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प्रश्नोत्तर — भाग 7

योगी रविकांत जी (गुरु जी) के सत्संग वीडियो से 200 प्रश्नोत्तर। हर उत्तर के साथ वीडियो का लिंक।

कविता कुमारी पूछती हैं, एक गुरु धारण करने के बाद किसी दूसरे गुरु से कुछ सीखना, क्या अपने पुराने गुरु से दगा होता है? नाम और दर्शन किसका करें?

जैसे पृथ्वी पर पानी एक ही जगह से आता है, और नल निमित्त अनेक हैं। कहीं से भी अपनी प्यास बुझाओ। तो किसी से भी ज्ञान लो। ज्ञान एक ही जगह से आता है। दो जगह से नहीं आता। गुरु ज्ञान का प्रतीक है। गुरु तेरा मेरा नहीं है। ज्ञान लो, और आगे बढ़ो।

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कशिश कुमार पूछते हैं, आत्मज्ञान का मार्ग क्या है? कृपया बताइए।

ईमानदारी और सत्कर्म सबसे आसान रास्ता है।

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किस साधना से आत्मसाक्षात्कार हुआ? क्या ध्यान किया है? बताइए। गुरु से ज्ञान लो और आगे बढ़ो, इसका मतलब क्या है?

मैं बोल सकता हूँ। ईमानदारी से करो। बस। अगर मैं बोलूँ तो मैं यही बोल सकता हूँ। गुरु से ज्ञान लो, और आगे बढ़ो। आगे बढ़ो का मतलब यह है, जितना पकड़े हो उसे छोड़ो। अपने आप की तरफ बढ़ो। तो आगे बढ़ो। उसको भी मत पकड़ना। उसके शरीर को मत पकड़ना। ज्ञान लो, और आगे बढ़ो। काम करना पड़ेगा। उसी दिशा में आगे। जो ज्ञान मिला, उसे लगाकर उसी दिशा में आगे बढ़ो। बस वही।

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विनायक पूछते हैं, आत्मज्ञान किसे होता है? मन को, वृत्ति को, चित्त को, या बुद्धि को? समझ की जरूरत किसको है, बुद्धि को या आत्मा को?

आत्मज्ञान किसी को नहीं होता। क्योंकि आत्मज्ञान पहले से मौजूद है। बस बाहर से तुम छोड़ दो। हो गया।

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क्या सूक्ष्म शरीर होता है? स्वप्न में जाते हैं तो कुछ हो जाता है, और स्थूल शरीर पर भी उसका प्रभाव आता है। यह कैसे है?

देखो, स्वप्न में कुछ हो जाता है तो स्थूल शरीर पर भी उसका प्रभाव आता है। जैसे स्वप्न दोष। इसका अनुभव हर व्यक्ति को है। होता है। घटना कहाँ होती है? सूक्ष्म शरीर में। और उसका प्रभाव कहाँ मिलता है? प्रत्यक्ष स्थूल शरीर में। और एक बात यह भी, अफसोस होता है। काश और देर सपना रह जाता। पर रहता नहीं। यह अफसोस सबको है। जिन लोगों को स्वप्न दोष होता है, अफसोस रह जाता है। काश कुछ देर और टिक जाता। क्योंकि वहाँ कोई डर नहीं होता, भय नहीं होता। पर यह अफसोस होता है कि काश और देर सपना रह जाता। और यह सपना मुख्य मौके पर ही टूटता है। मुख्य मौके पर ही जाता है। पता होने के बाद भी अफसोस होता है कि काश स्वप्न और रह जाता। स्वप्न में भी भोग कर रहे हैं। स्थूल शरीर को छोड़ो, इस बात को देखो। स्वप्न में भी हम भोग कर रहे हैं। अफसोस होता है, काश और रुक जाता। पता है झूठ था, पर झूठ ही सही, रुक जाता। वहाँ कौन रसपान कर रहा है? वहाँ क्या जरूरत है? फिर भी अफसोस हो रहा है कि कुछ देर और स्वप्न रहे। पता है झूठ है, फिर भी जागने पर अफसोस हो रहा है। कभी रुका नहीं। मुख्य मौके पर ही टूटता है।

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रामकरण कोटपुतली पूछते हैं, मैं घर पर ही बैंकों का रुपया का लेनदेन करता हूँ और उनसे रुपया लेता हूँ। यह गलत है या सही?

अब देख लो। तुम उचित तरीके से लेनदेन कर रहे हो, या किसी को लूट रहे हो। तुम खुद देख लीजिए।

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संसार से मुक्ति कैसे हो?

बेईमानी और दुष्कर्म छोड़ दो। बस। खत्म बात।

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राम अवतार शर्मा पूछते हैं, होनी और अनहोनी में क्या अंतर है? विस्तार से समझाइए।

तुमने कर्म किया है। बस उसी का परिणाम है। होनी कहो, चाहे अनहोनी कहो।

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प्रशांत गुप्ता पूछते हैं, चेतना, मन, बुद्धि और आत्मा में क्या अंतर है? क्या चित्त ही आत्मा है?

नहीं। आत्मा के बारे में कुछ बोल नहीं सकते।

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आप ध्यान को छोड़ने के लिए कहते हो। बिना किसी विधि के कैसे आगे बढ़ सकते हैं?

कहाँ आगे बढ़ोगे? ध्यान अच्छा करके कहाँ आगे बढ़ रहे हो? बताओ, क्या बढ़ रहे हो? कहाँ ध्यान लगा रहे हो? मुझे कोई बताए। जितने लोग यहाँ ध्यान करते हो, ध्यान में क्या कर रहे हो? बताओ, कहाँ आगे बढ़ रहे हो। पहले इस पत्ते पर ध्यान था। अब खाट पर लगा दिए। क्या फर्क है? बोलो। हो तो बाहर। ध्यान से भी मुक्त हो। क्योंकि ध्यान तुमसे है। और तुमसे कब है? जब तुम्हें कुछ चाहिए। तो कुछ चाहिए से मुक्त हो जाओ। ध्यान से भी मुक्त होकर अपने आप में स्थिर हो जाओगे। सीधी सी बात है।

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श्वेता सिंह पूछती हैं, आप नर्मदे हर क्यों कहते हैं?

बस ऐसे ही। नर्मदा किनारे नर्मदे हर। गंगा किनारे होते हैं तो गंगे हर। अब क्या बोलें। जिसके पास हो, वही बोलोगे ना। तुम्हारे घर में रहेंगे तो तुम्हारा नाम लेंगे। किसी और घर में जाएँगे तो उसका नाम लेंगे। उसके घर में जाकर तुम्हारा नाम लेंगे तो क्या होगा। तो जहाँ रहो, देश, काल, स्थिति, परिस्थिति में, पास में जो है उसको पुकारना पड़ता है। दूर वाले को पुकारोगे थोड़े ही। वह आएगा नहीं।

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दीप पूछते हैं, ज्ञान के लिए चक्रों को एक्टिव करना जरूरी है क्या?

अपने आप हो जाएगा। जितने भी चक्र हैं, ईमानदारी से कर्म अपना लो।

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रावत पूछते हैं, ब्रह्मा, विष्णु और महेश कौन हैं? क्या इनको भी मोक्ष मिला? ये बताएँगे क्या?

ये ब्रह्मा, विष्णु, महेश बताएँगे। हो गए। हो गए।

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आध्यात्म को ना जानते हुए ईमानदारी और सत्कर्म के साथ क्या आत्मज्ञान संभव है?

