प्रश्नोत्तर P6-0101 · भाग 6
हरियाणा से आई बहन साधना में लगातार बैठने से पैर और शरीर के दर्द में बहुत परेशान थी। कहा गया था, या तो बैठो या चली जाओ, उसके बाद दर्द चला गया। साधना में दर्द और पीड़ा को कैसे देखें? गुरु कठोर क्यों होता है? शरीर, धन और समझ की ताकत को संचित करें या कहां लगाएं?
देखो, क्या होता है। मुझे कठोर बनना पड़ता है। अगर मैं कठोर नहीं बनता तो तेरा दर्द नहीं जाता। तू राउंड ही मारती रहती। हमने एक ही बात कही, या तो तू बैठ, या तो चली जा। उसी में तेरा दर्द गया। या तो तू चली जाती।
कठोरता गुरु, डॉक्टर, शिक्षक, वकील, इन सबमें होनी चाहिए। गुरु अगर शिष्य के हां में हां मिला दे, तो शिष्य का पतन हो जाएगा। डॉक्टर अगर मरीज के हां में हां मिला दे, तो रोग बढ़ेगा। जिससे रोग बढ़े, वही खाना रोगी को अच्छा लगता है। परहेज बता दो, चोरी-चोरी खाता है। तो डॉक्टर को कठोर बनना पड़ेगा। शिक्षक को कठोर बनना पड़ेगा। वकील का मतलब सलाहकार होता है। चाहे वह राजा का सलाहकार हो, चाहे किसी और का। वकील को भी कठोर बनना पड़ेगा। मुवक्किल के हां में हां कह दिया, तो गया। इसलिए मैंने तुमसे कठोरता की। और मैंने इनसे कहा भी था कि उसका दर्द चला जाएगा। क्योंकि मुझे मालूम है। उस दर्द का तुमने साथ दिया है। अपना साथ नहीं दिया। हमेशा दर्द का साथ दिया, इसलिए वह दर्द बढ़ता ही चला गया। और जब तुमने अपना साथ दिया, चाहे मजबूरी में, परिस्थिति में, लाचारी में, क्योंकि मैं अंदर से देखता रहता हूं। दोबारा राउंड मारती तो मैं भगा ही देता। देखो, तुम्हें क्या मिला। तुम उस दर्द से मुक्त हो गई।
इसलिए दर्द को मत बढ़ाओ। दर्द को वैल्यू मत दो। अपने आप को वैल्यू दो। शरीर की पीड़ा को वैल्यू मत दो। देखो, रोग नहीं है। जब तुम कुछ करोगी तो पीड़ा होगी। यह कुछ करने की पीड़ा है, तो उसे होने दो। जितनी पीड़ा हो रही है, उतना तुम उसमें आगे जा रही हो। जितनी पीड़ा सह रही हो, उतना उसमें बढ़ रही हो। एक दिन उस पीड़ा को पार कर लोगी। और अगर पीड़ा में पड़ गई तो गिर जाओगी। तुम कितना परेशान थी। अब कुर्सी पर भी राउंड नहीं मार रही। तो साधना में दर्द को कभी महत्व मत देना। दर्द साधना करने से ही आ रहा है। उस दर्द को महत्व मत देना। हम यही गलती करते आए हैं। दर्द को अपने आप से भी ज्यादा महत्व दे दिया। जरा सा दर्द बर्दाश्त नहीं होता, और कहानियां सुनाते हैं कि साधना करते-करते उनके शरीर पर कीड़े लग गए। रमण महर्षि को चूहे नोच-नोच कर खाने लगे। और तुम एक मच्छर भी बर्दाश्त नहीं कर पाते। एक पीड़ा बर्दाश्त नहीं। उन्नति कैसे होगी। लगाव तभी टूटेगा जब शरीर की पीड़ा को बर्दाश्त करोगे। साधना में शारीरिक पीड़ा उठेगी, मानसिक पीड़ा उठेगी। जब उस पीड़ा को बर्दाश्त कर लोगे, उसका साथ नहीं दोगे, तो आगे बढ़ जाओगे। पीड़ा का साथ दिया, चाहे शरीर की हो चाहे मन की, तो गिर जाओगे। गुरु को कठोर होना पड़ता है। मैं कठोर नहीं होता तो तुम राउंड ही मारती रहती। राउंड में चिंतन थोड़ा ही होता है।
