वकील दीदी तुमसे बात करने नहीं आई हैं। कभी माई अच्छी लगती थी, कभी चाची अच्छी लगती थी — तो वकील दीदी के पास इतनी फुर्सत नहीं कि तुमसे बात करें। वकील दीदी अपने आत्मिक उद्धार, आत्मिक कल्याण के लिए आई हैं; उन्हें अपना कल्याण करने दो। अब वे ‘दीदी’ बनकर नहीं जिएंगी, आत्मज्ञानी, ब्रह्मज्ञानी बनेंगी। जहां वे दीदी थीं, वह छोड़कर आई हैं। और तुम जिसे-जिसे दीदी बनाती हो, उसका परिणाम क्या होता है? ज्यादा दीदी मत बनाओ; जगह-जगह दीदी बनाकर हालत खराब कर ली है। अपना उद्धार कर लो। ज्यादा दीदी के चक्कर में मत पड़ो, अपने चक्कर में पड़ो।
ठीक है — ईमानदार होना चाहिए, बेईमान नहीं होना चाहिए, इच्छा-अपेक्षा नहीं होनी चाहिए, चोरी-पाखंड नहीं होना चाहिए; कहने का मतलब, मानवता चाहिए। बस, बात खत्म।
अगर (आपके हिसाब से) परम सत्ता है ही नहीं, तो सबूत कहां से? सबूत मांग रहे हो, इसका मतलब आपको भी परम सत्ता पर शक है कि हो भी सकती है, नहीं भी। अगर नहीं है, तो सबूत की मांग क्यों? खत्म करो। अगर कोई कह रहा है परम सत्ता है, तो आपके लिए वह पागल है, मूर्ख है — हो सकता है; लेकिन आप सबूत मांगकर मूर्ख क्यों बन रहे हो? इस पर चिंतन करना। पक्का होता कि नहीं है, तो सबूत नहीं मांगते, क्योंकि जो नहीं है उसका सबूत हो ही नहीं सकता। सबूत की मांग है, इसका मतलब कहीं न कहीं आप भी भ्रमित हो, संशय में जी रहे हो। तो एक तरफ हो जाओ।
गलत दिख जाए तो तुरंत नजर हटा लो; कानों से गलत सुनाई दे तो दूर हट जाओ। मतलब दिखने के बाद देखो मत। दिख जाना और देखना — दोनों में फर्क है। दिख गया तो स्वाभाविक हुआ, और अगर देख रहे हो तो कर्ता का भाव आ गया। दिख गया तो दिख गया।
अरे, तो जाकर मैप में देख लो ना। अब हम यहां यही बताने बैठे हैं कि दिल्ली से हरियाणा कितना है, तुम्हारे घर से रिश्तेदारी कितनी दूर है? मैप एक व्यवस्था है, उसका उपयोग कर लो; पूरी लोकेशन तो भेजी हुई है। कुछ भी पूछते रहते हो।
तो जमीन किसके लिए खरीदी है, यह बताओ? तुम्हारे जैसे लोगों के लिए, ताकि तुम जैसे अपनी बेवकूफी से निकल जाओ। लेकिन अभी भी बेवकूफी भरी बात कर रहे हो। जमीन मैंने अपने लिए नहीं खरीदी है; तुम्हारे जैसों के लिए खरीदी है कि अपनी बेवकूफी छोड़ दो।
मैंने परिक्रमा तो कभी नहीं की, जरूरत नहीं पड़ी, क्योंकि जब मैं नर्मदा तट पर गया, उसके कुछ ही महीनों बाद मुझे आत्मज्ञान हो गया; मेरी आखिरी खोज उसी जगह पर थी। नर्मदा तट पर (सन्) 19 से लेकर 24 तक मैंने भ्रमण ही किया।
सारा अनुभव किया है, कोई अनुभव बाकी नहीं है। अनुभव किया हूं, तभी तो आपको ज्ञान दे रहा हूं। जितना बोल रहा हूं, मैं उसमें जिया हूं; ऐसे ही नहीं बोलता। अनुभव से ही बोल रहा हूं।
मैंने कब कहा कि भजन करने से पाप कटता है? भोगने से कटता है। भजन का मतलब क्या समझते हो? भोगना पड़ता है। ईमानदारी और सत्कर्म से करोगे, तो कुछ कम हो जाता है, लेकिन भोगना पड़ता है। इसलिए करने से पहले सोचो कि मैं क्या कर रहा हूं।
अगर मेरे आशीर्वाद से हो जाता, तो मैं घंटों सत्संग नहीं सुनाता। आराम से लाइव में आता और कहता — गॉड ब्लेस यू, खुश रहो, मेरी तरफ से आशीर्वाद है, तुम्हारा अटैचमेंट खत्म। अगर ऐसा होता, तो यह बोलकर अब तक जाकर सो जाता, आराम करता; इतनी देर तक मुंह को थकाता नहीं। समझ में आ रही है बात? इतना बता रहा हूं, उसमें जियो।
गुस्से में ही पैदा हुआ हूं। जब से पैदा हुआ, तभी से गुस्से वाला हूं, और आखिरी तक गुस्से में ही जीना चाहता हूं; गुस्सा छोड़ना नहीं चाहता। मेरे रोम-रोम में गुस्सा है। अब नीम कड़वा है, तो आप कहोगे कि नीम का कड़वापन हटा दो — नहीं जा सकता। तो आप गुस्से वाला काम मत करो, गुस्सा नहीं आएगा। गुस्से वाला काम करोगे तो गुस्सा तो आएगा। आए हो किसी और काम के लिए, बता कुछ और रहे हो, कर कुछ और रहे हो — (ऐसा न करो) तो गुस्सा नहीं आएगा।
आ सकते हो, अभी भी आ सकते हो। एक हफ्ते बाद आना चाहो तो एक हफ्ते बाद आ जाओ, तब तक यह सब तैयार हो जाएगा। जैसी व्यवस्था है, वैसे में रहना पड़ेगा — हो सकता है बाहर आसन लगाकर सोना पड़े; शौचालय बन गया है। लेकिन इस व्यवस्था में जीना है; आकर मच्छरदानी मत मांगना कि गुरुदेव मच्छरदानी दे दो, गद्दा मंगा दो, तोशक मंगा दो। अगर आप इस जंगल में जीने लायक हो, तो आना। इसीलिए लाइव दिखाता हूं।
साक्षी भाव का मतलब होता है — मैं अपने कर्म को करते हुए देख रहा हूं कि मैं पूरी ईमानदारी से, निष्काम कर्म कर रहा हूं। कर्म ही पूजा है — यह मैं साक्षी भाव से देख रहा हूं, और इस कर्म से मेरा उद्धार हो जाएगा। यह साक्षी भाव है।
संगत का असर तब होता है, जब जिसकी आपने संगत की, वह पावरफुल है। जैसे गंगा जी का जल गटर में डाल दो — अगर गटर की मात्रा ज्यादा है, तो गंगा जी का जल गटर बन जाएगा, क्योंकि गटर में ताकत थी। गटर का एक बाल्टी पानी उठाकर गंगा जी में डाल दो, तो गंगामय हो जाएगा, क्योंकि गंगा के पानी की ताकत ज्यादा थी। तो आप जिसकी संगत कर रहे हो, अगर आप ताकतवर हो, तो वह आपके गुणों, आपके स्वभाव को धारण करने लगेगा; अगर वह ताकतवर है, तो आप उसके गुणों को धारण करने लगोगे। तो आप देखो कि संगत किसकी करते हो — बात यह है।
(उसके लिए अलग से) परमात्मा को जानने की कोई जरूरत नहीं है। मैं तो कह रहा हूं कि मेहनत करो, ईमानदारी और सत्कर्म के साथ जीवन जियो, जरूरतमंद की सेवा करो। बात खत्म।
हां, बचपन से बतानी चाहिए। बचपन में न बताई, तो जवानी में बताओ, जवानी में बना लो। अब बुढ़ापे का इंतजार मत करो, जब चलने की ताकत नहीं रहती। लोगों ने कहा है कि 60 साल के बाद आत्मिक कल्याण करेंगे — लोग मेरे पास आ रहे हैं, 60 साल में चलने की ताकत नहीं है, वे क्या आत्मिक कल्याण करेंगे? रोग निकालेंगे।
बस उम्मीद से मुक्त होने का प्रयास करिए — जो आपने दूसरों से उम्मीद बनाकर रखी है, उससे मुक्त हो जाओ। लेने का भाव छोड़कर देने का भाव बनाओ। बात खत्म। एक दिन उस परम स्थिति को उपलब्ध हो जाओगे।
हां (सहायक है), लेकिन देख लीजिए कि उसके पीछे कोई उम्मीद तो नहीं, मान की इच्छा तो नहीं। यह देख लेना कि मुझे बाहर से कुछ नहीं चाहिए; ऐसा न हो कि मैं अपना मान खड़ा कर रहा हूं। बहुत समझदारी से आगे बढ़ना।
दोनों की मैप लोकेशन मैंने भेजी है — एक मध्य प्रदेश में ‘आध्यात्मिक प्रत्यक्ष ज्ञान अपनों की कुटिया’, एक हरियाणा में। मैप में डालकर देख लो कि कौन कितनी दूर पड़ती है।
जितना जरूरत पूर्ति करने के बाद बचे। पहले तो जरूरत पूर्ति करें; बचे तो करें, और न बचे तो इंतजार करें, यह भाव रखें कि अभी नहीं कर पा रहा, आगे करूंगा, या कुछ बचाकर करें। कोई तय नहीं कि इतना करना है। आपकी भी जरूरतें हैं, आवश्यकताएं हैं; आपके ऊपर जिम्मेदारी, दायित्व, कर्तव्य है। एक व्यक्ति ने मुझे लिखा कि क्या मैं ब्याज पर कर्ज लेकर आपको दे दूं? मैंने कहा, कतई ऐसा कभी मत करना। आपके पास है तो सहयोग दो, नहीं तो कोई बात नहीं, जब होगा तब करना; लेकिन कर्ज लेकर मत भेजो। पहले अपनी सुविधा, अपनी जरूरत, अपने परिवार की जिम्मेदारी देखो; उसके बाद अपनी योग्यता के अनुसार और सामने वाले की जरूरत के अनुसार करो। हां, पीछा मत छुड़ाओ। जहां भी रहो, पूरी तरह रहो; जिसके साथ रहो, पूरी तरह रहो।
