भी या नहीं। जवाब है तभी पूछो। कोई कहे यह पेड़ क्यों है। पेड़ थोड़ी बताएगा। जिसने लगाया, उसने किस उद्देश्य से लगाया, वह बताएगा कि मैंने यहां क्यों लगाया। यह पेड़ यहां क्यों है, लगाने वाला बताएगा। आगे जाओगे तो पेड़ नहीं बताएगा। मतलब यह कि वही प्रश्न करो जिसका कुछ मतलब हो और जिससे लाभ हो। नहीं तो समय बर्बाद होता है और भटकते रहते हो।
पत्ते को हाथ में मत लो। देखो क्या कर रहे हो। अब प्रश्न पूछने की क्षमता नहीं रह गई, तो अपने आप को वहां लगाकर कुछ ना कुछ बोलना है। उसे क्यों छुए। प्रश्न की बात चली गई नहीं है। उस अवस्था में मुझे क्यों नहीं देख रहे। प्रश्न की कीमत है तो ध्यान वहां कैसे चला गया। हाथ लगाया, तो उसमें प्रश्न नहीं उठा? नहीं, उसमें ताकत लग गई। मन उधर हो गया, ऊर्जा वहां लग गई। बिना विचार पत्ता उठ ही नहीं सकता। चटाई क्यों नहीं उठा ली, अगर बिना विचार उठ जाता? विचार आया था। मेरी बात समझोगे, या खुद बताओगे? पहले मेरी बात समझो।
प्रश्न पूछते पूछते उत्तर मिलते गए, समझ आने लगी। अब क्या पूछूं। ऊर्जा सीधी मेरी तरफ नहीं लग पा रही। पत्ते पहले भी थे, पता नहीं कितने पत्ते उड़ गए। ऊर्जा मेरे पर नहीं लगी तो गई कहां। पत्ते में कुछ लग गई, मुझमें कुछ लगेगी। ऊर्जा बंट रही है। शुरुआत में ऊर्जा एक ही जगह थी। अब विचलित हो रहे हो, ऊर्जा बंट रही है, संभाल नहीं पा रहे। मुझ पर केंद्रित नहीं हो पा रहे। केंद्र तभी तक था जब तक व्यक्तिगत प्रश्न थे। तब कुछ और दिखता नहीं था। कोई बोल भी रहा होता तो मन करता चुप हो जाए। व्यक्तिगत प्रश्न हटते ही खुद विचलित हो गए। कुछ और पूछना है, पूछने को बचा नहीं, जितना पूछना था उसका जवाब मिल चुका। फिर भी कुछ और पूछना है, और ऊर्जा सीधे मुझ पर नहीं लग रही। ऊर्जा बांट दी। पत्ता दिख गया। हाथ में पत्ता लेते हो, तोड़ते हो, तोड़ने में लगते हो, मुझसे कुछ ना कुछ पूछते हो।
एक बार में एक ही काम करो। लक्ष्य तक पहुंचना है तो लक्ष्य से विचलित मत होओ। यहां मुझसे प्रश्न करने बैठे हो, पत्ता तोड़ने नहीं। पत्ता तोड़ने का तुम्हारे जीवन में कोई उद्देश्य है क्या।
अब यह मिल गया, अब यह गलती मत करना। एक समय में मन एक है, दो नहीं। पूरी तरह लगता है तो एक ही जगह लगता है। इंद्रियों से उसे अनेक जगह उलझा दिया। कई जगह ऊर्जा लगा रहे हो, काम नहीं कर पा रहे। एक ही जगह लगो। देखो सच में जरूरी क्या है। ऐसी गलती फिर मत करना।
कहते हो उस समय विचार नहीं उठा, आंख ने क्रिया की, हाथ उधर गया। हाथ ऐसे जा ही नहीं सकता। आंख ने देखा, फिर हाथ गया। तेरी ईमानदारी या बेईमानी से मुझे लेना देना नहीं। तू मेरे लिए कोई कर्म नहीं कर रहा, तो तेरी ईमानदारी सिद्ध करने की यहां जरूरत नहीं। अपने आप को यह मत कहो कि मैं ईमानदार हूं या बेईमान। समझने के लिए पूछो। दृष्टि गई, फिर विचार आया कि उठा लूं। यह सूक्ष्म विचार है। विचार नहीं आया हो तो उठा ही नहीं सकते, असंभव है। इस पर चिंतन करो। जब तक उठाने का आदेश नहीं देंगे, तब तक उठ नहीं सकता। बातचीत मत करो, इस पर चिंतन करो। विचार का आदेश दिए बिना हाथ क्रिया करता ही नहीं। प्रतिदिन भी ऐसा ही होता है। बिना विचार आए उठा ही नहीं सकते।
खाना खाते समय निवाला अपने आप मुंह तक जाता है, ऐसा नहीं। नाक में क्यों नहीं जाता? पता है कि भूख यहीं से मिटेगी, इसलिए उठाकर यहीं डालता हूं। ज्यादा बातचीत मत करो। इसका उत्तर पहले भी आ गया था। मेरे पास इतना समय नहीं। समय बर्बाद मत करो। अब तुम हट रहे हो। जितना कहा गया है उस पर चिंतन करो। आगे प्रश्न हो और जीवन में मौका मिले तो पूछना। अब बातचीत हो जाएगी। मेरे पास इतना समय नहीं कि तुमसे बातचीत करूं। इतना समय है कि तुम अपना आत्मिक कल्याण कर लो। मैं समय तुम्हारे लिए वहीं तक लगाऊंगा, बातचीत में नहीं। बातचीत में तुम्हारा भी समय जाएगा, मेरा भी। जिंदगी ने मिलने का एक मौका दिया है, कुछ शब्द दिए हैं, उतना समय दिया है। फिर तुम कहीं और, मैं कहीं। समय का सदुपयोग करो।
मैंने कहा विचार आया तभी पत्ता उठा, तुम कहते हो विचार नहीं आया। इस पर गहरा चिंतन करो। तुम्हारी बात मेरी बात काट रही है। जिससे सीखने आए हो, उसकी बात को अगर तुम्हारी बात काट दे, तो मैं सिखाने लायक नहीं रहता। इस बात को समझो। बहुत गहरा चिंतन करना। वह कह रहे थे विचार आया तभी उठा, और मैं कह रहा हूं विचार नहीं आया। अगर मैं इतना सूक्ष्म देख पाया और वे नहीं, तो मैं उनसे आगे था। मेरी सूक्ष्म बुद्धि हुई, मैं भूल से वहां चला गया, दोबारा नहीं जाऊंगा। तुम्हारी बात और हमारी बात एक दूसरे को काट रही हैं। पहुंच नहीं हुई हो तो सुनो। मेरी बात सुनो। अब बोलो मत। बोलने से मतलब नहीं होगा। जब तक जवाब नहीं मिलता, चिंतन करो। अगर निश्चय हो जाए कि बिना विचार उठ गया, तो तुम मुझसे आगे हो, कोई और खोजो। अगर पता चले कि विचार आया था तभी उठा, मेरी बात सही है, तो मैं तुम्हारे काम का हूं। इस पर चिंतन करो। यह जवाब तुम्हारे लिए जरूरी है। अब आगे किसी और का प्रश्न हो तो वह पूछे। तुम्हारी और मेरी बात एक दूसरे को काट रही है। तुम्हारी बात सही हो तो तुम्हारा स्तर मुझसे ज्यादा है, आगे बढ़ो। मेरी सही हो और तुम्हारी काट रही हो, तो आगे का मार्ग पूछना। पहले इस पर चिंतन। इसका जवाब दोगे तो उस समय पूछूंगा, कैसे। वह जवाब भी तुम्हें ही देना पड़ेगा। फिर चिंतन, फिर आगे की बात।
मन शरीर के लिए काम करता है। चित्त मतलब मेरे द्वारा कोई घटना हो गई तो मेरा चित्त वहां लग जाता है। चाहे वह घटना हद से ज्यादा सम्मान की हो, या हद से ज्यादा अपमान की हो, मेरा चित्त वहां लग जाता है।
संभव तब होता है जब खुद को समझना हो। अगर हम आए ही हैं तो अपने समय का सदुपयोग करें। यहां क्या है, मैं समझूं। यहां आने का उद्देश्य क्या है? क्योंकि हम कुछ उद्देश्य लेकर आए हैं। क्यों ना जितने दिन रुकें, हम अपनी समझ को विकसित करें। क्या है, मैं समझूं। इसलिए कि अब तो आ ही गए हैं। तो मैं समझ लूं क्या है। और मैं तभी समझ पाऊंगा जब पूरी तरह नियम में रहूंगा।
अगर मैं खुद नियम में नहीं हूं तो मैं सामने वाले को भी कुछ बोल नहीं सकता। अगर मैं पूरी तरह नियम में हूं तभी मैं सामने वाले से भी कुछ बोल सकता हूं कि मैं पूरे नियम में रहा, और मैं कुछ समझने आया था, हुआ या नहीं। वह बात तब होगी जब आप नियम में रहोगे, तब सामने बोल सकते हो। जिसकी प्रबल जिज्ञासा होती है कि नहीं, मुझे बस समझना ही है, तो फिर वह जहां जाता है, वह समझने आया है, तो फिर वह उसी नियम में जिएगा और अपने समय का सदुपयोग करेगा।
हमें क्या समझना चाहिए कि हम जहां भी गए हैं, एक जगह से दूसरे जगह गए, दूसरे से तीसरे गए, तो हमें पिछला छोड़ना चाहिए। क्योंकि हम उस नियम में रह के जितना समझना था, समझ गए। अब यहां का नियम अलग है, तरीका अलग है। तो मुझे अब यहां समझना है। मुझे तुलना तो करनी ही नहीं है। तुलना ही तो भटकाव है। तुलना हमें करनी ही नहीं चाहिए। तुलना तो आप तब करो जब आपको प्रत्यक्ष हो गया हो। आप अप्रत्यक्ष में रहकर तुलना करना मतलब अपने आप को भटकाना है।
तुलना तो तब करो जब आप उसको और इसको दोनों को समझ लिए हो। लेकिन आप एक को समझने गए थे, उसको छोड़कर वहां समझ में नहीं आया, दूसरे जगह आ गए, तो तुलना कैसे कर सकते हो? क्योंकि अभी तो समझ ही रहे हो। अगर तुलना करोगे तो समझ नहीं पाओगे, तुलना में लग जाओगे। तुलना तो तब करोगे जब दो चीजें हों, दोनों के बारे में आपको प्रत्यक्ष मालूम हो, तब आप तुलना कर सकते हो। वो तो जब संभव होगा। तब तक मैं बिल्कुल कोरा बैठूंगा। उधर का मटेरियल उधर ही छोड़ के आऊंगा। दोनों की तुलना नहीं करूंगा।
आप जहां थे, जब आगे गए, इसका मतलब जो समझने के लिए मैं वहां गया था, वो नहीं हुआ। वो नहीं हुआ तो मुझे वहां की बात भी नहीं करनी चाहिए। वहां की बात करना मतलब है समय की बर्बादी। अगर आप सामने वाले से जाकर कह भी रहे हो कि मैंने ये ये साधनाएं कीं, तो आप समय बर्बाद कर रहे हो। आपको वहीं छोड़ देना चाहिए। क्योंकि अगर समझ में आ जाता तो आगे क्यों जाते? आगे आए हो तो इसका मतलब उसके द्वारा समझ नहीं पाए, तभी आप आगे आए। तो जिसके पास गए हो, अब उसके द्वारा समझो। पीछे की बात ही मत करो। पीछे की बात करना मतलब अपने आप को उलझाना है।
आप इतिहास में देखिए कि जितने महापुरुष हुए। आप अष्टावक्र का नाम लेते हो, राजा जनक का नाम लेते हो, कृष्ण का नाम लेते हो, अर्जुन का नाम लेते हो। लेकिन क्या उसके पहले कोई महापुरुष नहीं हुआ था? क्या किताबें नहीं थीं? क्या उन्होंने उन दो के अलावा किसी की चर्चा की? उसने अपने व्यक्तिगत जीवन के बारे में पूछा, बस अपनी समस्या बताई, मेरा कल्याण कैसे होगा। राजा जनक ने अष्टावक्र से यह नहीं कहा कि मैंने ये किया, मैंने वो किया, मैं उसमें विफल रहा। अब विफलता क्या सुनाऊं। और मैं सफल होता तो आपके पास क्यों आता, वही चीज लेने। एक वस्तु जिसको मैं ढूंढ रहा था, अगर वह मिल जाए तो मैं दूसरी जगह थोड़ी जाऊंगा। अगर मैं दूसरी जगह गया तो पहले की चर्चा करना मतलब समय की बर्बादी।
तो जिज्ञासु को अपनी बात ही करनी चाहिए। तीसरे को लाया, मतलब उसने अपने आप को फंसा लिया। कभी भी हमें पीछे की चर्चा नहीं करनी चाहिए। क्योंकि हम अतीत में असफल हुए हैं। असफलता को क्या ढूंढना? असफलता को क्या ढोना? और वह आपको कुछ देना चाह रहा है, तो आप उसको अपनी असफलता में उलझा दे रहे हो। उसका कोई मतलब ही नहीं होगा। लेकिन आप बता के अपने अहम भाव को पोषण कर रहे हो कि मैं बहुत सालों से प्रयास कर रहा हूं। लेकिन तुम एक साल से प्रयास करो, चाहे हजार साल से, परिणाम तो नहीं आया ना। तुम्हारे प्रयास का कोई मतलब ही नहीं है। लेकिन आप प्रयास बता के अपने आप को, मैं को, खड़ा करना चाह रहे हो कि मैं इतने सालों से साधना कर रहा हूं। उस साधना का क्या अर्थ है, क्या मतलब है, और उसे क्यों सुना रहे हो? क्या उसको यह बताने गए हो कि मैं इतने साल तक साधना किया?
अगर उसने साधना दी है तो सुना सकते हो। अगर उसके बताए हुए नियम पर, उसके बताए हुए सत्संग पर चल रहे हो, तब आप उसे सुना सकते हो। लेकिन और किसी की बात अगर सुना रहे हो तो आप समय बर्बाद कर रहे हो। तो मुझे सिर्फ अपनी बात करनी चाहिए। प्रबल जिज्ञासु का यही लक्षण है। और अगर आप और किसी की बात कर रहे हो, कभी इनकी, कभी उनकी, कभी यह कहानी, कभी वो कहानी, इसका मतलब आप जिज्ञासु बनना चाहते हो क्या? प्रबल जिज्ञासु हो नहीं। प्रबल जिज्ञासु सिर्फ अपनी बात करता है कि मेरा कल्याण कैसे होगा, मुझे पिछले लोगों से मतलब नहीं है।
और आप इतिहास में देखिए, जिसका भी संवाद आप सुनिए। चाहे मैंने उदाहरण दिया राजा जनक और अष्टावक्र का, उन्होंने अपने अलावा किसी की बात की क्या? अर्जुन और कृष्ण, क्या उसके पहले कोई महापुरुष नहीं था? उसके पहले क्या किताबें नहीं थीं? तो आप जीवंत गुरु के शरण में गए हो। अगर जीवंत गुरु का सानिध्य जीवन में मिल गया है तो अपने अलावा कोई बात ही मत करो। मेरा कल्याण कैसे होगा, इस पर पूरी तरह बात करो। जब भी आपको समय मिले, और उसके बताए हुए नियम में रहो।
तो ये इतनी शांति से इसलिए रह पा रहे हैं। इन्हें कुछ समझना है कि क्या है। और क्या है का जवाब तभी मिल पाएगा जब उस नियम में रहोगे। उस नियम में नहीं रहोगे तो क्या है का जवाब मिल भी नहीं पाएगा। तो मैं चाहे एक दिन के लिए जाता हूं, चाहे सात दिन के लिए जाता हूं, चाहे महीने के लिए, मुझे पूरी तरह नियम में ही रहना चाहिए। तभी आप कह सकते हो कि मैंने पूरी तरह किया। मैं करके मुक्त हूं। उस नियम को, सौ तो आपने दिया था, मैंने एक सौ एक प्रतिशत पालन किया। क्या सौ आपकी तरफ से और एक मेरी तरफ से? लेकिन आपने कह दिया, नहीं। कोई त्रुटि हो गई तो फिर आपको समझ में ही नहीं आएगा। नियम की पालना के बाद ही इंसान कह सकता है कि यहां कुछ है या नहीं है। जब आप पूरी तरह नियम में रहोगे तभी आप कह सकते हो, या तो है या तो नहीं। और आप सामने वाले से कह सकते हो कि भाई, आप हैं या नहीं। हम कब बोल सकते हैं? जब हम पूरे नियम में रहे, तब सामने वाले से कह सकते हैं कि आप यहां फिर क्या कर रहे हो, लोगों का समय क्यों बर्बाद कर रहे हो।
नियम में रहना मतलब समाज के लिए सहायता भी है। उसका एक और सत्कर्म हो रहा है। मैं नियम करके उजागर कर दूं, यहां कुछ है या कुछ नहीं है। उजागर करते वक्त एक बात का ध्यान रखना, एजेंट बन के मत आ जाना। एजेंट बनेगा तो नियम बता रहा हूं, नहीं। एजेंट वाले के अंदर भी तो कुछ और चल रहा है। मैं आपको बता रहा हूं। क्योंकि अगर आप एजेंट बन के आ गए और बाहर से दिखा रहे हो कि मैं नियम में रह रहा हूं। रहना क्या है? मौन बैठना है, सात दिन। अब अंदर से क्या चल रहा है, वही जाने। अंदर और बाहर दोनों एक ही होना चाहिए। और अगर पता चला कि कोई समाज हित के लिए उचित कार्य कर रहा है, यह आपको पता है, लेकिन आप कहीं और से जुड़े हो, उसको तोड़ने के लिए आए हो, उसको चलाना चाहते हो, तो आपका स्तर बहुत भयानक गिरेगा। उसे आप सिद्ध भी नहीं कर सकते।
तो आप चाहे किसी की बुराई करिए, चाहे बढ़ाई करिए, समझ करिए। अगर मैं कहीं गया हूं तो मुझे पूरी तरह नियम में रह के अपने अनुभव को व्यक्त करना चाहिए। लेकिन वो अनुभव आपका हो। और अपनी समझ से ही बोलो कि मैं आपके नियम में रहा और मैं यह समझ पाया। उससे क्या होगा? समाज को भी प्रेरणा मिलेगी। क्योंकि समाज हित के लिए काम हो रहा है और समाज के लाभ के लिए काम हो रहा है। तो उसमें समाज का हिस्सा तो आप भी हो। आप कुछ बोलते हो तो आप भी लोगों से जुड़े हो। लोग आपसे जुड़े हैं, तो उन्हें भी प्रेरणा मिलती है। तो आप ईमानदारी से बोलो, लेकिन समझने के बाद बोलो। समझने के पहले नहीं। अगर आपने नहीं समझा है तो मत बोलो। समझ लिया है तो बोलो।
तो यह नियम में इसलिए रह पा रही है, क्योंकि इसे समझना है कि क्या है। जब हम उस नियम में रह के देखेंगे तभी पता चलेगा। और तभी तो हम सिर उठा के बोल भी पाएंगे कि मैं नियम में रहा। तो मेरा तो यही कहना है, प्रबल जिज्ञासु हो जाओ और सिर्फ अपनी बात करो। बस, और कुछ नहीं।
अपनी स्थिति का पता ही है। जायजा लेने की जरूरत ही नहीं है भाई। अपनी स्थिति का आपको पता ही है। जायजा लेने की कोई आवश्यकता ही नहीं है। और गहराई से जायजा लेना चाहते हो, कुछ भ्रम पाल के रखे हो, तो जिस स्थान पर हो उस व्यवस्था को छोड़कर कहीं दूर अकेले चले जाओ, एकांत में, और कुछ दिनों तक किसी से संपर्क मत रखो। तो आपकी असलियत का आपको पता चल जाएगा।
जैसे यहां पर जया आई थी। जब आती थी यही कहती थी, मेरा बच्चों का मोह नहीं, पति का मोह नहीं। और जैसे ही उसके बच्चे का मैसेज आया, अश्रुधारा बहने लगी। यह कब? जब दूर जाने के बाद। एक दो दिन रुकती थी तो उसे समझ में नहीं आता था। जब सात दिन रुकना पड़ा, तब समझ में आया कि बच्चों में आसक्ति कितनी है, पति में आसक्ति कितनी है, परिवार में आसक्ति कितनी है। अगर वह सात दिन नहीं देती, एक एक दिन, दो दो दिन रुक के चली जाती, तो यह बात उसको पूरे जीवन में समझ में नहीं आती। उसे अंदर से लगता कि नहीं, मैंने सब छोड़ दिया है। तो यह भ्रम आपका तभी टूटेगा जब आप किसी जीवंत गुरु के सानिध्य में जाकर रहोगे। क्योंकि उसका अनुशासन होगा। आप अपनी लापरवाही कर ही नहीं पाओगे। करोगे तो भगा देगा, तुरंत भगा देगा।
तो एकांत में जाइए। जीवंत गुरु की शरण मिल जाए तो सौभाग्यशाली हो। लेकिन मुझे कोई ऐसा व्यक्ति चाहिए जो मेरे पर अनुशासन करे, मैं नहीं कर पा रहा हूं। अपने आप को पूरी तरह समझना है, मैं कहां कहां उलझा हूं, मैं कहां कहां फंसा हूं, तो आपको किसी जीवंत गुरु के शरण में जाना होगा। और जब तक जीवंत गुरु ना मिले, तब तक भ्रमण करो। किसकी खोज में? गुरु की खोज में। मुझे कोई गुरु मिल जाए। फिर घर बार कैसे चलेगा? घर बार का मैंने क्या कहा है, बारह महीने में ग्यारह महीने घर को दो, एक महीना अपने आप को दो। एक महीना भ्रमण नहीं किया, तो एक महीना भ्रमण करो। अपनी उचित व्यवस्था कर लो।
जैसे मान लो हम बीमार हैं, तो हम जा जा के जगह पूछते हैं कि इधर कोई अच्छा डॉक्टर है क्या, कोई क्लीनिक है क्या, कोई हॉस्पिटल है क्या। अगर हम नए जगह भी चले गए तो लोगों से पता करते हैं ना, अपने को ठीक कराने के लिए। ऐसे ही जा के पूछो तीर्थ स्थानों पर, जहां जहां ऐसे स्थान हैं, जैसे नर्मदा तट पर, जहां जहां ऐसा क्षेत्र है। वहां जाके पूछो, कोई ज्ञान देने वाला गुरु है क्या। भ्रमण करो।
महिलाएं ऐसा नहीं कर पाएंगी, ऐसा कहते हो। करना तो पड़ेगा। महिलाएं भी अपना झोला बांध के निकल जाएं। निकलना पड़ेगा भाई। आत्मिक कल्याण करना है तो निकलना ही पड़ेगा। मीराबाई भी तो महिला थीं। कई ऐसी महिलाएं नहीं हुईं क्या। निकलना तो पड़ेगा। आत्मिक कल्याण चाहते हो तो निकलना पड़ेगा।
अपनी स्थिति घर पर ही जांचना चाहो, और कोई ऐसा गुरु ना हो जिसके नियम में आज पहले अपने आप को समझूं, तो आप थोड़ा समझ सकते हो, पूरी तरह नहीं समझ सकते। थोड़ा भी कैसे समझूं, किसी का सत्संग मिले, तो या तो शास्त्रों का अध्ययन करो। आपके समझ में आना चाहिए। या किसी को समझ में आ गया है, उसके शरण में जाके रहो। कुछ तो शुरुआत करनी पड़ेगी। या तो खुद शास्त्रों का अध्ययन करो। अभी तो सोशल मीडिया हो गया है। जितने भी आध्यात्मिक हैं, जितना सुन सकते हो, सबकी वीडियो सुनो। यह व्यवस्था तो है ही। लेकिन आपको उसमें किसी तरीके से लगना पड़ेगा। अपने आप को लगाना पड़ेगा। ज्यादा से ज्यादा समय मैं उसी में लगाऊं, वो जानकारियां लूं। अपने काम से खाली होकर बस उसी में लग जाओ, किसी भी तरीके से।
लगना पड़ेगा निकलने के लिए। जैसे हमने अपने आप को फंसने के लिए लगाया। ऐसे थोड़ी फंस गए। कहीं लगाया ना, कहीं उलझाया ना। तो निकलने के लिए भी लगना पड़ेगा। मेहनत तो करनी पड़ेगी। जाना तो आपको पड़ेगा ही। चाहे स्त्री हो, चाहे पुरुष हो, निकलना तो पड़ेगा ही। और जिसको भी अपना आत्मिक कल्याण करना है, वह निकलेगा ही। चाहे कोई भी शरीर हो।
अरे, कितने पुरुष डरते हैं, बाहर निकलते ही नहीं। क्या कहोगे। कल्याण करने वालों का इतिहास आप देखिए। जिस वक्त स्त्रियां एकदम नहीं निकलती थीं, डरती थीं, उस समय भी उपलब्धि हुई। तो जिसकी खोज है वह निकलेगा। और खोज नहीं है तो बहाना क्या, कि हमें तो स्त्री शरीर मिला है, हम कैसे जाएंगे। मतलब उसे एक एक बहाना चाहिए अपने आप को छुपाने का। तो स्त्री शरीर के द्वारा छुपा लिया। और पुरुष को नहीं निकलना है तो उसने कहा, भाई मेरी जिम्मेदारी है, दायित्व है, कैसे चला जाऊं। इन लोगों को निकलना ही नहीं है। नहीं तो शरीर कभी बाधा नहीं बनेगा।
शरीर कभी बाधा नहीं बनता। हमें निकलना नहीं है, तो हमें एक बहाना चाहिए। क्योंकि हम सीधा नहीं रुक सकते। अगर बहाना मिल गया तो मेरा मैं भी खड़ा हो जाता है कि निकलना तो चाहता हूं, लेकिन करूं क्या, मुझे तो स्त्री शरीर मिला है, क्या करूं। और इतिहास में देखिए तो कितनी स्त्रियों ने अपना आत्मिक कल्याण किया, निकलीं ना घर से। तो फिर आज क्यों नहीं निकल सकते।
इसने कहा ना कि मैं पहली बार इतनी दूर यात्रा किया। डर डर के किया। अगर समझने की इच्छा नहीं होती तो कहती, नहीं, मैं तो नहीं जा पाऊंगी। प्रबल इच्छा ही इसको लेकर आई। कभी नहीं निकली थी, अब कैसे निकल गई? समझने की प्रबल जिज्ञासा।
आप एक बात बताइए। एक स्त्री हो और वो कभी ना निकली हो, अपने घर में ही हो, और परिवार में ऐसा कारण बन जाए कि उसका बालक एकदम सीरियस हो जाए। क्या आपको लगता है वो स्त्री बाहर नहीं निकलेगी? क्या वो देखेगी कि रात है? अगर दो चार किलोमीटर भी पैदल होगा तो अपने बच्चे को गोद में लेकर भाग जाएगी। उस समय ना उसे जानवर का डर होगा, ना प्रेत का डर होगा, ना मानव का डर होगा। इसलिए कि उसके बच्चे को बचाना उसके जीवन में सबसे जरूरी है। डर तभी तक है जब तक आपके लिए जरूरी नहीं है। जिस दिन आपको यह समझ में आ गया कि मेरे जीवन में सबसे जरूरी यही है, डर गया। डर काम ही नहीं करेगा। डर तभी तक काम करता है। डर हमारा एक बहाना है। हम अपने आप को बचाते हैं। डर एक बहाना है। जब जीवन में सबसे जरूरी यही कार्य हो जाएगा तो डर खत्म। डर तो तभी तक है जब तक जरूरी नहीं। जिस दिन जरूरी हो गया, वह चाहे स्त्री शरीर हो, चाहे पुरुष शरीर हो, कोई फर्क नहीं पड़ता। शरीर कभी बाधा नहीं बनता। हमें अपने आप को बचाने के लिए सिर्फ एक बहाना चाहिए, और वो मिल गया, शरीर।
धीरे धीरे वो व्याकुलता जो भोग विलास के प्रति थी, पंच प्रपंच के तरफ थी, अब आप वहां खर्च नहीं कर रहे हो। तो आप अपने आप में धीरे धीरे आ रहे हो। तो आप अपने आप को शांत पा रहे हो। मिला जुला के यह शुभ लक्षण है।
देखिए, घटनाएं आपके पास होती रहती हैं। आगे भी होंगी। पीछे भी हो रही थीं। आप देखो, क्या उन घटनाओं को रोकने का आपका अधिकार है या क्षमता है। अगर उन घटनाओं को रोकने के लिए काम कर सकते हो, तो ठीक है। नहीं तो कम से कम अपने आप को निकालने का काम कर दो। आप भावनाओं में अपने आप को मत उलझाओ। मत फंसो।
जब आपके प्रश्नों का जवाब दिया जा रहा है, तो आत्मज्ञान को ही तो व्यक्त किया जा रहा है। आत्मज्ञान का परिणाम ही तो है आपके प्रश्न के उत्तर। तो व्यक्त तो किया जा रहा है।
अब भाई, यह फूल है। इसका आखिरी नाम क्या है? फूल। लेकिन अब फूल क्या है? क्या इसका कोई जवाब है? फाइनल जवाब यह है कि ये फूल है। अब इसका उपयोग किस तरीके से करना है, करो। लेकिन कोई कहे कि यह फूल है, फूल क्या है, तो फिर क्या करोगे? आखिरी में जाकर क्या ही रह जाएगा। तो आत्मज्ञान, आत्मा से जो ज्ञान निकल रहा है, आपके प्रश्न के उत्तर निकल रहे हैं, वही तो व्यक्त हो रहा है।
अब आत्मा क्या है, यह थोड़ी ना व्यक्त किया जा सकता है। अरे, आत्मा छोड़ो। फूल दिख रहा है, फूल क्या है, बताओ। जवाब क्या है? यह क्या है? टेबल। टेबल क्या है? तो यह आखिरी है ना। आत्मा से ज्ञान निकल रहा है, आपके प्रश्न के उत्तर मिल रहे हैं, वही तो व्यक्त हो रहा है। लेकिन अगर आप पूछोगे आत्मा क्या है, तो आप बस खड़े हो गए। आप आगे नहीं बढ़ सकते। यह क्या है? टेबल है। टेबल फाइनल जवाब। अब यह किससे बना है? भाई, प्लास्टिक से बना है। अब आत्मा किससे है? परमात्मा से। यह प्लास्टिक से बना है, तो आखिरी जवाब क्या? यह आखिरी जवाब नहीं है।
तो व्यक्त हो रहा है। आपको समझना पड़ेगा। समझने के लिए बात करिए, प्रश्न करिए। नहीं तो यह क्या कभी खत्म भी नहीं होगा, और क्या में ही मर जाओगे। और फिर क्या है में जन्म ले लोगे। क्योंकि जब तक क्या है, तब तक जन्म और मृत्यु। क्या है का फाइनल जवाब नहीं है। फिर तो मैं भी क्या हूं। सारा क्या हमेशा खड़ा ही रहेगा। मैं को तो छोड़ दो। जो चीजें प्रत्यक्ष हैं, वहां भी क्या खड़ा है। प्रत्यक्ष तो मैं भी हूं। मेरा बाप क्या है? फिर मेरा दादा क्या है? वो कौन है? वो क्या है? तो क्या है में मर जाओगे। और फिर क्या है में जन्म हो जाएगा। फिर क्या है ढूंढते रहो।
इसलिए क्या है इसलिए पूछो कि भैया, यह क्या है और कैसे उपयोग करना है। यह टेबल है, तो टेबल का उपयोग क्या है। यह क्या है? भैया, यह फूल है। समझ गए। फूल फाइनल जवाब है। अच्छा, इसका उपयोग कैसे करना है? उपयोग करो, निकल जाओ। लेकिन क्या है, क्या है, क्या है, तब यही अगला शरीर। अगला शरीर, क्या है, क्या है, क्या है। ऐसे लेटे रहोगे, कभी जवाब नहीं मिल पाएगा।
क्या है इसलिए पूछो कि आपकी जरूरत है। मुझे इसलिए समझना है कि इसका उपयोग करना है। तो यह क्या है? यह टेबल है। अच्छा, इसका उपयोग कैसे करना है? बस बात खत्म हो गई। उपयोग करो, निकल लो। अब मेरी जरूरत होगी तो ही मैं पूछूंगा, नहीं तो मैं पूछूंगा भी नहीं। अब देखिए, वही तो बात है कि जरूरत है, या अपने मान के लिए पूछ रहे हो। बहुत लोग ऐसे हैं, दुकान पर जाते हैं, सामान नहीं लेना, लेकिन पूछ भाव कर रहे हैं। बहुत तरह के घूम रहे हैं। अब देखना है मैं किस तरह का व्यक्ति हूं।
यह तो आपको ही तय करना पड़ेगा कि आपको क्या चाहिए। बहुत ज्यादा झमेला थोड़ी ना है। क्या आपको हजारों ऑप्शन हैं? आप उद्देश्य पक्का ही नहीं कर पा रहे हो। दो ही तो उद्देश्य हैं भाई। एक, शादी विवाह करके प्रॉपर्टी और वैभव बनाते बनाते खत्म हो जाना। दूसरा, उससे हटकर आत्मिक कल्याण करना। दो ही तो उद्देश्य हैं। तीसरा कोई है क्या? तो यह पूछने की बात ही नहीं।
आत्मिक कल्याण मतलब क्या? आत्मिक कल्याण मतलब दुख, राग, द्वेष, मोह, आसक्ति, इच्छा, अपेक्षा, मेरा और कर्ता के भाव से मुक्त होना। जहां मैं परेशान हूं, वहां से अपने आप को छुड़ा लेना आत्मिक कल्याण है। जिससे मैं परेशान हूं, उससे अपने आप को निकाल लेना आत्मिक कल्याण है। जिन जिन चीजों से, जिन जिन व्यक्तियों से, जिन जिन मेरे कर्मों से मैं परेशान हूं, उनसे अपने आप को निकाल लेना आत्मिक कल्याण है। अपने दुखों के कारण से अपने आप को निकाल लेना आत्मिक कल्याण है।
अब मुझे यह देखना है कि मैं किसके द्वारा दुखी हूं। पहले देखना है, मैं दुखी हूं कि नहीं। अगर दुखी नहीं हो तो बात खत्म। तब तो आपका आत्मिक कल्याण हो गया, कोई टेंशन नहीं है। अगर आपके पास दुख नहीं है, तब तो आपका आत्मिक कल्याण हुआ है। कोई टेंशन लेने की जरूरत नहीं है। अब आपको लग रहा है कि नहीं, मेरे जीवन में दुख है, अशांति है, व्याकुलता है, उदासी है, बेचैनी है, घबराहट है। मैं समझ नहीं पा रहा हूं क्या करूं, क्या ना करूं। अगर यह सब बातें हैं तो देखिए किसके द्वारा हैं। अगर हैं तो किसी के द्वारा होंगी। उस द्वारा तक जाना होगा और उस द्वारा तक जाकर उसे छोड़ना होगा। द्वारा तक क्यों जाना है? उसे छोड़ना है, स्रोत को खत्म करना है। द्वारा तक जाओगे तभी स्रोत खत्म होगा। द्वारा को बस समझ लोगे तो नहीं खत्म होगा। उस द्वारा तक जाना पड़ेगा। बाहर से देखने मात्र से वह बंद थोड़ी ना हो जाएगा।
तो भाई, आत्मिक कल्याण का मतलब आप समझ गए ना। यही आत्मिक कल्याण है कि मेरे दुखों का जो कारण है, उससे अपने आप को छुड़ा लेना। यही आत्मिक कल्याण है।
अभी भाई, यह तो आपकी एक गंदी आदत है। अगर वह गंदी आपको लग ही नहीं रही, और आप यही जानना चाह रहे हो, अपनी स्थिति बुरी लग ही नहीं रही, तो कोई बात ही नहीं है। कैसे चेक करूं, यह आप ही को समझना पड़ेगा। चेक करने की बात ही नहीं। दो ही चीज हैं, अच्छा या बुरा। अगर आपको बुरा लगा ही नहीं तो छूटने की प्रेरणा मिलेगी ही नहीं।
अगर आप परेशान हो, अगर ऐसे भाव उठ रहे हैं, तो आप देखिए, इस कारण से उठ रहे हैं। तो उनके द्वारा भी कोई कर्म हुआ होगा। ऐसा तो नहीं कि बस इसने किया। उनके कारण हुआ होगा। तो मैं इसमें क्यों लिप्त हो रहा हूं? और इसका परिणाम क्या आएगा? क्या मैं परिणाम भोगने के लिए तैयार हूं? क्योंकि कुछ करोगे तो उसका परिणाम भी है। अगर परिणाम भोगने के लिए तैयार हो तो करो। उसका परिणाम मिलेगा। और अगर लगे कि परिणाम तो बड़ा भयानक है, तो वो काम मत करो। बस, बात खत्म।
समझना आपको पड़ेगा। समझ के आपको कोई घसीट के नहीं ले जाएगा। समझना आपको पड़ेगा कि यह करने से क्या होगा। परिणाम को समझना पड़ेगा कि मैं अगर कुछ कर रहा हूं तो उसका एक परिणाम है। क्या मैं इस परिणाम को भोगने के लिए तैयार हूं? तो करो, भोगो। सीधी सी बात है। नहीं, यह परिणाम तो मुझे नहीं भोगना है, तो मत करो। और अगर उनके साथ कुछ किया होगा, हमारी पीढ़ियों के साथ, तो उनका भी ऐसा बर्ताव रहा होगा। देश, काल, स्थिति, परिस्थिति अलग रही होगी। हमें समझ के अपने आप को छुड़ा लेना है।
देख, जैसे तुझे कोई ऐसा रोग हो जाए जहां जिंदगी और मौत की बात हो, तो तुम्हारा हर समय चिंतन कहां होगा? कि मैं कैसे ठीक हो जाऊं। सोते-जागते, उठते-बैठते, तुम्हारा बालक बीमार हो जाए और जीवन-मौत की बात हो, तो तुम दुनिया के किसी कोने में रहो, हर सुख-सुविधा में एक ही बात का चिंतन रहेगा कि तुम्हारा बेटा कैसे ठीक हो जाए। क्या तुम उसका सुख ले सकते हो? अगर तुम्हारा एक पुत्र हो और वह हॉस्पिटल में जन्म-मृत्यु की शय्या पर लेटा हो, तो क्या तुम्हें लगता है कि दुनिया का जितना भी सुख दिया जाए, तुम उस सुख में लिप्त हो सकते हो? नहीं हो सकते। आत्मचिंतन कहां रहेगा आपका? वहां रहेगा। एक ही भाव बना रहेगा कि कैसे वह ठीक हो जाए। और जैसे वह ठीक हो जाएगा, फिर आप हर सुख लेने लगोगे।
बस एक ही बात समझ लो कि मुझे मेरा आत्मिक कल्याण करना है। और आत्मिक कल्याण के लिए मुझे राग, द्वेष, मोह, आसक्ति, इच्छा, अपेक्षा और कर्ता के भाव से छुड़ाना है। बस यही तो आत्मिक चिंतन होगा। करना नहीं पड़ेगा। अभी आपको यह जरूरी समझना है कि मुझे मेरा आत्मिक कल्याण करना है, तो आत्मिक चिंतन होगा। तुम्हारे लिए जीवन में सबसे जरूरी क्या है, उसी पर चिंतन होगा। आपके लिए जो जरूरी होगा, उसी पर चिंतन होगा।
एक जरूरत मेरे द्वारा पैदा हुई है, एक दूसरे के द्वारा पैदा हुई है। दूसरे के द्वारा पैदा हुई जरूरत नहीं टिकेगी। जैसे दूसरे का बच्चा बीमार हो जाए तो सांत्वना तो देंगे, लेकिन चिंतन नहीं होगा। खुद का बीमार हो गया तो चिंतन ज्यादा होगा। जब अपनी समझ से तू समझ जाएगा कि मानव तन मिला है, मेरा आत्मिक कल्याण ही मेरे जीवन का उद्देश्य है, मैं इसीलिए जन्मा हूं, तो तू आत्मिक कल्याण के बिना रह ही नहीं पाएगा। आत्मिक चिंतन होगा, करना नहीं पड़ेगा। जीवन में जो हमारे लिए सबसे जरूरी होता है, उसी पर चिंतन होता है। आप चिंतन पैदा नहीं कर सकते। जो जरूरी है, वहीं आप लगे रहो। अपने आप वहीं लगे रहोगे। जबरदस्ती अपने आप को लगाना चाहोगे तो लग ही नहीं सकता।
अगर भूख लग गई तो भूख आपकी जरूरत है, भोजन के लिए चिंतन बनेगा। प्यास लग गई तो पानी के लिए चिंतन बनेगा। यह नहीं कि प्यास लगी हो और मैं भोजन के लिए चिंतन करूं। तुमने अपनी जरूरत क्या पैदा की है, वही देखो। जैसी तुम्हारी जरूरत है, उसी पर चिंतन होगा। चिंतन करना नहीं पड़ता। चिंतन करना पड़ रहा है, जबरदस्ती अपने आप को लगाना पड़ रहा है, इसका मतलब एक नया नाटक रच रहे हो, और होगा कुछ नहीं।
सत्संग सुनकर धीरे-धीरे याद हो जाएगा। राग, द्वेष, मोह, आसक्ति, इच्छा, अपेक्षा और कर्ता के भाव से मुक्त होना है। और उसके लिए छल, कपट, चोरी, बेईमानी, चापलूसी, मक्कारी, धूर्तता और पाखंड नहीं करना है।
यह प्रत्यक्ष ज्ञान पहले उतरेगा। उतारना इतना आसान नहीं है। शब्दों में इसको किताब पर उतारना इतना आसान नहीं होता। अब तक छप जाती। जिस दिन उतरना होगा, उस दिन उतरेगी।
कहीं भी बैठ जाओ, हर वक्त बैठ जाओ, तो यही चिंतन करना ही है। हर वक्त यही याद रखना कि मैं इस दुख के भवसागर से अपने आप को कैसे निकालूं। तू पूर्ण है। पूर्ण है, अपूर्ण को धारण किया है। यह भी सही है। अगर तू यह भाव पक्का कर लेगा कि मैं इस भवसागर से अपने आप को कैसे निकालूं, तो निकालने की क्षमता आने लगेगी। क्षमतावान तुझे मिलने लगेगा। तेरी क्षमता बढ़ने लगेगी। तो तुझे बस एक ही भाव बनाना है कि मैं इस भवसागर से कैसे अपने आप को निकालूं। यह दुख का भवसागर है।
क्योंकि जितना मैंने किया, पहले मुझे समझना पड़ेगा। अभी शुरू से लेकर जब तक मैं समझने लायक हुआ, अभी तक जितना भी किया, उससे मुझे क्या मिला? दुख। दुख मिला, फंसता ही गया। यह समझना पड़ेगा कि मुझे दुख ही मिला। मैं अपने सारे सुख की खोज में गया था, लेकिन मेरा आखिरी परिणाम दुख ही मिला। तो बस इस दुख से मैं कैसे छुटकारा पाऊं, इस पर चिंतन करना है। तब तुझे मार्ग मिलता जाएगा। इस पर गहरा चिंतन करना है कि मुझे इस भवसागर से निकलना है। यह किसका भवसागर है? दुख का। दुख के भवसागर से। क्योंकि कितना दुख है, तुम्हें भी नहीं पता। इसलिए इसे भवसागर कहा गया है। इसका न आदि है, न अंत। तो मैं कैसे इससे अपने आप को निकालूं, इसके लिए चिंतन करना है।
अब इसके लिए क्या-क्या करना है, निकालने के लिए, सत्संग में बताया जाता है। लेकिन पहले निकालने वाले भाव को प्रबल करो। अगर निकालने वाले भाव को प्रबल करोगे, तो कैसे निकालना है, वह सत्संग के द्वारा समझ जाओगे। और निकालने वाला भाव अगर प्रबल नहीं होगा, तो सत्संग सुनकर भी कोई मतलब नहीं होगा। तो बस एक ही बात पर जोर दो। विशेष ध्यान दो कि मुझे इस दुख के भवसागर से अपने आप को निकालना है। मुझे अपने आप को छुड़ाना है। इस पर जोर डालो। जहां फंसा हूं, वहां से मुझे निकलना है।
अब मुझे दुख के भवसागर से निकालना है, तो फिर नया राग-द्वेष बनाना भी नहीं है। यह नहीं कि मैं एक तरफ रसपान भी ले रहा हूं, राग को बढ़ावा भी दे रहा हूं, और निकालने का नाटक कर रहा हूं। जब निकालने का भाव आ गया, तो आगे पैदावार बंद कर दो राग-द्वेष की। किसी के प्रति न राग होना चाहिए, न द्वेष होना चाहिए। जरूरत में जियो। और इस भाव को प्रबल करो। और नए राग-द्वेष बनाना बंद करो।
देखो, बारह साल अगर पूरी तरह लगातार छोड़कर रहेगा तो होगा। घर छोड़कर मेरे पास ही रहेगा। पूरी तरह मेरे पास रहकर लगे रहेगा। पता चला मेरे पास है, लेकिन प्रपंच में है। रात-दिन थोड़ी न उसके साथ हूं। पूरी तरह नियम का पालन करते हुए रहेगा। नियम जो लिखा है, अगर उसमें रहेगा तो बारह के अंदर ही हो जाएगा। लेकिन पूरी तरह रहकर, नियम का पालन करते हुए।
पता चला एक साल नियम का पालन किया और दूसरे साल में तोड़ दिया, तो एक साल पूरा गया क्या? जैसे आप एक सब्जेक्ट में फेल हो गए, तो एक साल पूरा गया न। फिर वहीं से पढ़ोगे न। अब एक-एक महीना के लिए कोई आएगा, तो भाई वह दो जगह लगा है न। इधर भी लगा है, उधर भी लगा है। अभी एक महीना के लिए आ रहा है। ग्यारह महीना तू वहां अपने आप को लगा रहा है। तो ग्यारह महीने में बहुत गलतियां हो रही हैं न उससे। वहां तो गलतियां ही होती हैं, ज्यादा। तो बारह साल तो नहीं, लेकिन कभी न कभी कल्याण उसका भी होगा। और अगर एक महीने के लिए आता रहेगा, अपने दायित्व और कर्तव्य को निभाकर हमेशा के लिए आ जाएगा। अगर एक-एक महीना के लिए आने लगा, तो उसकी मजबूती हो जाएगी। धीरे-धीरे वह वहां अपने दायित्व और कर्तव्य को पूरा करके छोड़कर, फिर इधर आ जाएगा।
लेकिन अब उसको बारह साल थोड़ी न। मैंने क्या बोला? जब पूरी तरह आप लगते हो। कुछ संचय नहीं करना है। और बारह साल पूरी तरह लगते हो, तब होगा, बारह साल में। पूरी तरह लगने के बाद वह भी बारह के अंदर ही हो जाएगा। लेकिन पूरी तरह लगने के बाद, फिर और कोई काम नहीं, तब होगा। अब एक महीना यहां दोगे, ग्यारह महीना वहां दोगे, तो ग्यारह महीने में बहुत कुछ हो जाएगा न। हो गए तुम्हारे प्रश्न के उत्तर।
अब तुम्हें देखना है कि डर क्यों है। डर तुम रहे हो। गुरु तो ऐसा कोई काम नहीं कर रहा है कि तुम डरो। वह तो खुलकर जी रहा है तुम्हारे सामने। तो डर का कोई सवाल ही नहीं उठता। तुम डरे क्यों हो, यह तुम्हें देखना पड़ेगा। डर होना ही नहीं चाहिए। लेकिन मर्यादा होनी चाहिए। डर रहे हो तो इसका मतलब अभी तुम समझे नहीं, और प्रबल जिज्ञासु नहीं हो।
डर तुम्हें इसलिए रह गया कि कहीं कुछ ऐसा न हो जाए, कुछ डांट सुननी पड़े, कुछ गलत हो जाए। कहीं न कहीं तुममें लापरवाही है, कमी है, कि कुछ हो न जाए, इसलिए तुम डरते हो। तो उसको हटाओ। अपने आप को इतना ताकतवर बनाओ कि तुमसे गलती या अपराध हो ही नहीं।
मर्यादा का मतलब गुरु के आदेश में जीना। उसके पूरे नियम में जीना। यही मर्यादा है। मर्यादा का मतलब, मैं जिसके लिए आया हूं वही करूं। और जितना उसने बता दिया, उतने में मैं रहूं। बस यही मर्यादा है।
तुम पूरी तरह यहां के नियम में जिए हो, कह सकते हो? तो तुम प्रश्न न करो। तुम पीछे चले जाओ। न जीने का कारण बता सकते हो? क्यों नहीं रहे नियम में? बोलने के लिए मना था, फिर भी बोले। क्यों बोला? तुम्हें यहां कोई जवाबदारी है? तुम्हें कुछ करना है? अरे, तुम खाकर अपना आत्मिक कल्याण नहीं कर सकते, तो तुम्हें करना होगा क्या? तुम अपना आत्मिक कल्याण करोगे जब तुम्हें सारी व्यवस्था देने के बाद यहां कुछ सोचना ही नहीं है। क्या आपको कुछ सोचना ही नहीं है? और फिर आप नियम में नहीं रह रहे हो। अगर तुम्हें सोचना पड़ता, सारी व्यवस्था करके अगर साधना करनी पड़ती, तो तुम्हारा क्या होता? बोलो तो। क्यों नहीं नियम में रहे? उसका कारण क्या है, बताओ।
तुम्हारी जिंदगी से आत्मिक कल्याण बड़ा दूर है। जिस चाल से चल रहे हो, लाखों जन्म में भी संभव नहीं है। क्या तुम्हें लगता है नियम तोड़ना अनिवार्य था? जरूरी था? टूटने का कोई कारण था? बोलो। जवाब दो। समय मत बर्बाद करो। उसके पीछे कोई कारण है? क्या कारण था उसके पीछे? एक व्यक्ति तुम्हारे लिए दिन-रात लगा है, कि तुम्हारा कैसे आत्मिक कल्याण हो जाए। तुम्हें यहां सोचना भी नहीं है। चाहे तुम आजीवन रहो। तुम्हारे घर पर एक-दो दिन के लिए मेहमान आ जाए, तो एक दिन, दूसरे दिन सोचोगे कि तीसरे दिन कब जाए। या तुम कहीं चले जाओ। परिवार में भी अगर तुम कुछ न करो और तुम रहो, तो वह भी तुम्हें बर्दाश्त नहीं करेंगे। तुम्हारे मां-बाप भी। और एक व्यक्ति जंगल में तुम्हारे लिए सारी व्यवस्था कर दी है, कि कैसे भी तुम्हारा आत्मिक कल्याण हो जाए, वह भी तुम नहीं कर रहे हो। तुम कितने गए-गुजरे हो। तुम सोच भी नहीं सकते।
यह एक व्यक्ति तुम्हारी व्यवस्था के लिए हर वक्त लगा है। आप दो-चार परिवार पालते हो तो आप पूरी जिंदगी परेशान रहते हो। दिन-रात काम करते रहो तो भी तुम्हारा कभी भरा नहीं। आपको एडजस्टमेंट ही करना पड़ता है। बचा-बचाकर ही करना पड़ता है। और यहां आपको पूरी तरह छूट है। आपको सोचना ही नहीं है कुछ। व्यवस्था के लिए सोचना ही नहीं है। सारी व्यवस्था मिलने के बाद भी, एकांत से लेकर सत्संग से लेकर, भोजन से लेकर रहने तक, सारी व्यवस्था मिलने के बाद भी तुम अपना आत्मिक कल्याण नहीं करते। मतलब तुम अपने लिए नहीं जी सकते, और वह व्यक्ति तुम्हारे लिए जी रहा है। हम भी तो जंगल में पड़े हैं। हम तुम्हारे लिए पड़े हैं, और तुम अपने लिए नहीं पड़ रहे हो। और कह रहे हो, मैंने नियम तोड़ दिया। नियम टूटने का कोई आधार है क्या? बताओ, क्यों तोड़ना पड़ा? क्या तुम्हें यहां कोई कमी थी? क्या कमी को पूरा करने के लिए तुमने नियम तोड़ा? नियम तोड़ो या पालन करो, हानि-लाभ किसको होगा? तुम्हें होगा। मुझे थोड़ी न होगा।
अगर तुम नियम में भी रहे तो लाभ तो तुम्हें ही होने वाला है। नियम तोड़ोगे तो हानि तुम्हें होने वाली है। मैं तो उससे बड़ा दूर हूं। मैं तो तुम्हें एक व्यवस्था दिया हूं। मैं तुम्हें अभी भी सचेत कर रहा हूं कि आप इस व्यवस्था का सदुपयोग करो। नहीं तो यह भी छीन लिया जाएगा। जिससे बात की, उसका भी नियम टूटा। अगर तुम नहीं बात करते, तो उसको नियम तोड़ने का मौका नहीं मिलता। अगर वह प्रयास भी करता, तो तोड़े किसके साथ? आप जहां भी गए हो, जिसके लिए गए हो, सिर्फ वही करो। इस जगह पर, इस कुटिया का निर्माण आत्मिक कल्याण के लिए हुआ है। ये व्यवस्थाएं उसके लिए हैं जिसको आत्मिक कल्याण करना है। आपको बात करने के लिए पूरी दुनिया पड़ी है। जाओ, सब खोज रहे हैं। तुम्हें कितने लोग मिलेंगे? नहीं मिलेंगे क्या? यहां क्या जरूरत पड़ गई? यहां जरूरत नहीं है।
अभी भी कद्र करो। नहीं तो एक दिन सब हाथ से छूट जाएगा। सिर्फ रोने के अलावा कुछ नहीं रहेगा। अगर कुछ मिलता है, उसका कद्र करना सीखो। तुम प्रश्न के लायक हो? तुम्हें लगता है कि तुम प्रश्न के लायक हो? तुम तो यहां रहने के लायक भी नहीं थे। लेकिन फिर भी मैंने कहा, जाने दो। नियम टूटा है, कोई बात नहीं, रहने दो, सुधर जाएगा। तुम प्रश्न के लायक अभी नहीं हो। अभी प्रश्न के लायक बनो।
यहां पर ऐसी कोई बात ही नहीं है कि नियम तोड़ना पड़े। न कोई मालिक है कि आपको कुछ पूछना हो, उसका आदेश लेना हो, या रोज आकर मुझे माथा टेकना हो। ऐसी कोई बात नहीं है। नहीं कि मुझे देखते ही उड़ जाना है, ऐसा भी कोई बात नहीं है। यहां इतनी स्वतंत्रता है कि यहां कोई मां ही नहीं है। सब अपने-अपने काम में लगे हैं। मैं अपने काम में लगा हूं। आप लोग अपना काम करिए। किसी से कोई मतलब भी नहीं है कि मुझे देखकर तुम्हें उठना ही है। मेरा तो बस एक ही कहना है कि आप जिसके लिए आए हो, उससे ही मतलब रखो। मुझसे भी मत रखो। मेरे शब्दों से मतलब रखो बस। क्योंकि इन शब्दों के द्वारा ही कल्याण छिपा हुआ है। इस शरीर से कोई मतलब मत रखो। इतनी स्वतंत्रता में भी तुम भटक रहे हो। न कोई दबाव है, न कोई मालिक है। न ऐसा है कि सुबह-शाम उठकर तुम्हें माथा टेकना है। पता चला बैठे हो, सामने मैं निकला, आकर माथा टेक दो, ऐसी कोई बात ही नहीं है। इतनी स्वतंत्रता के बाद भी तुम कह रहे हो, मैं गिर रहा हूं। आप सोचो, मैं कहां हूं। आप कल्पना करिए कि तुम कहां हो।
ये लोग जब एक साल के अंदर आए थे, तो मैं सोलह-सोलह, अठारह घंटे सत्संग करता था। सब सोए हुए थे यहां। मैं सुबह उठ गया। मैं लगभग दो बजे सोया था। सुबह पांच, साढ़े पांच बजे इनको उठकर बिस्किट खिलाया। कहा, पानी पी लो बेटा, आराम से जाना। पता नहीं आप लोग कब किसी की मेहनत को समझोगे। कितने गए-गुजरे हो। दो बजे व्यक्ति सोया है और पांच बजे उठकर इसको बिस्किट दे रहा है। और दिन भर वह काम किया है। तुम लोग सच में बहुत गए-गुजरे हो। तुम कल्पना भी नहीं कर सकते। तुम जैसे हो, वैसे ही सामने वाले को समझते हो। मैं सोच रहा हूं, कैसे तुम लोग अपना आत्मिक कल्याण करो। पहले ज्ञान खोजा, अपनी जिंदगी लगाकर। फिर मैंने यह व्यवस्था की। कैसे-कैसे कर रहा हूं, मुझे पता है। और तुम लोग आकर ठिठोली मार रहे हो, गप मार रहे हो। यह शर्म की बात है। सोचो, सोलह घंटे। दो बजे रात को सोने गया, सुबह पांच-साढ़े पांच इसके लिए उठ गया। मैंने नहीं कहा था कि मैं उठूंगा। लेकिन मैंने कहा, नहीं, यह जा रहा है। इसे यह नहीं लगना चाहिए कि मैं अनजान जगह से जा रहा हूं। एक व्यक्ति का जीवन लग रहा है। क्या देखकर, क्या समझकर उसने ऐसा किया, और तुम लोग उसका उपयोग नहीं कर पा रहे हो। कितने गए-गुजरे हो। तुम सोचो अपने बारे में।
फिर मैं उठकर कह रहा हूं, आराम से जाना, अपना ख्याल रखना। एक आदमी कहां-कहां झांकेगा, बताओ? तुम सोच नहीं सकते। तू कितना गिरा हुआ आदमी है। और तेरी ऐसी दुर्दशा होने वाली है, तू कल्पना भी नहीं करता। अभी भी समय है तेरे पास। मैंने यहां एक भी ऐसी चीज नहीं रखी कि आपको किसी से कहना पड़े। किसी वस्तु पर ताला लगा हो, ऐसा नहीं। सब खुला है। यहां एक भी ऐसी कमी नहीं जिसे आपको बोलना पड़े। मैंने व्यवस्था में कोई कमी छोड़ी ही नहीं। पता नहीं आप लोग कब समझोगे।
मैं इस पृथ्वी पर जितना ज्ञान हो सकता था, सब कुछ समझकर प्रत्यक्ष ज्ञान लाया, उतारा। मैंने मांगा कि इतना सरल ज्ञान दो कि हर व्यक्ति इस भवसागर को पार कर ले, आत्मिक कल्याण कर ले। फिर इसके बाद अनेकों आश्रम देखे। हर आश्रम से कुछ अलग लेकर मैंने यहां निर्माण किया। आप इतनी संस्थाओं में गए हो। एक संस्था ऐसी है क्या, बताओ, जहां ऐसी व्यवस्था हो? नहीं है। मैंने बारह साल के भ्रमण के बाद अपनों की कुटिया का निर्माण किया है। और मैं बहुत सोच-समझकर किया हूं। अगर ऐसा स्थान होता तो मैं नहीं करता। प्रत्यक्ष ज्ञान होता तो मैं नहीं लाता। था, तो लाने की क्या जरूरत थी? मैंने बहुत सोच-समझकर ऐसा ज्ञान, ऐसी व्यवस्था लाई है। मेरा भाव है, कम से कम तुम उपयोग तो करो। तुम अपने लिए उपयोग नहीं कर सकते। जिसने तुम्हें सहारा दिया, तुम्हारे आत्मिक कल्याण के लिए, उसी को तुम रुला रहे हो। तुम कितने गिरे हो?