कठोर तभी हुआ जाता है जब योग्य हों, जब सामर्थ्यवान हों। अगर गुरु खुद किसी पर निर्भर है, तो कठोर नहीं होगा। तब तो जैसा तुम चाहोगे वैसा बोलेगा। हम स्त्रियों को सेवा में नहीं लगाते। स्त्रियों को काम ही नहीं देते। करती भी है तो मैं मना करता हूं। तुम्हें कुछ नहीं करना है। पैदा हुई हो तभी से काम ही करवाया गया। बर्तन घिसे, झाड़ू मारी, पोछा मारा। इसलिए यहां स्त्रियों से भोजन भी नहीं बनवाता। बस आत्मिक चिंतन करना है। पैदा होते ही छोटा भाई हो तो बड़ी बहन उसकी मां बन जाती है। दोनों का नाक बह रहा है, वह एक को गोद में लेकर संभाल रही है। स्त्रियों का जीवन यही है। भाई का बचा हुआ बहनों को मिलता है। मैंने यह देखा है। यहां ऐसा नहीं किया। सब उल्टा कर दिया। कहीं तो इन्हें सुख दो, कहीं तो शांति दो।
माता जी को सेवा में लगाया है, क्योंकि वह स्त्री-पुरुष के हिसाब से थोड़ा ऊपर उठ गई हैं। उन्हीं को सेवा में लगाया। उन्हें वही जरूरत थी। कर नहीं पाई होंगी, इसलिए जरूरत थी। उनके लिए सबसे जरूरी वही था, इसलिए मिल गया। मैंने नहीं दिया, उन्हें मिल गया। देता तो सबको देता।
जीवन में यह याद रखना। साधना करते समय दर्द का साथ कभी मत देना। मानसिक पीड़ा हो या शारीरिक पीड़ा। साथ दिया तो आवेश और जज्बात में आकर चले जाओगे। अच्छा गुरु होगा, अच्छा सलाहकार होगा, तो कठोर बोलेगा। लाली-चिपड़ी बात नहीं करेगा, खुश करने के लिए। कठोरता में ही साधना होती है। पत्थर के साथ कठोरता ना की जाए तो प्रतिमा कैसे बनेगी। बनाने वाले को हमेशा कठोर होना पड़ता है। डॉक्टर कठोर ना हो तो ऑपरेशन कैसे करेगा। गुरु, डॉक्टर, वकील, सलाहकार, शिक्षक, इनको कठोर होना चाहिए। ऊपर से कठोर, नीचे से मुलायम, मोम की तरह, नारियल की तरह। ऊपर से कठोर, अंदर से कोमल।
तुम्हारे सामने प्रत्यक्ष अनुभव है। मैं कठोर नहीं होता, कह देता कोई बात नहीं, राउंड मारती रहो, दर्द हो तो सो जाया करो। क्या चिंतन होती। नहीं होती। ऐसे घूम कर चली जाती, कुछ नहीं होता, क्योंकि नियम में रह ही नहीं पाती। रोगी की तरह रहती। रोगी की तरह रहोगे तो अनुभव नहीं होगा। ऐसे घूम कर चले जाते हो और कहते हो कुछ हुआ नहीं। अब होगा। यहां से कुछ ना कुछ ले ही जाओगे। मेरा भाव यही है कि यहां आने वाला खाली ना जाए।