जैसे हम भोजन करते हैं, उस अनाज का नाम मुझे कुछ मालूम हो या ना हो, अगर हम खाएँगे तो पेट तो भरेगा, और अनाज मुझे पोषण देगा कि नहीं देगा। क्या पोषण के लिए अनाज का नाम जानना जरूरी है? कोई जरूरी नहीं। जल पीते हैं, प्यास बुझती है, चाहे हम पानी की परिभाषा जाने या ना जाने। कहने का मतलब यह कि आप ईमानदारी और सत्कर्म करेंगे। ईमानदारी का काम है, आगे बंधन नहीं बंधने देगा। और सत्कर्म का काम है, आपको बल देगा, और आपके पिछले जितने भी कर्म हैं, जो आपने किए हैं, उनका नाश होगा। और एक समय आएगा, उस परम स्थिति पर उपलब्ध हो जाएँगे। साफ-सुथरी बात है। आप कपड़ा पहने हैं। क्या सब लोग जानते हैं कपड़ा कौन सा है, क्या है, इसकी क्वालिटी कहाँ से आई है, कहाँ का बना है? कुछ जानते हैं? लेकिन आपका तन ढक रहा है। स्वेटर पहनते हैं, आपको पता है कौन सा धागा कहाँ का यूज हुआ है? लेकिन वह आपको ठंड से बचा लेता है कि नहीं? यही है। ईमानदारी और सत्कर्म आपको आपसे मिला देगा। बात खत्म। जीवन में अपना लीजिए ईमानदारी। और सत्कर्म तपस्या है, तप है। आपको आपसे मिला देगा। ऐसा तप है कि आपसे आपको मिला देगा। सब छोड़ देंगे आपको। ईमानदारी और सत्कर्म अपना लोगे तो कोई आपको पूछेगा ही नहीं। क्या ईमानदारी और सत्कर्म अपनाते ही लोग आपको छोड़ने लगेंगे? क्योंकि ईमानदार व्यक्ति जैसा है वैसा बोलेगा, तो उसे पसंद कौन करेगा? और भगवान पसंद करने लगेंगे। कबीर कहते हैं, कबीरा मन निर्मल भयो जैसे गंगा का नीर। पीछे-पीछे हरि फिरै, कहत कबीर कबीर। भगवान पीछे-पीछे दौड़ के आएँगे, तुम्हारे हृदय में वास करने। निर्मलता आ गई ईमानदारी से। यह नहीं करोगे, कुछ भी करो, भटकते रहो। यह नहीं करिए, कुछ भी करिए, भटकते रहोगे। पकड़ यही है। छोड़ने के लिए यह मूल है। ईमानदारी से मुक्ति दे रही है, बाकी सब बाकी है। मूल यह है। कुछ अपनाओ या ना अपनाओ, यह पक्का अपना लो जीवन में। और सबसे ज्यादा हम बेईमानी करते हैं बोलचाल में। सबसे ज्यादा झूठी बड़ाई, झूठी निंदा, झूठी चापलूसी, आकर्षित करने के लिए बातचीत करना, प्रभावित करने के लिए बातचीत करना, जो नहीं हो उसे सिद्ध करना, अपने काम को बनाने के लिए लोगों को आकर्षित करने के लिए बातचीत करना, अपना बैकग्राउंड बताना। बैकग्राउंड की जरूरत नहीं, फिर भी बता रहा हूँ, मैं यह हूँ। कोई आवश्यकता नहीं। कोई आवश्यकता ही नहीं है। कोई पूछ भी नहीं रहा है, फिर भी जाते ही बता रहे हो, मैं यह हूँ। पूछा कौन? अध्यात्म में या कहीं भी इसकी जरूरत कहाँ है? केवल उस जगह पर है जहाँ आप काम कर रहे होंगे। बस, इसके अलावा कहीं जरूरत नहीं। आप जहाँ कर्म कर रहे हो वहाँ आपका परिचय बताना जरूरी है, कि लोग आपका लाभ ले सकें। वह भी सेवा के लिए। वह भी ऐसा थोड़े ही, मान के लिए। भाई, एक डॉक्टर क्लीनिक का बोर्ड लगा देता है, तो बड़ी आसानी से लोग उसे खोज लेते हैं। अब सोचो, वह अपने पीठ पर लिखवाए, या हर जगह जाकर बोले, कोई मतलब नहीं। देख लीजिए, जरूरत है तो कर दे। जरूरत है तो कर दे। तो कहने का मतलब है, मेन ईमानदारी और सत्कर्म है। आप इसे कोई साधारण बात ना समझिए। यही तो आप नहीं कर रहे, इसलिए तो भटक रहे हो। कितनी विधियाँ अपना लीं, कुछ हुआ? आप और ग्रसित हो गए। आप विधियों के पहले अपना जीवन देख लो, विधियों के बाद देखो। आप पाओगे, मैं ज्यादा परेशान हूँ। आप तो बस अपने आप को सांत्वना दे रहे हो। आप हकीकत में बात करिए, आप पाओगे आप ज्यादा परेशान हो। जिसके लिए किया, वह हुआ ही नहीं। जिसके लिए आपने विधियाँ अपनाईं, जिसके लिए आपने साधना अपनाई, वह हुआ ही नहीं। तो समझौता कर लेते हो। करके कर थक गए, तो समझौता करके लोग बैठ जाते हैं, चलो अगले जन्म में देखेंगे। इस जन्म में नहीं होगा तो अगले जन्म में कैसे? अगले जन्म में शरीर बदलेगा, तुम ही तो रहोगे। पुराने जीव के संस्कार भी बने रहेंगे। वह भी बना रहेगा तो बना रहेगा ना। वह तो जारी रहेगा। तो ईमानदारी और सत्कर्म सबसे जरूरी है। ईमानदारी और सत्कर्म मेरे को कर्ता से छुड़ा देता है। आप इसे कोई साधारण शब्द ना समझिए। यह साधारण बात नहीं है। मेन यही है। यह कह सकते हैं कि हर विधि का लक्ष्य यही है। विधियाँ भी मान लीजिए, उनके लिए भी यही अपनाकर विधियाँ करनी हैं। ईमानदारी और सत्कर्म ही आपको आपसे मिलाए, यह पक्का है। अगर आप कर्म कर रहे हैं, तो विधियाँ पकड़ने से भी ज्यादा जरूरी है ईमानदारी और सत्कर्म। नहीं तो विधियाँ आपका पतन कर देंगी। राक्षसों को भी तो दर्शन हुए। क्या हुआ, बताओ? और घातक हो गए। और भी उनका पतन हो गया। वैसे ही अगर बेईमानी और दुष्कर्म जीवन में हो। राक्षस कौन? बताइए। क्या राक्षस मतलब इतना मुँह, इतना हाथ? बेईमानी और दुष्कर्म। अगर आपके जीवन में है तो आप राक्षस हो, दुष्कर्मी राक्षस। धर्मशाला वगैरह, भंडारा वगैरह करा रहे हो, लोगों की सेवा कर रहे हो, तो आप देवत्व भाव में हो, ईमानदारी और सत्कर्म में लगे हो। जरूरतमंद की सेवा कर रहे हो तो सात्विक भाव है। क्या आप अपने आप को मानव बोल सकते हो? ज्यादा संख्या आपको किसमें मिलेगी? राक्षस में ज्यादा मिलेगी। फिर कुछ कम देवता। और फिर एकाध ईमानदारी और सत्कर्म वाले। अब देखो, तुम उस एकाध में हो या नहीं। नहीं हो तो फिर कहाँ हो? राक्षस में। क्योंकि जब आप बेईमानी और दुष्कर्म कर रहे हो तो आप एक राक्षस हो। और राक्षस विधियाँ करेगा तो राक्षस और पतन करेगा। आप जब से विधियाँ अपनाए हो, सबसे ज्यादा आपका परिवार परेशान है। विधि का लक्ष्य अगर ईमानदारी हो, पीछे ईमानदारी छिपी हो, ईमानदार और सत्कर्मी बनना हो, तो आप बना सकते हो। विधियाँ क्यों बनाएंगे? विधियाँ कैसे बनाएंगे? ईमानदारी और सत्कर्म बताइए कैसे किए जाएँ? यह तो आपके हाथ में है। मैं कह रहा हूँ, जब यह आप ही के हाथ में है तो काहे को आप नहीं कर लेते? क्यों विधियाँ? जब हम फैसला लेकर तुरंत जगह पर कर सकते हैं, तो जितना हम विधियाँ करने में समय लगाएँ, उतना सत्कर्म में लगाएँ, तो हमारी जल्दी यात्रा होगी। जिस काम को हम तुरंत कर सकते हैं, विधियों द्वारा क्यों करें? आप बताइए। सही है कि पूरे चिंतन में यह धारणा बनी हुई है, कि कोई चीज है तो उसको मिटाने के लिए यह तरीका है, तो तरीका ही विधि हो गई। तो मैं कह रहा हूँ, साफ-साफ एक तरीका आपके पास है। अभी छोड़ दो, और ईमानदारी से कर्म करो। यह नहीं जम रहा है। आपको यह नहीं जम रहा है। जिस काम को आप तुरंत कर सकते हो, आपके हाथ में है, और आप कह रहे हो कि हम विधि द्वारा करेंगे। प्रत्यक्ष बिल्कुल हमारे हाथ में है। कोई कल्पना नहीं। वही एकदम पक्का विचार है। पक्का कर लीजिए। बस आज के बाद बेईमानी और दुष्कर्म, क्या करता हूँ, बस खत्म। बात हो गई। इतनी सी बात। हम क्यों विधियाँ अपनाएँ? जिस काम को तुरंत हम कर सकते हैं, विधियाँ क्यों अपनाएँ? आप बताइए। हमें तो कोई विशेष प्रयोजन नजर नहीं आता। लेकिन यह कि जैसे हर चीज की आदत पड़ी हुई है, तो विधियों की भी आदत पड़ी हुई है। हमने मान लिया है कि यह वाला यज्ञ कर लेंगे तो भगवान, देवता, या कोई काल्पनिक चीज हमें वरदान दे देगी। यह हमारी एजुकेशन में, हमारी परवरिश में, हमारे बड़े होने में सब चली आ रही है। अच्छा, विधियाँ करने में समय दोगे। विधियों से बेईमानी और दुष्कर्म छोड़ना चाहोगे। पता नहीं छूट पाएगा कि नहीं, क्योंकि ताकत आएगी, ऊर्जा मिलेगी, और पतन करोगे। लेकिन आपके हाथ में तुरंत था। और जितना विधियों