ऐसा नहीं है। मैं आपको बता दूं। आप देखते रहो। भोजन बना लिया, कोई जानवर है। आप देख रहे हो तो नहीं खाएगा। जैसे उसे पता चला आप चले गए, तुरंत खा लेगा। तो इतनी तो समझ उसके पास है। हां, यह है कि वह अपने पेट के लिए खाता है। संचय नहीं करता। तो ईमानदार नहीं होता, बेईमान नहीं होता। अपनी जरूरत में जीता है।
घबराहट पढ़ने में ही हो जा रही है। जब आधा हिंदी, आधा अंग्रेजी से बोलोगे तो सामने वाला भी घबरा जाएगा। क्योंकि आधी बात समझ में आए, आधी न आए। अब हम पढ़ते हैं। मैं जितनी गहराई में अपने आप को देखती हूं, एंग्जायटी, बेचैनी, घबराहट हो जाती है। अब हम खुद घबरा गए कि क्या लिखा है। क्या तुम थोड़े न घबराओगे। आधा अंग्रेजी। या तो पूरा अंग्रेजी बोलो, कुछ न समझ में आए।
या तो आप पूरा अंग्रेजी बोलिए। बेचारे को कुछ न समझ में आए, तब तक घबराएगा नहीं, क्योंकि समझ में ही नहीं आया। उसी से अनुवाद करवाएगा। अब अंग्रेजी समझ रहा है, लेकिन आपने क्या किया, हिंदी-अंग्रेजी मिला दिया। तो या तो हिंदी पूरा बोलो, या तो पूरा अंग्रेजी बोलो। अब आधा हिंदी या आधा अंग्रेजी, कोई मतलब नहीं है।
लक्षण आपको देखना आना चाहिए। तो बिना शब्दों के अगर समझ लो, तो आपको पूछने की जरूरत नहीं। बिना शब्दों के कुछ कहे, आपको देखकर ही समझ में आ जाएगा। तो लक्षण भी तो देखना आना चाहिए। अब लक्षण ही देखना नहीं आएगा तो फिर कोई मतलब ही नहीं है। तो बिना शब्दों के समझने की आपकी क्षमता भी होनी चाहिए।
वे क्या करते हैं, वे जानें। लेकिन वे कह रहे हैं, फिलॉसफी के स्टूडेंट हैं। देखिए, प्रश्न किसके हैं। प्रश्न आपके नहीं हैं। प्रश्न आपको समाज से मिले हैं। उत्तर आपको समाज से मिलेंगे। वे प्रश्न हट जाएंगे। आपके पास तो आपके अलावा कुछ नहीं है। अगर कुछ है तो किसी और का। चाहे प्रश्न हो, चाहे उत्तर हो। यह क्लियर हो गया।
यह पूछते हैं, गुरु जी मेरे प्रश्न हैं, अभी उत्तर दीजिए। तो जब आप बिना शब्दों के समझना चाहते हो, प्रश्न कर ही क्यों रहे हो। जब आप कह रहे हो कि बिना शब्दों के कुछ कहें, तो बिना शब्दों के हम कुछ कह रहे हैं। अब आप समझ लो। समझने की क्षमता नहीं है। या तो आपकी समझने की क्षमता नहीं है। क्योंकि कुछ न कुछ तो सामने वाले को पढ़ने के लिए उसके पास है ही है। आप कहोगे, नहीं, इनके पास कुछ नहीं। ऐसा हो ही नहीं सकता। यहां के हर कण में कुछ है। क्या आपकी क्षमता है वह समझने की।
आप एक कण उठाओ। आप कह नहीं सकते कि कुछ नहीं है। यह कहिए कि मैं इसे पढ़ नहीं पा रहा हूं। खाली में भी, मैंने कर दिया, तो इसमें भी कुछ है। हवा है न। कुछ तो है न इसमें भी। यहां कुछ खाली है ही नहीं। यह कहिए कि मेरी समझ नहीं काम कर रही है। बस। तो बिना शब्दों के यहां सब कह रहे हैं। पूरी प्रकृति बोल रही है तुमसे। पूरी प्रकृति कुछ कहना चाहती है, और तुम उसे कुछ कहना चाहते हो। शब्द की जरूरत ही नहीं है। अगर तुम्हारी समझने की क्षमता है तो शब्द की जरूरत नहीं है।
अगर आपको भाव समझने की क्षमता है तो आप देखते नहीं। आप किसी के साथ रहते हो। कहते हो, आज क्यों उदास हो। क्या उसने कहा आपसे? आपने उसे पढ़ लिया। और यह बड़ा आसान है। वह कहता है, नहीं, कुछ नहीं हुआ। लेकिन जब आप पीछे पड़ जाते हो तो कहता है, उदासी का कारण यह है। पढ़ लिया कि नहीं पढ़ लिया। क्या उसने आपसे शब्दों में कहा? नहीं कहा। तो आप तभी पढ़ पाओगे जब उसके करीब में जिओगे। क्या आप एक अनजान आदमी को देखकर बोलोगे, उदास हो? क्योंकि आपने उसे कभी हंसते-रोते देखा ही नहीं, तो आप उसे कैसे पढ़ोगे। अब उसको पढ़ने वाला आपसे आगे होगा, वह पढ़ लेगा। शरीर को न देखे, उसे सीधा देखे, वह पढ़ पाएगा कि इसके अंदर क्या चल रहा है।
तो बिना शब्दों के आराम से पढ़ सकते हो। तुम्हें कोई पढ़ रहा है, तुम किसी को पढ़ रहे हो। हर वक्त यही तो हो रहा है। हर वक्त आप पढ़ ही रहे हो। जरूरी नहीं कि आप स्कूल जाओ। जब से समझने लायक हुए, पढ़ ही रहे हो। क्योंकि आपका भाव ही है। आपका प्रश्न ही है, यह क्या है। और जब तक इसका जवाब पूरी तरह नहीं मिलेगा, जब तक इस क्या है से नहीं छूटोगे, तब तक आप पूछते ही रहोगे, क्या है यह। क्या है, मतलब पढ़ना तो चाह रहे हो। यही तो प्रश्न है, इसी का तो उत्तर चाहिए।
भाई, कोई कहता है बाहर क्या है। कोई कहता है आत्मज्ञान क्या है, परमात्मा क्या है। वह बाहर का छोड़ के अंदर का पढ़ना चाहता है। कोई बाहर का पढ़ना चाहता है। लेकिन आप देखेंगे तो हर व्यक्ति हर क्षण पढ़ ही रहा है। और आप तब तक पढ़ोगे जब तक आपको उस परम सत्ता से मिलना न हो जाए। जिस दिन मिलना हो गया, उस दिन खत्म। क्योंकि क्या है, उसी के द्वारा है। और इसका जवाब कौन देगा? वही देगा। क्योंकि जिसके द्वारा जिसका निर्माण हुआ है, वही जवाब देगा। क्योंकि कोई भी जवाब देगा तो एक अनुमान लगाएगा। तो जब तक उससे मिलना नहीं होगा, तब तक यह प्रश्न खत्म भी नहीं होगा। तो यही है भैया। इन्होंने कहा, मेरे प्रश्न का उत्तर अभी दीजिए। अभी उत्तर दीजिए।
आत्मचिंतन मतलब हम फंसे हुए हैं। आत्मा मतलब खुद। मैं खुद कहां फंसा हूं, इसके लिए चिंतन करना है। और मैं किस तरीके से अपने आप को छुड़ा लूं, इसके लिए आत्मिक चिंतन करना है।
यही हाल है। एक बार में ही बैठ सकता था, लेकिन एक बार में नहीं बैठा। कितनी बार बोलना पड़ा, तब जाकर बैठा। यही हाल जिज्ञासु का है, यही हाल साधक की होती है, कि उसके पीछे पड़ना होता है, तब जाकर वह साधना करता है।
साधना में जब साधक और जिज्ञासु बैठता है, तो खजुआ आने लगता है। कभी पीठ खुजलाता है, कभी हाथ, मुंह। लेकिन खुजवाना नहीं चाहिए। जब तक घूम रहा था, खजुली नहीं हो रही थी। जैसे बैठा, खुजाने लगे। ऐसे ही साधक की स्थिति है। जब प्रपंच करता रहे, जब रसपान करता रहे, तब खजुली नहीं होती। और जब साधना में बैठेगा, तो कब से खुजली चल रही है, पता नहीं। गर्दन नहीं मुड़ती। कब से है, बता नहीं सकता।