व्यवस्था में कोई कमी हो, साधक के लिए, जिज्ञासु के लिए, तो बताओ। स्त्री के लिए हो या पुरुष के लिए। यहां स्त्री-पुरुष का ऐसा भेद नहीं रखा। माहौल ऐसा बना दिया है कि सोचना ही नहीं पड़ता। ऐसी ऊर्जा है, ऐसा वाइब्रेशन है, कि बाहर कुछ सोचना ही नहीं। अपने आप में लीन होना है। बाहर जाने लायक यहां कुछ है ही नहीं। ना आवाज है, ना ऐसा दृश्य है। अगल-बगल ऐसा दृश्य नहीं कि बाहर चले जाओ। शब्द नहीं, दृश्य नहीं, सुगंध नहीं, स्वाद नहीं, स्पर्श नहीं। बाहर जाओगे कैसे। यहां सिर्फ अपने आप में जा सकते हो।
अपने आप में जाओगे तो बड़ी पीड़ा का सामना करना पड़ेगा। कभी शरीर की, कभी मन की। बाहर पीड़ा और भी ज्यादा होती है, पर वहां वह दब जाती है। बाहर के आवरण से पीड़ा को दबा देते हैं, और वह धीरे-धीरे मीठे जहर की तरह बढ़ती है। यहां पीड़ा प्रत्यक्ष दिखती है, शरीर की और मन की। पर उसी पीड़ा से तुम मुक्त हो रहे हो। घाव पर मलहम लगाओ तो बहुत पीड़ा होती है। जब तक मलहम नहीं लगता, घाव सड़ता रहता है, तब पीड़ा का पता नहीं चलता। पीड़ा तब होती है जब सफाई होती है। हाथ कसकर पकड़ने पड़ते हैं, नहीं तो सफाई नहीं होने देता। सड़ते समय पीड़ा नहीं होती, क्योंकि वहां तुम सड़ रहे होते हो। सड़ने में पीड़ा नहीं होती।
बहुत लोगों का घाव अंदर ही अंदर सड़ जाता है। बाद में काटना पड़ता है। कहते हैं, पता ही नहीं चला। जब मलहम लगेगा, इलाज होगा, चीर-फाड़ होगी, तब बहुत पीड़ा का सामना करना पड़ेगा। वैसे ही अपने आप में जाओगे तो शरीर और मन दोनों की पीड़ा आएगी। बस भागो मत।
उस दिन तुम भाग भी सकती थी। मैंने कहा भी था। विकल्प तुम्हारे पास था। ऐसा नहीं कहा था कि सात दिन रहना ही है। सब तुम्हारे हाथ में था। या तो साधना करो, यहां के नियम हैं, नहीं तो चली जाओ। दो में से एक करो। मुझे मालूम है तुम पीड़ा से गुजर रही हो, क्योंकि मैं भी गुजरा हूं। दया दिखा दूं तो तुम गिर जाओगी। मैं गिराना नहीं चाहता, उठाना चाहता हूं। इसलिए कठोर बनना पड़ता है। वैसे भी मैं कठोर हूं। बहुत कठोर हूं। अपने आप को भी नहीं छोड़ा।
साधना में मेरे पैर कटने की हालत तक आ गए थे। सड़ गए थे। मैंने कहा, कट जाए तो कट जाए। क्या फर्क पड़ता है। कितने शरीर धारण कर चुके हैं। यह भी तो नष्ट होने वाला है। इसे बचा नहीं सकता। एक समय आएगा, इस पैर का नाश हो ही जाएगा। तो लक्ष्य की तरफ बढ़ते हुए कट जाए, यही ठीक है। इसके चक्कर में पड़कर मुड़ गया तो मुड़ने में क्या बचेगा। इस पैर का करूंगा क्या, इस हाथ का करूंगा क्या। जीवन में घुटन है, अशांति है, बेचैनी है। तो इस हाथ का, आंख का, कान का, नाक का, मुंह का, इस शरीर का करूंगा क्या। लक्ष्य की तरफ बढ़ने में इसका नाश हो जाए। वैसे भी नाश होगा। बचाता भी रहूं तो भी नाश होगा। हर स्थिति में इसका नाश है। इसके चक्कर में मत पड़ो। इस साधन का उपयोग करो, उस परम साध्य तक पहुंचने के लिए। सिर्फ उपयोग करो।