में समय लगाते, उतना सत्कर्म में देते, आपका जल्दी कल्याण हो जाता। लेकिन आप अपना कल्याण करना ही नहीं चाहते। विधिपूर्वक सत्कर्म कर सकते हैं कि नहीं? सत्कर्म तो जरूरतमंद की सेवा है। उसमें विधि की जरूरत नहीं है। जरूरतमंद की सेवा, बस इतना है। यही सत्कर्म। इसी को सत्कर्म कहते हैं। जैसे अभी उस कुतिया के लिए हमने देखा, वह लंगड़ा रही थी। मैंने उसको देखा। वही कुतिया इनके सामने खड़ी नहीं हो रही थी, भाग रही थी। मैंने कहा, जरा देखो क्या है। नहीं खड़ी हुई। और हम गए तो उसने खड़े होकर रुकी। हमने उसका पाँव हाथ में लिया, देखा, तो उसमें मवाद था। दवा मँगवाई। करुणा को अनुभव कर लिया होगा। मैं वही कह रहा हूँ। उसे मैंने महसूस किया। आखिर वह मुझे भी नहीं जानती, उन्हें भी नहीं जानती। अगर देखती है तो इनको भी देख रही है, मुझे भी देख रही है। तो जाते ही कैसे सो गई? क्योंकि मैंने कभी उसको सताया नहीं था। ऐसा भी नहीं कि पहले कभी सताया हो। इन्हें भी देखती है, हमें भी देखती है। बिस्किट यही लोग डालते हैं, उधर से डाला जाता है। लेकिन मैं गया तो सो गई। मैंने हाथ में लिया, स्प्रे मारा। तुरंत फोन किया कि भैया, दवा लेकर आना, घाव पर मारना है। इसी को कहते हैं सत्कर्म। लेकिन मुझे इससे मतलब भी नहीं है। मैं बता रहा हूँ। सत्कर्म को मैं पार कर गया हूँ। अब मैं ईमानदार भी नहीं रहा। समझ रहे? अब खत्म हो गया सब मेरी जिंदगी से। उसको हम जानते भी नहीं। वह कहाँ रहती है, क्या उसका नाम है, क्या पता है। बस देखा कि चोट लगी है, मैंने तुरंत मँगवा लिया। एक बार मैं भँडा गाँव में रहता था। एक काली सी कुतिया थी। जानवरों की समझ मैं बता रहा हूँ। मैं नेरू भाई की दुकान पर बैठा रहता था। कोई भी आए तो मैं बोलता, बिस्किट लो और उसे दो। उसका पेमेंट मैं करता था। जितना होता था मैं कर देता था। बिस्किट लोग देते थे, कभी-कभी हम भी खिला देते। जब मैं निकलूँ तभी वह आए। जब मुझे देखे तभी आए, और मेरे पास आए। उनके पास कभी नहीं जाए। डालने वाले यही लोग हैं, लेकिन कभी वह कुतिया इनके पास खड़ी नहीं हुई। जब आती थी तो मेरे सामने आकर पूँछ हिलाती थी। मैंने देखा, वह कभी उनके पास खड़ी नहीं होती। मतलब उसकी समझ देखी। उसको पता था बिस्किट कहाँ से आता है। सोचिए, जानवर को यह पता था। कई लोग देते थे, किसी के पास नहीं खड़ी होती थी। मतलब उसे पक्का था, यह नहीं देगा। देता तो है, लेकिन बिस्किट यहाँ से आता है, उसे पता था। दुकान पर भी नहीं खड़ी होती थी। किसी के पास नहीं खड़ी होती थी। और जैसे मैं निकलूँ, वह कहीं भी हो, देखते ही दौड़ के आ जाए। बस उसका एक ही काम था, खड़े होकर पूँछ हिलाना, बिस्किट चाहिए। तो इनमें इतनी समझ होती है। मैंने वही आज महसूस किया कि मैं गया तो सो गई। पहले मैंने कहा, जरा देखना क्या हुआ है उसे। उसकी समझ अद्भुत है। मैं बोल सकता हूँ, अद्भुत है, कि किसी के पास कभी नहीं खड़ी हुई। पकड़ में आने वाली चीज नहीं है। अब मेरे पास आ जाए। जैसे ही मुझे देखे, दौड़ के आ जाए, और पूँछ हिलाने लगे। वह वस्तु का नहीं, करुणा और प्रेम का मामला है। आखिर उसे यह पता था कि यह यहाँ से आता है। यह लोग बस देने के निमित्त हैं। ये लोग नहीं देते। इतना उसे पक्का पता था। और अगर आप ईमानदारी और सत्कर्म करने के लिए तैयार हो, तो प्रकृति आपको मौका देती रहेगी। अगर आप तैयार हो तो। मूल यही है। और जब आप तुरंत कर सकते हो तो समय क्यों बर्बाद कर रहे हो विधियों में? बताइए। मेरा यह कहना है कि जिस काम को हम तुरंत कर सकते हैं, उसमें समय क्यों बर्बाद करें। ठीक है, फिर विधियाँ करो, उसमें समय दो, होगा कि नहीं होगा। लेकिन यह तुरंत हो सकता है। मैं समझ के करूँ। और तुरंत ईमानदारी और सत्कर्म की शुरुआत कर दें तो हमारी यात्रा होने लगेगी। मैं इतना समय विधियों में क्यों गवाऊँ? आपको क्या लगता है गवाना चाहिए? मुझे तो नहीं लगता। कोई जरूरत नहीं। वह भटकाव है। और भटकाने में लाखों लोग लगे हैं। अपने आप को गुरु कहते हैं, दुकानें खोले हैं। दुकानदारी है। जिन्हें आज तक बताया गया, कर्म का सिद्धांत बताया गया। पहले महापुरुष कर्म का सिद्धांत बताते थे। और कोई ऐसा व्यक्ति निकलता था जिसे कुछ नहीं चाहिए था। ना कुछ करना है, ना कुछ चाहिए था। तो उसको कुछ पकड़ा देते, जाओ ले, बैठ जाओ। क्योंकि तुम्हें छोड़ने के लिए कुछ तो थमाना पड़ेगा। अब तुम्हें कुछ नहीं चाहिए, लो इसको लो, बैठ जाओ, उपलब्धि हो जाएगी। क्योंकि उसको उन्होंने कुछ नहीं चाहिए के लिए पकड़ा। वह तो कुछ नहीं चाहिए ही है। वहाँ से छूटेगा, इसमें आएगा। और यह तो कुछ नहीं चाहिए, उपलब्धि हो जाएगी। लेकिन कब? जब कुछ नहीं चाहिए। कर्म करते हुए ईमानदारी और सत्कर्म जरूरी है, सबसे जरूरी। समझ रहे? लेकिन लोग क्या कर रहे हैं? कर्म करते हुए बेईमानी और दुष्कर्म कर रहे हैं, और गुरु से मंत्र ले रखा है। और उस मंत्र से पतन हो रहा है। इतिहास में ज्यादातर देखिए, मंत्र किसको दिया गया? जिन्हें कुछ नहीं चाहिए। पात्रता। कुछ नहीं चाहिए का भाव। ले भैया, कुछ नहीं चाहिए, लेके बैठ। उससे नुकसान ऐसे हो रहा है कि व्यक्ति अपने आप को सांत्वना दे रहा है, कि पाप किए, कुकर्म किए, लेकिन यह कर लिया तो सब माफ हो गया। ऐसा होगा नहीं। माफ कहाँ होगा? वही अपने आप को सांत्वना दे रहे हैं। गुरु घुमा-फिरा के सांत्वना दिला रहा है। आप सीधा बोल रहे हो, थोड़ा। उतना रूखा शब्द नहीं डालना। लेकिन है तो चीटिंग ही, एक तरह से अपने साथ। पैर में चोट लगी है और सिर का इलाज हो रहा है। कहाँ की चोट और कहाँ इलाज। वह तो सड़ेगा। यह भी सड़ने लगेगा। पहले एक घाव था, अब दूसरा तैयार हो रहा है। कुछ नहीं चाहिए की स्थिति आने के बाद मंत्र देते हैं। वह धारणा, वह पात्रता, कुछ नहीं चाहिए का भाव बन गया था। पात्रता चाहिए। तो उन्हें पकड़ा देते हैं, ताकि वह उसी रास्ते में चल सके। इसलिए पकड़ा देते हैं कि तुम वह सब छोड़ चुके हो। छोड़ने की बात है, छूटा तो नहीं है। लेकिन कुछ पकड़ा देंगे तो वह छूट जाएगा, फिर यह भी छूट जाएगा। यह तो कुछ नहीं चाहिए के लिए पकड़ा है। यह पकड़ा ही नहीं गया। यह बता दिया गया है कि यह पकड़ने से आप अपनी स्थिति में आ जाओगे। तो जैसे वह छूटेगा, यह तो पकड़े नहीं, अपने आप में हो जाओगे। वहाँ से छुड़ाने के लिए पकड़ा दिया। लेकिन किसको? जिसे कुछ नहीं चाहिए। वाल्मीकि हुए, ध्रुव हुए। उन्हें तब दिया गया। पहले समझाया गया, वापस जाओ, वापस जाओ, वापस जाओ, फिर दे दिया। अगर आप देखेंगे तो नारद का मंत्र नहीं था, वाल्मीकि के मुँह से ही बात निकली। उन्होंने राम कहा, उनसे मरा निकला। तो मंत्र किसका था? अब बताइए। मेन भाव की बात है। सारा खेल भाव का है। मरा-मरा करके पहुँच जाऊँगा। बोले, पहुँच जाओगे, जाओ। क्या भाव। इतना सघन हो गया कि प्रेम की बरसात हो गई। उन्होंने पक्का कर लिया। शब्द कुछ भी रहे। मैं कह रहा हूँ, वह शब्द किसका था? इन्होंने राम दिया, उनसे मरा निकला। उनका तो वही अभ्यास था। बोले मरा-मरा करते जाओ, मरा-मरा से हो जाएगा। तूने पक्का कर लिया है। पक्का हो जाएगा। जाओ, हो जाएगा। नाम जप से विकार भी हट सकते हैं, अगर कर्म नहीं कर रहे हो तो। अगर कर्म कर रहे हो तो ईमानदारी और सत्कर्म सबसे जरूरी है। बैठ जाओ ना। या तो तुम निकल लोगे, या तो निकल लोगे। हर स्थिति में निकल ही लोगे। यहीं से, कहीं से भी। बस। ऐसा भी कर सकते हो। आपके ऊपर है।

