प्रश्नोत्तर P6-0020 · भाग 6
एक्ट नहीं करूं फिर भी याद/विचार आते हैं — क्या करें?
उसे छोड़ दो। उस पर एक्ट ही मत करो। बस बंद कर दो, धीरे-धीरे मानसिक भी बंद हो जाएगा। पहले शरीर से ही बंद करना पड़ेगा, क्योंकि शुरुआत शरीर से हुई है। जब शरीर से बंद कर दोगे, तो मानसिक भी बंद हो जाएगा। सब लोग सोचते हैं, मन को दोषी देकर मैं बच जाऊं, मैं निर्दोष हूं।
मन ऐसे नहीं करता है। कभी-कभी उसी समय जरूरत हुई, और आपने बहुत जमा किया है। चाहे शब्द हो, चाहे रस हो, चाहे गंध हो, चाहे दृश्य हो, चाहे स्पर्श हो। शब्द, दृश्य, गंध, रस, स्पर्श, ये जमा किया है। जब लगता है कि मुझे जरूरत है, तब सब याद आने लगता है। आपने जमा किया था, इसलिए जब जरूरत होती है तो याद आने लगता है। हमें ये देखना है कि अगर वो जरूरत शरीर की है, या आपके हित की है, तब तो उसे ग्रहण करो। और अगर उसमें आपका पतन हो रहा है, तो उसका त्याग करो। बस बात खत्म। साफ-सुथरी बात है।
मन ऐसे नहीं जाएगा। कहीं ना कहीं आपको जरूरत लग रही है, तभी मन जा रहा है। अभी भूख नहीं लगी है। मन को भोजन पर ले जाओ, जाएगा? जरूरत किसकी है? आप कह रहे हो कि वो ना शरीर की है, ना मन की। शरीर के द्वारा मजा लेने वाला कौन है? तुम ही हो। शरीर तो सिर्फ एक निमित्त है। शरीर के पीछे आप ही हो, तो जरूरत उसकी है। आपने अपनी जरूरत बना के रखी है। जब नहीं मिलता, तो आप बेचैन हो जाते हो। वो चाहिए आपको।
जब आप कहते हो जरूरत पर जीना, तो मतलब शारीरिक जरूरत पर जीना। शरीर को जितनी जरूरत हो, स्वाद की नहीं। शरीर की जरूरत में आप फसोगे कभी नहीं। जरूरत के बाद योग्यता है, और ईमानदारी से। ऐसे नहीं कि जरूरत की पूर्ति किसी का छीन के कर लूं। पूरी बात समझनी होगी। जरूरत, योग्यता, ईमानदारी, सत्कर्म, इतना लेकर चलना पड़ेगा। है तो दो ही लाइन, ईमानदारी और सत्कर्म। लेकिन इन दो लाइन को समझने में इतना बोलना पड़ेगा, क्योंकि दो लाइन के पीछे बहुत कुछ है। जैसे कहा गया, जन्म और मृत्यु। शब्द तो दो ही हैं, लेकिन इनके बीच में बहुत कुछ है।
किसी से पूछोगे, दुनिया का रहस्य क्या है, तो भैया एक रहस्य सामने है, जन्म और मृत्यु। बस खत्म। लेकिन इनके बीच में बहुत कुछ है। अब इनके बीच में जीना पड़ेगा। इनके बीच में फिक्स नहीं बोला जा सकता। फिक्स है जन्म और मृत्यु। या तो मृत्यु से निकल जाओ। ना जन्म, ना मृत्यु। लेकिन बीच में बहुत कुछ है। बीच में फिक्स थोड़ी ना बोला जाएगा। जैसा व्यक्ति आएगा, वैसा बोला जाएगा। अगर ये दो लाइन में ही समझ गए, तो इससे बात नहीं करनी है। बात करोगे तो आपका शब्द व्यर्थ जाएगा। आपका शब्द किसी काम का नहीं है, क्योंकि दो ही लाइन में वही कहा जा चुका है।
आप प्रश्न पूछ रहे हो। ये प्रश्न आप उलझाने के लिए पूछ रहे हो, या समझने के लिए? ये आप ही को पता है। और किसी को नहीं पता। समझने के लिए पूछ रहे हो, तो ईमानदार हो। उलझाने के लिए पूछ रहे हो, तो बेईमान हो। बस इतनी सी बात है। आप दर्शा ये रहे हो कि मैं समझने के लिए पूछ रहा हूं, सामने वाला आपको समझने के लिए बोल रहा है, और भाव ये है कि मैं उसे उलझाऊं, तो आप बेईमान हो।
अब देखना है, जिसके अंडर में मैं काम कर रहा हूं, उसकी स्थिति क्या है। मैं नहीं करूं तो उसको बहुत घाटा हो जाएगा, तो मानवता के नाते कर देना चाहिए। और अगर मेरी करने की स्थिति नहीं है, मेरे और भी काम हैं, तो अपना काम ईमानदारी से करके चला जाना है। लेकिन मानवता नहीं छोड़नी। जिसके द्वारा मुझे कुछ मिल रहा है, हो सकता है वो फंस गया हो। उसे मेरे सहयोग की जरूरत है, तो सहयोग करना चाहिए। लेकिन रोज अगर वो ऐसा करता है, जरूरत अगर आदत बन गई है, तो नहीं। शोषण नहीं करवाना है। ना करना है, ना करवाना है। ना शोषण करना है, ना शोषण करवाना है। ना अपमान करना है, ना अपमान करवाना है। सीधी सी बात है।