आ जाओ अपनों की कुटिया में, और बीड़ी अभी, आज से, इसी वक्त से छोड़ दो। अगर मुझे गुरु जी बोल रहे हो, तो अब देख लो कि गुरु जी से प्रेम है या बीड़ी से। नहीं तो आप ऐसे ही मुझे गुरु जी बोल रहे हो। अभी से त्याग करो। त्याग ही परम सुख है। तुरंत त्याग करो। अब देखो, आप किसको महत्व देते हो।
नवरात्रि पर एक संकल्प लें — ईमानदारी, सत्कर्म और सत्संग से मैं अपना उद्धार करूंगा। ईमानदार होना सबसे जरूरी है। अगर आप नवरात्रि को, किसी भी त्योहार, पूजा, भक्ति को मानते हैं, किसी इष्ट के सामने बैठते हैं, तो एक ही संकल्प लें कि मैं ईमानदारी से जीवन जिऊंगा; कुछ भी हो जाए, ईमानदारी नहीं छोडूंगा — चलने, उठने, बैठने, बोलने, लेन-देन में ईमानदार रहूंगा; ईमानदारी मेरा मूल स्वभाव है। फिर (एक दिन) ईमानदारी भी छूट जाएगी और मैं पहुंच जाऊंगा। तो ईमानदारी अपना लें और अपना कल्याण कर लें।
आप ईमानदारी से काम करवाइए। अगर आपके अधीन होकर भी नहीं कर रहे, तो सिद्ध कर दीजिए कि वे बेईमान हैं, और उन्हें उस पद से निकलवाने का प्रयास करिए। और अगर यह आपसे नहीं हो पाता, तो आप उस पद को छोड़ दीजिए; क्योंकि जिस पद को आपने लिया है, अगर उसकी काबिलियत नहीं है, तो उस पद का त्याग कर दीजिए। बात खत्म।
जंगल है तो जानवर हैं, सीधी सी बात है। और मुझे जंगली जानवरों ने आज तक कभी परेशान नहीं किया; मुझे समाज के जंगली जानवर बहुत परेशान करते हैं, लेकिन फिर भी मैं उनसे लड़कर अपना काम करता रहता हूं। समाज के जंगली लोग समाज के लोगों को बहुत परेशान करते हैं।
नहीं, सब सिस्टम नहीं करता। अगर सब सिस्टम करता, तो हमें प्रयास नहीं करना पड़ता। सिस्टम कभी दुख नहीं देता; दुख तब होता है जब हम सिस्टम के विपरीत कार्य करते हैं। इस बात को जरा अच्छे से समझ लो — सिस्टम न कभी घुटन देता है, न दुख; सिस्टम सिर्फ सिस्टम है। जब हम सिस्टम के विपरीत चलते हैं, तो उसका भुगतान करना पड़ता है — अशांति, दुख, व्याकुलता, बेचैनी, उदासी, तड़प, मायूसी सब झेलना पड़ता है।
सिर्फ सात्विक एनर्जी होती है; आप जिस तरीके से उपयोग करते हो, वह नेगेटिव या पॉजिटिव हो जाती है। जैसे दवा सिर्फ दवा है — एक गोली लो तो आराम होगा, 100 गोली खा लो तो क्या होगा? अब वह नेगेटिव बन गई। पहले पॉजिटिव थी, फिर नेगेटिव; लेकिन खाने से पहले वह सिर्फ दवा थी — न पॉजिटिव, न नेगेटिव।
देखिए, (पेड़-पौधे) सजीव हैं, लेकिन उनमें काम भाव नहीं है। पृथ्वी पर जितने भी जीव संबंध बनाकर बच्चे पैदा करते हैं, उन्हें नहीं खाना चाहिए। उन्हें बोल दीजिए कि जितने भी जीव संबंध बनाकर बच्चों को पैदा करते हैं, उन्हें नहीं खाना चाहिए; उनमें फीलिंग होती है, एहसास होता है।
नहीं, द्वेष नहीं हुआ, क्योंकि उसने ऐसा काम किया। द्वेष तो तब होता है जब हम उससे फ्री की कोई उम्मीद रखते और वह नहीं देता; योग्यता से ज्यादा कुछ मांगते, तब राग-द्वेष होता — दे तो राग, न दे तो द्वेष। ऐसा कुछ है ही नहीं; हमने कोई अनुचित मांग नहीं की, फ्री में कुछ नहीं चाहा, हमने तो उसका मूल्य दिया है। गलत वह है, तो राग-द्वेष नहीं होगा। और आप किसी से भी जुड़े हो, एक-दूसरे को समझते हो, तो आपके जीवन में कुछ होता है तो जितने लोग आपसे जुड़े हैं उन्हें दुख होता है; यह राग-द्वेष नहीं है।
यह जीवन है। यहां कुछ भी करोगे तो संघर्ष है, लड़ाई है, युद्ध है। अगर मैं सत्संग और भ्रमण ही करता रहता, कुछ नहीं करता, तो न किसी से लड़ना था, न झगड़ना। लेकिन जब काम कर रहा हूं, तो उस काम में अनेक तरह के लोग हैं, अनेक प्रवृत्तियां हैं — देव प्रवृत्ति, राक्षस प्रवृत्ति, मानव प्रवृत्ति — ये अपने-अपने स्वभाव से काम करेंगे। तो लड़ाई करनी पड़ती है, युद्ध करना पड़ता है, क्योंकि आपको कुछ करना है। सबका अपना-अपना दृष्टिकोण है, अपनी-अपनी मति है — किसी को सही करके अच्छा लगता है, किसी को गलत करके।
वे रख सकते हैं; मुझे नहीं रखनी है। इसका विशेष ध्यान देना है — मुझे निकलना है। कौन मुझसे उम्मीद रखता है? क्या मैंने उम्मीद का आश्वासन दिया है? (दिया है) तो मुझे पूरा करना पड़ेगा। अगर मैंने आश्वासन नहीं दिया, तो कोई भी मुझसे कोई भी उम्मीद रखे, क्या फर्क पड़ता है?
हां, सही कह रहे हो। लेकिन संसार का काम तुम एक दायरे में करते हो — वह दायित्व है, कर्तव्य है, जिम्मेदारी है। और आश्रम का काम तुम समाज के लिए करते हो — यह सत्कर्म हुआ। यही साधना है। आप कहीं भी हो, आश्रम में क्या सहयोग दे रहे हो — आर्थिक, शारीरिक और मानसिक — यही सेवा है, यही साधना है, इसी से मुक्ति है, इसी से कल्याण है। मैं खुद लगा हूं — क्या मैं दिन-रात नहीं लगा हूं, देखे नहीं हो? अभी भी ऐसे प्रश्न हैं, तो मुझसे क्या समझा?
मद मतलब अहंकार। अहंकार तब आता है जब आप किसी को नीचा दिखाना चाहते हो, किसी को जलील करना चाहते हो, खुद को बड़ा सिद्ध करने का प्रयास करते हो — तब मद, यानी अहंकार।
रोने-चिल्लाने से कुछ नहीं होगा; सोच-समझकर जीवन जियो। और अगर खुद पर शासन करना मुश्किल हो रहा है, तो यहां (कुटिया) आ जाओ। या तो खुद पर शासन करो, खुद नियम में जियो; या किसी ऐसे व्यक्ति के पास जाओ जो आप पर शासन कर सके। बस यह देखना कि शासन करने वाला आपके हित के लिए शासन कर रहा है या अहित के लिए, क्योंकि गुलाम बनाने वाला भी शासन करता है और ऊपर उठाने वाला भी। देखना कि शासन करने वाले का भाव क्या है — क्या वह आपको गुलामी से मुक्त कराना चाहता है, या एक जगह की गुलामी छुड़ाकर अपना गुलाम बनाना चाहता है।
‘क्या है’ से मुक्त हो जाओ — क्यों है, क्या है, लेकिन, किंतु, परंतु। राग, द्वेष, मोह, आसक्ति, इच्छा, अपेक्षा, ‘मेरा’, कर्ता — इनसे मुक्त होने के बाद पता चलेगा, सत्य का आभास होगा, तब आप सत्य महसूस कर पाओगे। पहले आप इससे निकलो — आप जहां हो, वहां से पहले हटो।
नहीं, आप समझो कि मैं क्या कह रहा हूं, किसके लिए बोल रहा हूं, मेरा भाव क्या है, और भाव के बाद जो शब्द निकलते हैं वे क्या हैं — क्या कह रहा हूं, किसलिए कह रहा हूं, उससे क्या होगा। जीवन मिला है, तो उसे सोच-समझकर जियो। जब भी आप कुछ करते हो, दो ही बातें होती हैं — हर क्षण या तो आपका स्तर उठता है या गिरता है; या तो आप गिरने की प्लानिंग कर रहे हो या उठने की। जैसे विचार बनाओगे, जैसी जानकारियां लोगे, जिसके साथ रहोगे, वैसा काम भी होने लगेगा। आप किसके साथ हो, यह मायने रखता है, क्योंकि जिसके साथ रहोगे उसका असर आपके जीवन पर होगा, आप चाहो या न चाहो। ठंडी जगह रहोगे तो शरीर ठंडा हो जाएगा, गर्म जगह रहोगे तो गर्म; ठंडी जगह रहकर सोचो कि शरीर गर्म हो जाए, तो संभव नहीं। कुछ व्यवस्था कर भी लो, तो वह कब तक टिकेगी? आना तो अकेले ही पड़ेगा; बाहर के आधार के सहारे कब तक खड़े रहोगे?