जैसे घर कोई काम करने वाला आए, और थक जाए, तो तुम कहते हो बैठो मत। लंच करने लगे तो पूछते हो कितनी देर करोगे। कैसे खटाते हो। वैसे अपने आप को खटाओ। जब पैसे देने पड़ते हैं, तो एक पहर काम करके एक पहर आराम, यह तुम पचा नहीं पाते। कहते हो, काम करने आए हो तो काम करो, नहीं तो आधी मजदूरी ले जाओ। पूरी मजदूरी तब, जब काम करोगे। लंच में भी घड़ी पर नजर रहती है। पैसा भरा पड़ा हो, फिर भी नजर रहती है। अब लेट क्यों कर रहे हो, समय हो गया। दोपहर में मजदूर काम कर रहा हो, क्या दया आती है। दया आ जाए तो काम ही नहीं होगा। और काम जरूरी है, क्योंकि तुम भी कहीं मेहनत कर रहे हो। कोई शरीर से, कोई बुद्धि से। धूप में भी काम होता है।
उस पर दया करते हो क्या। उसे धूप नहीं लगती क्या। गर्मियों में गेहूं काटते देखते हो, कितनी धूप होती है। अपना बेटा निकले तो कहोगे धूप में मत जाना। अपनी कठोरता देखो। यह कठोरता अपने लिए लाओ। तुम कठोर नहीं हो, ऐसा नहीं है। किसान अपना बालक निकले तो कहेगा छाया में रहना, लू लग जाएगी। वही मजदूरों से तपती धूप में गेहूं कटवाता है। मजदूर बोले एक घंटा और आराम कर लूं, तो बर्दाश्त नहीं होता। पगार काट लेंगे। कठोर तो हो। पर कामनाओं में कठोर हो, वासनाओं में कठोर हो। काश अपने कल्याण में कठोर हो जाते। तुम बहुत कठोर हो। सोच भी नहीं सकते कितने कठोर हो। मैं आईना दिखा रहा हूं। अपने लोगों को बचाया, और दूसरों पर कठोरता दिखाई, वह भी कामना में, उनके भले के लिए नहीं।
यहां मैंने कठोरता की तो किसके लिए। तुम्हारे लिए। हो सकता था तुम्हारी बुद्धि नाराज होकर चली जाती, जाकर गालियां देती। कहती, कैसा आदमी है, साधु है, संत है, गुरु है। मैं दर्द में इधर-उधर दौड़ रही हूं, और यह कह रहा है बैठो, नहीं तो निकल जाओ। हरियाणा से इतनी दूर आई हूं, और महिला हूं। मैं महिला देखकर नहीं बोलता, पुरुष देखकर नहीं बोलता। मैं कल्याण चाहता हूं। इसलिए कठोर बनना पड़ता है। मैं यह नहीं देखता कि महिला हो या पुरुष। मैं एक जीवात्मा को देख रहा हूं, जहां ना नर है ना मादा। अगर मैं यह देखता तो इन्हें काम पर नहीं बोलता। काम करने वालों की यहां कमी है क्या। इनकी जरूरत नहीं थी क्या। थी। बहुत जरूरत थी। उसी काम की, जिसके लिए मैंने कहा। वह काम करते हुए अपने आप को पाती हैं। चिंतन से भी अच्छा उनके लिए वह है, क्योंकि करते हुए अपने आप को पाती हैं। जितनी देर काम करती हैं, उतनी देर उस परम सत्ता से लगाव रहता है। कहती हैं, मैं उसका काम कर रही हूं, मुझे मौका मिला। यह मेरा काम नहीं, उसका कार्य है। उसके कार्य का मौका मिला।