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ना करने में आपका अनुभव कैसे होता है? जब कुछ नहीं चाहिए, तब अनुभव कहाँ है?

ना करने में आप होते हो, फिर भी पता नहीं करने में क्यों भाग रहे हो। सीधा-साधा हमारे हाथ में है, फिर भी हम दूसरे के हाथ में देकर घूम रहे हैं, करवा दो, करवा दो। ना करने में आपका अनुभव कैसे है, कैसे होता है? ना करने में आप हैं। बात इतनी है। ना करने में अनुभव कैसे आता? नहीं आता। कुछ नहीं है तो हम वहाँ अनुभव कहाँ हैं। आप कैसे हो। वही तो बात है। हम उसमें कहाँ हैं। हम तो उसमें तब होते जब मुझे कुछ चाहिए होता। अनुभव तो तब होगा जब कुछ चाहिए। कुछ नहीं चाहिए का क्या अनुभव। कुछ भी नहीं होगा। अनुभव भी नहीं होगा। आप कहाँ हो। उसका भी कैसे अनुभव हुआ। वही बात है। जब कुछ भी नहीं, तो हम भी नहीं हैं। एकदम। जैसे आपने कहा, यह तुरंत मेरे में आ गया ना। बोलते ही मेरा आता है। हमसे बाहर। जैसे कुछ हुआ, वह मेरा। आप अंदर भी बोल रहे हो तो मेरा आ गया ना। अंदर बोलो, चाहे बाहर बोलो। मेरे से ही संबंध बनेगा। हमने व्यक्त किया तो मेरा ही है वह। पहली बात तो व्यक्त होगा ही नहीं। व्यक्त हुआ, मेरे से हुआ। अगर व्यक्त हुआ तो फिर आप मेरे में हो। अगर आपने बताया तो आप मेरे में हो। अगर आप देखेंगे तो स्थिति का वर्णन भी नहीं हो सकता। वर्णन नहीं किया जा सकता। कोई स्थिति ही नहीं। स्थिति का भी तो दायरा है।

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व्यवहार में बाहर की चीजों से संबंध कैसे बनता है? श्मशान में लाश जलती देखकर नमकीन कैसे खाई जाती है? भोजन का संबंध शरीर के लिए है या अपने लिए? जरूरत में जीने पर संबंध होते हुए भी संबंध क्यों नहीं रहता?

जो व्यावहारिक जीवन जी रहा है, जैसे हम यहाँ बैठे हैं, तो हम अपने और बाहर की चीजों से अंतरसंबंध बनाए हुए हैं। आपको हम सुन रहे हैं। जैसे यह प्रकृति है, हवा चल रही है, पौधे हैं, तो हमारा अंतरसंबंध है ना उनसे। मेरा हुआ। आपको चाहिए इसलिए आप उसमें लिप्त हो। एक उसमें राग-द्वेष में देख रहा है। एक सिर्फ दिख रहा है, तटस्थ है। बस दिख रहा है। उसे कुछ नहीं चाहिए। आप देखिए, श्मशान में जाते हो, और कैसे आप नमकीन खाते हुए लाश को जलते देखते हो। बताओ। संबंध नहीं है। उसके साथ कोई अपना होता है तो बात दूसरी है। और कोई आकर बता दे कि आपके संबंधी हैं, फिर दूसरे तरह हो जाता है। वह भाव से ही संबंध बना। कर्म से संबंध नहीं है। घटना से संबंध नहीं। वह हो रहा है तो हो रहा है। हम तटस्थ हैं। हम निरपेक्ष हैं। यही कहना चाह रहा हूँ। अगर संबंध बना रखा है तो आप अपने आप में स्थिर हो ही नहीं पाएँगे। जब तक संबंध है, आपने संबंध बना के रखा है। संबंध हमेशा राग में ही बनते हैं। सहज भाव में भी तो संबंध है। जैसे हम भोजन कर रहे हैं तो भोजन से हमारा संबंध है। भोजन क्यों कर रहे हो। अब यह देखना है कि शरीर के लिए कर रहे हो कि अपने लिए कर रहे हो। शरीर के लिए। जी की वजह से नहीं। शरीर की वजह से। जी तो उसमें छिपा ही हुआ है। स्वादिष्ट होगा तो और लग जाएगा। संबंध हमारा सीधा भोजन से नहीं, लेकिन संबंध हमारा शरीर से तो है। आखिरी में शरीर से भी छूट जाना है। आप जितना भी कर रहे हो, किसके लिए कर रहे हो। छूट जाना है। शरीर से भी छूट जाना है, सारी चीज से। लेकिन शरीर के निर्वाह के लिए, जीवन निर्वाह के लिए, जो हमारा अंतरसंबंध बनता है प्रकृति से, अगर जरूरत में जी रहे हो तो संबंध होते हुए भी संबंध नहीं है। जरूरत में जी रहे हो तो संबंध होते हुए भी संबंध नहीं।

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माता-पिता, पत्नी और पुत्र के प्रति जो भाव है, उसे प्रेम कहें या मोह? प्रेम किसको देखता है?

जैसे पिता-माता हैं तो एक आत्मीय स्नेह हुआ। अब वह देखना है। जरूरत तो है स्नेह की। पिता का प्रेम, माता का प्रेम, पुत्र की तरह हमारा प्रेम। उसे प्रेम नहीं बोल सकते। वह मोह आ सकता है। प्रेम नहीं बोल सकते। तो फिर तो सूख जाएँगे ना। माँ से इतना प्रेम था, तो पत्नी आने के बाद पत्नी से ज्यादा और माँ से कम क्यों होता है। हम सबके लिए नहीं बोल सकते, लेकिन ज्यादातर तो यही है। माँ का माँ का ही है, पत्नी का पत्नी का है। लेकिन फिर भी पत्नी आने के बाद जितना हम पत्नी के लिए कर सकते हैं उतना माँ के लिए नहीं कर सकते। जितना अपने बेटे के लिए कर सकते हैं, उतना भाई के लड़के के लिए नहीं कर सकते। अगर प्रेम होता तो किसी के लिए भी कर सकते। यह मोह है। प्रेम नहीं बोल सकते। जरूरत में तो संबंध है। और उन संबंधों का निर्वाह सृष्टि की व्यवस्था में है। तो एकदम से सूख तो नहीं जाएँगे। जरूरत में जियो। देखिए, मान लीजिए आपका भाई का लड़का बीमार हो जाए। आपका देने का दायरा एक होगा। लेकिन आपका पुत्र बीमार हो जाए तो सारे दायरे तोड़ दोगे। क्यों। जरूरत वहाँ भी है, जरूरत यहाँ भी है। दायरे वहाँ क्यों नहीं तोड़े, और अपने में क्यों तोड़ रहे हो। मोह है। प्रेम नहीं है। प्रेम जरूरत देखता है। और जो सामने खड़ा है उसे दे देता है, सब। पहले यही प्रेम की परिभाषा है। वह यह नहीं देखता कि मेरा और तेरा। जरूरत देखता है। प्रेम हमेशा जरूरत देखता है। फिर वह रिश्ते भी नहीं देखता। यह अपूर्व स्थिति है। सिर्फ जरूरत दे। यह सामान्य नहीं है। सामान्य में प्रेम प्रकट ही नहीं हो पाता। हो ही नहीं पाता, जब तक बोध नहीं होता। एकदम नहीं होगा। उसके पहले बस प्रेममय जीवन होगा।

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बोध के बाद भाव क्या रहता है? पहले तुम और बाद में मैं, क्या यह बोध का लक्षण है? तब प्रेम कैसे होता है?

बोध के बाद, जब बोध में व्यक्ति नहीं रहता, तो उसका भाव यह रहता है। बोध से पहले कहेगा, पहले मैं, बाद में तुम। और बोध होने के बाद कहेगा, पहले तुम, बाद में मैं। बस इतना है। यही है। बोध नहीं हुआ तो वह कहेगा, पहले मैं, बाद में आप। बोध होने के बाद कहेगा, पहले आप, बाद में मैं। बस यही है। बोध मिट गया। खुद को है ही नहीं। पहले आप। जो है, सब पहले आप। बस यही है। अगर यह भाव आ गया तो बोध हो गया। बोध हो गया तो यह भाव आ गया। क्या यह लक्षण है उसका। तभी प्रेम है। तभी प्रेम हो पाएगा। एकदम पूरी तरह। हाँ, पूरी तरह। इसके पहले तो बस इसकी झलक दिखाई पड़ती है। यही बोध है, और यही प्रेम है। वह यह नहीं देखेगा कि तुम कौन हो। कौन उसके जीवन से खत्म हो जाता है। उसके जीवन में कौन है, यह नहीं रहता। कौन तो प्रश्न पैदा करने वाली चीज है। फिर उसमें सापेक्षता आ जाएगी। तुम कौन हो, यह नहीं रहता।

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कैसे का भेद और कौन का भेद कैसे मिटता है? तुम कौन हो, यह कब पूछा जाता है? जरूरत खत्म होने पर मैं और तुम क्या रह जाते हैं?

