प्रश्नोत्तर P2-0169 · भाग 2
(जया बहन का पत्र:) गुरु जी, न मैं मीरा हूं जो घर में रहकर भजन करूं और गलियों में निकल पड़ूं, न शबरी जो एक जगह कुटिया बनाकर इंतजार करूं। आपका बताया सत्संग, ईमानदारी और सत्कर्म कर रही हूं। जिम्मेदारियों ने घेर लिया है — न अपनों की कुटिया में आ पाती हूं, न घर पर रह पाती हूं; जीना बहुत मुश्किल हो गया है। कर्तव्य कैसे पूरे करूं, कब निकलकर हमेशा के लिए आपके चरणों में आ सकूं? मैं क्या करूं?
अपने आप को स्वतंत्र कराना चाहिए, विवश नहीं करना चाहिए। ज्यादातर देखने को मिलता है कि महिलाएं अपने आप को विवश कर लेती हैं। आपको अध्यात्म में खुलकर आना चाहिए। अगर आप जीवन में सब कुछ कर सकते हो, हर काम के लिए समय निकलता है, तो अपने लिए समय क्यों नहीं है? अगर अपने लिए समय नहीं निकाल पा रहे, तो आप गुलाम हो — फिर उस गुलामी को तोड़ दो। अगर परिवार में मुझे अपने लिए समय नहीं दिया जा रहा, हर जगह उपयोग किया जा रहा है, एक दायरे में रखा जा रहा है, तो मुझे वह दायरा तोड़ देना चाहिए। मेरा कहना यह है कि सारे काम छोड़कर, भोजन भी छोड़कर, आत्मिक कल्याण — भोजन से मेरा जीवन है, उससे भी आगे आत्मिक कल्याण।
रही बात मीरा की — आपने देखा, कितना विरोध हुआ; वैसे थोड़ी वह घर से निकल गईं, विष तक दिया गया उनको। तो अपनी गुलामी से मुक्त होने के लिए आपको मेहनत करनी पड़ेगी, निकलना पड़ेगा; सिर्फ बातों से बात नहीं बनेगी। इस दुनिया में कुछ पाना है, तो उस लायक बनना पड़ेगा। यहां बेबस, मजबूर, लाचार को कुछ मिलने वाला नहीं है — धक्के मिलेंगे।
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वीडियो: मेरे भाव को तू योगी ही समझ सकता है । #योगी · 2026-01-20