खड़ा हो तो नहीं खजुता। बैठे तो खजू आता है। जब साधना में बैठा है, तो कब रीढ़ की हड्डी पिराए, कब कमर पिराए, कब गर्दन खुजाए। यही हाल मैं दिखाना चाहता हूं। यही हाल साधकों का है, जिज्ञासुओं का है, कि जब साधना में बैठते हैं तो कहते हैं, मैं विचलित हो रहा हूं, मुझे घुटन हो रही है, बेचैनी हो रही है, समझ नहीं आ रहा। और जब तक रसपान करते रहे, तब तक कोई दिक्कत नहीं रही।
मैं आप लोगों से यही कहूंगा, साधना करो, आगे बढ़ो।
घुटन क्यों हो रहा है? मौन नहीं हो। जबरदस्ती तुम दबाए जा रहे हो। तुम कमजोर हो। इसे मौन नहीं बोलते। करोगे क्या? तुम जवाब नहीं दे पा रहे हो, तो चुप हो। डर के नाते चुप हो। सामर्थ्यवान बनो। आगे बढ़ो। ऐसा नहीं कि मौन हो तो आप बहुत हो गए। अब आप जवाब ही नहीं दे सकते। जब जवाब दोगे तो लतियाए जाओगे, मारे जाओगे। आपकी हिम्मत नहीं है। तुम मौन नहीं होते, डर से चुप होते हो।
अब ऐसे मत समझना। आपने प्रयास किया, यह कह नहीं रहे। अब कोई बात नहीं, मैं आप पर छोड़ देता हूं। प्रयास क्यों किया फिर? प्रयास किए। अब तुम हार गए हो। तो मजबूर हो गए हो। अपनी मजबूरी को महानता का नाम मत दो कि मैं मौन हो गया हूं। यह मौन नहीं है। पिटाई के डर से मौन हो। पहले सामर्थ्यवान बनो।
दूर नहीं बना लिए हो। अगर आप ज्यादा बोलोगे तो पीटेंगे। पिटाई के डर से आप बोलते नहीं हो। सामर्थ्यवान बनो। जवाब देना है तो सामर्थ्यवान बन के दो। अब बोलोगे क्या? बोल दोगे तो पिटाओगे।
अब तो यहीं हूं। अब कुछ दिन है। कब चला जाऊं, पता नहीं। जब मिलना है तो आ जाओ। पता नहीं कब हम इस शरीर के द्वारा कहीं चले जाएं, या यह शरीर छोड़ कर कहीं चले जाएं। मिलना है तो जहां हूं, वहां आ जाओ।
मैं आपको साफ-साफ बता दूं कि यहां मैंने निशुल्क व्यवस्था की है। भोजन और रहने की निशुल्क व्यवस्था है। यहां के नियम में आप आकर क्रिया करें, इसके लिए व्यवस्था कर रहा हूं, कि मैं अगर शरीर भी छोड़ दूं तो भी लोगों को कमी ना हो। अपनों की कुटिया में सत्य के खोजियों को कभी हाथ न फैलाना पड़े।
यही भाव से मैं मेहनत कर रहा हूं। मेहनत पर लगा हूं कि कोई सत्य का खोजी हो, उसको किसी पर निर्भर ना होना पड़े। क्योंकि सत्य का खोजी अगर किसी पर निर्भर हो जाएगा, तो फिर वह भटक सकता है। क्योंकि देने वाला अपने तरीके से यूज करता है।
मैं इसी में लगा हूं। पूरी तरह मेहनत कर रहा हूं। धन से, तन से, अपनी समझ से, ज्ञान से। और परिणाम दिखता है। जब मैं यहां आया था, मैंने जितना बोला था उतना हो रहा है। मैं लगा हूं। यहां के लोगों को मालूम है और आप लोगों को भी दिख रहा है। ये ऐसे ही थोड़ी ना तैयार हो गया।
जब कोई कामना नहीं होगी, तो भीड़ में भी मौन हो। और जब कोई कामना है, तो हिमालय में भी आप मौन नहीं हो। यह प्रत्यक्ष ज्ञान की तरफ से आपके लिए है।
जब तक अपने तरीके से चाहिए, तो आप हिमालय पर भी मौन नहीं हो। और जब अपने तरीके का त्याग कर दिए, जरूरत में जीना चालू कर दिए, तो आप भीड़ में भी मौन हो। यही है मौन।
अर्जुन ने इतनी बात पर मारा नहीं है। वे अर्जुन की परीक्षा ले रहे थे। क्या अर्जुन अंधविश्वासी है? क्या अर्जुन मेरी बात मान लेगा?
फिर बाद में, जब उन्हें ज्ञान हुआ, जब वह समझ पाए पूरी तरह, तब उन्होंने मारना चालू किया। पहले पूरी तरीके से समझे।
जहां उम्मीद खत्म हो जाती है, पूरी तरह से जब हम उम्मीद से मुक्त हो जाते हैं, तब जाके हम अपने आप में हो पाते हैं। तब हमें सत्य का बोध होता है। सत्य का ज्ञान होता है।
ऐसे मुंह से बक-बक बोलने से कुछ नहीं होगा। कुछ भी पढ़ के कंठ से बोल दें। मुंह से बक-बक कम करो और साधना करो।
भीतर कहां से? मतलब तुम अलग हो और भीतर अलग है? वह तुम्हीं में से है। उसे भीतर भी नहीं बोला जा सकता। यहीं से हम कहे थे, बक-बक कम बोलो, साधना करो। अपनी स्थिति को प्राप्त करो। जिस स्थिति को तुमने खो दिया है, उसको प्राप्त करना पड़ेगा।
पहले हम बक-बक सुनते रहे, लेकिन अब न सुनें। काहे इतना समय बिताते? पहले तो यहां आए होते। लाइव में भी हम दो-दो, चार-चार, पांच-पांच घंटा, सात-सात घंटा लाइव लेकर बक-बक सुनते रहे, लेकिन एक को मतलब हो।
पूरी तरह छोड़ के निकला। पीछे देखा ही नहीं कि पीछे कुछ है। सिर्फ आगे जाता रहा। जाते-जाते सिर्फ मैं ही रहा। सब खत्म हो गया।
तो यह देखो, यहां बैठ के साधक लोग अपने आप में होने के लिए साधना करते हैं। और कुछ समय बाद मैं फिर से कह रहा हूं, और मैं कहता रहता हूं, कि हजारों लोग आकर साधना करेंगे। आज यहां अपनों की कुटिया में आकर कोई भी साधक साधना कर सकता है। देखो, यह व्यवस्था है।
आपके अंदर शांति है या अशांति है, मैं क्या करूंगा? इसे सिद्ध कैसे करोगे कि तुम्हारे अंदर शांति है कि अशांति है? तुम समाज के लिए क्या कर सकते हो? वो कुछ बताओ, तो मैं सुनूं भी।
आपके अंदर शांति है, प्रेम है, दया है, करुणा है। ये सब बातों का कोई मतलब है क्या? आपने इस समाज में अपने शरीर के द्वारा किया क्या है? इसका कोई मतलब है? आपके अंदर शांति है, आपके अंदर क्या है? अब हम क्या करेंगे सुन के? हमने पूछा भी नहीं। तो इसका कोई मतलब नहीं है।
मां-बाप की सेवा की, तो कौन सा एहसान किया? उन्होंने भी तो आपके लिए किया। तो आपने एहसान थोड़ी ना कर दिया। इसमें यह बताने की क्या जरूरत है? मैंने मां-बाप की सेवा की, मैंने भाई की सेवा की, बहन की सेवा की। ये कोई बात है?
अगर बिना स्वार्थ के मां-बाप की सेवा की होती, तो भी बात यह है कि आपने किसी और के मां-बाप का किया क्या? किसी और समाज का किया क्या? अपने मां-बाप का तो सब कर रहे हैं। ये कौन सी बड़ी बात है? ये क्या सुना रहे हो, अपने मां-बाप का मैं कर रहा हूं? जानवर भी अपने बच्चों की करते हैं। वो कौन सी बड़ी बात है? कुछ ऐसा बताओ कि लगे तुमने कुछ किया।
ये कौन सी नई बात बता रहे हो कि मैंने अपनी मां-बाप की सेवा निस्वार्थ की? हंसा रहे हो। मुझे आपकी बातों पर हंसी आ रही है। यह क्या बता रहे हो?