कैसे वाला भेद, कैसे मार्ग, बताइए। कौन वाला। कौन का भेद। कौन भेद ही तो है। यह भेद मिटे तो आत्मवत् सर्वभूतेषु। सारे जीव-जगत आपके समान। तुम कौन हो, यह मैं आपसे तभी पूछूँगा जब मुझे आपसे कुछ चाहिए। अगर मुझे आपसे कुछ नहीं चाहिए तो मैं आपसे पूछ ही नहीं सकता कि तुम कौन हो। कोई कह सकता है कि उसमें कुछ स्वार्थ है। कुछ भी तो है। कुछ मुझे चाहिए। बात चाहिए की है। अगर कुछ चाहिए तो मैं आपसे पूछूँगा कि आप कौन, तब मैं बताऊँगा कि मुझे यह चाहिए। और मुझे कुछ नहीं चाहिए तो मुझे पूछने की जरूरत ही नहीं। अगर मैं पूछना भी चाहूँ तो नहीं पूछ पाऊँगा। कैसे पूछूँगा। तुम तुम हो। मैं मैं हूँ। ना तुम हो, ना मैं हूँ। ना मैं हूँ, ना तुम। बस जरूरत में हम और तुम। जरूरत खत्म होते ही खत्म। हम ना, तुम ना। तुम ना, हम ना। हमारी जरूरत की वजह से हमने एक-दूसरे को जन्म दिया। दवा मँगानी है तो दुकानदार है। दुकानदार का परिचय है। अगर वह जरूरत खत्म हुई तो उसके और मेरे में कोई भेद नहीं। जरूरत खत्म। ना तुम तुम, ना मैं मैं। जरूरत ने पैदा किया तुमको। और तुमको बताना पड़ा कि मैं हूँ। क्या भाव पैदा होने लगता है। जरूरत खत्म तो सब खत्म। तुम भी खत्म। प्रकृति यह प्रत्यक्ष कराती है। शरीर नष्ट हो गया। सारी जरूरत खत्म हो गई। सारे लोग खत्म हो गए। कोई संबंध बना बचा ही नहीं। लेकिन वहाँ तक पहुँचने से पहले बोध नहीं हो पाता। उसके बाद कौन बचा। मरने वाले के अंदर कोई स्मृति नहीं है। जीने वाले के अंदर भी मरने तक स्मृति है। उसके बाद दिखाती है। हर बार पिक्चर दिखाती है। पिक्चर ही तो देख रहे हैं। काश इस पिक्चर को देखने से मुक्त हो जाते। लेकिन पिक्चर देखने में लगे हैं। हर बार जीवन में एक नई कहानी साथ आ जाती है। पता है कि शुरुआत क्या है और आखिरी क्या है। पता है। आदि और आखिरी। और शायद पूरा पता नहीं है। तभी तो थोड़ा सा अटका है। अगर वह बहुत ज्यादा पता चल जाता तो बुद्ध हो गए होते। इतना तो पता है कि आप जिस जगह पर हो, आपका क्या परिणाम होगा। कुछ ढीला-ढाला पता है। ज्यादा ठोस पता नहीं है। आइडिया की तरह पता है। विचार की तरह पता तो है। जरूरत खत्म, सब खत्म। जरूरत में तुम। जरूरत खत्म, तुम भी खत्म। और तुम खत्म तो मैं खत्म। क्योंकि तुम्हारे लिए तो मैं पैदा हुआ। तुम्हारे बगैर तो मैं था ही नहीं। मैं अकेले कौन सा। इसलिए मैं कहता हूँ कि जरूरत में जियो। और एक समय ऐसा आएगा कि कहोगे, अरे मेरी जरूरत ही नहीं है। यह तो शरीर की जरूरत है। इसलिए मैं कहता हूँ, अभी जरूरत में जियो। एक समय ऐसा आएगा कि समझ में आ जाएगा, मेरी कोई जरूरत ही नहीं है। शरीर रहने तक शरीर की जरूरत तो है। लेकिन आपने अपनी जरूरत बना के रखी है। इससे निकलने के लिए आपको जरूरत में जीना पड़ेगा। एक समय ऐसा आएगा, कहोगे, अरे मेरी जरूरत ही नहीं है। ऐसा समझ में आए। इसलिए हम कहते हैं, जरूरत में जीना चालू कर दो। बस।

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जरूरत में जीना क्या अभ्यास है? व्यक्ति की वास्तविक जरूरत कितनी है?

यह अभ्यास का विषय है क्या? समझ के जी रहे हो तो अभ्यास नहीं बोल सकते। अभ्यास तो एक आदत है। इसे अभ्यास भी नहीं बोल सकते, क्योंकि आप अपनी समझ से कर रहे हो, मेरी समझ से नहीं। नहीं करना है। पहले कर रहे थे, अब नहीं करना है। बात खत्म। कोई नया अभ्यास थोड़ी करना है। पुराने अभ्यास को छोड़ना है। पुराने, जरूरत से ज्यादा में जी रहे थे। अब उसे छोड़ना है। तो यह अभ्यास नहीं। अभ्यास से मुक्त होना है। अभ्यास तो करके कर लिए थे। छोड़ना है। और यह छोड़ना। बहुत सारे लोग गंभीरता से पूछते हैं, भाई इसे कैसे छोड़ें। मतलब नहीं। सिर्फ जरूरत में जीना है। बस हो गया। क्या जी लिया। खूब खा लिए, खूब उड़ा लिए, खूब कर लिया। अब चलो जरूरत में जी के देखते हैं। एक नया जीवन का अनुभव। यह मौलिक चिंतन है। एक व्यक्ति की वास्तविक जरूरत बहुत न्यून है। इतनी कम है कि उसके लिए चौबीस घंटे बर्बाद करना बेवकूफी होती है। एकदम। और हमने चौबीस घंटे को भी कम समझ लिया है, अपने संधान के लिए, अपने कार्यक्रमों के लिए। तो वह हमारी जरूरत नहीं है। कुछ और है। जरूरत से ज्यादा हो रहा है।

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ईमानदारी और सत्कर्म तो पहले से था, किसी ने इस पर गौर नहीं करवाया। क्या आप कुछ नया बता रहे हैं? दूसरे देश से आए व्यक्ति को रुकना चाहिए या चले जाना चाहिए?

ऐसा नहीं कि मैं कुछ इसमें नया बता रहा हूँ। लोगों ने हमें बताया नहीं, हम समझ नहीं पाए। बस बात इतनी सी है। मैं आपको नया नहीं बता रहा हूँ। हमने कुछ पैदा किया नहीं। जैसा मैंने समझा, वैसा बताया। और जैसा था, वैसा हमने समझ लिया। इसलिए इस तरह से बड़े सरल रूप में बता रहा हूँ। ऐसा नहीं कि मैंने कुछ नया पैदा किया। कोई नई विधि पैदा की। ऐसा कुछ भी नहीं। इसलिए तो एक शब्द में, मैं नहीं हूँ। जैसा था वैसा समझा मैंने, और वैसा आपके सामने बता रहा हूँ। बस बात खत्म। अभी तो दूसरे देश से लोग आ रहे हैं। इसी कारण से आमद है। मेन यही है। हाँ तो रहो। रहोगे तब समझ में आएगा। अब जाना नहीं। आप कहाँ गए थे? नहीं जा सकते, बैठो। रोक नहीं सकते तो क्या रोकूँ। बाढ़ थोड़ी ना आ रही थी कि रोक देते। नहीं रोक सकते थे। एक दिन आएगा। एक दिन तो रहो। एक दिन में बहुत कुछ समझ में आएगा। और यही अपना लिया अपने घर पर, तो निकल जाएगा। जितने दिन रह सकते हो, रहो। और यहाँ के क्रम को समझो। जितना हो सकता है, पूरी तरह घर जाकर अपना लो। फिर जरा कमजोरी इधर-उधर हो, तो मजबूती के लिए फिर आ जाना। कुटिया तो रहेगी, मैं रहूँ या ना रहूँ। समझ में आएगा। हमारे कहने से क्या होगा। हम तो कुछ भी बोलें। आप रहिए, समझ में आएगा।

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हम खुद से ही जो बेईमानी करते हैं उसका क्या उपाय करें? अंदर की नकारात्मक ऊर्जा कैसे हटे? क्या बिना दूसरे को धोखा दिए अपने आप को धोखा दे सकते हैं?