तो कठोर बन जाओ। अपने ऊपर अनुशासन करो। या किसी अनुशासन वाले को पकड़ लो। फिर उसे छोड़ो मत, क्योंकि वह बहुत कठोर होगा। तुम सरलता से सुधरने वाले नहीं हो। इतने जटिल हो गए हो, अपने आप को इतना गिरा दिया है, कि सामने वाले को बहुत कठोरता लानी पड़ेगी। ऐसे नहीं बदलोगे। एक-एक रुपए का हिसाब रखकर जीने वाले हो, नियम और संयम की बात करने वाले हो। वही हिसाब-किताब तुम्हें गिरा रहा है। समझ नहीं पा रहे। आज जहां भी हो, अपने हिसाब-किताब से ही हो। उसी से निकलना पड़ेगा।
काश इतना हिसाब कल्याण में लगा लेती। हिसाब कहां लगाया। कामनाओं में, वासनाओं में, वैभव बढ़ाने में, घर-परिवार बढ़ाने में। हमेशा उसके लिए लगाया जिसे छोड़कर जाना है। काश ऐसा गणित जीवन में लातीं कि उद्धार हो जाता। वह गणित थी। यह पैसा और यह चमड़ा है। चमड़ी और दमड़ी कही गई है। इसका चक्कर छोड़ो। इसमें हेर-फेर बहुत करते हो। एक शरीर के चक्कर में और एक पैसे के चक्कर में बड़े माहिर हो। एक रुपया इधर-उधर नहीं होता।
पर होगा क्या। सोम का धन शैतान खा जाता है। एक रुपया इधर-उधर नहीं हो रहा, पर शैतान आएगा। जितना बचाया है, किसी के पास जाएगा, और ऐसे व्यक्ति के पास जाएगा जो उसे खत्म कर देगा। उस संचय से क्या मिला, कि कोई बर्बाद हो गया। यह होना ही है। इतिहास में जाकर देखो। बचाते-बचाते एक आता है, और जितना सार पड़ा है सब खा-पीकर खत्म कर देता है। जिसे तुम बचा रहे हो, आने वाले समय में एक व्यक्ति उससे बर्बाद होगा। एक परिवार बर्बाद होगा। इसलिए उसका सदुपयोग करो।
ताकत हो तो उसे संचित मत करो। गलत व्यक्ति के पास चली गई तो वह अपने आप को और अपने साथ जितने हैं सबको बर्बाद कर डालेगा। अपने सामने ही ताकत का उपयोग कर डालो। धन की ताकत हो या शरीर की। जीवन भर संचित किया तो कल्याण भी नहीं हुआ। ताकत थी, उसे संचित कर दिया। ताकत खर्च करते तब बढ़ना होता। तुमने ताकत को लाया। लाने में ताकत खर्च हुई, और तुम धीरे-धीरे कमजोर हो रहे हो।
यह मत समझना कि समझ बढ़ रही है। जिससे समझ बढ़ाने की कोशिश कर रहे हो, वही धीरे-धीरे कमजोर हो रहा है। एक दिन समझ रह जाएगी, कर कुछ नहीं पाओगे। जहां लगता है समझ विकसित हो रही है, वहां ताकत कम हो रही है। पांचों इंद्रियां धीरे-धीरे कमजोर हो रही हैं। समझ बढ़ रही है, यह मत समझना।
ताकत से ताकत लाई, और संचित कर दी, उपयोग नहीं किया, तो नीचे चले गए। ताकत खर्च हो गई, ताकत कहीं जमा हो गई। मिला क्या। निर्बल हो गए, कमजोर हो गए। ताकत लगाई, ताकत लाई, ताकत संचित कर दी। पास नहीं रही। अब वह ताकत किसी के पास जाएगी। वह अयोग्य रहा तो उस ताकत से अपना पतन करेगा, और जो उसके साथ हैं उनका भी। आखिर में तुम्हारी ताकत का फल किसी का पतन होगा। इसलिए जितनी ताकत है, उसका सदुपयोग अपने कल्याण के लिए कर दो। सबके पास अपनी ताकत है। सब अपने हिसाब से जुटा लेंगे।