अपनों की कुटिया में एक महीने के लिए आप लोग आ सकते हो। आप लोगों के लिए यहां व्यवस्था है। एक-एक महीने की छुट्टी मांगो अपने परिवार से। आप ग्यारह महीने परिवार को दो। एक महीने अपने आप को दो।
जवाब देता हूं। अगर आप किसी और के बारे में पूछोगे, तो कोई मतलब है क्या? आप उनके क्या लगते हो? और मैं उनसे थोड़ी मिला हूं? मैं उनके बारे में बताऊंगा? और मैंने पहले भी बोल दिया, जितने लोग इस समाज के लिए काम किए हैं, मैं उन्हें प्रणाम करता हूं।
कर्तव्य तो जानवर भी निभा रहे हैं। अगर आपने अपने परिवार को देखा, तो जानवर भी बच्चे पैदा करके हर साल, वो भी तुमसे ज्यादा, अपने बच्चों की सेवा करके छोड़ देते हैं। तो जानवर में और तुम में क्या फर्क है?
जानवर भी अपने बच्चों की सेवा करते हैं। ये कौन सी बड़ी बात है? उन्हें पालते हैं, पोसते हैं, बड़ा करते हैं, छोड़ देते हैं, घोंसला बनाते हैं, उनकी सुरक्षा करते हैं। ये कौन सा नया काम कर दिया आपने? तो फिर आप में और जानवर में क्या फर्क है?
अगर आपने सिर्फ अपने परिवार के लिए किया, तो समाज के लिए क्या किया, वो बताओ। सत्कर्म क्या किया? जरूरतमंद की सेवा क्या की?
मैं तो कुछ भी बोल दूंगा, उसका कोई मतलब है? मैं बोल दूं कि मैं यह हूं, तो उसे कैसे सिद्ध किया जाए? मैं कहूं कि यह हूं, उसे सिद्ध कैसे किया जाएगा? तो इसका जवाब मैं आपको दे ही नहीं सकता। और मैं जितना भी जवाब दूंगा, उसका आपके जीवन में कोई मतलब ही नहीं होगा। कौन सा नाप है? कैसे नापोगे कि मैं क्या हूं? तो ये कोई मतलब ही नहीं है।
मन तो एक ही है, दो तो है नहीं। आप क्षण-क्षण में, सेकंड से भी कम समय में, कई जगह ले जाते हो, तो आपको लगता है कि मैं कई जगह साथ में लगा हूं।
जैसे पांच इंद्रियां हैं, तो आप देख भी रहे हो, सुन भी रहे हो। दोनों घटना एक साथ घट रही है। कोई छू रहा है, तो उसका एहसास कर रहे हो। मतलब आप दृश्य को देख भी रहे हो, सुन भी रहे हो। कोई छू रहा है, तो उसको फील भी कर रहे हो। आप खा भी रहे हो। सुगंध और दुर्गंध भी। पांच इंद्रियों द्वारा आप एक ही समय में महसूस कर सकते हो।
आप समझ लीजिए। आप क्या समझते हो, आपने अपने से बता दिया।
ठीक है, आज दिखा रहा हूं आपको।
लो, आपको देखना था भोजन बनते वक्त, देख लीजिए। ये भोजन बनाया जा रहा है। साधक स्वयं अपने हाथों से भोजन बना के खाते हैं। लोगों को देखना था कि यहां भोजन कैसे बनता है, तो आज दिखा रहे हैं। ये साधक लोग बैठे हैं, साधना कर रहे हैं।
इसी तरीके से यहां भोजन बनता है। आप लोग भी आएंगे तो आपको भोजन बना के खाना पड़ेगा। साधक लोग अपना भोजन स्वयं बना के खाते हैं।
पुरुषार्थ के साथ श्रद्धावान होना चाहिए। सिर्फ श्रद्धावान है और पुरुषार्थ नहीं है, तो कोई मतलब नहीं होगा। पुरुषार्थ है और श्रद्धावान नहीं है, तो भी कोई मतलब नहीं होगा। तो पुरुषार्थ के साथ श्रद्धावान रहो। श्रद्धा भी जरूरी है।
नहीं। अगर विचार परेशान कर रहे हैं, राग-द्वेष हो रहा है, तो विचार कहां से आए, कैसे आए हैं, उसे जड़ तक जाना है। वो कैसे पैदा हुआ, कहां से पैदा हुआ। यह बताया अभी।
हां। अपनों की कुटिया का जहां बोर्ड है, यहां से आखिरी तक जितनी बाउंड्री है, वहां बैठकर साधना कर सकते हैं। यह अपनों की कुटिया है। यह नर्मदा तट है। बाउंड्री के अंदर बैठकर साधना करो।
नहीं। ये कुत्ते ऐसे नहीं हैं। ये देखो, सब छुटे पड़े हैं। किसी साधक को बोलते नहीं हैं। इन्हें बस पता चल जाता है कि आप यहां साधना करने आए हो, जिज्ञासु हो या साधक हो। आप यहां साधना करोगे तो आपको कुछ नहीं बोलेंगे। देखो, सब छुटे पड़े हैं और साधक लोग आराम से भोजन बना रहे हैं। ऐसा नहीं है।
नियम तो बता दिया है। आने वाले साधक और अभी के साधक सुन लें। यहां का नियम ही साधना है। नियम में रहना ही साधना है।
सुबह 4 बजे या उसके बाद उठ जाना है। नित्य कर्म कर लेना है। शौच कर लेना है। स्नान कर लेना है। अपने आत्मिक चिंतन में बैठ जाना है। 8 बजे तक, आखिरी सुबह में, हॉल का गेट लगा दिया जाएगा। उसके बाद काढ़ा मिल जाएगा। नाश्ता करके सत्संग सुनना है। सत्संग में बैठना अनिवार्य होगा। फिर एकांत में जाकर बैठना है। सुबह 8 बजे हॉल बंद किया जाएगा, लॉक किया जाएगा, और शाम को 8 बजे ही खुलेगा।
मैं व्यवस्था इसलिए कर रहा हूं कि लोग जाकर लेटे रहते हैं और उनका समय बर्बाद होता है। मैं किसी को बर्बाद होते हुए देख नहीं सकता। मैं जब तक अपनों की कुटिया में रहूंगा, मेरा शरीर रहेगा, तब तक मैं आप लोगों के लिए काम करूंगा। जिस तरीके से आप सध जाओ, जिस तरीके से आपकी साधना हो, उसके लिए मुझे कुछ भी करना पड़े, मैं करने के लिए तैयार रहूंगा।
कुटिया में लॉक है। 8 बजे सुबह लॉक हो जाता है और शाम को 8 बजे खुलेगा। आप बाहर रह के साधना करें। काढ़ा, नाश्ता, भोजन बाहर लें। साधना करें। फिर 8 बजे विश्राम कक्ष में आ जाएं। सुबह 4 बजे के बाद उठें, और 8 बजे बंद हो जाएगा। आपस में बातचीत नहीं कर सकते। मोबाइल स्विच ऑफ हो जाता है। यह साधक आराम से बैठा हुआ है।
4 बजे उठने का जोर नहीं दे रहा हूं। अगर आप 4 बजे सोएंगे, तो आराम से 6 घंटा तो नहीं चाहिए। जोर 4 बजे का नहीं दे रहा हूं।
मेरा तो यही कहना है जीवन में, कि आप सोने के पहले और उठने के बाद करते क्या हो। चाहे जब उठो।
अब यहां क्या है। जैसे आप 8 बजे सोने चले गए। मैं कह रहा हूं, 9 बजे नींद आए, 10 बजे आए। अब जब भी नींद आए 8 बजे के बाद, तो सुबह 8 बजे लॉक होगा। तो आप 4 बजे उठे, 5 बजे उठे, या 6 बजे उठे, तो 8 बजे बंद हो जाएगा। उसमें आपको नित्य की क्रिया करनी है। 8 बजे से 8 बजे, 12 घंटे हुए। तो कितना घंटा व्यक्ति सोएगा, 6 घंटे या 8 घंटे।
