प्रश्नोत्तर P10-0067 · भाग 10
मैं जब अपनी समझ से कुछ भी सेवा, दया आदि करता हूं तो बार-बार गिर जाता हूं। फिर वापस ईमानदारी को पकड़ लेता हूं और पीड़ा के बाद उठने लगता हूं। कब तक (गुरु की) समझ से चलना चाहिए और कब अपनी समझ से भी चल सकते हैं?
अपनी समझ से ही तो चल रहे हो ना। अगर किसी ने कुछ बताया, आपको समझ आया, तभी तो आगे बढ़ोगे। आप नहीं समझ पाए तो थोड़ी ना चल पाओगे। अपनी समझ से ही हर व्यक्ति चलता है।
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