प्रश्नोत्तर P6-0014 · भाग 6
पांचवां वेद गुरु को बताया — गुरु की महिमा कैसे समझें?
जो गुरु है, वो पांचवा वेद है। इसलिए कि देश, काल, स्थिति, परिस्थिति में, किताबों में जो लिखा है, वो बदलता रहता है। आज अगर बीस साल पहले की किताब उठा के नक्शा देखो भारत का, तो बदल गया। तो चार वेद के ऊपर पांचवा वेद गुरु बोला गया है, कि वो देश, काल, स्थिति, परिस्थिति में जीवंत गुरु आपको, जैसी स्थिति परिस्थिति है, उसमें निकलने का मार्ग बताता है। वो किताबों में नहीं लिखा जा सकता। क्योंकि किताबों में जैसे ही लिखा गया, बदल जाता है।
कबीर को बहुत लोग मानते हैं। कबीर ने क्या कहा था? पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय। मैं ये कह रहा हूं, कबीर ने जिसको कहा, पूरा जितना भी लिखा गया था, लेकिन कबीर का भी सब लिखा पोथी हो गया। कबीर की भी बातें अब पोथी हो गईं। तो लोगों ने जोर दिया कि जीवंत गुरु ढूंढो। क्योंकि जीवंत गुरु, देश, काल, स्थिति, परिस्थिति जैसी है, उसमें से निकलने का मार्ग बताएगा। इसलिए जीवन में जीवंत गुरु जरूरी है। जीवंत गुरु को पांचवा वेद बोला गया है। वो कभी लिखा नहीं जा सकता। क्योंकि जैसे आपने लिखा, और कुछ समय में, यहां प्रतिपल हर चीज बदल रही है।
अगर बीस साल पहले का नक्शा उठा के भारत का भ्रमण करो, तो कर पाओगे? नहीं कर पाओगे। तो कबीर ने खुद कहा था कि पोथी है, इससे कुछ नहीं होगा। लेकिन अब कबीर की भी बातें पोथी हो गईं। तो हमारे जीवन में जीवंत गुरु चाहिए। उन्होंने यही लिख के आए थे, जीवंत गुरु चाहिए। क्योंकि जीवंत गुरु देश, काल, स्थिति, परिस्थिति में आपको मार्ग बताएगा। यहां प्रतिपल सब बदल रहा है। तो इसलिए पांचवा वेद गुरु को बोला गया है। गुप्त है, मतलब वो कभी लिखा नहीं जा सकता। क्योंकि जैसे आपने लिखा, अगर आपने यहां के बारे में कुछ लिखा, वैसे तो बदल गया, बदल चुका है। आप जैसे ही लिखना चालू करते हो, बदल गया। अगर आप किसी वस्तु के बारे में कुछ बोल रहे हो कि ऐसा है, उसी क्षण वह बदल गया। तो यहां ना कुछ सच है, ना झूठ है। उपयोग करो और आगे बढ़ो। इसीलिए तो कहा गया कि यहां ना सच है, ना झूठ है। इसके चक्कर में मत पड़ो। उपयोग करो और आगे बढ़ो।
गुरु ज्ञान का प्रतीक है। नल से प्यास नहीं बुझेगी। पानी से प्यास बुझेगी। तो मुझे पानी से प्यास बुझा के आगे बढ़ना है। ज्ञान के अलावा गुरु का रोल नहीं है। अगर उसके ज्ञान को नहीं अपनाए, तो उस शरीर का कोई मतलब ही नहीं। कोई मतलब नहीं है। अगर आप पानी पी ही नहीं रहे हो, तो उस नल को सोने का बना लो, क्या मतलब है? गुरु ज्ञान का प्रतीक है, तो उसके ज्ञान को लो और आगे बढ़ो। उसके शरीर को मत पकड़ो। ज्ञान के अलावा गुरु कुछ नहीं। ज्ञान है। ज्ञान पे मर मिटना है। ज्ञान को छोड़ दो तो गुरु खत्म। गुरु है किस लिए? ज्ञान। और ज्ञान नहीं है, तो गुरु तो तुम्हारे जैसा है। गुरु की मान्यता क्यों है? गुरु ज्ञान का प्रतीक है। अगर ज्ञान नहीं है, तो वो आपके जैसा है। और मेरा कल्याण ज्ञान से होगा। और ज्ञान में मैं जब जिऊंगा, उसमें होगा। अगर वो ज्ञान भी दे दिया, और मैं उसमें जिया नहीं। किसी ने भोजन दे दिया, आपने उसे ग्रहण नहीं किया, तो पोषण थोड़ी ना देगा। अगर उसने ज्ञान दिया, तो उस ज्ञान में जीने में आपका कल्याण है।