दूसरों से पहले करना बंद कर दो। नकारात्मक वाला काम बंद कर दो। बस बात खत्म। अच्छा, एक बात बताइए। खुद को कैसे धोखा देते हो? बताओ। क्या आपको लगता है, बिना दूसरे को धोखा दिए अपने आप को धोखा दे सकते हो? मेरा के बिना आप स्वयं को कैसे धोखा दे सकते हो? बताइए कैसे। दूसरा है ही नहीं, तो तुम तो हो ही नहीं। धोखा किसको दोगे? धोखा दो में होता है। एक में तो धोखा हो ही नहीं सकता। कैसे बताइए। सिद्ध करिए। एक में धोखा कैसे हो। धोखा तो कभी भी होगा तो दो में होगा। एक में तो हो ही नहीं सकता। इस पर बात करना बहुत जरूरी है। आप अपने आप को धोखा कैसे दे सकते हो? यही तो मैं पूछ रहा हूँ। आप अकेले धोखा कैसे दोगे? धोखा के लिए तो दो चाहिए। एक में तो धोखा हो ही नहीं सकता। हो सकता है क्या? बिना दूसरे को धोखा दिए खुद को नहीं दे सकते। मैं आपसे यह पूछ रहा हूँ कि एक में धोखा हो सकता है क्या। धोखा तो तब हो सकता है जब दूसरा मौजूद हो। तो आप दूसरों को धोखा दे रहे हो। अपने आपको कभी धोखा नहीं दे सकते। आदत है। तुम माल खा रहे हो, उसकी भरपाई कर रहे हो। धोखा नहीं खा रहे हो। माल खा रहे हो, रसपान कर रहे हो, उसकी भरपाई कर रहे हो। बात को समझो, जरा बहुत गहराई से समझो। तुम धोखा नहीं खा रहे। तुम माल खा रहे हो, और उसका बिल चुका रहे हो। बस। एक आदमी बैठा-बैठा माला जप रहा है। क्या कर रहा है? माला तो है। माला तो दो हो गई। माला तो स्वयं नहीं है। माया तो स्वयं नहीं है। मैं कह रहा हूँ, स्वयं को धोखा कैसे दे सकता है। मैं आपसे यह पूछ रहा हूँ, बिना दूसरे को धोखा दिए। आराम से सोचिए। क्योंकि मुझे कहीं नहीं जाना है, और आपको भी कहीं नहीं जाना है। अभी बताइए। भ्रम टूटना चाहिए। मेन बात यह है। नहीं टूटेगा तो फिर यही कहते रहेंगे। जो ऐसा लगता है, इसका जो दूसरापन है, वह जरूरी है। इसलिए तो हमने कहा, आज बात कर लेते हैं। स्वयं को धोखा देने के लिए स्वयं को कभी धोखा दे ही नहीं सकता। जब भी धोखा देगा, दूसरे को देगा। वह भी रसपान के चक्कर में। फिर रसपान का बिल पड़ेगा। बिल भरना पड़ेगा ना। बात समझ में आ गई? क्योंकि इसको भी लोग लेकर ढो रहे थे। हमने कहा, आज इसको साफ करो। आप लोग भी ढो रहे होंगे। एक व्यक्ति दूसरे को धोखा दे रहा है और समझ यह रहा है। तो कोई जानता ही नहीं है। इसको क्या कहेंगे। वह तो जानता है। धोखा तो तब होता जब वह भी नहीं जानता। वह तो जानता है ना। पूरी समझ के साथ कर रहा है। तो धोखा कहाँ हुआ। धोखा तो तब होता है जब वह नहीं जानता। वह तो जान रहा है। कोई जाने या ना जाने, वह तो जानता है। धोखा भी समझता है, जान के साथ कर रहा है। धोखा उसके साथ कर रहा है, अपने साथ नहीं। दूसरे के साथ, रसपान के चक्कर में। और फिर रसपान का बिल भर रहा है। बस। व्यक्ति अपने आप को कभी धोखा नहीं दे सकता। यह समझ लेना। जब भी वह धोखा देगा तो किसी और को। फिर वह धोखे का बिल भरेगा। आदत तो आदत। कल से छोड़ूँगा, कल से छोड़ूँगा। आदत किसी और में है ना? नहीं। मैं गुटखा खा रहा हूँ। हाँ तो मत खाओ ना। वह खुद का धोखा नहीं। उसे पता है। उसे पता है मुझे नुकसान करेगा। बात समझ गए? उसे पता है। और पता नहीं, फिर धोखा भी नहीं है। खा रहा है। समझना। व्यक्ति कभी अपने आप को धोखा नहीं दे सकता। जब भी धोखा देगा, किसी और को। वह भी रसपान के चक्कर में। बात समझ में आ गई? कोई संशय हो तो बोलना। पीने वाला तो देख रहा है कि मैं पी रहा हूँ। धोखा तो तब होता जब बीड़ी डाले और पता ही नहीं चले कि मैं बीड़ी पी रहा हूँ कि नहीं। और अगर पता नहीं होता, फिर धोखा भी नहीं होता। घुमा-फिरा के, धोखा अपने आप को नहीं दिया जा सकता। यह कहा कि आज के बाद हम यह नहीं करेंगे। और वही व्यक्ति दस मिनट के बाद, जब कंपनी में है, वही कर रहा है। तो दोनों में वह है ना। एक में नहीं बोला, एक में हाँ कर रहा है, ऐसा नहीं। दोनों में वह है। वह भोग रहा है। भोगता बोल सकते हैं। उसे भोग कह सकते हैं। लेकिन धोखा नहीं बोल सकते। फल जाएगा। जैसे सज मिलेगा, फल मिलेगा। वह तो देख रहा है। दूसरे से बोला। अगर दूसरा ईमानदार है तो उसे सजा मिलेगी। दूसरा भी वैसा है तो नहीं मिलेगी। बहुत कुछ है। लेकिन बात समझ में आ गई। साफ करना बहुत जरूरी था। जेब में पैसा होने के बावजूद मना करूँ, तो सामने वाले के लिए वचन सत्य हो गया। उसे पता नहीं कि हमारे पास है कि नहीं। लेकिन मुझे पता है कि मेरे पास है। उसे भी पता है तुम्हारे पास है, तभी माँगने आया था। भले ही तुम नहीं दे रहे हो, यह भी पता है। यह बात भी सही है। लेकिन कोई अनजाना हो, हर किसी की स्थिति लगभग पता चल जाती है। इस स्थिति में वह अपने आप को धोखा नहीं दे रहा। मेरे जेब में पैसा होने के बावजूद मैं मना करूँ। सामने वाले के लिए तो वह वचन सत्य हो गया। हाँ, तो धोखा दो में दिया ना। पहले उसको दिया, बाद में अपने आपको। फिर पात्रता तो भी होगी ना। सबको ऐसे नहीं। उसको नहीं दिया इसलिए कि उसकी योग्यता नहीं। कल यही मैंने बताया था। समझ में आया यह बात? इसलिए मैंने कहा, इसे अंतिम कर लो। बात सही है। अब तो समझ में आएगा। अब तो नहीं बोलोगे ना। बात यह है। बहुत कुछ हम ढो रहे हैं। धीरे-धीरे आप सुनो, समझ में आएगा।

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जो मिटने के लिए तैयार है वही आ सकता है और रुक सकता है। गहरे पानी में डूबने, मीरा के पदों और बोध के बाद वाले प्रेम का क्या अर्थ है?

जो मिटने के लिए तैयार है, वही आ सकता है, और वह हमेशा रुक सकता है। और जिसे बचाने का कोई अपना कारण हो, तो वहाँ से आया हुआ हो सकता है। एकदम। तुरंत भी जा सकते हो। कोई कहता है जाओ, ठीक, जाओ। स्वतंत्र हो आप। आप आ भी सकते हो, जा भी सकते हो। जिन्हें डूबा तिन पाइया। डूबेगा वही पाएगा। जिन्हें खोजा तिन पाइया, गहरे पानी पैठ। रहीम की बात है। डूबने के डर से किनारे ही बैठे रह गए। क्योंकि जब तक डूबेंगे नहीं, तब तक पाएँगे नहीं। काव्य में मीराबाई के पद थे। घायल की गति घायल जाने। जो घायल होए, सो जाने। दर्द के मारे बन-बन भटके, वैद्य मिला नहीं कोई। उसमें दर्द था। उसके बाद जो मिलन था, उसे भी उन्होंने प्रकट किया। चोला छोड़कर। तन के सारे पंचतत्व का जो चोला है, उससे मुक्त होकर तब मिला। मिलन। जब तक गाँठ है, बंधन है, तब तक मिलन नहीं। गाँठ और बंधन रसपान का है। किसका है? संसार का है? संसार का नहीं। आपके रस का है। संसार ने रस दिया? संसार ने तो आनंद भी दिया। आपने अपना संसार का निर्माण किया। संसार ने थोड़ी दिया, आपने अपनाया। संसार तो सब कुछ दे रहा है। अगर वह बंधन भी दे रहा है तो मुक्ति भी दे रहा है, अवसर दे रहा है। बंधन तो आप बाँध रहे हो। अगर संसार दे रहा है तो मुक्ति ही दे रहा है। बंधन तो आप बाँधते हो, जबरदस्ती। ना मैं जानूँ आरती वंदन, ना पूजा की रीत। हरि में तो दर्द दिया। प्रेम दीवानी में तो जाने कोई। क्या वही प्रेम है जो बोध के बाद आता है? जिसमें मेरा-तेरा कुछ है नहीं। मेरे से पहले तुम। हाँ, पहले तुम, बाद में मैं। वही। और अज्ञानता में पहले मैं, बाद में तुम। बस इतनी सी बात। एक और सुना था। लकड़ी जलकर कोयला बनी। मैं पापी ऐसी जली, कोयला बनी। अधूरा। अधूरापन वही है। पूरा रस नहीं आया। डर-डर के रहे, हिचक-हिचक के। वही होता है। डूब जाएँगे, डूब जाएँगे, इस वजह से हम कभी कूदे ही नहीं। और कूदे नहीं तो तैरना नहीं सीखा। और ना उसकी गहराई समझ पाए। मुक्ति भी बहुत निर्भय है। निर्भयता। जिसे कुछ नहीं चाहिए। सीधी सी बात। डर भी नहीं है। ना हार है, ना जीत। मैंने इसी बात को कहा। कुछ नहीं चाहिए, और निकल लो। बस बात खत्म। उसमें सारी बात आ गई। उसमें हर तरह से सारी नदियाँ आकर संगम बन गईं। एकदम।

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आत्मा क्या है?

क्या है, से मुक्त हो जाओ। पता चल जाएगा।

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दुष्कर्म क्या है और सत्कर्म क्या है?

जब आप किसी को बिना मतलब सताते हो, किसी की भावनाओं को ठेस पहुँचाते हो, तो दुष्कर्म। और जब आप जरूरतमंद की सेवा करते हो, तो सत्कर्म। बस इतना है।

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मेरा नहीं छूट रहा है, क्या करूँ?

मेरा छोड़ दो। और मेरे से कुछ चाहिए, वह छोड़ दो। मैं गिर जाएगा, सब छूट जाएँगे। उसके बाद बस चाहिए छोड़ दो। कोई बचेगा नहीं आसपास।

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दूसरे के दोष नहीं दिखें, उसके लिए क्या उपाय है?