तो मेरा यही कहना है कि आप खुद उस स्थिति में पहुंचो। प्रत्यक्ष ज्ञान आपको यही सिखाता है कि अधीनता छोड़ो, गुलामी छोड़ो। आपने किसी समूह, किसी व्यक्ति की गुलामी कर ली है — उसे छोड़िए, अपने आप को निकालिए। समझिए कि आपका कर्म आपको कहां ले जाएगा। आपके जीवन पर आपका अधिकार है, और यह अधिकार इसलिए दिया गया है कि आप अपना कल्याण कर लो। यह मत कहना कि मेरा जीवन, मेरा अधिकार, मैं चाहे जो करूं — फिर ‘अब पछताए होत क्या, जब चिड़िया चुग गई खेत’। ऐसी जगह मत जीना जहां से आप गिर जाओ। यह शरीर मिला है, मौका मिला है — अपने आप को मुक्त करा लो; मौका हाथ से न जाए, क्योंकि एक दिन यह शरीर छीन लिया जाएगा, उसके पहले कुछ कर लो। आप जहां हो, जिसके साथ हो, उसका असर आप पर पड़ेगा; तो देखो कि वहां रहकर क्या कर रहे हो, और जिसके साथ हो उसका आपके जीवन में क्या महत्व है।
हां, दुख ही दुख है — अगर आपको उम्मीद है। वह दुख कहां है? उम्मीद में छिपा हुआ है। जैसे एक बीज में वृक्ष छिपा है, वैसे ही उम्मीद में दुख छिपा है। तो उम्मीद से अपने आप को मुक्त कराओ। उम्मीद ही दुख-सुख का कारण है — मेरे तरीके से उम्मीद पूरी हो गई तो सुख, नहीं हुई तो दुख।
ईमानदारी, सत्कर्म अपनाओ। निकलना है तो निकलने के लिए कुछ करना पड़ेगा; बस निकलने के भाव से नहीं निकल पाओगे, निकलने वाला काम भी करना पड़ेगा — ईमानदारी, सत्कर्म।
अभी यह प्रश्न आपसे ईश्वर थोड़ी पूछ रहा है? यही तो बात है — कर्ता तुमने अपने आप को मान रखा है। जब तक आपको अपने तरीके से चाहिए, तब तक कर्ता तुम ही हुए। यह कहना बड़ा आसान है कि मैं कर्ता नहीं हूं, तो मैं दुखी क्यों? जब तुम कर्ता नहीं हो, तो दुखी भी नहीं हो; फिर जो हो रहा है उसे देखो, फिर दुख-सुख कहां? फिर आपके जीवन में जैसा हो रहा है, उसे स्वीकार करो। दुख क्यों हो रहा है? क्योंकि आप कर्ता हो — आपके तरीके से नहीं हो रहा। जब आप कर्ता ही नहीं हो, तो जैसा हो रहा है उसे स्वीकार कर लेना चाहिए। अगर स्वीकार नहीं कर पा रहे, तो इसका मतलब आप कर्ता हो। सीधी सी बात है; बहुत सरल तरीके से समझ में भी आ जाएगी।
बहुत अच्छी बात है। बस इस तरीके से जियो कि जीने में ही आपका कल्याण हो जाए। जिंदगी ऐसी जियो कि जीने में ही मुक्ति मिल जाए, जीने में ही कल्याण हो जाए; मुक्ति के लिए कुछ अलग से करना ही न पड़े।
मलिनता वाला काम मत करो। विचार चाहे जैसे आ रहे हैं, उनसे क्या होने वाला है? विचारों से महल थोड़ी ना तैयार होगा; विचारों में महल बना दिया तो क्या महल तैयार हो जाएगा? विचारों में अपने आप को राजा बना दिया तो क्या राजा बन जाओगे? नहीं। आप कर्म पर ध्यान दो — आप क्या कर रहे हो, किस भाव से कर रहे हो, क्यों कर रहे हो, इसका परिणाम क्या है, करना उचित है या अनुचित। सोच-समझकर करो।
रह सकते हो — 12 महीने में एक महीना तो आकर अपनों की कुटिया में रहो। कभी भी आप लोग आओ, नियम पढ़कर आओ। 12 महीने होते हैं — 11 महीने अपने परिवार को दो, एक महीना अपने आप को दो।
ये सब बोलने की बातें हैं भाई। कोई कुछ कह रहा है — आप क्या कह रहे हो, आपकी स्थिति क्या है, वह देखो। वह क्या बोल रहा है, उससे आपके जीवन में कुछ थोड़ी ना होगा। यह देखो कि आपकी स्थिति कहां है।
मैं तो कह रहा हूं — कुछ भी करो। युवाओं के लिए मेरा यही संदेश है: कुछ भी करो, ईमानदारी से रहो, जरूरतमंद की सेवा करो, सत्संग सुनो और अपना कल्याण करो। यही संदेश है।
आप होलिका दहन में देखिए — एक बुराई का नाश हो जाता है और भक्त बच जाता है। यही है। तो हमें अपनी बुराई का नाश करना है, अपने बुरे काम छोड़ने हैं, पूरी तरह ईमानदारी अपनानी है; तब हमारे जीवन में होली का महत्व है।
उस होलिका दहन में दो लोग बैठते हैं — बुआ और प्रह्लाद। अंदर वाला, यानी गोद वाला, बच जाता है, और बाहर वाला जल जाता है। तो हमने बुराइयां बाहर से धारण की हैं; अगर देखा जाए, तो बुरे हम नहीं हैं — देश, काल, स्थिति-परिस्थिति में हमने उन्हें धारण किया है। तो उनका त्याग कर देना चाहिए; शेष बचेगा सत्य। बुराइयां तुरंत छोड़ देनी चाहिए, और जितनी बुराइयां हमने की हैं, उन्हें पश्चाताप की आग में जलाकर राख कर देना चाहिए। तब हमारे जीवन में होली का मतलब है।
नहीं, आपको समझना पड़ेगा कि जीवन में क्या हो रहा है, क्योंकि समझोगे तभी अपने आप को निकाल पाओगे; समझोगे नहीं तो निकाल नहीं पाओगे। आपके जीवन में क्या हो रहा है, यह आपको ही समझना है।
निराकार तो एक ही है। पर पहले देखिए, हमारे सामने साकार अनेक हैं। पहले इस साकार से मुक्त होकर निराकार में जाएं, तो वहां पता चल जाएगा। मेरा तो कहना है कि जिस जगह की बात कर रहे हो, उसके बारे में पूछने से अच्छा है कि उस जगह पहुंचा कैसे जाए, इसके लिए काम करो। कोई दूसरा बता रहा है कि एक है या दो, उससे अच्छा आप भी पहुंचकर देख लो — यह ज्यादा ठीक रहेगा।
ध्यान के लिए हमें धारणा बनानी है कि मुझे निर्विकार होना है — राग, द्वेष, मोह, आसक्ति, इच्छा, अपेक्षा, ‘मेरा’ और कर्ता के भाव से मुक्त होना है। यह धारणा पक्की बनानी है; इस पर ध्यान घटित होगा — धारणा, ध्यान, समाधि। और इस धारणा पर फिर काम करना पड़ेगा।
ईमानदारी अपना लेंगे, सत्कर्म करेंगे, सत्संग सुनेंगे, तो उसमें ध्यान स्वाभाविक होगा; आपको ध्यान अलग से नहीं करना पड़ेगा, अपने आप होगा। ध्यान हमेशा स्वाभाविक होता है, क्योंकि ध्यान ‘चाहिए’ में होता है। देखना यह है कि आपको क्या चाहिए।
बस इतना देखना है कि मैं क्या कर रहा हूं। लोग कर रहे हैं; जैसा कोई करेगा, वैसा उसे परिणाम मिलेगा। मेरा अधिकार कहां तक है — मेरे तक या उससे आगे? मेरे तक है, तो अपने आप को रोक लो; और अगर कहीं अधिकार मिला है, तो वहां भी काम करो। जैसा कोई करेगा, वैसा उसे भरना पड़ेगा। आप देखो कि आप क्या कर रहे हो।
जब कोई विचार आए और परेशान करे — चाहे राग में, चाहे द्वेष में; क्योंकि जब आप छोड़ना चाह रहे हो, तो परेशानी दोनों से है — तो देखिए कि राग हो रहा है तो क्यों हो रहा है, द्वेष हो रहा है तो क्यों। ‘क्यों’ आपको ले जाएगा — क्यों, क्यों, क्यों; क्या मुझे उससे कुछ चाहिए कि मुझे राग-द्वेष हो रहा है? तो आप आखिर में जाकर (जड़ पर) खड़े हो जाएंगे, और फिर सत्संग और ज्ञान के द्वारा वहां से अपने आप को छुड़ा पाओगे।
मुझे तो जीवन में इतना समझ में आया कि इस दुनिया में कुछ बन जाना संभव है या नहीं (पक्का नहीं), लेकिन आत्मज्ञान पक्का है, क्योंकि वह आपसे है। कुछ बनना किसी और के द्वारा है, तो और के द्वारा बना जा सकता है या नहीं, यह पक्का नहीं किया जा सकता; जो स्वयं के द्वारा है, वह तो पक्का ही है — उसमें तो संशय ही नहीं।
ठीक है, तुरंत नहीं त्याग सकते, पर त्यागने का प्रयास तो करो। जैसे कोई चीज हमें तुरंत याद नहीं होती, बार-बार याद करते हैं तो याद हो जाती है; वैसे ही बार-बार प्रयास करने पर एक समय ऐसा आएगा कि आप उसमें राग-द्वेष से मुक्त हो जाएंगे।
आत्मिक कल्याण के लिए आपको आत्मिक कल्याण के मार्ग पर चलना पड़ेगा। राग, द्वेष, मोह, आसक्ति, इच्छा, अपेक्षा, ‘मेरा’ और कर्ता के भाव से मैं कैसे मुक्त हो जाऊं — उसके लिए आपको काम करना पड़ेगा। तब जाकर आपका आत्म-कल्याण होगा।
इसलिए नहीं रह पाते कि आपको और कुछ चाहिए, और अपने तरीके से चाहिए। अगर योग्यता और जरूरत में चाहिए होता, तो आप जरूरत की पूर्ति करके वापस अपने आप में स्थिर हो जाते; पूर्ति करते वक्त भी स्थिर रहते। आप स्थिर नहीं हो पा रहे, इसका मतलब अपने तरीके से चाहिए और आपकी योग्यता नहीं है — कहीं न कहीं योग्यता से ज्यादा मांग है, और वह आपको परेशान कर रही है। तो अपनी क्षमता को बढ़ाएं।
वह आपके ऊपर है। होली का मतलब मैंने आपको बताया कि हमें अपनी बुराइयों का त्याग कर देना है, अपने जीवन में ईमानदारी, सत्कर्म, सत्संग अपना लेना है — तब हमारे जीवन में होली का (अर्थ) है।
कोई बात नहीं, दोनों एक साथ नहीं हो पाते। अगर जरूरत में सेवा कर रहे हो, तो ठीक है; और अगर मान के लिए सेवा कर रहे हो, तो कोई मतलब नहीं है। सेवा जरूरत में कर रहे हो या नहीं, यह देख लेना — जिसकी सेवा कर रहे हो, क्या उसे उसकी आवश्यकता, जरूरत भी है?
