प्रश्नोत्तर P6-0080 · भाग 6
अनुकूल परिस्थितियों के बाद जब विपरीत परिस्थितियां आएं, तो साधक को क्या करना चाहिए? परीक्षा कब और कैसे होती है? भवसागर से निकलने का भाव बना लेने के बाद प्रकृति क्या करती है?
आप अपने आप में बनी रहिए। बस अनेक तरह के दृश्य आएंगे, और भी बहुत सारी चीजें आएंगी। हो सकता है अभी आपके अनुकूल है, बाद में विरोध में खड़ी हो जाए। लेकिन मुझे दोनों में नहीं जाना है। अगर मैं अच्छे में नहीं गया, तो मुझे बुरे में भी नहीं जाना है। मुझसे क्या मतलब। अभी तो आपके अनुकूल परिस्थितियां हैं। कभी विपरीत परिस्थितियां होंगी। विपरीत में भी आपको वैसे ही बने रहना है, अपने आप में स्थिर। और तभी पता चलेगा, जब विपरीत परिस्थितियां पैदा होंगी। परीक्षा उसी समय होगी। अनुकूल में तो सब सज्जन दिखते हैं। अनुकूल परिस्थितियों में व्यक्ति एकदम सज्जन है। विपरीत परिस्थितियों में पता चलता है कि आप अपने आप में स्थिर हो या नहीं। फिर तो विपरीत परिस्थितियां भी आएंगी।
मैं इसका भुक्तभोगी हूं। मैं कहीं भी किनारे सोया रहूं, तो लोग बेमतलब कहकर उठा देते हैं। पहले तो यार, इससे झगड़ा ही कर लो। न इसका स्थान है, न कुछ है। एकदम किनारे, घाट पर जाकर कहीं पड़े रहो, वहां से भी आकर उठा दे। क्या सोया है? बोले, यार इससे क्या मतलब है? न इसका घर है, न द्वार है। लेकिन मतलब है कुछ। तो मैं उसको देखता था, फिर धीरे से निकल जाता था। इससे क्या बोलूं? क्योंकि मैं कहीं जा रहा हूं। न इसका दरवाजा है, न इसकी जमीन है, इसका कुछ नहीं है। फिर भी बोल रहा है। तो इसका मतलब इसको उलझना है। लेकिन मुझे सुलझना है। इसको तो उलझना है। अगर कुछ होता, बोलता, तो समझ में भी आता कि बात सही कह रहा है। इसके दरवाजे पर सोए हो, क्यों सोए हो? नर्मदा तट पर एकदम किनारे सोए हो, और वहां से कहे, यहां क्या सोया है, चलो हटो। इतने दिन हो गए और तुम अभी तक सोए हो। उसे उलझना है, लेकिन मुझे सुलझना है। तुम धीरे से निकल लो। यह उलझा देगा। यह उलझाने के लिए आया है। उस समय परखने की शक्ति होनी चाहिए, सामने वाला क्या चाहता है। जब उसका कुछ नहीं है, फिर भी बोल रहा है, तो बस उलझना चाहता है। अपने खेल में आपको भागीदार बनाना चाह रहा है। झगड़ा करना चाहता है। अगर रास्ता होता, कुछ ऐसी बात होती, तो मुझे भी समझ में आता कि सही बोल रहा है। लेकिन वह न सही है न गलत। उलझना चाह रहा है। लेकिन मुझे नहीं उलझना है। मैं अपना चला जाता था।
विपरीत परिस्थितियों में आपकी स्थिति का पता चलता है। अनुकूल में नहीं। अभी तो आपके अनुकूल परिस्थितियां बन रही हैं। कभी विपरीत भी बनेंगी। उस समय सहनशक्ति होनी चाहिए, सामना करने की। फिर अपनी मंजिल का पता चलता है। समय मत गवाओ।
रात भर जागने के बाद नींद भी नहीं आ रही। ठंड के महीने में सारी रात जागा, सारी रात सत्संग चला। तड़के चार बजे उठा, तो सोने वाला तो सब सोचेगा। लेकिन मैं रात भर जागूं, सुबह जब सूर्य उदय होने लगे, धूप लगे, तब नींद आए। और उसी के बाद कोई आकर जगाए। इतना भी जंगल में नहीं जा सकता था, क्योंकि शरीर की भी रक्षा करनी है। जंगल भी था, लेकिन जा नहीं सकता था। वहां जाऊं तो जानवर मारे, यहां हूं तो इंसान मार रहा है। इन दोनों के बीच से निकलना है। जंगल में भी नहीं जा सकते, जानवर मार देगा। और घाट पर सो रहे हैं, तो इंसान मार रहा है कि क्या सोया है तू, दोपहर हो गई। उसका कोई लेना-देना नहीं। न उसकी जमीन है, न उसकी कोई दुकान। उससे कोई मतलब ही नहीं। तो ऐसे लोग भी मिलेंगे। बहुत परिस्थितियां बनती हैं। विपरीत परिस्थितियों में अगर आप स्थिर हो, तभी आपकी स्थिति का पता चलता है। अनुकूल में नहीं। विपरीत परिस्थितियों में आप वैसे बने रहो। और आएंगी विपरीत परिस्थितियां। ऐसा नहीं है, आएंगी।