तुम इन आंसुओं की भरपाई कर सकते हो? क्योंकि ये आंसू कामनाओं और वासनाओं में नहीं गिरे हैं। ये प्रेम के आंसू हैं। इसकी भरपाई तुम कहां करोगे? ये आंसू किसी उम्मीद में नहीं गिरे, कि तुमने उम्मीद पूरी नहीं की इसलिए गिरे। तुम्हारे लिए गिरे। तुम्हारे अपराध पर गिरे। तो तुम इस आंसू की भरपाई कैसे करोगे? और भरना पड़ेगा तुम्हें। क्योंकि जिसके पास आए, जिसकी शरण ली, और तुम उसी को रुला दोगे, तो तुम्हें भरना ही पड़ेगा। और तुम्हारे भरने में लाखों जन्म चले जाएंगे। इस आंसू की भरपाई के लिए तुम्हें लाखों जन्म लग जाएंगे। तुम आंसुओं को ऐसे न समझ लेना। जिसने शरण दी, तुम्हारे लिए शरण दी, और उसे चाहिए कुछ नहीं। और तुम उसी को रुला दो, तो क्या होगा तुम्हारा? तुम्हारी कल्पना से परे।
आंसू मुझे इसलिए आते हैं कि तुम्हारी फिक्र है। अगर मुझे फिक्र नहीं होती, मुझे यह आश्रम बनाना नहीं होता, यह सब नहीं बनाना होता, तो मुझे आंसू भी नहीं आते। तुम चाहे नियम तोड़ो, चाहे कुछ भी करो, हमको क्या मतलब? तुम्हारी फिक्र है। इसलिए आंसू आ जाते हैं कि तुम्हें तुम्हारी फिक्र नहीं है। पता नहीं तुम कैसे हो। एक अनजान व्यक्ति को तुम्हारी इतनी फिक्र। मैं इसका नाम भी नहीं जानता। कहां से आया, यह भी नहीं पता। एक अनजान व्यक्ति को इतनी फिक्र है, और तुम्हें तुम्हारी फिक्र ही नहीं है। तुम कहां जी रहे हो? तुम कहां हो? अगर फिक्र होती तो तुम नियम कभी नहीं तोड़ते।
जब हम एक साल सेवक रूप में थे, तो साधक लोग खा लें, उसके बाद मैं खाऊं। पूरी तरह जिस नियम में साधक रहे, उसी में मैं भी रहा। जैसा नाश्ता उनको मिले, वैसा मुझे मिले। वह काढ़ा पिए, मैं काढ़ा पिऊं। लेकिन उनके बाद। एक दिन की घटना है। वे लोग भोजन करने जा रहे थे। मैं भी भोजन करने जा रहा था। मुझे पता चला कि मैंने कौर जल्दी उठा लिया, और मुझे आंसू आ गए। मुझे बहुत पश्चाताप हुआ। फिर मैंने कहा, नहीं, अब जब देखूंगा कि ये लोग खा रहे हैं, तब मैं जाऊंगा खाने। शरीर भोजन मांगे, क्योंकि मैं इतना काम करता था। रात को जाऊं तो भूख लग जाए। लेकिन मैं पहले खाऊं ही नहीं। अपने आप को कहां रखा था। मुझे कोई देखने वाला थोड़ी न था। लेकिन मैं तो था। मैंने अपने आप को पकड़ लिया। तोड़ने से पहले ही देख लिया। तुम क्यों तोड़ रहे हो? जरा सोचो। तुम्हें नहीं लगता कि तुम्हें जवाब भी देना पड़ेगा? तुम्हें एक दिन खड़ा किया जाएगा। आप यह मत समझना। आपको एक दिन खड़ा किया जाएगा, और पूरा हिसाब-किताब देना पड़ेगा। और उसी निर्णय पर आप आगे जाओगे। आप यह मत समझना कि जैसा चाहो वैसा जी लिया, निकल लूंगा। नहीं। एक दिन ऐसी जगह खड़े होगे जहां हिसाब दोगे। उस हिसाब में पता चलेगा कि आप कहां जाओगे।
तुम्हें अभी पता नहीं है, तुम कितने नीचे गिर रहे हो। इस आंसू की भरपाई कर देगा क्या? इसके बस में है क्या? जब भरना होगा, तभी पता चलेगा। अभी समझ में थोड़ी आएगा। आपका जैसा कर्म है, उसी हिसाब से आप आगे जाओगे। वही आपको ले जाएगा। जब हिसाब होगा, अपना हिसाब तुम ही लगा लो, कि अभी तुम कहां जाओगे। एक दिन बैठकर अपना हिसाब करो। गुणा-भाग करो। तुम अपने आप को नरक के द्वार पर ही पाओगे। करके देख लो। नरक का द्वार मतलब दुख का भवसागर। दुख, घुटन, व्याकुलता, उदासी, तड़प, बेचैनी, चिंता, असाध्य रोग। असाध्य रोग मतलब जिसका इलाज ही नहीं। वहां तुम अपने आप को पाओगे।
अभी भी समय है। सोचो। जिसने शरण दी, मैं उसका नाम भी नहीं जानता। जिसने शरण दी, सारी व्यवस्था की, कि तुझे कोई कमी नहीं होगी, तू आराम से रह। उसको रुलाकर जा रहा है। इसका क्या होगा? मैं देख पा रहा हूं। तुम्हारे लिए आंसू मतलब पानी है। मैं समझ रहा हूं कि इसका क्या होगा।
कहा गया है, जस करनी तस भोग, विधाता। नरक जाते ही तुम पछताते। तुम तो तब पछताते हो जब हो जाता है। लेकिन उसके पहले तुम्हारे पास समय था। कर्म पहले है, परिणाम बाद में आता है। काश जब कर रहे थे तभी संभल जाते। उस समय तो मजा ले लेते हो। बाद में जब नरक जाते हो, तब पछताते हो। फिर क्या होने वाला है? भोगो। पता नहीं कितना भोगोगे। चौरासी लाख योनि कही गई है। सोचो, एक-एक योनि की आयु कितनी होती है। ऐसे जीव हैं जो हजार साल से भी ऊपर जीते हैं। इतना हमने खोज किया है। पता नहीं इससे भी ज्यादा होंगे। चौरासी योनियों में जाओगे तो कितने लाखों साल ऐसे रहोगे। कल्पना भी नहीं कर सकते।
पालतू जानवर की बात अलग है। जंगल में रहने वाले जानवर जब बीमार पड़ते हैं, क्या कोई इलाज करवाता है? सड़कर मर जाते हैं। तड़प-तड़पकर मर जाते हैं। जंगल का जानवर पूरी जिंदगी डर में, सदमे में जीता है। उसके पीछे कर्म ही है। यह मानव तन मिला है। अभी भी संभल जाओ। अपने उद्धार में लग जाओ। नहीं तो एक दिन चला जाएगा। योग करने आए थे, भोग करने लगे। योग की जगह भोग हो रहा है, तो क्या परिणाम मिलेगा? बात करके कुछ रसपान ही लिया। कोई जरूरत तो थी ही नहीं। पहले उसके नियम को स्वीकार करता हूं, फिर धीरे से नियम तोड़ता हूं। काश तू पहले ही कह देता कि मैं नियम में नहीं रह सकता। रखना हो तो रखो, नहीं तो मत रखो। लेकिन तू इतना भी ईमानदार नहीं। पहले स्वीकार करता है कि पूरी तरह नियम में रहूंगा, फिर छुप-छुपकर नियम तोड़ता है। नियम टूटने के बाद आकर खड़ा हो जा, बता दे कि नियम टूट गया, मुझसे अपराध हुआ। इतने दिन का समय भी मिला। अगर टूटने के बाद व्यवस्थापक के पास जाकर कह दे कि नियम टूट गया, अब बताओ मैं क्या करूं, दंड क्या है, इतना ईमानदार हो तो नहीं गिरेगा। किसी का प्रभाव हावी हुआ, चाहे मेरा चाहे उसका। ईमानदार होता तो जाकर बोल देता। देख लो क्या कर रहे हो। सबका हिसाब देना पड़ेगा।
यह मत समझना कि बुरा किया, अच्छा कर दूंगा, सेटिंग हो जाएगी। नहीं। एक का अलग भोगना पड़ेगा, दूसरे का अलग। प्लस-माइनस नहीं होता। तुम प्लस-माइनस के चक्कर में हो। तुम्हारे जीवन में प्लस-माइनस होते हैं। प्रकृति के हिसाब में प्लस-माइनस नहीं होता। कृष्ण के माता-पिता ने क्या ऐसा सत्कर्म किया था कि कृष्ण जैसा पुत्र हुआ? कुछ सत्कर्म उसके पीछे रहा होगा। और क्या ऐसा दुष्कर्म किया होगा कि छह पुत्र उनके सामने पटककर मारे गए? रामकृष्ण परमहंस को उपलब्धि हुई, वह सत्कर्म का फल था। कैंसर से तड़प-तड़पकर गए, वह दुष्कर्म का फल था। महापुरुष भी नहीं बचता। दोनों का परिणाम अलग-अलग मिला। यह मत सोचना कि माइनस और प्लस कट जाता है। एक-एक का हिसाब करना पड़ेगा। बचकर निकल ही नहीं सकते।
तुम सोचते हो, सिस्टम से छुपकर कुछ कर लूंगा। सारा सिस्टम तुम्हारे अंदर फिक्स है। कैमरा लगा है। तुम समझते हो, किसी ने नहीं देखा, चुपके से कर लूं। देखने वाला मुख्य तो तुम ही हो। तू देखकर ही कर रहा है। अपने से छुपाकर कोई कुछ कर सकता है क्या? तू बचेगा नहीं।
बस पूछ लिया। कैसे पता चले कि हम अध्यात्म में हैं कि नहीं? तू अध्यात्म में है? तू इंसान तो सही से है नहीं। अध्यात्म की कल्पना ही मत कर। तू उससे कोसों दूर है। तू संसार के लायक अभी नहीं है। नॉर्मल जिंदगी के लायक नहीं है। जिसकी शरण में है, उसी से विश्वासघात कर रहा है, तो अध्यात्म कहां। प्रश्न पूछ लेने से आध्यात्मिक थोड़ी हो गए। जब प्रश्न पूछो, तो देखो कि उस उत्तर के लायक भी हो या नहीं। क्या यह प्रश्न तुम्हारी योग्यता का है, कि बस ऐसे ही पूछ लिया? जैसे किसी वस्तु का नाम ले लिया। क्या तू उस वस्तु के लायक है? गाड़ी का नाम ले लिया। देख, तू उस गाड़ी के लायक भी है क्या? लेने की बारी आएगी तब क्या होगा? आत्मिक कल्याण करने की बारी आई तो कर पाएगा क्या? नहीं कर पाएगा, तो क्यों पूछ रहा है? सामने वाले का समय क्यों बर्बाद कर रहा है? तेरे समय की कीमत नहीं है, तो कम से कम सामने वाले को समझ। अलग-अलग शोरूम में जाकर गाड़ियां देखता है, लेना कुछ नहीं है, सबका समय बर्बाद करता है।
जिस प्रश्न को पूछ रहा है, क्या उसके लायक है? उत्तर को पचा पाएगा क्या? पूछने से पहले देख, क्या मैं इस प्रश्न के लायक हूं? उत्तर मिला तो संभाल लूंगा क्या? जीवन में उसका उपयोग कर पाऊंगा क्या? बस ऐसे ही नहीं। अपनी सामर्थ्य के अनुसार पूछना चाहिए। अपनी सामर्थ्य जांचो। सामर्थ्य के अंदर पूछोगे तो उन्नति होगी। मैं कुछ कहने जा रहा हूं, कुछ पूछने जा रहा हूं, तो मेरी सामर्थ्य इस कहने की है या नहीं, इस पूछने की है या नहीं। ऐसे ही किसी का समय बर्बाद मत करो। नहीं तो उस समय की भी भरपाई करनी पड़ेगी, जो बिना मतलब ले लिया। यहां सबका हिसाब होता है।
कहानी सुनी होगी। कहानी सही है या गलत, मुझे मतलब नहीं। सुदामा चावल ले गए। कृष्ण ने एक मुट्ठी खाई, कहते हैं एक लोक दे दिया। दूसरी मुट्ठी खाने गए तो रुक्मणी ने हाथ पकड़ लिया। कृष्ण बोले, भूल गईं क्या? वह बोलीं, प्रभु, सब दे दोगे क्या? यह बात सुदामा को पता नहीं। उनके बीच की बात है। सुदामा खुद न खाकर तुम्हें खिला गया था, उसकी भरपाई तो करनी पड़ेगी। आगे से आदिशक्ति, जगतजननी कर रही हैं। जब वह यहां का खाकर नहीं बचे, तो तुम खाकर बच जाओगे? आधे चावल का हिसाब देना पड़ा। सुदामा की पत्नी जबरदस्ती भेजती है। साढ़े तीन मुट्ठी लेकर जाते हैं। समझना यह है कि एक-एक कण का हिसाब देना पड़ेगा। एक-एक अन्न का हिसाब देना पड़ेगा। यह मत समझना कि खा लिया, हो गया। यहां से तब निकलोगे जब एक-एक कण का हिसाब हो जाएगा, लेन-देन खत्म होगा। दाने-दाने पर खाने वाले का नाम लिखा है, यह कहते हो। नाम लिखा है तो भरना भी पड़ेगा। इसलिए सोच-समझकर जीवन जियो।
आने वाले साधकों से, जिज्ञासुओं से, यही कहता हूं। यहां के नियम में रहना। पूरी तरह आकर। मुझसे भी मतलब मत रखना। मेरे द्वारा जो शब्द निकल रहे हैं, उनमें जीना। उसी में कल्याण है। नियम में जीना। नियम सर्वोपरि है। नियम में ही उद्धार छिपा है। आगे जैसा करोगे, वैसा परिणाम सामने आएगा। मैं रहूं या तुम रहो। एक समय आएगा, हिसाब-किताब होगा। तब देख लेना क्या होगा। वहां नहीं बचोगे। आज समाज की नजर से बच जाओगे, भीड़ से बच जाओगे। हिसाब के समय नहीं बचोगे। पूरी भरपाई करनी पड़ेगी। उसी हिसाब से आगे जाओगे।
तू तो एक साल तक बोल मत। एक साल का समय दिया था न। एक साल तक तुझे कुछ नहीं करना है। आकाशवृत्ति से यहां जो मिलता है, उसी में जीना। किसी से न बात, न चीत। एक साल मैंने बोल दिया था। एक साल बाद बात करना। कल्याण चाहता है तो उसी में जी। एक साल बस अपने आप में रह। तुझे सब समझ में आने लगेगा। एक साल तक किसी से कुछ बात नहीं करना। एक साल का समय दिया है। तुझे एक घंटे में हो जाए, ऐसा नहीं। तू एक साल तक छोड़। एक साल तक तुम्हें बस अपने आप में रहना है।
और यहां ऐसी कोई बात भी नहीं कि बात करनी पड़े। इसका ध्यान रखना। न कोई प्रश्न, न उत्तर। तुम्हारे लिए एक साल तक मौन। पांचों इंद्रियों से मौन हो जाओ। जरूरत में खाओ, आराम करो, और चिंतन करो। बस आत्मिक चिंतन में लगे रहो। एक साल तक पांचों इंद्रियों से मौन ले लो। तुम्हें बहुत जरूरत है।
उस समय मुझे बस इतना पता था कि मुझे आत्मज्ञान के अलावा कुछ नहीं चाहिए। बस इतना पता था, इसलिए मैंने मना कर दिया। मैं उनके साथ भी आत्मज्ञान के लिए चाहता था, एक करोड़ के लिए नहीं। मैं जिससे मिलता हूं, उसके अलावा कोई बात ही नहीं करता। आत्मज्ञान के अलावा कोई बात ही नहीं करता।
यह तो जानते-जानते पता चलेगा। जब आप जानने का प्रयास कर रहे हो, तो उस प्रयास में जान भी रहे हो। जानने में देखो कि इसमें है क्या। मुझे क्या मिल रहा है। तब आप उससे छूट जाओगे। आप देखो, आप कुछ भी जानना चाहते हो। क्यों जानना चाहते हो? और वह जानकर क्या होगा? तो जानते-जानते यह जानना है कि जानने के लिए कुछ नहीं है। तब यह जानते-जानते ही जान पाओगे।
नहीं। आप इसको बिना अपनाए इस भवसागर से निकल ही नहीं सकते। आप चाहे कुछ भी कर लो। या तो यह अपना लो, या कुछ और अपनाया हो तो इसको साथ में लेना ही पड़ेगा। क्योंकि ईमानदारी और सत्कर्म के बिना इस भवसागर को पार ही नहीं कर सकते, निकल ही नहीं सकते। अभी भी समय है। समझ लो, और कल्याण कर लो, उद्धार कर लो।
आप लोगों को जीवन में मौका भी अच्छा मिला है। सत्संग भी है, व्यवस्था भी है, स्वतंत्रता भी है। आत्मिक कल्याण के लिए सारी व्यवस्था मिल गई है। मेरा यही कहना है, अभी भी सत्योग कर लो। समय एक जैसा रहता नहीं। कब हाथ से चला जाएगा, पता नहीं।
वह सता नहीं रही। अब वह धीरे-धीरे निकलेगी। अब उसे निकाल, और सत्संग सहारा बनेगा। वह सता नहीं रही है। अब वह निकलेगी, क्योंकि जब तक वह नहीं निकलेगी, तू आगे नहीं बढ़ेगी। जितनी भी बातें हैं हमारे अतीत की, सब याद आने वाली हैं, राग-द्वेष की। तू देख, गलत कौन था।
जहां भी जाएगी, अपने आप को पाएगी। जगह बदलने से स्थिति नहीं बदलती। जगह छोड़ेगी तो क्या होगा? दूर जाएगी तो यादें और सताएंगी। जगह मत छोड़। देख, गलत कौन था, और क्यों था। छोड़ दे। जाने दे। आगे निकल।
कहीं न कहीं यह मेरे ही कर्मों का परिणाम है। उन्होंने मेरे साथ ऐसा व्यवहार किया, और हमने उनके विरोध में शादी की। वह सही था या गलत, यह बाद की बात है। तू सही है या गलत, यह बाद की बात है। यह मेरे कर्मों का परिणाम है। छोड़ उसे। छोड़ना पड़ेगा। धीरे-धीरे निकल भी जाएगा। जितना सताएगा, उतना निकलेगा। जब निकल नहीं रहा था, तब सता नहीं रहा था। बातें पहले भी थीं, पर सता नहीं रही थीं। अब सता रही हैं, तो अब निकल रही हैं।
जैसे शरीर में कांटा चुभ जाए। जब तक कांटा अंदर रहता है, कभी पत्थर लगे तो दर्द करता है, नहीं तो पड़ा रहता है, दर्द नहीं देता। जब उसे निकालते हैं तो बहुत दर्द होता है। निकालते हैं, तो हमेशा के लिए उससे मुक्त हो रहे हैं। अब तेरे अतीत की सारी घटनाएं दर्द ही देंगी। दर्द दे रहा है, इसका मतलब निकल रहा है। पहले क्यों नहीं दर्द देता था? पहले भी तो था। क्योंकि तू निकल नहीं रही थी, उसे और बढ़ाने में थी। अब तू कहीं और जा रही है, छुटकारा पाना चाहती है, इसलिए दर्द दे रहा है। दर्द दे रहा है, मतलब वह निकल रहा है।
जैसे-जैसे तू आगे आएगी, वैसे-वैसे पुरानी घटनाएं दर्द देंगी, घुटन देंगी, बेचैन करेंगी। होने दे। तत्परता से लगी रह। सत्संग सुनती रह। ईमानदारी और सत्कर्म में लगी रह। मैं इस जंजाल से कैसे छूट जाऊं, इसके लिए प्रार्थना करती रह। प्रार्थना के साथ पूरी तरह लग जा।
ले लिया करो। और आप भी कुछ सेवा में लग जाया करो, बागवानी में। थोड़ा मार्ग देखकर चली जाया करो। वही पौधा लगा है। कभी पानी दे देना, कभी घास निकाल देना। यही सत्कर्म है। अपने शरीर को कहीं न कहीं सत्कर्म में लगा दो। एक-दो घंटा कर दिया करो।
वह वृक्ष होगा। उसके लाखों-करोड़ों जीव भोजन करेंगे। कितने लोग तपोभूमि में आकर तपस्या करेंगे। तुम्हें कब तक आशीर्वाद मिलता रहेगा। आशीर्वाद से ही कल्याण होगा। और आशीर्वाद के लिए कुछ करना होगा, क्योंकि करने से उद्धार होगा। आंख बंद करके बैठने से नहीं होगा। आंख बंद करके बैठना तब है, जब मैंने कुछ किया हो। तन से, धन से, समझ से, जितना बल मेरे पास है, तब बैठने का लाभ है। जब मैं कुछ करूं।
बस मैंने अपने दायरे में किया है, अपने लिए किया है। परिवार के लिए वह करना नहीं है। समाज के लिए मैंने क्या किया? एक सोसाइटी के लिए नहीं। पूरे विश्व के लिए। पता नहीं इसका उपयोग कौन करेगा। तुम सोचते हो, मैंने एक सोसाइटी के लिए किया, समाज के एक हिस्से के लिए किया। वह करना नहीं होता। एक व्यक्ति परिवार चला रहा है, एक व्यक्ति समाज का एक समूह चला रहा है। दोनों में फर्क नहीं है। और दोनों सत्कर्म नहीं हैं। सत्कर्म का मतलब है कि विश्व का कोई भी व्यक्ति आकर उसका उपयोग कर ले। वह सत्कर्म है। सामाजिक स्तर पर काम हो, कोई सोसाइटी हो, आप उसके लिए कर रहे हो, तो वह भी एक परिवार ही है। उसमें दो-चार लोग रहें या एक लाख, कोई मतलब नहीं। उसे सत्कर्म मत समझना। इसलिए जितना हो सके, लग जाया करो। जरूरी है तुम्हारे लिए। इसी से कल्याण होगा। शरीर जहां लगाना था, लगाया। अब अपने लिए लगा दो। जब वहां से खाली हो जाओ, फिर बैठना। आराम से रहकर अपने आत्मिक कल्याण में लगना।
हम तो प्राण दे दें, बस तुम कल्याण करना चाहो। तुम्हारे कल्याण में हमारा प्राण भी लग जाए, तो मेरे लिए कुछ नहीं है। प्राण तो जाने वाला है। और अपने प्राण का मैंने कर लिया। जहां उपयोग करना था, अपने लिए मैंने कर लिया। अब प्राण का उपयोग समाज के लिए हो। अगर समय आए कि लोगों के कल्याण के लिए प्राण भी देना पड़े, तो मैं वह भी कर सकता हूं। मेरे प्राण का, मेरे लिए, अब कुछ करना नहीं है। अगर मेरे लिए करना होता, तो आंसू नहीं आते। कभी नहीं आते।
आंसू मोह में आते हैं। इसका तो नाम भी नहीं जानता। नियम टूटा तो गुस्सा आता है, आंसू नहीं आते। भगा देते। जिस दिन पता चलता, उसी दिन भगा देता। गुस्सा आता है, अभी भी गुस्सा आता है। आंसू क्यों आए? प्रेम में आए। क्योंकि मैं देख पा रहा हूं, यह कितना गिर रहा है। यह नहीं देख पा रहा। मैं देख पा रहा हूं। अभी परिणाम नहीं आया। मैं परिणाम तक देख रहा हूं।
शुरू से अभी तक यही भाव रहा है। अगर इस समाज के लिए मेरा प्राण भी लगे, तो मैं तैयार हूं। मैं इसके लिए कुछ भी कर सकता हूं। मैं तुम्हारे कल्याण के लिए कुछ भी कर सकता हूं। लेकिन देख रहा हूं, तुम ही नहीं चाह रहे। जैसे कसम खा रखी है। एक तरफ कल्याण की बात करते हो, और जब करने की बारी आती है तो पीछे हट जाते हो। तो आए ही क्यों? कहते हो, पूरी तरह तैयार हूं। जब सामने वाला तुम पर कुछ कर रहा होता है, तो पीछे हट जाते हो। तब आए क्यों? उसका कितना समय बर्बाद हुआ। मेरा यही कहना है। पूरा तैयार होकर आओ, अपने आत्मिक कल्याण के लिए।
जरूरत में गया। वहां स्लीपर में रास्ता था, जगह थी, उसका उपयोग कर लिया। बेईमानी तब कहते हैं, जब मेरे कर्म से किसी को तकलीफ होती है। जरूरत में किया, उसे बेईमानी नहीं कहते।
तंबाकू बेच रहा है। उसे खाकर बहुत लोगों को रोग होता है। तू खुद क्यों नहीं खाता? क्योंकि गलत है न। तो मत बेच। कोई और व्यापार कर ले। ग्राहक कहें कि यह नहीं रखोगे तो दूसरी दुकान चले जाएंगे, यह छोड़ दे। तंबाकू दुकान से निकाल दे। तेरा कल्याण हो या न हो, बहुत लोगों का हो जाएगा। वे दूसरी जगह खाएंगे, वह अलग बात है। तू निमित्त मत बन। एक होता है बिगाड़ने वाला। कोई बिगड़ रहा है, तो बिगाड़ने वाले में तेरा नाम न आए। नहीं तो बिगाड़ने वाले को भी दंड मिलता है। जो खुद बिगड़ता है, उसे दंड मिलेगा। जो बिगाड़ने का निमित्त बनता है, उसे भी दंड मिलता है। बिगाड़ने वाले में मत जाना।
विवाह नहीं किया। फिर तू यहीं रह। जब तक वहां है, वहां से छोड़। वहां किसके लिए है? किसी के लिए नहीं। यही तो पूछ। मोह आ सकता है, बस और कुछ नहीं। बचपन से जो है, उससे छुड़ाने के लिए ही तो बात है। छोड़ दे। एक साल में एक बार, एक महीना, ऐसे ही आता रहे, यह कब तक? मोह है, तो छोड़। वहां कर्म क्या करना है? तेरे पास कुछ नहीं है। फिर भी जमीन-जमीन की बात करता है। तेरे पास पूरा मौका है। जगह है। शादी नहीं, बच्चे नहीं। किससे मोह है?
घर वाले रोकते हैं। गर्मी का बहाना करते हैं। बीमार होकर आएगा, ऐसी बात करते हैं। इस उम्र में क्यों जाता है, कौन तेरा कल्याण कर देगा, इस उम्र में क्या कर सकता है। सही बोलते हैं। बचपन से लगना चाहिए। मैं भी यही कहता हूं। पर अभी इस उम्र में भी पूरी तरह लग जा। अभी देख, पूरी तरह लग नहीं पा रहा। तेरे पास कुछ भी नहीं है। फिर भी जाने की तैयारी है। दुकान का सामान खत्म करने की बात अगले साल भी थी। मुंह से यह कब खत्म होगा? मैंने कहा था, जब आना तो यह सोचकर आना कि फिर नहीं जाऊंगा। वह दिन कब आएगा? एक साल बीत गया। आध्यात्म में बीस-पच्चीस साल हो गए। स्वामी राम के पास बीस साल। बीस साल में भी तू उसी जगह पर है। छोड़ नहीं रहा। थोड़ा इधर से ज्ञान, थोड़ा उधर से। बीस साल में उन्नति होती, तो अपने कल्याण के लिए किसी आश्रम में, एकांत में, पड़ जाता। यहां कमी है क्या? नहीं है। तब यहां आ जा।
अभ्यास नहीं हुआ, इसलिए आजादी कम लगती है। अभ्यास रहते-रहते होगा। बात करना मना है, यह नियम तेरे आत्मिक कल्याण के लिए ही है। बात करेगा ही क्यों। अगले साल जब आया था, तब मैं सेवक रूप में था। तब भी नियम था। आपस में बात मना थी। मोबाइल बंद रहता था। लोग बाथरूम में जाकर बात कर लेते थे। अब पूरा जाकर वहां जाना है, इसलिए पूछना पड़ता है। जरूरत हो तो बात कर सकता है। जरूरत में बोल रहा है, तो बोलकर भी बात नहीं हो रही। बात तब होती है जब शब्दों का रसपान करे। जरूरत में बोला, तो बोलकर भी मौन है। इसी को मौन कहते हैं। जरूरत में ही बोलना है। शब्दों में रस नहीं लेना है। और देखना है कि बोलने की जरूरत है भी या नहीं। कहीं रस के चक्कर में जरूरत तो नहीं पैदा कर रहा। यह देखना है।
दुकान पर मच्छर हैं, अहिंसा नहीं रहती, यह कहता है। दुकान बंद कर। तुझे दुकान की जरूरत ही नहीं। कर्तव्य बताता है। कौन सा कर्तव्य तेरा है? उसी से कमाई होती है। तुझे कमाने की क्या जरूरत है? क्यों कमा रहा है? लगता है कमाना चाहिए। वहां रहना है तो कमाना पड़ेगा। जरूरत है। तू वहां रह ही मत। यहां आ जा। पेट के लिए रोटी, तन पर कपड़ा, रहने को मकान। यह यहां है न? यहां आ जा। वहां रह ही क्यों रहा है? जो लोग तुझे इतना प्यार करते हैं, रोटी नहीं दे सकते क्या? निठल्लों के बीच रहता है क्या? वे कमाते हैं या नहीं? इतना मोह है कि लू लग जाएगी, इसलिए रोकते थे। तो दुकान बंद कर। एक कमरे में पड़ा रह। खा और सो। काम करने की क्या जरूरत है?
जीवन में कब उतारेगा? सुना तो है। सुनने से कल्याण नहीं होता। जीवन में उतारने से होता है। जब अपनाएंगे, तब होगा। तुझे दुकान चलाने की आवश्यकता नहीं। इतने लोग प्यार करते हैं, भोजन नहीं दे सकते क्या?
उनका खाएगा तो उनकी माननी पड़ेगी। स्वाधीनता नहीं रहेगी। कुछ बोल नहीं सकेगा। हां, उनका खाया तो मानना पड़ेगा। कमाकर देगा तो बोलना पड़ेगा। बोलेगा तो तेरा चलेगा, नहीं तो नहीं। एक्सीडेंट के समय कहते थे, शादी कर लो, अब कौन करेगा तेरा। निकलने का पूरा मौका था, तब भी नहीं निकला। ऐसे-ऐसे महापुरुष पृथ्वी पर पड़े हैं। अभी भी मौका है। यहां हमेशा के लिए खा, पी, आराम से रह। पर तू रहेगा नहीं। वहां रहना तेरी दुर्बलता है। दुर्बलता में ही रुका है। तू दुर्बलता कहता है, पर अंदर से वह पक्का नहीं है। जिस दिन पता चल जाएगा कि वहां रहना दुर्बलता है, तू रुक ही नहीं पाएगा। बोलने में हम कुछ भी बोल देते हैं। बोलने में मजा आता है। बोलने में बड़े-बड़े त्यागी बन जाते हैं। करने की बारी आती है, तो पीछे हट जाते हैं। रह। अपना आत्मिक कल्याण कर।
हैंडीकैप का सर्टिफिकेट बनवाया, पेंशन मिलती है। दो महीने से ज्यादा बाहर रहे तो कैंसिल कर देंगे, यह कहते हैं। महीना एक हजार मिलता है। तू हैंडीकैप है क्या? अभी तो नहीं। तो क्यों लेता है? उसका भी पाप लगेगा। हैंडीकैप है तो ले सकता है। नहीं है, और ले रहा है, तो भरपाई पता नहीं कितनी करनी पड़ेगी। हैंडीकैप नहीं है तो क्यों ले रहा है? बेईमानी पर बेईमानी। न दायित्व है, न जिम्मेदारी, और हालत यह है। कंजूस इतना कि दो रोटी का खर्च भी नहीं। पेट भर खा ले, और कुछ खाता-पीता नहीं। सोए का धन शैतान खाता है। आदत गंदी है। कहीं से मिल जाए और इन लोगों को दे दूं। सोए हुए का धन शैतान खाता है।
गाय को खाना देता है, तो चार-पांच और आ जाती हैं। पड़ोसी कहते हैं, तुम देते हो इसलिए परेशान करते हैं, ग्राहक के सामने भगाओ। कोई बात नहीं। सुन लिया कर। सत्कर्म के लिए चौराहा ढूंढ ले। वहां डाल दिया कर। गली खराब नहीं होगी। गाय को ले जाकर और कहीं डाल दिया कर। जगह-जगह देता है, यह ठीक है। पर हैंडीकैप का पैसा लेना छोड़। तू हैंडीकैप नहीं है। ऑपरेशन हुआ, इम्प्लांट है, तीन महीने पड़ा रहा, उसी का सर्टिफिकेट बनाकर अब तक लाभ ले रहा है। देख ले, तुझे क्या करना है। आराम से रह। साधना कर। अपना कल्याण कर। यहां का नियम पढ़ ले। उसी नियम में रह।
साधना में व्यक्ति जाता है तो एक ऐसी स्थिति बन जाती है कि कुछ नहीं चाहिए। लेकिन उस स्थिति में अगर वह टिका रहा, तो उसके बाद उसको आत्मसाक्षात्कार होगा। ज्यादातर लोगों के साथ यह होता है कि उस स्थिति से लौट आते हैं। निन्यानवे प्रतिशत लौट आने वाली कहानी है। होता यह है कि भाव बनाया, मुझे कुछ नहीं चाहिए। नाम, शोहरत, पैसा, सब देखने के बाद कह रहा है, मुझे कुछ नहीं चाहिए। कुछ समय के लिए वह “मुझे कुछ नहीं चाहिए” चला जाता है, लेकिन टिक नहीं पाता। जैसे माता जी ने कहा कि मैं अपने आप को सब में देखती थी, अपने आप में भी और सब में अपने आप को देखती थी। यह भाव बनाया हुआ भाव होगा।
सब में न तो मैं हूं, न मुझमें कोई है। सीधी सी बात है। सब एक जैसे हैं। एक मूल केंद्र है जहां सब एक जैसे हैं। लेकिन न तो मैं किसी में हूं, न मुझमें कोई है। यह बहुत बड़ी भ्रांति है। इस भ्रांति को हटा दो। भ्रांति कौन सी? कि मैं सब में हूं, सब मुझमें है। अगर मैं सब में हूं और मुझमें सब है, तो किसी को समझाने की जरूरत ही नहीं होती। इतने महापुरुष हुए, वे अपने स्व में स्थिर हुए। अगर वे आप में होते, तो आपको समझाने की जरूरत ही नहीं होती। आप अलग थे और वे अलग थे, तभी तो आपको समझाया। इस बात को बहुत गहराई से समझो। हमारे सामने इतनी रटी-रटाई बातें आ गई हैं, जिनको लेकर मैं ढूंढ रहा हूं कि भैया, सब में मैं हूं और मुझमें सब है। ऐसा कुछ भी नहीं है।
स्व और भाव को अलग समझो। स्व एक जैसा है, एक नहीं है। हम एक जैसे हैं, एक से हैं। मूल केंद्र सबका एक है। मूल एक जैसे हैं। सबका आधार एक हो सकता है, लेकिन हैं वे सब अलग-अलग। स्व एक जैसा है, भाव सबका अलग-अलग है। भाव सबका भिन्न-भिन्न है। स्व एक जैसा है, लेकिन एक नहीं। स्व में स्थिर होने के बाद भी आप यह नहीं बोल सकते कि मैं सब में हूं, सब मुझमें है। क्योंकि वह सबसे अलग निकला, तभी तो अपने स्व में स्थिर हुआ। अभी भी आप लोगों में हो, लेकिन कामनाओं में हो, दायरे में हो। सब में नहीं हो, कुछ लोगों में हो। वही परेशानी का कारण है, और उसी से निकलने के लिए काम कर रहे हो। आज अगर आप निर्विकार की बात करते हो, तो आप विकारों में, लोगों में, कामनाओं में लिप्त हो। वह दायरा कुछ लोगों का है। आप वहीं से निकलने का प्रयास कर रहे हो। जब उन लोगों में से निकलोगे, स्व में स्थिर होगे, तभी आत्म का बोध होगा, आत्मज्ञान होगा। ये रटी-रटाई बातें बोलने में बड़ा अच्छा लगता है, लेकिन है नहीं ऐसा। खुद इस पर चिंतन करो, नहीं तो और भ्रमित हो जाओगे।
एक सीखने वाला है, एक सिखाने वाला है। सिखाने वाला सीखने वाले को इसलिए सिखा रहा है कि वह उसके जैसा नहीं है। अब यह कहो कि सिखाने वाला इसलिए सिखा रहा है कि तुम भी मेरे जैसे बन जाओ। लेकिन बनने के बाद भी तुम अलग रहोगे। ज्ञान लेकर एक जैसे हो जाओगे, हां, एक जैसे हो जाओगे, लेकिन तुम अलग और मैं अलग। एक जैसे हो जाओगे, लेकिन ऐसा नहीं कि तुम मुझमें और मैं तुममें। ये सब रटी-रटाई बातें हैं।
जब हमने किसी रूप को देखा, चाहे वह कैसा भी रूप हो, विराट हो, कुछ भी हो, तो देखने वाला और जिसे देखा जा रहा है, दोनों अलग हैं। अगर मैं कह रहा हूं कि मैंने किसी विराट रूप को देखा, तो देखने वाला और विराट रूप दोनों अलग हुए, भिन्न हो गए। और अगर मैं यह कह रहा हूं कि मैं ही विराट रूप हूं, तो फिर देखा कहां? दर्शन, दृश्य और दृष्टा। जब तक कुछ दिख रहा है, जब तक आपने देखा, तब तक आप दर्शन में हो। और जब तक दर्शन में हो, आत्मसाक्षात्कार नहीं हो सकता, क्योंकि आप रूप में हो। वह भी एक स्थिति है, ऊपर की। होता भी है, ऐसा नहीं है। जैसे-जैसे आगे बढ़ोगे, अनेक ऊर्जाएं दिखने लगेंगी। लेकिन मुझे उस अनुभव में कभी रुकना नहीं है। मुझे यह इच्छा नहीं रखनी है कि वह अनुभव दोबारा आ जाए। अगर मैंने इच्छा रखी, तो मैं वहीं रुक गया। इससे भी ऊपर कुछ है। वहां तुम रुक गए, फिर तुम्हारी यात्रा वहीं रुक गई। रूप, शब्द, दृश्य, गंध, रस और स्पर्श से परे जाना है।
इस शरीर से देखें तो हमारे लिए आसमान भी एक विराट रूप है, क्योंकि हमें उसका आदि-अंत दिखता ही नहीं। पृथ्वी भी हमारे लिए विराट रूप है, क्योंकि पूरा रूप दिखता नहीं। अगर आप देखोगे, तो आपके लिए कण भी एक विराट रूप है, क्योंकि कण को भी आप पूरी तरह एक बार में नहीं देख सकते। कोई भी छोटा-से-छोटा कण ले लो, एक तरफ देखोगे तो उसके कई हिस्से छिप जाएंगे। वह भी हमारे लिए विराट रूप है। मुझे इस विराट रूप से परे उठना है। सामने कोई एक ऐसी चीज बता दो जिसे आप पूर्णतया देख सकते हो। क्या है कोई चीज? उलट-पलट कर एक-एक भाग देखोगे तो कितने भाग छिप जाएंगे। एक बार में कोई भी छोटा-से-छोटा कण ले लो, क्या उसे पूरा देख सकते हो? तो आपके लिए वह भी विराट है। विराट वही है जिसका न आदि है न अंत। एक कण उठा लो, वह भी विराट है, उसे भी आप पूरा नहीं देख सकते। विराट रूप से भी ऊपर उठना है, क्योंकि जिसे मैं देख रहा हूं, देखने वाला और जिसे देख रहा हूं, अलग है। दृष्टा जब तक दर्शन में है, किसी को देख रहा है, तब तक आत्मसाक्षात्कार नहीं हुआ। मुझे उस रूप से भी परे उठना है।
जिसे मैं पूरी तरह देख नहीं पाऊंगा, वही विराट है। तो आपके लिए आपका शरीर भी विराट है। आपका एक-एक बाल भी आपके लिए विराट है, क्योंकि आप उसे भी पूरा नहीं देख सकते। तो आप खुद एक विराट हो। मुझे इस चक्कर में नहीं पड़ना है। ऊपर जाना है। इसे छोड़ेंगे तो ऊपर जाएंगे, देखने से और दिखने से। मुझे मुक्त होना है। मुझे देखने-दिखने की इच्छा न रहे कि मुझे कुछ दिख जाए। देखने से मुक्त होना है। अपने अंदर यह इच्छा न रखें कि मुझे कुछ दिख जाए।
अगर जरूरत है तो उपयोग करके आगे बढ़ूं। न देखने में फंसना है, न दिखने में फंसना है। मुझसे मतलब ही नहीं। मुझे सिर्फ अपने काम से मतलब है। न किसी को देखना है, न दिखना है। मुझे यात्रा करनी है अपने स्व तक। और स्व की यात्रा तभी होगी जब आप दर्शन के भाव से मुक्त होंगे, चाहे विराट रूप का दर्शन हो। विराट के बारे में मैंने बता दिया कि आप खुद एक विराट हो। खुद का भी तो दर्शन नहीं हो पाया। अगर शरीर को ही अपना आप समझते हो, तो शरीर का भी दर्शन नहीं कर पाए।
इसमें रुकना नहीं है। जो स्थिति आप बता रही हैं, वही स्थिति बनाई हुई है, क्योंकि मैं कह रहा हूं कि मैं एक आत्मा हूं। जो बोल रहा है कि मैं एक आत्मा हूं, वह अलग है। मैं आत्मा हूं, यह बोल रहा हूं। अगर मैं आत्मा हूं, तो मुझे बोलने की आवश्यकता क्यों पड़ रही है?