कठोर बनो। संचित मत करो। संचय के चक्कर में मत पड़ो। खर्च करो। सत्कर्म में लगाओ। ताकत का सदुपयोग करो। जैसे देखते हो कि किस बैंक में डालने से पैसा जल्दी दूना होगा। कहां खर्च करूं, प्रॉपर्टी में लगाऊं। एक का दो हो, दो का चार हो, यह हिसाब करते हो। कभी यह देखो कि क्या करूं जिससे मेरा उद्धार हो जाए। यह शरीर जिसके लिए मिला है, वह काम इस जीवन में करूं। यह कभी किया। सौ-दो सौ का चंदा देकर पीछा छुड़ा लिया। पीछा मत छुड़ाओ। ताकत है तो सत्कर्म में लगाओ। देखो कहां लगाना है।
गुरु नानक जी से व्यापार नहीं बन पा रहा था। पिताजी ने कहा, जाओ व्यापार करो। साथ में एक साथी लगा दिया। पूछा, क्या करूं। कहा, कम में लेना और ज्यादा में बेच देना। माल ले लिया, खरीदने वाला नहीं मिला। रास्ते में संत मिल गए। कपड़े थे, बांट दिए। लौटे। पिताजी ने पूछा, माल। कहा, सब बेच दिया, बहुत अच्छे दाम में। धन कहां है। कहा, बेच दिया। इतने अच्छे दाम में बेचा कि वह दिखेगा नहीं। पिताजी बोले, तू निठल्ला का निठल्ला रह गया। क्या वह निठल्ले रह गए। आज भी दुनिया प्रणाम करती है। पिता की नजर में निठल्ले हुए, क्योंकि उनकी नजर धन, वैभव, कामना और वासना पर थी। आज हम उन्हें प्रणाम करते हैं। उनके बताए मार्ग पर चलते हैं। देश-विदेश में गुरु नानक जी के द्वारा लंगर चलता है, भंडारा चलता है। एक व्यक्ति ने ऐसा काम करके गया कि लाखों-करोड़ों लाभ ले रहे हैं, और करोड़ों का कल्याण हो रहा है। जीवन में ऐसा कुछ करके जाओ।
वैभव समेटना, प्रॉपर्टी खड़ी करना, फिर कोई पैदा होगा और सोम का धन शैतान खा जाएगा। शैतान आता ही है। शैतान वहां जाता है जहां माल होता है। जहां ज्यादा माल, वहीं शैतान। बड़े घरों में देखो, बच्चे क्या लेते हैं। ड्रग्स, अफीम, चरस, हीरोइन। शैतान वहीं पैदा होता है जहां माल दिखे। चोर चोरी वहीं करता है जहां माल हो। किसी निर्धन के यहां नहीं। घर में माल नहीं तो चोर चोरी नहीं करता। वैसे ही शैतान वहां पैदा होता है जहां वैभव हो, सुख-सुविधा हो। कोई महान पैदा हो जाए तो उस धन को छोड़ देता है। कितने राजा-महाराजा भिक्षुक हो गए। पैदा तो हुए, पर छोड़ दिया। कहा, इससे हटो, दूर हटो। तभी कुछ पाना हो सकता है।