उसमें एक अनुभव हुआ ना — द्रष्टा अलग, (शरीर) अलग; अपने आप को मरा हुआ महसूस कर रहा था। (पर उससे) मानवता कैसे (खत्म हो गई)? कुछ और हो गया होगा। सामने आकर पूछोगे, तो अच्छा रहेगा।
‘आध्यात्मिक प्रत्यक्ष ज्ञान सत्संग’ चैनल पर पोस्ट में जाकर पता देख लीजिए, हर जगह पते डले हुए हैं; आप अपनों की कुटिया में आकर गुरु जी से मिल सकते हैं। नियम जरूर पढ़ लीजिएगा।
अगर आपको जरूरत लगे तो करना; नहीं तो दबाव में आकर किसी और का जीवन बर्बाद मत करना। अगर आपने दबाव में विवाह कर लिया और उसमें आपका भाव भी नहीं है, तो किसी की लाइफ बर्बाद हो जाएगी; उसका भी अपराध का दोष आपको लगेगा। ऐसी गलती न करना। अगर आपको करना है, निभाना है, उसके साथ जीना है, तो विवाह करना, नहीं तो मत करना; नहीं तो उसका परिणाम भी आपको भोगना पड़ेगा। इतना तो भोग नहीं पा रहे हो, अगर कर दिया तो उसका परिणाम कैसे भोगोगे? जीवन में सोच-समझकर आगे बढ़ना। दबाव-संकोच में आकर ऐसा कोई कार्य मत करना, क्योंकि दबाव-संकोच व्यक्ति को हमेशा गिराता है; हमेशा सूझबूझ के साथ आगे बढ़ना। बाकी आपकी मर्जी — आपका जीवन आपके हाथ में है, फैसला आपको करना है। अगर किसी के फोर्स में आकर किया, तो भोगना आपको पड़ेगा।
ऐसा कुछ नहीं, जैसे आज अभी आ गए। रविवार को 1 बजे आते हैं; समय रहता है तो आते हैं, कोई काम हो तो नहीं भी आ पाते, लेकिन जहां तक हो सकता है, आते हैं।
मेरे जीवन का अब एक ही उद्देश्य बचा है — इस समाज के लिए, इस संसार में, कि आप लोग सरल तरीके से अपना कल्याण कैसे कर पाएं। बस उसी के लिए हम हर वक्त लगे रहते हैं — शारीरिक, मानसिक हर तरीके से — कि अपनों की कुटिया में ऐसी व्यवस्था कर दूं कि अभी की पीढ़ी और आने वाली पीढ़ी बहुत सरलता से इस व्यवस्था का उपयोग करके अपना आत्मिक कल्याण कर पाए, और इसे और कैसे सरल कर दूं। यही मेरे जीवन का उद्देश्य बचा है।
वर्तमान में जीने के लिए तो ‘कुछ नहीं चाहिए’ में जाना पड़ेगा। वर्तमान में आप हो सकते हो; (पर) जैसे ही आपने जिया, वह भूत बन जाता है, (और चाहना) भविष्य। तो ‘कुछ नहीं चाहिए’ में आने का प्रयास करें, जरूरत में जीने का प्रयास करें।
मैंने कहा ना कि आपको विचारों के साथ (जड़ तक) जाना पड़ेगा। आपने एक जगह थोड़ी ताला मारा है — हर जगह कैद करके चाबी फेंक दी, नंबर वाले ताले भी लगा दिए; आपको गिनती ही नहीं है कि कितनी जगह ताला मारा है। लेकिन जब तक वह ताला आप खुद नहीं खोलोगे (तब तक नहीं खुलेगा), क्योंकि आप ही खोल सकते हो। और सारा बंधन मानसिक है — पहले शारीरिक प्रतिक्रिया की, फिर मानसिक बंधन हो गया। शरीर से तो भागकर हिमालय की कंदराओं में चले जाते हो, लेकिन मानसिक रूप से आपकी पूरी दुनिया आपके साथ ही है। इसीलिए कहा गया है — यथा पिंडे तथा ब्रह्मांडे; पूरी दुनिया आपके इसी में तो है। विचार भी आपसे हैं; जितना इकट्ठा किया, इकट्ठा करने वाले आप ही थे। तो आपकी दुनिया आप में ही है।
हां, अब आप चल रहे हो — क्या सच में लक्ष्य तक पहुंचने के लिए चल रहे हो, किसी को प्रभावित करने के लिए, अकड़ में, या किसी को नीचा दिखाने के लिए? जब अकड़ दिखाओगे, तो शरीर की बनावट अलग कर दोगे, सीना तान दोगे। तो यही देखना है कि मैं चल रहा हूं तो कहीं जा रहा हूं, या किसी को आकर्षित-प्रभावित कर रहा हूं — यह अपने को जांचना है। चाल में भी बहुत बेईमानियां हैं।
एक डर है सामने वाले का। आप खुद इस पर चिंतन करो — जब आप अपनी दुनिया में थे, तो सामने वाले को देखकर बदलने की क्या जरूरत है? जैसे कोई यात्रा कर रहा है; कुछ के पास टिकट है, कुछ के पास नहीं। टीटी आएगा तो डरेगा कौन? जिसके पास टिकट नहीं, उसे हर व्यक्ति टीटी जैसा लगेगा। तो जब हमारे अंदर बदलाव आ रहा है, इसका मतलब कहीं न कहीं हमारे अंदर कमी है।
जैसे एक अमीर आदमी लेटा हो और गरीब आदमी आ जाए, तो अमीर पर प्रभाव नहीं पड़ेगा, लेटा का लेटा रहेगा। लेकिन गरीब सोया हो और अमीर आ जाए, तो वह डर जाएगा — क्योंकि गरीब में वैभव की कमी है, वह कमी दिख गई। आप लेटे हो और चूहा या चिड़िया आए, तो डर नहीं लगेगा; पर शेर आ जाए, तो तुरंत अपना बचाव करोगे, क्योंकि शेर की ताकत ज्यादा है, आप उससे कमजोर हो। तो जब भी किसी का प्रभाव आप पर काम करे, किसी को देखकर चाल बदल जाए, तो समझ लेना कि आपके अंदर कोई कमी है।
देखो, मान लीजिए आपको राजा ही बनना है, तो किसी राजा का चित्र लगा दो — क्या राजा बन जाओगे? राजा बनने के लिए जो गुण होते हैं, वे गुण आपमें लाने पड़ेंगे, और उसके लिए काम करना पड़ेगा। आप जिससे प्रभावित हो रहे हो, देखो कि वह वहां कैसे है, उसमें क्या-क्या गुण हैं, और उन गुणों के लिए काम करना पड़ेगा; सिर्फ चित्र लगाने से कुछ नहीं होगा। कमजोर व्यक्ति चित्र लगा देता है; बुद्धिमान व्यक्ति एक बार देख लेता है, और जितनी देर चित्र देखने में लगाता, उतनी देर वह काम करता है जिससे वह व्यक्ति वहां तक पहुंचा। अगर आपका भाव है तो लगा दो, वह बात अलग है; चित्र कहीं न कहीं प्रेरणा का केंद्र तो है ही। लेकिन चित्र के ही चक्कर में मत पड़ जाओ। चित्र देखने से चरित्र नहीं बदलता।
वह माता क्या कर रही है, उसका आत्मिक चिंतन क्या हो रहा है — वह मायने रखता है। सिर्फ आंखों से देखने से होता, तो हर गर्भवती को राजा या महात्मा का ही चित्र दिखाया जाए और हर बच्चा राजा या महात्मा बन जाए — ऐसा नहीं होता। उस माता का कर्म क्या है, वह जीती कैसे है? क्योंकि जैसे जिएगी, जैसा करेगी, वैसे ही विचार आएंगे; चित्र वाला विचार तो (बाहर से) डाला हुआ है। वह मानसिक रूप से कहां केंद्रित है, किसमें जी रही है — मायने यह रखता है।
तो अगर हम किसी से प्रभावित हो रहे हैं और वैसा बनना है, तो उसके लिए वैसा काम करना पड़ेगा। चित्र एक प्रेरणा का केंद्र है, लेकिन चित्र में ही लिप्त नहीं होना है। दो व्यक्ति हों — एक ने राजा का चित्र लगा दिया और बस देखता रहा; दूसरे ने राजा के गुण समझे और उनके लिए पूरी मेहनत की। मौका मिलने पर राजा किसे चुना जाएगा? काम करने वाले को, क्योंकि गुण से वह राजा बना है, और गुण लाने के लिए काम करना पड़ता है। पानी या भोजन का चित्र देखने से प्यास-भूख नहीं मिटती; पेट भरने के लिए भोजन पकाना पड़ेगा। सीधी बात — मेहनत करनी पड़ेगी।
पहली बात तो, आप चाहते क्या हो — यह पक्का कर लो। जब यह पक्का हो जाए, तब (देखो) मैं वहां पहुंचूंगा कैसे, उसका मानचित्र (मैप) कहां है। पहले लक्ष्य; लक्ष्य बन गया, तो अब इस लक्ष्य तक पहुंचने के लिए मेरे पास क्या-क्या साधन होने चाहिए। उन साधनों की व्यवस्था करो, और चल दो। ऐसा न हो कि निहत्थे युद्ध के मैदान में कूद पड़े, तो मारे जाओगे।
हां, क्योंकि आप कहीं भी जाओगे, जाने में समय लगेगा, ताकत लगेगी। आपके पास गाड़ी है, जहां चाहो ले जाओ, लेकिन उसमें खर्च भी होगा — इसी में जीवन चला जाएगा। मैं उस पहले आदमी को जानकर भी क्या करूंगा? मैं किससे प्रभावित हुआ, यह देखना है; मुझे क्या करना है, मुझे क्या चाहिए — यह देखना है। अगर जान भी जाऊं कि यह किससे प्रभावित हुआ, वह किससे हुआ — उससे क्या होगा? उसका कोई निष्कर्ष नहीं है।
अगर वह प्रबल जिज्ञासु है और ईमानदार है, तो गलत जाएगा ही नहीं, जा ही नहीं सकता; क्योंकि एक से पूछने के बाद दूसरे से पूछेगा, सबकी बात मिलाएगा, ऐसे थोड़ी चल देगा। जैसे एक अमीर और एक गरीब सामान लेने जाएं — गरीब के पास पैसे नहीं, तो दुकानदार उसे नकली माल दे देगा; उसे पता भी है, फिर भी लेकर चला आएगा, क्योंकि उसकी मजबूरी थी। अमीर को नकली दोगे तो तुरंत झटक देगा, दुकानदार देने से डरेगा। कहने का मतलब — कोई भी अगर किसी के द्वारा भटकता है, तो वह भी वैसा ही है; किसी लालच में तो आया, कोई न कोई कमी उसकी वहां पूरी हो रही थी। अगर जिज्ञासु है और ईमानदार है, तो दुनिया की कोई ताकत उसे भटका नहीं सकती, क्योंकि उसे पता है कि वह किस लिए गया है; सामने वाला बोलेगा तो पता चल जाएगा कि यह कहां का रास्ता बता रहा है।
इसलिए मैं कहता हूं कि आप जिसके लिए गए हो, उसकी जानकारी आपको होनी चाहिए। जानकारी नहीं है, तो असली के पास भी पहुंच जाओगे, तो कुछ नहीं होगा। छह-सात साल के बच्चे की शादी करा दो तो क्या होगा? उसमें वह ऊर्जा जागृत ही नहीं हुई है। बीस साल का हो जाए, तब शादी का मतलब होगा। आपके अंदर ही नहीं है, तो बाहर का लेकर क्या करोगे? बिना लक्ष्य के चले हो, तो कुछ भी मिल जाए, चलेगा। लक्ष्य बनाकर भी चले हो पर खुद बेईमान हो, तो जो मिलेगा उससे काम चला लोगे — ‘अगले जन्म में लक्ष्य पर पहुंच लेंगे।’ आप एकदम जिज्ञासु हो, ईमानदार हो, तो आपके सामने ईमानदार ही टिकेगा।
प्रकृति में देखो — प्लस-प्लस, माइनस-माइनस (एक जैसे) जुड़ जाते हैं, पर विपरीत को जोड़ो तो बटन चालू करते ही ब्लास्ट हो जाएगा। भटकाने वाला और भटकने वाला, दोनों वैसे ही हैं; हम बाहर से एक पहलू देखकर कहते हैं कि इसने भटका दिया। अगर ईमानदार होगा, जिज्ञासु होगा, तो गुरु के पास ही टिकेगा; बेईमान होगा और (ईमानदार) गुरु मिल भी गया, तो क्रॉस हो जाएगा, वहां से चला जाएगा। प्रबल जिज्ञासु अगर किसी धोखे में एक दिन रुक भी गया, तो टिकेगा नहीं — प्यासा बिना प्यास बुझाए थोड़ी रुकेगा; और प्यास ही नहीं लगी, तो कहीं भी रुक जाएगा। यहां कोई किसी को भटका नहीं सकता, और न कोई किसी को उठा सकता। नशे के पदार्थ देखो — क्या दुकानदार बुला-बुलाकर देता है? लोग जानते हैं कि गलत है, परिवार अलग हो रहे हैं, फिर भी लाइन लगाते हैं। जिसकी जो जरूरत है, वह वहां पहुंच जाएगा।
तो हम जहां हैं, उसी के लायक हैं। जहां होना है, उसके लायक बनने की कोशिश करें, उसके लिए काम करें। घर में भी हर वस्तु उसके लायक जगह पर रखते हो — चप्पल की कीमत ज्यादा हो, चादर की कम, फिर भी चप्पल चप्पल की जगह ही रखोगे। हमें (अन्याय) ऐसा लगता है क्योंकि हम दोनों पहलू नहीं देख पाते; किसी को मारते हुए देखते हैं, पर वह क्यों मार रहा है, नहीं देखते। खोज में आज तक मैंने यही अनुभव किया कि कोई जहां है, जैसा भी है, उस लायक है, तभी वहां पड़ा है। आपने भी बहुत लोगों को निकालने, उनकी जिंदगी बदलने का प्रयास किया — क्या वे बदल पाए?
