प्रश्नोत्तर P2-0179 · भाग 2
(साधना के कठिन दिनों में) जब आपके कपड़े भी ऐसे (फटे-पुराने) थे, तब आप अपने आप को कैसे संभालते थे, उस समय क्या सोचते थे? दुख तो बहुत होता होगा?
मैनेज क्या करना, कोई बात नहीं। अगर दुख होता भी, तो किससे कहें? उस दुख का जिम्मेदार कौन है — मैं ही हूं ना, या और कोई? लक्ष्य तुमने बनाया, लक्ष्य पर तुम चल रहे हो, तो उसके जिम्मेदार तुम ही हो, दोषी कौन है फिर? कोई दूसरा होता तो अफसोस भी होता, पछतावा भी होता कि इनकी बात न मानी होती तो आज कम से कम सही से पढ़ा तो रहता। सारी जिम्मेदारी मेरी थी; मैं जहां भी था, उसका जिम्मेदार सिर्फ मैं था, और कोई नहीं। इसलिए अफसोस भी नहीं होता था — अफसोस तो तब हो, जब कोई और जिम्मेदार हो। मेरे जीवन में न पीछे कोई था, न कोई और जिससे मैं कह सकूं।
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वीडियो: मेरे भाव को तू योगी ही समझ सकता है । #योगी · 2026-01-20