प्रश्नोत्तर P2-0150 · भाग 2
गुरु जी, मुझे एक अनुभव हुआ कि मैं द्रष्टा हूं और बाकी सब दृश्य है, मेरे अलावा कोई नहीं है। बहुत पीड़ा हो रही थी; मैं अपने शरीर को मरा हुआ महसूस कर रहा था। उस अनुभव ने मेरे भीतर मानवता, दया, करुणा को खत्म कर दिया। मार्गदर्शन कीजिए कि वह क्या था।
उसमें एक अनुभव हुआ ना — द्रष्टा अलग, (शरीर) अलग; अपने आप को मरा हुआ महसूस कर रहा था। (पर उससे) मानवता कैसे (खत्म हो गई)? कुछ और हो गया होगा। सामने आकर पूछोगे, तो अच्छा रहेगा।
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