यहां यह नहीं बोला जा रहा है कि आप 4 बजे उठो, 5 बजे उठो, 6 बजे उठो। यहां का नियम बताया जा रहा है कि 8 बजे सुबह हॉल बंद हो जाएगा और 8 बजे शाम को खुलेगा। उसके पहले आप सो लो, अपना नित्य काम कर लो। अब कोई 9 बजे सोएगा, तो यही कहा जाएगा कि 6 घंटा सोके 8 बजे उठो।
कहने का मतलब 4 बजे या 3 बजे पर जोर नहीं दे रहे हैं। 5 बजे, 6 बजे, 7 बजे, 8 बजे पर भी जोर नहीं दे रहे हैं। यहां 8 बजे चले गए, कोई काम नहीं है, तो सो जाओ। उठ जाओ। अपना आत्मिक चिंतन करो। जिसके लिए आए हो, वो करो।
मैं जोर थोड़ी देता हूं। मैं ना तो किसी और पर जोर देता हूं, ना मैंने अपने आप पर जोर दिया है।
अब हर रोज नहीं होता। 2024 में मैंने कुटिया बनाई थी, और 2025 में मई में, 16 मई को यहां आया था। 16 मई तक रोज होता था। धीरे-धीरे अब सप्ताह में एक दिन, रविवार को होता है। वह भी 1 बजे लाइव था। आप उसमें प्रश्न रख सकते हैं। वो भी अगर मेरा भाव हुआ तभी मैं करता हूं। अनिवार्य नहीं है। अगर होगा 1 बजे, तो आप सुन लीजिएगा। आगे-पीछे भी हो सकता है। कुछ भी हो सकता है।
मैंने इसके लिए 12 साल तप किया है, और 12 साल तपस्या के बाद मैंने अपनों की कुटिया बनाई है। मैं इसके लिए पूरी तरह मेहनत करता हूं। जितने लोग मेरे सत्संग को सुनते हैं, समझते हैं, उन्हें लाभ होता है, वे लोग मेरे कार्य में सहयोग करते हैं। वे भी लाभ ले रहे हैं, तो वे देते हैं। और आराम से चलता है।
मैं ऐसी व्यवस्था कर रहा हूं कि अगर मैं शरीर छोड़ के जाऊं, तो भी अपनों की कुटिया में कोई कमी ना हो, सत्य के खोजियों के लिए। मैं इसी काम में लगा हूं।
बस यही है कि मैं सत्य के खोजियों के लिए क्या कर दूं। कौन हूं मैं, कहां से आया हूं, उस परम आनंद में हो जाएं जो स्वयं का है। जहां से आए हैं, वहां का पता लगा लें। मूल सत्ता, परम सत्ता, उस परमात्मा से मिल लें। तो इसी में मैं लगा हूं।
और यहां सत्य के खोजियों की कोई कमी ना हो, ऐसी व्यवस्था करना चाहता हूं, शरीर छोड़ने के पहले। अगर मैं शरीर छोड़ के जाऊं, तो यहां सत्य के खोजी आराम से रहें और भोजन ग्रहण करें। आराम से साधना करें। उन्हें किसी पर निर्भर ना रहना पड़े।
हां। अगर जिस पोस्ट पर हैं, उस पोस्ट का काम पूरी ईमानदारी से कर रहे हैं, तो ईमानदारी की है। आप जिस पद पर हो, उस पद का काम ईमानदारी से कर रहे हो, तो ईमानदारी की कमाई है।
ऐसा नहीं है। मैं जहां धारण किया था, जिस काम के लिए गया था, वो काम नहीं हुआ। तो मैंने धीरे-धीरे वहां से हटा। फिर मैं खोज में निकला, तो धीरे-धीरे छूट गया।
तो मुझे पता चला कि गुरु ज्ञान का प्रतीक है। और वस्त्र इसलिए धारण करते हैं कि समाज से हमें उचित व्यवस्था मिल सके। तो मैंने देखा कि नहीं, मैं अपनी व्यवस्था खुद कर सकता हूं। तो मैंने उस कपड़े को उतार दिया, प्रणाम करके।
नहीं। यहां नर्मदा जी के तट पर जाना सख्त मना है। बस अपनों की कुटिया की बाउंड्री में रहना है। इसलिए कि किसी को तैरना आता है, किसी को नहीं आता। कुछ भी हो सकता है। इसलिए हमने मना कर दिया है। पहले जाना होता था, बाद में मैंने बंद कर दिया।
संत भेषभूषा से नहीं जाने जाते। संत एक चरित्र है, भेषभूषा नहीं। बुराइयों का त्याग करें, अपने स्व में पहुंच जाएं, और लोगों को ज्ञान दें, आत्मज्ञान को उपलब्ध हो जाएं, वो संत है।
ईमानदारी ब्रह्मचर्य है। आपको ब्रह्मचर्य रखना है। शरीर का ब्रह्मचर्य रखने से कुछ नहीं होगा। पता चले कि शरीर का ब्रह्मचर्य रखे हो और बेईमानी कर रहे हो, तो कोई मतलब नहीं है।
ईमानदारी अपना लो। ईमानदारी आपका ब्रह्मचर्य है। सत्कर्म इसमें सहयोग करेगा।
आ सकते हो। यहां आप आओ तो कम से कम सात दिन रहना है, और ज्यादा से ज्यादा आजीवन भी रह सकते हो। एक महीना, एक साल, पूरी आजीवन रह सकते हो। सात दिन पक्का रहना ही पड़ेगा।
हां, क्या करोगे? पहले किताब मिलती थी। पहले क्या था? कंठस्थ कराते थे। लिपिबद्ध नहीं था। लिपि नहीं थी। गुरु शिष्य को कंठस्थ कराता था। लोग ज्ञान को उपलब्ध थे। ज्ञान बांटते थे। फिर किताब आई। अब सोशल मीडिया भी है, तो उसका उपयोग करो। उसमें क्या है?
आपको क्या करना है, वो आप देख लो। वहां कोई लड़का-लड़की आए साधना करने, उन दोनों को प्यार हो जाए, तो वे क्या करेंगे? हम क्या करेंगे? जो करना है, वह करें। हम क्या करेंगे? हम जितना करना था, कर दिया आप लोगों के लिए।
कितने दिन के लिए भी आओ। अभी यहां पर जब बाउंड्री वगैरह हो जाएगी, तब यहां 7 दिन का नियम अनिवार्य हो जाएगा। अभी एक-दो दिन के लिए, जितने दिन के लिए आना है, आ सकते हो। उसके बाद फिर आपको कम से कम सात दिन के लिए आना पड़ेगा, और फिर आजीवन भी रह सकते हो। यह आपके ऊपर है।
अपनी समझ से ही तो चल रहे हो ना। अगर किसी ने कुछ बताया, आपको समझ आया, तभी तो आगे बढ़ोगे। आप नहीं समझ पाए तो थोड़ी ना चल पाओगे। अपनी समझ से ही हर व्यक्ति चलता है।
बस उस परम स्थिति को उपलब्ध हो जाओ। और आप चाहोगे तो कभी भी गिर सकते हो ना। आप अगर गिरने वाला काम करोगे तो गिर जाओगे। क्योंकि आप उस परम स्थिति पर कभी न कभी तो थे, तो चाह के ही तो गिरे।
पहली कुटिया है अदलपुरा, अपनों की कुटिया, मध्य प्रदेश — खरगोन जिला, तहसील कसरावद, निबरानी फाटा, तिचली, अदलपुरा। एक ये हो गया, और एक हरियाणा की यह कुटिया है। मैप पे दोनों का लोकेशन है। आप आ सकते हो, पूरा पता है। आके अपने कल्याण के लिए साधना करो, अपना आत्मिक कल्याण करो।
मुझे अगर करना होता तो मैं पहले बात करता। अगर मैं पहले बात कर लिया होता तो वापस करने की जरूरत नहीं थी। मुझे किसी ने कहा कि क्या आप पूरा दे देंगे? तो हमने कहा, चलो कुछ कम करा लेते हैं। कम कराया, लेकिन फिर मैंने कहा — नहीं, पहले तो बात हो गई है ना, अभी क्यों कम करा रहे हो? बात करने के बाद क्यों हट रहे हो?