जैसे आपका नाम गोदावरी है। आज तक इतनी उम्र में आपने कभी अपने आप से कहा कि मैं गोदावरी हूं? नहीं कहा, क्योंकि आप गोदावरी हो। आप इस बात को पहले साफ कर लीजिए। आप गोदावरी हो, इसलिए आपको यह कहना कभी नहीं पड़ता। लेकिन कोई पागल हो जाता है, याददाश्त चली जाती है, तो उसे याद दिलाया जाता है कि तुम यह हो, वह यह हैं। जिस दिन मुझे इस बात का बोध हो गया कि मैं आत्मा हूं, तो मुझे कहने की जरूरत नहीं पड़ेगी। मैं जब तक कह रहा हूं, उसमें स्थिर होना चाहता हूं। आत्मिक स्थिति में आना चाहते हो, लेकिन यह तरीका एकदम गलत है। यह तरीका आपको वहीं का वहीं ले जाकर खड़ा कर देगा, कि मैं एक आत्मा हूं। कुछ दिन में रटी-रटाई बात हो जाएगी। मैं एक आत्मा हूं, मैं शुद्ध आत्मा हूं, मैं पवित्र आत्मा हूं। यह कहने से कुछ भी नहीं होने वाला। एक आदत पड़ जाएगी, रट्टा पड़ जाएगा, और फिर कोई मतलब भी नहीं रहेगा। आप धीरे-धीरे कमजोर भी होते जाओगे, क्योंकि आपकी ऊर्जा वहां लग रही है। कुछ करना नहीं है, बस इतना कहना है कि मैं शुद्ध आत्मा हूं, मैं पवित्र आत्मा हूं। उस पवित्रता के लिए, उस शुद्धता के लिए काम करना पड़ेगा।
यह आलसी लोगों का काम है। बड़ा अच्छा लगता है, मैं शुद्ध आत्मा हूं, पवित्र आत्मा हूं। लेकिन यह कहने से कुछ होगा क्या? क्योंकि मैं पवित्र नहीं हूं, मैं शुद्ध नहीं हूं, इसीलिए बोल रहा हूं। अगर मैं होता, तो बोलने की जरूरत नहीं पड़ती। उस पवित्रता के लिए, उस शुद्धता के लिए मुझे काम करना पड़ेगा। और वह मेरे कर्म से हो सकता है, क्योंकि कर्म से मैं गंदा हुआ हूं। वृत्तियां कैसे धारण कीं? गंदगी कैसे धारण की? कर्म से। मैंने कर्म करते हुए गंदगी को धारण किया। मैं अपवित्र कैसे हुआ? कर्म करके। तो कर्म करके ही शुद्ध होऊंगा, पवित्र होऊंगा। यह कहने से कुछ नहीं होने वाला।
एक व्यक्ति बैठ जाए और कहे, मैं राजा हूं, मैं राजा हूं। आपको लगता है कभी वह राजा बन सकता है? पागलखाने जा सकता है। तो आप पागलखाने मत जाइए। मैं आपको यही सलाह दे रहा हूं। बहुत लोग बहुत लोगों को पागलखाने भेज रहे हैं। मैं अध्यात्म में आया तो बहुत रोता था। मैंने कहा, मेरी बात कौन मानेगा? क्योंकि मुझे ज्ञान तो नहीं हुआ था, लेकिन इतना पता था कि यह गलत बता रहे हैं। यह व्यक्ति उस स्थिति में कभी नहीं आएगा, जो यह तरीका बता रहे हैं कि मैं शुद्ध आत्मा हूं। आप शिक्षक रही हैं। एक बालक से कह दो, बोलो बेटा, मैं शिक्षक हूं, मैं शिक्षक हूं। क्या बिना शिक्षा लिए, बिना पढ़े, वह शिक्षक हो सकता है? उसके लिए अध्ययन करना पड़ेगा, पढ़ाई करनी पड़ेगी। तो यह सब बातें छोड़िए।
काम करना पड़ेगा। रास्ता बहुत साफ है। मुझे कर्म करने का मौका मिला और मैंने बेईमानी को धारण किया, मैं अपवित्र हो गया। अब मैं ईमानदारी को धारण करूंगा, सत्कर्म करूंगा, सत्संग सुनूंगा, और अपने आप को पवित्र कर लूंगा। बहुत आसान रास्ता है, और यह समझ में भी आता है। कितने लोग डिप्रेशन के शिकार हुए हैं। कितने लोग संस्थाओं में डिप्रेशन के शिकार हो गए हैं। बस पवित्र आत्मा की बात करके उनके पास बैठकर बात करिए, रोते हैं। उन्हें कुछ नहीं मिला। बोल रहे हैं, चालीस साल उम्र बीत गई, किसी का बुढ़ापा आ गया, मिला कुछ नहीं। आई एम सोल, पवित्र आत्मा, क्या-क्या बुलवाते हैं। आप खुद सोचिए, ऐसा हो सकता है क्या? जब तक आप करोगे नहीं, होगा नहीं। बड़ा सरल लगा कि बोलो, इसमें कुछ करना तो है नहीं। आपको भी लगा कि मैं पवित्र आत्मा बोलूं। अगर कुछ अपवित्र है, तो कपड़ा ही ले लीजिए। कपड़ा पहनकर गंदा हो गया और आप उसे धो नहीं रहे, कह रहे हो कपड़ा शुद्ध है, कपड़ा पवित्र है। कपड़ा और गंदा हो जाएगा। क्या आपको लगता है बोलने से कपड़ा शुद्ध हो जाएगा? एक वस्त्र ले लीजिए, पहनकर घूम लीजिए, गंदा हो जाए, उसे हाथ में ले लीजिए और रोज सुबह-शाम बोलिए, कपड़ा शुद्ध है, कपड़ा पवित्र है। क्या उसकी गंदगी आपके बोलने से हट जाएगी? काश आप शुद्ध जल लेते, साबुन लेते, और उसे धो देते, तो साफ हो जाता। पूरी जिंदगी क्यों गवा रहे हो? यह बोलने से कुछ नहीं होगा, और यह समझ में भी आता है।
आपको लग रहा है कि मैं आत्मा हूं, यह बोलने से आप आत्मा हो जाओगे। जब आप आत्मा हो, तो बोलने की आवश्यकता क्यों पड़ रही है? आत्मा के अंदर विराट स्वरूप बताते हैं। क्या विराट रूप आत्मा से छोटा है? अगर आत्मा में कोई है, तो आत्मा से छोटा ही होगा। उससे बड़ा कैसे समाएगा? एक पात्र में उससे बड़ा पात्र डालो, तो क्या उस पात्र में जा सकता है? नहीं जा सकता। तो आत्मा में आत्मा के अलावा कुछ नहीं है। आप खुद सोचो, विराट रूप आत्मा से बड़ा हो तो आत्मा में कैसे रह सकता है? एक पात्र में उससे बड़ा पात्र आप रख सकते हो क्या? यह बात समझ में भी आती है।
एक उदाहरण देता हूं। दो लोगों ने अपराध किया, दोनों को सजा हो गई। दोनों ने एक ही तरह का काम किया था, दोनों को एक ही जैसी सजा हुई। लेकिन एक ने क्या किया? बस ध्यान लगाना चालू किया। अपना समय पर खाए और ध्यान लगाए, बैठा रहा। और एक ने क्या किया? पूरा सेवा भाव, सबकी सेवा करना, सबकी देखरेख करना, पूरा कामकाज करना। जल्दी कौन छूटेगा? जेल में काम करवाया जाता है, डंडे भी लगते हैं, यह समझ लो। शुद्ध आत्मा, शुद्ध आत्मा, मैं अपने आप में केंद्रित कर लूं। अरे, आप कहीं केंद्रित हो क्या? जब तक आप वहां से नहीं छूटोगे, आप यहां केंद्र में हो ही नहीं पाओगे। आप केंद्रित इसलिए करना चाह रहे हो कि मैं बैठूं और आत्मा में केंद्रित हो जाऊं। इसका मतलब आप कहीं केंद्रित हो। तो जहां आप हो, वहां से अपने आप को छुड़ाओ। रबर को यहां से खींचकर छोड़ोगे तो वह अपनी जगह नहीं टिकेगा। लेकिन अगर यहां से छुड़ा दो, तो अपनी जगह चला जाएगा। छोड़ने वाला काम करो। किसी विधि से जबरदस्ती कहीं लगा रहे हो। कुछ समय के लिए शांति मिलेगी, लेकिन छूटने के बाद कहां जाओगे? वही जाओगे, क्योंकि वहां से छूटे नहीं हो। ध्यान लगाने से थोड़ी छूट जाओगे। इसलिए कर्म के सिद्धांत को समझना बहुत जरूरी है। कर्म का सिद्धांत बताता है कि जैसा कर्म, वैसा परिणाम। सीधे कर्म के सिद्धांत पर आ जाओ।
जिसका परिवार से कोई मतलब नहीं, जो सब कुछ छोड़कर चला गया, जो आकाशवृत्ति से ग्रहण करता है, कुछ संचित नहीं करता, धन-वैभव से कोई मतलब नहीं, फटे कपड़े पर घूमता रहता है, अपना ध्यान लगाता रहता है, उसको बहुत गाली मिलती है, बहुत मार खाता है। उसका किया हुआ कर्म भी तो राग-द्वेष है। परीक्षा होगी। उसके साथ समाज एक अपराध करता है। कभी ठंड में बिस्तर नहीं, खाना नहीं। उसके लिए यह सब है।
जैसे कृष्ण भगवान ने अर्जुन को कर्म का सिद्धांत बताया। क्यों बताया? क्योंकि अर्जुन राजकुमार थे। वे गृहस्थ में रहकर कल्याण चाहते थे, तो उन्हें कर्म का सिद्धांत बताया। वही वाल्मीकि को, रत्नाकर डाकू को, मंत्र दे दिया कि जाओ, तुम्हारा मंत्र। लेकिन उस मंत्र के द्वारा उनके शरीर में दीमक भी लग गए। आपको देखना है कि आप हो कहां, पहले। कृष्ण ने अर्जुन को यह भी बताया था कि आत्मभाव में टिको। क्या टिक पा रहे थे?
जब वे समझे कि सब आत्माएं हैं, खुद को आत्मभाव में टिकाया, तब धनुष-बाण उठाया। जब नहीं टिके थे, तब नहीं। जब टिके, तब। जब उनके सारे प्रश्न खत्म हो गए, उत्तर मिल गए, तब टिके। जब सब छूट गया। शुरू में जब वे भाग रहे थे, तो कहा युद्ध करो। उन्होंने कहा, नहीं, सब मेरे दिख रहे हैं, मैं युद्ध नहीं करूंगा। क्या उनकी बात तुरंत मानी? अर्जुन प्रश्न निकालते थे, उत्तर सुनकर चुप हो जाते थे। आत्म तत्व में आखिर में स्थिर हुए। कृष्ण ने तुरंत कहा, हे अर्जुन, भागो मत, युद्ध करो, कोई तुम्हारा नहीं है। अर्जुन ने कहा, नहीं, मैं युद्ध नहीं करूंगा। मेरे लोग मुझे दिख रहे हैं, और मैं धन-वैभव के लिए अपने लोगों को मार नहीं सकता। तो यह आखिरी की बात आप कह रही हैं। आत्म तत्व में वे प्रयास करके थोड़ी स्थिर हुए। प्रयास नहीं किए। आप लोग समझ नहीं पाते। आप गीता का आदेश दे देते हो कि भक्ति मार्ग बताएं, ध्यान मार्ग बताएं। अर्जुन कहीं गए क्या? वही प्रश्न-उत्तर चलता रहा, और उसी में वे आत्म तत्व में स्थिर हुए। क्या वे ध्यान लगाने गए? उन्होंने एक बार भी कहा कि मैं शुद्ध आत्मा हूं? कभी कहा क्या?
वे आत्म तत्व में तब स्थिर हुए जब उनके सारे प्रश्न खत्म हो गए। जीवंत गुरु की शरण मिली। जब उनके सारे प्रश्न खत्म हो गए, तब वे आत्म तत्व में स्थिर हुए। स्थिर होने के लिए प्रयास नहीं किए। उन्होंने सिर्फ अपने प्रश्न निकाले। क्योंकि एक भी प्रश्न है, तो आप बाहर हो, बहिर्मुखी हो। उन्होंने अपने सारे प्रश्नों को खत्म किया। वे कहीं ध्यान लगाने नहीं गए। उनकी इच्छा भी नहीं थी कि मैं आत्मज्ञानी हो जाऊं।
उनकी तो बस एक ही बात थी। वे कृष्ण भगवान के परम भक्त थे। कृष्ण भगवान की इच्छा थी। जैसे मां काली की इच्छा थी कि रामकृष्ण परमहंस को ज्ञान हो जाए। रामकृष्ण परमहंस की इच्छा नहीं थी। वे तो मां में ही संतुष्ट होते थे, मां में ही खो गए। जब पूरी तरह समर्पित हो गए, तो आदिशक्ति, जगतजननी ने कहा, नहीं, मेरे पुत्र का कल्याण होना चाहिए। तोतापुरी को कहा, जाओ। रामकृष्ण ने कहा, मेरी मां मेरे लिए सब कुछ है, तुमसे कोई मतलब नहीं। तोतापुरी बोले, जा रे, तेरी मां ने ही तुझे बुलाया है। तब जाकर मां से पूछते हैं, तो मां कहती है, हां, जा, उसे गुरु बना, तेरा उद्धार कर देगा।
अर्जुन की ज्ञान की कोई इच्छा नहीं थी। लेकिन अर्जुन परम भक्त थे। जब रुक्मिणी ने कृष्ण से कहा, आपका परम भक्त कौन है, तो बोले, अर्जुन। अर्जुन के हृदय से धुन बोलती थी। जब कान लगाओ, तो हरे कृष्ण हरे कृष्ण की धुन आती थी। परम भक्त हो गए। परम भक्त अगर कोई हो जाता है, तो उसका इष्ट उसका कल्याण करता है। किसी के द्वारा करवाएगा, या खुद करेगा। कृष्ण भगवान उस स्थिति में थे, तो उन्होंने खुद किया। और अर्जुन उस लायक हो गए थे, क्योंकि परम भक्त हो गए थे। उनके अंदर लालच थी ही नहीं। उन्हें कुछ चाहिए ही नहीं था। वे भक्ति में लीन थे।
इसलिए जब अर्जुन युद्ध छोड़कर जा रहे थे, तो उनके पास ब्रह्मास्त्र था। वे एक बाण में युद्ध खत्म कर सकते थे। इतनी क्षमता उनमें थी। ऐसा नहीं कि कायर होकर जा रहे थे, कमजोर होकर जा रहे थे, डर के जा रहे थे। मोह में जा रहे थे। मेरे लोगों को मैं वैभव के लिए नहीं मारूंगा। नहीं तो एक बाण में युद्ध खत्म कर देते। किसी और के पास वह नहीं था। उनके बाद एक और था, जिसने पेड़ में बाण मारा, हर पत्ते में छेद हो गया। कृष्ण भगवान ने एक पत्ता अपने चरणों में दबाया था। उसके पास तीन बाण थे। अर्जुन एक बाण में खत्म कर सकते थे, वह तीन बाण में। तो उस जगह अगर कोई सर्वश्रेष्ठ योद्धा था, तो अर्जुन थे। उसकी मां ने कहा था, बेटा, तुम उसकी तरफ होना जो हार रहा हो, उसका साथ देना। कृष्ण भगवान ने कहा, यह तो तीन बाण में युद्ध खत्म कर देगा। फिर एक बाण मरवाया, एक पत्ता अपने चरणों में दबाया, तो उस पत्ते में भी छेद हो गया।
मेरा यह कहना है कि आप कुछ पढ़िए, पूरी तरह समझिए, उसे निचोड़िए। इसीलिए कहा गया है कि शास्त्रों का अनुसरण किसी योग्य गुरु की शरण में जाकर करो। क्योंकि अगर खुद करते हो, तो भ्रमित हो जाते हो। आप अपनी स्थिति से अर्थ निकालोगे। जैसे एक वृक्ष है। छह-सात साल के बालक से लेकर सौ साल के आदमी तक, सबको बोलो इसके बारे में लिखो, सब अपनी-अपनी स्थिति से अलग-अलग लिखेंगे। लेकिन सामने दृश्य एक ही है। इसीलिए कहा गया है कि किसी योग्य गुरु के सानिध्य में जाकर शास्त्रों का अनुसरण करो। अध्ययन मत करो, अनुसरण करो। और अनुसरण तभी करोगे जब कोई समझाने वाला होगा। अध्ययन करने में व्यक्ति फंस जाता है, क्योंकि वह वही निकालता है जो उसके मतलब का होता है, जिसमें उसे आसानी दिखती है। हर व्यक्ति आसान रास्ता खोजता है। बचपन से आदत है, आसान रास्ता खोजना। जिस काम में मेहनत है, उसमें नहीं जाता। इसमें क्या मेहनत है कि बैठ गए और बोल दिए, मैं आत्म तत्व में केंद्रित हूं? इसमें मेहनत नहीं है। मेहनत तो सत्कर्म में है, ईमानदारी में है, अपने को निचोड़ने में है।
लोगों ने अध्यात्म का बहुत अच्छा व्यापार बना लिया है। आप यह मत समझना कि यह बात सिर्फ आपके लिए है, आप कहां हो कहां नहीं। यह तो बहुत लोगों के लिए हो रहा है। बहुत लोग लाइव देख रहे हैं, वे न फंसें। अध्यात्म एक व्यापार हो गया है। अध्यात्म के नाम पर व्यापार हो गया है कि कुछ करना नहीं है। सामने वाले को भी कुछ नहीं करना है। तुम मुझे तार दो। वह कहता है, मैं तुम्हें तार दूंगा, बस तुम कहो कि मैं प्योर सोल हूं, मैं प्योर आत्मा हूं। कहने में भी बड़ा अच्छा लगता है, करना कुछ नहीं है। लेकिन इससे कुछ नहीं होने वाला। इससे बस इतना होने वाला है कि डिप्रेशन का शिकार हो जाएगा। वह किसी से कुछ कह नहीं पाएगा। ऐसे लोग बहुत डिप्रेशन के शिकार हुए।
किसी से बातचीत नहीं करते। अपना खाकर पड़े हैं, मंदबुद्धि की तरह। लेकिन जब आप उनसे बात करोगे, तब समझ में आएगा। बहुत चिड़चिड़े, बहुत उदास। मिला नहीं कुछ। कहते ही रह गए, शुद्ध आत्मा, शुद्ध आत्मा। लेकिन शुद्ध आत्मा का कभी दर्शन ही नहीं हुआ। और बहुत लोग ऐसे फंस गए। मैं बहुत लोगों को देखता था, मैं रोता था। आध्यात्मिक व्यापार बना दिया। लोगों को सिर्फ किसी विधि में फंसा दे रहे हैं।
आज गुरु शंकराचार्य खुद चिल्लाकर बोले, हजार सालों तक यज्ञ-हवन, विधि करो, तत्वज्ञान की प्राप्ति नहीं होगी। भज गोविंदम में आपने पढ़ा होगा। कर्मकांड से नहीं होगा। कर्मकांड मतलब विधि। अगर आप कह रहे हो, मैं शुद्ध आत्मा हूं, तो यह भी तो एक विधि है। यह भी एक मानसिक विधि है। आप सिर्फ बाहरी विधि मत पकड़ो। जाप हाथ से भी होता है, मुंह से भी होता है, मानसिक भी होता है। तो यह मानसिक विधि है। भज गोविंदम में उन्होंने चिल्ला-चिल्लाकर कहा कि लोग अनेक तरह के त्रिपुंड लगाएंगे, अनेक तरह के कपड़े पहनेंगे, मात्र पेट भरने के लिए। फिर उन्होंने कहा, हजार जन्मों तक यज्ञ-हवन करो, ये विधियां करो, तत्वज्ञान की प्राप्ति नहीं होगी। बिन सत्संग विवेक न होई। विवेक तभी जगेगा जब सत्संग सुनोगे। विधियां सिर्फ भटकाती हैं, चाहे शारीरिक विधियां हों, चाहे मानसिक विधियां। बिन सत्संग विवेक नहीं होता। बिना सत्संग के विवेक नहीं जगता। सत्संग से विवेक जगता है। विवेक जगने से वैराग्य, वैराग्य से तत्वज्ञान की प्राप्ति होती है। बिना सत्संग का कल्याण नहीं है।
इतिहास में जितने भी महापुरुष हुए, उस परम स्थिति में उन्होंने सिर्फ सत्संग किया। शंकराचार्य ने कहीं विधि करवाई क्या? सत्संग ही किए। अष्टावक्र ने राजा जनक को कोई विधि दी क्या? ज्ञान दिया। और अगर घोड़े पर भी चढ़ाया, तो बोले, मन मुझे दे, और तू चढ़। उनसे नहीं करवाया। मन तो ले लिया। बोले, चल, अब घोड़े पर चढ़। फिर बोले, अब रुक जा, मेरा मन नहीं है। उनसे नहीं करवाया। आप देखो, कोई भी संत-महापुरुष कभी विधि नहीं दिया। ये विधियां गुलाम बनाती हैं। विधियां एक नया संप्रदाय खड़ा करती हैं। एक समूह तैयार करती हैं। एक गुलामी की तरफ ले जाती हैं। एक गुलामी से छूटे, फिर नई गुलामी में ले जाती हैं।
इसलिए मैंने यहां कोई विधि नहीं रखी। प्रत्यक्ष तो प्रत्यक्ष है। विधियां गुलाम बनाती हैं। एक नया समूह तैयार होता है। एक नया संप्रदाय खड़ा होता है। एक नया पंथ खड़ा होता है। एक नया मजहब खड़ा होता है। और फिर वह समाज के लिए बहुत हानिकारक होता है। जब एक समूह तैयार होता है, तो सामने वाले के लिए बहुत हानि पहुंचाता है। एक झुंड। इसलिए प्रत्यक्ष ज्ञान ऐसा है कि इसको सब अपना सकते हैं। पूरे विश्व में इसका खंडन कोई नहीं कर सकता। क्योंकि इसके बिना तुम्हारा कल्याण ही नहीं होगा।
जिस स्थिति में आप हैं, जैसा बता रही हैं, बस उसी में स्थिर रहें। न आगे बढ़ना है, न पीछे हटना है। अगर आपको ऐसा लग रहा है कि आप उसमें हो गई हैं, तो बस आप उसमें बने रहिए। न आगे जाना है, न पीछे जाना है। बस उसमें स्थिर रहना है, और इंतजार करना है। जब यहां बैठो, तो निरसंकल्प स्थिति में ही रहो।
जब आप अपने स्व की तरफ बढ़ती हैं, तो बहुत सारी शक्तियां दिखती हैं। आप बस दिखने दो। कभी देखने का भाव मत लाना कि फिर से मुझे दिख जाए। इससे आपकी स्थिति ऊपर उठ रही है। लेकिन इसमें कभी यह मत जानना कि मुझे फिर दिख जाए।
आपको अपने आप में स्थिर रहना है। मेरे सामने कुछ भी आए, मुझे विचलित नहीं होना है। न उसमें जाना है। जाने का मतलब यह कि फिर दिख जाए। आप जो स्थिति पाना चाहती थीं, जिसे आप आत्मसाक्षात्कार समझ रही थीं, विराट स्वरूप जो आपने देखा, उसी में फिर आना चाहती थीं। वही तो बात है। बस आप अपने आप में बने रहिए। मुझे कुछ नहीं चाहिए। मुझे रूप से मुक्त होना है। क्योंकि अगर मुझे कुछ दिख रहा है, इसका मतलब देखने वाला मैं हूं, और जो दिख रहा है वह अलग है। और जब तक मैं देखने में हूं, तब तक उपलब्धि नहीं होगी।
जैसे जब तोतापुरी रामकृष्ण परमहंस को ज्ञान करा रहे थे, तो काली मां का रूप आ जाता था। वह रूप ज्ञान होने में बांधा था। तब उन्होंने तरीका बताया कि किस तरीके से आप इस रूप से मुक्त हो सकते हो, तभी ज्ञान होगा। तो मुझे किसी रूप में लिप्त नहीं होना है। रूप आ रहा है तो आए, मुझसे मतलब नहीं। और अगर आपने फिर इच्छा रखी कि मुझे फिर दिख जाए, इसका मतलब उस रूप में आप फंस गईं। अब आगे बढ़ोगी नहीं, जब तक वह इच्छा बनी रहेगी। वह दिखे या न दिखे, बाद की बात है। लेकिन आप फंस गईं। ऐसी इच्छा न जगे कि मुझे फिर ऊर्जा ऊपर से नीचे जाए, बड़ा अच्छा लगा। शरीर जागृत हो रहा है। हमारे सब शरीर खुलते हैं। बहुत सारी चीजें होती हैं। कभी करंट जैसा लगता है, कभी शरीर में पूरा घूमने लगता है, क्योंकि सब खुलेगा। लेकिन वह अपने आप होगा। मुझे कुछ नहीं करना है। और दोबारा यह इच्छा भी नहीं रखनी है कि ऊर्जा इधर से उधर जाए और मैं वह देखूं। नहीं तो आप वहीं रुक गईं। फिर आपने अपने आप को रोक लिया। बस यही भाव बनाकर रखें कि मुझे कुछ नहीं चाहिए। आत्मसाक्षात्कार के अलावा कुछ भी नहीं।
जहां रूप नहीं, रूप से परे, निराकार। कुछ भी नाम दे दो। हम रूप में हैं, इसलिए निराकार कहते हैं। लेकिन उसे भी कहीं न कहीं देखा गया है। निराकार हम इसलिए बोलते हैं कि इस स्थूल शरीर से नहीं देख सकते। लेकिन उसे भी देखा जा सकता है।
विधियां गुलाम बनाती हैं। विधियों से मुक्त हो जाओ। कोई भी विधि हो, आपको गुलाम बनाएगी। इसका विशेष ध्यान दो। नहीं तो जिंदगी भर पवित्र आत्मा, प्योर सोल, करते हुए खत्म हो जाइए। बहुत लोग खत्म हो जा रहे हैं। कर्म के सिद्धांत को समझो। ईमानदारी, सत्कर्म और सत्संग अपना लो। अगर कल्याण चाहते हो, तो यही मूल मंत्र है। और यह समझ में भी आता है।
यह बात समझ में भी आती है। मान लो तुम्हें ही कहीं रखा गया, और दो बैग तुम्हारे अंदर दे दिए गए। दोनों को कहा गया कि दोनों को रखो, और एक साल बाद दोनों के बारे में बताना। तो एक ने आपका फोटो लगाकर बढ़िया पूजा-पाठ करने लगा, और एक आपके जितने काम थे सब करने लगा, आपके काम में हाथ बंटाने लगा। एक साल बाद दोनों के बारे में पूछा जाएगा, तो क्या बोलोगे? फोटो लेकर बैठा है, हो, बैठा रहो। कोई भी हो, आप अपने आप को मालिक की जगह रखकर देखो। हमारे सामने अगर दो भक्त आ जाएं, एक मेरे काम में हाथ बढ़ाए, और एक मेरा फोटो लेकर माला जपे, कोई काम न करे, बस खाए-पिए-सोए और मेरी माला जपे, तो आप किस पर प्रसन्न होगे? काम वाले पर। तू तो मेरा ही काम कर रहा है न। यह बात समझ में भी आती है।
दो व्यक्ति हों। एक कहे, मैं शुद्ध आत्मा हूं, मैं प्योर सोल हूं, ऐसे ध्यान लगाकर बैठे कि मैं आत्म तत्व में स्थिर हो रहा हूं, दिन भर ऐसा करे। और एक व्यक्ति तुम्हारे सारे काम में हाथ बढ़ाए, जितना उससे हो सकता है। तो आप किस पर प्रसन्न हो? मां अपने फोटो वाले से कहे, जा, तू मेरा यह काम करेगा, तो मना करना पड़ेगा। ये बातें समझ में भी आती हैं। लेकिन आलसी लोग हैं, जिनको समाज के लिए कुछ करना नहीं है।
जितने लोग जानवर की जिंदगी जीते हैं, मैं सीधी बात बता रहा हूं। जानवर का मतलब क्या, अपने बच्चों तक करना। मानव का मतलब क्या, समाज के लिए करना। आप यह मत समझना कि शरीर लेने से मानव हो गए। अगर आप समाज के हित के लिए कार्य करते हो, तब आप मानव हो। एक समूह की बात नहीं कर रहा हूं। समूह के लिए काम करने वाले बहुत हैं। अगर कोई एक घर के लिए काम कर रहा है, एक समूह के लिए काम कर रहा है, दोनों में कोई फर्क नहीं है। समाज हित मतलब किसी के लिए भी। अगर आप काम कर रहे हो, तो अब आप मानव हो। और अगर आप सिर्फ अपने परिवार के लिए, या एक समूह बनाकर काम कर रहे हो, तो आप समझ लीजिए कि जानवर हो। मानव और जानवर में यही फर्क है। और मानव शरीर में ही व्यक्ति परमात्मा से मिलता है। मानव का काम समझो। ईमानदारी से सत्कर्म में लगे रहना, यही मानव का कार्य है। और इससे परमात्मा मिलता है, परम सत्ता मिलती है।
तीन गण बोले गए हैं। देवगण, राक्षस गण, मानव गण। मानव गण मतलब सात्विक प्रवृत्ति में जीने वाले को मानव गण कहा गया है। तामसी और राजसी प्रवृत्ति में जीने वाले संसार में भटकते रहते हैं। आप देखो, आप किस प्रवृत्ति को धारण किए हो। सात्विक प्रवृत्ति मतलब परोपकार में लगा है, ईमानदारी के साथ। तब आप मानव प्रवृत्ति हो। मानव प्रवृत्ति वाला उस परम सत्ता से मिलता है। कहा गया है, बड़े भाग्य मानुष तन पाए। मानुष तन पाया, तो उसका कुछ काम होगा न। ऐसे थोड़ी छोड़ दिया है। उसके पीछे कोई कार्य है। आप देखो कि वह कार्य कर रहे हो, वह स्वभाव धारण किए हो।
ज्यादातर या तो राक्षस स्वभाव धारण करते हैं, या देवता बनकर पॉजिटिव-नेगेटिव में जीते हैं। सात्विक में बहुत कम लोग जीते हैं। सात्विक वाला उस परम सत्ता से मिलेगा। सात्विक वाले का आत्मकल्याण होगा। सात्विक वाले को आत्मदर्शन होगा। अब देख लो। आपको फैसला देना हो, तो आपने कहा, फोटो वाले को, माला वाले को तो मैं कुछ नहीं दूंगा। लेकिन जिसने मेरे काम में सहायता की, उससे जरूर मिलूंगा। आपको दोनों में से एक से मिलना हो, किससे मिलोगे? जो आपके काम में सहायता करे। तो अगर इस जगत में परमात्मा के कार्य में सहयोग करते हो, जरूरतमंद की सेवा करते हो, ईमानदारी के साथ, तब जाकर परमात्मा आपसे खुद मिलने आएगा। आप खुद सोचो। आपको रखा जाए, और आपके सामने ऐसे व्यक्ति रखे जाएं। एक समूह आपका माला-फोटो जपे, फर्स्ट क्लास। और एक समूह आपके काम में हाथ बंटाए। किससे मिलोगे? इस सिद्धांत को समझ लो। यह हर जगह लागू होता है। इस बात को बहुत गहराई से समझ लो।
विधियों से मुक्त होकर, मेहनत के साथ, कर्म के सिद्धांत को समझो। और धन से, तन से, और अपनी समझ से, समाज के हित के लिए कुछ कार्य करो। अब देखो, यहां यह बड़ा पेड़ है। पता नहीं किसने लगाया। कितना साधना में सहयोगी है। लाखों जीव इस पर भोजन कर रहे हैं। और आज देखिए, अपनों की कुटिया के द्वारा कितने बड़ और पीपल के पौधे लगाए गए। आने वाले समय में, जैसे आप लोग साधना कर रहे हो, तो उसको आशीष जा रहा है जिसने इसको लगाया है। जब तक यह रहेगा, तब तक उसको आशीष जाएगा। आज अपनों की कुटिया में इतने पौधे लगाए गए हैं, हजारों साल चलेंगे। तो हजारों साल अगर कोई साधक आकर यहां एक पानी भी देगा, तो उस लगाने वाले को भी हजारों साल आशीर्वाद जाएगा। और यही तो मुझे तारेगा। मेरा कर्म ही तो मुझे तारेगा। मेरा कर्म ही तो मुझे फंसाया है।
किसी छेद में आप हाथ डाल दो, तो निकालने के लिए उसी छेद से पीछे आना पड़ेगा। लेकिन तुम सोच रहे हो, मैं किसी और छेद से निकाल दूं। आपको लगता है कभी हाथ निकलेगा? आप बेईमानी करके फंसे हो, ईमानदारी करके वापस आ जाओ। इस सिद्धांत को समझ लो। साफ-सुथरा समझ में आया।
आप अपने आप में बनी रहिए। बस अनेक तरह के दृश्य आएंगे, और भी बहुत सारी चीजें आएंगी। हो सकता है अभी आपके अनुकूल है, बाद में विरोध में खड़ी हो जाए। लेकिन मुझे दोनों में नहीं जाना है। अगर मैं अच्छे में नहीं गया, तो मुझे बुरे में भी नहीं जाना है। मुझसे क्या मतलब। अभी तो आपके अनुकूल परिस्थितियां हैं। कभी विपरीत परिस्थितियां होंगी। विपरीत में भी आपको वैसे ही बने रहना है, अपने आप में स्थिर। और तभी पता चलेगा, जब विपरीत परिस्थितियां पैदा होंगी। परीक्षा उसी समय होगी। अनुकूल में तो सब सज्जन दिखते हैं। अनुकूल परिस्थितियों में व्यक्ति एकदम सज्जन है। विपरीत परिस्थितियों में पता चलता है कि आप अपने आप में स्थिर हो या नहीं। फिर तो विपरीत परिस्थितियां भी आएंगी।
मैं इसका भुक्तभोगी हूं। मैं कहीं भी किनारे सोया रहूं, तो लोग बेमतलब कहकर उठा देते हैं। पहले तो यार, इससे झगड़ा ही कर लो। न इसका स्थान है, न कुछ है। एकदम किनारे, घाट पर जाकर कहीं पड़े रहो, वहां से भी आकर उठा दे। क्या सोया है? बोले, यार इससे क्या मतलब है? न इसका घर है, न द्वार है। लेकिन मतलब है कुछ। तो मैं उसको देखता था, फिर धीरे से निकल जाता था। इससे क्या बोलूं? क्योंकि मैं कहीं जा रहा हूं। न इसका दरवाजा है, न इसकी जमीन है, इसका कुछ नहीं है। फिर भी बोल रहा है। तो इसका मतलब इसको उलझना है। लेकिन मुझे सुलझना है। इसको तो उलझना है। अगर कुछ होता, बोलता, तो समझ में भी आता कि बात सही कह रहा है। इसके दरवाजे पर सोए हो, क्यों सोए हो? नर्मदा तट पर एकदम किनारे सोए हो, और वहां से कहे, यहां क्या सोया है, चलो हटो। इतने दिन हो गए और तुम अभी तक सोए हो। उसे उलझना है, लेकिन मुझे सुलझना है। तुम धीरे से निकल लो। यह उलझा देगा। यह उलझाने के लिए आया है। उस समय परखने की शक्ति होनी चाहिए, सामने वाला क्या चाहता है। जब उसका कुछ नहीं है, फिर भी बोल रहा है, तो बस उलझना चाहता है। अपने खेल में आपको भागीदार बनाना चाह रहा है। झगड़ा करना चाहता है। अगर रास्ता होता, कुछ ऐसी बात होती, तो मुझे भी समझ में आता कि सही बोल रहा है। लेकिन वह न सही है न गलत। उलझना चाह रहा है। लेकिन मुझे नहीं उलझना है। मैं अपना चला जाता था।
विपरीत परिस्थितियों में आपकी स्थिति का पता चलता है। अनुकूल में नहीं। अभी तो आपके अनुकूल परिस्थितियां बन रही हैं। कभी विपरीत भी बनेंगी। उस समय सहनशक्ति होनी चाहिए, सामना करने की। फिर अपनी मंजिल का पता चलता है। समय मत गवाओ।
रात भर जागने के बाद नींद भी नहीं आ रही। ठंड के महीने में सारी रात जागा, सारी रात सत्संग चला। तड़के चार बजे उठा, तो सोने वाला तो सब सोचेगा। लेकिन मैं रात भर जागूं, सुबह जब सूर्य उदय होने लगे, धूप लगे, तब नींद आए। और उसी के बाद कोई आकर जगाए। इतना भी जंगल में नहीं जा सकता था, क्योंकि शरीर की भी रक्षा करनी है। जंगल भी था, लेकिन जा नहीं सकता था। वहां जाऊं तो जानवर मारे, यहां हूं तो इंसान मार रहा है। इन दोनों के बीच से निकलना है। जंगल में भी नहीं जा सकते, जानवर मार देगा। और घाट पर सो रहे हैं, तो इंसान मार रहा है कि क्या सोया है तू, दोपहर हो गई। उसका कोई लेना-देना नहीं। न उसकी जमीन है, न उसकी कोई दुकान। उससे कोई मतलब ही नहीं। तो ऐसे लोग भी मिलेंगे। बहुत परिस्थितियां बनती हैं। विपरीत परिस्थितियों में अगर आप स्थिर हो, तभी आपकी स्थिति का पता चलता है। अनुकूल में नहीं। विपरीत परिस्थितियों में आप वैसे बने रहो। और आएंगी विपरीत परिस्थितियां। ऐसा नहीं है, आएंगी।
एक घटना बताई थी। एक महात्मा जी ने मार दिया था। उस समय हमारा आखिरी समय चल रहा था। लगभग दिसंबर का महीना था, दो हजार उन्नीस। बड़ी परीक्षाएं होती हैं। हम अंदर सोए थे। हम दो लोग और थे। एक जन ने मुझसे कहा, बाहर परमात्मा की, ब्रह्म की चर्चा चल रही है, चलो देखते-सुनते हैं। मैंने कहा, चलो। मैंने कहा, मैं जाकर देखूं, सच में चल रहा है कि नहीं। पहले जांच तो लूं। मैं गया। डंडी स्वामी थे, लगभग पचास के ऊपर, साठ वर्ष के करीब, बुजुर्ग थे। कुर्सी पर बैठे थे। फटे-पुराने कपड़े, बिखरे बाल। मैंने कहा, महाराज जी, नर्मदे हर। वे ऐसे रहे, दो लोग बात कर रहे थे। फिर मैंने दोहरा दिया। साथ वाले ने कहा, देख ही लेते हैं। मैंने कहा, बैठकर बहुत गवाया। ग्यारह से निकला हूं, उन्नीस तक बैठा ही तो रहा हूं। ऐसे लोगों के पास तो देखूं, ब्रह्म की चर्चा हो भी रही है या कुछ और हो रही है। मैंने कहा, महाराज जी, नर्मदे हर। तब दूसरी बार उठे, और मेरे सीने पर जोर से मारे। इतने तेज मारे कि मैं बहुत दूर गया। एक बार मारा, फिर दो बार मारा। तीसरे बार सबने पकड़ा। और मैंने भी कहा, बुढ़ापे में हड्डियां नहीं जुड़तीं। मैंने अपने क्रोध को देखा। अभी भी मुझे उनसे द्वेष नहीं है। उस समय भी नहीं था। लेकिन जब दो-दो बार मारे, और कई महीने तक मेरा सीना दर्द रहा, इतना तेज मारे थे, तो मैंने कहा, बुढ़ापे में हड्डियां नहीं जुड़तीं। फिर मैंने क्रोध को देखा। हर तरह से मैं ताकतवर था, क्योंकि वे अकेले थे, हम तीन थे। और शरीर के बल में भी ताकतवर था। मैंने उस क्रोध को देखा। बहुत देर तक चिंतन किया। कहा, मुझे इससे निकलना है। जबान तक तो आ गया, लेकिन शरीर से प्रतिक्रिया नहीं दी। उन्हें रोकने की भी शरीर से कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। लेकिन आ गया। फिर मैंने उसे देखा। जब हटा, तो बहुत सारी बातें होती हैं। यह आखिरी समय मेरा था। विरोध करने वालों का, मेरे समझ से, वह आखिरी समय था। लेकिन उसके लिए दो बार मार खाया, बिना मतलब। कुछ नहीं किया था। नर्मदे हर तो बोल रहा था। मैं अपनी क्षमता से ही बोलूंगा न। वे यह भी बोल सकते थे, बैठो। वे डंडी स्वामी थे। डंडा उठाकर चल ही रहे हैं। टेस्ट उनका भी हो रहा था, मेरा भी हो रहा था। दोनों का हो रहा था। मेरे द्वारा उनका, उनके द्वारा मेरा। ऐसे ही तो प्रकृति करवाती है। मैंने यह भाव नहीं बनाया था कि उस आश्रम में जाऊंगा, ऐसा करूंगा। परिस्थिति वैसे निर्मित हो जाती है। उस टेस्ट में मैंने मार भी खाई। लेकिन मैंने शरीर से कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। जबान तक आया। एक इंद्रिय का प्रयोग तो हुआ। बहुत सारी स्थितियां ऐसी बनेंगी। व्यक्ति के द्वारा भी होती हैं, और परिस्थिति के अनुसार। जानवर के द्वारा भी हो सकती है। प्रकृति के द्वारा भी। भिन्न-भिन्न रूप को ही हम प्रकृति मानते हैं। प्राकृतिक आपदाएं जो आती हैं, वे किसी रूप में ही आती हैं। हमारे हाथ में नहीं होतीं। उनके द्वारा भी परिस्थितियां बनती हैं। जैसे-जैसे आप चलोगे, परीक्षा उनके द्वारा भी ली जाती है।
परीक्षा हमेशा स्कूल लेता है। परीक्षा आप थोड़ी लोगे। अगर आप कुछ पार करोगे, तभी परीक्षा होती है। टेस्ट होता है, हम कहां पहुंचे हुए हैं। आपकी परीक्षा प्रकृति तब लेगी जब आप चलोगे। जब आप स्कूल में पढ़ोगे, तो आपकी परीक्षा स्कूल लेगा। किस तरीके से लेगा, वह स्कूल तय करेगा। आप तय नहीं करोगे। लेकिन जो बच्चे स्कूल के बाहर हैं, उनकी परीक्षा नहीं होगी। ईमानदारी और सत्कर्म पर चलने वाले की, जब आप कहोगे कि अब मुझे कुछ नहीं चाहिए, अब मैं मूल स्थिति में जाना चाहता हूं, उसी क्षण से आपका एडमिशन हो गया। निकलने वालों में। बंधन में फंसने वालों की परीक्षा नहीं होती। जो बच्चे स्कूल के बाहर हैं, उनकी परीक्षा होती है क्या? लेकिन जिन्होंने पढ़ाई में एडमिशन ले लिया, उनकी परीक्षा होती है। तो प्रकृति आपकी तब परीक्षा लेगी जब आप कहोगे, अब मुझे इस भवसागर से निकलना है। तब समझ लीजिए, वहीं से आपका एडमिशन हो गया। आपने अपना नाम दर्ज करा लिया निकलने वालों में। अब आपकी परीक्षा होने लगी। अब आपके विपरीत परिस्थितियां बनेंगी। आप सोच भी नहीं सकते कि ऐसा भी मेरे जीवन में हो सकता है। वैसा होगा। बालक थोड़ी सोच सकता है कि कैसा प्रश्न आएगा। उसकी सोच से परे ही आएगा।
जब आप निकलने का भाव बना लोगे कि बस अब मुझे निकलना है, अब मैं निर्विकार होना चाहता हूं, राग, द्वेष, मोह, आसक्ति, इच्छा, अपेक्षा और कर्ता के भाव से मुक्त होना चाहता हूं, मैं बेईमानी नहीं करूंगा, समझ लीजिए आपका एडमिशन हो गया। आपका नाम दर्ज हो गया निकलने वालों में। अब वह परीक्षा कब लेगा, पता नहीं। तिमाही लेगा, छमाही लेगा, सालाना लेगा। कब, कहां, किस स्थिति में लेगा, कुछ बोल ही नहीं सकते। और तभी आपकी स्थिति का पता चलेगा। अगर कोई पहले से कहे कि मैं तुम्हें एक झापड़ मारूंगा, गुस्सा मत करना, यह तुम्हारी परीक्षा है, तो तुम गुस्सा नहीं करोगे, क्योंकि बोल चुका है। अगर बताकर परीक्षा हो, तब तो पास ही कर लोगे। परीक्षा तब होगी जब आपको पता ही नहीं रहेगा। अचानक आएगी। अचानक में ही पता चलता है आपकी स्थिति का। बताकर हो, तो नहीं। कोई कहे, मैं आपका अपमान करूंगा, लेकिन आप कुछ जवाब मत देना। प्लानिंग करके थोड़ी अपमान होगा। अंदर से कोई प्रतिक्रिया ही नहीं उठेगी, शारीरिक भी नहीं, मानसिक भी नहीं, क्योंकि प्लानिंग कर चुके हो। परीक्षा अचानक होती है। आप सोच भी नहीं सकते।
एक भाग तो यही खेड़ी घाट है, ओंकारेश्वर के पहले। हम गए, एक महाराज जी मिल गए। बोले, यहीं रुक जाओ। मैंने कहा, मुझे एक ऐसी जगह चाहिए, एकांत, जहां मैं साधना कर सकूं, क्योंकि मेरे पास अब रहने की जगह नहीं होगी। उन्होंने कहा, मेरे पास एक जगह है, तुम बैठो। बातचीत हुई, शाम हुई। जब रात हुई, तो कह रहे हैं, एक काम करो, अब जाओ। मैंने कहा, यार, दिन में ही बोल देते। सुबह तक भी मौका नहीं दिया। रात हो गई, अब जाओ। अब भरोसा नहीं है तुम पर। तो यह बात सुबह कह देते, या दिन में कहते। अब मैं कहां जाऊं, किधर जाऊं। लेकिन गया।
फिर जब ओंकारेश्वर में गया, क्योंकि मैं हर जगह छोड़ आया था, बहन का घर, हर जगह। तो ओंकारेश्वर में गया, घूमता रहा। अब मैं कहां रहूं, क्या करूं, कुछ समझ में नहीं आ रहा था। फिर एक बाबा थे, वहां रुक गया। अब बाबा की घटना बता रहा हूं। बहुत हंसी आई, बहुत रोना आया मुझे। बाबा बोले, रुक जाओ। रुक गया। सुबह पता नहीं क्या हुआ। उसका कोई तौलिया लेकर गया। बोला, तू मेरा तौलिया ले गया। अब मैं तो रोने लगा कि यार, आते-आते तौलिया पर अटक गया। अगर यह मुझसे कहे, तो मैं सौ-दो सौ तौलिया खरीदकर दे दूं। एक बार अगर यह मुझसे कहे, तो मेरी क्षमता अभी भी ऐसी है कि मैं एक नहीं, सौ-दो सौ दे दूं। और ओंकारेश्वर में ही रुकने का फैसला कर लिया था। उसने कहा, आपने मेरा ले लिया। बोला, बाबा। बोले, हम केस करेंगे, यह करेंगे। मैंने कहा, हे भगवान, मतलब कितना नीचे गिरा है। अगर यह बोलता, तो सौ-दो सौ तौलिया दे देता। अब आंखों से आंसू। उसको क्या जवाब दूं? क्योंकि इल्जाम लग गया। आप दो सौ तौलिया भी दे दो, कोई मतलब है क्या? अब रोने लगा। रोते-रोते वहां से चला गया। बोला, यार, तू भी रहने नहीं देगा।
एक ही कपड़ा पहनते थे। बैग भी नहीं था। कुछ नहीं था। चुराओगे कहां? वही तो बात है। कहीं रख दिया होगा। फिर रोते-रोते वहां से निकला। बोला, अब कहां जाऊं। अभी इस जगह पर नहीं रह सकता, क्योंकि चोरी का इल्जाम लग गया, वह भी तौलिया का। बोला, यार, अब यहां भी तूने रहने नहीं दिया। अब मैं कहां जाऊं। मेरे पास तो जगह ही नहीं है। फिर वहां से निकला। ओंकारेश्वर से लगभग एक किलोमीटर ऐसे आया।
मेरे पास एटीएम था। मुझे एटीएम से कुछ पैसे निकालने थे। पास वाले एटीएम में नहीं था, तो मैं पैदल दूर गया। वहां पैसे निकालना था। पैसा नहीं निकाल पाया। ऐसे रो रहा था, खड़े होकर, कि अब जाऊं कहां। इसलिए कि एक खोजी था। जा-जाकर हर जगह, आश्रम वगैरह में थक चुका था। सिर्फ रहने की जगह नहीं चाहिए थी। एक खोज थी, मिल नहीं रही थी। तो वहां अब कहां जाए, समझ में नहीं आ रहा था। क्योंकि हर स्थान से हट गया था, मानसिक भी, शारीरिक भी। लोग पसंद भी नहीं करते। स्थिति यह आ गई थी। मैंने इस समाज में देखा है, चाहे आपके पास धन हो, चाहे रूप हो, तभी आपको लोग पसंद करेंगे। कोई काबिलियत हो। अब पूरी तरह अध्यात्म में आ गया, तो मैं भौतिक वालों के किसी काम का नहीं रहा। न शरीर का उन्हें कुछ दे पा रहा हूं। वे मेरा रूप लेकर क्या करेंगे? उन्हें तो धन चाहिए। तो हर तरह से हट गया था।
तो रोने लगा। ऐसे रोता खड़ा था। तो एक महाराज जी जा रहे थे। वहां से मुझे देखने लगे। मैं उन्हें देखने लगा। एक-दूसरे को देखते-देखते हम एक-दूसरे के पास गए। फिर वहीं पेड़ था। बैठे, बातें करने लगे। बातें करते-करते उन्होंने कहा, चलो मेरे साथ। वे बहुत त्याग की बातें करते थे। उनके पास एक फोन था। मैंने कहा, जब इतनी त्याग की बातें करते हो, तो फोन क्यों रखे हो? बोले, तो इसको फेंक दूं? आप बोलो तो। मैंने कहा, मैं बोलूं, फेंक दोगे? बोले, अभी फेंक देता हूं। तो मैं समझ गया, मेरी बात मान लेंगे। मैंने कहा, फेंको मत, रखो, कोई बात नहीं।
फिर हम आगे गए। मुझे बहुत भूख लगी थी। मेरे अकाउंट में पैसे थे। मैं होटल में गया। पूछा, कार्ड से होता है? बोले, हां। फिर कहा, जाने दो। महाराज जी बगल में खड़े थे। आया, पूछा। बोले, जो मर्जी हो, खा लिया करो। उन्होंने कुछ नाश्ता कराया। नाश्ते के बाद होटल वाले ने कहा, नहीं, हम पैसे नहीं लेंगे उनको। फिर उन्होंने मुझसे कहा, एक करोड़ में तुम्हारा आश्रम बन जाएगा। वही महाराज जी बोले। मैंने कहा, नहीं, मुझे एक करोड़ नहीं चाहिए। मुझे आश्रम नहीं चाहिए। मुझे सिर्फ आत्मज्ञान के अलावा कुछ भी नहीं चाहिए। अगर मुझे कुछ चाहिए, तो सिर्फ आत्मज्ञान। उसके अलावा मुझे कोई बात ही नहीं करनी है।