राग-द्वेष से मुक्त हो जाओ।

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आप कहते हो जरूरत में जियो, फिर लघुशंका होने पर सत्संग में रोकने की बात क्यों करते हो? यह स्वास्थ्य के लिए सही नहीं। इस शंका को दूर करें।

लोगों को पहले ही कह दिया गया है, भैया सत्संग के पहले मूत्र त्याग कर लो। एक-एक मिनट पर आए तो डब्बा दे दें क्या। हमें भी तो लगती है। हम भी तो इंसान हैं। सब कार्य छोड़ के भोजन, भोजन भी छोड़ के सत्संग। पता है आपको। यह जरूरत नहीं। अज्ञानता क्या है। यह जरूरत नहीं। हम कुछ चीजों को रोक सकते हैं क्या। हम सत्संग में बैठते हैं तो घंटों तक रोक लेते हैं। आप समझ रहे हो, यह तो सामान्य अनुशासन है। कहने का मतलब यह है। अब आदमी अगर एक-एक घंटे पर पेशाब कर रहा है, तब तो उसको हॉस्पिटल की जरूरत है, सत्संग की नहीं। साधक अगर एक बार बाथरूम कर लिया, तो दो-चार घंटे नहीं जाएगा। एक-एक घंटे में बाथरूम जाएगा, तो उसकी अज्ञानता है कि सत्संग के पहले वह क्यों नहीं गया। यह उसकी अज्ञानता है। सत्संग के पहले चला जाता है, मल-मूत्र का त्याग करके फिर बैठता है। फिर दो-चार घंटे तो बैठ ही सकता है। और नहीं बैठ सकता तो फिर उसे हॉस्पिटल की जरूरत है। वह साधक नहीं है तब। वह यहाँ टाइम पास करने आया है। बात समझ रहे हो। अस्सी साल के हैं, अस्सी के ऊपर उम्र है। बताइए। इनसे तो वह जवान है। तब यह जरूरत नहीं है। अज्ञानता है। प्रेम में, भक्ति में, सत्संग में कभी उठना नहीं चाहिए। तो मेरे को बताओ, उनको है क्या। आपको है। चश्मे वाले को है, उनको नहीं। प्रेम में, भक्ति में, सत्संग में उठना नहीं चाहिए। अगर बैठ गए। अब तुम प्रेम में बैठ गए, कमरे में बोल रहे हो। जैसे ही मूड बना, तुम कह रहे, बाथरूम करके आता हूँ। फिर क्या होगा। समझने वाली बात है। और तुमको इसकी जरूरत है तो बोलो इसकी जरूरत है। शादी क्यों की, जब देखें तेरे को बाथरूम में लगी रहती है। कहने का मतलब है, आप देश, काल, स्थिति, परिस्थिति में समझ के जियो। अगर आप सत्संग में बैठ रहे हो तो पहले मल-मूत्र का पूरी तरह त्याग कर दीजिए, और फिर बैठिए। कोई आपातकालीन घटना हो जाए, बात अलग है। यह समझने वाली बात है। सब काम छोड़ के भोजन, भोजन भी छोड़ के सत्संग।

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भगवान, देवता और पुनर्जन्म क्या असल में होते हैं?

देख लो। आप खोज करो।

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भगवान की इच्छा के बिना पत्ता भी नहीं हिलता, क्या यह बात सही है?

हाँ। तो पत्ता ना। पत्ता ना। तुम्हारी बात तो नहीं हुई है। पत्ते की बात हुई है ना। बस बात खत्म। जैसा सवाल, वैसा जवाब। पत्ते की बात हुई है। तुम टेंशन क्यों ले रहे हो। भगवान जाने, पत्ता जाने। तुम तो उसमें हो ही नहीं। तुम बीच में झूठे कूदते हो। पत्ते की बात है।

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प्रेम करने के बाद दुख क्यों मिलता है?

वासना में दुख मिलता है। प्रेम में तो ना दुख होता है, ना सुख होता है। कुछ नहीं होता। जहाँ कुछ नहीं चाहिए, वही प्रेम है। जहाँ कुछ चाहिए, प्रेम नहीं है, वासना है। वह सुख देगा, दुख देगा। दुख देगा, सुख देगा।

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दिन भर ज्यादातर निराशा की भावना आती है, इस पर क्या उपाय है?

क्या दिन भर ज्यादातर निराशा की भावना आती है? अपनी कमजोरी दूर करो।

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इंसान अपने जीवन में क्या करे?

जरूरत में जिए। और नहीं तो कुछ ना करे। दोनों में उपलब्धि हो जाएगी। या तो जरूरत में जिए तो भी उपलब्धि हो जाएगी, और या तो कुछ ना करे तो भी हो जाएगी। बस इतना आप कर लो। कुछ करने के लिए तो मैं कहाँ कह रहा हूँ। जरूरत में कुछ करिए। और नहीं तो कुछ ना करें। करने की आदत की वजह से कह रहा हूँ। जरूर बहुत हो जाएगा। बस। जीवन में इसमें उपलब्धि भी हो जाएगी।

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आत्मज्ञान कैसे प्राप्त करें?

जितना प्राप्त किया, छोड़ दो। बचेगा शेष आत्मा।

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अध्यात्म में आकर मुझे दुख और सुख दोनों विचलित क्यों नहीं कर पा रहे हैं? कुछ बताएँ।

एक तो यह भी धोखा हो सकता है। कुछ भी हो सकता है।

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मनुष्य अपने कर्मों से कैसे मुक्त हो सकता है?

ईमानदारी और सत्कर्म से। कुछ नहीं चाहिए।

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आत्मा मृत्यु लोक में भगवान को पाने का प्रण लेकर आती है, पर विषयों को चुनती है। तो क्या यह धोखा ही है?

नहीं। समझ-समझ के जाते हो। उस तरफ मत जाओ।

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स्वयं को जानने का मार्ग क्या है?

जानने से मुक्त हो जाना। फिर बचेगा जानने वाला।

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मोक्ष और मुक्ति में अंतर है या नहीं?

ईमानदारी मुक्ति है। और लेन-देन पूरा हो गया, तो मोक्ष हो गया।

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भगवत्प्राप्त संत की पहचान कैसे हो?

पहली बात तो, क्या करोगे पहचान करके। तुम अपनी पहचान करो। और उसकी पहचान बस यही है कि जब तक उसके आसपास रहोगे, जब भी वह बोलेगा, आपका आत्मिक कल्याण कैसे हो जाए, उसी के लिए बात करेगा। दिन-रात। जब तक आप उसके पास रहोगे, एक ही बात। क्या तू अपना आत्मिक कल्याण कर ले। तू अपना आत्मिक कल्याण कर ले। वह यही चिल्लाएगा। यही उसकी पहचान। यही उसकी पहचान।

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आत्मज्ञान होने पर क्या अनुभव होता है? और दिन-प्रतिदिन जो दुख-सुख का घर्षण है, उसके साथ कैसा तालमेल रहे?

अनुभव कहाँ रहा। आत्मज्ञान होता है, अरे जो होता था वह खत्म हो जाता है। बस होता क्या है। कुछ नहीं। कुछ नहीं होता। वही आत्मज्ञान। होना खत्म हो जाता है। आप इसे समझिए। जब तक कुछ है, तब तक ज्ञान नहीं है। वह जानकारी दूसरों की जानकारी है। संशय ही ना। उसे कुछ चाहिए नहीं। ना दुख, ना सुख। शरीर तो अनुभव करेगा। शरीर को देखो। शरीर से आँखों से आँसू भी आएँगे। एक दिन की बात बता रहा हूँ। इस उंगली में बहुत तेज दर्द हो रहा था। अंदर कुछ हो गया था। हमने सत्संग किया, चला गया, सो गया। लेकिन नींद नहीं आ रही थी। उस पीड़ा को भी देख रहा था। एकदम देख रहा था। करवट भी बदल रहा था, वह भी देख रहा था। सुबह सत्संग करना था। शरीर को आराम देना बहुत जरूरी था। जो व्यक्त हो रहा है, शरीर से ही तो हो रहा है। मैं वही देख रहा था। मैंने देखा कि पीड़ा किसको है। तो पता चला, मुझे नहीं। बस यही। देखा, तो उस पीड़ा में मैं नहीं था। एक प्रतिशत भी मैं यह नहीं बोल सकता कि मुझे पीड़ा हुई। लेकिन करवट बदल रहा था, वह भी देख रहा था। नींद नहीं आ रही थी, वह भी देख रहा था। हँस भी रहा था। मेरी पीड़ा नहीं है, इसलिए हँसी आ रही थी। फिर भी पीड़ा थी। उस पीड़ा से बेचैनी कहीं थी। बेचैनी यह थी कि सुबह सत्संग करना था। अगर नहीं सोऊँगा तो सही से शरीर काम नहीं करेगा। मेरे पास कुछ नहीं था, मोटी सी सलाई ली। चुभने में भी दर्द था। देखा कि दर्द मेरा नहीं है। उस दर्द में मैं नहीं था। यह मैं देख पाया। हम उसे साक्षी भाव भी नहीं कह सकते। देख रहा था। सीधा दिख रहा था। साक्षी भाव का मतलब है जो हो रहा है उसको देखना। लेकिन कोई कर भी तो रहा है। साक्षी भाव कर्म में होता है। यहाँ तो सिर्फ यह शरीर था और मैं था। जब इस शरीर के द्वारा कुछ कार्य होता है, तब एक करने वाला और एक देखने वाला। कहीं गलती ना हो जाए, उसे साक्षी भाव कहते हैं। वहाँ तो साक्षी भी कोई नहीं था। साक्षी भाव बाहर होता है। यहाँ तो शरीर था और मैं था। सीधा दिख रहा था। साक्षी भाव तो तीन में होता है। मैं हूँ, शरीर है, और कोई और। अगर कोई और है तो साक्षी भाव बोलो। लेकिन मैं और शरीर, और शरीर में पीड़ा देख रहा था। यह पीड़ा तो मेरी नहीं। बहुत हँसा। मुझे सुबह सत्संग नहीं करना होता तो मैं रात भर उस पीड़ा को देखता रहता। लेकिन सुबह सत्संग करना था, इसलिए मैंने उस पीड़ा को हटाया। उसे फोड़ दिया। जो भरा था निकल गया, तो आराम हो गया। सत्संग करना था इसलिए। कुछ समय पहले आप लोगों को बताया भी था। ऐसी घटना हुई। एक दिन मैंने देखा। बचपन से देखा था, लेकिन उस दिन का देखना अलग था। मैं सोया था। देखा तो एक चिड़िया बगल में रखी कढ़ाई को चोंच मार रही थी। खट-खट। मेरी नजर गई, और मैं उसे देखता रहा। यही हालत हमारी है। हम समझ रहे हैं, हमारे अलावा कोई है। कढ़ाई की वजह से उसे लग रहा है कि मेरे अलावा कोई है। लेकिन सही पूछो तो कढ़ाई है। कुछ चाहिए की वजह से कोई लग रहा है, लेकिन है नहीं। वह कढ़ाई में सोच रही है दूसरी चिड़िया है, और मार ही रही है। बचपन से देखा था, लेकिन यह एहसास नहीं हुआ था। हमारी हालत यही है। प्रतीति को सत्य मान लिया। यही हालत तो हमारी है। मतलब कढ़ाई हटना चाहिए, तभी कुछ समझ में आएगा। नहीं हटी तो भ्रम नहीं टूटेगा। इच्छा, अपेक्षा, चाहिए, यही है।