अपनी ताकत का सदुपयोग अपने कल्याण के लिए करो। जिम्मेदारी भी निभाओ, और सदुपयोग भी करो। ताकत वहां लगाओ जहां से कल्याण हो। पैसा लगाते समय कितनी पूछताछ करते हो, कहां बढ़ेगा। कभी यह पूछताछ करो कि आत्मिक कल्याण जल्दी कैसे हो, ताकत कहां लगाऊं। एक जगह लगाओगे और ताकत बढ़ेगी, तो इस भवसागर से निकल पाओगे। यहां ताकत चाहिए। तुम ताकत से ताकत ला रहे हो, पर ताकत तुम तक पहुंच नहीं रही। संचित कर दे रहे हो। यही गलती हुई। ताकत खूब बढ़ी। नहीं बढ़ी, ऐसा नहीं। पर ताकत खर्च की, और ताकत को अपने तक आने नहीं दिया। किसी को दे दिया। आखिर में अपने आप को निर्बल पाओगे, असहाय पाओगे। क्या करूं बाबा, यह हाल होगा। जिसे ताकत दी, वह लौटाएगा नहीं। तो ताकत खर्च करो, ताकत लाओ, और सही जगह लगाओ, अगर कल्याण चाहते हो। धन की हो, तन की हो, समझ की हो।
एक दिन ताकत खत्म होने वाली है। यह मत समझना कि संचित कर ली तो रह जाएगी। ऐसे ही नाश हो जाएगा। बैटरी चार्ज करके रख दो, इस्तेमाल करो या ना करो, खत्म हो ही जाती है। ताकत को बचा नहीं सकते। कहीं ना कहीं खर्च होगी। लगता है कि बचा रहे हो। बचा ही नहीं सकते। ताकत रुकती नहीं। घूमती रहती है, कभी यहां कभी वहां। जब से समझने लायक हुए हो, ताकत को ही बचाना चाह रहे हो। यही गलती हुई। मुझसे यह गलती नहीं हुई। मैं सामने हूं। बचपन से यह गलती नहीं की। ताकत को समाज में, सत्कर्म में खर्च करता रहा।
घर का बगीचा रखवाने कोई भेजे, तो मैं कहता, तोड़ लो। घर वाले ना देखें, सब तोड़ डालो। अभी खाने वाले मौजूद हैं। वे लोग उधर हैं, उतना खा भी नहीं पाएंगे, बेचेंगे। और सामने खाने वाले खड़े हैं। तोड़ लो, पर घर वाले ना देखें। मुझसे डरने की जरूरत नहीं थी। डरते भी नहीं थे। मेरे सामने तोड़ लेते थे। मैं कहता, बस वे लोग ना देख लें। फल नहीं खाने देते अपने बगीचे का, तो राक्षस ही हुए। एक व्यक्ति खाना चाहता है, परमात्मा ने उसे बनाया है, और तुम कहते हो तोड़ना मत। ऐसी दुर्दशा होगी, सोच नहीं सकते। मैं कह देता, बच्चे आएं तो तोड़कर आइसक्रीम खिला देना। मुझसे डरने की जरूरत नहीं।
धन भी कमाता था, तो सब खर्च कर देता था। जहां रहूं, उन लोगों को दे दूं। सारा धन कहीं ना कहीं बांटने में ही कर दूं। मेरे ऊपर कर्ज ही रहता था। जितना कमाता, कर्ज में ही रहता। कमरे का भाड़ा अलग से नहीं देना पड़ता था, खुराकी भी नहीं देनी पड़ती थी। लाखों रुपए आते, तब भी कर्ज में ही था। मेरा लगाना बहुत ज्यादा था। लेने वाले बहुत थे। मेरे पास बहुत आते थे, और मैं देता रहता था। जरूरत पड़े तो ना नहीं कहता था। उनके लिए कर्ज ले लेता था। झेलता भी था। अभी भी भर रहा हूं। पर लगाया ऐसा कि आज मैं यहां हूं। ऐसी जगह लगाया। मेरे पास कुछ नहीं, पर मेरे पास मैं हूं। कर्ज से कभी मुक्त नहीं हो पाया। लगाना बहुत तगड़ा रहा।