खोज में बहुत लोग मिले जो बस खोज की बातें करते हैं, उन्हें चाहिए कुछ और। एक जगह शिव मंदिर में एक बाबा मिले, बोले — आज तक मुझे कोई मार्ग बताने वाला नहीं मिला। मैंने कहा — अगर मिल जाए तो चलोगे? बोले — चलूंगा। मैंने मार्ग बताना शुरू किया और कहा — पक्का करना कि यह मार्ग पहुंचा देगा या नहीं; जब तक पक्का नहीं करोगे, मैं बताता रहूंगा, मेरे पास अनेक मार्ग हैं। उनकी समझ में आ गया। पूछा — बाबा, चलोगे? बोले — नहीं, चल तो नहीं पाऊंगा; मार्ग में कोई कमी नहीं है, पर मैं चलने के लायक ही नहीं हूं। मैंने कहा — चलो, इतना तो पता चल गया, नहीं तो यही कहते-कहते मर जाते कि कोई मार्ग बताने वाला नहीं मिला। जब तक बताने वाला नहीं मिलता, लगता है कि मैं तो पार हो जाऊंगा; पर जब मिल जाता है, तो ज्यादातर लोग छोड़कर भाग जाते हैं — मैदान में उतरने में दमखम लगता है।
यहां भी लोग आए, बोले — कुछ नहीं चाहिए, अब यहीं एकांत में रहेंगे। दूसरे दिन सुबह — मैं जाना चाहता हूं; यहां कोई कमी नहीं, पर अभी मुझमें कुछ कमी है, फिर आऊंगा। वह कमी है घूमने की, भटकने की; अभी शब्दों का रसपान करना है, मन भरा नहीं, बहुत कुछ कहना-सुनना है, इच्छाएं बाकी हैं। पहले दिन ऐसी त्याग की बातें करते हैं कि लगे इतने त्याग के बाद इन्हें परमात्मा क्यों नहीं मिलता; दूसरे दिन समझ में आता है कि ये त्याग की बातें करते हैं, त्याग का इन्हें पता ही नहीं है।
जैसी करनी, जैसा कर्म है, विधाता वैसा ही फल देगा। जब आपके कर्मों का परिणाम आता है, सजा मिलती है, तब पछताते हो — यार, यह मैंने क्या कर दिया। काश उसी समय, जब कर रहे थे, तभी संभल जाते। अब कोई बात नहीं, भोग लो। इसलिए सोच-समझकर काम करो; परिणाम आपके सामने आएगा, परिणाम से कोई बचा नहीं पाएगा। इसलिए पहले आप खुद अपने आप को स्वतंत्र करो — आपने खुद अपने आप को ही गुलाम बनाकर रखा है।
अपने आप को स्वतंत्र कराना चाहिए, विवश नहीं करना चाहिए। ज्यादातर देखने को मिलता है कि महिलाएं अपने आप को विवश कर लेती हैं। आपको अध्यात्म में खुलकर आना चाहिए। अगर आप जीवन में सब कुछ कर सकते हो, हर काम के लिए समय निकलता है, तो अपने लिए समय क्यों नहीं है? अगर अपने लिए समय नहीं निकाल पा रहे, तो आप गुलाम हो — फिर उस गुलामी को तोड़ दो। अगर परिवार में मुझे अपने लिए समय नहीं दिया जा रहा, हर जगह उपयोग किया जा रहा है, एक दायरे में रखा जा रहा है, तो मुझे वह दायरा तोड़ देना चाहिए। मेरा कहना यह है कि सारे काम छोड़कर, भोजन भी छोड़कर, आत्मिक कल्याण — भोजन से मेरा जीवन है, उससे भी आगे आत्मिक कल्याण।
रही बात मीरा की — आपने देखा, कितना विरोध हुआ; वैसे थोड़ी वह घर से निकल गईं, विष तक दिया गया उनको। तो अपनी गुलामी से मुक्त होने के लिए आपको मेहनत करनी पड़ेगी, निकलना पड़ेगा; सिर्फ बातों से बात नहीं बनेगी। इस दुनिया में कुछ पाना है, तो उस लायक बनना पड़ेगा। यहां बेबस, मजबूर, लाचार को कुछ मिलने वाला नहीं है — धक्के मिलेंगे।
उसके हाल पर उसे छोड़ दो, और तुम निकल लो — तुम तो अपना कर लो। ऐसा न हो कि वह नहीं समझ रहा और उसे समझाने में तुम्हारी जिंदगी चली जाए; आखिर में तुम्हारी जिंदगी भी गई, और दोनों एक ही जगह पहुंचोगे। अगर सालों से नहीं चल रही, तो इसका मतलब उसे चलना ही नहीं है। जिसे चलना है, वह चलेगा — एक बार में ही पकड़ लेगा।
मैं आपको घटना बताता हूं। मेरे ज्योतिष के गुरु जी थे; वे पहले कई बार आश्रम जा चुके थे। मैं पहली बार उनके साथ ऐसे ही गया, मुझे अच्छा लग गया और मैं संन्यासी हो गया। इसका मतलब मेरे अंदर कहीं न कहीं वह छिपा हुआ था, जो देखकर जागृत हो गया कि मुझे भी ऐसा जीवन चाहिए, क्योंकि इस जीवन में परमात्मा है, आनंद है; मुझे बचपन से फकीर बनने का बड़ा शौक था। वे अभी भी अपनी जगह ही हैं — ज्योतिष से कथावाचक बन गए।
मुझे अध्यात्म में एक व्यक्ति भी नहीं लाया; अध्यात्म का एक शब्द भी मुझे किसी ने नहीं बताया। इस मार्ग पर लाने वाला, इस लक्ष्य पर पहुंचाने वाला एक ही व्यक्ति है — वह मैं हूं। एक व्यक्ति ने भी मुझे पूरी तरह सपोर्ट नहीं किया; चाहे अध्यात्म के शब्द हों या जगह, सारी व्यवस्था मैंने की। मेरे अंदर वह था, और मैंने पूरा समय, पूरी ताकत इसी में लगा दी। इसलिए कह रहा हूं — अपना समय बर्बाद मत करो। एक-दो बार कह दो कि मुझे यह बात समझ में आई है, तुम्हें भी समझनी है तो पकड़ लो; बाकी तुम्हारी मर्जी, तुम्हारा जीवन तुम्हारे हाथ में। तीसरी बार मत कहो। (मैं भी) उसी घर में रहकर अध्यात्म की तरफ पूरी तरह बढ़ गया।
ऐसे खाली तो कोई नहीं बैठा। हां, उन्हें कुछ और समझना है, वे समझ रहे हैं, उसमें लगे पड़े हैं, वहां बिजी हैं। तो आप उन्हें परेशान न करें; उन्हें वह समझने दें।
अपनी समझ से — जब उसे यह समझ में आ जाएगा कि मैं जहां हूं, जिस राह पर चल रहा हूं, वहां कुछ नहीं है। (रसपान से अतृप्त होकर, ठोकरें खाकर) कोई पहली ठोकर में समझ जाए, कोई लाखों-करोड़ों ठोकरों में — यह उसी की डिमांड है कि वह कब समझना चाहता है। जब डिमांड होगी, तो (मार्ग दिखाने वाले) लोग मिलने लगेंगे; डिमांड के पहले मिल भी जाएं, तो लेकर क्या करेगा?
