प्रश्नोत्तर P6-0152 · भाग 6
प्रकृति में जो इंद्रियों द्वारा मिलता है, उसे क्या कहेंगे? क्या उसे भी रसपान कहेंगे? जो अकेले एकांत में प्रकृति से मिलता है, वह रसपान है या जरूरत? अघोरी साधना और श्मशान का क्या मतलब है?
प्रकृति में जो इंद्रियों द्वारा मिलता है, उसे भी रसपान नहीं कहेंगे यूँ ही। देखना यह है कि तुम जरूरत में जी रहे हो या जरूरत से ज्यादा में। जरूरत से ज्यादा में हो तो रसपान हो गया। प्रकृति में जरूरत से ज्यादा क्या होगा? बहुत सारी चीज प्रकृति में ही है। तुम कुछ भी प्रयोग करते हो, वह प्रकृति से ही है। वातावरण अच्छा है तो सुख की अनुभूति अपने आप होगी। वह अपने आप हो रहा है, या तुम व्यवस्था बनाकर ले रहे हो? बिना व्यवस्था बनाए जो हो, वह अलग है। व्यवस्था बनाकर लेना, वह देखना है।
जैसे पेड़ पर फल लगा है। उस फल पर तुम्हारा अधिकार है क्या? तुमने उस पेड़ में कभी पानी दिया है? नहीं दिया, तो इंतजार करो। गिरे तो खा लेना। तोड़ो मत। सच में उस वृक्ष को कभी सींचा नहीं, तो गिरने दो। या उसका मालिक वहाँ है तो उससे बोलो, भूख लगी हो तो। नहीं तो इंतजार करो। जब जीवन और मृत्यु की बात आ जाए, कोई उपाय न रहे, तोड़ने के अलावा चारा न रहे, गिर भी नहीं रहा हो, तब अपनी आत्मरक्षा में तोड़ सकते हो। तब दोष नहीं। जैसे संविधान में है, अपनी आत्मरक्षा में किसी को मार भी दो तो हत्या का दोष नहीं लगेगा। कब? जब उसने प्रहार किया हो और तुमने अपने को बचाने के लिए प्रहार किया हो। जाँच होगी। ऐसे ही बोलने से नहीं। वैसे ही भूख इतनी लग जाए कि जीवन और मृत्यु की बात हो, तब तोड़ सकते हो। नहीं तो इंतजार करो गिरने का। पेड़ नहीं सींचा तो अधिकार नहीं। गिर गया, भूख लगी है, वैसे ही वह जाने वाला है, तब अधिकार हो गया। कोई न कोई उसे खाएगा। तुम खाओ या कोई और। पहले जो मौजूद है, भूख है, वह खा ले।
ऐसे अघोरी की साधना होती है। पृथ्वी पर अब उसका उपयोग कोई नहीं कर रहा, उस समय तुम हो, तुम ग्रहण कर लो। गिरा हुआ। मारकर नहीं। शरीर है, उसमें जीवात्मा नहीं है, तो ग्रहण कर सकते हो। पता चला कि मारकर कर रहे हो, तो दोषी हो। इसे अघोर साधना कहते हैं। किसी से कुछ माँगना भी नहीं। अघोरी बनना सबसे कठिन है। अभी तो लोग माँगकर खा रहे हैं, काटकर खा रहे हैं। कोई अघोरी है तो पृथ्वी पर अब जो किसी के काम का नहीं रहा, उसे ग्रहण कर सकता है। बिना मरे को काट लेना अघोरी साधना नहीं। वह तो हत्या हुई। उसे अघोरी चौड़ी कह सकते हो। अघोर पंथ में अघोरी उसे कह सकते हैं, कि पृथ्वी पर अब उसका उपयोग करने वाला नहीं, उस समय वह मौजूद है, तो गिरे हुए फल, गिरी हुई वस्तु ग्रहण कर सकता है। कोई न कोई तो खाएगा। पहले जिसे भूख है वह खाएगा।
कोई जीवात्मा शरीर से निकल गई, तो वह शरीर कोई न कोई खाएगा ही। उसमें जीवात्मा तो है नहीं। तुम खाओ या कोई खाए। मिट्टी होने वाली है। घूम फिरकर पाँच तत्वों में विलीन हो जाएगा। जाने वाला है। तुम्हारी भूख मिटाकर जाए, हो सकता है जीवन जीने का निमित्त बन जाए। तुम नहीं खाओगे तो भी कोई न कोई खाएगा। सर्वप्रथम जो मौजूद है, वह ग्रहण कर सकता है। वही उसका अधिकारी है।
ज्यादातर बात श्मशान की करते हैं। श्मशान कहीं एक जगह नहीं। पूरी दुनिया श्मशान है। यहाँ तक तुम्हारा शरीर भी श्मशान है। तुम्हारे शरीर में कितने पैदा हो रहे हैं, कितने मर रहे हैं। तुम बैठे हो, लाखों जीव मर गए, और यही मिट्टी में मिल जाएँगे। जहाँ शरीर का नाश किया जाए उसी को श्मशान कहते हैं। पूरी दुनिया श्मशान है। जहाँ भी मिले, वहीं समझो।
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