एक घटना बताई थी। एक महात्मा जी ने मार दिया था। उस समय हमारा आखिरी समय चल रहा था। लगभग दिसंबर का महीना था, दो हजार उन्नीस। बड़ी परीक्षाएं होती हैं। हम अंदर सोए थे। हम दो लोग और थे। एक जन ने मुझसे कहा, बाहर परमात्मा की, ब्रह्म की चर्चा चल रही है, चलो देखते-सुनते हैं। मैंने कहा, चलो। मैंने कहा, मैं जाकर देखूं, सच में चल रहा है कि नहीं। पहले जांच तो लूं। मैं गया। डंडी स्वामी थे, लगभग पचास के ऊपर, साठ वर्ष के करीब, बुजुर्ग थे। कुर्सी पर बैठे थे। फटे-पुराने कपड़े, बिखरे बाल। मैंने कहा, महाराज जी, नर्मदे हर। वे ऐसे रहे, दो लोग बात कर रहे थे। फिर मैंने दोहरा दिया। साथ वाले ने कहा, देख ही लेते हैं। मैंने कहा, बैठकर बहुत गवाया। ग्यारह से निकला हूं, उन्नीस तक बैठा ही तो रहा हूं। ऐसे लोगों के पास तो देखूं, ब्रह्म की चर्चा हो भी रही है या कुछ और हो रही है। मैंने कहा, महाराज जी, नर्मदे हर। तब दूसरी बार उठे, और मेरे सीने पर जोर से मारे। इतने तेज मारे कि मैं बहुत दूर गया। एक बार मारा, फिर दो बार मारा। तीसरे बार सबने पकड़ा। और मैंने भी कहा, बुढ़ापे में हड्डियां नहीं जुड़तीं। मैंने अपने क्रोध को देखा। अभी भी मुझे उनसे द्वेष नहीं है। उस समय भी नहीं था। लेकिन जब दो-दो बार मारे, और कई महीने तक मेरा सीना दर्द रहा, इतना तेज मारे थे, तो मैंने कहा, बुढ़ापे में हड्डियां नहीं जुड़तीं। फिर मैंने क्रोध को देखा। हर तरह से मैं ताकतवर था, क्योंकि वे अकेले थे, हम तीन थे। और शरीर के बल में भी ताकतवर था। मैंने उस क्रोध को देखा। बहुत देर तक चिंतन किया। कहा, मुझे इससे निकलना है। जबान तक तो आ गया, लेकिन शरीर से प्रतिक्रिया नहीं दी। उन्हें रोकने की भी शरीर से कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। लेकिन आ गया। फिर मैंने उसे देखा। जब हटा, तो बहुत सारी बातें होती हैं। यह आखिरी समय मेरा था। विरोध करने वालों का, मेरे समझ से, वह आखिरी समय था। लेकिन उसके लिए दो बार मार खाया, बिना मतलब। कुछ नहीं किया था। नर्मदे हर तो बोल रहा था। मैं अपनी क्षमता से ही बोलूंगा न। वे यह भी बोल सकते थे, बैठो। वे डंडी स्वामी थे। डंडा उठाकर चल ही रहे हैं। टेस्ट उनका भी हो रहा था, मेरा भी हो रहा था। दोनों का हो रहा था। मेरे द्वारा उनका, उनके द्वारा मेरा। ऐसे ही तो प्रकृति करवाती है। मैंने यह भाव नहीं बनाया था कि उस आश्रम में जाऊंगा, ऐसा करूंगा। परिस्थिति वैसे निर्मित हो जाती है। उस टेस्ट में मैंने मार भी खाई। लेकिन मैंने शरीर से कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। जबान तक आया। एक इंद्रिय का प्रयोग तो हुआ। बहुत सारी स्थितियां ऐसी बनेंगी। व्यक्ति के द्वारा भी होती हैं, और परिस्थिति के अनुसार। जानवर के द्वारा भी हो सकती है। प्रकृति के द्वारा भी। भिन्न-भिन्न रूप को ही हम प्रकृति मानते हैं। प्राकृतिक आपदाएं जो आती हैं, वे किसी रूप में ही आती हैं। हमारे हाथ में नहीं होतीं। उनके द्वारा भी परिस्थितियां बनती हैं। जैसे-जैसे आप चलोगे, परीक्षा उनके द्वारा भी ली जाती है।