तो हमें यह समझना है कि गुरु शब्द है, शरीर नहीं। धोखा तो तब होता, जब कहा जाता कि शब्द को छोड़ो, शरीर को पकड़ो। तब धोखा हो सकता है। और ज्ञान कभी धोखा नहीं दे सकता। क्योंकि आप समझोगे तभी अपनाओगे, तो धोखा दे ही नहीं सकता। क्योंकि समझते ही पता चल जाएगा कि इससे क्या होगा। और नहीं समझ पाओगे, तो अपना ही नहीं पाओगे। तो ज्ञान कभी धोखा दे ही नहीं सकता। ज्ञान से आपका कल्याण होगा। तो ज्ञान को समझो, शरीर को पकड़ो ही मत। गुरु ज्ञान का प्रतीक है। ज्ञान हटा दो, तो वो तो आपके जैसा हो गया।
भक्ति मार्ग में गुरु शरीर को भी पकड़वाता है। अब देखना है मैं कहां खड़ा हूं। भक्ति मार्ग में भी एक इष्ट पकड़ता है, एक प्रतिमा को पकड़ लेता है। लेकिन किसी भी मार्ग से चलो, ईमानदारी से कर्म अपनाना ही पड़ेगा। और हर जगह देखा जाए, चाहे आप भक्ति मार्ग से चलो, ध्यान मार्ग से, योग मार्ग से, ज्ञान मार्ग से, किसी मार्ग से चलो, तो बिना ज्ञान के चल ही नहीं सकती। क्या बिना समझ के भक्ति हो सकती है? भक्ति भी करने के लिए समझ तो चाहिए। तो अगर कोई गुरु कह रहा है कि ऐसे भक्ति करना है, तो उसमें शब्द ही तो दे रहा है। बिना शब्द दिए वो बता सकता है क्या? शब्द तो दे रहा है। तो मूल शब्द है। तो गुरु ज्ञान का प्रतीक है। तो अब मुझे समझना है कि मुझे कौन सा शब्द दे रहा है। क्योंकि वही शब्द गाली में भी लगते हैं। वही शब्द मेरे कल्याण में भी लगते हैं। वही शब्द मेरे पतन में भी लगे हैं। बस शब्द बोलने का तरीका अलग था। तो अब देखना है कि जब गुरु हमें शब्द दे रहा है, तो इन शब्दों के द्वारा मेरा क्या होगा। ये आपको समझना पड़ेगा, और समझने के बाद फिर अपनाओ। समझने के बाद अपनाओ। तब जाके आपकी यात्रा होगी। और आपको समझ में ही नहीं आया, और आप हां में हां कह दिए। अगर आपको कोई मार्ग बताया, और आपको समझ में नहीं आ रहा, आप हां में हां कह दिए। अब उसके सामने आगे तो चल दिए, लेकिन जाओगे कब? कहां जाओगे? आपको समझ में आना चाहिए। इसीलिए मेरा कहना है कि आप अपनी समझ से समझिए। और अपनी समझ को विकसित करें। अगर आपको यात्रा करनी है तो अपनी समझ से चलिए, और यात्रा नहीं करनी है तो हां में हां मिलाते रहिए। आप बीस साल बाद भी खड़े वहीं पाएंगे।
गुरु की तो बहुत तगड़ी महिमा है। समझ में आ गया तो ठीक है। प्रश्न करने वाले आदमी को यह पता नहीं कि तू प्रश्न क्या कर रहा है। इस बात को जिसने समझा है, उसकी समझ में आ जाएगा। शब्द गुरु है। देह गुरु की कोई जरूरत नहीं है। और वो गुरु है जो शब्द गुरु को जानता है। गुरु ज्ञान का प्रतीक है। ज्ञान में शब्द है।
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