फिर हम बहुत आगे आए। बात करने लगे। एक महाराज जी हमें रोक रहे थे। बोले, हमारे आश्रम में रुक जाओ। मैंने कहा, कितने समय में ज्ञान हो जाएगा? बोले, बारह साल। फिर बोले, आपको छह साल में हो जाएगा। वे वहां बारह-चौदह साल से रह रहे थे। मैंने कहा, यार, जब बारह-चौदह साल में इनको नहीं हुआ, तो मुझे छह साल में क्या होगा? बोले, चलो यहां से। फिर आगे आए। एक दिन पूजा कर रहे थे, तो उन्होंने मेरा पांव छुआ। पांव छूकर बोले, मैं तुम्हारे अंदर कुछ देखकर तुम्हारे साथ चला हूं। मैंने भी उनका पांव छुआ, कि मैं भी आप में देखकर ही चला हूं। फिर जब आगे आए, तो उन्होंने कहा, तुम्हें पूरे भारत में कोई आत्मज्ञान नहीं करवा सकता। मैंने कहा, जब पूरे भारत में कोई नहीं करवा सकता, तो फिर आपको भी छोड़कर जा रहा हूं, क्योंकि आप भी तो इस भारत में हो। चला था उम्मीद से। जब आपने मना कर दिया, अब मैं जा रहा हूं। वही चल दिया।
जब मुझे ज्ञान हुआ, तो मैं उस तौलिया वाले बाबा के पास गया, ओंकारेश्वर। क्योंकि वह बात खटक रही थी। मैं गया। बोला, बाबा, पहचाने मुझे? देखा। फिर मैंने कहा, मैं वही तौलिया वाला हूं। अरे, बोला, यार, तौलिया तो कोई और लेकर गया था। मैंने बिना मतलब तुमको बोल दिया। मैंने कहा, तुम्हारे बोलने से मुझ पर क्या बीती, वह तो मैं ही जानता हूं। बस इतना बोलकर निकल गए, कि तौलिया तो कोई और ले गया था, मैंने तुम्हें बोल दिया। लेकिन मेरे ऊपर क्या बीता, वह तो मैं ही समझ सकता हूं। फिर वहां से वह बात दिमाग से निकल भी गई। सच्चाई का पता तो चल गया।
बड़ी परीक्षाएं होती हैं। ऐसी-ऐसी परीक्षाएं होती हैं कि तुम सोच भी नहीं सकते। तुम पर ऐसे इल्जाम, ऐसी बातें, ऐसा अपमान होता है कि होता है, यह क्या, मैं कर सकता हूं क्या? लेकिन सीधा सामने वाला कह रहा है, तुमने किया। और पूरी भीड़ उसके साथ है। एक भीड़ है उसके साथ। तुम सिर्फ अकेले हो। तुम्हारी कौन सुनेगा? क्योंकि तुम्हारे पास कुछ है ही नहीं। न कोई पावर है, न कुछ है। क्योंकि तुम परीक्षा में खड़े हो। एक परीक्षा वाले के पास कोई पावर नहीं होती। कोई समूह नहीं होता। जैसे एक विद्यार्थी परीक्षा में बैठ जाता है, तो उसके पास कोई पावर होती है क्या? बलहीन है वह। उस समय उसके साथ कोई नहीं। यही हालत होती है। और ऐसी परीक्षा होती है, सोच भी नहीं सकते।
जैसे वह बाबा सुबह बोलता, तो दो-चार तौलिया लाकर दे देता। लेकिन उसने इल्जाम ही लगा दिया। तो तौलिया देने से उसकी छुटकारा नहीं होगी। लग गया न, इस समय। वह सोचेगा, हां, चोर बनता है, ईमानदार। बहुत तरह की परीक्षाएं होती हैं। बस इतना है कि आप अगर ईमानदार हो, और आत्मिक कल्याण की पूरी जिज्ञासा है, तो हर परीक्षा पास कर लोगे। यह मुझे पता है। अगर आपको कुछ नहीं चाहिए, सच में। आपके अंदर कोई लालच नहीं है। न कुछ बनना है, न नाम, न शोहरत, न पैसा। आप पक्का निकल जाओगे। अगर यह भाव प्रबल है, इस भाव पर टिके रहे, तो आप निकल जाओगे।
अब देखो, मुझे वह बाबा एक करोड़ दे रहे थे। और वे बाबा ऐसे थे, झोली में से कितने पैसे कहां से निकालते थे, समझ में ही नहीं आता। वे बाबा उस लेवल के भी थे। अगर वहां लालच होती, तो जागृत हो जाती, कि चलो यार छोड़ो। झोली में एटीएम। पृथ्वी पर कहीं रहने की जगह नहीं है। बाबा दे ही रहा है, तो ले ले। बहुत सारी परीक्षाएं होंगी। और बहुत परीक्षाएं पार करनी हैं। निकलने वालों के लिए। अब कोई सिर्फ नाम लिखवाने की योजना कर रहा है, तो उसे परीक्षा नहीं होगी। अगर कोई नाम लिखवाने की योजना ही कर रहा है, तो उसे परीक्षा में बैठना नहीं है। बैठना भी चाहेगा, तो नहीं बैठने दिया जाएगा। पहले कक्षा में बैठो।
बहुत विपरीत परिस्थितियां बनती हैं। बहुत अनुकूल परिस्थितियां बनती हैं। एक बार तो ऐसी अनुकूल परिस्थितियां बनती हैं कि लगेगा, मैं तो भगवान हूं। सामने वाला ऐसा मिल जाता है कि वह एक ही क्षण में तुम्हें भगवान बना देता है। वह इतना सेवा करने लगता है कि ऐसा लगता है, मैं ही भगवान हूं, मैं ही सब कुछ हूं। जितनी विपरीत परिस्थितियां, उतनी अनुकूल परिस्थितियां। ऐसा लगता है, मैं ही भगवान हूं। इतना सामने वाला सम्मान देता है। इतना फूलों की तरह बैठाता है। मतलब क्या चाहिए तुम्हें, बताओ। क्या खाओगे, क्या पियोगे, कैसे रहोगे। सोच भी नहीं सकते। और फिर एक विपरीत परिस्थिति ऐसी आती है कि भैया, तौलिया कहां ले गए। अब मैं नया था, वह पुराना था। ले जाने वाला पुराना आदमी था। मैं एक ही दिन गया था, रात एक रात बीती थी। तो मुझ पर शक की संभावना भी थी। अगर देखा जाए, तो वह भी दोषी नहीं। बोल सकते हैं। वह यह तो देख लेता, अगर चुराया भी है तो उसी के आश्रम में कहीं होगा। बैग ही नहीं है इसके पास। मैंने कहा, कपड़े, यह सब कुछ है। ढूंढ ले भैया। अगर इसके अंदर हो, तो नंगा भी हो सकते हैं।
अगर कभी उस तरफ चलना होगा, और वह बाबा होगा, तो मैं मिलाऊंगा आप लोगों को। ओंकारेश्वर चलेंगे, परिक्रमा मार्ग में है वह। अगर वह रहा, तो हम मिलेंगे। उस समय लाइव वालों को भी दिखाएंगे। याद तो होगी। वह कभी नहीं भूल सकता। क्योंकि मेरा कपड़ा, पहनावा, वह तौलिया, मेरा रोना, नहीं भूल सकता। बहुत परीक्षाएं होती हैं। सोच भी नहीं सकते।
सीता माता की परीक्षा हुई। बोले, अब निकल ही लो। एक काम करो, इनसे निकल लो। तो निकल जाना ही ठीक है। ये कभी तुम्हें पवित्र मान ही नहीं सकते। और कितनी परीक्षा दोगे। इसलिए ये अनेक तरह के लोग हैं। एक झुंड है। ये एक तरह के लोग तो हैं नहीं। एक तरह के लोगों को परीक्षा भी दो, तो हो सकता है जिसे तुम परीक्षा दे रहे हो, वह एक समूह कहे, और दूसरा समूह कहे, सब इसके एजेंट हैं। तो किस-किस को परीक्षा दोगे? जब आप परीक्षा में पास कर लोगे, तो कहेंगे, सब इसके एजेंट हैं। सारे दलाल हैं। आप अगर परीक्षा पास करना चाह रहे हो, तो कर ही नहीं पाओगे। तो निकलना ठीक है। इसलिए सीता माता ने कहा, अब निकल लो। क्योंकि इनकी परीक्षा में तुम कितना भी पास करो, ये तुम्हें फेल ही करेंगे। इनके पास एक ही है, फेल। क्योंकि फेल हैं। जिसके पास जो रहेगा, वही देगा। ये हर जगह से फेल हैं। एक दुखी, एक घुटन, व्याकुल, उदास, बेचैन, बेईमान, चांडाल। यही तो परीक्षा लेते हैं। पवित्र आदमी कभी किसी की परीक्षा नहीं लेता। पवित्र व्यक्ति किसी की परीक्षा नहीं लेगा। परीक्षा हमेशा दुष्ट लोग लेते हैं। तो होता यह है कि इस जगह से निकल जाओ। इसलिए तो मैं कहता हूं, निकल जाओ। तुम यहां कभी किसी का कुछ पूरा ही नहीं कर सकते। चाहे बेटा हो, चाहे पत्नी हो, चाहे बाप हो। आप किसी को कभी भर ही नहीं सकते। निकल सकते हो। निकल जाना ठीक है। आप इनका कभी भर ही नहीं सकते। तो शुरुआत ही मत करो। अगर शुरुआत नहीं करोगे, तब आपको ये कुछ नहीं बोलेंगे। अगर तुमने शुरुआत किया, तो एक दिन ऐसा आएगा, तुम इनसे गाली सुनोगे। कभी न कभी रुकोगी। शारीरिक, आर्थिक, फिर क्या होगा। वहीं से गाली देंगे। तो शुरुआत मत करो। निकल जाना ठीक है। अब शुरुआत कर दिए हो, तो निकलो।
मैं तो सोचता हूं, पच्चीस-छब्बीस की उम्र में। मैं सोचता हूं, अगर छह-सात साल में यह समझ आ जाए, तो निकल जाए। मैं तो पच्चीस-छब्बीस में निकला। मैंने सोचा, यह समझ कहां छह-सात साल में आ जाती। और भी कम में आ जाती। तीन-चार साल में। तीन-चार साल में यह समझ आ जाए कि यह जगत में रहने लायक नहीं है। निकल जाना ठीक है।
हर जगह युद्ध है। आप युद्ध के मैदान में पूरी तरह खड़े हो। आप कुछ भी हो, चाहे सात्विक हो, तामसी हो, राजसी हो। तीन गुण हैं, तीन प्रवृत्तियां हैं। आप कहीं भी खड़े हो, युद्ध के मैदान में हो। चाहे आप सात्विक हो, तो भी। तामसी हो, तो भी। राजसी हो, तो भी। और तीन में से एक गुण में तो रहना ही पड़ेगा। इससे बाहर भी नहीं रह सकते।
जिस गुण में रहोगे, एक गुण में रहे, तो दो तैयार, तुम्हारे दुश्मन। सात्विक में रहे, तो राजसी और तामसी दुश्मन नजर आएंगे। राजसी में रहे, तो सात्विक और तामसी। तामसी में रहे, तो वे दोनों। दुश्मन ही नजर आएंगे। मैंने देखा कि ये तीन गुण हैं, और आपके अंदर तीनों हैं। तीन में से एक में जीना पड़ेगा। तीन में से एक गुण अपनाना पड़ेगा। तो सात्विक गुण अपनाकर निकल लो। राजसी वाला भी ठीक नहीं है। तामसी वाला भी ठीक नहीं है। अब सात्विक अपनाना पड़ेगा, निकलने के लिए। नहीं तो मैं उसको भी छोड़ देता और सीधा निकल ही लेता। लेकिन निकलने वाली स्थिति में है नहीं। तो सात्विक गुण अपना लो, और निकल लो।
कभी तौलिया, कभी बांसुरी, कभी इसी में फंसे रहोगे। परिवार भी तो इल्जाम लगा रहा है। तुमने मेरे बारे में क्या बोला? तुमने क्या सोचा? तुम मेरे बारे में क्या सोच रहे हो? आप हर जगह देखो। परिवार में रोज किचकिच हो रही है। एक-दूसरे पर इल्जाम ही तो लगा रहे हो। इल्जाम पर इल्जाम ठोका जा रहा है तुम्हारे ऊपर। लेकिन तुम हो कि भाग नहीं रहे हो। काश भाग जाते। और हमारी तरह, उपलब्ध होकर, फिर उस तौलिया वाले के पास जाते, कि भैया, बता, तौलिया किसने लिया। काश तुम भी घर से निकलकर, उपलब्ध होने के बाद जाते, कि भैया, अब इल्जाम लगाओ। क्योंकि अब मैं इल्जाम के लायक भी नहीं रहा। लगा रहे हैं कि नहीं लगा रहे? लेकिन देखो, आप हो कि निकल ही नहीं रहे हो।
तुम्हारे लिए तो एक स्थान भी है। बुला रहा है। आप कितने सौभाग्यशाली हो कि परमात्मा ने आपके लिए एक इंतजाम भी करा दिया है। हमें तो शाम हुई। दिन भर नहीं बोला। उसी के साथ हूं। बोला, यहीं रहो, आराम से। कल चलेंगे। एक गुफा है, वहां आराम से साधना करना। रात होते ही बोल रहा है कि तुम यहां नहीं रह सकते। और आपको बताऊं, उसकी जगह ऐसी थी कि बांस भी मार रहा था। उसे बात पूछने की भी नहीं। दो-चार वरदान मांगता हुआ। दो-चार कपड़े थे। एक ऐसी छोटी सी कुटिया थी, सड़ी हुई। बांस मार रही थी। रात तो बितानी थी, क्योंकि उसने आश्वासन दिया था, गुफा दिखाऊंगा। लेकिन उसमें भी नहीं रुकने दिया। बोला, रात को अकेले अंधेरे में गुफा ढूंढ। तो मैंने यही कहा, आज दिन में बोल दिया होता।
आपको तो एक जगह पुकार रही है। जिसे आप गुरु समझ रहे हो, वह पुकार रहा है। मेरे जीवन में यह दोनों नहीं थे। मेरे सामने मुझे कोई पुकार ही नहीं रहा था। सिर्फ भगा रहा था। मुझे पुकारने वाला सिर्फ मैं एक था। मैंने अपना साथ दिया। तो तुम्हें तो एक जगह पुकार रही है। तुम क्यों सह रहे हो? तुम जिसे गुरु समझते हो, वह पुकार रहा है। लेकिन पता नहीं, उसकी पुकार तुम्हें सुनाई नहीं दे रही है। सब लेकर खड़ा है, कि तू आ, अपना आत्मिक कल्याण कर। मैं हूं न। आत्मिक कल्याण की सारी व्यवस्था यहां है। लेकिन तुम हो कि यह पुकार सुन ही नहीं रहे हो। और मैंने सोचा, कोई पुकारे। मुझे कोई पुकारने वाला मिला नहीं।
एक मेरा कर्म था, एक तुम्हारा कर्म है। तुमने जरूर कुछ सत्कर्म किया होगा। आप लोगों की यह बात मैं समझता हूं। आपके जीवन में कुछ तो सत्कर्म किया होगा, कि आपके अनुसार व्यवस्था मिल रही है, आपके अनुसार सत्संग मिल रहा है। मैं तो कभी-कभी तुलना करता हूं। मैंने कहा, यार, मैंने क्या किया था? क्योंकि एक दिन नहीं। दो हजार ग्यारह से दो हजार बीस तक का धिक्कार मामूली नहीं है। दो हजार ग्यारह से बीस तक मैं उस जगह रहता था, जहां रात बीते तो दिन का भरोसा नहीं, दिन बीते तो रात का भरोसा नहीं। चाहे मेरी बहन का घर हो, चाहे किसी का घर हो, चाहे कहीं भी रहो। रात बीते तो सुबह का खतरा, सुबह बीते तो रात का खतरा। यही बना रहता था। कभी-कभी बहन के घर से भी रात को चल देता था। कभी-कभी वे ऐसा शब्द बोल देते थे। यह नहीं था कि बहन के यहां आज रात बीतेगी। एक कवर जा रहा है, मुंह तक जाएगा कि नहीं, पता नहीं। कौन सी बात बुरी लग जाए। इतने सालों का यह हाल। और बीस को छोड़ो। बीस के बाद भी।
मुझे भुंडा में ही ऐसे सोना पड़ा। दो चबूतरा थे। हनुमान जी का मंदिर था। जिधर मैं सोया था, उसे परिक्रमावासियों को कुछ बांटना था। मैं रात को दो-तीन बजे तक जागता हूं। जब सोया, तो सुबह ही आकर सात-आठ बजे मुझे जगा दिया। दूसरा चबूतरा था बांटने के लिए। उसी दिन वह हुआ, तो मैं गांव छोड़कर चला गया। आपको गजेंद्र जी को बताया था न, कि हम लोगों ने दोबारा बुलाया, इन्हें। वह मेरे सामने फिर बात करने आया। बोला, नहीं, आज के बाद तू बात नहीं करना, जा यहां से। तो ऐसा नहीं कि बीस के बाद नहीं हुआ। ज्ञान के बाद भी मेरे साथ ऐसा हुआ। क्योंकि दिन-रात बोलता रहूं, और फिर जब सोऊं। अब देखिए, दो चबूतरा। बड़ी आश्चर्य की बात है। उस पर भी बांट सकता था, लेकिन उसने मुझे उठाना उचित समझा। मैं बोल सकता हूं कि जब तक कुटिया के पहले, सोलह मई के पहले, दो हजार चौबीस तक, मैं बेघर ही रहा हूं। मेरी रात कहां बीतेगी। दिन में मुझे सोने दिया जाएगा कि नहीं। रात भर यहां सोऊंगा कि नहीं। यह भी नहीं पता। यह जिंदगी मैं दो हजार ग्यारह से इतने समय तक जिया।
तो इस मामले में मैं आप लोगों को भाग्यशाली समझता हूं, कि आपके अनुकूल परिस्थिति आपको मिली। तो जरूर इसके पीछे आपका कर्म है। और जो मुझे मिला, मेरे पीछे मेरा कर्म था। तो इस मामले में आपको सौभाग्यशाली समझता हूं। लेकिन मैं फिर भी सोच रहा हूं कि यार, आप लोग पुकार सुन ही नहीं रहे हो। मुझे कोई पुकारा नहीं, फिर भी मैं चल दिया। मुझे अध्यात्म की तरफ मोड़ने वाला एक भी आदमी नहीं है। न मेरे घर में है, न मेरे गांव में है, न मेरे क्षेत्र में। मैंने अपने अंदर से अपने आप को पुकारा, कि तुझे इस मार्ग में चलना है। और मेरे जीवन में एक व्यक्ति भी ऐसा नहीं मिला। अगर कोई मिला, तो एक ही बात कही, कि जन्म-जन्म लगते हैं। बस एक वही, बद्रीनाथ के थे। उन्होंने कहा, तुम बहुत अच्छे संत हो। बद्रीनाथ की घटना बताई थी न।
तो मैं आप लोगों से कह रहा हूं, आप लोगों को कोई पुकार रहा है। आप लोगों को सुनाई नहीं दे रहा है। हो सकता है यह समय चला जाए, और फिर आप सोचो कि कोई पुकारे। पुकारने वाला ही चला जाए। पुकारने वाला भी कब तक पुकारेगा? आप ही देखो। किसी को बुलाना है, तो कितनी आवाज मारोगे? एक, दो, तीसरे में चेक करने लगोगे, क्या हुआ। या तो आवाज पहुंच नहीं रही है, या फिर जाओगे उसे खोजोगे। और पास जाकर पूछोगे, मेरी आवाज आई थी कि नहीं। अगर कहेगा, हां आई थी, तो क्यों नहीं आया। या तो तब छोड़कर चले जाओगे। या नहीं आई, तो अब आ गई, अब चलो। कहेगा नहीं, तो अब छोड़कर चले जाओगे। वह कब तक पुकारेगा। उसका भी तो एक समय है। निकल जाएगा। क्योंकि कैसे भी करके अपने आप को निकाला है। तो पुकारते-पुकारते चला जाएगा। ज्यादा दिन पुकारेगा नहीं।
मेरे समझ से पुकार सुनो, और अपने कल्याण में लग जाओ। आप लोग खाली हो, इसलिए बोल रहा हूं। अब इसको नहीं बोल रहा हूं, क्योंकि ये इधर भी लगे हैं, उधर भी लगे हैं। कुछ जिम्मेदारियां हैं इनके ऊपर। लेकिन आपके ऊपर थोड़ी है। आप जबरदस्ती जिम्मेदारी थोपे हो। पता नहीं क्या करना चाहते हो। क्या बनाना चाहते हो। अभी क्या बनाना है आपको? कुछ बनाना है? न कुछ बनाना है, न जिम्मेदारी सौंपी है। ट्रांसफर नहीं करी। पावर नहीं दी अपनी किसी को। तो पावर आपके हाथ में है, यह आपको लगता है। पावर आपके हाथ में है क्या? जो है, वह तो है ही। अगर पावर आपके हाथ में होती, तो आपने मुझसे कुछ बोला होता, तो करते न। आपके हाथ में छूछी चाबी है। मास्टर चाबी उधर है। आपके हाथ में बस चाबी है। मास्टर चाबी उनके पास है। तुम्हारे पास उतना ही चाबी है कि कुछ ताले खुलेंगे। उनके पास मास्टर चाबी है। वे हर ताला खोल देते हैं। और वे उतना ही ताला तुम्हें खोलने देंगे, जिसमें कुछ नहीं है।
जैसे दानपात्र रखा जाता है। तुम्हारे लिए दानपात्र रख दिया, कि बस तुम डाल सकते हो। निकाल सकते हो क्या? दानपात्र में डालकर निकालो, तो निकालने देगा क्या? मंदिर में जाओ, डाल दो, फिर निकालो। निकालने देंगे क्या? नहीं निकालेंगे। तुम्हारे पास वही है। तुम्हारे पास दानपात्र है। तुम सिर्फ डाल सकते हो। चाबी उनके पास है। जब उनको निकालना होगा, निकाल लेंगे। तुम सिर्फ डाल सकते हो। तब कौन सी पावर देकर आए? पावर तुम्हारे हाथ में नहीं है। लग रहा है कि आपको भ्रम है। पावर होती, तो आप अपनी मर्जी से कर सकते थे न, कुछ भी। जब हमारी मर्जी से हमें किया नहीं जाने दे रहा। हम अपनी मर्जी से नहीं कर पा रहे हैं। किया जाने दे रहा है। तो इसका मतलब पावर किसी दूसरे के हाथ में है। आपके हाथ में नहीं है। यही तो भ्रम है। आपके सामने दानपात्र है। सिर्फ डाल सकते हो, निकाल नहीं सकते।
अगर तुम सोचो कि दानपात्र में मैंने हजार डाल दिया, और तुम निकालने लगो, तुरंत दौड़कर आएंगे। बोलेंगे, क्या कर रहा है? बोलोगे, हजार डाला, सौ निकालूं। बोलेगा, चल, भाग। यहां सिर्फ डाल सकते हो, निकाल नहीं सकते।
बहुत समय पहले की, दो हजार छह के पहले की बात है। हम मेडिसिन लाइन में काम करते थे, वैक्सीन लाइन में। कैंपिंग होती थी। कैंप को लेकर हम भोपाल आए थे। हेपेटाइटिस बी और टाइफाइड के इंजेक्शन का। हुआ यह कि हम लोगों के पास में सिर्फ उतना ही पैसा था, जिसमें खा सकते थे। और चाहिए होता, तो कंपनी के मालिक से मंगाना पड़ता। हम एरिया में जा रहे थे। रास्ते में एक मदारी जादू दिखा रहा था। कहा, चलो, जादू देख लेते हैं। जादू दिखाने में रूमाल थी, उसमें आग लगा दी। बोला, कोई भी सामने आए, तो हम उसे आग लगा देंगे। कोई है ताकतवर? वहां तो कोई नहीं था। लेकिन एक बाबा जी, साईं बाबा की तरह टोपी ऐसे बांधकर, उस भेष में आ गए। बाबा जी आए। लोगों ने कहा, यार, ये तो ताकतवर है। वे खड़े हो गए। बोले, जला मुझे। मुझे जला। साईं बाबा के जैसे भेष था। साईं बाबा को तो प्रणाम करता हूं मैं। लोग बड़े जल्दी आस्था पकड़ लेते हैं। मुख्य बात को न पकड़ें, कुछ और पकड़ लेते हैं। उनके जैसा भेष लिया था। भेष तो रावण ने भी लिया था साधु का। फिर बोले, मैं हूं। अब उसने अपना जादू दिखाया। अब उन्होंने ऐसे किया। अब वह तड़पने लगा, छटपटाने लगा। जादूगर बोला, मुझे छोड़ दो, छोड़ दो, छोड़ दो। तो बोले, इसको मार दूं कि छोड़ दूं। अब पब्लिक तो है ही। पब्लिक हमेशा कहती है, छोड़ दो। बोली, छोड़ दो। चलो, तुम लोग कह रहे हो, छोड़ दिया। अब वह अपना बोरिया-बिस्तर फटाफट लपेटा और भागा।
तो बाबा ने कहा, आप लोगों को पता है, यह किसके द्वारा हुआ चमत्कार? कुछ लोग चले गए। कुछ लोग रुक गए। हम जैसे लोग, और भी हमारे साथ थे, सब रुक गए, कि देखें क्या चमत्कार है। तो एक नाग था लिए। बोले, इसके चमत्कार से। जिसको चाहिए, मेरे साथ आओ। नया बिजनेस पाना था थोड़ी। तो चल दिए। बाबा ऐसे बैठ गए एक जगह, जहां खंजाट-वंजाट होता है। वहां बैठ गए। अब लाइन से सबको कहा, सब लोग बैठो। बैठ गए। अब इसमें से कौन मुझे भोजन कराएगा? जितने लोग मुझे भोजन का पैसा दे सकते हैं, रुके। नहीं, तो जाए। कुछ लोग नहीं कराएंगे। तो उसमें से एक-दो लोग उठे, चल दिए। अब बचे पक्के लोग। तो बाबा ने पिटारा खोला। सांप था। बोले, इसको दूध पिलाने के लिए कौन पैसा देगा? तो एक ने दिया एक रुपया, दो ने दिया, तीन ने दिया। बाबा ने कहा, ओहो, नहीं नहीं नहीं, हम पैसे थोड़ी लेंगे। उसका वापस किया, उसका वापस किया, उसका वापस किया। फिर बाबा ने कहा, देखो, यह नाग मेरे पास एक है, और उसी के हाथ में जाएगा जो एकदम समर्पित होगा। चेला बनाना था। अब समर्पण दिखाएंगे न। तो बाबा ने फिर पिटारा खोला। दिमाग में तो है कि वापस दे देगा। अब ज्यादा डिमांड करेगा। अब की बार किसकी आस्था है। सबको लग रहा है, बाबा वापस कर देगा। एक बार कर चुका है। किसी ने पचास, किसी ने सौ दिए। मेरे पास एक नहीं था। मेरे साथ वाले ने दे दिया। उस समय मेरे पास भी होता, तो दे ही देता। क्योंकि दिखाना है कि मैं सबसे समर्पित हूं। एक नाग मुझे चाहिए। सबकी भाव यही थी। उसने कहा, अपनी पूरी श्रद्धा दिखाओ। तो सबने दे दिया। उसने अपना पिटारा बंद किया। बोला, जिसके हाथ में जाएगा, किसी को कहना मत। किसी को दिखाना मत। लेकिन वह नाग सबके हाथ में एक-एक दे रहा था।
सब खुश। लेकिन किसी को नहीं पता कि किसके हाथ में है। वह सोच रहा है, मेरे हाथ में है। क्योंकि उसने कहा था, नाग एक ही है। और बताना भी नहीं है, अभी नहीं, नहीं तो ताकत चली जाएगी। तो सब पोटली बांधकर खुश हैं। है तो सबके हाथ में, लेकिन सब यही सोच रहे हैं कि मुझे मिला, किसी को नहीं मिला। यह बात सब सोच रहा है। सब ले लिए। बाबा उठ गए। बोले, अब मैं जा रहा हूं। और जिसके हाथ में गया है, जाकर अगरबत्ती दिखाकर पहन लेगा। आपके हाथ में आया? सबके हाथ में एक-एक आया। एक भी नहीं छूटा। सबके हाथ में आया। प्रसाद की तरह बांट रहा था। उसके पास कई थे। सबको दिया उसने। मुट्ठी में दिया, बंद करो। जेब में ऐसे बंद कर लो। लेकिन किसी से कहना मत। एक के हाथ में जाएगा। तो आप इशारा करके भी नहीं कह सकते, मेरे में भी आ गया, तेरे में। कैसे कहें? पावर खत्म हो जाएगी। अगर मेरे में आया, तो पावर खत्म हो जाएगी। क्योंकि मेरे में आया, तो मतलब उसके में नहीं है।
कहानी का सार बता रहा हूं। घर पहुंचकर क्या किया? बाद में फेंका गया। उसका क्या होता है। दोनों ने सोचा होगा, मेरे पास भी होती अगरबत्ती। एक रुपए का नाग कुछ पत्तरा काम करेगा क्या? वह तो उस समय के लिए समझ रहा है। वहां हंसी की बात। आज भी मैं उस पर हंसता हूं। अभी तक सब उठकर जाने लगे। एक लड़का बोल रहा है, बाबा, बाबा। बताया कि मैं कहीं जा रहा हूं, ट्रेन से। मैंने आपको दो सौ दिया है। मेरे को सौ दे दो न, बाबा। तो बाबा बोला, जा, टीटी तेरे को देख भी नहीं पाएगा। वह बोल रहा है, बाबा, दो सौ दिया था। मुझे सौ दे दो न। टिकट का पैसा दे दो। मुझे अभी भी वह सीन दिखता है, और अभी भी उस सीन पर हंसी आती है। अपना पैसा देकर। कुछ ही मिनट पहले उसका पैसा था। अपना पैसा देकर, और उससे दो सौ के बदले सौ मांग रहा है। नहीं दे रहा है वह। बोला, टीटी तुझे देख ही नहीं सकता, तू जा। तुझे चींटी देख ही नहीं पाएगी। उसने किराया नहीं दिया। मुझे यह हंसी आ रही है, कि अपना पैसा देकर। आदमी अपना ही, कुछ ही मिनट पहले उसका पैसा था, और दो सौ देने के बाद सौ मांग रहा है। वह दे नहीं रहा। बोला, टीटी तुझे देख ही नहीं सकता, तू जा। और वह गिड़गिड़ा रहा है, मुझे टिकट का पैसा दे दो न।
वह भी कितना लालची। दो सौ क्यों दिया उसने? पावर के चक्कर में सबने इसलिए दिया। सौ क्यों दिया, दो सौ क्यों दिया। पहले जब पिटारा खोला, तो लोगों ने पांच रुपए, एक रुपए, एक रुपए दिए। कई लोगों से लेकर बोला, मुझे पैसे नहीं चाहिए। उसने सबको लौटा दिया। तो लोगों के दिमाग में यह हो गया कि यह सब वापस देगा। चाहे दो सौ दूं, चाहे चार सौ दूं। तो जेब में जितना था, निकालकर देने लगे। पावर के चक्कर में। कि मैं सबसे आस्थावान हूं। लोगों को यह भी था कि पैसा वापस आ जाएगा। दिमाग में एक बात घूम रही थी। और फिर उस नाग ने, उस मुट्ठी ने, बाबा को होल्ड कर दिया। बाबा को अगर पकड़ते भी, तो क्या। वह चल दिया, निकल लिया। मदारी का ही पार्टनर होगा वह। दोनों मिले थे, पब्लिक के सामने। नहीं, दोनों मिले थे। यह तो बाद में समझ में आया। हम लोग भी तो खाने का पैसा दे दिए। हम भी तो भूखे रहे। हमारा भी जितना था, खाने का पैसा बचा था, वह चला गया। हम लोग वापस रूम पर आए। न जाने का भाड़ा, न खाने का।
ऐसे ही तो पावर आपके हाथ में नहीं है। यह भ्रम निकाल दो। तुम डाल सकते हो। नाग में कुछ है नहीं। यह नाग ही देने जा रहा है। ट्रांसफर कर, कि मैं ताकत दे आऊं, अपनी नाग लाकर। हम भी अगरबत्ती। मेरे साथ डॉक्टर था। उसने भी अगरबत्ती दिखाया। पेट में भोजन नहीं। फिर शाम तक कहीं से पैसे की व्यवस्था की गई, तो खाया गया। जहां जा रहे थे, जा नहीं पाए, क्योंकि सारा पैसा बाबा के पास चला गया। तो यह हालत है, कि अपना देकर भी हम गुलाम हैं। अब दिखी न एकदम। तो यही हाल आपका भी है। वैसे वह बाबा आपके घर में है। मैं यह बताना चाहता हूं। वह बाबा से कम नहीं है। तुम्हारे बच्चे। हां, बाबा से कम नहीं है। मैं यह बताना चाहता हूं कि उनके लिए सहारा लग रहा है कि मालिक मैं हूं, बाप मैं हूं। और अपने काम के लिए उनसे विनती करनी पड़ रही है। वे हां कहेंगे, तो कर पाऊंगा। नहीं तो नहीं। और मेरी पूरी मर्जी है, ऐसा लगता है। तो ये बाबा की तरह तुम्हारे घर में भी हैं। जहां आप मालिक भी कह रहे हो, और कुछ कर नहीं पा रहे हो। और आप करना भी चाह रहे हो, और सक्षम भी हो सब। आपको करने नहीं दे रहे हैं। तो आप क्या हो, फिर बताओ। वे लोग क्या बाबा से कम हैं? मैं इस कहानी के माध्यम से यह बता रहा हूं, कि वे बाबा आपके घर में ही हैं। आप डाल सकते हो, निकाल नहीं सकते। फिर कहेंगे, जा, तुम जितने में जी सकते हो, उतना खाओ-पियो, पड़े रहो। जैसे वह बाबा बोला, तू जा, टीटी तुझे नहीं देखेगा।
मैं कहानी इसलिए बता रहा हूं। और यह जीवन की घटित कहानी है। यह कोई किताब की कहानी नहीं है। यह प्रत्यक्ष मेरे साथ ही घटी है। उस घटना में मैं तो कैसे भी। यह भ्रम तोड़ो कि मैं मालिक हूं। मालिक का मतलब, पूरा आदेश मेरा चलेगा। पूरा आदेश मेरा चले, तब मैं मालिक हूं। लेकिन अगर जहां मेरे आदेश का खंडन हो जाए, तो मैं मालिक नहीं हूं। और मैं कार्य भी ऐसा नहीं कर रहा हूं कि खंडन लायक हो, तो भी खंडन किया जा रहा है। तो इसका मतलब कहीं न कहीं मैं गलतफहमी में हूं।
गिरगिट देखते हो? शिकार करने से पहले शिकार के रंग की हो जाती है, और फिर शिकार कर लेती है। तो ये अपने लोग बनकर शत्रु हैं। गलतफहमी से हटो। इस भ्रम से हटो। और कैसे भी अपना कल्याण करो। जीवन में एक व्यक्ति तो मिल ही गया। पुकार रहा है, कि आ भैया, तेरे लिए सब व्यवस्था कर दी है। तू सारी चिंता छोड़, अपना कल्याण कर। क्योंकि वहां तेरी चल भी तो नहीं रही है। जिसके लिए तू मर रहा है, मिट रहा है, वहां तेरी बात भी नहीं मानी जा रही है।
आप यह मत समझना कि गुलामी कुछ और है। गुलामी यही है। मैं सर्वेसर्वा होते हुए भी, सबका मालिक होते हुए भी, और मेरी बात नहीं सुनी जा रही है, तो यह गुलामी नहीं तो क्या है? इसी को गुलामी कहा जाता है। ऐसा नहीं है कि आपको कोई जंजीर में बांधकर पेड़ में बांधे, तब तुम गुलाम। तुम चलते-फिरते गुलाम हो गए हो। अपने परिवार में, जहां मेरी भावनाओं को नहीं समझा जा रहा है, मेरी फीलिंग को नहीं समझा जा रहा है, मुझे नहीं समझा जा रहा है, तो वहां मैं गुलाम ही तो हूं। तो अगर ऐसा है, तो निकलो, और अपना कल्याण कर लो।
मुझे उस कहानी में यही हंसी आती है, कि अपना पैसा देकर भी भाड़ा मांग रहा है, और वह आखिर तक नहीं दिया। मैं वही देखता रहा। वह क्या देगा। उसको बड़ा मुर्गा फंसाएगा।
छोड़ दो। अगर मेरे स्वास्थ्य में मेरी उंगली ही रुकावट हो रही है, पता चला कि इसमें असाध्य रोग हो गया, तो मैं इसको कटवा दूंगा। और कटवाने का मूल्य भी दूंगा। तो अगर कोई भी बाधा मेरे आत्मिक कल्याण में आए, तो उसे छोड़ दो। त्याग ही परम सुख है।
नहीं। आत्मज्ञान के पहले ही आने लगती हैं। वाक सिद्धि तक। वाक सिद्धि में ही लोग भटक जाते हैं। आज्ञा चक्र के बाद ऊपर सहस्रार होता है। तो वाक सिद्धि में ही लोग भटक जाते हैं, ज्यादातर लोग, कि मैं बोल रहा हूं और हो जा रहा है। वाक सिद्धि के ऊपर बहुत कम लोग जा पाते हैं। सिद्धियां तब आने लगती हैं, जब आप आत्मज्ञान की तरफ बढ़ते हो।
हां, मालिक तब हो, जब आपकी चले। लेकिन मालिक का भ्रम है। मालिकपन का बहुत भ्रम है। नरेंद्र जी, आपको है कि नहीं? मालिकपन का भ्रम टूट गया? भ्रम था, टूट गया। मालिकपन का भ्रम तोड़िए, और अपने आत्मिक कल्याण में लगिए।
संकल्प किए, तो क्या किसी के सामने संकल्प कर रहे हो? किसी को बताकर कर रहे हो, ढिंढोरा पीट रहे हो, तब तो आ जाएगा। और अगर संकल्प आपने अपने अंदर लिया है, आपको ही पता है, और वह कार्य हो गया, तो अहंकार नहीं आएगा। क्योंकि अहंकार मेरेपन में जागृत होता है, अकेले में नहीं। अगर संकल्प किसी को बताए हो, तब तो पूरा होने के बाद अहंकार आएगा। अगर नहीं बताए हो, और आपका कार्य हुआ, तो नहीं आएगा।
कुछ भी बोल नहीं सकते। वह पता नहीं, स्थिति कब तक बनी रहेगी। एक हफ्ता, एक महीना, दो महीना। जैसे मैं कह सकता हूं कि मेरी यह स्थिति बनी थी दो हजार बीस के जनवरी के कुछ दिन। मैं तारीख नहीं बोल सकता। कुछ दिन ऐसी स्थिति आ गई थी कि मुझे कुछ नहीं चाहिए। मैं हो गया। यहां तक कि आत्मज्ञान की चाह भी नहीं रही। अब उसके बाद कई महीने लग गए। लेकिन कितना महीना किसको लगेगा, कुछ कहा नहीं जा सकता। जैसे कोमा में गया हुआ आदमी कब लौटेगा। कोई दूसरे दिन लौट जाए। कोई एक साल बाद लौट जाए। किसी को कितने साल लग जाएं। कुछ बोल सकते हैं क्या? नहीं बोल सकते। तो पता नहीं, उसमें कितना समय स्थिर रहना पड़े। कुछ कहा नहीं जा सकता।
मुझे जितना लगा, मैं बता रहा हूं। मैं भी पूरा ठीक-ठीक नहीं बता पा रहा हूं। मुझे भी वह अवधूत स्थिति आ गई थी। तारीख थोड़ी लिख रहा था। उस समय वीडियो नहीं बनते थे। वीडियो तो दो हजार इक्कीस से बनना शुरू हुआ। मैं तो रात-दिन बोलता था। तब वीडियो नहीं बनते थे। कुछ कहा नहीं जा सकता।
फिर आप लोग नियम में रहिए। जितने साधक और जिज्ञासु यहां रह रहे हैं, नियम में ही आपका उद्धार है। नियम में ही रहने का प्रयास करो। और अपने कल्याण में लग जाओ। अभी भी समय है, समझ है। नहीं तो एक दिन ऐसा आएगा, सब हाथ से चला जाएगा।
नहीं, बहुत कठिन है। इसलिए कठिन है कि एक जगह रह रहे हो, जैसे सात दिन आप यहां रहे, तो सात दिन में कोई तू-मैं नहीं हुआ। जब भी सोकर उठे, सत्कर्मी हुआ। इतना तुम्हारे घर पर थोड़ी मिलेगा। तुम्हारे परिवार में ही तू-मैं रोज होती है। कोई न कोई नाराज, दुखी रहता ही है। तो जितना आसान एक जीवंत गुरु की शरण में है, उतना घर में नहीं।
वैसे भी अगर ऐसे आश्रम में रहो, जहां उपलब्धि नहीं हुई, तो घर से ज्यादा बवाल है। घर से ज्यादा पंचायत है। अगर जीवंत गुरु है, आत्मज्ञानी है, और उसके शरण में रह रहे हो, तो जल्दी निकल सकते हो। अगर किसी ऐसे आश्रम में रह रहे हो, जहां उसको उपलब्धि नहीं हुई है, तो वहां राग-द्वेष बहुत ज्यादा होता है। ऊंच-नीच, राग-द्वेष, हर समय यही चलता है। तो आप और ज्यादा फंस जाओगे।
इसीलिए चिल्ला-चिल्लाकर गुरुओं ने कहा है कि जीवंत गुरु ढूंढो। जीवंत गुरु का सानिध्य ही आपको उभारेगा, तारेगा, आपके कल्याण में सहायक बनेगा। जीवंत गुरु के सानिध्य में रहो। वह चाहे जहां रह रहा हो। जीवंत गुरु वह है, जो अपने स्व में स्थिर हो गया हो। वह आत्मज्ञानी हो।
देखो, क्या होता है। मुझे कठोर बनना पड़ता है। अगर मैं कठोर नहीं बनता तो तेरा दर्द नहीं जाता। तू राउंड ही मारती रहती। हमने एक ही बात कही, या तो तू बैठ, या तो चली जा। उसी में तेरा दर्द गया। या तो तू चली जाती।
कठोरता गुरु, डॉक्टर, शिक्षक, वकील, इन सबमें होनी चाहिए। गुरु अगर शिष्य के हां में हां मिला दे, तो शिष्य का पतन हो जाएगा। डॉक्टर अगर मरीज के हां में हां मिला दे, तो रोग बढ़ेगा। जिससे रोग बढ़े, वही खाना रोगी को अच्छा लगता है। परहेज बता दो, चोरी-चोरी खाता है। तो डॉक्टर को कठोर बनना पड़ेगा। शिक्षक को कठोर बनना पड़ेगा। वकील का मतलब सलाहकार होता है। चाहे वह राजा का सलाहकार हो, चाहे किसी और का। वकील को भी कठोर बनना पड़ेगा। मुवक्किल के हां में हां कह दिया, तो गया। इसलिए मैंने तुमसे कठोरता की। और मैंने इनसे कहा भी था कि उसका दर्द चला जाएगा। क्योंकि मुझे मालूम है। उस दर्द का तुमने साथ दिया है। अपना साथ नहीं दिया। हमेशा दर्द का साथ दिया, इसलिए वह दर्द बढ़ता ही चला गया। और जब तुमने अपना साथ दिया, चाहे मजबूरी में, परिस्थिति में, लाचारी में, क्योंकि मैं अंदर से देखता रहता हूं। दोबारा राउंड मारती तो मैं भगा ही देता। देखो, तुम्हें क्या मिला। तुम उस दर्द से मुक्त हो गई।
इसलिए दर्द को मत बढ़ाओ। दर्द को वैल्यू मत दो। अपने आप को वैल्यू दो। शरीर की पीड़ा को वैल्यू मत दो। देखो, रोग नहीं है। जब तुम कुछ करोगी तो पीड़ा होगी। यह कुछ करने की पीड़ा है, तो उसे होने दो। जितनी पीड़ा हो रही है, उतना तुम उसमें आगे जा रही हो। जितनी पीड़ा सह रही हो, उतना उसमें बढ़ रही हो। एक दिन उस पीड़ा को पार कर लोगी। और अगर पीड़ा में पड़ गई तो गिर जाओगी। तुम कितना परेशान थी। अब कुर्सी पर भी राउंड नहीं मार रही। तो साधना में दर्द को कभी महत्व मत देना। दर्द साधना करने से ही आ रहा है। उस दर्द को महत्व मत देना। हम यही गलती करते आए हैं। दर्द को अपने आप से भी ज्यादा महत्व दे दिया। जरा सा दर्द बर्दाश्त नहीं होता, और कहानियां सुनाते हैं कि साधना करते-करते उनके शरीर पर कीड़े लग गए। रमण महर्षि को चूहे नोच-नोच कर खाने लगे। और तुम एक मच्छर भी बर्दाश्त नहीं कर पाते। एक पीड़ा बर्दाश्त नहीं। उन्नति कैसे होगी। लगाव तभी टूटेगा जब शरीर की पीड़ा को बर्दाश्त करोगे। साधना में शारीरिक पीड़ा उठेगी, मानसिक पीड़ा उठेगी। जब उस पीड़ा को बर्दाश्त कर लोगे, उसका साथ नहीं दोगे, तो आगे बढ़ जाओगे। पीड़ा का साथ दिया, चाहे शरीर की हो चाहे मन की, तो गिर जाओगे। गुरु को कठोर होना पड़ता है। मैं कठोर नहीं होता तो तुम राउंड ही मारती रहती। राउंड में चिंतन थोड़ा ही होता है।
कठोर तभी हुआ जाता है जब योग्य हों, जब सामर्थ्यवान हों। अगर गुरु खुद किसी पर निर्भर है, तो कठोर नहीं होगा। तब तो जैसा तुम चाहोगे वैसा बोलेगा। हम स्त्रियों को सेवा में नहीं लगाते। स्त्रियों को काम ही नहीं देते। करती भी है तो मैं मना करता हूं। तुम्हें कुछ नहीं करना है। पैदा हुई हो तभी से काम ही करवाया गया। बर्तन घिसे, झाड़ू मारी, पोछा मारा। इसलिए यहां स्त्रियों से भोजन भी नहीं बनवाता। बस आत्मिक चिंतन करना है। पैदा होते ही छोटा भाई हो तो बड़ी बहन उसकी मां बन जाती है। दोनों का नाक बह रहा है, वह एक को गोद में लेकर संभाल रही है। स्त्रियों का जीवन यही है। भाई का बचा हुआ बहनों को मिलता है। मैंने यह देखा है। यहां ऐसा नहीं किया। सब उल्टा कर दिया। कहीं तो इन्हें सुख दो, कहीं तो शांति दो।
माता जी को सेवा में लगाया है, क्योंकि वह स्त्री-पुरुष के हिसाब से थोड़ा ऊपर उठ गई हैं। उन्हीं को सेवा में लगाया। उन्हें वही जरूरत थी। कर नहीं पाई होंगी, इसलिए जरूरत थी। उनके लिए सबसे जरूरी वही था, इसलिए मिल गया। मैंने नहीं दिया, उन्हें मिल गया। देता तो सबको देता।
जीवन में यह याद रखना। साधना करते समय दर्द का साथ कभी मत देना। मानसिक पीड़ा हो या शारीरिक पीड़ा। साथ दिया तो आवेश और जज्बात में आकर चले जाओगे। अच्छा गुरु होगा, अच्छा सलाहकार होगा, तो कठोर बोलेगा। लाली-चिपड़ी बात नहीं करेगा, खुश करने के लिए। कठोरता में ही साधना होती है। पत्थर के साथ कठोरता ना की जाए तो प्रतिमा कैसे बनेगी। बनाने वाले को हमेशा कठोर होना पड़ता है। डॉक्टर कठोर ना हो तो ऑपरेशन कैसे करेगा। गुरु, डॉक्टर, वकील, सलाहकार, शिक्षक, इनको कठोर होना चाहिए। ऊपर से कठोर, नीचे से मुलायम, मोम की तरह, नारियल की तरह। ऊपर से कठोर, अंदर से कोमल।
तुम्हारे सामने प्रत्यक्ष अनुभव है। मैं कठोर नहीं होता, कह देता कोई बात नहीं, राउंड मारती रहो, दर्द हो तो सो जाया करो। क्या चिंतन होती। नहीं होती। ऐसे घूम कर चली जाती, कुछ नहीं होता, क्योंकि नियम में रह ही नहीं पाती। रोगी की तरह रहती। रोगी की तरह रहोगे तो अनुभव नहीं होगा। ऐसे घूम कर चले जाते हो और कहते हो कुछ हुआ नहीं। अब होगा। यहां से कुछ ना कुछ ले ही जाओगे। मेरा भाव यही है कि यहां आने वाला खाली ना जाए।
व्यवस्था में कोई कमी हो, साधक के लिए, जिज्ञासु के लिए, तो बताओ। स्त्री के लिए हो या पुरुष के लिए। यहां स्त्री-पुरुष का ऐसा भेद नहीं रखा। माहौल ऐसा बना दिया है कि सोचना ही नहीं पड़ता। ऐसी ऊर्जा है, ऐसा वाइब्रेशन है, कि बाहर कुछ सोचना ही नहीं। अपने आप में लीन होना है। बाहर जाने लायक यहां कुछ है ही नहीं। ना आवाज है, ना ऐसा दृश्य है। अगल-बगल ऐसा दृश्य नहीं कि बाहर चले जाओ। शब्द नहीं, दृश्य नहीं, सुगंध नहीं, स्वाद नहीं, स्पर्श नहीं। बाहर जाओगे कैसे। यहां सिर्फ अपने आप में जा सकते हो।
अपने आप में जाओगे तो बड़ी पीड़ा का सामना करना पड़ेगा। कभी शरीर की, कभी मन की। बाहर पीड़ा और भी ज्यादा होती है, पर वहां वह दब जाती है। बाहर के आवरण से पीड़ा को दबा देते हैं, और वह धीरे-धीरे मीठे जहर की तरह बढ़ती है। यहां पीड़ा प्रत्यक्ष दिखती है, शरीर की और मन की। पर उसी पीड़ा से तुम मुक्त हो रहे हो। घाव पर मलहम लगाओ तो बहुत पीड़ा होती है। जब तक मलहम नहीं लगता, घाव सड़ता रहता है, तब पीड़ा का पता नहीं चलता। पीड़ा तब होती है जब सफाई होती है। हाथ कसकर पकड़ने पड़ते हैं, नहीं तो सफाई नहीं होने देता। सड़ते समय पीड़ा नहीं होती, क्योंकि वहां तुम सड़ रहे होते हो। सड़ने में पीड़ा नहीं होती।
बहुत लोगों का घाव अंदर ही अंदर सड़ जाता है। बाद में काटना पड़ता है। कहते हैं, पता ही नहीं चला। जब मलहम लगेगा, इलाज होगा, चीर-फाड़ होगी, तब बहुत पीड़ा का सामना करना पड़ेगा। वैसे ही अपने आप में जाओगे तो शरीर और मन दोनों की पीड़ा आएगी। बस भागो मत।