नहीं, सताता तो कोई नहीं है। देखिए — काम, क्रोध, मद, लोभ, मोह। मद, लोभ, मोह जब हटता है तो आत्मज्ञान होता है, और काम और क्रोध हटता है तो ब्रह्मज्ञान होता है। तो जब तक मुझे कुछ कार्य करना है, तब तक उस कार्य में क्रोध करना पड़ता है। अगर जीवन से कार्य हटा दो, तो फिर क्रोध करने की कोई आवश्यकता नहीं। अगर आपके जीवन से काम को, कर्म को हटा दिया जाए और फिर आपको कहा जाए कि क्रोध करो, तो आप हंस दोगे। हमें काम में ही करना पड़ता है। एक व्यक्ति किसी और के लिए, आपके कल्याण के लिए क्रोध करता है; एक व्यक्ति अपनी कामनाओं की पूर्ति के लिए क्रोध करता है। एक क्रोध आपको ऊपर उठाएगा और एक क्रोध आपको नीचे गिराएगा। तो आप देखो, क्रोध किस स्थिति में करते हो।
देखो, अभी ध्यान से समझना। जैसे मैं कोई वस्तु लेने गया, तो वस्तु का मोलभाव मैं कर सकता हूं। अब मोलभाव करने के बाद जब वह देने के लिए तैयार हो गया, अगर फिर मैं उसके बाद मोलभाव करता हूं तो गलत हूं। मैंने उस व्यक्ति को कहा, इतने में ले आओ, मैं लूंगा; बाद में मैंने उसे कम करवाए — वहां गलत है। अगर शुरू में ही कम करवाता तो मैं थोड़ी ना उसे भेजता। तो आप शुरू में मोलभाव कर सकते हो, लेकिन भाव फिक्स करने के बाद, अगर वह सामान ले आया आपको देने के लिए, तब वहां मोलभाव करो तो गलत है। अब ऐसा नहीं कि मोलभाव नहीं करोगे, क्योंकि गलत आदमी फिर क्या करेगा? डबल बोल के डबल पैसा ले लेगा। ऐसा भी होता है, तो मोलभाव आप कर सकते हो।
गलती और अपराध में फर्क है। अपराध नहीं हो सकता। गलती किसी से भी हो सकती है। कोई सामान ले जा रहा है, गिर गया, टूट गया, तो गलती तो है ही। अपराध नहीं हो सकता, बेईमानी नहीं हो सकती।
सत्संग सुनो, अपना आत्मिक कल्याण करो, जितना बताया जा रहा है। और बुक तो समाज में उपलब्ध है; अगर आपको लग रहा है तो पढ़ो। कुछ भी करो, अपनी समझ से करो और आगे बढ़ो।
जरूर करो। लेकिन यह है कि आप किसी को मानसिक तकलीफ ना देना। अगर कोई कुछ गुस्सा कर रहा है, उसको पी जाना, क्योंकि आप कुछ काम कर रहे हो। उस मकसद को याद रखना। आपकी वजह से किसी को तकलीफ नहीं होनी चाहिए, परेशानी नहीं होनी चाहिए। इसका विशेष ध्यान रखना।
आप देख लो कि आप फंसे हो या नहीं, वो देखना है। वो फंसे हैं या नहीं फंसे हैं, उससे मुझे क्या मतलब? मैं फंसा हूं या नहीं, मुझे यह देखना है। उनके बीच में मैं अकेला फंसा हूं, यह मुझे मतलब नहीं है। मैं फंसा हूं ना, बात खत्म।
जब आप कोई काम के परिणाम के पहले अनुमान लगाते हो, तो कर्ता का भाव प्रकट होता है। तो आप अनुमान लगाना छोड़ दो, कर्ता का भाव प्रकट नहीं होगा। हटाने की जरूरत नहीं है, अनुमान लगाना छोड़ दो। कोई भी काम करो, परिणाम आए तो बताओ। और कोई पूछे तो — भाई, परिणाम के लिए मैं काम कर रहा हूं। परिणाम कब, कितना आएगा, मुझे पता नहीं। मैं मेहनत कर रहा हूं परिणाम के लिए।
अपेक्षा का मतलब — आपने किसी के लिए किया और बिना उससे पूछे अपेक्षा बांध के रख दी कि वह मेरे लिए भी करेगा। नहीं करता है तो दुख होता है। तो अपेक्षा मत करिए, सीधा बातचीत करिए।
कुछ भी कर सकता है। मेरा संकल्प था कि मैं जैसे भटक-भटक के पूछ रहा हूं, वैसे लोग ना भटकें; मुझे जिस दिन मिल जाएगा, मैं घर-घर जाके, गांव-गांव, जैसे हो सकेगा, सबको प्रत्यक्ष ज्ञान बांटूंगा। तो भाई, मौन भी हो सकते हैं, अब उनकी इच्छा के ऊपर है कि वह क्या करते हैं। लेकिन ज्यादातर मैं समझता हूं, किसी को आत्मज्ञान हो जाएगा तो चुप नहीं बैठेगा।
मैं एक ही बात आपको कहूंगा — आपको अपनी समझ का उपयोग करना है। कौन क्या कह रहा है, यह छोड़ो; देखो कि मेरा कल्याण, मेरा उद्धार कैसे होगा। अगर किसी को बाप बनना है तो पहले किसी का बेटा बनना पड़ेगा। जब आत्मज्ञान ही नहीं होगा, तो ब्रह्मज्ञान की तो छोड़ दो। किताब पढ़ने के लिए पहले क-ख सीखना पड़ेगा; अगर आप क-ख, मिलावट अक्षर, शब्द का अर्थ नहीं सीख पाए तो किताब आपके लिए क्या रहेगी? जितनी लाइन कोई रटा देगा, उतनी रट लोगे। और अगर क-ख सीख लिए, शब्द का अर्थ सीख लिए, तो दुनिया की कोई भी किताब आ जाए, आप उसका मतलब समझ भी लोगे, समझा भी दोगे। तो परमात्मा के साक्षात्कार के लिए पहले आत्मज्ञान होना चाहिए। अगर आत्मज्ञान नहीं होगा तो ब्रह्मज्ञान हो ही नहीं सकता, संभव ही नहीं है। आप इतिहास देखो, जितने भी महापुरुष हुए, उन्होंने इसी पर जोर दिया है कि पहले उस परम आनंद को उपलब्ध हो जाओ, उस परम स्थिति को प्राप्त कर लो, अपने स्व में स्थिर हो जाओ।
ईमानदारी के लिए काम करना पड़ेगा। ईमानदार मतलब आप कर्म में बेईमानी मत करो। जब आपको कर्म करने का मौका मिले, जब आपके द्वारा कर्म हो रहा है, तो उसमें बेईमानी मत करो। यही ईमानदारी है।
सात दिन क्यों, सात पल में हो सकता है, एक पल में हो सकता है। प्रयास करो। यह तो आपकी योग्यता के ऊपर है, आपकी क्षमता के ऊपर है। सारा खेल आपके ऊपर है। कोई आपको बस मार्ग बता सकता है। जैसे शिक्षक आपको पढ़ना सिखा सकता है, लेकिन सीखने की क्षमता नहीं है तो फिर कुछ नहीं होगा; और सीखने की क्षमता है तो सीख लोगे। एक शिक्षक कई लोगों को पढ़ाता है — कई लोग पढ़ के निकल जाते हैं, कई फेल होकर फिर कुछ और करते हैं। तो देख लो तुम किसमें से हो। सात दिन तो बहुत दूर है; सात दिन क्यों गंवाना, सात क्षण क्यों नहीं, एक पल में क्यों नहीं?