ताकत कभी रुकती नहीं। तुम्हारी सबसे बड़ी गलती यह हुई कि ताकत को रोकना चाहा। लगाओ। ज्यादा से ज्यादा वहां लगाओ जहां वही पैसा लौटने की संभावना ना हो। ऐसी जगह लगाओ कि सामने वाला सुखी हो जाए, संपन्न हो जाए। इस भाव से कि उसके दुख-दर्द मिट जाएं। जरूरतमंद के पास लगा दो। देखो जरूरत कहां है। ताकत है तो खोजना है, कहां जरूरत है। ताकत को रखो मत। यही सबसे बड़ी गलती है। मैंने कभी सेविंग नहीं की। घर नहीं है, इसका डर कभी नहीं हुआ। एक ही बात लगी रहती थी। काम है तो घर है, भोजन है। काम मिलेगा तो दोनों मिलेंगे। बीमारी आएगी तो दवा भी आ जाएगी। बीमारी आ सकती है तो इलाज भी आएगा। ऐसी बीमारियां भी आ सकती हैं जिनका नाम तक नहीं सुना। इलाज के लिए अलग से क्यों सोचना। यह हमने कभी सोचा ही नहीं। बीमारी आएगी तो इलाज भी आएगा।
जिस पीड़ा से परेशान थी, उसका इलाज भी चलता रहा होगा। यह पीड़ा पहले नहीं थी, बैठने से उजागर हुई। किसी भी मुद्रा में देर तक बैठो, तो एक तरह से रोगी ही है। और लोग बैठ रहे हैं, तुम नहीं बैठ पा रही। इसका इलाज कभी कराया था। नहीं। अभी उजागर हुई है। दर्द की गोली कभी खाई थी। नहीं। इतनी तेज पहले हुई नहीं, क्योंकि इतनी देर बैठा नहीं जाता था। दर्द होने से पहले ही उठ जाती थी। मेरा कहना यही है कि रोग आएगा तो इलाज आएगा।
तुम लोग सारी व्यवस्था मत करो। पूरी जिंदगी की प्लानिंग बना लेते हो। और प्लानिंग अपने ही दायरे में होती है। अगर काम कर रहे हो तो सब मिलेगा। बस इतना पता होना चाहिए। काम कर रहा हूं तो सब मिलेगा। ताकत को सही जगह लगाओ। जरूरतमंद की सेवा में लगाओ। भूखे को भोजन, प्यासे को पानी। जिसके तन पर कपड़ा नहीं, जिसके पास दवा नहीं। जितनी सामर्थ्य हो, वहीं तक। वहां लगाओगे तो ताकत बढ़ेगी। रिटर्न भी आएगा। प्रकृति को जितना देते हो, कई गुना लौटाती है। अच्छा दो या बुरा दो, उससे उसे मतलब नहीं। कई गुना लौटता है।
सलाह यही है। ताकत सही जगह लगाओ। रोकने के चक्कर में मत पड़ो। नहीं तो तुम भी बर्बाद, और जिसके लिए रोक रहे हो वह भी। ताकत खर्च करके तुमने लाई है। उसकी वैल्यू तुम्हें पता है, उसे नहीं। इसलिए बाप मकान बनवाता है, बेटा गिरा देता है। कहता है नक्शा पसंद नहीं। बाप की जिंदगी लग गई उस घर में। बेटा नहीं गिराए तो नाती गिरा देगा। कहेगा डिजाइन पसंद नहीं, माहौल बदल गया, गिरा दो। जो ताकत तुम संचित कर रहे हो, उसकी वैल्यू तुम्हें पता है। मैंने जिंदगी लगा दी। उसने नहीं लगाई, जिसके लिए रखा है। वह नाश कर देगा, मौज ले लेगा। मेहनत से थोड़ी लाया है। ऐसे ही मिला है। योग्यता उसकी नहीं थी। यह तुम्हें पता है, उसे नहीं। इसलिए बच्चों को संस्कार दो। पढ़ाओ-लिखाओ, अच्छे संस्कार दो। पर ताकत को रोकने की कोशिश मत करो। उसे खर्च करो।
परेशानी का कारण तुम मत बनना। एक तो परेशानी है नहीं। दूसरा, इसी नियम में रहो। नियम में ही कल्याण होगा। नियम सर्वोपरि है। नियम में ही उद्धार छुपा है।
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