उस दिन तुम भाग भी सकती थी। मैंने कहा भी था। विकल्प तुम्हारे पास था। ऐसा नहीं कहा था कि सात दिन रहना ही है। सब तुम्हारे हाथ में था। या तो साधना करो, यहां के नियम हैं, नहीं तो चली जाओ। दो में से एक करो। मुझे मालूम है तुम पीड़ा से गुजर रही हो, क्योंकि मैं भी गुजरा हूं। दया दिखा दूं तो तुम गिर जाओगी। मैं गिराना नहीं चाहता, उठाना चाहता हूं। इसलिए कठोर बनना पड़ता है। वैसे भी मैं कठोर हूं। बहुत कठोर हूं। अपने आप को भी नहीं छोड़ा।
साधना में मेरे पैर कटने की हालत तक आ गए थे। सड़ गए थे। मैंने कहा, कट जाए तो कट जाए। क्या फर्क पड़ता है। कितने शरीर धारण कर चुके हैं। यह भी तो नष्ट होने वाला है। इसे बचा नहीं सकता। एक समय आएगा, इस पैर का नाश हो ही जाएगा। तो लक्ष्य की तरफ बढ़ते हुए कट जाए, यही ठीक है। इसके चक्कर में पड़कर मुड़ गया तो मुड़ने में क्या बचेगा। इस पैर का करूंगा क्या, इस हाथ का करूंगा क्या। जीवन में घुटन है, अशांति है, बेचैनी है। तो इस हाथ का, आंख का, कान का, नाक का, मुंह का, इस शरीर का करूंगा क्या। लक्ष्य की तरफ बढ़ने में इसका नाश हो जाए। वैसे भी नाश होगा। बचाता भी रहूं तो भी नाश होगा। हर स्थिति में इसका नाश है। इसके चक्कर में मत पड़ो। इस साधन का उपयोग करो, उस परम साध्य तक पहुंचने के लिए। सिर्फ उपयोग करो।
जैसे घर कोई काम करने वाला आए, और थक जाए, तो तुम कहते हो बैठो मत। लंच करने लगे तो पूछते हो कितनी देर करोगे। कैसे खटाते हो। वैसे अपने आप को खटाओ। जब पैसे देने पड़ते हैं, तो एक पहर काम करके एक पहर आराम, यह तुम पचा नहीं पाते। कहते हो, काम करने आए हो तो काम करो, नहीं तो आधी मजदूरी ले जाओ। पूरी मजदूरी तब, जब काम करोगे। लंच में भी घड़ी पर नजर रहती है। पैसा भरा पड़ा हो, फिर भी नजर रहती है। अब लेट क्यों कर रहे हो, समय हो गया। दोपहर में मजदूर काम कर रहा हो, क्या दया आती है। दया आ जाए तो काम ही नहीं होगा। और काम जरूरी है, क्योंकि तुम भी कहीं मेहनत कर रहे हो। कोई शरीर से, कोई बुद्धि से। धूप में भी काम होता है।
उस पर दया करते हो क्या। उसे धूप नहीं लगती क्या। गर्मियों में गेहूं काटते देखते हो, कितनी धूप होती है। अपना बेटा निकले तो कहोगे धूप में मत जाना। अपनी कठोरता देखो। यह कठोरता अपने लिए लाओ। तुम कठोर नहीं हो, ऐसा नहीं है। किसान अपना बालक निकले तो कहेगा छाया में रहना, लू लग जाएगी। वही मजदूरों से तपती धूप में गेहूं कटवाता है। मजदूर बोले एक घंटा और आराम कर लूं, तो बर्दाश्त नहीं होता। पगार काट लेंगे। कठोर तो हो। पर कामनाओं में कठोर हो, वासनाओं में कठोर हो। काश अपने कल्याण में कठोर हो जाते। तुम बहुत कठोर हो। सोच भी नहीं सकते कितने कठोर हो। मैं आईना दिखा रहा हूं। अपने लोगों को बचाया, और दूसरों पर कठोरता दिखाई, वह भी कामना में, उनके भले के लिए नहीं।
यहां मैंने कठोरता की तो किसके लिए। तुम्हारे लिए। हो सकता था तुम्हारी बुद्धि नाराज होकर चली जाती, जाकर गालियां देती। कहती, कैसा आदमी है, साधु है, संत है, गुरु है। मैं दर्द में इधर-उधर दौड़ रही हूं, और यह कह रहा है बैठो, नहीं तो निकल जाओ। हरियाणा से इतनी दूर आई हूं, और महिला हूं। मैं महिला देखकर नहीं बोलता, पुरुष देखकर नहीं बोलता। मैं कल्याण चाहता हूं। इसलिए कठोर बनना पड़ता है। मैं यह नहीं देखता कि महिला हो या पुरुष। मैं एक जीवात्मा को देख रहा हूं, जहां ना नर है ना मादा। अगर मैं यह देखता तो इन्हें काम पर नहीं बोलता। काम करने वालों की यहां कमी है क्या। इनकी जरूरत नहीं थी क्या। थी। बहुत जरूरत थी। उसी काम की, जिसके लिए मैंने कहा। वह काम करते हुए अपने आप को पाती हैं। चिंतन से भी अच्छा उनके लिए वह है, क्योंकि करते हुए अपने आप को पाती हैं। जितनी देर काम करती हैं, उतनी देर उस परम सत्ता से लगाव रहता है। कहती हैं, मैं उसका काम कर रही हूं, मुझे मौका मिला। यह मेरा काम नहीं, उसका कार्य है। उसके कार्य का मौका मिला।
तो कठोर बन जाओ। अपने ऊपर अनुशासन करो। या किसी अनुशासन वाले को पकड़ लो। फिर उसे छोड़ो मत, क्योंकि वह बहुत कठोर होगा। तुम सरलता से सुधरने वाले नहीं हो। इतने जटिल हो गए हो, अपने आप को इतना गिरा दिया है, कि सामने वाले को बहुत कठोरता लानी पड़ेगी। ऐसे नहीं बदलोगे। एक-एक रुपए का हिसाब रखकर जीने वाले हो, नियम और संयम की बात करने वाले हो। वही हिसाब-किताब तुम्हें गिरा रहा है। समझ नहीं पा रहे। आज जहां भी हो, अपने हिसाब-किताब से ही हो। उसी से निकलना पड़ेगा।
काश इतना हिसाब कल्याण में लगा लेती। हिसाब कहां लगाया। कामनाओं में, वासनाओं में, वैभव बढ़ाने में, घर-परिवार बढ़ाने में। हमेशा उसके लिए लगाया जिसे छोड़कर जाना है। काश ऐसा गणित जीवन में लातीं कि उद्धार हो जाता। वह गणित थी। यह पैसा और यह चमड़ा है। चमड़ी और दमड़ी कही गई है। इसका चक्कर छोड़ो। इसमें हेर-फेर बहुत करते हो। एक शरीर के चक्कर में और एक पैसे के चक्कर में बड़े माहिर हो। एक रुपया इधर-उधर नहीं होता।
पर होगा क्या। सोम का धन शैतान खा जाता है। एक रुपया इधर-उधर नहीं हो रहा, पर शैतान आएगा। जितना बचाया है, किसी के पास जाएगा, और ऐसे व्यक्ति के पास जाएगा जो उसे खत्म कर देगा। उस संचय से क्या मिला, कि कोई बर्बाद हो गया। यह होना ही है। इतिहास में जाकर देखो। बचाते-बचाते एक आता है, और जितना सार पड़ा है सब खा-पीकर खत्म कर देता है। जिसे तुम बचा रहे हो, आने वाले समय में एक व्यक्ति उससे बर्बाद होगा। एक परिवार बर्बाद होगा। इसलिए उसका सदुपयोग करो।
ताकत हो तो उसे संचित मत करो। गलत व्यक्ति के पास चली गई तो वह अपने आप को और अपने साथ जितने हैं सबको बर्बाद कर डालेगा। अपने सामने ही ताकत का उपयोग कर डालो। धन की ताकत हो या शरीर की। जीवन भर संचित किया तो कल्याण भी नहीं हुआ। ताकत थी, उसे संचित कर दिया। ताकत खर्च करते तब बढ़ना होता। तुमने ताकत को लाया। लाने में ताकत खर्च हुई, और तुम धीरे-धीरे कमजोर हो रहे हो।
यह मत समझना कि समझ बढ़ रही है। जिससे समझ बढ़ाने की कोशिश कर रहे हो, वही धीरे-धीरे कमजोर हो रहा है। एक दिन समझ रह जाएगी, कर कुछ नहीं पाओगे। जहां लगता है समझ विकसित हो रही है, वहां ताकत कम हो रही है। पांचों इंद्रियां धीरे-धीरे कमजोर हो रही हैं। समझ बढ़ रही है, यह मत समझना।
ताकत से ताकत लाई, और संचित कर दी, उपयोग नहीं किया, तो नीचे चले गए। ताकत खर्च हो गई, ताकत कहीं जमा हो गई। मिला क्या। निर्बल हो गए, कमजोर हो गए। ताकत लगाई, ताकत लाई, ताकत संचित कर दी। पास नहीं रही। अब वह ताकत किसी के पास जाएगी। वह अयोग्य रहा तो उस ताकत से अपना पतन करेगा, और जो उसके साथ हैं उनका भी। आखिर में तुम्हारी ताकत का फल किसी का पतन होगा। इसलिए जितनी ताकत है, उसका सदुपयोग अपने कल्याण के लिए कर दो। सबके पास अपनी ताकत है। सब अपने हिसाब से जुटा लेंगे।
कठोर बनो। संचित मत करो। संचय के चक्कर में मत पड़ो। खर्च करो। सत्कर्म में लगाओ। ताकत का सदुपयोग करो। जैसे देखते हो कि किस बैंक में डालने से पैसा जल्दी दूना होगा। कहां खर्च करूं, प्रॉपर्टी में लगाऊं। एक का दो हो, दो का चार हो, यह हिसाब करते हो। कभी यह देखो कि क्या करूं जिससे मेरा उद्धार हो जाए। यह शरीर जिसके लिए मिला है, वह काम इस जीवन में करूं। यह कभी किया। सौ-दो सौ का चंदा देकर पीछा छुड़ा लिया। पीछा मत छुड़ाओ। ताकत है तो सत्कर्म में लगाओ। देखो कहां लगाना है।
गुरु नानक जी से व्यापार नहीं बन पा रहा था। पिताजी ने कहा, जाओ व्यापार करो। साथ में एक साथी लगा दिया। पूछा, क्या करूं। कहा, कम में लेना और ज्यादा में बेच देना। माल ले लिया, खरीदने वाला नहीं मिला। रास्ते में संत मिल गए। कपड़े थे, बांट दिए। लौटे। पिताजी ने पूछा, माल। कहा, सब बेच दिया, बहुत अच्छे दाम में। धन कहां है। कहा, बेच दिया। इतने अच्छे दाम में बेचा कि वह दिखेगा नहीं। पिताजी बोले, तू निठल्ला का निठल्ला रह गया। क्या वह निठल्ले रह गए। आज भी दुनिया प्रणाम करती है। पिता की नजर में निठल्ले हुए, क्योंकि उनकी नजर धन, वैभव, कामना और वासना पर थी। आज हम उन्हें प्रणाम करते हैं। उनके बताए मार्ग पर चलते हैं। देश-विदेश में गुरु नानक जी के द्वारा लंगर चलता है, भंडारा चलता है। एक व्यक्ति ने ऐसा काम करके गया कि लाखों-करोड़ों लाभ ले रहे हैं, और करोड़ों का कल्याण हो रहा है। जीवन में ऐसा कुछ करके जाओ।
वैभव समेटना, प्रॉपर्टी खड़ी करना, फिर कोई पैदा होगा और सोम का धन शैतान खा जाएगा। शैतान आता ही है। शैतान वहां जाता है जहां माल होता है। जहां ज्यादा माल, वहीं शैतान। बड़े घरों में देखो, बच्चे क्या लेते हैं। ड्रग्स, अफीम, चरस, हीरोइन। शैतान वहीं पैदा होता है जहां माल दिखे। चोर चोरी वहीं करता है जहां माल हो। किसी निर्धन के यहां नहीं। घर में माल नहीं तो चोर चोरी नहीं करता। वैसे ही शैतान वहां पैदा होता है जहां वैभव हो, सुख-सुविधा हो। कोई महान पैदा हो जाए तो उस धन को छोड़ देता है। कितने राजा-महाराजा भिक्षुक हो गए। पैदा तो हुए, पर छोड़ दिया। कहा, इससे हटो, दूर हटो। तभी कुछ पाना हो सकता है।
अपनी ताकत का सदुपयोग अपने कल्याण के लिए करो। जिम्मेदारी भी निभाओ, और सदुपयोग भी करो। ताकत वहां लगाओ जहां से कल्याण हो। पैसा लगाते समय कितनी पूछताछ करते हो, कहां बढ़ेगा। कभी यह पूछताछ करो कि आत्मिक कल्याण जल्दी कैसे हो, ताकत कहां लगाऊं। एक जगह लगाओगे और ताकत बढ़ेगी, तो इस भवसागर से निकल पाओगे। यहां ताकत चाहिए। तुम ताकत से ताकत ला रहे हो, पर ताकत तुम तक पहुंच नहीं रही। संचित कर दे रहे हो। यही गलती हुई। ताकत खूब बढ़ी। नहीं बढ़ी, ऐसा नहीं। पर ताकत खर्च की, और ताकत को अपने तक आने नहीं दिया। किसी को दे दिया। आखिर में अपने आप को निर्बल पाओगे, असहाय पाओगे। क्या करूं बाबा, यह हाल होगा। जिसे ताकत दी, वह लौटाएगा नहीं। तो ताकत खर्च करो, ताकत लाओ, और सही जगह लगाओ, अगर कल्याण चाहते हो। धन की हो, तन की हो, समझ की हो।
एक दिन ताकत खत्म होने वाली है। यह मत समझना कि संचित कर ली तो रह जाएगी। ऐसे ही नाश हो जाएगा। बैटरी चार्ज करके रख दो, इस्तेमाल करो या ना करो, खत्म हो ही जाती है। ताकत को बचा नहीं सकते। कहीं ना कहीं खर्च होगी। लगता है कि बचा रहे हो। बचा ही नहीं सकते। ताकत रुकती नहीं। घूमती रहती है, कभी यहां कभी वहां। जब से समझने लायक हुए हो, ताकत को ही बचाना चाह रहे हो। यही गलती हुई। मुझसे यह गलती नहीं हुई। मैं सामने हूं। बचपन से यह गलती नहीं की। ताकत को समाज में, सत्कर्म में खर्च करता रहा।
घर का बगीचा रखवाने कोई भेजे, तो मैं कहता, तोड़ लो। घर वाले ना देखें, सब तोड़ डालो। अभी खाने वाले मौजूद हैं। वे लोग उधर हैं, उतना खा भी नहीं पाएंगे, बेचेंगे। और सामने खाने वाले खड़े हैं। तोड़ लो, पर घर वाले ना देखें। मुझसे डरने की जरूरत नहीं थी। डरते भी नहीं थे। मेरे सामने तोड़ लेते थे। मैं कहता, बस वे लोग ना देख लें। फल नहीं खाने देते अपने बगीचे का, तो राक्षस ही हुए। एक व्यक्ति खाना चाहता है, परमात्मा ने उसे बनाया है, और तुम कहते हो तोड़ना मत। ऐसी दुर्दशा होगी, सोच नहीं सकते। मैं कह देता, बच्चे आएं तो तोड़कर आइसक्रीम खिला देना। मुझसे डरने की जरूरत नहीं।
धन भी कमाता था, तो सब खर्च कर देता था। जहां रहूं, उन लोगों को दे दूं। सारा धन कहीं ना कहीं बांटने में ही कर दूं। मेरे ऊपर कर्ज ही रहता था। जितना कमाता, कर्ज में ही रहता। कमरे का भाड़ा अलग से नहीं देना पड़ता था, खुराकी भी नहीं देनी पड़ती थी। लाखों रुपए आते, तब भी कर्ज में ही था। मेरा लगाना बहुत ज्यादा था। लेने वाले बहुत थे। मेरे पास बहुत आते थे, और मैं देता रहता था। जरूरत पड़े तो ना नहीं कहता था। उनके लिए कर्ज ले लेता था। झेलता भी था। अभी भी भर रहा हूं। पर लगाया ऐसा कि आज मैं यहां हूं। ऐसी जगह लगाया। मेरे पास कुछ नहीं, पर मेरे पास मैं हूं। कर्ज से कभी मुक्त नहीं हो पाया। लगाना बहुत तगड़ा रहा।
ताकत कभी रुकती नहीं। तुम्हारी सबसे बड़ी गलती यह हुई कि ताकत को रोकना चाहा। लगाओ। ज्यादा से ज्यादा वहां लगाओ जहां वही पैसा लौटने की संभावना ना हो। ऐसी जगह लगाओ कि सामने वाला सुखी हो जाए, संपन्न हो जाए। इस भाव से कि उसके दुख-दर्द मिट जाएं। जरूरतमंद के पास लगा दो। देखो जरूरत कहां है। ताकत है तो खोजना है, कहां जरूरत है। ताकत को रखो मत। यही सबसे बड़ी गलती है। मैंने कभी सेविंग नहीं की। घर नहीं है, इसका डर कभी नहीं हुआ। एक ही बात लगी रहती थी। काम है तो घर है, भोजन है। काम मिलेगा तो दोनों मिलेंगे। बीमारी आएगी तो दवा भी आ जाएगी। बीमारी आ सकती है तो इलाज भी आएगा। ऐसी बीमारियां भी आ सकती हैं जिनका नाम तक नहीं सुना। इलाज के लिए अलग से क्यों सोचना। यह हमने कभी सोचा ही नहीं। बीमारी आएगी तो इलाज भी आएगा।
जिस पीड़ा से परेशान थी, उसका इलाज भी चलता रहा होगा। यह पीड़ा पहले नहीं थी, बैठने से उजागर हुई। किसी भी मुद्रा में देर तक बैठो, तो एक तरह से रोगी ही है। और लोग बैठ रहे हैं, तुम नहीं बैठ पा रही। इसका इलाज कभी कराया था। नहीं। अभी उजागर हुई है। दर्द की गोली कभी खाई थी। नहीं। इतनी तेज पहले हुई नहीं, क्योंकि इतनी देर बैठा नहीं जाता था। दर्द होने से पहले ही उठ जाती थी। मेरा कहना यही है कि रोग आएगा तो इलाज आएगा।
तुम लोग सारी व्यवस्था मत करो। पूरी जिंदगी की प्लानिंग बना लेते हो। और प्लानिंग अपने ही दायरे में होती है। अगर काम कर रहे हो तो सब मिलेगा। बस इतना पता होना चाहिए। काम कर रहा हूं तो सब मिलेगा। ताकत को सही जगह लगाओ। जरूरतमंद की सेवा में लगाओ। भूखे को भोजन, प्यासे को पानी। जिसके तन पर कपड़ा नहीं, जिसके पास दवा नहीं। जितनी सामर्थ्य हो, वहीं तक। वहां लगाओगे तो ताकत बढ़ेगी। रिटर्न भी आएगा। प्रकृति को जितना देते हो, कई गुना लौटाती है। अच्छा दो या बुरा दो, उससे उसे मतलब नहीं। कई गुना लौटता है।
सलाह यही है। ताकत सही जगह लगाओ। रोकने के चक्कर में मत पड़ो। नहीं तो तुम भी बर्बाद, और जिसके लिए रोक रहे हो वह भी। ताकत खर्च करके तुमने लाई है। उसकी वैल्यू तुम्हें पता है, उसे नहीं। इसलिए बाप मकान बनवाता है, बेटा गिरा देता है। कहता है नक्शा पसंद नहीं। बाप की जिंदगी लग गई उस घर में। बेटा नहीं गिराए तो नाती गिरा देगा। कहेगा डिजाइन पसंद नहीं, माहौल बदल गया, गिरा दो। जो ताकत तुम संचित कर रहे हो, उसकी वैल्यू तुम्हें पता है। मैंने जिंदगी लगा दी। उसने नहीं लगाई, जिसके लिए रखा है। वह नाश कर देगा, मौज ले लेगा। मेहनत से थोड़ी लाया है। ऐसे ही मिला है। योग्यता उसकी नहीं थी। यह तुम्हें पता है, उसे नहीं। इसलिए बच्चों को संस्कार दो। पढ़ाओ-लिखाओ, अच्छे संस्कार दो। पर ताकत को रोकने की कोशिश मत करो। उसे खर्च करो।
परेशानी का कारण तुम मत बनना। एक तो परेशानी है नहीं। दूसरा, इसी नियम में रहो। नियम में ही कल्याण होगा। नियम सर्वोपरि है। नियम में ही उद्धार छुपा है।
पलंग में ही क्यों बैठना। नीचे क्यों नहीं बैठना। अच्छा, रूम है, छोटा है। देख, अगर नीचे जगह हो तो नीचे बैठ। जगह नहीं है तो पलंग पर ही बैठ।
यहीं रह जा, क्योंकि मौन घर पर नहीं हो पाता था। मैं कह रहा हूं, यहीं रह जा। आराम से रह। यहां तो बड़ा है, यहां बैठने की जगह है। जिस मौन की तलाश थी, वह मिल गया। लोग कह रहे थे कि गलत काम कर रही है, जादू-टोना सीख रही है। चल, कोई बात नहीं। हो गया।
पैसे देकर नहीं देते। तो बोल दे, भाई पैसे दो तो लूं, नहीं तो जाने दो। वे कहते हैं, पैसे नहीं दूंगा। पैसे लेना है तो दूसरी दुकान में जा। यह भी सही है। तो ले लिया कर। तेरे काम को अच्छा समझकर ही दे रहे होंगे। कोई बात नहीं। ऐसे भी कहते हैं, मजदूरी करती हो, लेके चली जा, पैसे मत दे। पैसे देना है तो दूसरी दुकान में चल।
कोई साड़ी दे दे, कपड़े दे दे, खाना दे दे। मूल्य नहीं लिया, तो ठीक है। तेरे पास अगर कुछ हो तो उसे भी दे देना। नहीं लेने से मुंह फुलाते हैं, विरोध करते हैं। अभी तक लेती थी, अब क्यों नहीं लेती, यह बोलते हैं। नहीं, ले लिया कर। लेकर दूसरे को दे देना। जो भी दे, ले लिया कर। बस जहर मत लेना। मीराबाई को जहर नहीं दिया गया था क्या। दिया गया था। तो यह मत सोच। बस जहर मत लेना। बाकी कोई विदाई दे, कोई सामान दे, ले लिया कर। सब गठरी में ले ले। एक ही बात का ख्याल रखना। जहर कोई दे तो ना लेना, और जहर देना भी मत। कोई भी सामान दे, ले लेना। किसी का दिल मत तोड़ना।
तू उस तरफ लेने वाली बन जा। कोई ना ले, तो बोल, हम लेने के लिए तैयार हैं, मुझे ला दो। लिखवा दे कि अगर कोई ना ले तो मैं लेने के लिए तुम दे देना। साड़ी हो या कोई और चीज। बोल, हम तैयार हैं, लाकर दो। जरूरत नहीं रहती तो बांट देना। जरूरतमंद बहुत हैं, लेकर देना। हिसाब से लेना। जरूरत वाले लेते भी नहीं। जिसके पास भरा है वही लेता है, वही मांगता है। जिसको जरूरत नहीं, वही कहता है दे दो।
ज्यादा हो तो मेरे को दे देना। मैं जरूरतमंद बहुत हूं, मुझे बहुत चाहिए। मैं सब ले लूंगा। गाड़ी भी भेज दूंगा। चूड़ियां, साड़ियां, सब ले लूंगा। यहां जितने कार्ड आते हैं, इस क्षेत्र में कोई भी कार्ड आ जाए, एक साड़ी जाती है। आश्रम से, कुटिया से यह तय है। लड़के का कार्ड आए तो भी लड़की को जाता है। लड़की का कार्ड आए तो भी लड़की को ही जाता है। जितने कार्ड आते हैं, उनको इक्कीस सौ रुपए और एक साड़ी।
अब छोड़ दिया। पहले शरीर की बीमारी का इलाज करता था। फिर पता चला कि शरीर की बीमारी ठीक करने से कुछ नहीं होगा। शरीर की बीमारी के पीछे कोई और बीमारी है। शरीर बीमार क्यों होता है। कोई उसके अंदर बीमार है। पहले साधना करके ऐसी शक्ति हासिल की थी कि लोगों का दर्द दूर कर दूं। शरीर का दर्द ठीक हो जाए, यही चाहता था। फिर लगा, नहीं, इसके पीछे कोई है। दर्द शरीर को नहीं हो रहा। पीछे वाला है, उसके कर्म से दर्द हो रहा है। उसका इलाज कैसे हो। उसका इलाज लेकर मैं अभी यहां आया हूं। तब वह शरीर वाला इलाज छोड़ दिया। पूरी तरह ठीक करना चाहता हूं। इसलिए वह छोड़ दिया। अब उसकी जरूरत नहीं। शरीर के पीछे वाले को ठीक कर रहा हूं।
खूब देखा कर। तू आ भी गई। अब रह ले। मौन की तलाश खत्म हो गई। जाने की जरूरत क्या है, आने के लिए। जब सब छोड़ ही दिया है, तो जाना किसलिए। तेरे पास मोह-माया कुछ है ही नहीं। हकीकत यही है। पति की जो जंजीर लगती थी, उसे छोड़कर आई है। याद भी नहीं आ रहे, ना तू उन्हें याद आ रही होगी।
बढ़िया है। जब मुक्त हो तो जाने की क्या जरूरत। जाकर देख। नहीं जाकर देखेगी तो पता नहीं चलेगा कि जंजीर से मुक्त हुई कि नहीं। तू तब तक रह, जब तक कोई लेने ना आए। कोई जंजीर नहीं है तो जाने की जरूरत क्या है। आराम से रह। यह भाव बना ले कि अगर कोई लेने आए तो जाऊंगी, नहीं तो जाना ही कहां। जैसी जगह चाहती थी, वैसी मिल गई।
काम भी छूट गया। फाइनल बता, अब जाएगी नहीं। मैं वही कह रहा हूं। जब कोई लेने आए, तब जा। लड़की रोती है, मां तेरे सहारे हूं। मां है तो मां है। तू यहां रहे तो वह कभी भी आ सकती है। इतनी दूर अभी नहीं आ पाएंगे। हिम्मत वे भी बना लेंगे। छोटे बच्चे नहीं हैं कि दूध पिलाना हो, खिलाना-पिलाना हो। सबसे तू मुक्त है। अब नहीं जाएगी, तब समझ लेना कि मुक्त है।
मुक्त है, जंजीर नहीं है, और जैसी जगह चाहिए थी वैसी मिल गई। फिर जाना क्यों। गई और वापस ना आ पाई, तो कम से कम यह जगह तो है। शरीर कहीं भी छूटता है। साधना के स्थान पर छूटे तो अच्छा है। बहन ने गुस्से में कहा, जा रही है तो दोबारा आना मत। अपनी मर्जी की मालिक है। तू अपनी मर्जी से आ गई। अब इधर ही रह।
पति ने कहा, जा रही है तो जा, मैं यहां खुश रहूंगा। नाती-नातिन में, बेटे-बहू में उनकी माया पड़ी है। तुझसे ज्यादा लगाव वहां है। जगह मिल गई। आखिरी जैसी इच्छा थी, वैसी जगह मिल गई। फिर क्यों जाना। वहां तुझे कोई नहीं चाहता। तू किसी को नहीं चाहती। अंदर से तू किसी के लिए नहीं है। तो खत्म कर। आराम से रह। फिर नहीं जाएगी।
तारीख फाइनल नहीं बता पा रही। आने का टारगेट नहीं बनाया, जाने का भी नहीं। इक्कीस दिन भी रुक सकती है, इक्कीस साल भी। यहां खाना-पीना मिल रहा है। आराम से रह। साधना के लिए मौन मिला। पर मौन में तू रहेगी नहीं, इसलिए बोल रहा हूं। आखिरी इच्छा यही थी कि कोई साधना का स्थान मिल जाए। बहुत दिन से तलाश थी। वहां तुझे कोई नहीं चाहता, ना तू किसी को चाहती है। कोई कामना नहीं, कोई इच्छा नहीं।
जब इच्छा नहीं है, तो ऐसा ना हो कि तू गई और शरीर वहीं छूट जाए। कम से कम साधना के स्थान पर छूटे। शरीर तो कहीं भी छूटता है। वहां भी छूट सकता है। आखिरी इच्छा साधना के स्थान पर छूटे, तो जन्म भी साधना के स्थान पर हो सकता है। यह बात समझना। ऐसा नहीं कि हो ही नहीं सकता। आखिरी घड़ी में जहां छोड़ते हो, जैसी कामना रहती है, जैसी इच्छाएं रहती हैं, वैसी ही गति होती है और वैसा ही जन्म होता है।
पूजा-पाठ छोड़ दिया, दिया जलाना छोड़ दिया, त्योहार नहीं मनाती। लोग कहते हैं हिंदू धर्म छोड़कर दूसरे धर्म में चली गई। उनकी सोच है। तुझे किस बात की तकलीफ है। तू लेगी भी नहीं, सोची भी नहीं। आराम से रह। अब पक्का हो गया, नहीं जाएगी। इक्कीस दिन तो पक्का कह रही है।
जंजीर के पीछे जंजीर है। एक जंजीर है। उसे सिर्फ गुरु देखता है। तुझे दिखाई नहीं देती। गुरु दिखा देगा। इसलिए गुरु को दर्पण कहा गया है। तू जैसी है, वैसी दिखा देगा। एक जंजीर तू देख पाती है। एक जंजीर नहीं दिखती। वह जंजीर गुरु देखता है।
जैसे पता है कि रोग हो गया। कौन सा रोग है, यह पता नहीं। बस इतना पता है कि रोग हो गया। सामने सारी दवाएं रख दी जाएं तो भी नहीं पता कि रोग कौन सा है, कौन सी दवा लूं। उसके लिए डॉक्टर चाहिए। डॉक्टर मशीन से, अपनी समझ से जांच करेगा, तब बताएगा यह रोग है। तुझे दर्द का पता है। कौन सा रोग है, पता नहीं।
वैसे ही कुछ जंजीरें तू देख पाती है। वह जंजीर आसान है। उसके पीछे एक गहरी जंजीर है। वह गुरु के सामने दिखती है। जो जंजीर अभी दिख रही है, वह हल्की है। ऐसी बेड़ी है जो खटाखट टूट जाएगी। पर उसके पीछे जंजीर है, कसकर बंधी हुई। वह जंजीर गुरु दिखाता है।
तू कहती है, समझ में कुछ नहीं आ रहा। देखती हूं तो दिखता ही नहीं कि किस चीज में फंसी हूं। इसलिए कह रहा हूं, हमेशा के लिए रुक जा। पता चल जाएगा। हां भर दे, तो जा ना मत। सारी जंजीरें, सारी बेड़ियां दिख जाएंगी। तैयार होगी तब। इक्कीस दिन पक्का रहूंगी, यह कह रही है। इक्कीस दिन में बेड़ियां दिखेंगी। इक्कीस दिन के बाद हमेशा के लिए रुकूंगी, ऐसा बोल दे, तो सारी बेड़ियों के दर्शन होंगे।
अभी कैसे बोल दूं। लोगों ने आस लगा रखी है कि गई है तो आएगी। वे तुझे चाहते नहीं, तू उन्हें चाहती नहीं। बोल दे कि नहीं आओगी, कोई बात नहीं। फिर आस कहां से लगाएंगे। जिस दिन रहना हो उसी दिन रहना। जब आना हो तो फोन करके बता देना, मैं आ रही हूं। हो गया, खत्म। मैं हमेशा के लिए यहीं रुक गई। तब असली बेड़ियों के दर्शन होंगे। नहीं तो दर्शन भी नहीं कर पाएगी।
एक बेड़ी फंसी है। आदमी साथ में है। पहले बोली कोई बेड़ी नहीं, फिर बोली मेरा आदमी साथ में है। साथ में है, पर बेड़ी थोड़ी ही है। गांव छोड़कर मेरे भरोसे में है। इतनी जिंदगी निकाल ली, उसे कैसे छोड़ूं। वह नहीं रहे तब पूरी तरह छूटूंगी। क्या उनके जाने का इंतजार करेगी। जाने का इंतजार नहीं होता, पर खाना-पीना, और भी बहुत कुछ रहता है। बहुत बेड़ियां हैं। कुछ दिखती हैं, कुछ नहीं दिखतीं।
तुझे सिर्फ इतना पता है कि रोग है। उस रोग का इलाज तू नहीं कर सकती। उसे बढ़ा सकती है। इलाज डॉक्टर ही करेगा। कौन सा रोग है, पता नहीं। डॉक्टर तक जाना पड़ेगा। बुखार जैसा हो जाए तो पत्ते-वतते पीकर ठीक कर लेते हो। कुछ बेड़ियां ऐसी हैं कि अपनी समस्या काट देते हो। पर कुछ असाध्य रोग बिना डॉक्टर के ठीक नहीं होता। कुछ बेड़ियां इतनी गहरी हैं कि खुद पता नहीं कि बेड़ी है, पर ग्रसित हो। दुख है, अशांति है, बेचैनी है, घुटन है। समझ नहीं आता कहां फंसी हूं। पर फंसी तो है। अब तू देख नहीं पाएगी। ताकत खत्म हो गई। अब गुरु दिखाएगा। जहां से तेरी सोच खत्म होती है, वहां से उसकी सोच शुरू होती है। जहां से तेरा देखना बंद होता है, वहां से उसका देखना शुरू होता है।
यह अपने आप को धोखा देने वाली बात है। पता नहीं होता। सबको नहीं पता। तुझे पता चल गया, क्योंकि मैं खोल-खोल कर बात कर रहा हूं। तेरी भी यही हाल है। सबकी यही हाल है। यह धोखा हम शुरू से खुद को देते आए हैं। इसलिए जीवंत गुरु का सानिध्य बहुत जरूरी है।
बीमारी एक झटके में बता दी। इलाज के लिए तैयार तब हो, जब बैठ जाओ। पहले बीमारी का पता नहीं था। अब पता चल गया, एक बेड़ी मिल गई। दूसरी भी कहीं अटकी होगी, बाद में दिखेगी। मुख्य बेड़ी पति में है। पति के जाने के बाद दूसरी बेड़ी दिखेगी। शरीर में दर्द हो, पता चले सिर दर्द कर रहा है। घर में दुर्घटना हो जाए, कोई घटना हो जाए, दर्द चला जाता है, भूख चली जाती है। चिल्ला रहे थे भोजन लाओ, जल्दी पकाओ। थाली आ गई, और पता चला दुर्घटना में बेटा है, पत्नी है, जिससे लगाव है। तुरंत भूख चली गई। कई दिन भूख नहीं लगती। भूख कहां गई। क्योंकि जीवन में सबसे ज्यादा महत्व उसी का है। वैसे ही अभी इसकी बेड़ी पति में दिखी। एक ही बेड़ी नहीं है। पीछे और बेड़ियां हैं। धीरे-धीरे दिखेंगी।
टारगेट नहीं है, ऐसा कहती है। पर टारगेट इतना है कि आऊंगी। कितने दिन में आऊं, यह तय नहीं। ज्यादा से ज्यादा इक्कीस दिन, यही सारा टारगेट है। इतना सूक्ष्म बना लिया है कि इक्कीस दिन के अंदर आ ही जाऊंगी। इक्कीस दिन फाइनल नहीं। यहां इक्कीस दिन बोल रही है। उन्हें ऐसा नहीं बताया था। महीने भर भी बताया था, एक दिन भी बताया था। महीने में भी आ सकती हूं, एक दिन में भी लौट सकती हूं। वही मैं कह रहा हूं।
गुरु की जरूरत इसलिए पड़ती है कि कुछ बेड़ियां तुम बांधते हो और तोड़ भी देते हो। पर जो दिखती ही नहीं, उसे तोड़ोगे कैसे। तोड़ना तब होगा जब दिखे। दिखेगी नहीं, तो गुरु दिखाता है। इसलिए गुरु को दर्पण कहा गया। सबका चेहरा देख सकते हो। अपना चेहरा बिना आईने के कभी देखा है। बिना गुरु के बेड़ियां नहीं दिखेंगी। इसलिए जीवंत गुरु का सानिध्य ढूंढो।
तू अशांत है, दुखी है, निराश है, बेचैन है। कहता है जीवन में कोई कमी नहीं। जितना सोचा था सब हासिल कर लिया। नाम, शोहरत, पैसा, जितनी सामर्थ्य थी, जितना पद बनाया था, सब पा लिया। पर अशांत हूं। अशांति का कारण नहीं दिख रहा। कारण है। इस स्थिति में कहा गया, गुरु ढूंढो। अब तुम गुरु को समझ पाओगे, और गुरु तुम्हें समझा पाएगा। अशांति का कारण क्या है। बाहर से जो चाहिए था सब इकट्ठा कर लिया। फिर भी अशांति है, बेचैनी है, घुटन है। विवाह हो गया, बच्चे हो गए, पैसा, प्रॉपर्टी, घर, गाड़ी, सब ले लिया। एक जिंदगी का टारगेट, अपने बैकग्राउंड के हिसाब से बहुत ज्यादा कर लिया। फिर भी अशांत हूं। उदासी का, निराशा का कारण नहीं दिख रहा।
इस स्थिति में गुरु चाहिए। तुम देख नहीं पा रहे। समझ काम नहीं कर रही। अब गुरु ही दिखाएगा। एक दर्पण चाहिए, जिसमें सारी बेड़ियां साफ दिखें, सारा कारण दिखे, सारी वजह दिखे। इसलिए गुरु के सानिध्य में रहो। रहना पड़ेगा। तब दिखाएगा।
दिखाएगा भी, पर छुड़ाने की ताकत तुम्हारे पास नहीं रही। ताकत खत्म हो गई। सारी ताकत कहीं और लगा दी। निर्बल हो गए। अब वह ताकत देगा। सत्कर्म करवाएगा। सब दिखाएगा भी, और कुछ सेवा करवाएगा। उससे ऊर्जा आएगी। उस ऊर्जा को अपने आप को छुड़ाने में लगाओगे।
तुम निर्बल हो गए, असहाय हो गए, फेल हो गए। गुरु के यहां तब जाते हैं जब एकदम फेल हों। अंदर जरा सी ताकत होती तो गुरु कौन ढूंढता। एक प्रतिशत बल भी होता, रत्ती मात्र भी, तो क्या मजाल कि गुरु खोजते। मैं ताकतवर हूं, यह भाव रहता। जब करने की सामर्थ्य नहीं रहती, तब गुरु चाहिए। उसी स्थिति में गुरु काम आता है।
ताकत लिए हुए गुरु के पास पहुंचोगे तो भाग जाओगे। गुरु मारेगा, चोट लगाएगा, लताड़ेगा। जरा सी ताकत बची हो तो उसी संसार में लौट जाओगे। गुरु कभी सीधी बात नहीं करता। इतिहास गहराई से पढ़ो। गुरु हमेशा उल्टी मार देता है, जिससे शब्द बुरे लगें। घूरकर देखेगा। हर समय चोट मारेगा। देखेगा कि अभी भी आवेश और जज्बात बचा है क्या। आवेश और जज्बात संसार में ही घसीटते हैं। चोट इसलिए मारता है कि देखे, ताकत बची है क्या। बची हो तो यह भागने वाला है। अभी भाग जाए।
कोई बेहोश पड़ा हो, मरने लगे, तो डॉक्टर छूकर देखता है कुछ बचा है कि नहीं। धड़कन है कि नहीं। नाड़ी चल रही है कि नहीं। दबाकर जांचता है। कुछ है तो बचाने की कोशिश करता है। कुछ नहीं रहा तो कहता है, हो गया, खत्म। ऐसे गुरु चोट मारकर देखता है कि अंदर कहीं कुछ है क्या। हमेशा विरोध में बात करेगा। अनुकूल बोल दे तो तुम वहीं के वहीं रह जाओगे। उठ ही नहीं पाओगे। किसी को उठाने के लिए उसके विपरीत करना पड़ता है। अनुकूल करो तो वह उठेगा नहीं। क्रोध नहीं आएगा, उन्नति नहीं होगी। हमेशा विपरीत परिस्थिति पैदा करनी पड़ती है। तब ऊर्जा जागती है। तब समझने की कोशिश करता है।
अनुकूल परिस्थिति में आदमी रुक जाता है। अनुकूल में बढ़ना नहीं होता। लोग समझते हैं अनुकूल में बढ़त होती है। नहीं। विपरीत परिस्थिति में बढ़ना होता है। अनुकूल में रुक जाते हो। आंख की ऊर्जा तब उठती है जब विपरीत परिस्थिति आए। इसलिए गुरु हमेशा विपरीत परिस्थिति पैदा करता है। अनुकूल हो तो आराम से बैठ जाओगे। जरूरत ही नहीं रहेगी।
तुम्हारे तरीके से कोई बात करे तो तुम सरल और सहज हो जाते हो। उकसाना हो तो विरोध में बात कर दो। फिर अपनी सारी सामर्थ्य लगा दोगे उसे चुप कराने में। शरीर का बल हो, धन का बल हो, लोगों का बल हो। पर अनुकूल बात हो तो कहते हो, और बोलो, मैं सुनूंगा, क्योंकि मेरे अनुकूल बोल रहा है। उसमें ऊर्जा नहीं बढ़ती, समझ नहीं बढ़ती। समझ विपरीत परिस्थिति में विकसित होती है।
इसलिए जीवंत गुरु के यहां जाते हो तो तभी क्वालिफाइड होते हो। समाज में बड़ा मान-सम्मान मिला हुआ है। गुरु राजा और रंक से एक ही काम करवाता है। राजा भी आए तो कहे, झाड़ू मार। जा, स्नानघर धोकर आ। आज तक समाज में किसी ने यह नहीं कहा। हिम्मत नहीं हुई। मैं अफसर हूं, लोग सलामी मारते हैं। जहां राजा और रंक एक जगह बैठ जाएं, वही गुरु है। जहां समभाव हो, समदृष्टि हो, उसी को गुरु कहा गया है। उसके लिए कोई अलग नहीं होता।
जब मैं कहीं गिरता हूं, तो जरूरी नहीं कि जिसके बारे में मैं जानता हूं वही मुझे उठाने आए। कोई भी आ सकता है। उस समय जो मौजूद है, वह आकर मदद कर देगा। उसे तुम ईसाई मानो, मुस्लिम मानो, या हिंदू मानो। ईसा मसीह स्पष्ट दिखे। मैं वही कह रहा हूं। तुम्हें बस उठना है। कोई मदद करने आ गया, तो मदद ले लेना। बस। कौन है, इससे मतलब नहीं। तुम जहां हो, वह निमित्त है।
जब तक साधना में रहो, तब तक परिवार का कोई यहां आए तो बातचीत मत करना। यहां के लोगों को मैं कह दूंगा। कोई आए तो बोल देना, यहां बात नहीं होती, आप वापस चले जाओ। यह व्यक्तिगत सलाह है। उनकी तरफ नजर भी मत मारना। बात कर लोगी तो साधना में रुकावट आ जाएगी। कोई भी आए, उसकी तरफ देखना भी नहीं, जब तक यहां रहकर साधना करनी है। इसका खास ख्याल रखना।
उस आनंद में रहो। उसे महसूस करो। उसी में रहो। आनंद को परिभाषित नहीं किया जा सकता। शब्दों में कहा नहीं जा सकता। तो उसी में रहो। कोई परिचित आए तो उससे बात एकदम नहीं करनी। मैं उन्हें मैसेज नहीं भेजूंगा। जब सामने आएंगे, तभी पता चलेगा कि तुम बात करती हो या नहीं। प्रकृति पर छोड़ दो। उन्हें मैसेज दे दिया तो प्रकृति के खिलाफ हो जाएगा। मैं उन्हें आने के लिए बुलवा नहीं सकता, और मना भी नहीं कर सकता। तुम साधना में हो। मैं तुम्हें बोल सकता हूं। मेरा अधिकार तुम पर है, उन पर नहीं। कोई परिचित आए तो उसकी तरफ देखना भी नहीं। जैसे इन लोगों को देखती हो, वैसे उसे देखना। उसी में परीक्षा होगी। इसलिए सचेत कर रहा हूं। मैं उन्हें मना कर दूं तो एक बंधन बन जाएगा। फिर तुम्हारी स्थिति का तुम्हें भी पता नहीं चलेगा। ऐसा माहौल बने तो यही करना। मैंने सचेत कर दिया। यह व्यक्तिगत है।
जैसे साधना में आगे बढ़ रही हो, वैसे यह आदेश तुम्हारे लिए है। मेरा निजी आदेश नहीं है। तुम्हारे लिए आदेश आया, इसलिए सचेत कर रहा हूं। उन्नति बहुत अच्छी हो रही है। बहुत तेजी से हो रही है।
बस अपने आप में रहिए। अपनी स्थिरता बनाए रखिए। मेरा आशीर्वाद पूरी तरह है। मैंने अभी भी कहा है। मेरे प्राण भी अगर आप लोगों के कल्याण में लग जाएं, तो उसे भी मैं कम समझता हूं। कम इसलिए समझता हूं कि प्राण तो जाने वाला ही है। यह जाने वाला है। तो क्यों ना आप लोगों के कल्याण में ही चला जाए। ऐसे भी तो चला जाएगा।
भ्रम की स्थिति तुम्हारे लिए हो सकती है। ना इनके लिए है, ना मेरे लिए। मैं तुम्हारे लिए नहीं बता रहा। तुम्हारे लिए हो सकती है, पर ना इनके लिए है ना मेरे लिए। अगर होता तो मैं तोड़ देता। जैसे उनका भ्रम था, उसे मैंने तोड़ा। होता तो तोड़ देता। नहीं तोड़ूंगा तो सामने वाला गिर जाएगा।
ना इनके लिए भ्रम है, ना मेरे लिए। होता तो तोड़ देता, जैसे उनका तोड़ दिया। भ्रम को बढ़ावा दूं तो भ्रम बढ़ता ही चला जाएगा। जिम्मेदार वह नहीं होगा, मैं होऊंगा। क्योंकि वह मेरे सानिध्य में है। भ्रम बढ़ा तो आगे बढ़ता रहेगा, और दोष मुझे लगेगा। नहीं तो इतनी देर बात करने की जरूरत क्या थी। भ्रम तोड़ने के लिए इतनी देर बात की। बातों में दम था। भ्रम उन्हीं बातों से टूटा। लोगों के लिए उन बातों का मतलब नहीं भी हो। पर मैं न बोलता तो भ्रम नहीं टूटता। एक जंजीर उसे दिखती नहीं। वह समझती है सबसे मुक्त हो गई। मुक्ति का भ्रम लेकर घूमती रहती। यही भ्रम लेकर जिंदगी निकल जाती।
भ्रम रहेगा तो मैं तोड़ दूंगा। नहीं तोड़ा तो उसी में आगे बढ़ता जाएगा। रुकेगा नहीं। जीवात्मा जिधर बढ़ती है, बढ़ती ही जाती है। भ्रम के बाद नया भ्रम। ऐसे नए-नए भ्रम हो जाते हैं।
यह ऐसी साधना कर रही है कि मुझे पता चलता है। इसलिए सचेत किया, कहां गिरोगी। उठ तो बहुत तेजी से रही हो। पर गिराने वाले भी आ सकते हैं। सचेत रहना। गिर गईं तो तुम जिम्मेदार होगे। तुम्हारे लिए आदेश आया है कि ऐसी संभावना होगी। सचेत रहना है, क्योंकि बहुत तेजी से आगे बढ़ रही हो। उनके लिए नहीं कहा। मुझे आदेश आया था, मैंने कह दिया। समझ गए। अब यह साफ है।
जब बहुत सारे कनफ्यूजन हों, तो इसका मतलब तुम निर्णय लेने लायक नहीं रहे। निर्णय कौन ले सकता है, उस व्यक्ति को ढूंढो। किसके द्वारा निर्णय लूं। अपने द्वारा नहीं, क्योंकि कनफ्यूजन हो चुका है। कनफ्यूजन है तो निर्णय के लायक नहीं रहा। होता तो ले लेता। अब अगर मैं ही निर्णय ले रहा हूं, जबकि पता नहीं है, तो लत्तर लग सकते हैं। बहुत नीचे जा सकता हूं, और बहुत ऊपर भी। दोनों संभावनाएं हैं। निर्णय सही भी हो सकता है, गलत भी। पता होता तो ले लेता। कनफ्यूजन है, मतलब मैं निर्णय के लायक नहीं। अब ढूंढना है कि यह निर्णय कौन कर सकता है, किसमें सामर्थ्य है। उस व्यक्ति को ढूंढो। अब मैं निर्णय नहीं ले रहा। तुम्हारे द्वारा निर्णय लेना चाहता हूं।
हां, मिला हूं। पर मेरा मत किसी पर नहीं है। मेरा मत बस इतना है कि जिससे आत्मिक कल्याण हो जाए, वह कर लो। मुझे किसी समूह से मतलब नहीं, किसी संप्रदाय से मतलब नहीं, किसी धर्म से मतलब नहीं, किसी अधर्म से मतलब नहीं। मैं ना धार्मिक हूं, ना अधार्मिक। दोनों में नहीं हूं। ना किसी संप्रदाय का हूं, ना मेरा कोई संप्रदाय है। मैं इससे ऊपर उठ चुका हूं। ऊपर उड़ चुका हूं। मत बस इतना है कि जिससे कल्याण हो, वह मार्ग चुनकर आगे बढ़ जाओ। तुम्हें देखना है कि मेरा कल्याण कैसे होगा। किसी के बारे में निर्णय नहीं लेना। निर्णय यही लेना है कि मेरा कल्याण कैसे हो। काश यह निर्णय ले पाता।
कितनी बार फोन लगाया है। कह रहा है, कृपा से बहुत कुछ हुआ है, आगे मार्गदर्शन और आशीर्वाद दो, जो मिला है उसे औरों में बांटू। वह तो छलकने लगेगा। टंकी में मोटर लगाकर छोड़ दो, तो पाइप टंकी को फाड़ देगा। पानी निकल जाएगा। पाइप फट जाएगा। मोटर ब्लास्ट हो जाएगी। ताकत रुकती नहीं। ताकत को रोक नहीं सकते। बंट ही जाएगा। बांटने की जरूरत नहीं। बंट ही जाएगा।
वही फिर कह रहा है, कृपा से साक्षात्कार हुआ है, तो ज्ञान बांटू क्या। मैं वही कह रहा हूं। बांटना नहीं पड़ता। फट जाता है।
नहीं। नहीं सुधर रहा है तो देखो, क्यों नहीं सुधर रहा। वह सुधरना नहीं चाहता, तो छोड़ दो। सुधारने में तुम्हारी कमी है, तो सुधारने लायक बनो। कमी कहां है, यह देखना है। एक सुधारने वाला है, एक सुधरने वाला। कमी सुधरने वाले में हो सकती है। यह भी हो सकता है कि सुधारने वाले को सुधारना आता ही ना हो। परिणाम नहीं आ रहा तो दो में से एक में कमी है। जिसमें कमी है, उसे हट जाना चाहिए। जिसे सुधरना है, वह सुधरना चाहता है, पर सुधारने वाले में योग्यता नहीं, तो सुधरने वाला दूसरे को ढूंढे। और सुधारने वाला पहले सुधारने लायक बने, फिर सुधारने की बात करे।