परीक्षा हमेशा स्कूल लेता है। परीक्षा आप थोड़ी लोगे। अगर आप कुछ पार करोगे, तभी परीक्षा होती है। टेस्ट होता है, हम कहां पहुंचे हुए हैं। आपकी परीक्षा प्रकृति तब लेगी जब आप चलोगे। जब आप स्कूल में पढ़ोगे, तो आपकी परीक्षा स्कूल लेगा। किस तरीके से लेगा, वह स्कूल तय करेगा। आप तय नहीं करोगे। लेकिन जो बच्चे स्कूल के बाहर हैं, उनकी परीक्षा नहीं होगी। ईमानदारी और सत्कर्म पर चलने वाले की, जब आप कहोगे कि अब मुझे कुछ नहीं चाहिए, अब मैं मूल स्थिति में जाना चाहता हूं, उसी क्षण से आपका एडमिशन हो गया। निकलने वालों में। बंधन में फंसने वालों की परीक्षा नहीं होती। जो बच्चे स्कूल के बाहर हैं, उनकी परीक्षा होती है क्या? लेकिन जिन्होंने पढ़ाई में एडमिशन ले लिया, उनकी परीक्षा होती है। तो प्रकृति आपकी तब परीक्षा लेगी जब आप कहोगे, अब मुझे इस भवसागर से निकलना है। तब समझ लीजिए, वहीं से आपका एडमिशन हो गया। आपने अपना नाम दर्ज करा लिया निकलने वालों में। अब आपकी परीक्षा होने लगी। अब आपके विपरीत परिस्थितियां बनेंगी। आप सोच भी नहीं सकते कि ऐसा भी मेरे जीवन में हो सकता है। वैसा होगा। बालक थोड़ी सोच सकता है कि कैसा प्रश्न आएगा। उसकी सोच से परे ही आएगा।
जब आप निकलने का भाव बना लोगे कि बस अब मुझे निकलना है, अब मैं निर्विकार होना चाहता हूं, राग, द्वेष, मोह, आसक्ति, इच्छा, अपेक्षा और कर्ता के भाव से मुक्त होना चाहता हूं, मैं बेईमानी नहीं करूंगा, समझ लीजिए आपका एडमिशन हो गया। आपका नाम दर्ज हो गया निकलने वालों में। अब वह परीक्षा कब लेगा, पता नहीं। तिमाही लेगा, छमाही लेगा, सालाना लेगा। कब, कहां, किस स्थिति में लेगा, कुछ बोल ही नहीं सकते। और तभी आपकी स्थिति का पता चलेगा। अगर कोई पहले से कहे कि मैं तुम्हें एक झापड़ मारूंगा, गुस्सा मत करना, यह तुम्हारी परीक्षा है, तो तुम गुस्सा नहीं करोगे, क्योंकि बोल चुका है। अगर बताकर परीक्षा हो, तब तो पास ही कर लोगे। परीक्षा तब होगी जब आपको पता ही नहीं रहेगा। अचानक आएगी। अचानक में ही पता चलता है आपकी स्थिति का। बताकर हो, तो नहीं। कोई कहे, मैं आपका अपमान करूंगा, लेकिन आप कुछ जवाब मत देना। प्लानिंग करके थोड़ी अपमान होगा। अंदर से कोई प्रतिक्रिया ही नहीं उठेगी, शारीरिक भी नहीं, मानसिक भी नहीं, क्योंकि प्लानिंग कर चुके हो। परीक्षा अचानक होती है। आप सोच भी नहीं सकते।
एक भाग तो यही खेड़ी घाट है, ओंकारेश्वर के पहले। हम गए, एक महाराज जी मिल गए। बोले, यहीं रुक जाओ। मैंने कहा, मुझे एक ऐसी जगह चाहिए, एकांत, जहां मैं साधना कर सकूं, क्योंकि मेरे पास अब रहने की जगह नहीं होगी। उन्होंने कहा, मेरे पास एक जगह है, तुम बैठो। बातचीत हुई, शाम हुई। जब रात हुई, तो कह रहे हैं, एक काम करो, अब जाओ। मैंने कहा, यार, दिन में ही बोल देते। सुबह तक भी मौका नहीं दिया। रात हो गई, अब जाओ। अब भरोसा नहीं है तुम पर। तो यह बात सुबह कह देते, या दिन में कहते। अब मैं कहां जाऊं, किधर जाऊं। लेकिन गया।
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वीडियो: रविवार प्रश्नोत्तरी 31 मई 2026 #योगी · 2026-05-31