देखो, जरा समझो। कोई भी काम आप करते हो, परिणाम तो एक ही पल में आता है ना, लेकिन उसकी मेहनत कई वर्ष तक करनी पड़ती है। आदमी मर गया या जिंदा है — यह एक ही पल में होता है, परसेंटेज में नहीं होता। आप पास हो गए या फेल हो गए, यह एक क्षण में मालूम पड़ता है, लेकिन उसके लिए पढ़ाई तो एक साल करनी पड़ी ना। "हो रहा है" में प्रोसेस है, धीरे-धीरे; "हो गया" — वह एक ही क्षण में होता है, कई सालों की मेहनत के बाद।
अगर आप सुने हुए सत्संग पर चल रहे हो, ईमानदारी, सत्कर्म और सत्संग के साथ जीवन जी रहे हो, और इसके बाद अपने आप को एकांत में भी समय दे रहे हो, तो काम करोगे तो होगा।
पहले देख लो, सबसे जरूरतमंद तो तुम ही दिख रहे हो मुझे। जब थक ही जाते हो तो पहले प्रोटीन लो — दूध, काजू, किशमिश, बादाम, छुआरा, मुनक्का खाओ। पहले अपना इलाज सही से कराओ, खुद का पोषण करो। पहले अपनी सेवा करो।
काम तो करना पड़ेगा। यहां आओगे तो खुद बना के खाना पड़ेगा, बर्तन मांजने पड़ेंगे, झाड़ू लगानी पड़ेगी, और अपनों की कुटिया में पेड़-पौधों को पानी देना हो तो देना पड़ेगा। भोजन आप करोगे तो धोना भी आपको ही पड़ेगा। अपनों की कुटिया में वही आ सकता है जो अपना काम स्वयं करे, पेड़-पौधों को पानी दे, साफ-सफाई करे, अपनों की तरह रहे। कुछ भी लिखने से पहले सोचो कि मैं क्या लिख रहा हूं। जब सत्संग हो रहा है तो सत्संग की, मूल की बात करो।
तो मत जाओ ना। अगर ऐसा हो रहा है तो मत जाओ। मैं तो खुद कहता हूं कि मुझ पर भरोसा मत करो, मुझ पर विश्वास ना करना। प्रत्यक्ष ज्ञान को समझो और निकल लो। आपके पास बुद्धि है, विवेक है; आपको समझ में आना चाहिए कि कौन मेरे साथ क्या कर रहा है।
देखो, ऐसा है — मान लो आप कपड़ा खरीदने जा रहे हो और जेब में एक लिमिट का पैसा है। तब दुकान में देखोगे कि भैया ऐसी क्वालिटी का दो, वैसी क्वालिटी का दो — समझौता करना पड़ेगा। और आपके पास अनलिमिटेड पैसा है, तो दुकान में जाते ही कहोगे सबसे बेस्ट क्वालिटी का आइटम दिखाओ; और यहां न हो तो कहोगे ऑर्डर देकर मंगा दो। तो भैया, सामर्थ्यवान बनो।
सामर्थ्यवान बनने से अहंकार नहीं होता। अहंकार तब होता है जब आप सामर्थ्यवान नहीं हो। किसी काम में आप सामर्थ्यवान नहीं हो, और उसमें कोई आपके विरोध में खड़ा होता है कि आपको तो जानकारी नहीं, तो वहां पर आपका अहंकार खड़ा होता है। सामर्थ्यवान व्यक्ति को कभी अहंकार खड़ा नहीं होता। सामर्थ्यवान व्यक्ति अपने काम को परिणाम तक ले जाने के लिए गुस्सा कर देता है, लेकिन अहंकार कभी खड़ा नहीं होगा। अहंकार तो कमजोर व्यक्ति को खड़ा होता है।
नहीं। कर्म कैसे करना है, यह जो बताएगा, वह गुरु है। आपका जन्म हुआ, शरीर मिला, तो खाना आता है लेकिन धोना नहीं आता — वह मां सिखाती है। वहीं से गुरु शुरू होता है, इसलिए मां-बाप को प्रथम गुरु बोला गया है। अगर वे न सिखाएं तो आप कभी सीख भी नहीं पाओगे। तो वहीं से आपने गुरु धारण किया।
श्रद्धा-विश्वास — जब आपके जीवन में (कुछ) प्रत्यक्ष होता है, तो उस व्यक्ति के लिए श्रद्धा अपने आप पैदा हो जाती है। (उसके पीछे) कुछ नहीं चाहिए वाला भाव है।
तो आप सामर्थ्यवान बनो। अगर वे और बच्चों को महत्व देते हैं, आपको नहीं, तो जरूर आप उस काबिल नहीं होगे। पैदा होते हुए थोड़ी ना ठप्पा लगा था कि इसको महत्व देना, इसको नहीं। बकरा मत बनो।
अपने कर्तव्य और जिम्मेदारी को निभाते हुए अपनी क्षमता अनुसार कार्य करिए। बात खत्म। लोग क्या कहते हैं, उससे मुझे क्या मतलब? मुझे ईमानदारी से जीना है, लोगों को कहने दो। मुझे किस तरीके से जीना है, कैसे मेरा कल्याण करना है, मुझे मालूम है, और मैं उसके लिए बेईमानी नहीं करूंगा। ईमानदारी से जितना आएगा — यह लो भैया। अपने को सुरक्षित रखते हुए जीवन में आगे बढ़ो।
यह अपना-अपना भाव है। मैं अपने जीवन का बताऊं — ना तो मुझे बाबा बनना था, ना साधु, ना संन्यासी। मुझे सिर्फ काम करना था, कि मैं इस समाज में कुछ कर सकूं, अपने आप को उस लायक बनाऊं; और वह मैं कर रहा हूं। संन्यासी का मतलब यह थोड़ी ना कि आश्रम में बैठ जाना; समाज के लिए कुछ करना। अपनों की कुटिया अदलपुरा में मैंने कई सौ पौधे लगाए, जो अब वृक्ष की तरफ बढ़ रहे हैं, और वहां साधक रह के साधना करते हैं — तो पर्यावरण को भी सहयोग दिया। मैं जीवन में ईमानदारी सिखाता हूं, ईमानदारी से जीता हूं, तो देश सेवा भी हुई। एक गृहस्थ दो-चार लोगों के लिए कुछ घंटे काम करता है; जिस संन्यासी ने समाज उद्धार के लिए काम किया, वह 24 घंटे काम करता है। संन्यासी को भगोड़ा मत समझिए। जो खाने को नहीं था, या कुभाव में पत्नी-बच्चों या मां-बाप को छोड़कर भाग गया, वह संन्यासी नहीं, वह भगोड़ा है, कायर है। संन्यासी का मतलब — सामर्थ्यवान होकर घर से निकला, पूरी समझ से; वह दो-चार लोगों में जिंदगी कीड़े-मकोड़े की तरह खत्म नहीं करना चाहता, उसमें वह क्षमता है कि वह विश्व के लिए कुछ कर सके। वह संन्यासी है।
नहीं, ऐसा कुछ नहीं। मैंने जो कुछ कहा या किया, सामने वाले के लिए किया, इसलिए कभी अफसोस नहीं होता। अफसोस तब होता जब मेरी कोई कामना होती, कोई मेरी इच्छा होती, और मैं इच्छा के लिए उसे कुछ गलत-सही बोल देता; तब मुझे लगता कि मैंने गलत किया।
हो सकता है ना। दत्तात्रेय भगवान ने इसी बात को तो सिद्ध किया था — उन्होंने 24 गुरु माने थे, बनाए नहीं थे। तो गुरु ज्ञान का प्रतीक है; ज्ञान लो और आगे बढ़ो।
संन्यास का मतलब होता है अपनी बुराइयों का नाश कर देना। बुराई क्या है जो हमने कर्म में धारण की है — छल, कपट, चोरी, बेईमानी, चापलूसी, मक्कारी, धूर्तता, पाखंड — इसको छोड़ देना, बुरे काम को छोड़ देना और अपना कल्याण करना, इसी को संन्यास कहते हैं। संन्यासी इससे आगे है। संन्यासी का मतलब होता है — वह समाज उद्धार के लिए निकला है, दो-चार लोगों में जिंदगी खत्म नहीं करना चाहता। उसके पास वह बल है, वह ऊर्जा है; वह समझ चुका है कि मेरे पास अथाह बल है और यह बल दो-चार लोग नहीं झेल पाएंगे। तो वह समाज के लिए निकल जाता है और अपनी ऊर्जा को समाज कल्याण के लिए लगा देता है। वह संन्यासी है।
कुछ करो। अपनी ऊर्जा को सही जगह लगाओ। कुछ समाज के लिए करो। आपको शरीर मिला है, आपके पास बल है — धन बल, तन बल, समझ का बल। तो समाज के लिए खर्च करो, और करके बताओ। फिर बताना नहीं पड़ेगा।
क्योंकि पास्ट में मैंने जिया। मैं जी के निकला हूं, तो छुएगा कैसे? आधा-अधूरा छोड़ के निकलता, तो फिर छूता, मुझे पकड़ता। मैं जहां भी था, पूरी तरह जिया, और जी के निकला हूं, तो वापस जाने की बात ही नहीं है। किताब के अगर पूरे पन्ने पढ़ लिए तो किताब दोबारा उठाने की जरूरत नहीं है; लेकिन एक पन्ना भी छूट गया तो हो सकता है 20 साल बाद भी वह किताब पढ़नी पड़े। मेरे लिए ना कुछ अच्छा था, ना बुरा; मैं जहां भी था, पूरी तरह जिया। इसलिए मुझे अतीत कभी खींचता नहीं। और भविष्य की मुझे चिंता नहीं, क्योंकि मैं जहां होता हूं, पूरी तरह जीता हूं; मेरे जीने में ही तो सब कुछ है।
नशा तब करते हैं जब उनके जीवन में अध्यात्म नहीं होता। वे जीवन के लक्ष्य को समझ नहीं पाते कि मानव तन क्यों मिला है। यह सब नहीं समझ पाते, इसलिए उस तरफ चले जाते हैं।
अंतर यह है कि हम चाहते हैं कि अपनों की कुटिया अच्छी तरीके से बन जाए और यहां आप लोग आकर रहो अपने आत्मिक कल्याण के लिए — और जिन्हें मैं जानता भी नहीं। अभी दो साधक यहां रह रहे हैं अपने आत्मिक कल्याण के लिए। और आप अपने लिए चाहते हो, और अपनी मोह-माया में जितने लोग "मेरा" हैं उनके लिए चाहते हो। यही फर्क है। मैं समाज के लिए अच्छा करना चाहता हूं, आप अपने परिवार के लिए। मेहनत तुम भी कर रहे हो, मेहनत मैं भी कर रहा हूं; तुम्हारी मेहनत तुम्हें अन्य शरीरों में लेकर जाएगी और मेरी मेहनत मुझे उस परमात्मा तक ले जाएगी। अगर यह आपने अपना लिया तो आप भी उस परम सत्ता तक, आत्मज्ञान तक, उस परम आनंद तक पहुंचोगे।
काम के भरोसे। मेरे कर्म से मुझे ताकत मिली है; इसमें राम का कोई लेना-देना नहीं है। जैसा मैं करूंगा, मेरे सामने परिणाम वैसा आएगा। इसमें राम क्या कर लेंगे?