इसलिए कि जैसे अपराधी अपराध करता है तो सोचता है मैं बच जाऊंगा; लेकिन जब पकड़ा जाता है, तब पछताता है। जब तक मजा आता है, तब हाय-तौबा नहीं करते; तब तो उसमें घुसने की इतनी प्लानिंग करते हैं, और कुछ नजर नहीं आता। सजा के बाद पछताता है कि यह मैंने क्या कर दिया; अगर बच जाता, तो और नया, बड़ा कांड करता। तो हम खुद करते हैं, और जब उसमें तकलीफ मिलती है, तो हाय-तौबा भी मैं ही करता हूं; करने वाला भी मैं ही हूं, पूरी समझ से करता हूं। फिर यह कहना कि इसके कारण फंस गए — यह मेरी बेईमानी है। असल में आप पकड़े गए, भागने का कोई रास्ता नहीं, तो चिल्लाने लगे — बचाओ, मैं यहां से निकलना चाहता हूं।
वह जहां है, वही उसका असली चेहरा है। अपने कर्मों से वहां है, और वही वह चाहता था। अब अगर कहे कि अब नहीं चाह रहा, तो ठीक है; लेकिन जितना आपने उपयोग किया है, उसका बिल भी तो भरना पड़ेगा। आप होटल गए, थाली ऑर्डर की, खाने लगे; अब कह रहे हो मुझे नहीं खाना — तो मत खाओ, लेकिन जितना खाया, जो ऑर्डर किया, उसका बिल भरो। आप पहले उपयोग करते हो, और जब चुकाने की बारी आती है, तो निकलना चाहते हो।
तो अगर आपको लग रहा है कि उपयोग नहीं किया, तो निकल लो — तब तुम्हें कौन पकड़ लेगा? कह दो कि बचपन में शादी हो गई, मुझे समझ नहीं थी, अब मुझे नहीं करना — बस, बात खत्म। कानून भी है; हर जगह स्वतंत्रता है — नौकरी है तो इस्तीफा है, विवाह है तो तलाक है। मुझे कहां रहना है, कहां नहीं, यह मैं तय करूंगा। अगर मैं अपने आप को विवश, मजबूर बता रहा हूं, तो इसका मतलब मुझे वहीं रहना है; बस कोई कह दे कि हां, तुम मजबूर हो, बेचारे हो — मेरी पूरी आसक्ति और मोह वहीं है और ऊपर से सांत्वना चाहिए। ऐसा कुछ नहीं है; नहीं करना है, तो नहीं करना है। जो बेड़ियां खुद बांधी हैं, वे खुद ही तोड़नी पड़ेंगी, चाहे आज हाथ कांप रहे हों।
इसलिए मैं कहता हूं — चाहे पुरुष हो या महिला, अपने आत्मिक कल्याण के लिए घर में रहकर ईमानदारी, सत्कर्म के साथ जीवन जियो। और कम से कम पूरा एक महीना एकांतवास में जाओ — अगर जीवंत गुरु मिल जाए तो गुरु के सान्निध्य में, नहीं तो किसी ऐसे आश्रम में जो पूरी तरह आध्यात्मिक हो; पहले पूरा समझकर ऐसी जगह खोजनी है। एक महीना पूरा एकांत में, पत्थर की मूर्ति की तरह रहना है — एक भी शब्द व्यावहारिक बातचीत नहीं। कोई पूछे कहां से आए हो, तो जवाब एक ही — यही पता लगाने आया हूं; नहीं तो पत्थर की प्रतिमा बन जाओ। जब जरूरतमंद की, सत्कर्म की बात आए, तो वहां लग जाओ, फिर अपने आप में स्थिर हो जाओ।
साधना स्थान पर एक भी शब्द व्यावहारिक बोला, तो आप राग-द्वेष में फंसे। एक शब्द का जवाब दिया, तो दूसरा आएगा; उसका जवाब नहीं दोगे, तो वह व्यक्ति आपके प्रति द्वेष बांध लेगा — पहले जवाब में राग बांधा, दूसरे में द्वेष। जवाब देते रहोगे, तो रसपान करने लगोगे; आपके तरीके से बोला तो अच्छा लगेगा, नहीं तो बुरा — दो में से एक परिणाम आएगा, और तुम फंस गए। इसलिए अपने आप को बचाकर रखना है, पत्थर की प्रतिमा बन जाना है — अगर अपना कल्याण करना हो तो।
मैनेज क्या करना, कोई बात नहीं। अगर दुख होता भी, तो किससे कहें? उस दुख का जिम्मेदार कौन है — मैं ही हूं ना, या और कोई? लक्ष्य तुमने बनाया, लक्ष्य पर तुम चल रहे हो, तो उसके जिम्मेदार तुम ही हो, दोषी कौन है फिर? कोई दूसरा होता तो अफसोस भी होता, पछतावा भी होता कि इनकी बात न मानी होती तो आज कम से कम सही से पढ़ा तो रहता। सारी जिम्मेदारी मेरी थी; मैं जहां भी था, उसका जिम्मेदार सिर्फ मैं था, और कोई नहीं। इसलिए अफसोस भी नहीं होता था — अफसोस तो तब हो, जब कोई और जिम्मेदार हो। मेरे जीवन में न पीछे कोई था, न कोई और जिससे मैं कह सकूं।
एक बार मैं (मलाड) आश्रम गया था; वहां चार दिन कुछ नहीं खाया, पानी भी नहीं पिया। वहां गुरु जी भी थे, फिर भी किसी ने कुछ नहीं कहा; मैं रोता हुआ आश्रम छोड़कर चला गया। एक तड़प थी कि जीवन अज्ञान में न जाए। अफसोस, पछतावा कभी नहीं हुआ, क्योंकि सारी जिम्मेदारी मेरी थी। मैंने कहा ना, एक व्यक्ति भी मुझे इस मार्ग पर नहीं लाया — तो किससे कहूं? मैं जाऊं तो कोई रोकने वाला ही नहीं; वे तो जाने का ही इंतजार कर रहे थे। किसी से तब कहोगे जब कोई आपकी भावनाओं को समझने वाला हो; नाराज तब होगे जब कोई प्रेम करने वाला, मनाने वाला हो। कोई है ही नहीं, तो नाराज होकर मर भी जाओ, कौन पूछेगा? इस मार्ग पर लाने वाला, इसकी व्यवस्था करने वाला — जगह, भोजन, साधना की वस्तुएं, कहीं जाना — सब मुझे ही करना था; मर भी जाओ, तो पूरी जिम्मेदारी तुम्हारी।
लगभग 12-13 साल में ऐसी कई घटनाएं घटीं। एक बड़ी भयानक थी: मुंबई से फ्लाइट से गुवाहाटी गया, वहां कामाख्या में काम किया, फिर गुवाहाटी से चेन्नई की फ्लाइट पकड़ी। उतरा तो मेरे पास बहुत थोड़े रुपये थे। पैदल एयरपोर्ट से स्टेशन गया, फोन किया; उस समय फोन से पैसे भेजने की व्यवस्था बहुत कम थी, और अगले दिन रविवार पड़ गया। मैं तिरुपति बालाजी जा रहा था, वहां लोग हिंदी भी कम जानते थे। स्टेशन पर खड़ा था, एक व्यक्ति ने खाने के लिए ₹20 मांगे; जेब देखते हुए भी मैंने दे दिए। बाद में किसी ने कहा कि ये लोग बेवकूफ बनाते हैं — मैंने कहा, कोई बात नहीं, खाने के लिए ही तो मांगा। फिर बिना टिकट ट्रेन में बैठ गया; सामने लोग वड़ा-पाव, समोसा खाते रहे, भूख थी, आंखें देख रही थीं, नींद भी नहीं आ रही थी। स्टेशन से मंदिर 20 किलोमीटर से ऊपर था, पैदल चला। गणपति का समय था, एक जगह प्रसाद बंट रहा था; मांग तो सकते नहीं थे, पर प्रसाद तो खा सकते हैं — लाइन में लगा, मेरा नंबर आया तो उसने हटा दिया। एक व्यक्ति ने अपना प्रसाद मुझे दे दिया और उसे खूब डांटकर बिना प्रसाद लिए चला गया। वह प्रसाद खाकर, पानी पीते-पीते मंदिर तक गया, रात बिताई, दूसरे दिन पैसे आए तब कुछ खाया-पिया। ऐसे कई दिन-रात गए हैं; भूख क्या होती है, बिना बिस्तर कहीं भी सो जाना — बहुत समय ऐसे गया। मैं सारी व्यवस्था कर सकता था, लेकिन उसमें लगता तो यहां तक नहीं पहुंचता, प्रत्यक्ष ज्ञान की खोज नहीं कर पाता; उसी में डूब जाता, ताकत उसी में लग जाती। ऐसी घटनाएं याद करूं तो अभी भी आंसू निकलने लगते हैं।
लेकिन मैं कभी विचलित नहीं हुआ, कभी पीछे नहीं मुड़ा, कभी किसी को दोषी या जिम्मेदार नहीं ठहराया; बस लगा रहा कि एक समय ऐसा आएगा, मैं जिसके लिए निकला हूं वह हो जाएगा। विश्वास भी मेरे लिए छोटी चीज है — मुझे पता था कि हो जाएगा, क्योंकि मैं पूरी तरह लगा था, सब कुछ उसी के लिए लगा दिया था। गुरु ने भी कह दिया — जो तुझे चाहिए, मैं नहीं दे सकता, जा खोज; उन्होंने पल्ला झाड़ लिया। जो लावारिस हो गया, जिसे सबने छोड़ दिया, वह किससे कहे? उसकी नाराजगी खत्म; व्यक्ति रूठता तब है जब मनाने वाले हों। और पीछे जाना नहीं था — मैंने फाइनल कर लिया था कि यह (पुराना) जीवन मुझे नहीं चाहिए। यह मेरा पहला और आखिरी रास्ता है: या तो खोज लूंगा, या खोज में मर जाऊंगा। मेरे पास और कोई विकल्प ही नहीं था, कोई अपने थे ही नहीं जिनके लिए एक बार मुड़कर देखूं।
हां — ये पहुंच सकते हैं, तो मैं क्यों नहीं? पहुंचने से पहले ये भी मेरे जैसे ही थे, तो मैं भी पहुंच सकता हूं। चलने से पहले ही पता था कि पहुंच जाऊंगा, क्योंकि मैं उसके लिए कुछ भी कर सकता था। मैं कहीं फिक्स नहीं था — अगर कोई कहे कि तुम्हारा लक्ष्य इस तरफ है, तो उधर चल देता; मेरी खोज मुझे जहां ले जाए, चल लेता था, चाहे कांपता रहूं, चाहे डरता रहूं। किसी पर संशय भी नहीं होता था, क्योंकि अपने पास कुछ था ही नहीं। चोर का डर कब? जब जेब में कुछ हो। लोग कहते — यहां क्या कर रहा है, चोर आएगा, लूट लेगा; मुझे पता था कि चोर आ भी गया, तो मेरी सहायता ही करके जाएगा, क्योंकि मेरे पास कुछ नहीं है। तो डर-भय मुझ पर काम नहीं करता था। कहां जाओगे, कौन है तुम्हारा? जहां से आए हो, वहां क्या है, यह तो समझ ही चुके हो।
मेरा बस यही भाव था — पहला और आखिरी। अगर ज्ञान के साथ नहीं हूं, तो इस अज्ञानता में जीना नहीं चाहता। बस इतना था कि जिस मार्ग पर चल रहा हूं, उसका जिम्मेदार मैं हूं; मेरी वजह से किसी को तकलीफ नहीं होनी चाहिए, मुझे हो रही है तो कोई बात नहीं। जहां था, वहां क्या था? यहां कम से कम आशा की किरण फूटी है, पता चल गया कि कहां चलना है, मंजिल नजदीक आ रही है; वहां तो शुरुआत ही नहीं थी। अगर मेरे प्राण भी खोज में जाएंगे, तो हंसूंगा और कहूंगा — देख जिंदगी, तेरे लिए गई।