इसलिए कहा था, क्योंकि पड़े रहने में तुम होते हो। अभी तक जहां भी थे, किसी और में थे। तुम्हारा मिलना तुमसे हुआ ही नहीं। तुम अपने आप को भरने में ही लगे थे। तो यहां पड़े रहो। पड़े रहना ही साधना है। पड़े रहने का तरीका यहां अलग है। निठल्ले की तरह बिस्तर पर पड़े रहना नहीं। सोए, नींद खुली, स्नान किया, फिर पड़े रहो। ऐसा नहीं। आलसियों की तरह पड़े रहना नहीं। यहां पड़े रहने का तरीका अलग है।
असल तत्व वह है जो था, है, और रहेगा। वही असल तथ्य है। और वह बदलाव के पीछे है। नकली के पीछे ही असली छुपा है। जिसने नकली का आविष्कार किया, उसने असली को देखा है। नहीं तो नकली बना ही नहीं सकता था। जिसने नकली बनाया, उसने असली को प्रत्यक्ष देखा। तभी नकली बनाने में समर्थ हुआ। नहीं तो नकली बनता नहीं। फिर कुछ और बन जाता।
पहले ना होने में आओ। ऐसा ना हो कि सब कुछ होने के लालच में ना होने में आओ। तब ना होने में आ ही नहीं पाओगे। यह भ्रांति पाल ली है कि सब कुछ होने से सब कुछ हो जाऊंगा। सब कुछ पाने के लिए ना होने में आओगे, तो ना होने में आ ही नहीं सकते। क्योंकि सब कुछ होने का भाव बना ही लिया है। लालच में मत आओ। पहले इस भाव में आओ कि कुछ नहीं चाहिए। ना होने में तो आओ।
कुछ गलत नहीं है। ना गलत है, ना सही है। जहर मारता भी है, और जहर जीवन भी देता है। जहरीला जानवर काट ले तो एंटीडोट उसी जहर से बनता है। उपयोग कहां करते हो, यह तुम पर है। एक कांटा निकालने के लिए दूसरा कांटा चुभाना पड़ता है। फूल छुओगे तो कांटा निकलेगा क्या। यहां सब उपयोग के लायक है। उपयोग करना आता है क्या। उपयोग नहीं आता तो सही चीज का भी गलत उपयोग कर दोगे। उससे भी नुकसान होगा। उपयोग करना सीखो। जब सीख लोगे तो तुम्हारे लिए ना कुछ अच्छा रहेगा, ना कुछ बुरा। तुम अपना काम करोगे। उपयोग करना नहीं आता, इसलिए अच्छे और बुरे में फंसे हो।
बेचैन मन नहीं, बेचैन आप हो। मन के द्वारा आपको पता चलता है। मन को छोड़ दीजिए। आप लोगों की आदत हो गई है, क्योंकि हजारों साल से यही बोला जा रहा है कि मन को रोको, मन विचलित है। नहीं, विचलित आप हो। मन सिर्फ निमित्त है।
तो आप देखो कि आपकी बेचैनी का कारण क्या है। आपकी बेचैनी की वजह क्या है। किस लिए आप बेचैन हो। क्या उलझन है। कहां से बेचैनी है। कुछ मिल नहीं रहा है आपके तरीके से, इसलिए बेचैन हो। आपके तरीके से कुछ हो नहीं रहा है, इसलिए बेचैन हो। तो आप उसे निकालने का प्रयास करिए। क्या हो रहा है। मैं उस लायक हूं कि नहीं हूं। जो मैं चाहता हूं, मैं उस लायक हूं कि नहीं हूं। ये सब जांचने का प्रयास करिए।
विचार का मतलब है, विचार का आवागमन देश, काल और परिस्थिति में होता है। आता है, चला जाता है। बस इतना ध्यान रखना है कि कोई भी विचार हमें प्रभावित ना कर पाए। हमें विचारों के साथ काम करना है या नहीं करना है, दो में से एक। हर विचार हमें कुछ ना कुछ समझा के जाता है, और अगर आप नहीं समझते तो आपको विचलित करके चला जाता है। विचार का आना-जाना आपके बस में नहीं है, इसलिए हर वक्त, हर क्षण सचेत रहिए। अपनी समझ को विकसित करिए, ना कि परिस्थितियों को बदलने का प्रयास करिए। परिस्थिति आई, तो उस परिस्थिति को उचित तरीके से कैसे मैं स्वीकार करके आगे बढ़ जाऊं, इसके लिए काम करिए।
चित्त का मतलब होता है, मैं जा रहा था या मैं कहीं था, ऐसी घटना घट गई जिसका मुझे पता नहीं था। कभी-कभी मैं उसका दोषी भी नहीं हूं। ऐसे भी हमें आरोप थोप दिए जाते हैं जिसका मैं दोषी भी नहीं हूं। तो हमारा चित्त हर समय वहां लगा रहता है, जब तक वो क्लियर नहीं होगा।
चेतना का मतलब होता है, बहुत लोग आत्मा को भी चेतना कहते हैं, बहुत लोग अपनी समझ को चेतना कहते हैं। चेतना को ऊपर उठाओ, मतलब अपनी समझ को विकसित करो। मिलाजुलाकर अपनी समझ को विकसित करो, ताकि देश, काल, स्थिति और परिस्थिति में कोई भी विचार आपको डगमगा ना पाए। आप हर विचार के साथ कुछ सीखें।
बहुत लोग हैं जिन्होंने प्रणाम बोला है, लंबे समय के बाद। आप सबको नर्मदे। और हमारा यही आशीर्वाद है कि अपने आत्मिक कल्याण के लिए कार्य करें। हर कार्य को सोच-समझ कर करें कि मैं क्या करने जा रहा हूं। मैं जिस भेष को धारण कर रहा हूं, क्या मैं उस भेष के लायक हूं। क्या मैं उस भेष का काम कर पाऊंगा। मैं जहां हूं, मैं किस लिए हूं, क्या उद्देश्य है। क्या मैं वो काम कर पा रहा हूं जिसके लिए मैं हूं। उस उद्देश्य की पूर्ति हो रही है, या बस मैं ऐसे ही आया, रहा और गया, यही मैं कर रहा हूं जन्म-जन्म से। क्या मैं जहां हूं वो कार्य कर रहा हूं। क्या मैं अपने आप को बता के वहां रह रहा हूं। लोगों को भी बता दिया हूं कि मैं इस उद्देश्य से यहां रह रहा हूं। क्या मैं वो कार्य कर पा रहा हूं। कर पा रहा हूं तो ठीक। नहीं कर पा रहा हूं तो क्यों नहीं कर पा रहा हूं। क्या वहां की स्थिति और परिस्थिति वैसी नहीं है जिस कार्य को मैं करने गया था। क्या विपरीत परिस्थितियां हैं। और अगर अनुकूल परिस्थितियां हैं, तो मैं उस कार्य को क्यों नहीं कर पा रहा हूं। क्या मैं उस कार्य के लिए नहीं गया हूं।
जहां भी रहिए, जिसके साथ भी रहिए, सोच-समझ के रहिए कि मैं किसी का साथ क्यों पकड़ा हूं। क्योंकि जिसका भी साथ आप पकड़ोगे, वैसा बन जाओगे। गंगाजल गटर का साथ करेगा तो गटर बन जाएगा। गटर गंगाजल का साथ करेगा तो गंगाजल बन जाएगा। आप जिसके साथ हो, एक समय ऐसा आएगा, आप वैसे हो जाओगे। जिसके साथ आप हो, उसकी मात्रा या तो बहुत ज्यादा है या बहुत कम है। जैसे बच्चे के साथ आपको रहना पड़ता है, बच्चे आपके साथ नहीं रहते, और उनकी ताकत बहुत कम है। तो अगर आप हमेशा बच्चों के साथ रहो, बलवान के साथ नहीं, तो आप बच्चे जैसे हो जाओगे। आप किसका साथ करते हो, ये बहुत महत्व है। आप एक दिन उसके जैसे बन जाओगे।
आपने किसका साथ पकड़ा, यह देख लो कि जिसका आप साथ पकड़ रहे हो वो कौन है। क्योंकि एक दिन आप उसके जैसे हो जाओगे। जिसका आपने साथ पकड़ा है, वो आपको अपने जैसा कार्य करवाएगा। जैसा वो रहेगा, जैसा खाएगा, पिएगा, हर चीज आपको अपने तरीके से देगा, तो आप एक दिन वैसे बन जाओगे। इसलिए सोच-समझ के साथ करो। आप कहां हो, किसके साथ हो, किस स्थान पर हो, उस स्थान पर किसका साथ आपने पकड़ा है। इसका जीवन में बहुत महत्व है। सोच-समझ के साथ करिए।
एक तो जगह, और एक उस जगह पर किसका अधिकार है। जैसे बीहड़ जंगल में भी चले जाओगे, तो वहां जानवरों का अधिकार है। वहां आप उनका साथ कर ही नहीं सकते, क्योंकि वो इतने ताकतवर हैं कि आपको खत्म भी कर सकते हैं, कुछ भी कर सकते हैं। अगर आगे बढ़ने के लिए आपको अपने जैसे का साथ चाहिए, या वो आपको आगे बढ़ा दे, तो आप किस जगह पर किसके साथ हो, इसका महत्व है। जीवन में सोच-समझ के आगे बढ़ो।
मन निमित्त है। जैसे हम दृश्य देख रहे हैं, तो इसमें हमारी आंखें निमित्त हैं। अगर आंख हटा दी जाए, तो हम देखना चाहेंगे, लेकिन देख नहीं सकते। जैसे कान है, हम सुनना चाह रहे हैं। कान है तो सुन पाएंगे, नहीं तो नहीं। वैसे ही हमारे लिए मन निमित्त है, आदान-प्रदान करने के लिए। वो हमें बताता है जितना हमारे अंदर है, और हम बाहर से पांच इंद्रियों द्वारा संचित करके रखते हैं। तो मन आदान और प्रदान में निमित्त बनता है।
जीवात्मा मन द्वारा शरीर को आभास करती है। शरीर का मतलब, मन द्वारा ही पता चलता है कि मेरा शरीर है। जैसे किसी का हाथ काम नहीं करता, तो इतना हाथ है या नहीं है, उसे पता नहीं। उसके टुकड़े भी कर दो, तो उसे पता नहीं। शून्य हो जाता है। आपने देखा होगा, किसी के नीचे शून्य हो गया। अब वो मल-मूत्र कर देता है, उसे पता नहीं चलता। मतलब उसके लिए शरीर है भी और नहीं भी है, क्योंकि वो आंखों से देख पा रहा है इसलिए है, लेकिन मन द्वारा फील नहीं कर पा रहा। जब नीचे शून्य हो गया, तो बाहर की वस्तु में और इसमें मेरे लिए कोई अंतर नहीं। ये है भी और नहीं भी है। मन द्वारा ही हमारा शरीर हमारे लिए प्रत्यक्ष होता है। निमित्त मन ही है।
उंगली कट गई, और कट के थोड़ी देर तक अगर मेरे शरीर से अलग भी हो गई, तो जब तक चेतना है, अलग होने पर इधर का फील होगा, उधर का नहीं। चेतना की वजह से फीलिंग आई। मैं आपको बता रहा हूं। यह अंग सुन्न हो गया, लेकिन अंग खराब थोड़ी हो गया। खराब होता तो सड़ जाता। अभी भी इसमें चेतना है। उसको आप खूब दबाइए, उसमें कीला भी घुसा दीजिए, तो उसको पता नहीं चलेगा। चेतना नहीं होती तो सड़ जाता। आपने ऐसे लोगों को देखा है। लेकिन नहीं सड़ता, तो चेतना है। जैसे कई लोगों का हाथ पैरालाइज हो गया, वो सूख-सूख के बिल्कुल काम नहीं कर रहा। लेकिन चेतना तो अभी है। अगर चेतना ही नहीं रहे, तो सड़ जाएगा। लेकिन मन हमें बता नहीं पा रहा। वहां अगर चिकोटी काटो, तो उसे पता नहीं। चाहे उसे अलग भी कर दो, उसे पता नहीं।
चेतना नहीं हो तो सड़ जाता। चेतना कम-ज्यादा की बात नहीं है। जैसे पत्थर में चेतना है। चेतना तो है ही। कम-ज्यादा में हमें नहीं जाना है। मन वहां तक जा सकता है जहां हमारा अंग पूरी तरह काम करता है, और मन के द्वारा ही हम भासित करते हैं कि मेरा शरीर है। जब उस अंग में मन काम नहीं कर रहा और चेतना है, इसलिए वो सड़ नहीं रहा। चेतना नहीं होती तो सड़ जाता, उसमें कीड़े पड़ जाते, वो खा जाते। चेतना है, लेकिन मन वहां इसलिए नहीं जा रहा, क्योंकि अंग खराब हो गया है।
हमारे अंदर जितनी स्मृतियां हैं, वो हमें हैं। धीरे-धीरे जैसे-जैसे हमारी समझ बढ़ती है, वो हमें याद आने लगती हैं। वो हमारे अंदर ही हैं। कहते हैं, हमें पता है, लेकिन याद नहीं आ रहा, मुंह पर भी नहीं आ रहा। इसका मतलब ये नहीं कि आपके अंदर नहीं है। अभी भी है, लेकिन याद नहीं आ रहा। और एक-आध घंटे बाद, या कुछ ही मिनट बाद, कहते हो, मुझे याद आ गया। तो ऐसे ही जन्म-जन्म से जितनी भी घटनाएं हमारे साथ हुई हैं, वो हमारे अंदर हैं। जब से हमने शरीर धारण किया है, वहां से लेकर अभी तक, पांच इंद्रियों द्वारा जितना लेन-देन किया है, सब हमारे अंदर है।
मन निमित्त है, आदान-प्रदान का मैसेंजर है। आदान-प्रदान के पीछे तुम हो। ये चीजें तुम्हारे लिए सहायक हैं। जैसे अंग हैं, वैसे मन भी है। मन अदृश्य है। जैसे हवा हमें छू के जाती है, एहसास होता है, लेकिन देख नहीं सकते, महसूस तो कर पाते हैं। वैसे मन भी है। शरीर के लिए सूक्ष्म रूप से काम करता है।
वही तो खोजना है कि फिर तुम कौन हो। तुम कोई अंग नहीं हो। तुम मन नहीं हो। तो तुम कौन हो। यही खोज का विषय है। आप ही खोज सकते हो। दूसरा कैसे खोजेगा।
मैं का रोला इसलिए है कि आप अपने आप को कुछ बना दिए हो, कई शिफ्ट कर दिए हो। कई लोगों में, भिन्न-भिन्न रूपों में, आपने अपने आप को शिफ्ट कर दिया है। जहां-जहां आप मोहग्रस्त हो, वहां आप मानसिक रूप से घुस गए हो। जब वहां से अपने आप को हटा दोगे, जिस दिन पूरी तरह हटा दिए और अपने आप में हो गए, तो मैं कौन हूं का जवाब आपको मिल जाएगा। जैसे मिट्टी के द्वारा घड़ा बन गया, कोई भी पात्र बन गया। असली को देखना है, तो नकली को मिटा देना पड़ेगा। मैं कौन हूं का जवाब उसी में छिपा हुआ है। उस घड़े का नाश कर दो। पूरी तरह मिटा दो। वो मिट्टी में हो जाएगा।
यह बताने का विषय ही नहीं कि कैसे फील करो। अगर बता दिया जाए कि तुम ये फील करना, तो आप सब छोड़ के वही फील करना चाहोगे। उस तरीके का फील करना चाहोगे, और वो आपसे अलग होगा। आप कैसा फील करते हो, आपको पता चल जाएगा।
मैं यहां आ जाऊंगा, तो मैं भी वही रहूंगा। बस मेरी पूरी ऊर्जा मुझ में होगी। मैं वहीं रहूंगा। बस मैं पहले दुखी था, अब मैं दुखी नहीं। मैं बदलूंगा नहीं, क्योंकि मैं वहां था तो भी मैं था। मैं बंट-बंट के दुखी हो गया। जब मैं सबसे निकल जाऊंगा, तो मैं दुख और सुख से परे होकर उस आनंद में आ जाऊंगा, तो भी मैं वही मैं रहूंगा। मैं टुकड़े-टुकड़ों में बिखर गया हूं। मान का, दिखाने का, कोई भी मेरा चक्कर चलता है। मेरे लिए मैं नहीं बदलता। मैं सबके लिए बदलता हूं, लेकिन मेरे लिए वही मैं रहता हूं। मैं पहले दुख में था। अब मैं दुख में नहीं हूं। बस इतना ही फर्क है।
बाहर के नजारे बदल जाएंगे। देखने का भाव बदल जाएगा। आप एक आदमी को देखते हो। एक व्यक्ति आपके सामने खड़ा है, अनजान है, तो उसे अनजान की तरह देखते हो। और जैसे थोड़ी बातचीत होती है, परिचय हो जाता है, तो देखने का भाव बदल गया।
मैं नहीं बदला कभी। मेरे कर्म के द्वारा मैंने जैसा अपने आप को बनाया, लोगों ने मुझे बदला हुआ देखा। मैं वही था, वही हूं, वही रहूंगा। मैं कभी नहीं बदलता। मैं अभी भी, मेरे लिए, मैं ही हूं। मैं उसमें लिप्त हूं, इसलिए उसकी वजह से मुझे दुख है। वो हट जाएगा, तो भी मैं ही रहूंगा, और मैं आनंद में रहूंगा। ऐसा भी नहीं कि कोई आपको आत्मा अलग से दिखने वाली है, क्योंकि आप ही तो वो हो। जब आप ही आप हो, तो पहले आप अपने आप को उसमें लिप्त होकर देख रहे थे। आपने कीचड़ में कूदा, तो अपने आप को कीचड़ से लिपटा हुआ देखा। नहा लिया, तो कीचड़ से मुक्त होते हुए देखा। लेकिन कीचड़ लगा था, तो भी आप वही थे।
बस अब यह जानकारी होगी कि तू नहा ले, बस खत्म। पानी कहां मिलेगा, नहाना कैसे है। कीचड़ के साथ मैं घुटन में था। अब मैं कीचड़ से मुक्त होके आनंद में हूं। बस इतना ही। ऐसा नहीं कि मुझे आत्मा दिखने वाली है। मुझे ऐसा कुछ नहीं दिखना है। आत्मज्ञान में ऐसा कुछ नहीं है। तीसरी नेत्र खुल जाएगी, ऐसा कुछ भी नहीं है। ज्यादा उजाला दिखेगा, ऐसा नहीं। बस आप दुख, सुख, राग, द्वेष, मोह, आसक्ति, इच्छा, अपेक्षा और मैं कर्ता के भाव से मुक्त होके, अपने आप में होकर आनंद में रहोगे। लेकिन तुम वही रहोगे। ऐसा कुछ तुम्हें अलग नहीं दिखने वाला है।
पहले संसार तुम्हें रोष में, राग और द्वेष में दिख रहा था। अब नहीं। अब आप हर व्यक्ति के दोनों रूप देख पाओगे। बिगड़ा हुआ रूप, और रूप से परे वो परम रूप। स्व को भी देख पाओगे। देख के समझ पाओगे। ऐसा नहीं कि कुछ अलग दिखने लगेगा। आप वही के वही रहोगे। अभी भी वही हो, और आत्मज्ञान होने के बाद भी वही रहोगे।
सजगता मतलब जागरूकता, अवेयरनेस। बस इतना आपको सचेत रखना है अपने आपको कि मुझे किसी के साथ गलत नहीं करना है। आप हर वक्त सचेत रहोगे। यह भाव आपको सचेत रखेगा। मुझे किसी भी प्रकार का, किसी भी व्यक्ति के साथ गलत नहीं करना है। ना बोलने में, ना चलने में। गलत नहीं करना है, तो किसी में नहीं करना है। बोलने में, चलने में, उठने में, बैठने में, देखने में। मेरी नजरें ना चुभें किसी को। मेरे द्वारा कुछ गलत नहीं होगा।
यह अगर पक्का कर लोगे, सोते जागते, उठते बैठते, कि मेरे द्वारा अब कोई भी कार्य गलत नहीं होगा, तो आप हर वक्त, हर समय सचेत रहोगे।
कान खराब हो, तो मन थोड़ी ना, हमारा ब्रेन थोड़ी ना आवाज को समझ पाएगा। अगर हमारा हाथ काम ना करे, तो ब्रेन बताएगा क्या। नहीं बताएगा। मन निमित्त है। ब्रेन और दिमाग तो एक ही बोलते हैं। इंग्लिश में ब्रेन और हिंदी में दिमाग। और मन तो शरीर के लिए काम करता है। शरीर की सारी जरूरतों को देखता है। हमें पीछे खुजली आ रही है, तो मन ही इंगित कर रहा है कि यहां खुजली आ रही है। तो मैं उस जगह पर अपने अंग को ले जाता हूं, उसको हटाने के लिए। मन हमारे शरीर के लिए काम करता है, सिर्फ शरीर के लिए। उसको हटाना आपके ऊपर है। मन सिर्फ शरीर की जरूरतों को इंगित करता है। वो भी कहां तक। जहां तक अंग सही है। अगर सही नहीं है, तो वहां नहीं बता पाएगा।
मान लीजिए मोबाइल ऐरो द्वारा चलता है, लेकिन आपने फाइल में लॉक लगा के लॉक भूल गए। तो अब ऐरो को लेके जाओगे खोलने के लिए, लेकिन वो लॉक मांगेगा। लॉक आप भूल गए हो, तो कितना भी ट्राई करो, कुछ नहीं होगा। लेकिन लॉक कहीं आपको याद है। और कभी-कभी बाद में हमें याद हो जाता है, हम खोल लेते हैं। तो मन क्या करता है। निमित्त है। मन सिर्फ हमारे शरीर की जरूरतों को इंगित करता है। यह हमें समझना बहुत जरूरी है।
जितना भी आपने पहले लेन और देन किया, उसी के द्वारा इनकम होगी, उसी के द्वारा आउटपुट भी होगी। आपको अपनी समझ को विकसित करना पड़ेगा। विकसित करने के लिए जिसकी समझ विकसित हुई है, उसके पास जाना पड़ेगा। वह तरीका बताएगा किस तरीके से विकसित करो। मन आदान-प्रदान है। जब से आपने शरीर धारण किया है, जितना आपने आदान और प्रदान किया है, वो बताता है। और आपका शरीर है, उसके बारे में बताता है कि क्या जरूरत है। यही मन का काम है। यह क्लियर करना बड़ा जरूरी है, क्योंकि हमारी आदत हो गई है। मन को लेकर लोग बड़े भ्रम में पड़ गए हैं। मन को तो एकदम छोड़ ही दो।
सहायक तो है। लेकिन वो अपने आप काम कर रहा है। पीछे मैं तो निमित्त हूं। निमित्त तो आप हो। अब उसको हमें कहीं लगाने की जरूरत नहीं। मुझे क्या चाहिए, वो फैसला लेना है। उसके द्वारा वो मेरा नौकर ही मानो, एक्टिव नौकर है। नौकर एक शब्द अलग होता है। उसे लोग अलग तरीके से लेते हैं। सहायक हम बोल सकते हैं। नौकर नहीं बोल सकते। मुझे नौकर शब्द ज्यादा सूट करता लगता है, लेकिन नौकर नहीं है, इसलिए नौकर नहीं है। अगर आपको भूख नहीं लगी है, तो आप उसे भूख पर ला ही नहीं सकते। अगर नौकर होता, तो ले जाते। वो अपने आप काम करता है। वो मेरे अनुसार भी नहीं करता। आपके अनुसार आप करते हो। वह सहायक बनता है। अपने आप पता चलता है। वह शरीर के लिए ही काम करता है, और आप काम करवाते हो। सहायक मतलब, वो ज्यादातर शरीर के लिए काम करेगा। भूख लगी, बाथरूम आया, प्यास लगी, तो वो मेरा कहना नहीं मानेगा। नौकर होता तो मानता। हर समय वही लगा रहेगा। आप सोचो, मैं भूख को रोक कर कोई और काम करूं। वो हमेशा इंगित करेगा, भूख, भूख, भूख, आपको व्याकुल कर देगा। नौकर होता तो हट जाता।
आप कहीं ना कहीं शरीर के द्वारा अगर काम कर रहे हो, तो शरीर पर निर्भर हो। और शरीर के लिए मन काम करता है, तो शरीर की हर जरूरत को बताता रहता है। नौकर नहीं बोल सकते। सहायक बोल सकते हैं, लेकिन अगर सहायक कोई है, तो शरीर का सहायक आपकी समझ है। आपकी सहायक आपकी समझ है। यह तो शरीर के लिए काम कर रहा है। मेरे लिए सहायक सिर्फ एक ही चीज हो सकती है, समझ। क्या आप समझ ले रहे हो, क्या समझ दे रहे हो, वही सहायक है। और बाकी सब अपने आप काम कर रहे हैं। वो मेरे कंट्रोल में नहीं है। इसीलिए समझ को इतना विकसित करो कि इन सब से छूट जाओ। इनका ऐसा सदुपयोग करो कि आप इससे छूट जाओ। नहीं तो आपका ही शरीर आपका शत्रु बन जाएगा। आपको शरीर से पार उठना है।
जब शरीर ठीक-ठाक हो, तभी ज्यादा काम हो सकता है। नहीं तो यह तो जाने ही वाला है। मशीन ठीक है, गाड़ी की, तभी आप पहाड़ों पर चढ़ा सकते हो। अब अस्सी साल में चढ़ा रहे हो, तो धौं-धौं बोल रहा है। उतनी ताकत शरीर में नहीं है। यह साधन है, उस परम साध्य तक पहुंचने का। इसलिए मेरा कहना है कि जवानी से भजन करो। अपने आप को जवानी में लगाओ। नहीं तो शरीर को ठीक करने में पूरी एनर्जी चली जाएगी। साठ के बाद शरीर को ही ठीक करने में आपका समय चला जाएगा। फिर तो यह भी नहीं समझ पाओगे कि मन अलग है, शरीर अलग है, मैं अलग हूं। इसलिए मन को अच्छी तरह समझ लो। आप क्या करते हो, आपकी समझ कहां विकसित है, आपके क्या करने से क्या होगा, वो आप देख लो। मन को तो छोड़ ही दो। मुझे यह चाहिए, फिर मन उधर लगा दो, लग ही जाएगा। आप जाओगे तो लगना ही पड़ेगा। मेरे पीछे ही तो सब आएंगे।
एक अर्थ में वो कुछ नहीं है, और एक अर्थ में वो मेरा सहायक भी है। अब जैसे मन ने इंगित किया कि आपको भूख लगी है, लेकिन आपने कहा कि कोई बात नहीं, मैं यह जानकारी इकट्ठा कर रहा हूं। तो जानकारी इकट्ठा करने में उसको सहायक बनना पड़ेगा। भले वो इंगित करेगा कि भूख बढ़ रही है, लेकिन एक तरफ जानकारी भी इकट्ठी होती रहेगी। इसीलिए अपने शरीर को उचित पोषण देके, जरूरत में जियो, और अपनी समझ को विकसित करो। आपको देखना पड़ेगा कि मेरे लिए हित क्या है। अगर आप सिर्फ इंगित की ही सुनोगे, तब आप भटक जाओगे। दिन-रात शरीर को संभालने में ही लग जाओगे, क्योंकि वो कहेगा, कहीं भूख लगी है, कहीं पेशाब लगी, कहीं बाथरूम लगा, कहीं मंजन करना है, कभी सोना है, कभी आलस आ रहा है, कभी खुजली आ रही है, कभी मन नहीं लग रहा, कहीं और चलो। आपको देखना है कि आपका हित किसमें है। मुझे क्या करना है। मेरे द्वारा ही होगा।
इंगित कर रहा है, तो करने दो। अगर यह मेरा चल सकता है, तो करने दो। इंगित को रोको भी मत। वो करेगा ही। अगर नहीं करेगा, तब तो गया। अगर नहीं किया, तो वो अंग फेल हुआ। इस स्थिति पर मत ले जाना कि इंगित ना करे। गाड़ी जब रिजर्व में लगती है, वैसी स्थिति मत ले जाना। इंगित ना करे, तब तो वो अंग खत्म हो गया। आपको इतना पता होना चाहिए कि कब मुझे देना भी है। अपने आप को इतना दूर मत लगा दो कि यह मशीन फेल हो जाए। क्योंकि एक बार फेल हुआ, तो गए। बाथरूम आ रहा है, घंटों रोकोगे, तो किडनी फेल हो जाए। ऐसा नहीं कि रोको। और तुरंत आया, तुरंत करो, ऐसा भी नहीं। तुरंत आया और तुरंत करते रहे, तो आप गुलाम हो गए। वो बार-बार कराएगा। आप देखो, मेरी क्या जरूरत है। इंगित तो कर दिया। क्या अभी जरूरत है। आपको इतनी समझ होनी चाहिए कि कब मुझे क्या देना है अपने शरीर को। कितना मुझे खाना चाहिए, कब क्या देना चाहिए, कब इसको नींद की जरूरत है। एक साधक की तरह मैं तय करके उसे समय की सारणी दे दूं। पहले मत हिलाओ मुझे। हम एक शेड्यूल बांध लेते हैं कि अब खाना है, अब नहाना है। तो उसी समय पर यह अलार्म की तरह काम कर देता है।
दृष्टा भाव में हर वक्त सचेत रहो कि ईमानदारी मुझे रखनी है। बस मेरे कर्म में ईमानदारी बनी रहे। दृष्टा भाव रखना है। फिर एक समय ऐसा आएगा कि भाव भी छूट जाएगा, क्योंकि भाव भी तभी तक है जब तक आप लिप्त हो। आप लिप्त से मुक्त हो गए, तो भाव भी खत्म।
मन तो है ही। अपने आप है, शरीर में अपने आप है। तुम कर्म करो या ना करो, कर्म में सहायक बनता है। शायद जब शरीर बन रहा होगा, साथ-साथ वो भी बन रहा होगा। वो भी सक्रिय है। वो हमारा ही अंग है, लेकिन अदृश्य रूप से। अब जैसे आंख तैयार हो रही है, तो इसके लिए पलक भी तैयार हो रही है, बरौनी भी तैयार हो रही है। सब साथ में, क्योंकि तैयार करने वाला पूरा प्लान कर लिया है कि कब क्या बनाना है। पीछे कोई तैयार कर रहा है, तो उसने प्लानिंग कर ली है कि इसके बाद क्या बनाना है। सब पहले से तैयार है। तैयार होने से पहले ही तैयार है। तभी तो तैयार किया जा रहा है। नहीं तो कुछ का कुछ तैयार हो जाता।
तैयार करने वाला पहले से ही तैयार कर देता है। फिर वो प्रत्यक्ष हो रहा है। तो प्रत्यक्ष में विवाद लगता है कि नहीं, यह तैयार अभी हुआ। अभी नहीं, पहले ही हो चुका है। अप्रत्यक्ष रूप से तभी वो प्रत्यक्ष होता है। बीज के अंदर टहनियां थीं। बीज के अंदर ही फल थे। पहले से उसमें है। इसका नाम ही परमात्मा है।
सब पहले से तैयार है। तुम्हें लगता है कि अभी यह बन के तैयार हुआ, लेकिन पहले से तैयार हुआ है। तब आपने बनाने वाले को बताया कि कैसे बनाना है। एक है बनाने वाला, एक है बनवाने वाला। बनवाने वाला पहले से तैयार कर लेता है। बनाने वाले को बताता है कि मुझे ऐसा चाहिए। बनाने वाला वैसा बना देता है। अब आप कहते हो कि यह गेट इधर लगाना है, तो इधर लगा देता है। आप बनाते हुए कौन दिख रहा है। बनाया उसने नहीं। निर्माण किसी और का था, प्रत्यक्ष उसने किया। लेकिन प्रत्यक्ष के पहले, अप्रत्यक्ष रूप से, वो बन चुका है। बनाने वाला प्रत्यक्ष करता है, लेकिन बनाने वाले के पहले ही बन चुका है। किसी ने बना दिया है। पहले मानसिक रूप से तैयार है।
हर चीज के लिए सब चीज बनी हुई है। बस वो समय, काल, स्थिति और परिस्थिति आती है, तो वो इकट्ठी हो जाती है, और रूप आपको दिखता है। कुछ दिन पहले देखिए, अब यह बना। यह बना, तो कुछ दिन पहले बनाने वाले को पता चला, उसके बाद आपको पता चला। लेकिन आपके पहले भी यह तैयार था। आपको बाद में पता चला। कोई और है, उसको पता था कि यहां यह बनेगा। उसके पीछे भी कोई है। ऐसे ही पूरा चक्र है।
आपके सामने दो तो प्रत्यक्ष हैं। एक आप हो, और एक बनाने वाला है। उससे पहले आपको यह नक्शा आ गया था। तभी तो इतना अंतर है। लेकिन आपके पहले भी यहां ऐसा बनेगा, यह अगर देखा जाए तो सौ साल पहले से भी निर्णय था। यह आपको नहीं पता। आपको कुछ दिन पहले पता चला। कई वर्ष पहले से था। दिनों को कितना भी ले लो, क्योंकि यह समय के बाद, समय के पार की बातें हैं। इसलिए सौ साल में भी पता नहीं चलता। क्या यह सब पूर्व निश्चित है। हां, वही तो बात है।
अब जैसे जमीन आपने खरीदी, फिर यह नक्शा निकाला, आज हम इस हॉल में बैठे हैं। हमसे पहले आपको पता था कि यह जमीन आप लोगे। जब कुटिया में रहते थे, तब हमें दिखता नहीं था। तब हमें पता था, यह जमींदारों की जमीन है। आपको पता था कि आप यह जमीन लेने ही वाले हो। लेकिन उससे पहले यहां गांव था, यहां खेती होती थी। प्रकृति को पता था, यहां बाढ़ आएगी और यहां आश्रम बनेगा। कब किस चीज का आना है, कब प्रलय होना है, सब निश्चित है, क्योंकि कहीं ना कहीं कोई तो प्लान कर रहा है। एकदम निश्चित सब है।
जब हम निश्चित करने लगे, तो फंस गए। हम आए थे निश्चित। लेकिन जब मैं निश्चित में आया था, तो कुछ और था, और जैसे मैं आया, कुछ और हो गया। तो जितना मैंने निश्चित किया था, अब मैं उसे ही बदलना चाह रहा हूं, और उसमें बेईमानी करके मैं फंस गया। बेईमानी का दोष मेरे ऊपर लग गया। मैं निश्चित करके आया। मुझे क्या करना है। हां।
आप देखो, यहां भी आप आए, तो वहां से आने से पहले निश्चित किए थे कि मैं यहां क्या करूंगी। अब छोटे बच्चे को हम स्कूल भेजते हैं। बस इतना सा मां-बाप को पता है कि यह पढ़ाई करके संसार में जीना सीख जाएगा। एक अनपढ़ आदमी को देखते हैं, एक पढ़े-लिखे को देखते हैं। इसलिए अनपढ़ मां-बाप भी चाहते हैं कि मेरा बच्चा पढ़ ले। इसलिए वो स्कूल भेज रहे हैं। लेकिन बच्चा डिसाइड करके आया है कि उसको क्या बनना है, संसार में क्या-क्या करना है। वो डिसाइड करके आया है। तभी उसके मां-बाप उसको भेज रहे हैं। सब निमित्त बन रहे हैं। मैंने इसके पहले भी कहा है, सब फिक्स है।
पीछे तुम ही हो। पीछे तुम ही हो। अब जैसे मान लीजिए, बनाने वाला यह बोले कि मैंने नहीं बनाया। उसे कोई पूछेगा, तो कहेगा, मैंने बनाया। क्या उसने बनाया। और कह देते, तेरा क्या होगा, तूने क्या बनाया। फिर आपके पास आएगा, तो कहेगा, नहीं, इन्होंने बनवाया। तो क्या आपने बनवाया। मैंने तो बोला ना। हां, तो यही है। आपके मन में था कि आप यह जमीन लोगे। लेकिन आपसे पहले यहां लोगों की भैंसें चरती थीं, फसल होती थी। फिर बाढ़ का आना। उससे पहले क्या। उससे पहले ही निर्णय था कि यहां यह होगा। अब कितने साल पहले यह फिक्स हुआ, यह कोई नहीं बताएगा। और यह कब तक रहेगा। फिर इसका विनाश हो जाएगा। फिर यहां कुछ और बनेगा। क्योंकि होना ही होना है। यह कालचक्र है। एक चक्कर की तरह यह चलता रहता है।
आप इसमें से बस निकल जाओ। सीधी सी बात है। फिक्स हो या ना हो, दोनों हाल में आप इसमें से निकल जाओ। हम ज्यादा ड्रामेबाजी में फंस जाते हैं कि मैं यह कर रहा हूं, इसके लिए मैं यह प्लान कर रहा हूं। जिंदगी खत्म हो जाती है। कहेंगे, सब फिक्स है। फिक्स है तो फिर क्या कर रहे हो। फिक्स है या नहीं है, उसे छोड़ के, क्या आप करना चाहते हो, वह कर क्यों नहीं रहे। क्या आपको चाहिए, देख लो। एक बार जो करना चाह रहे हो, फटाफट कर लो। यह नहीं कि उसमें मजा आ रहा है या नहीं आ रहा है।
हम थोड़ा समाज की धारणाओं में सोचते हैं। अगर किसी के बारे में सोचना है, तो पहला मैं, और दूसरा यह कि मेरे वजह से किसी को तकलीफ ना हो। फिर इसके बाद और सोचना पड़ेगा। जो होता है, जिम्मेदार वो होगा। इतना मुझे पता है कि मैं नहीं रहूंगा। अपनी जांच करो। अपना लक्ष्य बना लो। मुझे ईमानदार रहना है। मेरे ईमानदार होने से भी अगर उसको तकलीफ है, वो जाने, उसका काम जाने। लेकिन मैं अपनी ईमानदारी नहीं छोड़ सकता। क्योंकि मुझे निकलना है। मैंने तय कर दिया है कि मुझे बस निकलना है। निकलना, मैं जो मैं और मेरा में घुस गया हूं, वहां से निकलना है। दुनिया और संसार से नहीं निकलना। दुनिया से कहां निकलो। जितने महात्मा हुए, वो भी तो इसी दुनिया में रह के आनंद में रहे, अपने कर्म किए और गए। उन्होंने भी कुछ कार्य किया और गए।
आप सबसे बड़े बन जाओ, और ऐसे लोगों को जवाब दो। अगर कोई किसी को दबा रहा है, तो दबने वाला उससे पावरफुल बनेगा। जब तक कमजोर रहेगा, और जब तक उस जगह में रहेगा, तब तक दबेगा ही दबेगा। अपनी ताकत को विकसित करो।
सत्य बोला नहीं जा सकता। हां। आवरण को हटाते रहो। अपनी धारणा को तोड़ते रहो। जहां रहो, देखो, सत्य है क्या। सत्य है, तो ठीक है, पता चल गया। और सत्य नहीं है, तो वहां से हटो। सत्य होगा, तो था और रहेगा। वही चीज है। आप देख लो, कहां हो। सत्य है क्या। नहीं है, तो वहां से हटो।
अगर सत्य की खोज है, तो मैं कहीं जा रहा हूं। मैं पूछता हूं, क्या यह जगह आ गई। नहीं, इससे आगे है, तो मैं उस जगह को छोड़ता हूं। अपने लक्ष्य तक पहुंचने के लिए मैं उस जगह को छोड़ देता हूं। क्या मैं आ गया। नहीं आया, तो छोड़ना पड़ेगा। तो आप देख लो, सत्य क्या है। अगर इसकी खोज है, तो आप क्या है, इसमें हो। इसीलिए पूछना पड़ रहा है कि सत्य क्या है। देखो, आप क्या है, इसमें जहां हो। सत्य है क्या। नहीं है, तो छोड़ दो। है, तो मिल गया।
संसार का मतलब, सबका यहां अपनापन, पूरा संसार है। और संसार में अनेक भिन्न-भिन्न रूप हैं। अनेक रूप में, अनेक पिंड में, मैं घुसा हूं, अपनी कामना के लिए, इच्छा के लिए, वासना के लिए। तो मुझे वो कामना और इच्छा छोड़ के वहां से निकलना है।
समझ हो जाती है, लेकिन किसकी। जहां जिए हो, वही समझ ज्यादा हो जाएगी। लेकिन आप उस समझ का उपयोग नहीं कर पा रहे। मैं कह रहा हूं, आप बचपन से निकले। घूमते-घूमते, खाई और पहाड़ों का सामना करते हुए, एक जगह चले आए, और यहां बूढ़े हो गए। अब यहां से जाना है, तो ताकत तो लगेगी, क्योंकि अब यहां से जाना पड़ेगा। आपको कहीं शिफ्ट होना है, या वही वापस आना है। वापस आने के लिए भी ताकत चाहिए।
आपको पता मालूम है, लेकिन पता मालूम होने से आप पहुंच थोड़ी जाओगे। मान लो पता भी मालूम हो गया, लेकिन साधन ही खराब हो गया, तो क्या करोगे। जिस साधन के द्वारा आपको जाना है, जिस साधन के द्वारा आपको सब छुड़ाना है, जब वही खराब हो गया, तो क्या करोगे। पता होने के बाद भी आप वही पड़े रहोगे। चलो, पता मिल गया, तो फिर अगला शरीर धारण करोगे, तो निकल जाओगे। पता ही तो समझ लो। समझ आपके साथ जाएगी। बाकी सब यहीं का यहीं रह जाएगा। आपकी समझ आपके साथ जाने वाली है।
समझ साथ में जाएगी, तो आप एक काम करो। समझ को विकसित करो। जहां भी हो, पता इकट्ठा करो। आज मैं इस साधन को लेके नहीं जा पा रहा। लेकिन पता इकट्ठा कर लो। जब साधन आपको मिलने वाला है, यह साधन जाएगा, अगला साधन मिलेगा, आप उसमें उस पता का उपयोग कर लेना।
मन आपके साथ नहीं है। यही तो बात है। आंख किसके साथ है। आपके साथ है, या शरीर के साथ। शरीर के साथ। आंख निकल जाए, तो भी आंख रहती है। आंख चली जाती है क्या। यहां तक कि कुछ घंटे के अंदर अगर किसी में लगा दो, तो देखने भी लगता है। तो आपके साथ खत्म क्यों नहीं हुई। वैसे ही मन शरीर के साथ है, ना कि तुम्हारे साथ। इस बात को अच्छी तरह समझो।
जीवन में दुख के लिए काम किए होंगे, तो दुखी हो। इसमें कौन सी गंभीर बात नहीं है। आप दुखी हो, आप परेशान हो, इसमें गंभीरता ना लेना। आप पीछे कर्म देखो, तो कहोगे, इससे ज्यादा दुखी मुझे रहना चाहिए था। जैसे आप दूसरों को देखते हो, दूसरे के कर्म को देखते हो, वैसे काश अपने कर्म को देख के फैसला लेते, तो ज्यादा अच्छा रहता।
पास और फेल आपके हाथ में ही है। जितना लिखे रहोगे, उतना ही नंबर आएगा। कभी-कभी आपने देखा है, किसी बच्चे को कम नंबर मिलता है, वो कहता है, फिर से मेरी कॉपी जांच कराओ, और अर्जी करता है। जांच करने दो, जितना नंबर होना है, उतना आता है। तो पास और फेल आपके हाथ में है, जांच करने वाले के हाथ में नहीं। जांच करने वाला अगर इधर-उधर किया, तो उसकी नौकरी भी जा सकती है। सब कुछ आपके हाथ में है। सब खेल खेले राम गोसाईं, अपना बैठे, दास की नहीं। तो सारा खेल के खिलाड़ी तुम हो।
मूल नहीं बदलता, लेकिन मूल ने जो स्वभाव को धारण किया है, वो बदल जाएगा। स्व नहीं बदलेगा। जो भाव धारण किया है, वो बदल जाएगा। जिस स्वभाव से आप परेशान हो, आप कुछ और काम करो। जैसा आप होना चाहते हो, वो छोड़ जाएगा। स्व ने भाव को धारण किया है, कर्म से।
आत्मज्ञान के बाद तो ईमानदारी भी खत्म हो जाती है। ईमानदारी भी कब तक। रास्ता कब तक। जब तक लक्ष्य तक ना पहुंचे। लक्ष्य पर पहुंचने के बाद रास्ता खत्म हो जाता है। छूट जाएगा। वैसे ही, जब तक जीवन में बेईमानी है, तभी तक ईमानदारी है। जीवन से बेईमानी खत्म हुई, तो ईमानदारी भी खत्म। और तुम ना ईमानदार रहे, ना बेईमान रहे।
आपके द्वारा जो भी होगा, सत्कर्म होगा। सोना, जागना, उठना, बैठना, आपके द्वारा समाज के हित का कार्य होगा। क्योंकि अब ना तुम ईमानदार रहे, ना बेईमान रहे। ईमानदार हो, तो भी तुम मेरे में ही हो। बेईमान हो, तो भी मेरे में ही हो। बेईमानी कर रहे हो, तो मेरा वाला तुम्हें गिरा रहा है। और ईमानदारी कर रहे हो, तो मेरा वाला तुम्हें उठा रहा है। लेकिन बेईमान हो या ईमानदार हो, हो मेरे में ही।
मैं और मेरा से मुक्त हो गए, तो आपकी ईमानदारी भी छूट गई, बेईमानी भी छूट गई। बेईमानी छूटी, तो ईमानदारी छूट गई।
कोई बात नहीं। ऐसे अंदर-बाहर करते रहो। एक दिन लॉक लग जाएगा। देखना, अंदर ही लॉक लगाना। बाहर से लॉक मत मार देना। अंदर आकर लॉक ही मार दो। और लॉक मार के चाबी फेंक दो। फिर मन करता है, बाहर झांक के आएं। किसी के हाथ में दे दो। किसको दे। फिर वो बार-बार डिस्टर्ब करेगा। उस चाबी को किसी ऐसे महापुरुष के हाथ में दे दो कि भाई, बस ले ले। तू जहां ले जा। जहां जाएगा, वहां तुम्हें लेके चला जाएगा।
दो ही तरते हैं। या तो सेवक, या तो साधक। देख लो, तुममें गुण क्या है। चाबी लेके चलने वाला गुण है, या चाबी देके चलने वाला गुण है। दो ही सत्य हैं, साधक या सेवक। साधक अपनी चाबी खुद रखता है, और वो कभी भी बाहर-अंदर कर सकता है। लेकिन सेवक चाबी दे देता है कि तू चाहे अंदर रख, चाहे बाहर रख, तेरी मर्जी। क्योंकि मैं अंदर भी हूं तो तेरी मर्जी से, बाहर भी हूं तो तेरी मर्जी से। क्योंकि मुझे कहीं होना नहीं है। मुझे होने से ही मुक्त होना है। यह सेवक का भाव है।
अगर मैं यहां भी हूं, तो तेरी मर्जी। मेरी मर्जी तो है ही नहीं। मैं चाहे अंदर हूं, चाहे बाहर हूं, तेरी मर्जी से हूं। क्योंकि मुझे कहीं होना ही नहीं है। तो यह सेवक समझ जाता है, और चाबी दे देता है कि भाई, यह ले। मैं जहां भी हूं, तेरी मर्जी से हूं, तो मेरी मर्जी ही नहीं है। यह सेवक का भाव। और साधक का भाव यह है कि चाबी मेरे हाथ में है। मुझे अंदर रहना है या बाहर रहना है, यह मैं तय करूंगा। जोखिम दोनों में है। अगर चाबी दोगे, तो पहले समझ लो, चाबी किसके हाथ में दे रहे हो। क्या पता, कहां शिफ्ट कर दे।
जांचना उसके कर्म से होता है। जैसे आज आप यहां आए, कुछ समय पहले। मेरे द्वारा क्या कार्य हो रहे हैं, चौबीस घंटे आपको पता है। तो क्या आप जांच नहीं पाए। यही तो जांच है। अब जिसके साथ रहोगे, वो जांचा जाएगा। जिसके साथ आप जीने लगोगे, वो जंच जाएगा। जांचने की अलग से जरूरत नहीं पड़ेगी। आप सीधे किसी से अलग होकर किसी को नहीं जांच सकते। अगर किसी को जांचना है, तो आपको उसके साथ होना पड़ेगा। वो जंच जाएगा। वो आपको जांच लेगा। आप उसको जांच लोगे कि कौन किसके लायक है।
जज तो दोनों ही रहे हैं। दोनों जंच रहे हैं। अगर कोई मशीन किसी को जांच रही है, तो मशीन को जांचने वाला भी कोई है। हो सकता है मशीन टूटी हुई हो, कोई गलत बता रही हो। ऐसा होता भी है, बहुत बार। तो मशीन के पीछे भी कोई है, कि मशीन सही है कि नहीं। उसके पीछे भी कोई है, कि इसको जांचना आता भी है कि नहीं। एक के पीछे एक, आखिरी परमात्मा। आंख के पीछे कितने लोग हैं, आपको नहीं पता। आप किसी सिस्टम को चला रहे हो, पीछे कितनी जांच हुई है, आपको नहीं पता।
अज्ञानी होना चाहते हो, यह भी नया नहीं है। हम तो थे ही। मुक्त होना चाहते हो, यह भी आपके लिए नया नहीं है। आप लिप्त हो रहे हो, यह भी आपके लिए नया नहीं है। यहां नया कुछ नहीं है। नया सिर्फ भ्रम है। यह नया है, यह भ्रम भी पुराना ही है। सब मामला पुराना ही है। रूप बदलते रहते हैं। उसे हम ट्रांसफॉर्मेशन कहते हैं। इधर से उधर शिफ्ट होता है, तो हमें लगता है नया हो गया। यहां नया कुछ नहीं है। हर चीज रिसाइकल हो रही है। या तो मुझे कबाड़ बनना है, या कुछ नया रूप लेना है। अगर बीज अच्छी जगह पड़ जाए, तो पौधा बन जाएगा। जो कुछ भी कर रहे हो, नया नहीं है। कुछ बोलो, तो भी कोई शब्द ऐसा नहीं है जो मैं बोल पाऊं और पहले ना बोला गया हो। कुछ भी नया नहीं। मेरे द्वारा ही क्या-क्या बोला गया होगा।