पहले इसको पूरा करें, इसमें काम करें। आगे का ऐसा कोई विचार नहीं है, क्योंकि एक आश्रम मध्य प्रदेश में हो गया, एक यहां हो गया। आश्रम बनाते रहना मकसद नहीं है; जिस उपदेश से हमने बनाया, उस मकसद पर पूरी तरह काम होना चाहिए।
आप किसी के साथ रहो, चाहे सिनेमा देखो, पिक्चर देखो, किताबें पढ़ो, भ्रमण करो — आप कुछ भी देख रहे हो तो उससे कुछ सीख सकते हो। फिल्मों में भी चरित्र दिखाया जाता है, एक अच्छे का, एक बुरे का; आप उससे भी बहुत कुछ सीख सकते हो। एक ही घटना में दो बात घटती है, अच्छा और बुरा; आप क्या सीखते हो, वह देखो। बस ईमानदारी अपना लो, सत्कर्म अपना लो, बेईमानी का त्याग करो। आप कहीं भी घूम सकते हो, किसी के साथ जा सकते हो; बस उसमें ईमानदार रहो, किसी का साथ बेईमानी से मत करो। आप जैसे हो, उसे बता दो; अगर वह स्वीकार करता है तो उसका साथ ठीक है, नहीं तो बोल दो — मैं ऐसा हूं, और हूं तो हूं। क्योंकि मेरी समझ, मेरा कर्म ही मुझे लेके जाएगा; एक दिन यह साथ छोड़ के ही जाना पड़ेगा।
जीवन में उदासी है, तो वो क्यों है? उदासी के लिए आपने काम किया है। या तो पिछले कर्म याद आ रहे हैं, इसलिए उदास हो; या कुछ आपको बेईमानी से मिल रहा था, आपने बेईमानी छोड़ दी, ईमानदारी अपना ली और मिलना बंद हुआ, इसलिए उदास हो। उदासी का कारण जानो।
अगर घर पे मन नहीं लगता, तो देखिए आपकी कुछ जिम्मेदारियां हैं, आपका परिवार है। क्या कोई आप पे निर्भर है? कल वे लोग मेरी जरूरत पर मेरे साथ थे। अगर उनको मेरी जरूरत है, तो उनका साथ सीधा नहीं छोड़ना चाहिए; धीरे-धीरे अपने कर्तव्य-दायित्व को निभाते हुए आगे बढ़ना चाहिए, क्योंकि बात हमें समझ में आई है, उन्हें नहीं। देखो, क्या उनके जीवन में आपकी जरूरत है? ऐसा तो नहीं कि आपके जाने से उनका जीवन डांवाडोल हो जाएगा? तो उन्हें मजबूत बना के आओ — ऐसा मजबूत कि आपके आने के बाद वे अपनी जरूरत के लिए किसी के सामने हाथ ना फैलाएं।
जंजाल नहीं है। उस जंजाल का निर्माण तो हमारे द्वारा ही हुआ है। आप उसे जंजाल मत कहिए, क्योंकि उसको बनाने के लिए आपने कितनी मेहनत की है। बस ईमानदारी, सत्कर्म अपना लीजिए।
हां, मतलब हम यह कार्य कर रहे हैं तो क्यों कर रहे हैं? इस कार्य से सामने वाले का क्या होगा और मुझे क्या होगा? दोनों को देखना है, और दोनों को देखते हुए कार्य करना है।
नहीं। आप 7 दिन के लिए आइए। टिकट कैंसिल करा दीजिए और आराम से 7 दिन के लिए आइए, और पूरी तरह यहां के नियम का पालन करिए। (रहने वालों से) कोई नियम तोड़ता है तो उसे तुरंत भेज दो; समझौता मत करो। जब हमें पता है कि मुझे ऐसे करना है और फिर भी कहूं कि गलती हो गई, तो वह गलत बात है। कहा गया है — दया बिना संत कसाई, दया करी तो आफत आई; अपराध पर दया मत करो, नहीं तो उसके जीवन के साथ खिलवाड़ कर रहे हो। यहां आने वाला अपना आधार कार्ड और पासपोर्ट फोटो लाए, पूरी तरह नियम में रह सके और उसे इस जगह की जरूरत हो, तो आए; अन्यथा मत आए। अगर लगे कि मेरे आत्मिक कल्याण में यह जगह, यह सत्संग सहायक है, तब आइए।
जब कुछ नहीं चाहिए, तो जैसा है वैसा देख पाओगे। जैसे आप दूर से एक दुकान पर फल देख रहे हो; किसी ने पूछा क्या है, तो आप कहोगे फल की दुकान है — अभी आपको फल ही दिख रहा है। जैसे ही लगेगा कि चलो ले लेते हैं, और दुकान के नजदीक पहुंचकर लेने लगोगे, तो कहोगे — यह कच्चा है, यह पक्का है, यह अच्छा है, यह सड़ा है; अनेक तरह की चीजें आ जाएंगी। तो "चाहिए" में जैसा है वैसा ना दिख के, आपकी जानकारी के अनुसार कुछ और दिखने लगता है। जैसा है वैसा तभी दिखेगा जब आपको कुछ नहीं चाहिए। और जब आप सत्कर्म करते हो, तब भी आप वर्तमान में, अपने आप में होते हो, क्योंकि सत्कर्म में इच्छा-अपेक्षा काम नहीं करती; इसलिए सत्कर्म के बाद इतनी तृप्ति और आनंद मिलता है। कोई गिरा और आपने उठा दिया — उतनी देर, जितनी देर आपने उसकी जरूरत में सहायता की, आप आनंद में थे। इसलिए अपने जीवन में ज्यादा से ज्यादा सत्कर्म करो — सारे काम छोड़कर भोजन, और भोजन भी छोड़कर सत्कर्म, अगर इस भवसागर से निकलना है।
व्यथित होने से अच्छा है कि उस आदमी को खोज सकते हो तो खोजो, नहीं तो छोड़ दो। अगर 25 लाख ले भागा, तो जरूर आपको भी कोई गहरा आश्वासन मिला होगा, क्योंकि ऐसे कोई किसी को कुछ नहीं देता। जीव का स्वभाव है कि अगर वह किसी को कुछ दे रहा है, तो कहीं ना कहीं उससे ज्यादा मिलने की उम्मीद है। तो अब या तो उसकी खोज हो सके तो खोज करो, और नहीं तो भूल जाओ, बात खत्म करो।
हां, जो पहले से रह रहा है उसको पता है, उससे पूछ सकते हो; उसे नहीं पता होगा तो इतना तो बता देगा कि उनसे पूछ लो। काम को लेकर बात करो। लेकिन बात तब बढ़ती है जब पूछते हो — तुम कहां से आए? जैसे ही कहा कि तुम्हारे जिले से आया, उसे देख के खुशी होगी और बाकी लोगों को देख के घृणा आएगी। दूर प्रांत में आपके गांव का जानवर या आपके इलाके की नंबर प्लेट वाली गाड़ी भी दिख जाए तो गदगद हो जाते हो, बाकी इतनी गाड़ियां देख के नहीं — यह राग है, कितना अटैचमेंट है। उसके प्रति राग हो जाएगा और दूर वालों से द्वेष। तो आप कतई ऐसा मत पूछिए कि आप कहां से आए हो। गलती उसे कहते हैं जब आपको पता नहीं; पता होने के बाद नियम तोड़ा तो अपराध है।
जब उसका राग और द्वेष पूरी तरह छूट जाएगा। गुरु की आज्ञा में रहने का मतलब है कि आगे का राग-द्वेष ना बने। अब पीछे उसने कितने लोगों से राग-द्वेष बनाया है — जब उससे पूरी तरह छूट जाएगा, तब उसे उपलब्धि हो जाएगी। यहां जितना भी नियम बनाया गया है, आपके लाभ के लिए है; नियम बिना कल्याण नहीं होगा, नियम में सधना ही पड़ेगा।