उन यादों में दर्द इसलिए है कि जिस वक्त हमने उम्मीद रखी थी कि ये मेरी मदद करेंगे, कहीं न कहीं उनकी तरफ से अपनेपन का भाव मिला था — साथ रहते हुए उन्होंने कहा था कि मैं हूं, चिंता न करना। लेकिन जब जरूरत पड़ी, तो पता चला कि वह सिर्फ एक शब्द था; अपना भी बनाया, ‘मैं हूं ना’ भी बोला, और समय आने पर औकात भी दिखा दी — यह पीड़ा दे जाता है। पराया होता तो कोई फर्क नहीं पड़ता। वहां बात सिर्फ लेन-देन, पैसे, वैभव या जरूरत की नहीं रहती, एक भरोसा टूटता है; और मैं यह भी देख रहा हूं कि वह सक्षम है, मुझे न देकर किसी और को दे रहा है। तो जिस क्षण वह याद आता है, वही भाव बन जाता है।
मेरे जीवन में भी ऐसी कई घटनाएं हैं। अब याद आती हैं, पर दुख नहीं देतीं; पहले पीड़ा देती थीं कि उन्होंने ऐसा क्यों किया। अब समझ में आता है कि वे वैसे ही थे — उनका काम था लोगों को भरोसा देना और तोड़ना; मुझे भरोसा भी किसी उम्मीद में दिया होगा, जब वह उम्मीद नहीं दिखी तो क्यों देते। एक कमेंट में किसी ने पूछा था कि क्या आपको घर-बचपन की याद आती है — याद सब आती है, लेकिन उस याद में सुख-दुख कुछ नहीं, कोई शिकायत नहीं। पहले जिन्होंने मदद नहीं की, उनके प्रति शिकायत थी, शिकवा था; अब नहीं, क्योंकि उनका नेचर ही ऐसा है।
जब तक ज्ञान नहीं होगा, तब तक शिकायत कहीं न कहीं छिपी रहेगी; ऐसा करने वालों के प्रति घृणा का भाव रहेगा, घिन आएगी, क्योंकि उन्होंने अपना बनाकर किया — और लगता है कि मेरा अधिकार था, उन्होंने आश्वासन दिया था, उनका दायित्व, कर्तव्य था। ज्ञान के बाद यह सब हट जाता है — न पीड़ा, न दुख, न शिकायत, न शिकवा — क्योंकि समझ में आ जाता है कि अपना तो कोई था ही नहीं, हम मान बैठे थे; यह जरूरत की दुनिया है। अपना सिर्फ एक ही है — गुरु। गुरु ही आखिरी जगह का मार्ग बताता है, आखिरी यात्रा करवाता है; बाकी जितने लोग यात्रा करवाते हैं, उपयोग करने के लिए। मां-बाप, भाई-बहन से जिंदगी शुरू होती है, और सबने मुझे उपयोग करना और उपयोग होना सिखाया; गुरु ही एक ऐसा है जो उपयोग करने और होने, दोनों से मुक्त कराता है। तो ज्ञान के बाद भी याद आती है, पर उन यादों में दुख, शिकायत, शिकवा नहीं होता।
हां, अगर आत्मज्ञान नहीं हुआ, तो इसका मतलब लेना-देना बाकी ही रहता है; तो आप उनके इर्द-गिर्द ही आओगे। लेन-देन जिसके साथ रहेगा, आप उसी के पास आओगे, वे आपके पास आएंगे।
गलत वे नहीं, गलत हम हैं। अपनी समझ से वहां से अपने आप को हटा लेना चाहिए, उस समय ज्ञान का उपयोग करना चाहिए — यह मेरे ही कर्मों का परिणाम है। अगर मेरे साथ दुर्व्यवहार हुआ, मैं उसमें लिप्त नहीं हुआ, मैंने अपनी आत्मरक्षा की — उसके बाद भी जितना हुआ, वह मेरे कर्म का परिणाम है।
जैसे मांडव्य ऋषि की कहानी है। वे एक जगह तपस्या कर रहे थे; सेना चोरों का पीछा कर रही थी, चोर चोरी का सामान उनके पास रखकर छिप गए। सैनिकों ने कहा — चोरों का सरदार यही है, माल यहीं छोड़ा है; पकड़कर राजा के पास ले गए। राजा ने कहा — सूली पर चढ़ा दो। पर हर बार सूली टूट जाती थी। राजा को बताया गया, तो वह आया — ये तो मांडव्य ऋषि हैं — और क्षमा मांगी। ऋषि बोले — राजन, अपराधी तुम नहीं, कोई और है; तुम्हारी क्या हिम्मत। फिर वे धर्मराज के पास गए, जो कर्मों का लेखा-जोखा करते हैं, और पूछा कि यह किस कर्म का परिणाम है। धर्मराज बोले — जब आप 12 साल के थे, तितली को कांटा चुभोते थे, उसका परिणाम है। ऋषि बोले — 12 साल के बच्चे को तो दोष ही नहीं लगता, फिर दंड कैसे दिया? धर्मराज ने गलती स्वीकार की, और ऋषि ने श्राप दिया, जिससे धर्मराज विदुर बने। कहानी न सच होती है न झूठ; हम उससे प्रेरणा लेते हैं — कि आपके साथ जो व्यवहार हो रहा है, वह कहीं न कहीं मेरे ही कर्म का परिणाम है।
कर्म के सिद्धांत को समझना है: मुझे अपनी समझ से अपनी रक्षा भी करनी चाहिए — तुम समर्थ हो, तो अपनी रक्षा भी कर लो। किसी ने गलत किया, तो उसे दंड मिलना भी उसके कर्म का परिणाम है, तभी तो पूरा होगा। और मेरे साथ कुछ हुआ है, तो उसका जिम्मेदार मैं हूं — (मेरे कर्म के बिना) कोई ऐसा कर नहीं सकता।
हां। साथ ही, हमें हर जगह अपनी आत्मरक्षा करनी चाहिए। ऐसा नहीं कि कोई मेरे साथ गलत करे और मैं बर्दाश्त करूं — ईमानदारी से जवाब देकर आगे बढ़ूं; ईमानदारी यही है, बर्दाश्त करना बेईमानी है — सामर्थ्यवान होने के बाद। सामर्थ्य नहीं है, और जवाब देने में और तकलीफ हो जाएगी, तो अपनी आत्मरक्षा करके वहां से निकल लो।
वहां आत्मरक्षा की बात ही नहीं है। आत्मरक्षा तब है, जब आपको कोई सताता है और आप अपनी रक्षा करते हो। वहां परिवार की जिम्मेदारी की, कर्म की बात आ गई — कर्म सिद्धांत आ गया। कोई कहीं भी किसी शब्द का उपयोग कर देगा, हम उसे नहीं मान लेंगे।
अब यह भी देखना है कि कहीं उसका परिवार सोसाइटी को देखकर ज्यादा मांग तो नहीं कर रहा; जिस स्तर पर, जैसी उसकी स्थिति है, वैसी मेहनत वह कर रहा है या नहीं। दोनों तरफ देखना पड़ेगा — मांगने वाले और देने वाले, दोनों की क्षमता क्या है; जो मांग रहा है, क्या वह उस लायक है, या इतना मांग लिया कि वह देने लायक है ही नहीं। यह निर्णय देश, काल, स्थिति, परिस्थिति देखकर लेना पड़ेगा।
या तो फैसला ले पाए, या अपने से योग्य व्यक्ति के सामने अपनी बात रखकर उससे फैसला मांगे कि अब मैं क्या करूं — ऐसा व्यक्ति खोजे जिसे सलाहकार कहते हैं, जो उचित सलाह दे पाए। अगर उचित सलाहकार नहीं मिलेगा, तो फैसला तो लेना ही पड़ेगा; स्थिति-परिस्थिति फैसला लिवा देगी। पहले फैसला आपके हाथ में रहेगा, (देर करोगे तो) फिर आपके हाथ से भी चला जाएगा।
(जब मेरे हाथ में है, तो भाव शुद्ध रखना है कि मेरा कोई स्वार्थ, लालच नहीं, किसी को दुख नहीं पहुंचाना —) फिर जरूरतें फैसला करवा देंगी, क्योंकि उस फैसले में लोग भी हैं। आप नहीं दोगे, तो लोग दे देंगे फैसला — पहले आपका इंतजार करेंगे, फिर खुद ले लेंगे; ज्यादा देर तक फैसला आपके हाथ में नहीं रह पाएगा। तो देख लो — अगर (आपका फैसला) उनके हित में होता है, तो दे दो; नहीं तो इंतजार करो, वे फैसला खुद ले लेंगे। सिर्फ इंतजार करो।
जब कुछ पता ही नहीं है, तो फैसले की बात ही नहीं है; पता होने के बाद ही फैसले की बात आती है। अगर इतने अबोध हो, तो फैसले का भाव ही नहीं आएगा। रिस्क इसलिए लगता है क्योंकि हम चट्टू (भोग-लोलुप) हैं; रिस्क कुछ नहीं है। हमारे जीवन में रिस्क क्या है, बताओ?
वे चले ही नहीं, बस चाटते रहे। चले होते, तो लक्ष्य तक पहुंच गए होते। जिनके बताए लक्ष्य पर हम चल रहे हैं, अगर वे कुछ सालों में पहुंचे, तो हम भी कुछ सालों में, बल्कि उनसे कम में पहुंचते। हम बस चलने का नाटक कर रहे थे, चल कहीं और रहे थे। उम्र चाहे 90 की हो या 100 की, उससे क्या फर्क पड़ता है? वे कामनाओं में चले, मान के चक्कर में चले। कुछ लोग ऐसे होते हैं जो समाज में मेहनत करके नहीं खा सकते थे, तो इसी मार्ग पर चल देते हैं, खा-पीकर मजा लेते रहते हैं और बाद में पछताते हैं; उन्हें अध्यात्म का मतलब ही नहीं पता। वे जहां के लिए चले थे, वहीं हैं। यह मेरी जिंदगी का अनुभव है: आप जहां हो, वहीं के लिए चले हो; और जहां हो, वहीं से आपका लक्ष्य दिखता है। ऐसा नहीं कि हाथी के दांत — खाने के और, दिखाने के और; लक्ष्य कुछ बता रहे हो, और चल कहीं और रहे हो।
उसे पता है — वह जहां भी है, उसे पता है कि मैं इसीलिए (यहां) हूं। (अपनी अंतरात्मा से पूछो कि भाव कहां है, असल में कर क्या रहे हो।) बहुत लोग अध्यात्म के नाम पर ही घूमते रह जाते हैं; मुझे बहुत लोग मिले। एक व्यक्ति नर्मदा परिक्रमा कर रहे थे, बता रहे थे कि 12 साल एक पांव पर खड़े रहे, पांव सड़ गया। मैंने पूछा — उसका परिणाम क्या मिला? बोले — मेरे आश्रम बन गए। तो उनकी 12 साल की तपस्या का परिणाम एक आश्रम है; इसका मतलब वे वहीं जा रहे थे, उनको वही चाहिए था।