वो आपके ऊपर है। लेकिन मानवता नहीं खोनी। नहीं तो आपको भी किसी से मदद नहीं लेनी चाहिए। अगर आप किसी को मदद दे नहीं सकते, तो किसी से मदद कभी लेना भी मत। आप अगर ओवरटाइम काम नहीं कर सकते, तो किसी से जिंदगी में ओवरटाइम काम करवाना भी मत। और ये इतना आसान नहीं है। मुश्किल है। इसलिए मानवता कभी मत छोड़ना। नहीं तो दानव बनने में देर नहीं लगेगी।
देखना यह है कि उस झूठ से तुम तो बच गए, लेकिन किसी का अहित तो नहीं हुआ। तब तो तुम्हारा होना ही ठीक था। उस झूठ से एक बच जाए, लेकिन किसी का अहित भी ना हो, तो झूठ झूठ नहीं। लेकिन एक को बचाने के लिए एक का अहित हो रहा है, तब ये झूठ नहीं बोलना चाहिए।
इसीलिए सत्संग सुनो, आपको बल देगा। और कैसे जीना है, जब ये याद रखोगे, तब सुनते रहोगे, जब जियोगे तो समझ में आएगा, इसका उपयोग कर पाओगे।
हर वक्त भाव चेक करते रहो। मैं जो कर रहा हूं, उसमें मेरा भाव क्या है? भाव ईमानदारी का हो। भाव कभी झूठा नहीं बनता। कर्म झूठा कर सकते हो, लोगों को दिखाने के लिए, लेकिन भाव झूठा नहीं बना सकते। कर्म के पहले और कर्म के बाद एक भाव बनता है, उसी से फल का निर्णय होता है। कर्म तो दिखाने के लिए कुछ भी कर दोगे। किस भाव से किया, वो आपको पता है, दूसरे को नहीं। आप ये मत समझना कि फल सिर्फ कर्म से तय होता है। पहला भाव और आखिरी भाव मायने रखता है। बीच के भाव का महत्व नहीं। काम के पहले और काम के बाद जो भाव है, उसी से परिणाम तय होता है।
जैसे किसी को एक गिलास पानी पिला रहे हो। भाव पूरा पिलाने का है, शुद्ध भाव से पानी ले जा रहे थे। रास्ते में कोई मिल गया, और बोल दिया कि वो दुष्ट व्यक्ति है। उसके शब्दों से भाव बदल गया। फिर भी पानी उससे पहुंचा दिया। बीच में बदला हुआ भाव मायने नहीं रखता। पानी पिलाने का ही परिणाम मिलेगा। बीच में देश, काल, स्थिति, परिस्थिति में अनेक लोग मिलते हैं, अनेक संशय पैदा होते हैं। जिनको हम पूजनीय मानते हैं, उनके बीच भी वो मायने नहीं रखता, क्योंकि देश, काल, स्थिति, परिस्थिति में उतार-चढ़ाव होता है। आखिरी में, काम के बाद, भाव आएगा कि मैंने कैसे किया। उसी से फल मिलेगा। शुरुआत में भाव और होगा। काम में अनेक लोग मिलेंगे, अनेक भ्रांतियां पैदा होंगी। आप अपने काम पर अड़े रहो। काम पूरा होने पर जो भाव है, वही मायने रखता है। बीच में भाव में उथल-पुथल होती है, क्योंकि हम अकेले नहीं हैं। मुझे अपना भाव पकड़े रहना है। किसी की भावनाओं में नहीं बहना। अपनी समझ को पकड़ के रखना है। बीच में बह गए, तो बात खत्म। आखिरी में जैसा भाव बनेगा, वैसा कर्म होगा, और जैसा कर्म होगा वैसा भाव बनेगा। पहला और लास्ट भाव मायने रखता है।
काम पहले होता है, या भाव पहले? कर्म के पहले भाव बनता है, और कर्म के बाद का भाव मायने रखता है। कभी शुरुआत अच्छे भाव से होती है, फिर कर्म बुरे भाव में चला जाता है, तो परिणाम आखिरी भाव से मिलेगा। किसी से बहुत अच्छे से मिले, शुरुआत का भाव अच्छा रहा, फिर उसके व्यवहार से उसके साथ बुरा बर्ताव करने लगे, तो फल आखिरी भाव का आएगा। पहला भाव खत्म हो गया।
इसी को समझना है। कर्म के पहले और कर्म के बाद जो भाव बनता है, उससे फल तय होता है। हर वक्त अपना भाव चेक करो, कि ये कर्म किस भाव से हो रहा है। उस भाव में मेरी उन्नति भी हो, और किसी का अहित ना हो। झूठ भी बोल रहे हो, तो किसी का अहित ना हो। किसी को बचाने के लिए झूठ बोला, और एक को तकलीफ हुई, तो उस झूठ का परिणाम भी भोगना पड़ेगा, क्योंकि एक दुखी हुआ। भाव में कर्म है, कर्म में भाव है। कर्म करते समय उतार-चढ़ाव आते हैं, और आखिरी भाव मायने रखता है। जिस भाव से किया, आखिरी भाव मायने रखता है। इसलिए कहा गया है कि भाव में ईश्वर का वास है। भाव तुमसे है। भाव का आधार बाहर है, और भाव तुम्हारी समझ से है। जैसा सामने वाले को समझा, वैसा उसके प्रति भाव पैदा हुआ। भाव बहुत मायने रखता है। कर्म के पहले, और कर्म के बाद।
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