किसी भी हिसाब से रहिए। संकल्प करने की जरूरत नहीं है, क्योंकि संकल्प आप करते हो तो विकल्प आ जाता है। तो आप सीधा ईमानदारी, सत्कर्म अपना लीजिए, सत्संग सुनिए। बस, बात खत्म; इसमें संकल्प की कोई आवश्यकता ही नहीं है।
रस तो अपने तरीके में है। जैसे दो व्यक्ति बैठे हैं और एक व्यक्ति जा रहा है। एक ने शर्त लगाई कि वह गिर जाएगा, दूसरे ने कि नहीं गिरेगा। वह गिर गया तो जिसने कहा था गिर जाएगा वह खुश होगा, दूसरे को दुख होगा; नहीं गिरा तो उल्टा। तो रस अपने तरीके में है। ऐसा नहीं कि तुम प्राकृतिक स्वाद में फंसे हो — अपने तरीके के स्वाद में फंसे हुए हो। तो अपना तरीका छोड़ो और जरूरत में जियो। स्वाद के लिए भोजन ना करके शरीर के पोषण के लिए भोजन करो, कपड़ा तन ढकने के लिए पहनो, जरूरत में घर पर सामान लाओ। अपने मान के लिए सामान इकट्ठा मत करो; घर में 80% से ज्यादा चीजें ऐसे ही पड़ी रहती हैं। अपनी क्षमता और जरूरत से ज्यादा वस्तु रखोगे तो उसकी रखवाली करनी पड़ेगी, समय देना पड़ेगा — टेंशन ही टेंशन है, रात को नींद नहीं आएगी। तो जरूरत में जियो, अपनी क्षमता के अनुसार, बोझा मत रखो।
अगर आपको मार्ग मिल गया और आपके पास समय है, तो भ्रमण भी करना चाहिए। भ्रमण करने से अपनी समझ विकसित होती है, क्योंकि हर जगह लोग अलग-अलग तरीके से जीते हैं; कभी भूख का सामना करना पड़ेगा, कभी रास्ता नहीं मिलेगा — तो हमारे अंदर मानवता जगती है। लेकिन भ्रमण समझने के लिए करें, बस व्यवस्थाओं का उपयोग करने के लिए नहीं कि दो महीना यहां रहे, एक महीना वहां। किसी से बात करें तो सीखने के लिए, समझने के लिए। जैसे यह नदी है — एक व्यक्ति इसमें स्नान करके प्रणाम करता है, एक इसका जल पीकर प्यास बुझाता है, एक इसमें कचरा फेंकता है, एक इसमें से मछली मारकर खा रहा है, और एक उसी जीव को खिलाकर अपना आत्मिक कल्याण चाहता है। नदी एक ही है; आपको क्या सीखना है, वह देख लीजिए। एक ही स्कूल से कोई डॉक्टर, कोई इंजीनियर, कोई कलेक्टर बनता है, कोई आवारा हो जाता है। दत्तात्रेय भगवान ने 24 गुरु माने, बनाए नहीं — घटना को देखते हुए ज्ञान लिया। आप में सीखने की क्षमता होनी चाहिए।
अब वो आपके ऊपर है। अगर वह आपके मार्ग का मार्गी है, मिटने के लिए तैयार है, तब लेके जाना; नहीं तो बीच रास्ते में झगड़ा कर लेगा। मैं जूनागढ़ गया था; एक जंगल में ऊपर कोई महात्मा रहते थे, लोगों ने कहा मत जाइए, वहां तेंदुआ है। मैंने कहा मुझे भय ही तो खत्म करना है, मैं जाऊंगा। मेरे साथ मेरे गांव का एक व्यक्ति था। मैंने सोचा — मुझे कुछ हो जाए तो कोई फर्क नहीं, पर अगर इसे कुछ हो गया और मैं बच गया तो मैं जवाब क्या दूंगा? वह साधक भी नहीं था। तो मुझे वापस आना पड़ा। डर मेरे अंदर भी था, लेकिन उस डर में भी मैं आगे बढ़ रहा था; वापस आने का कारण वह व्यक्ति बन गया। भ्रमण का मतलब है — लौटूंगा कि नहीं, पता नहीं; यह भाव लेकर जाओगे तब भ्रमण का मतलब होगा। एकदम सुरक्षित, सारी व्यवस्था में चलोगे तो भ्रमण नहीं, पिकनिक हो जाएगा। भ्रमण अव्यवस्था में होता है।
अब देखो आपको लाभ किसमें होगा। अगर आपको लग रहा है कि इससे ज्यादा लाभ भ्रमण में होगा, तभी इसको छोड़ो। आप अपना लाभ देखो कि मेरा कल्याण किसमें है। जीव-जंतु सबको अपना हित पता है — चूहा उतना ही बिल बनाता है जितने में बिल्ली ना जाए। जब एक जगह को छोड़ो तो कभी भी ज्यादा के लिए ही छोड़ना, और बहुत सोच-समझ के छोड़ना, कम के लिए कभी मत छोड़ना। भ्रमण इंद्रियों के सुख के लिए — अलग-अलग भोजन, अलग-अलग लोग, गप्पें — नहीं; जिस उद्देश्य से भाव हुआ, उसी उद्देश्य से करो, उसके अलावा और कोई बात ना करना। अपने मान के लिए, अपना बैकग्राउंड बताने के लिए भ्रमण मत करना; सीखने के लिए करना। यह जगह तो रहेगी, भ्रमण करके आओगे तो भी रह सकते हो। अगर लग रहा है, तो कर लेना चाहिए, ऐसा ना हो कि इच्छा ही रह जाए।
जीव के पीछे तुम ही हो। सबके पीछे तुम ही हो। हाथ के पीछे तुम हो तो उंगली के पीछे भी तुम ही हो; ऐसा नहीं कि हाथ के पीछे कोई और है और पैर के पीछे कोई और। सबके पीछे तुम हो, और तुम ही आखिरी फैसला करते हो कि मुझे क्या चाहिए। तो देख लो कि मुझे क्या चाहिए, और उसके लिए काम करो। कुछ भी होता है तो "मैं" ही चाहता है, "मैं" की ही आज्ञा है।
कोई बात नहीं। यह यहां की ऊर्जा, यहां के सत्संग का प्रभाव है। तो आप वहां भी जाना तो वैसे ही रहना। अगर आपको लग गया कि यह चीज मुझे नुकसान दे रही है, तो मत करना; कुछ भी आए — नहीं करूंगा। करना या ना करना, सब तुम्हारे ऊपर है। अगर तुम मेरे शब्दों में जी रहे हो, तो मैं तुम्हारे साथ हूं; तो तुम गंदी आदत में जाना ही मत। अगर तुमने अपने जीवन में मेरे शब्द अपनाए हैं और तुम उस तरफ नहीं जाना चाहोगे, तो तुम्हें कोई नहीं ले जा सकता, क्योंकि उन शब्दों के पीछे मैं भी हूं। आप अगर इन शब्दों में जिओगे, तो मुझे पाओगे। वह (आदत) कोशिश करेगी, तुम करना ही मत; उसकी कोशिश से थोड़ी ना हुआ था, तुमने भी कोशिश की थी तभी हुआ।
बस जरूरत में जियो, और कुछ नहीं। और सामने वाले की भी जरूरत समझो, ऐसा नहीं कि सिर्फ अपनी जरूरत। आप जहां हो, जिसके साथ हो, उसकी भी जरूरतें हैं; अपनी योग्यता अनुसार उसकी भी सहायता करिए।
नहीं, आप उन्हें नहीं त्यागिए। अगर उनका कोई सेवा करने वाला है तो ठीक है; नहीं तो आप वहां पे रहकर उनकी सेवा करते हुए अपना आत्मिक कल्याण करो। आप 11 महीने उनको समय दो, एक महीने के लिए यहां आओ। अगर (उन्हें आपकी) जरूरत है तो एकदम मत आओ; सत्संग सुनो, अपना आत्मिक कल्याण करो।