ऐसा नहीं कि वे कहीं नहीं पहुंचे; जहां वे हैं, वहीं पहुंचने के लिए कर रहे थे। यहां सब चलायमान है — हर वस्तु, हर जीव कहीं न कहीं पहुंच रहा है; एक जगह कुछ नहीं रुका। कहां पहुंच रहा है? जहां के लिए चला। बीज वृक्ष के लिए चला, वृक्ष फूल-फल के लिए; जहां के लिए चला है, वहां पहुंचेगा, या लक्ष्य के रास्ते में खत्म हो जाएगा, तो अगला शरीर वहीं से मिलेगा जहां शरीर छोड़ा — जैसे लक्ष्य बनाकर जा रहे थे, रात को सोए, सुबह उठे तो यात्रा वहीं से प्रारंभ। तो यह मत कहिए कि कोई कहीं नहीं पहुंचा; आप हर पल अपने लक्ष्य की ओर पहुंच रहे हो — अब देख लो आपका लक्ष्य क्या है। ऐसा न हो कि निकला कहीं के लिए और पकड़ ली कोई और गाड़ी, और रास्ता, और लोगों से कहूं कि मैं तो यहां के लिए निकला हूं। यहां हर चीज परिवर्तनशील है, सब यात्रा कर रहे हैं; या तो ऊपर जा रहे हैं, या नीचे — जा जरूर रहे हैं।
देखिए, जैसे एक मादा गर्भ धारण कर ले, तो दो-तीन महीने बाद क्या उसकी चाल पहले जैसी रहती है? उसका उठना-बैठना, बोलना, सब बदल जाता है, रूप-रंग तक बदल जाता है, वह अपने आप में केंद्रित होने लगती है। ऐसे ही आप जहां जा रहे हो, वैसे होने लगते हो; आपके चाल-चलन, बोलने, उठने-बैठने से पता चलने लगता है। मुख्य रूप से तो आपको ही पता है; समाज को तो बाद में परिणाम दिखता है, आपको शुरुआत में ही पता चल जाएगा।
स्पीड के लिए ईमानदारी से (चलो)। देखो, कहीं जाना है तो जितना तेज साधन, उतना पैसा, उतनी कीमत — समाज में ऐसा ही है ना। तो जितनी स्पीड से यात्रा करनी है, उतनी ऊर्जा चाहिए, और ऊर्जा आपको सत्कर्म से मिलेगी। ईमानदार हो, मतलब लक्ष्य की तरफ हो — आपका मुख लक्ष्य की तरफ है; सत्कर्म कर रहे हो, मतलब आगे बढ़ रहे हो।
जरूरत देखो ना — जहां (दाने का) ढेर लगा है, वहां मत डालो; वहां सत्कर्म नहीं है, वहां मान की इच्छा है, पुण्य का चक्कर है। पहले जरूरत देखो कि क्या इस जीव को जरूरत है, तब दो। (वरना) एक तरह का ट्रेडिशन बन जाता है कि लोग वहीं-वहीं डालते रहते हैं; ऐसा नहीं कि आदत बना ली — जरूरत देखो, क्या सच में इसे जरूरत है।
जैसे देख लीजिए — अभी आप यह वीडियो देख रहे हैं; यहां भी इतना काम मैं कर रहा हूं — वृक्षारोपण किया, एक दिन से लेकर आजीवन तक साधकों के लिए व्यवस्था कर रहा हूं — तो इसमें सहयोग देना भी सत्कर्म है। सत्कर्म आप बहुत आसानी से कर सकते हो, जब देख पाओगे। कितने लोगों के फोन आते हैं — इतने महीनों से मेरे ज्ञान का लाभ ले रहे हैं, जीवन बदल गया; कहो कि कुछ सहयोग किया? — ‘यह तो हमने सोचा ही नहीं।’ कोई कहता है — आप बहुत अच्छा बोलते हो, बहुत अच्छा काम किया; तो क्या तुम ताली बजाने के लिए पैदा हुए हो? यह कहकर वे अपने अहंकार को पोषण देते हैं। ऐसे खोखले ईमानदार, कंजूस ईमानदार बहुत हैं, और वहीं सड़ जाते हैं; उनका धन भी वहीं रह जाता है।
धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष — मैंने जीवन में ज्ञान कमाया, आपने पैसा कमाया; दोनों मिल जाएं तो बहुत लोगों का कल्याण हो जाए, और उससे आपका भी उद्धार हो जाए — इस ज्ञान को फैलाने में अपना कमाया धन लगाते, तो आपका कल्याण हो जाता। लेकिन आप पूरा माल अपने घर-परिवार को देकर आ गए और कहते हो कि अब मेरा कल्याण कैसे होगा — कभी नहीं होगा। यह चालाकी काम नहीं आने वाली। अपने पुरुषार्थ का क्या समाज के हित में खर्च किया, वह बताओ। हम बड़े चालाक हैं — सारा माल रखकर आ जाते हैं, ‘हुआ तो हुआ, नहीं तो वापस चले जाएंगे’; और अपनी शातिरता को जिम्मेदारी, कर्तव्य कहते हैं।
तीन सेवाएं होती हैं — धन सेवा, तन सेवा, ज्ञान सेवा। 25-26 साल में निकलो, तो तन सेवा भी दे सकते हो; पूरी शक्ति उसी समय होती है। 60 के बाद तन सेवा नहीं हो सकती — उस उम्र में व्यक्ति को खुद सेवा चाहिए; जैसे जंगल में फंसे हो तो कोई भी नई गाड़ी का उपयोग करेगा, डगमगाते इंजन वाली पुरानी का नहीं। 60 के बाद कह रहे हो — मेरे पास तन है, मेरी समझ ले लो, बुढ़ापा मेरा ले लो, ज्ञान मुझे दे दो; तुम्हारा तन, तुम्हारी समझ तो तुम्हारे घर वालों के काम नहीं आ रहे। (60 के बाद) समझ तभी समाज के काम की है, जब आत्मज्ञान हो गया हो; किताबों की जानकारी तो सबके पास है। तो 60 के बाद आदमी के पास धन (सेवा) ही हो सकती है — और वह तो सब परिवार को दे आए। बुढ़ापा कोई क्यों लेगा? तुम्हें भी नहीं चाहिए — हर व्यक्ति सफेद बालों को काला करके जवानी रोकना चाह रहा है। हां, अगर कहते कि पुरुषार्थ मैंने किया, उसका आधा परिवार को दिया, आधा यहां लाया हूं, मुझे कल्याण के अलावा कुछ नहीं चाहिए — तब कुछ होगा। अपनी जिम्मेदारी, कर्तव्य निभाते हुए पुरुषार्थ का कमाया धन सत्कर्म में लगाओ। तीन में से एक भी दोगे — धन, तन या अपनी समझ — तो आपका कल्याण वहीं से शुरू हो जाएगा।
आप तुलना करते हो कि यह (गुरु जी) तो पहुंच गया — पर कैसे पहुंचा? इस व्यक्ति ने शुरू से आज तक सब समाज को दे दिया। और तुमने सब सुरक्षित रखा, और अपनी घुटन लेकर निकल गए कि कोई ले ले। जहां से लाभ ले रहे हो, वहां सहयोग नहीं दे रहे — ‘मैं उस लायक हूं ही नहीं’ कहकर आसानी से निकल जाते हैं। सीधी बात है — अगर उपयोग करने लायक हो, तो उसका मूल्य चुकाने लायक भी हो; चुकाने लायक नहीं हो, तो उपयोग मत करो। मेरा तो सिद्धांत है — अगर आप किसी का उपयोग कर रहे हो, तो जिस लायक हो, उसे दो। सत्कर्म आप बहुत अच्छे तरीके से कर सकते हो, करना चाहो तो; आप बस बचना चाह रहे हो। कल्याण तब होगा जब कुछ करोगे; बातें करने से कल्याण नहीं होगा।
पहले तो ये देखना है कि हम अगर अपूर्णता से पूर्णता में आना चाहते हैं, इसका मतलब मैं कभी पूर्णता में था। अब मैं पूर्णता में होते हुए अपूर्णता में कैसे गए? पहले तो मुझे ये समझना पड़ेगा।
शुरुआत मेरी कहां से हुई? जरूरत से। मेरी जैसी जरूरत होती थी, जरूरत मैं पूरा करता था, अपने आप में आ जाता था। ना मुझे कोई चिंता थी, ना कुछ था — बचपन की हमारी हालत यही थी। फिर आगे मुझे कुछ जिम्मेदारियां थोपी गईं, कुछ मैंने लीं। पहले जरूरत के लिए काम किया; लेकिन फिर समाज का मान का चक्कर, बड़ा बनने का चक्कर मुझ पर थोप दिया गया — कुछ घर वालों ने, कुछ सताने वाले लोगों ने कि तू मुझसे कमजोर है, अब मुझे इससे ताकतवर बनना है। फिर माहौल ऐसा मिला कि मैं बेईमानी करने लगा, क्योंकि मुझे जीतना था, अपमान से नहीं जीना था, बड़ा बनना था।
जैसे जल है उसे अशुद्ध कौन करता है? गंदगी। गंदगी बेईमानी है। बेईमानी करके मैं बाहर से मजबूत होता गया लेकिन अंदर से गंदा होता गया। दौड़ते-दौड़ते एक समय रुकना पड़ेगा, थक जाओगे। जब रुका तो देखा — अपने आप को गंदा, विवश, मजबूर, लाचार, अशांत बना लिया। पहले दौड़ बड़ा बनने की थी; रुका तो अब शांति के लिए दौड़ने लगा। अशांति का कारण मेरी बेईमानी है; शांति मेरे पास पहले से ही थी, बेईमानी करके खो दी।
अब क्या करना होगा? बहुत सीधी बात है। अब मुझे ईमानदारी अपनानी है। एक समय ऐसा था जीवन में कि ना मैं ईमानदार था ना बेईमान — एक जिंदगी थी और मैं जी रहा था। लेकिन अब बेईमानी इतनी कर ली कि वहां से निकलने के लिए ईमानदारी पकड़नी होगी। बेईमानी करोगे तो हर व्यक्ति-जीव का कहीं न कहीं श्राप लगेगा। ईमानदारी पकड़ लूंगा तो आगे अशुद्ध नहीं होऊंगा; लेकिन पीछे का मैल धोने के लिए सत्कर्म करना पड़ेगा। सत्कर्म से आशीर्वाद मिलेगा, श्राप कटेगा — जिस दिन श्राप कट गया, अपूर्णता से मुक्त होकर पूर्ण में स्थिर।
गड़बड़ ये है कि परिणाम हम अपने तरीके से चाहते हैं, बड़े जल्दी में हैं। जल्दबाजी कर रहे हो तो ईमानदारी-सत्कर्म में करो; परिणाम का इंतजार करो। मैल छूटेगा तो साफ हो ही जाओगे। जब अकेले बैठते हो तो कर्म याद आते हैं — उनमें मैल है, वही तकलीफ देता है। आप अपने आप को अभी भी देख पा रहे हो, लेकिन गंदा देख पा रहे हो — जैसे मैला कपड़ा: साफ भी दिखता है, मैल का प्रभाव ज्यादा है। कपड़े की गंदगी तब दिखती है जब काम से खाली होते हो; धोने के लिए समय देना पड़ता है। जीवन इतना बिजी बना लिया कि गंदा लगता रहा, चलते रहे; रुके तो इतना गंदा कि बास बर्दाश्त नहीं। धुलाई में समय लगेगा — ईमानदारी, सत्कर्म, सत्संग सुनते रहो; बल मिलेगा, कैसे जीना है तरीका मिलेगा। रोज सत्संग सुनो और सत्संग में जीना चालू करो।
आप अशांत में हो, घुटन में हो, व्याकुलता में हो। इससे निकलकर होना कहां चाह रहे हो? शांति में, रिलैक्स होना चाहते हो — तो वो आपको पता है तभी तो होना चाहिए। आज अगर डिप्रेशन, घुटन या डर है तो इसके अपॉजिट शांति कभी आपके पास रही होगी। आज जहां से हटना चाह रहे हो, इसका मतलब वो जगह कहीं याद है जहां से आए हो और वहीं जाना चाहते हो। नहीं तो अबोध-पागल को पता ही नहीं — बहुत लोगों को अध्यात्म का पता नहीं, जहां है वही है। आपको याद आ गया है, समझ में आ गया है।