आप समझ पा रहे हो, इसका मतलब आपके अंदर समझने की क्षमता है। तभी तो समझ पा रहे हो। अगर क्षमता ही नहीं होती, तो समझ भी नहीं पाते। कहने का मतलब, यहां कुछ नया नहीं है। ना तो आपके लिए आत्मज्ञान नया है, ना फंसना नया है, ना बंधन नए हैं। आपके लिए नया कुछ नहीं है। आप कभी उधर से होते हो, इधर आते हो। आप इधर थे, तो उधर गए। तुम ही तो गए। यही तुम्हारा काम चल रहा है। जब ज्यादा बेचैन होते हैं, तो कहते हैं, यह वाला देख लें। जब यहां ज्यादा त्राहिमाम हो जाती है, तब सोचते हैं, चलो देख आते हैं। जब ज्यादा त्राहिमाम हो जाती है, तब सोचते हैं, पूरी जिंदगी मशकत लगाई, पूरी जिंदगी समर्पण कर दी, अब आखिर में चलो परमात्मा के पास चलते हैं। लेकिन आखिर कभी था ही नहीं। परमात्मा के पास कभी तो होगे, तभी तो आज जा रहे हो। तो आपके लिए नया थोड़ी है।
क्या पता, परमात्मा भेज देता हो, बेटा, काफी दिन हो गए पड़े-पड़े, जा, थोड़ा घूम आ। हम ही थक जाते हैं। आप कहीं भी, किसी जगह जाते हो, तो कहते हो क्या। शहर वाले गांव में जाते हैं, वाह, क्या पेड़ हैं, क्या पौधे हैं। दो दिन बाद कहते हैं, मम्मी, चल। फिर मम्मी पापा से कहती है, चल। तो पापा कहता है, कुछ दिन हम गांव में रुक जाते हैं। तो मम्मी कहती है, नहीं, चलो, अब घुटन हो रही है। पहले दिन गए, वाह, क्या कच्चा मकान है, दादी है, दादी के साथ रहेंगे, अब तो बड़ी सभ्य है। जरा तीन दिन किसी भी व्यक्ति के साथ रहो, जिसको तुम अच्छा कहते हो, चाहे वो जगह हो, चाहे वो कोई व्यक्ति हो। तीन दिन तो क्या, तीन घंटे में पता चल जाएगा।
जो हमें नया लगता है, वो हमारे लिए नया नहीं है। हमारे लिए यहां कुछ नया नहीं हो रहा है। आज हम परमात्मा की यात्रा करें, यह कोई नया नहीं है। हम उससे बिछड़े, यह कोई नया नहीं। बस इतना है कि हमें थकान हो जाती है। ज्यादा त्राहिमाम करते हैं, परेशान हो जाते हैं, तो शिफ्ट करते हैं। अब वहां रेस्ट करते हैं, तो फिर दोबारा आना क्यों चाहते हैं। यह तो अब वहां से पता चलेगा। बहुत सारी चीजें हम भूल गए। जब वहां जाएंगे, तब जाके पूरा क्लियर होगा कि हम आए क्यों। अभी तो यात्रा में हैं। अभी तो जहां जाना है, वहां भी भूल गए हैं। जिसके पास जाना है, उसको भी भूल गए हैं। कैसा है वो, रास्ते भी भूल गए हैं। जिसके पास जाना है, उसको भी भूल गए हैं। तो हमें यह याद कैसे रहेगा कि मैं क्यों कूद पड़ा था। वो तो बहुत पुरानी बात है। वो तो वहां जाके पता चलेगा कि हम यहां आए क्यों थे। इतना तो पता चल रहा है कि हमें यहां से जाना है। यहां मन नहीं लग रहा। यहां हम जाना चाहते हैं।
यहां इच्छा रहेगी। राग, द्वेष, मोह आ सकते हैं। एक दिन देखो। आज जिस परिचय को छोड़ना चाह रहे हैं, वही परिचय बनाने के लिए कितनी मेहनत की है। सोच रहे हैं, जिन लोगों की याद आ रही है, उन लोगों की याद ना आए। लेकिन उन यादों के लिए हमने कितना काम किया है। बड़ी मेहनत की है। जिनको आज मैं भुलाना चाहता हूं, उनके लिए मैंने काम भी तो किए हैं। बहुत ज्यादा। जब मिल जाती है, तब लगता है, यह क्या, गले में घंटी बांध ली। और गले की घंटी खुलती नहीं, वो बजती रहती है।
हमारे लिए कुछ नया नहीं है। इसीलिए तो मैं आपको कल ही कह रहा था, बहुत सरल है। बहुत ही सरल है, क्योंकि मैं उसमें कभी था। मैं बताता हूं कैसे। मैं यहां हूं। यहां से छुड़ा दो। बस, बात खत्म। लेकिन तुम यहां से बिना छुड़ाए अपने आप को आत्मज्ञान कराना चाहते हो। संभव नहीं है। आप जहां लिप्त हो, वहां से अपने आप को छुड़ा लो। बात खत्म हो जाएगी। तो सबसे सरल आत्मज्ञान है। लेकिन सरल कब है। जब आप छुड़ाना चाहते हो, तब सरल बन जाएगा। लेकिन आप उसमें रख के अपने आप को आत्मज्ञान चाहते हो, तो संभव नहीं है।
जैसे आपने आंख बंद कर दी, तो इसका मतलब रूप दिखना बंद हो गया। अब मैं जहां हूं, वहां लोगों की आवाज भी मुझे ना आए। नहीं तो मैं उस आवाज में चला जाऊंगा। फिर सुगंध और दुर्गंध ऐसी ना हो कि मैं उसकी तरफ प्रभावित हो जाऊं। कोई ऐसी चीज मुझे ना छुए कि मैं उससे मोहित हो जाऊं। स्पर्श भी ना हो। और मेरे मुंह में ऐसी चीजें ना हों, जिनका मैं स्वाद ले रहा हूं। पता चला, मैं मुंह में कुछ रखकर ही स्वाद ले रहा हूं, तो मैं तो स्वाद में हूं।
आंख बंद करने का मतलब यह हुआ कि आंख बंद की, और मैं उन आवाजों से दूर हो गया जो मुझे बांट रही हैं। आवाज से तो कभी दूर हो ही नहीं सकते। प्रकृति की अपनी आवाज है। प्राकृतिक आवाज से दूर नहीं होना। जो आवाजें हमें बांट रही हैं, उनसे दूर होना है। मैंने आंख बंद कर ली। अब अगर पांचों इंद्रियों को ये विषय नहीं मिल रहे, तो मुझे पता चलने लगता है कि मैं कहां-कहां फंसा हूं। उनकी यादें आने लगती हैं। जब मैं रूप देखना बंद करूंगा, तो पुराने रूप याद आने लगेंगे। जिस रूप से मैंने राग और द्वेष लिया है, उस रूप की याद आने लगेगी। तो आप देखिए कि आप उसमें क्यों अभी तक फंसे हो। ले लिया, तो ले लिया। आदमी को यह चिंतन करना है। इसलिए आंख बंद करके अपने आप में हो जाओ।
कहीं से अपने आप को हटाना नहीं है। जैसे आपने आंख बंद कर ली, और भाव बना लिया कि अपने आप में होना है। अपने आप में होना है, मतलब आप जहां-जहां लिप्त हो, वहीं होगे। आंख बंद करने का मतलब यह नहीं कि आप अपने अंदर हो गए। आंख बंद करने का मतलब यह है कि चेतन इंद्रियों द्वारा बहिर्मुखी लेना बंद कर दिया। लेकिन जितना आपने संचित किया था, अब उसमें जाओगे। बहिर्मुखी और अचेतन, दोनों क्लियर होंगे, तभी आप अपने आप में हो पाओगे। तो मुझे जाके वहां क्लियर करना है कि मेरा लेन-देन किससे है।
धीरे-धीरे अपने आप होगा। धीरे-धीरे सत्संग सुनते रहो, और धीरे-धीरे ध्यान में यह समझते रहो कि ध्यान क्या है। धीरे-धीरे अपने आप ही होगा। जैसे आप एक बीज लगा दीजिए, तो सब अपने आप हो रहा है। बस आप उसकी देखभाल करो। वृक्ष बनाने का प्रयास नहीं करना होगा। उसे उसी तरीके से पोषण दो। तो आप अपने आप में होकर बैठिए। आप जहां लिप्त हो, वहां आपको धीरे-धीरे समझ में आ जाए।
बिना गुरु का नाम जप सफल होगा कि नहीं, यह पूछने से पहले गुरु को समझना पड़ेगा कि गुरु आखिर है कौन। कौन है, जो मुझे मुक्त करा दे, वो गुरु है। गुरु ज्ञान का प्रतीक है। गुरु शब्द ज्ञान का प्रतीक है। कोई व्यक्ति विशेष नहीं है।
आप गृहस्थ जीवन में हो। गृहस्थ जीवन में स्त्री को गुरु दीक्षा लेने की जरूरत नहीं होती। राम के गुरु वशिष्ठ थे। सीता के गुरु बताओ, हैं ही नहीं। इसके बाद कृष्ण के गुरु थे, रुक्मिणी के गुरु नहीं हैं। सुदामा के गुरु वही थे, उनकी पत्नी के गुरु नहीं। कहने का तात्पर्य यह है कि गृहस्थ जीवन में हो तो स्त्री को गुरु करने की जरूरत नहीं। सीधी सी बात है।
अब बचा पुरुष। पुरुष धन कमा रहा है। अब तो स्त्रियाँ भी कमा रही हैं। अगर घर में आय आ रही है तो पूरी तरह ईमानदारी होनी चाहिए। अपने ऊपर और अपने परिवार पर खर्च करते हुए, उसमें से कुछ हिस्सा सत्कर्म में लगाना चाहिए। सत्कर्म मतलब जरूरतमंद की सेवा। जीवन में इतना अपना लिया तो मुक्ति से मोक्ष तक पहुँच जाओगे।
गुरु ज्ञान का प्रतीक है। रही मंत्र जाप की, तो जिन लोगों ने मंत्र लिया, जैसे वाल्मीकि, ध्रुव, ऐसे कई हुए, उन्हें मंत्र उस स्थिति में मिला जब उन्हें कुछ नहीं चाहिए था। अभी वो स्थिति नहीं आई। अभी तो आपको बहुत कुछ चाहिए। दायित्व है, कर्तव्य है, जिम्मेदारी है। तो ईमानदारी से सत्कर्म अपनाते हुए जीवन जियो, और सत्संग सुनते रहो। गुरु बनाना नहीं है। बनने और बनाने से मुक्त करा दे, वो गुरु है।
मीराबाई ने गुरु बनाया, लेकिन मीराबाई ने गृहस्थ जीवन छोड़ दिया। वे कृष्ण भगवान की भक्ति कर रही थीं, फिर संत रविदास को गुरु बनाया। मीराबाई को कुछ नहीं चाहिए था। जब आपको कुछ नहीं चाहिए, तब गुरु मिल जाएगा। और ऐसा गुरु ज्ञान का प्रतीक है। सत्संग सुनते रहिए, ज्ञान लेते रहिए, आगे बढ़ते रहिए, ईमानदारी से कर्म कीजिए। स्त्री अगर गृहस्थ जीवन में है तो गुरु खोजने की कोई आवश्यकता ही नहीं है।
यहाँ तक कि स्त्री को साष्टांग प्रणाम भी नहीं करना चाहिए, क्योंकि स्त्री स्वयं शक्ति का स्वरूप है। स्त्री अपने बच्चों को अपने शरीर से पाल सकती है। पुरुष में यह क्षमता नहीं है। धरती को हम माता बोलते हैं। एक माता को दूसरी माता को साष्टांग नहीं करना चाहिए। प्रणाम करना है तो ऐसे करो, साष्टांग प्रणाम नहीं। पुरुष साष्टांग प्रणाम कर सकता है, स्त्री नहीं। गृहस्थ जीवन में स्त्री को गुरु की जरूरत नहीं। मूल है ईमानदारी और सत्कर्म।
अर्जुन के गुरु द्रोणाचार्य थे, लेकिन द्रोणाचार्य ने शस्त्र विद्या सिखाई। आध्यात्मिक गुरु कौन हुए, सारथी कृष्ण। जब ज्ञान दिया, उस समय कृष्ण भगवान सारथी थे और ज्ञान दिया। दीक्षा थोड़े दी, माला थोड़े दी, नाम थोड़े दिया। ज्ञान दिया। गुरु वही है, जो बनने और बनाने से मुक्त करा दे। ईमानदारी और सत्कर्म से जीवन जियो। सत्कर्म करते रहो, सत्संग सुनते रहो, आगे बढ़ते रहो।
रामकृष्ण परमहंस के गुरु तोतापुरी हुए, माँ काली की भक्ति के बाद। शारदा माँ के गुरु कहाँ बने? आप लोग तो ऐसे ही तर जाओगे। बस घर में ईमानदारी बनी रहे और सत्कर्म करिए। ऐसे ही अपना उद्धार कर सकती हो। गुरु करने की जरूरत नहीं। कहीं जाकर नाम दान लेने की स्त्रियों को जरूरत नहीं। स्त्री स्वयं शक्ति का स्वरूप है। जन्म देने वाली, पालन करने वाली, और उसके शरीर में ऐसी ताकत दी गई है कि अपने बच्चों को शरीर से पाल सकती है। सत्संग सुनिए। गुरु मतलब बंधन। बंधन की आपको जरूरत नहीं।
आप कहती हो कि गुरु मंत्र देते हैं, उसका जप होता है, गुरु किए नहीं तो मंत्र कौन सा लें। मैं वही कह रहा हूँ। मंत्र की जरूरत आपको नहीं है। आपको ईमानदारी और सत्कर्म की जरूरत है। अगर कोई नाम जप से मुक्त होना चाहता है, तो वह मंत्र तब लेने लायक है जब उसे कुछ नहीं चाहिए। तब वैसा गुरु मिलेगा। अभी मिल जाए तो आप उस स्थिति में नहीं हो। फिर बनावटी गुरु मिल जाएँगे, और गलती आपकी होगी। इतिहास देखिए, मंत्र उस स्थिति में किसी को मिला है जब उसे कुछ नहीं चाहिए था। ध्रुव का नाम लिया, वाल्मीकि जी का नाम लिया।
जब कुछ नहीं चाहिए, तब मंत्र की जरूरत है। और स्त्री गृहस्थ जीवन में है तो उसे तो है ही नहीं। अगर गृहस्थ जीवन छोड़ रही हो, तब ऐसा गुरु मिलेगा। अभी तो ईमानदारी से करो, अपने आप को समझो, सत्संग सुनती रहो। ऐसे ही मंत्र की जरूरत ही नहीं। आप जबरदस्ती गुरु की तलाश में हो। समझ होनी चाहिए। इतिहास में जिन्हें सर्वश्रेष्ठ माना जाता है, उनका उदाहरण दे दिया, उनकी पत्नियों का उदाहरण दे दिया। अभी भी गुरु की तलाश कर रही हो कि कोई मंत्र दे। ईमानदारी और सत्कर्म से जीवन जियो, सत्संग सुनो, अपने आप को समझो। सन्यासिनी होना है तो बात अलग है। जबरदस्ती गुरु क्यों खोज रही हो।
सीता ने गुरु नहीं बनाया, रुक्मिणी ने नहीं बनाया, माँ शारदा ने नहीं बनाया। अपने पति के साथ ईमानदारी और सत्कर्म से जीती रहीं, और वहीं से उनका उद्धार हो गया। आप कहती हो कि कृष्ण को जगतगुरु मानती हूँ। जिसको भी मानो, मूल ईमानदारी और सत्कर्म वही है। जगतगुरु सबकी आपको जरूरत नहीं। ले रही हो तो जबरदस्ती कर रही हो। या फिर उस स्थिति में हो जाओ कि मुझे कुछ नहीं चाहिए, तब ऐसा गुरु मिल जाएगा।
गृहस्थ जीवन में हो तो ज्ञान की जरूरत है, पर इन मंत्र देने वाले गुरु की जरूरत नहीं। आज लोगों ने मंत्र देने का काम बना लिया है। गुरु मंत्र उस स्थिति में दिया जाता था जब उसे कुछ नहीं चाहिए था, जब वह सब छोड़ना चाह रहा था, मुक्त होना चाह रहा था। आपकी स्थिति वो है क्या? इसलिए अपने घर में रहकर ईमानदारी और सत्कर्म से जीवन जियो। मैंने उनका उदाहरण दिया जिन्होंने अपने पति के साथ रहकर गुरु नहीं बनाया।
समझ में न आए तो जाओ गुरु ढूँढो, हम नहीं रोकेंगे। मंत्र जपो, माला फेरो, अगर आदत में हो तो बात अलग है। जेब काट रहे हैं और गुरु बनाकर बैठे हैं। पहले जेब काटना बंद करो। गुरु के लायक हो क्या तुम? गुरु भी वैसा ही मिल जाएगा। मंत्र दे दिया और कहा, जेब काटो, तुम अस्सी रखना, दस बीस मुझे देना, हम तुम्हारे पाप धोएँगे। ऐसा गुरु भी वैसा ही है। गुरु मंत्र तब देता था जब शिष्य को कुछ नहीं चाहिए था। इतिहास में चले जाओ। तुम गए और कहा आज लो, कल वह कहीं और चला गया। समाज की ऐसी दुर्दशा हो गई है। जैसे मंदिर में पंजीरी बँटती है, वैसे गुरु मंत्र बाँट रहे हैं।
जब गुरु मंत्र देता था तो योग्यता देखता था, सामर्थ्य देखता था। क्या सच में तुम्हें कुछ नहीं चाहिए? पूरी तरह ईमानदारी और सत्कर्म के साथ जीवन जिओगे क्या? पूरी तरह जाँचता था, उसके बाद देता था। राजा जनक को अष्टावक्र ने दीक्षा थोड़े दी थी। सीधा ज्ञान करा दिया। कोई विधि विधान नहीं करवाई। गुरु ज्ञान का प्रतीक है। ज्ञान, जो बनने और बनाने से मुक्त करा दे, वो गुरु है।
ईमानदारी और सत्कर्म से जियो, ऐसे ही अपने आप को तार लोगे। सत्संग सुनिए। जैसे भोजन रोज करती हो, वैसे सत्संग सुना करो। मंत्र जाप के लिए बहुत लोग भाग रहे हैं। पहले मंत्र जाप के लायक हो क्या? जेब काट रहे हो और मंत्र जाप कर रहे हो। तुम्हारा गुरु भी कैसा है, पता नहीं। मंत्र दे दिया क्योंकि वो गुरु नहीं है। गुरु होता तो तुम्हें सालों घुमाता, पहले पूरी तरह जाँचता, तब जाकर कोई मार्ग बताता। आज तुम गए नहीं कि लो मंत्र। पैसे वाले करोड़पति हों तो एकांत में दे देंगे, और सामान्य हों तो माइक पर बोल देता है, उठा लो जो उठाना है।
जिसका सालों से माला जप रहे हो, उसके दरवाजे पर जाओ। कहो, आज रात बितानी है, मैंने आपका मंत्र लिया है। कहेगा, मंत्र लिया है तो जाकर देख लो, आजमा लो। जिसका मंत्र ढो रहे हो, उसके दरवाजे पर जाकर पूछो, आप मुझे पहचान रहे हो क्या? पहली बात, तुम उन तक पहुँचोगे कि नहीं पहुँचोगे, यह भी पता नहीं। तुमने अपनी दुर्दशा करवा ली है। जब वही तुम्हें नहीं पहचान रहा और उससे मिलने नहीं दिया जा रहा, फिर आगे क्या होगा? इस बात को समझो।
इसलिए जीवन में मूल है ईमानदारी, और सत्कर्म करते हुए अपने आप को निकाल लो। राम का उदाहरण दे दिया, कृष्ण का उदाहरण दे दिया, रामकृष्ण परमहंस का उदाहरण दे दिया, और अभी भी लग रहा है कि नाम दान लेना है। दूसरे के माथे पर सिंदूर लगा देखकर अपना ललाट मत तोड़ो, कपाल मत पटको। अपनी स्थिति और परिस्थिति देखकर, सोच समझकर आगे बढ़ो। ऐसा नहीं कि लोग गुरु मंत्र लेंगे तो आप भी लोगी। आप उस लायक हो क्या? सच में आपको कुछ नहीं चाहिए, क्या इस स्थिति पर आ गई हो?
सच में अब पति और पत्नी का रिश्ता छोड़ना चाहती हो, बस अब वह खत्म हो गया, तब जाकर गुरु खोजो। फिर गुरु मिलेगा। कोई शब्द देगा और बोलेगा, जाओ, अपना कल्याण करो। क्या तुम इस स्थिति में हो? नहीं हो, तो जहाँ हो वहीं से अपना कल्याण कर लो, और पतन मत करो। लोगों ने मतलब ही बदल दिया। नाम, शोहरत और पैसे के लिए, मेरे लाखों शिष्य हैं। अभी तक तो माता पिता गुरु थे, शिक्षक गुरु थे। आध्यात्मिक गुरु आखिर में तब मिलेगा, जब सच में कुछ नहीं चाहिए।
जो भाव में आकर बैठे थे, उन्हें मैंने जानकर कह दिया। मुझे मालूम था वे पचा नहीं पाएँगे, अपना समय बर्बाद न करें। संकोच में न बैठें, इसलिए बोल दिया। वे नहीं सुन पाए। कामनाओं वाली बात होती तो शाम तक बैठते। घर से फोन भी आता तो कहतीं, अभी आ रही हूँ, आज पूरी तरह मिल गए हैं, माल पाने का रास्ता मिल गया। भगाने पर लोग नहीं जाते। कामना हो तो धक्के खाकर भी खड़े रहते हैं।
हो सकता है उसमें से आप भी हो। ये कुत्ते होते हैं ना, इन्हें कितना भी डंडा मारो, आ जाते हैं। ऐसे ही कामनाओं वाले व्यक्ति की हालत है। बस पता चल जाए कि कामना पूरी होगी, जूते भी मारो तो खड़े रहेंगे। और पता चल जाए कि कामना पूरी नहीं होगी, तो हार भी पहना दो तो नहीं रुकेंगे। यह मैं अनुभव बता रहा हूँ, और आपको भी इसका अनुभव है। आज नहीं हो तो कुछ साल पहले हो सकते हो।
लोगों ने कह भी दिया कि कुत्ते की तरह वफादार होना। हमारी हालत कुत्ते की तरह हो गई है। मेरा कहना है, कभी कुत्ते की तरह मत होना। कुत्ता वफादार तो है, पर उसमें गड़बड़ी यह है कि अच्छा आदमी पाल ले तो बुरे को काटेगा, बुरा आदमी पाल ले तो अच्छे को काटेगा। उसे मतलब नहीं। यह गुण आपमें नहीं होना चाहिए, नहीं तो नाश और पतन हो जाएगा। आपको सिर्फ ईमानदारी देखनी है। बेईमान व्यक्ति का त्याग कर देना, चाहे वह आपका बाप ही क्यों न हो, जैसे प्रह्लाद ने किया, और प्रह्लाद का कल्याण हो गया।
आज हमारी स्थिति यह हो गई है कि हम कुत्ते हो गए हैं। धक्के मारे जा रहे हैं, गाली सुन रहे हैं, झगड़ा भी हो रहा है, फिर भी कामनाओं के लिए खड़े हैं। उतना घर वाला बोल दे तो बर्दाश्त नहीं करोगे। मेहमान आ जाए और उतना बोल दो तो बर्दाश्त नहीं कर पाओगे। वहाँ जाकर धक्का खा रहे हो, गाली सुन रहे हो, धक्कामुक्की में खड़े हो, मात्र कामनाओं के लिए। सच में उसके लिए गए हो क्या, देख लो। अभी नहीं है तो कभी स्थिति हो सकती है। जाँच लो। हमने अपने आप को कुत्ता बना दिया। सबसे सर्वश्रेष्ठ कहते हैं कि देवता भी इस तन को पाने के लिए तरस रहे हैं, और हम देवताओं के पीछे भाग रहे हैं।
एक तरफ वही शास्त्र, वही गुरु कह रहा है कि देवता भी इस मानव तन के लिए तरसते हैं, और तुमसे देवता की पूजा करने को कह रहा है। तुम दोनों में हाँ कह रहे हो। प्रश्न खड़ा करो। जब देवता भी इस मानव तन को पाने के लिए तरसता है, तो मुझसे देवता की पूजा क्यों करवा रहे हो? यह प्रश्न तब खड़ा करोगे जब ईमानदार होगे, और तुम हो नहीं। सामने झूठ बोला जा रहा है और तुम हाथ जोड़े बैठे हो, क्योंकि तुम बेईमान हो। सोच रहे हो, कैसे भी कुछ मिल जाए।
कुत्ता तो कम से कम जीव है, उसका स्वभाव है। उसमें कर्ता का भाव नहीं। पैदा करके नहीं खा सकता, थाली देख रहा है कि कब देगा। वही हालत तुम्हारी है। तुम्हें सात्विक, राजसी, तामसी, परमात्मा से मिलने के लिए शरीर मिला था। तुम क्या कर रहे हो? हमने अपनी हालत कुत्ते जैसी बना ली है। हम भी ऐसे कभी थे। धीरे धीरे अपने आप को निकाला। तुम भी निकालो।
गाली सुनते हो और कहते हो, गुरु जी का आशीर्वाद। यह कौन सा आशीर्वाद है? गुरु को आशीर्वाद ही देना है तो गाली में देगा क्या? द्वार पर धक्का मिल रहा है, द्वार छोड़ो। किसके लिए खड़े हो, आत्मकल्याण के लिए या माल के लिए? आत्मकल्याण करने वाला गुरु गाली देगा क्या? जितने समाज को भटकाने वाले सिद्ध हैं, उन्होंने समाज को पूरी तरह भटका दिया। ये आत्मा को परमात्मा से नहीं मिलने दे रहे। जितने सिद्ध हैं, वो गिद्ध हैं। गिद्ध बहुत ऊपर उड़ता है, पर जब गिरता है तो सड़े गले मांस पर। जितने सिद्ध हैं, वो नाम, शोहरत और पैसे में चले जाते हैं, और समाज को बर्बाद कर देते हैं। जितने सिद्ध हुए, सबसे ज्यादा समाज को भटकाने वाले यही हैं। नाम और पैसे में उलझाए रखते हैं। आत्मा परमात्मा से मिलने के लिए व्याकुल है, और ये मिलने नहीं देते।
जैसे तुम्हारे छोटे बच्चे हों। उन्हें स्कूल न भेजकर खूब खिलौने दो, सोने के खिलौने दो। वे कहेंगे मम्मी पापा बहुत अच्छे हैं। कब तक? जब तक बच्चे हैं। थोड़ा बड़े होकर समाज में जाएँगे, लोग कहेंगे तू तो गँवार है। तब घर आकर वही मम्मी पापा गंदे लगेंगे। कहेंगे, तुमने मेरी जिंदगी बर्बाद कर दी। मुझे तो पता नहीं था, आपको पता था। जितने गुरु तुम्हारी कामनाएँ पूरी कर रहे हैं, जिस दिन समझ आ जाएगी, इनको गाली दोगे। इनसे घिन आएगी। जैसे बच्चों को माता पिता से घिन आती है कि तुमने जीवन बर्बाद कर दिया, तुम्हारा काम शिक्षा देना था, समझ थी, मुझे खिलौनों में फँसा दिया। जब बड़े हो गए, तब। वैसे ही जिस दिन तुम्हारी समझ जग जाएगी, कामना वाले गुरुओं से घिन आएगी। यह शरीर परमात्मा से मिलने के लिए मिला था, और तुमने जीवन वस्तुओं और वैभव के लिए बर्बाद कर दिया। अभी बहुत अच्छे लग रहे हैं, पैर धोकर पी रहे हो। समझ आने पर घिन आएगी।
जब तक समझ नहीं आएगी, जैसे उस बालक से कोई समझदार कहे, बेटा खिलौने छोड़, पढ़ाई कर, तो वह बोलेगा तुम गंदे हो, जाओ, मेरे माता पिता बहुत अच्छे हैं, खिलौना देते हैं। बड़ा होगा तो माता पिता से घिन आएगी, और उसी व्यक्ति को ढूँढेगा कि वह सही कह रहा था। कभी न कभी यह बात समझ में आएगी कि हम कुत्ता बन गए, और सिद्ध लोगों ने जिंदगी बर्बाद कर दी। अभी आ जाए तो ठीक है। कभी न कभी तो आनी ही है।
जब मैं साधना में था, लोग आकर साष्टांग प्रणाम कर देते थे। मैंने कहा यह मत करो, यह नहीं चलेगा। मुझे मालूम है तुम मुझे प्रणाम नहीं कर रहे, कामनाओं को कर रहे हो। मैं ज्यादा दिन तक तुम्हारी कामनाएँ पूरी नहीं कर सकता। बाद में वही होता था। साष्टांग करते थे, फिर उँगली उठाकर खड़े हो जाते थे। उँगली उठाना मुझे पहले ही पता था। अभी भी लोग आते हैं। जो ज्ञान को प्रणाम करते हैं, उन्हें मैं जानता हूँ। मुझे तो कोई जानता ही नहीं। तुम ज्ञान को प्रणाम कर रहे हो। तब वे कामनाओं को प्रणाम कर रहे थे, अब तुम इस ज्ञान को प्रणाम कर रहे हो। यह शरीर निमित्त है। मैं इस भ्रम में कभी नहीं फँसा कि मुझे कोई प्रणाम कर रहा है। मुझे कोई जानता ही नहीं, प्रणाम क्या करेगा।
वह मुझसे मिलने आया ही नहीं। नगामा गाँव है, नर्मदा तट पर, अंदर कमरे में मैं था। बच्चों से बोल दिया था, कोई आए तो दरवाजा मत खोलना, उस समय हम अपने आप में रहेंगे। कुछ समय बाद बाहर निकला तो बच्चों ने बताया, महाराज जी आपसे दो लोग मिलने आए थे। क्या बोल रहे थे? बोले, आपके दर्शन करने आए थे। मैंने कहा, अभी तो ऐसा कोई आदमी पैदा नहीं हुआ जो मेरे लिए आया हो। कुछ काम की बात की? बोले, नहीं, बस दर्शन करने आए थे। मैंने कहा, मेरे दर्शन करने ये कहाँ से आ गए। जब से जन्म हुआ, जहाँ तक मैंने समझा, मेरे लिए आज तक कोई नहीं आया। ये दो लोग कहाँ से आ गए। मैं उन्हें ढूँढता हुआ उस जगह पहुँचा। उस गाँव में मेरा परिचय भी था। हनुमान मंदिर और शिव मंदिर है। वहाँ पता किया, दोनों को खोज लिया। बोला, आप मुझसे मिलने आए थे। बोले, हाँ। मैं अपने आप को सौभाग्यशाली समझने लगा। अगर कोई मिलने आया है तो साधारण नहीं होगा। या परमात्मा होगा, या परमात्मा से पूरी तरह मिला हुआ होगा। दोनों को देख रहा था। चाय आई। मैंने पूछा, कुछ काम था? बोले, हाँ, एक काम था। बस मेरा भ्रम टूट गया। नहीं तो इस भ्रम को लेकर मैं ढोता रहता। उनके काम की बात की, मार्ग बताया। मैंने कहा, चलो मेरा भ्रम टूटा। मुझे पहले से मालूम है, अगर मेरे पास कोई आता है तो मेरे लिए नहीं आया। उस योग्यता की वजह से आया है। वह मुझे जानता ही नहीं।
मैं चुप हो जाऊँ तो लोग मुझे खड़ा भी नहीं करेंगे। किसी गाँव में आजमाने के लिए गया भी हूँ। चुपचाप हूँ तो कोई मेरी तरफ ठीक से देखता नहीं, उलटी सीधी बात करता है। जब तक मैं बोलूँ नहीं। यहीं चिचली के बगल में, तीन किलोमीटर पर टाकाल गाँव है। वहाँ से आता जाता था। राम मंदिर है। फटे पुराने कपड़े पहनता, इधर उधर घूमता रहता। कोई सत्संग सुनने वाला मिल जाए तो खड़े होकर सुनाता। एक दिन एक लड़के ने रोक दिया। बोला, मैं देख रहा हूँ तुम यहाँ से आते जाते हो, तुम कौन हो। मैंने कहा, क्या बताऊँ मैं कौन हूँ। बताऊँगा तो तुम ऐसे बैठोगे नहीं। वह बोला, तुम बताओ कौन हो। जब मैंने बताया तो भीड़ लग गई, क्योंकि आवाज दूर तक पहुँचती है। उसकी आँखों से अश्रुधारा बहने लगी, हाथ जोड़कर रोने लगा। उसने पूछा, तुम किस धर्म से हो। मैंने कहा, तुम्हें धर्म के बारे में मालूम है क्या, धर्म क्या होता है। मैंने उसे धर्म की परिभाषा बताई। वह रोने लगा। भीड़ लग गई। फिर उसी गाँव में अपने घर ले गया।
मुझे मालूम है, मुझे कोई नहीं जानता, मुझे कोई प्रणाम नहीं करता, मुझे कोई गाली नहीं देता। मेरे कर्म को देता है। और मैं कर्म नहीं हूँ। चाहे कोई बड़ाई करे, चाहे निंदा करे, चाहे गाली कह दे, मुझे एक प्रतिशत भी फर्क नहीं पड़ता। मुझे पता है यह मुझे नहीं दे रहा, कर्म को दे रहा है, और मैं कर्म नहीं हूँ। मैं तो मैं हूँ। यह बात पूरी तरह समझ में आ गई। कोई कुछ कहता है तो पता है मुझे नहीं कह रहा, क्योंकि वह मुझे जानता ही नहीं। इस शरीर के द्वारा कर्म हो रहा है, कभी अपनी जरूरत में, कभी सामने वाले की जरूरत में। उसकी वजह से वह बोल रहा है। मैं कर्म में हूँ नहीं। हर तरीके से आप मुझे नहीं जानते। कोई कुछ भी कहे, फर्क नहीं पड़ता।
जब तक इस शरीर में हूँ, इस दुनिया में जीने के दो ही रास्ते हैं। एक बेईमानी और दुष्कर्म, एक ईमानदारी और सत्कर्म। मैंने कहा, यह रास्ता ठीक लग रहा है। इससे लोग भी खुश, मैं भी खुश। जब तक शरीर में रहो, यह करते हुए आगे जहाँ जाना होगा जाएँगे। मेरी खोज कुछ नहीं है। मैं पीछे भी नहीं जा सकता, आगे भी नहीं जा सकता। जब तक शरीर में हूँ, बस मुझे यह ठीक लगा।
सबसे जरूरी मैंने यह देखा कि इस जीवन में समाज को अभी ज्ञान चाहिए। उस ज्ञान के लिए मैंने अपने आप को मिटाया। पता चला, ज्ञान के लिए अस्तित्व को मिटाना पड़ेगा। मिटा दिया। पहले धन की सेवा करता था। कमाकर, तनख्वाह पाकर, कर्ज लेकर भी लोगों की धन सेवा भरता रहता था। फिर बोला, यह वह नहीं है। यह तो ऊपर ही ऊपर की चर्चा है। करते करते सोलह सत्रह वर्ष में ये बातें पूरी तरह समझ में आ गईं। साधना में था। फिर लगा, इससे आगे कुछ है। तब समझ में आया कि सबसे जरूरी ज्ञान सेवा है, और ज्ञान सेवा के लिए अपने आप को खत्म करना पड़ता है। फिर मैंने वह किया। इस समय पूरी दुनिया में सबसे जरूरी सत्संग है। धन सेवा और तन सेवा करने वाले बहुत हैं। ज्ञान सेवा करने वाले संख्या में बहुत कम हैं, इक्के दुक्के।
मैंने देखा, सबसे जरूरी यह है। कुछ मिले या न मिले, अपने को कुछ नहीं चाहिए। इस समय न मेरे द्वारा सत्कर्म हो रहा है, न दुष्कर्म, न पाप, न पुण्य। बस हो रहा है, और मुझे लग रहा है यह ठीक है। परिणाम से भी कोई मतलब नहीं। बचपन में अगर कुछ माँगता था तो नरक, क्योंकि स्वर्ग में सब सुखी रहेंगे। मैं सुखी लोगों के साथ नहीं रहना चाहता। मैं हमेशा दुखियों के साथ रहता हूँ, और उनके दुख निकालने का प्रयास करता हूँ। बचपन से दुखियों को, कमजोर को पसंद किया। उनके साथ जिया, उन्हें बढ़ाने का प्रयास किया। बचपन में भी माँग होती तो यही, कि मरूँ तो नरक देना। स्वर्ग में सब सुखी रहेंगे, वहाँ जाकर क्या करूँगा। नरक में कुछ काम मिलेगा। मैंने इस दुनिया में दुख को चुना। सब सुख की तरफ भाग रहे हैं। मैंने दुख को पूरी तरह चुना।
साधना में मैं दुख पैदा करता था। ठंड में रात को ऐसी स्थिति पर ले आता कि कहीं से कुछ मिले नहीं, और फिर ढूँढता भी मैं ही था। दोनों मैं था। अपने आप को फँसाने वाला भी मैं, निकालने वाला भी मैं। इतना फँसा लेता कि तुम निकाल नहीं पाओगे, सुबह तक इंतजार करोगे, और वही होता था। मैं चाहता तो व्यवस्था कर लेता, पर नहीं। व्यवस्था तब कर दी जाती जब व्यवस्था मिल नहीं सकती। जहाँ व्यवस्था थी, उस जगह को छोड़कर आ जाता। ऐसा कर लेता कि दोबारा तू जा नहीं पाएगा। बिस्तर तब ढूँढूँ जब बिस्तर न मिले, बारह एक बजे के बाद। चाहता तो शाम को व्यवस्था कर लेता।
अगर आपको कुछ नहीं चाहिए, तो कुछ नहीं चाहिए में जियो। समझना बस इतना है कि है क्या, किसमें हम उलझे हुए हैं।
आप कहती हो कि बचपन से अभी तक मैं ही थी। समझकर बुरा काम कर रही थी। लिखा हुआ था कि मैं हूँ, यह पता नहीं था। इंद्रियों द्वारा मैंने कर दिया। अब सत्संग सुनते समझते यह आ रहा है कि इंद्रियाँ निमित्त हैं, मैं कर रही हूँ। उस समय यह पता नहीं था। अब समझ में आ रहा है कि इंद्रियाँ निमित्त हैं।
आप भी संसार के लिए निमित्त हो, पर आपने अपने आप को कर्ता मान लिया। गड़बड़ी यह हो गई कि करने वाला मान लिया।
तबीयत की बात भी यही है। तबीयत तब खराब होती जब जीने की इच्छा हो। जीने की इच्छा नहीं तो तबीयत क्यों खराब हो। जब तबीयत खराब होती, उसमें देखता था। पैर सड़ रहे थे, उसको भी देखता था। यहाँ नौ महीने के ऊपर हो गया, मैंने सत्संग कभी बंद नहीं किया। काँपता भी रहूँ तो हो। हो तो हो, क्या फर्क पड़ता है। मैं तब तक काम करता हूँ जब तक यह शरीर अपने आप न गिर जाए। गिर जाएगा, देख लेंगे। मेरे मुँह से आज तक नहीं निकला कि मैं बीमार हूँ। पहले काम। बीमार है तो देख लेंगे। पहले काम तो करो। मैंने अपने आप को पहले काम में रखा, बाद में कुछ और। सर्वप्रथम अपने जीवन में हमने अपने काम को महत्व दिया।
क्रोध की बात लो। क्रोध का पहले भी मैं था, बाद में भी मैं था, क्रोध में भी मैं था। पर वह क्षण क्यों आया? उस क्रोध में वासना थी। वासना की वजह से क्रोध था। क्रोध नहीं था। आपको अपने तरीके से चाहिए था, नहीं हुआ, तो क्रोध आया और चला गया। आप कहाँ थे? वासना में। आप क्रोध में नहीं थे, वासना में थे। वासना की वजह से क्रोध आया, अपना काम करके चला गया। मान की वजह से, उम्मीद की वजह से। उम्मीद और इच्छा छोड़ने से यह खत्म होता है।
कैसे भी अपने आप को निकाल लो। आपके पास समझ है। बहुत समझकर निकालना पड़ेगा। बहुत चिंतन करना पड़ेगा। बहुत समझदारी से निकालना पड़ेगा। ऊपरी ऊपरी मत चलो। गहराई में चिंतन करो। कुछ खा रहे हो तो अपने आप से पूछो, क्या सच में मेरे शरीर को इसकी जरूरत है, या ऐसे ही खा रहा हूँ। अगर ऐसे ही खा रहे हो तो रख दो।
कल मैंने अपने लिए भोजन बनाया था। आपके लिए तो बनाया नहीं था। आपके मना करने के बाद भी मैंने उसमें से भोजन दिया। दो रोटी बनाई थी तो एक आपको दी। चावल बनाया था तो उसमें से आपको दिया। दाल बनाई थी तो उसमें से आपको दी। दाल तो ठीक थी, दाल उतनी थी। पर रोटी और चावल उतना ही था कि मैं खा लूँ। मैंने अपने हिस्से से दिया। पहले भी समझा था, कल भी यही समझा, कि देना इतना आसान नहीं है जितना आसान हम समझते हैं।
आप मना भी कर रहे थे, फिर भी मैंने आपको दिया। आपने आधी इसलिए माँगी कि मुझे कमी न पड़े। मुझे पता था यह बात। आपको एक चाहिए था। आपने आधी माँगी ताकि मुझे कमी न पड़े। मैंने देखा, देना इतना आसान नहीं है जितना आसान आप समझते हो। आपके पास ज्यादा है तो फिर वह देना भी नहीं है। सच में जितनी भूख है, उसमें से दो, तभी समझ में आएगा। दो दिन भूखे हो, जरूरत का न हो, उसमें से देना, जैसे मैंने कल महसूस किया। इतना आसान नहीं है देना, जितना आसान हम समझते हैं।
समाज के लिए जीना भी इतना आसान नहीं है जितना लोग समझ लेते हैं कि हम समाज की सेवा करेंगे। इस संसार में जिसने भी समाज की सेवा की है, देख लेना, वह खत्म हो जाता है। उसके पास कुछ नहीं मिलता। तन पर एक वस्त्र मिलता है, जहाँ तक मैंने समझा, अगर उसने सच में समाज सेवा की होगी। और अगर समाज के द्वारा अपनी सेवा करवाई होगी, तो गाड़ी, बँगला, नौकर चाकर, सब मिलेंगे। सेवा एक ही जगह हो सकती है। या तो आपके द्वारा समाज की, या समाज के द्वारा आपकी। अपनी सेवा करोगे तो समाज को लूट लोगे। समाज की सेवा करोगे तो तुम लुट जाओगे। दो में से एक ही होता है। यह मैं प्रत्यक्ष अनुभव कर रहा हूँ।
कल भोजन के बाद बिस्कुट बाँटे गए थे। साधुओं की जरूरत नहीं थी, फिर भी ऐसे ही बाँट देते हैं। भाव रहता है। बिना जरूरत का खा लो। ऐसे ही बाँट देते हैं।
विषय और विकार। विकार क्या है? जब आप बेईमानी और दुष्कर्म करती हो तो विकार आते हैं। आप जहाँ भी रहो, बेईमानी और दुष्कर्म मत करो। बात खत्म। और सबसे ज्यादा बेईमानी बातचीत में होती है। झूठ, बढ़ाई, चापलूसी, यह छोड़ दो। इतना तो छोड़ो। बातचीत में सबसे ज्यादा बेईमानी होती है। मूल ईमानदारी और सत्कर्म अपना लो, जिससे कल्याण होगा।
पर आप यह हो कि अनेक साधनाएँ कर लोगे, और इसको पकड़ने नहीं आ रहे जिससे कल्याण होगा। यह आपको भी पता है। सबको पता है। कुछ लोग बैठे हैं, आओ हम तुम्हें बचाएँगे। तुम दूसरों की जेब काटो, इतना प्रतिशत तुम रखना, इतना हमें देना। इतने कम में बात कर रहा हूँ। हम तुम्हें बचाएँगे। जिसके द्वारा वे यह कह रहे हैं, समझना, वह अपने बाप को भी नहीं बचाए। जैसे राम अपने पिता को भी नहीं बचाए। एक साधारण पिता के शाप की वजह से पुत्र के वियोग में तड़प तड़प कर मरे। राम ने बचाया क्या? कोई उपाय करा क्या? कृष्ण भगवान के सामने उनका भांजा मारा गया। बचाया क्या? जरा सोचो। और तुम जाकर वहाँ प्रार्थना करते हो कि मुझे बचा लो। हँसते होंगे। देखो क्या मूर्खता कर रहा है।
काश प्रार्थना यह होती कि आपसे मिलना चाहता हूँ। जल्दी से जल्दी मेरा भोग खत्म करो। दो मुझे, मैं भोगूँ, और खत्म हो। खत्म तभी होगा जब मैं भोगने के लिए तैयार हो जाऊँगा। काश अपने भोग को भोगने के लिए प्रार्थना करते, कि मैं जल्दी से जल्दी आपके नजदीक आना चाहता हूँ, मिलना चाहता हूँ। यह तभी हो सकता है जब आप सारे कर्मों के फल को पूरी तरह भोग लोगे, चाहे पाप हो चाहे पुण्य। तभी उससे मिलना होगा। पर आप हो कि भोग बढ़ाए जा रहे हो।
ज्योतिर्लिंग और देवता अलग अलग हैं। एक ही श्रेणी में नहीं हैं। ज्योतिर्लिंग निराकार ब्रह्म का स्वरूप है। बारह में से एक त्र्यंबकेश्वर में साकार हो गए, इसलिए वहाँ गड्ढा है। ब्रह्मा, विष्णु, महेश। बाकी ग्यारह जगह निराकार ब्रह्म का स्वरूप है। शिव है। लिंग मतलब पृथ्वी से जुड़ा है। वह ज्योति स्वरूप है।
दर्शन के बाद क्या हो? बात यही है। दर्शन के बाद पूरी तरह बेईमानी और दुष्कर्म छोड़ दोगे क्या? तब वहाँ से लाभ मिलने लगेगा। अगर दर्शन के बाद भी बेईमानी और दुष्कर्म कर रहे हो तो हानि होगी। जैसे एक आदमी सड़क पर शराब पिए, और एक आदमी गर्भगृह में जाकर किसी मंदिर में शराब पिए। दोष किसको लगेगा? इसी से समझ लो। बिना समझे कोई कार्य नहीं करना चाहिए। वही आदमी शराब पी रहा है, दोनों पी रहे हैं। एक को दोष लग रहा है, एक को नहीं। दर्शन के बाद तुम क्या कर रहे हो, यही मायने है। नहीं तो दर्शन मत करो। जब वही काम करना है, बेईमानी करनी है, तो वहाँ मत जाओ। जाओगे तो जल्दी और ज्यादा तकलीफ होगी। लड़ना है तो ठीक है, वरना लाभ नहीं होगा।
लाभ वाला काम क्या है आपका, और हानि होगी, और आप परेशान हो जाओगे, क्योंकि जितनी ऊर्जा मिलेगी उसे बेईमानी में खर्च करोगे। एक आदमी सौ रुपये कमाता था, शराब पीकर भी घर पहुँच जाता था। आपने उसे दो हजार दे दिए, तो क्या होगा? नुकसान होगा। पहले घर बहुत था, अब घर भी नहीं पहुँचेगा। कहीं गटर में पीकर लोट जाएगा। मारपीट खाएगा, सर फूटेगा। आपने उसका काम और बढ़ा दिया। सुबह इलाज कहाँ से कराएगा? इसलिए जितने पवित्र तीर्थ हैं, वहाँ तभी जाओ जब बेईमानी और दुष्कर्म छोड़ना हो। नहीं तो मत जाओ। गुरु की शरण में भी तभी जाओ जब पूरी तरह बेईमानी और दुष्कर्म छोड़ने के लिए तैयार हो। नहीं तो मत जाओ। समय बर्बाद मत करो।
मैं यहाँ आने वालों को लाइव में बोलता हूँ। कुछ नहीं चाहिए तो यहाँ आना। कुछ चाहिए तो मत आना। बाद में कहोगे, कुछ मिला नहीं। मैं तो कह रहा हूँ, कुछ नहीं मिलेगा, सब खत्म हो जाएगा। पहले ही कहा था, कुछ नहीं चाहिए तो आना। चुपचाप बढ़िया से खाओ, और अपने आप में रहो। यहाँ बोलना भी मना है। कुछ नहीं चाहिए तो आना। पहले ही सचेत कर देता हूँ। फिर दो महीने बाद बोलो कि कुछ हुआ नहीं। पहले ही तो बोला था। बढ़िया से यहाँ जीने के लिए खाओ, एकांत में रहो। आने के लिए नहीं, छोड़ने के लिए आना।
जो है वह छूट नहीं रहा, यहाँ रहोगे तो छूट जाएगा। मैं ऐसा रखूँगा कि छूट जाएगा। आप कुछ करने लायक भी नहीं रहोगे। ज्यादा दिन रुक गए तो बाहर जाकर करने लायक नहीं रहोगे। होगा तो ईमानदारी और सत्कर्म, नहीं तो कर ही नहीं पाओगे। हाथ काँपेंगे, पैर डगमगा जाएँगे। इसलिए कहता हूँ, ज्यादा दिन मत रुको। रुकोगे तो खत्म होना है। बाहर जाओगे तो ईमानदारी और सत्कर्म ही कर पाओगे। यहाँ रुक गए तो कर ही नहीं पाओगे। बेईमानी होगी नहीं। दिखावा हो ही नहीं पाएगा।
सत्संग में एक बार बैठ गए तो देखो। मैं भी पानी पीने और बाथरूम नहीं जाता बीच में। आप उतना ही पानी पियो जितने में बाथरूम न लगे। गाड़ी का एवरेज निकालते हो, अपना भी एवरेज निकालो। उतना ही जल लो। सत्संग में बैठे हो तो सुबह से पानी मत पियो। सत्संग से उठो तब पानी पीना। हमें तो बोलना पड़ता है। जब सुबह से पानी नहीं पियोगे तो बाथरूम लगेगी ही नहीं। यह नहीं कर सकते तो सत्संग में मत बैठो। यह हॉस्पिटल थोड़े है। हॉस्पिटल के लायक हो तो वहाँ जाओ, इलाज कराओ। हम हॉस्पिटल खोलकर नहीं रखे। हम सत्संग करेंगे, तुम पानी पीने जाओगे, वह बाथरूम करने जाएँगे। ऐसा मत करो। लाइव सुनो। वीडियो सुनो। यहाँ आओ तो यहाँ के लायक बनकर आओ। नहीं तो मत आओ। भीड़ मत बढ़ाओ।
उड़ीसा से दो लोग आए थे। एक शिक्षक था, एक उसका विद्यार्थी। वह बोला, मैं घर पर चार बार खाता हूँ। यहाँ तो बारह के बाद नाश्ता और उसके बाद एक बार भोजन। बोला, सुबह एक मुट्ठी चना दे दो तो मैं रुकता। मैंने कहा, रुको या न रुको, वह मैं नहीं दूँगा। बारह के बाद ही दूँगा। आना है तो यहाँ के लायक बनकर आना। व्यवस्थाएँ तुम्हारी वजह से नहीं बदलूँगा। बुजुर्ग हैं तो उन्हें दो समय देते हैं। कहने का मतलब, सत्संग में प्रेम में भक्ति में बैठो तो पूरी तरह बैठो। मैं आपके सामने वीडियो लगाकर कमरे में सोने नहीं चला जाता, और तुमसे कहूँ मत उठना। हम बोल रहे हैं, बोलने में बहुत ऊर्जा लगती है, प्यास लगेगी। और अपनी पत्नियों से करवा चौथ का व्रत करवाते हो, खुद बिना पानी रहे नहीं जाता। कुछ तो त्याग करना सीखो। दो चार घंटे सत्संग में बैठना है तो सुबह से जल मत लो। पेशाब नहीं लगेगी। ऐसा नहीं हो सकता तो वहीं से वीडियो देखो। भीड़ बढ़ाकर क्या मतलब।
रेस में दौड़ने जा रहे हो और कह रहे हो मैं लँगड़ा हूँ, तो रेस में क्यों गए। गली मोहल्ले में दौड़ते। इस कुटिया को मैंने इसलिए बनाया है कि जिसका जीवन इस ज्ञान में लगा, उसे बनाना था, ताकि जिसे सीधा उससे मिलना हो उसके लिए जगह हो। ऐसे रहना भी पड़ेगा। आगे यहाँ का नियम और सख्त होने वाला है। यह उसके लिए बनाया है जिससे सीधा उससे मिलना हो। उसमें तीसरा कोई नहीं। आप और वह। यह गपसप और शोर के लिए स्थान नहीं बन रहा। हलवा, काजू, बादाम, छुहारा, भंडारा, इसके लिए नहीं बन रहा। यह स्थान मैं पूरे भाव से उस परमात्मा से मिलने के लिए बना रहा हूँ। ऐसे लोग यहाँ रहें जो सच में उससे मिलना चाहते हैं। वाहवाही के लिए नहीं। आने वाले समय में नियम और कठिन होगा। पैर फैलाकर बैठना, सुबह उठकर अंदर घूमना, यह आगे नहीं चलेगा। एक ही रहे, पर सधा हुआ। हम हॉस्पिटल थोड़े खोले हैं।
तुम्हें बेड रेस्ट चाहिए तो अपने घर जाओ। हो तो तप करो। बुजुर्ग लेटा हो तो चलो, बुजुर्ग को जरूरत भी है। तुम जवान होकर उसे देखकर कमर टेढ़ी कर रहे हो। साठ क्या है। पूरी रात सत्संग सुना, अब लाइव में गाली देता है कि कुर्सी पर नहीं बैठ सकता। साठ का क्या है। मैंने कहा, तुम बैठोगे नहीं। वह आदमी सत्संग में बैठा एक बार भी नहीं उठा। होता तो उठा देता। कुर्सी देखकर कुर्सी तोड़ने लग गया। कमर में पीड़ा किसके है? मेरे कमर में पीड़ा नहीं है क्या? तीन चार घंटे एक ही आसन में बैठकर सत्संग हो रहा है, हमें पीड़ा नहीं होती क्या? तुम्हारे लिए बैठे हैं। हमें कुछ नहीं चाहिए। यह काम व्यापार करने के लिए थोड़े कर रहे हैं। तुम मेरी बायीं करो, क्या आश्रम था, क्या जूते कपड़े, हम देखेंगे तुम कैसे हो वैसी व्यवस्था देंगे। यहाँ डोनेशन का काम नहीं हो रहा। तुम्हारे बैकग्राउंड से कोई मतलब नहीं। इसलिए कितने लोग आते हैं और चले जाते हैं। बैकग्राउंड समाज में दिखाना, घर पर दिखाना, मेहमानी में दिखाना। यहाँ नहीं चलेगा। यहाँ सिर्फ तुम चलोगे। सच में साधक हो तो रहो, नहीं तो भागो।
हमें अपने आप को जवाब देना पड़ता है कि कहीं तू भी होटल तो नहीं बना लेगा। अस्सी प्रतिशत से ज्यादा आश्रम होटल हैं। गाड़ी से जाओ तो एसी कमरा, पैदल जाओ तो सामान्य कमरा। यहाँ ऐसा नहीं। तुम करोड़पति हो तो भी अपनी प्लेट खुद माँजनी पड़ेगी। यहाँ सेवक वर्ग इस तरह नहीं है। अरबपति हो या करोड़पति, प्रोफाइल अपने पास रखो। भोजन करके प्लेट में आओ। नहीं तो निकल लो। हमें जवाब देना है। इसे होटल नहीं बनाना। होटल बना तो आग लग जाएगी। होटल बने तो इससे अच्छा इसे आग लगा दो। यह होटल नहीं बनाना। पूरे भाव से बनाया है। इसमें मेरा जीवन लग गया है, इस प्रत्यक्ष ज्ञान में। यहाँ परमात्मा से मिलने के लिए जगह है। रहने वाला साधक परमात्मा से मिले। यही पूरा भाव है।
बहुत लोग सलाह देने आते हैं, ऐसे नहीं ऐसे करो। मैंने कहा, साधना करो। सलाह देने आए हो क्या। तेरह साल से एक कपड़े में, दुकान से कपड़ा लेकर फाड़ता रहा, पागल की तरह घूमता रहा। अपने आप को योग्य बनाया, तब इस काम की शुरुआत की। अब तुम आकर सलाह दोगे। मैं भी कहता हूँ, साधना करो, नहीं तो निकल लो। तुम्हारी सलाह की यहाँ एक प्रतिशत भी जरूरत नहीं। हम कह देते हैं, तुम सोचो ही मत। जो शब्द आखिरी बोल दिया, वही आखिरी है। अगर कुछ कमी होती तो मैं यह काम करता ही नहीं। जब सौ में सौ एक प्रतिशत पक्का हो जाता है, तब काम की शुरुआत करता हूँ। सौ में सौ किया, एक और घुसा दिया। अब तुम कहाँ से घुसाओगे। घुसाने का स्थान नहीं रहा। अब इसका लाभ लो। एक मैंने घुसा दिया, सीना ठोककर। तुम नहीं घुसा पाओगे, क्योंकि जगह मैंने भर दी। इसलिए यहाँ से बहुत लोग नाराज होकर जाते हैं, और लाइव में गालियाँ देते हैं, वैसा है वैसा है। पहले भगवान थे, गले लगाने के लिए तरसते थे, पाँव मिल जाए तरसते थे। अब कहते हैं इस पाँव पर मेरा अधिकार है, और गालियाँ दे रहे हैं। क्यों? उनके तरीके से नहीं चला।
आजकल लोग अपने आप को खोजी कहते हैं, साधक कहते हैं। इन्हें तलुआ चाटने वाला गुरु चाहिए। तलुआ चाटे तब लगता है सच में गुरु है, क्योंकि डोनेशन के लिए तलुआ चाट रहा है, जेब की सफाई के लिए। मैंने लोगों की मानसिकता देखी। एक जन मिलने आए, छत्तीसगढ़ की तरफ से, रायगढ़ से। फोर व्हीलर से आए, एक दिन चले, दूसरे दिन पहुँचे, रात रुकने वाले थे। कुर्सी पर बैठ गए। घुटने में तकलीफ हो, कमर में तकलीफ हो, तो अलग बात। मैंने कहा उतरो, यह कुर्सी तुम्हारे लिए नहीं है। उतर गए। कुछ देर बाद बोले, हम जा रहे हैं, फिर आएँगे। मैंने कहा ठीक है, जाओ। आओ या जाओ। रहोगे तो यहाँ के सिस्टम में रहना पड़ेगा। रोकने वाला नहीं है। रात बारह बजे के बाद भी जाना चाहो तो जाओ। मैं सचेत कर देता हूँ, कुत्ते खतरनाक हैं, नोंचेंगे तो नचवा लेना। बाद में मत कहना बताया नहीं था। अठारह साल के बाद सरकार भी स्वतंत्र कर देती है। तुम्हें इतनी समझ होनी चाहिए कि जाने की स्थिति है या नहीं। मुझे अपने आप को जवाब देना पड़ता है। कहीं ऐसा तो नहीं कि लोगों की बात करता हूँ और खुद वैसा कर रहा हूँ। देखना है, क्या सच में इस ज्ञान के द्वारा उससे मिलना होगा। क्या सच में कुटिया साधक के लिए बनाई है। कहीं इधर उधर तो नहीं हो रहा।
मैंने अपने आप को सेवक भी बनाया और मालिक भी बनाया। सेवा भी करता हूँ और अपने आप से पूछता भी हूँ, सच में सेवा हो रही है क्या। कहीं मालिकपन का भाव तो नहीं आ गया। कहीं गाड़ी वाले के लिए अलग सेवा और पैदल वाले के लिए अलग तो नहीं। सबका जवाब देना पड़ता है। सेवा की शुरुआत करना सरल है। परिणाम तक ले जाना सरल नहीं। सेवक ही उससे मिलता है। मालिक कभी मिल नहीं पाता। मालिक भी मैंने अपने आप को बनाया, लोगों के लिए नहीं, अपने आप को जाँचने के लिए। काम को काम के तरीके से करना, जरा सा इधर उधर न करना। पूरी तरह जाँचते रहते हैं। सेवा करना इतना आसान नहीं जितना लोग समझते हैं। सेवा के नाम पर ज्यादा लोग मेवा खाने लगते हैं। देर थोड़ी लगती है।
पहाड़ पर चढ़ने में कितना लगता है, उतरते हो फुर्ती से। चढ़ने में कठिन, उतरने में मजा। ऐसी जिंदगी है। आर्थिक और आत्मिक स्तर उठाने में बहुत मेहनत पड़ती है। गिराने में एक झटका लगता है। एक्सीडेंट में घंटे थोड़े लगते हैं। सेकंडों में होता है। नजर हटी, दुर्घटना घटी। ऐसा ही इसमें भी है। सावधानी हटी, दुर्घटना घटी। हर समय सावधान रहो। जब एक्सीडेंट होता है तो कुछ सेकंड में। दुनिया में कोई एक्सीडेंट एक घंटे दो घंटे में आराम से होता है क्या? हुआ तो हो गया। ऐसे ही गिरे तो गिर गए, तुरंत। हर वक्त, हर पल, हर क्षण सचेत रहो। तब निकाल पाओगे। एक झटके में व्यक्ति गिरता है। बिल्डिंग बनाने में महीने लगते हैं। बुलडोजर लाओ, एक दिन में सफाया। दोनों मशीनें इंसान ने बनाईं। बनाने वाली चीज में समय लगता है, बिगाड़ने वाली फटाफट। दोनों का निर्माण मानव करता है, पर बिगाड़ने वाला तेजी से और बनाने वाला धीमे। क्यों ऐसा नहीं कि बनाने वाला फट से बने और गिराने में समय लगे? इसलिए आत्मिक स्तर उठाने में सालों लगते हैं, और एक सेकंड में गिर जाते हो। सालों की मेहनत पर पानी फिर जाता है।
अकेले में भी गिरना हो सकता है। जब तक प्रतिक्रिया नहीं, बचने के लिए अकेले रहो तो अकेलापन भी गिरने का स्थान बन जाता है। लोग अकेले में भागते हैं और वहीं गिरते हैं, अगर नशा लेकर गए। दो हजार बीस की बात है। गुजरात में जंगल में एक बाबा रहते थे। नर्मदा तट पर, राजपीपला के आसपास, सुफानेश्वर मंदिर के आगे। उनके साथ गया। कई वर्षों से, बीस साल के ऊपर वहाँ रहते थे। मैंने देखा, बाबा को कुछ नहीं मिला। इतने बीहड़ जंगल में जवाब नहीं मिल रहा। शाम हुई, रात होने लगी। आश्रम पहुँचे तो चिलम चल रही थी। जवाब मिल गया। बाबा इतने साल चिलम के साथ रहे। लोग बोल रहे थे, बाबा तुम्हारी वजह से धर्म बचा है। मैंने कहा, इन्हीं की वजह से धर्म गिर रहा है। चिलम पीने वाले कह रहे हैं गुरु ने धर्म बचाया। मैंने कहा, ऐसे गुरु ने धर्म तबाह कर दिया। समझ नहीं पा रहे। चलो, जवाब मिल गया।
हिमालय में तुंगनाथ, केदारनाथ से भी ऊपर। वहाँ सुलफा मार रहे थे। मैंने कहा मुझे जाना है। बोले रुको, यहाँ सीधी बात होती है। मैंने कहा, चरस मारने के बाद सीधी बात होती है क्या? उतरकर नीचे आता है आदमी। वे सुलफा मारकर बैठे थे। केदारनाथ में भिखारी बन गए। बताते हैं लाखों कमा लेते हैं। गेरुआ रंग पहनकर माँगने बैठे। गेरुआ कौन पहनता था, जिसे परमात्मा से मिलना होता था। अब गेरुआ पहनकर घर घर भीख माँग रहे हैं। कितना गिरा दिया। यह त्याग का प्रतीक था। ज्योतिर्लिंग के पास बैठकर भीख माँग रहे हैं। हिमालय में दुर्भाग्य है।
देखना भाई, कहीं तुम भी ऐसा न कर लेना। ज्यादातर ऐसा ही होता है। बीड़ी के साथ हैं। एकांत में भी नशा ही सहारा है। एकांत में जाना है तो सच में तुम हो, यह देख लेना। चाहे एक दिन का एकांत हो, चाहे एक घंटे का। मैंने हिमालय में देखा, लोग सुलफा मार रहे हैं। खुले में मारते हैं, गिरोह बनाकर। शर्म की बात है। नए युवाओं को बर्बाद कर रहे हैं। चिलम पिला पिलाकर। तुम्हारे क्षेत्र में आते हैं, तुम व्यवस्था करते हो, और तुम्हारे युवाओं को बर्बाद करते हैं। गाँजा पिलाकर, चरस पिलाकर, और ऐसे लोगों को गुरु बोलते हो।
प्रकृति में जो इंद्रियों द्वारा मिलता है, उसे भी रसपान नहीं कहेंगे यूँ ही। देखना यह है कि तुम जरूरत में जी रहे हो या जरूरत से ज्यादा में। जरूरत से ज्यादा में हो तो रसपान हो गया। प्रकृति में जरूरत से ज्यादा क्या होगा? बहुत सारी चीज प्रकृति में ही है। तुम कुछ भी प्रयोग करते हो, वह प्रकृति से ही है। वातावरण अच्छा है तो सुख की अनुभूति अपने आप होगी। वह अपने आप हो रहा है, या तुम व्यवस्था बनाकर ले रहे हो? बिना व्यवस्था बनाए जो हो, वह अलग है। व्यवस्था बनाकर लेना, वह देखना है।
जैसे पेड़ पर फल लगा है। उस फल पर तुम्हारा अधिकार है क्या? तुमने उस पेड़ में कभी पानी दिया है? नहीं दिया, तो इंतजार करो। गिरे तो खा लेना। तोड़ो मत। सच में उस वृक्ष को कभी सींचा नहीं, तो गिरने दो। या उसका मालिक वहाँ है तो उससे बोलो, भूख लगी हो तो। नहीं तो इंतजार करो। जब जीवन और मृत्यु की बात आ जाए, कोई उपाय न रहे, तोड़ने के अलावा चारा न रहे, गिर भी नहीं रहा हो, तब अपनी आत्मरक्षा में तोड़ सकते हो। तब दोष नहीं। जैसे संविधान में है, अपनी आत्मरक्षा में किसी को मार भी दो तो हत्या का दोष नहीं लगेगा। कब? जब उसने प्रहार किया हो और तुमने अपने को बचाने के लिए प्रहार किया हो। जाँच होगी। ऐसे ही बोलने से नहीं। वैसे ही भूख इतनी लग जाए कि जीवन और मृत्यु की बात हो, तब तोड़ सकते हो। नहीं तो इंतजार करो गिरने का। पेड़ नहीं सींचा तो अधिकार नहीं। गिर गया, भूख लगी है, वैसे ही वह जाने वाला है, तब अधिकार हो गया। कोई न कोई उसे खाएगा। तुम खाओ या कोई और। पहले जो मौजूद है, भूख है, वह खा ले।
ऐसे अघोरी की साधना होती है। पृथ्वी पर अब उसका उपयोग कोई नहीं कर रहा, उस समय तुम हो, तुम ग्रहण कर लो। गिरा हुआ। मारकर नहीं। शरीर है, उसमें जीवात्मा नहीं है, तो ग्रहण कर सकते हो। पता चला कि मारकर कर रहे हो, तो दोषी हो। इसे अघोर साधना कहते हैं। किसी से कुछ माँगना भी नहीं। अघोरी बनना सबसे कठिन है। अभी तो लोग माँगकर खा रहे हैं, काटकर खा रहे हैं। कोई अघोरी है तो पृथ्वी पर अब जो किसी के काम का नहीं रहा, उसे ग्रहण कर सकता है। बिना मरे को काट लेना अघोरी साधना नहीं। वह तो हत्या हुई। उसे अघोरी चौड़ी कह सकते हो। अघोर पंथ में अघोरी उसे कह सकते हैं, कि पृथ्वी पर अब उसका उपयोग करने वाला नहीं, उस समय वह मौजूद है, तो गिरे हुए फल, गिरी हुई वस्तु ग्रहण कर सकता है। कोई न कोई तो खाएगा। पहले जिसे भूख है वह खाएगा।
कोई जीवात्मा शरीर से निकल गई, तो वह शरीर कोई न कोई खाएगा ही। उसमें जीवात्मा तो है नहीं। तुम खाओ या कोई खाए। मिट्टी होने वाली है। घूम फिरकर पाँच तत्वों में विलीन हो जाएगा। जाने वाला है। तुम्हारी भूख मिटाकर जाए, हो सकता है जीवन जीने का निमित्त बन जाए। तुम नहीं खाओगे तो भी कोई न कोई खाएगा। सर्वप्रथम जो मौजूद है, वह ग्रहण कर सकता है। वही उसका अधिकारी है।
ज्यादातर बात श्मशान की करते हैं। श्मशान कहीं एक जगह नहीं। पूरी दुनिया श्मशान है। यहाँ तक तुम्हारा शरीर भी श्मशान है। तुम्हारे शरीर में कितने पैदा हो रहे हैं, कितने मर रहे हैं। तुम बैठे हो, लाखों जीव मर गए, और यही मिट्टी में मिल जाएँगे। जहाँ शरीर का नाश किया जाए उसी को श्मशान कहते हैं। पूरी दुनिया श्मशान है। जहाँ भी मिले, वहीं समझो।
काशी में जो मरता है उसे मोक्ष मिलता है, ऐसा नहीं है। यह पूरा भ्रम है। लोग मरने के लिए वहाँ जाते हैं। समय आता है तो काशी पहुँच जाते हैं, ऐसी बातें करते हैं।
तुम्हारे सामने दो जमीन हैं। एक बंजर, एक उपजाऊ। क्या बिना फसल बोए उपजाऊ जमीन में फसल आ जाएगी? नहीं। बोना पड़ेगा। काशी में रहकर करोगे क्या, वही मायने रखता है। कहीं भी खाली मरने का इंतजार करोगे तो वही होगा, सामान्य मृत्यु। मोक्ष कुछ नहीं। काशी में जानवर भी रहता है। क्या उसका भी वही होना चाहिए? ऐसा कुछ नहीं। सब भ्रांतियाँ हैं। बेमतलब वहाँ मरने जाते हैं। चोर डाकू भी तो वहाँ मरते हैं। फिर सबका मोक्ष हो जाएगा क्या? वहाँ ऐसे आश्रम बने हैं जहाँ लोग मरने के लिए जा रहे हैं। करते क्या हो? कुछ नहीं करते, और मुक्त हो जाओगे बिना किए? मैं वही कह रहा हूँ। करते क्या हो? करना कुछ नहीं, और करने से ही कुछ होगा।
उपजाऊ जमीन मिल तो गई, पर बोया ही नहीं। बंजर वाले ने बो दिया। फसल कहाँ आएगी? बंजर वाले में। जमीन ऊर्जावान मिल गई थी, बोया नहीं, ऐसे पड़े रहे। बिना बोए कुछ नहीं। साधना करनी पड़ेगी।
कथा यह कही जाती है कि शंकर वहाँ तारक मंत्र का उपदेश कर देते हैं, मुक्ति का उपाय बता देते हैं, मर जाओ। शास्त्रों ने लोगों को कितना गुमराह किया। मोक्ष तब कहा गया है जब लेनदेन से मुक्त हो जाओ। तभी मोक्ष। काशी में रहने वाला क्या लेनदेन से मुक्त हो ही जाएगा? लेनदेन से मुक्त होने में मोक्ष है। किसी एक स्थान पर विशेष मोक्ष थोड़े है।
आदि गुरु शंकराचार्य हों, या जितने लोग कर्म के सिद्धांत को नहीं बताते, वे बोल देते काशी चले जाओ मोक्ष हो जाएगा। इतनी मेहनत करने की क्या जरूरत रह जाती। यह भ्रांति है। खुद सोचो। मोक्ष उसे मिलता है जो लेनदेन से मुक्त हो जाए। कहीं भी रहो, लेनदेन से मुक्त हुए तो मोक्ष होगा। लेनदेन से मुक्त नहीं हुए तो काशी में रहो या कहीं भी रहो, एक ही बात है। काशी तपोभूमि है, इतना बोल सकते हैं। थोड़ा तप वहाँ आसान हो सकता है। जैसे नल में पानी आ रहा हो, मोटर लगाने पर गति तेज हो जाती है। पर नल में पानी ही न हो तो मोटर जल जाएगी। मूल बात यह है कि तुम करते क्या हो। चाहे जहाँ भी हो। ऐसी बहुत भ्रांतियाँ शास्त्रों से मिल गई हैं, और मन में बैठ गई हैं।
कोई मर जाता है तो घर के लोग कहते हैं, बहुत हो गए, परेशानियाँ हो रही हैं। फिर बोधगया जाते हैं, घूमते हैं, दान करते हैं, आकर भंडारा करते हैं, और कहते हैं सब हो गया। यह सब अपनी परंपराएँ हैं। सबको पता है कि मूल कर्म है। करने वाले को पता है, कोई भी हो। कृष्ण का शरीर कहाँ छूटा, राम का शरीर कहाँ छूटा। आप करते क्या हो? आप कहाँ हो और कहाँ नहीं हो, उससे मतलब नहीं। आप करते क्या हो, यही मायने रखता है।
शास्त्रों के विषय में बात यही है। शास्त्रों में लिखा तो ठीक है, पर हम क्या कर रहे हैं, अपने तरीके से। शास्त्रों का अध्ययन मत करो। अनुसरण करो। शास्त्रों का अनुसरण किसी योग्य गुरु की शरण में जाकर करो। तुम क्या कर रहे हो? स्वयं पढ़ रहे हो, अध्ययन कर रहे हो।
अपने बालक को किताब, कॉपी, पेन और गाइड भी लाकर दे दो, और कहो पढ़ो बेटा। बिना शिक्षक के वह पढ़ पाएगा क्या? ज्ञान नहीं होगा। शिक्षक वही बताएगा। गाइड में उत्तर है, वह भी बताने वाला तरीके से हल करेगा, पर शिक्षक तरीका सिखाएगा। आगे भी सवाल आएँगे। ये तो किताबी हैं। जीवन में आगे जो आएँगे, उन्हें कैसे हल करना है, यह गुरु सिखाएगा।
गुरु के पास जाओगे और सब कुछ लेकर जाओगे तो कुछ नहीं होगा। गुरु के पास सब कुछ खत्म हो जाएगा। तुम लेकर बैठ ही नहीं सकते। ज्यादा दिन रहे तो तुम्हें भी खत्म कर देगा। यहाँ एक से एक महापुरुष आए, क्योंकि तुम कुछ भी बोलोगे, मेरा एक ही काम है उसे खत्म करना। मुझे मालूम है तुम नहीं बोल रहे। कहीं से मिला है, कहीं से बोल रहे हो। दूसरे की बात है। मेरे पास आए तो तीसरे को आने ही नहीं देंगे, भटकने तक नहीं देंगे। तुम कहोगे, शास्त्र, उपनिषद, वेदांत, सब इधर उधर कर रहे हो। एक जन आए थे। बोले, दो लाइन में आपने सब खत्म कर दिया। मैंने कहा, हाँ, दो लाइन में ही सब खत्म हो गया। ईमानदारी से कहो, कुछ बचा ही नहीं। सब इसके नीचे ही बोला गया है। पृथ्वी पर जितना भी बोला गया, इसके नीचे ही बोला गया। ऊपर हो तो मुझे बताओ। नहीं तो निकल जाओ। चाहे यहाँ से, चाहे वासना से। यहाँ तुम नहीं बचोगे। रहोगे तो खत्म होगे, नहीं तो भाग लोगे। वह अधिकार मुझे नहीं दिया गया कि रोकूँ।
तुम्हारा कोई ज्ञान यहाँ काम आने वाला नहीं। इसलिए कितने महापुरुष आए और चले गए। मुझे बस इतना मालूम है, तुम एक परेशान इंसान हो और अज्ञानता को धारण किए हो। बस इतना मालूम है। वह कैसे छूटे, उसके लिए सत्संग सुनाऊँगा। तुम्हारा एक भी शब्द यहाँ काम नहीं करेगा।
कृष्ण जब गीता में कह रहे हैं कि मेरी शरण में आ जाओ, उससे पहले उन्होंने यह भी कहा कि सब में मैं हूँ। फिर वे कह रहे हैं, मेरा को छोड़ो और मेरी शरण में आ जाओ। अगर इस शरीर के द्वारा, इस पिंड के द्वारा, तुम कृष्ण की प्रतिमा की तरफ जा रहे हो, कृष्ण के चित्र की तरफ जा रहे हो, तो भी मेरा में ही जा रहे हो, और कह रहे हो सब में मैं हूँ। वे यह कह रहे हैं कि मेरी शरण में आओ। मतलब तुम में भी तो मैं हूँ, तो बस अपनी शरण में हो जाओ। तुम समझ नहीं पा रहे।
मामेकं शरणं व्रज। एक शब्द भी आया, एकं शरणं। एक तो फिर एक ही है, अलग थोड़े है। जैसे ही तुम उधर गए, बाहर गए, तो दो हो गए। अंदर ही रहे तो एक रहा। लोग यह बात समझ नहीं पाते। कृष्ण की प्रतिमा को पकड़ लेते हैं। एक अलग हो नहीं सकता। स्वयं में ही पाना है। एकं का मतलब ही एकं होगा। स्वयं में हो गया। गड़बड़ी यह कर रहे थे कि नहीं समझ पाते। उस एक को हम अलग समझ रहे, कि कृष्ण एक की शरण में, अपने से अलग। वे कह भी तो रहे हैं, सब में मैं हूँ। बस बात खत्म।
लोगों को क्या करना था? माल कमाना था। भ्रमित कर दिया। जब भ्रमित नहीं होगे तो माल कैसे छोड़ोगे। डरे रहोगे तभी माल छोड़ोगे। रास्ते में जा रहे हो, कोई कहे सामान दे दो। दोगे क्या? और बंदूक कान पर रख दे तो फटाफट सारी ताकत गई, ले लो, जल्दी दे दिया। बंदूक न हो और कोई दे दो कहे, तो लड़ाई होगी, झगड़ा होगा। जब तुम्हें लगेगा मैं कमजोर हूँ और यह बलवान है, तभी दोगे। जिस दिन पता चल जाएगा कि मैं मजबूत हूँ और यह कमजोर है, उस दिन नहीं दोगे। इसलिए ये तुम्हें हमेशा कमजोर बनाकर रखते हैं।
पहले कहते हैं एक ही ब्रह्म से सब है। फिर कहते हैं राम भगवान, कृष्ण भगवान। तो तुम क्या हो? क्या मेरा परमात्मा अलग है और उनका अलग है? एक तरफ कह रहे हो एक ही ब्रह्म से सब है। दूसरी तरफ अवतार बताते हो राम का, और मैं वही कह रहा हूँ। फिर हमारा परमात्मा अलग है क्या? परमात्मा दो हों तब तो बात अलग है। वे कह रहे हैं अवतार है, तो मैं क्या हूँ? मेरा परमात्मा क्या कमजोर है, उनका मजबूत है? क्या दो परमात्मा हैं? एक तरफ एक ही ब्रह्म से सब है, दूसरी तरफ तुम सामान्य हो। जिस समय राम और कृष्ण की बात हो रही है, उस समय राक्षस भी ताकतवर थे। पूरी प्रकृति ऐसी थी। ऋषियों को सताते थे। ताकत की बात कर रहा हूँ। सताते थे, पर ताकतवर भी थे। जिसने अपने आप को समझा, वह अवतरित। जिसने नहीं समझा, किसी और को समझना चाहता है, वह सामान्य है। बस इतनी सी बात है।
भगवान एक पद है। जैसे कोई गाड़ी चला रहा है तो ड्राइवर एक पद है। स्कूल में कोई शिक्षक का काम कर रहा है तो शिक्षक एक पद है। वह शिक्षक नहीं है, एक पद है, योग्यता से मिला है। वैसे जिसने अपने आप को इस भवसागर से निकाल लिया, उसे भगवान की पदवी दी जाती है। भगवान कोई व्यक्ति विशेष नहीं। जिसने अपने आप को भवसागर से निकाल दिया, उसे भगवान कहते हैं। जैसे नौकरी पकड़ लेते हो तो कहते हैं, देखो साहब जा रहे हैं। कुछ साल पहले साहब नहीं बोल रहे थे। एक पद है। भगवान एक पद भी है।
भग का मतलब है छुड़ाने वाला। जो अपने को जन्म और मरण से छुटकारा दिला दे, वो भगवान होता है। बस यही है। लोगों ने बहुत भ्रमित कर दिया। छोटे बच्चों को कहते हैं, ये तो वास्तव में भगवान के रूप हैं, क्योंकि उनमें राग द्वेष नहीं होता, मोह, शक्ति की इच्छा, अपेक्षा नहीं होती। हम माता पिता को, शिक्षक को, गुरु को, डॉक्टर को भगवान का स्वरूप मानते हैं। बच्चों में अभी अवगुण नहीं है, इसलिए। संत भगवान, गुरु भगवान। भगवान एक पद भी है, एक पदवी। जैसा काम किया, वैसा पदवी दे दी जाती है। पद भी तुम्हारे कर्म के उदय से आता है।
सौभाग्यशाली मैं उसे इस दुनिया में समझता हूँ, जो अध्यात्म को समझते हैं। और दुर्भाग्यशाली मैं उन्हें समझता हूँ, जो समझने के बाद भी यात्रा नहीं करते। दुनिया के सबसे दुर्भाग्यशाली वे व्यक्ति हैं, क्योंकि पृथ्वी पर बहुत ऐसे हैं जो अबोध हैं, पागल हैं, मंदबुद्धि हैं, जिनको अध्यात्म समझ में ही नहीं आता। ये तीनों नहीं हैं, तो भी बहुत ऐसे परिवार हैं, जैसे आपके लोग हैं, जिन्हें समझ में नहीं आता। उनकी बात अलग है। कम से कम आप अपने आप को समझ पा रहे हो। अध्यात्म को समझ रहे हो, तो निकल लो।
मैं दुर्भाग्य और सौभाग्य इसी को समझता हूँ। यह आपका सौभाग्य है कि आपके पास समझ है। दुर्भाग्य यह है कि आप नहीं चल पा रहे। नहीं चलना आपका दुर्भाग्य है।
जहाँ से चले थे वहीं पहुँच जाओ, यही परिक्रमा है। कुछ होकर चले थे, और कुछ नहीं में पहुँचे, तब परिक्रमा का मतलब पूरा होता है। कुछ चाहिए में ही निकलोगे, नहीं तो निकलोगे ही नहीं। पहुँचते पहुँचते अगर कुछ नहीं चाहिए में आ गए, तो बात खत्म हो गई।
ऐसा जीवन जियो कि कुछ चाहिए में तो जीवन है, और आखिर में जाते जाते कुछ नहीं चाहिए में आ जाओ। बस इतनी सी बात है।
इसे कैसे धारण करो, जीवन में कैसे उतारो। जरूरत में उपयोग करने लगो। जरूरत देखो। जो करने जा रहे हो, वह तुम्हारी जरूरत है, या ऐसे ही है। ऐसे ही वाले को छोड़ दो। जरूरत में जीते हुए निकल जाओ। अगर जरूरत में जीने लगोगे, तो कुछ नहीं चाहिए अपने आप आ जाएगा।
यहाँ दो दिन रहना है तो यहाँ के नियम में रहना होगा। फोन का स्विच बंद। खाना पीना अलग से नहीं। एक बार भोजन मिलेगा। किसी से एक शब्द बातचीत नहीं कर सकते। नियम मालूम होकर आए हो, तो उसी में रहो।
मूल मंत्र यही है। जीवन में ईमानदारी और सत्कर्म। बस निकाल लो। यही अपनाकर निकल सकते हो। उम्मीद हमें बाहर ले गई है। उम्मीद छोड़ दोगे, तो अंदर आ जाओगे। बस इतनी सी बात है। सीधी सी बात है।
जरूरत नहीं। तरीका अलग से ढूँढने की जरूरत नहीं।
चाय बहुत पीते हो। यहाँ ऑप्शन क्या है। यहाँ चाय मिलेगी ही नहीं। कपाल पटक दो, तब भी यहाँ की व्यवस्था इधर से उधर होने वाली नहीं। तुम शरण में आए हो। यहाँ नियम यही है। जितनी जरूरत होगी उतना ही मिलेगा। जरूरत से कम पड़े तो हम अपने को उतना रख लेंगे। जरूरत लगेगी, तो तुम नहीं लोगे तब भी दूँगा। मुझे बस इतना देखना है कि जरूरत लग रही है। जरूरत नहीं लगी, तो कपाल पटकते रहो, कोई मतलब नहीं। नहीं दूँगा तो नहीं दूँगा।
सबसे आसान है अपना आत्मिक कल्याण करना। कुछ करना ही नहीं है। आज सबसे कठिन हो गया, क्योंकि कुछ करने की आदत हो गई। सबसे आसान इसलिए है कि कुछ करना ही नहीं है। करने से मुक्त होना है। न करने में होना कितना आसान है। आसान को हमने कठिन बना लिया।
समाज को देखो। गुरु के नाम पर ऐसे लोग मिले, जिन्होंने कहा यह करो, वह करो। इतनी भ्रांतियाँ पैदा कर दीं कि जटिल हो गया। यह तो सबसे आसान था।
इस हाथ को पकड़ना कठिन है, क्योंकि ताकत चाहिए। छोड़ने में ताकत नहीं चाहिए। ताकत तो पकड़ने में चाहिए। सारी ताकत पकड़ने में लगवा दी। और छोड़ने के लिए भी कह रहे हैं, यह पकड़ो। छोड़ने के लिए भी कह रहे हैं, यह पकड़ो।
हाथ में पत्ते हैं। तुमने एक पत्ता पकड़ा था। उसने कहा यह पकड़ो। है तो पत्ता ही। आज तुम्हें यहाँ से वहाँ लाया, पर हो तुम पत्ते में ही। पत्ता छोटा हो या बड़ा, पत्ते में ही हो। यहाँ से छुड़ाकर वहाँ लगा देते हैं। ऐसे ही कर रहे हैं। तुम कोल्हू के बैल की तरह घूम रहे हो। भारी था, थोड़ा हल्का पकड़ा दिया। फिर इस हल्के को पकड़ाकर फिर भारी कर देंगे। जो तुम्हारे पास था उसकी सफाई कर देंगे, और फिर इसी को पकड़ने आओगे, क्योंकि इससे काम नहीं चलेगा। सोचोगे, इससे अच्छा तो वही था। इतना पकड़ाकर तुम्हें इतना कमजोर कर दिया कि फिर उसी में आओगे, क्योंकि उससे फिर मजबूत होगे। फिर वही बेईमानी और दुष्कर्म। ऐसा ही हो रहा है।
अब तो कर दिए। अब उनका तुम कुछ नहीं कर सकते। पश्चाताप तो होता ही है। वह तो होगा ही। ईमानदारी से कम तो कर सकते हो। बस वह करो। उसकी भरपाई हो जाएगी। किया हुआ कुछ नहीं कर सकते। उसकी भरपाई कर सकते हो।
एक शरीर के द्वारा तुम्हें बददुआ मिली है। एक शरीर के द्वारा आशीर्वाद मिलेगा। बस बात खत्म। इतनी सी बात है। रूप अलग होगा। पीछे वही है। रूप अलग है, पर है वैसा ही। एक से तुमने बददुआ पाई। अब दूसरे से आशीर्वाद ले लो। बस खत्म। यही कर्म का सिद्धांत है। निकलना है तो ईमानदारी पूरी तरह अपना लो।
वे सही कहते हैं। पाप और पुण्य की बात अलग है। पाप करोगे तो उसका परिणाम मिलेगा। पुण्य करोगे तो उसका परिणाम मिलेगा। एक करोड़ गाय का दान और एक मछली, दोनों का फल अलग अलग रहेगा। एक दूसरे को काटेगा नहीं।
पर मैं सत्कर्म की बात कर रहा हूँ। जरूरतमंद की सेवा। गाय दान किस लिए दिया? सच में जिसे जरूरत थी उसे दिया, या अपने पुण्य और प्रताप के लिए? बात यह है। पुण्य करना और पाप करना, दोनों का फल अलग है। सत्कर्म अनाज की तरह होता है। खाओ या लगाओ। और सत्कर्म ऐसा होता है कि खा भी सकते हो, लगा भी सकते हो।
जब तुम सत्कर्म करते हो, किसी जरूरतमंद की जरूरत पूरी करते हो, उस समय तुम उसके लिए कौन होते हो? भगवान। वह भगवान से अपनी जरूरत पूरी करता है, और फिर रोम रोम से आशीर्वाद देता है। क्या वह तुम्हें व्यक्ति समझ रहा है? नहीं। वह तुम्हें भगवान समझ रहा है। परमात्मा से सीधी ऊर्जा आ रही है। उसके रोम रोम से आशीर्वाद मिल रहे हैं।
और जब तुम ऐसे सेवा करते हो कि किसी को कहो आज इतने लोगों का भोजन करना है, वह शाम को घर जाकर कहे भोजन मत बनाना, तो क्या रोम रोम से आशीर्वाद देगा? नहीं देगा। निकलेगा ही नहीं। निकालना भी चाहे तो नहीं निकलेगा। जिन लोगों को तुमने लूटा है, वे रोम रोम से बददुआ दे गए हैं। जब जरूरतमंद की सेवा करोगे, तो रोम रोम से आशीर्वाद मिलेगा, और वह भरपाई हो जाएगी। सबकी भरपाई हो जाएगी।
सत्कर्म में तुम खर्च भी तो कर रहे हो। धन खर्च करो, तन खर्च करो, अपनी समझ खर्च करो। बिना कुछ दिए सत्कर्म होगा क्या? वह मेहनत से कमा रहे हो। सत्कर्म करके मुक्ति से मोक्ष तक पहुँच सकते हो। ईमानदारी और सत्कर्म। ईमानदारी नहीं की और सत्कर्म कर रहे हो, तो भी कुछ नहीं होगा। भटकते रह जाओगे। ईमानदारी से अर्जित धन से सत्कर्म करना। सत्कर्म जरूरतमंद की सेवा है। उससे भरपाई हो जाएगी। सर्वप्रथम ईमानदार हो जाओ।
माल निकले तभी बोलना। माल नहीं निकला तो मत बोलना। ब्लड प्रेशर बढ़ने से बचाने के लिए तुम कितना गिर रहे हो, समझ नहीं पा रहे। बाद में समझ में आएगा। जब उधर लेट होता है, तब गुस्सा आता है, और उस गुस्से में बददुआ देगा। तुम उससे झूठ बोल रहे हो। सच बोलो तो कितना भी गुस्सा हो, बददुआ लगेगी ही नहीं, क्योंकि तुम सच बोल रहे हो। झूठ बोल रहे हो तो उसकी बददुआ फिर लगेगी। इसलिए साफ साफ बोलो। गाड़ी नहीं निकली है तो बोलो, नहीं निकली। कुछ पैसों के लिए झूठ मत बोलो। सामने वाले को तभी समय देना जब पक्का कर सको। नहीं तो मत दो।
कठिन नहीं है। नहीं कर सकते तो व्यापार बंद कर दो। व्यापार के लायक नहीं हो तो काहे को कर रहे हो। छोड़ दो। काम को काम के तरीके से करो। कर्म ही पूजा है। अपनी मिलावट कर दी तो वही पतन का कारण बन जाती है।
बेटी है, अगले साल शादी कर देनी है, तब काम खत्म करना है। बंद तो करना ही है। पर अब जितने दिन करो, उतने दिन ईमानदारी से करो। करके देखो। एकदम करो। बंद हो तो अपने आप बंद हो जाए। उतना तो कमा ही लिया है। अब ईमानदारी से बोलना शुरू करो, और देखो क्या होता है। भाइयों को बेईमान मत बनाओ। परिवार मिलकर काम कर रहा है। तुम ईमानदारी से बोलो। वही भाइयों को अपना व्यवहार सिखा देगा। वे ले ही लेंगे। तुम बस ईमानदारी करो। अपने आप ले लेंगे, निकाल देंगे। जब तक झूठ बोला तुम थे। अब तुम जाओ। जाओ तो चले आना अपनों की कुटिया में। इस शरीर के द्वारा कोई बोल ही रहा है, कि भोजन और रहने की जितने में जी सको उतना तो है।
घर में व्यापार की बात में कभी सच बोलोगे, समझाओगे कि काहे को ऐसा कर रहे हो, तो घर वाले विरोध करेंगे। कोई बात नहीं। विरोध ही सही। कम से कम विरोध तुम्हारा किया जा रहा है। क्या फर्क पड़ता है। यहाँ से जाने के बाद पूरी तरह यही करना है। वाणी अब काम करेगी।
रामकृष्ण परमहंस के पास एक महिला बच्चे को लेकर आई। बोली, गुड़ बहुत खाता है, बोल दीजिए। पहले उन्होंने पंद्रह बीस दिन कोशिश की। बीच में औरत को कई बार टाल दिया। फिर जब दोबारा बच्चे को लेकर आई, तब कहा, बेटा गुड़ मत खाना। महिला बोली, यह तो पहले ही बोल सकते थे। वे बोले, पहले नहीं बोल सकता था, क्योंकि पहले मैं खुद गुड़ खाता था। उनकी वाणी काम कर गई। वैसे ही वाणी तब काम करती है, जब कथनी, करनी और रहनी एक हो। अब जाना तो पक्का कर लो। चाहे कुछ भी हो जाए। जितना जीवन बचा है, ईमानदारी से जीऊँगा। फूँक कर चाटना नहीं।
कारोबार में कहीं घूस देनी पड़ती है। मत देना। अधिकारी माँगे तो मत देना। जो कुछ होना हो, होने दो। अब तुम छोड़ना चाह रहे हो। लोग तुम्हें छोड़ देंगे। तुम मत छोड़ो। ऐसी ईमानदारी अपनाओ कि तुम ही बचो। अपने भाइयों से कहो, जाओ। जो बेईमानी करने को उतावला है, उसे यह चैनल खुलवा दो। जो घूस माँगे, उससे कहो, भाई यह है, यह चैनल खोलो। वह भी ईमानदार हो जाएगा।
टीटी को पाँच सौ क्यों दिए? स्लिप क्यों नहीं ली? ग्यारह सौ कुछ रुपये लग रहे थे तो ग्यारह सौ देते। वह सरकार के खाते में जाता। यह गलती हुई। तुम्हारे पास कमी भी नहीं है। इतनी कमी नहीं है। फिर क्यों नहीं दिए। बाद में महसूस किया कि गलती हो गई।
रिजर्वेशन कराने में एक्स्ट्रा पैसे दिए, वहाँ भी घूस दी, और दूसरी गलती यहाँ कर दी। दो गलतियाँ। पवित्र जगह जा रहे हो और दो गलतियाँ हो गईं। अब यहाँ से यह नहीं करना। रास्ते भर पछतावा होता रहा कि पाँच सौ छह सौ में अपने को इतना नीचे गिरा लिया।
कोई जरूरत ही नहीं थी। पाँच हजार भी तुम्हारे लिए कुछ नहीं है। कोई बड़ी बात नहीं। फिर भी कि पाँच सौ बच जाएँगे। बेईमानी करके पाँच छह सौ बच जाएँगे। बचाकर क्या करोगे। और पश्चाताप रास्ते पर किया। यही तो होता है हमारे साथ। अब मत करो।
ईमानदारी से करो। देखो, तुम किसी पद पर हो तो देखो, मैं उस पद के लायक हूँ या नहीं। लायक हो तो करो। नहीं हो तो छोड़ दो। संविधान भी, सरकार भी, इस्तीफा सबके लिए दिया है। नहीं करना है तो छोड़ सकते हो।
हर व्यक्ति अगर देश का हर व्यक्ति इस्तीफा अपनी जेब में रखे, तो बेईमानी कोई करवा नहीं सकता। कह दो, भाई नहीं करूँगा, यह लो। तुम स्वतंत्र हो, पूरी तरह। परिवार भी तुमसे बेईमानी नहीं कराता। तुम करते हो। नहीं करोगे तो छोड़ देंगे। कहेंगे, तुम इस बिजनेस के लायक नहीं हो, जाओ। अब तो एक रास्ता और हो गया, अपनों की कुटिया। चले आना।
सोलह मई के बाद हम निकल जाएँगे। भाइयों को सत्संग पूरा देश घूमकर सुनाएँगे। फिर यहाँ व्यवस्था रहेगी। आना जाना रहेगा। ऐसा नहीं कि निकल गए तो सब खत्म। जब तक यह शरीर रहेगा, दुनिया में घूमकर सत्संग होगा। इस कुटिया को देखना, साधक कैसे साधना कर रहे हैं, सब करना।
सोलह मई तक मैंने इसलिए बोल दिया कि अभी सोलह मई तक हर व्यक्ति आ रहा है। जितने साधक आ रहे हैं, मैं उनसे सीधा बात करता हूँ। सोलह मई के बाद पता नहीं, तुम आओ तो मैं यहाँ न रहूँ। पर यहाँ व्यवस्था रहेगी, साधना के लिए, और सत्संग भी चलेगा। ऐसी व्यवस्था कर देंगे। अगर हम कहीं लाइव बोल रहे हैं तो यहाँ चलेगा। यहाँ भी लोगों से प्रश्न लिए जाएँगे।
सोलह मई तक आने वाले हर व्यक्ति से मैं मिल रहा हूँ, सीधा बातचीत कर रहा हूँ। आगे इतनी भीड़ आने वाली है, मुझे पता है। उचित तरीके से काम भी तो करना होगा। इसलिए व्यवस्था कर रहे हैं। सोलह मई के बाद आएंगे, जाएँगे, यही लगा रहेगा। ज्यादा सत्संग करेंगे तो और लोग मिलेंगे। वे लोग मिलेंगे जो नहीं आ पा रहे हैं। ऐसे लोगों से मिलना होगा।
निमित्त बनती है। कोई न कोई फिर गुरु मिल जाता है। निमित्त बनती है। जैसे रामकृष्ण परमहंस के लिए माँ काली निमित्त बनीं, फिर गुरु बुलाती हैं।
मूर्ति पूजा भी तब निमित्त बनेगी जब तुम्हें कुछ नहीं चाहिए। कुछ चाहिए तो वह भी निमित्त नहीं बनेगी। वह तुम्हारे पतन की निमित्त बन जाएगी। कुछ चाहिए था तो राक्षसों को भी दर्शन हुआ। क्या हुआ? पतन हुआ। उन्हें कुछ चाहिए था, कुछ बनना था। उनका पतन हो गया।
पहुँचो उस तक। ब्रह्म को कोई जान नहीं सकता। ब्रह्म जान सकता है। खुद को तुम उसे नहीं जान सकते। तुम उसे नहीं जान सकते। वह तुम्हें जान सकता है। वह कब होगा? जब तुम पूरी तरह पवित्र हो जाओगे, तभी।
सत्संग उसे कहते हैं, जो संग से मुक्त करने का मार्ग बताए। जिस संग में तुम हो, उस संग से कैसे छुटकारा पा जाओ, अपने आप में हो जाओ, उसी को सत्संग कहते हैं। अवधूत खोजी होता है। जब खोजने के लिए कुछ नहीं बचता, तो उसके बाद उसकी अवधूत की स्थिति हो जाती है। और सद्गुरु, आत्मज्ञान होने के बाद।
परमात्मा का स्वरूप बोला गया है, यह नहीं कि सीधा परमात्मा बोल दिया गया है। जैसे माता पिता को भगवान का स्वरूप कहा गया है, यह नहीं कि वे भगवान ही बोल दिए गए हैं।
गुरु कौन है। गुरु ब्रह्मा, जिसने अपने जन्म और मरण से अपने आप को छुड़ा लिया हो। गुरु विष्णु, जो अपने पालन से मुक्त हो गया हो। गुरु देव महेश्वर, जिसने अपने विकारों का संहार कर दिया हो। ऐसा कोई भी व्यक्ति, जो इन तीनों से मुक्त हो गया, वह साक्षात है। पर मतलब परछाई नहीं। पर मतलब पार कराने वाला। परम ब्रह्म का स्वरूप हो गया। वह शरीर में है, मानव शरीर में है, पर अब वह मानव नहीं रह गया।
मानो, वैसे भी तुम हो नहीं मानव। तुम अपने आप को मानव कहते हो, पर हो नहीं। मानव शरीर मिला है। यहाँ कोई जानवर भी नहीं है। जानवर का शरीर है। तो परमात्मा का स्वरूप कहा गया है। उसमें इस भवसागर से, परमात्मा तक, मुक्त कराने की क्षमता आ गई। वह पार करा सकता है। पार कराने का मार्ग बता देगा। इतनी क्षमता है। उस क्षमता की वजह से उसे परमात्मा का स्वरूप कहा गया है।
जरूरत से ज्यादा मिल गया तो स्वर्ग। नहीं मिला तो नरक। और चाहिए से मुक्त हो गए तो मोक्ष। यही है जिंदगी।
जब तुमने छह सौ बचाया, तो स्वर्ग था। जब पता चला, तो नरक है। उस समय तुम स्वर्ग में थे। जब छह सौ बचाया, तब स्वर्ग था। और जब समझ में आया कि यह मैंने क्या कर दिया, तुरंत नरक में हो गए। तो तुम स्वर्ग और नरक से होकर आ रहे हो।
इस समय तुम स्वर्ग में हो, नरक में हो, अफसोस में हो, ग्लानि में हो। वहाँ न होते तो अफसोस भी न होता। यहाँ आने की वजह से अफसोस हो रहा है। सत्य मार्ग पर जा रहे हो और यह काम कर बैठे, लालच में।
करने वाला खुद भगवान हो जाता है। जब भी देखो, कोई जरूरतमंद की, या तुम्हारी कोई जरूरत पूरी कर दे, उस समय वह तुम्हारे लिए भगवान लगता है। तो तुम भगवान हो जाओगे। ईमानदारी और सत्कर्म करते करते तुम भगवान हो जाओगे। और भगवान ही उससे मिलता है। उससे कौन मिलेगा? भगवान। भगवान मिलेगा।
अपने लिए भी यह करते करते तुम भगवान हो जाओगे। देखो ना, जब भी तुम्हारी कोई जरूरत पूरी की गई है, उस समय वह तुम्हारे लिए भगवान लगता है। कहते ही हैं, भगवान ने भेज दिया। भाषा में भी बोलते हो। सच में भगवान लगता है। जीवन में ऐसी स्थिति हुई हो, कि कहीं कोई रास्ता नहीं था, और एक व्यक्ति आया और मदद कर दी। देखो, वह तुम्हारे लिए भगवान ही लगता है। भगवान ने भेज नहीं दिया, भगवान लगता है।
तो ईमानदारी और सत्कर्म करते करते तुम भगवान हो जाओगे। और भगवान फिर परमात्मा से मिल लेगा।
ईमानदारी और सत्कर्म करो। ध्यान से मुक्त होना है। ध्यान करना नहीं है। ध्यान में ध्यान करना था। अब ध्यान से भी मुक्त होना है। ध्यान के हमने अनेक वीडियो बनाए हैं। पहले वे देखो, तब बात समझ में आ जाएगी।