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जितने संत-सन्यासी को ज्ञान प्राप्त हुआ, उन सबने पूजा-पाठ और आडंबर का विरोध किया। क्या यह सही है?

नहीं। उन्होंने पूजा-पाठ या किसी का विरोध नहीं किया है। उनका यह कहना था कि कुछ चाहिए में पूजा-पाठ मत करो। इससे पतन होगा। कुछ नहीं चाहिए की स्थिति में मैं कुछ भी करूँ, सात्विक तरीके से। उन्होंने विरोध नहीं किया। रामकृष्ण परमहंस ने उपलब्धि के बाद खुद माँ की भक्ति की। संत रविदास जी उपलब्धि के बाद भी गंगा माँ को भेंट भेजते रहे। बोलिए, कहाँ विरोध किया। विरोध करने की जगह नहीं। विरोध नहीं किया। आप गलती कर रहे हो। आप गलती मत करो।

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ईमानदारी करना है या बेईमानी छोड़ना है?

बेईमानी छोड़ दो। ईमानदारी हो जाएगी। ईमानदारी करने की आवश्यकता नहीं। हाँ, सत्कर्म करना।

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आप चरण स्पर्श करने देते हो कि नहीं?

अगर मुझसे पूछे तो मैं तो कहता हूँ, दूर से ही प्रणाम करो। लोग करते हैं, मैं मना नहीं करता। सीधी सी बात है। मुझसे कोई कहे तो मैं कहूँगा, सबसे जरूरी आपका आत्मिक कल्याण है।

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जीवन में प्रसन्न और खुश कैसे रहें?

दूसरों के लिए जीना चालू कर दो।

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आम आदमी का अग्निदाह और साधु-संत का मिट्टी में दाह क्यों करते हैं?

यह तो करने वाले बताएँ। हमने तो ऐसा आज तक कुछ किया नहीं। और मैंने अपनी कोई योजना भी नहीं की है। मेरे पास तो कुछ कागज भी नहीं है। जहाँ गया, गया। पता नहीं। लोग शरीर का क्या करेंगे, वह जाने। हमें तो मतलब ही नहीं है। देखिए, मेरा शरीर तो है नहीं। मुझे मिला है। मैं इसमें से निकला हुआ हूँ। जिसका है, वह जाने। सीधी सी बात है। किसको गाड़ना है, किसको जलाना है, किसको खिलाना है। बात समझ रहे हो। अब मैंने टिकट कराया। मैं डिब्बे से उतरने वाला हूँ। तो मुझसे पूछोगे, सीट का क्या करोगे। सीट मेरा था क्या। सीट तो जिसका था, वह जाने। दूसरों को देगा। हम कौन होते हैं निर्णय करने वाले। सीट का क्या होगा। इस शरीर का क्या होगा। हमसे क्या मतलब। प्रकृति जाने। जब तक यह मिला है, मुझे ईमानदारी और सत्कर्म का जीवन जीना है, परम सत्य तक पहुँचना है, शरीर के द्वारा। बस, खत्म। भगवान अवतार लेता है या नहीं, तो भगवान बताएगा। सीधा उनसे बात करो।

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काम-वासना को कैसे रोके?

ईमानदारी से करो। बेईमानी से करना बंद कर दो।

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नाम जप एक प्रकार का ध्यान ही है। इसे क्यों करना चाहिए?

हम कहाँ बोल रहे हैं इसे करने के लिए। मैं तो कह रहा हूँ, ईमानदारी और सत्कर्म।

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एक आदमी अमीर के घर जन्म लेता है और एक गरीब के घर। इसका क्या कारण है?

यह तो जन्म देने वाला बताएगा, या जन्म लेने वाला, कि भैया ऐसा जन्म क्यों ले रहा है। यही तो रहस्य है, खोजो। यह आप ही खोज सकते हो। कोई बता देगा तो उसका कोई मतलब भी नहीं होगा।

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जीवन में सुख-दुख, लाभ-हानि का अनुभव होता ही है, अपनों की चिंता दिमाग में आती ही है। यह जीव भाव कैसे छूटे?

उम्मीद छोड़ दो।

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स्थितिप्रज्ञ क्या है, जिसके बारे में कृष्ण जी बोलते हैं?

अपने आप में स्थिर हो जाना। मेरे समझ से कुछ नहीं चाहिए। बस बात खत्म हो गई।

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आपने कहा था कि सोलह मई के बाद अलग-अलग जगह चले जाओगे। यह निर्णय आपका है या किसी ने यह तिथि सुझाई है?

आज तक मैं बोल सकता हूँ कि जब से मैं खोज में निकला हूँ, मैंने किसी का सुझाव माना ही नहीं। यह सुझाव किसी का नहीं है। मैं बोल सकता हूँ कि यह सुझाव जरूरत का है। बस, और कुछ नहीं। जरूरत हो, प्रेम मिला हो। बस यह सुझाव जरूरत का है। अपनों की कुटिया बनी, यह भी सुझाव जरूरत का है। यह सत्संग हो रहा है, यह भी जरूरत का है। यह किसी का व्यक्तिगत सुझाव ही नहीं है। जरूरत का बोल सकते हो। जरूरत ने सुझाव दिया। यह किसी का सुझाव नहीं है। ना किसी और का, ना मेरा। जरूरत का सुझाव है। मैं बोल सकता हूँ, मेरा भी सुझाव नहीं। जरूरत है।

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कुँवारी बेटियाँ भी कुटिया में रहकर साधना कर सकती हैं क्या? मार्गदर्शन करें।

कर सकती हैं। मैं बोल सकता हूँ कि यह सुझाव जरूरत का है। बस, और कुछ नहीं। जरूरत हो, प्रेम मिला हो। बस यह सुझाव जरूरत का है। अपनों की कुटिया बनी, यह भी सुझाव जरूरत का है। यह सत्संग हो रहा है, यह भी जरूरत का है। यह किसी का व्यक्तिगत सुझाव ही नहीं है। जरूरत का बोल सकते हो। जरूरत ने सुझाव दिया। यह किसी का सुझाव नहीं है। ना किसी और का, ना मेरा। जरूरत का सुझाव है। मैं बोल सकता हूँ, मेरा भी सुझाव नहीं। जरूरत है।

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हमारा धर्म क्या है? समझाइए।

परोपकार धर्म है।

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खुद को कैसे पाएँ और पहचानें?

दूसरों को पहचानना बंद कर दो। राग-द्वेष में मत पड़ो। बस बचेगा पहचानने वाला। आप सोचिए, एक आप व्यक्ति हो। आप कभी कहते हो, यह भगवान है, यह शैतान है, यह आदमी है, यह राक्षस है, यह पेड़ है, यह पौधा ताकतवर है, यह कमजोर है, यह अच्छा है, यह बुरा है। यह निर्णय करने वाला सबसे श्रेष्ठ ही हुआ। लेकिन तुम क्या हो। इन्हीं के चक्कर में पड़ गए, गड़बड़ी हो गई। आप सोचो जरा। वह निर्णय कर रहा है। भगवान है, राक्षस है, सब निर्णय कर रहा है। यह देवी है, यह देवता है, यह ज्ञान है, यह अज्ञान है। सब निर्णय कर रहा है। तो वही तो कह रहा हूँ। उसको कब पकड़ोगे। जब पकड़ने से आप मुक्त हो जाओगे। पकड़ना थोड़ी है। पकड़ने से मुक्त होना है। बचेगा पकड़ने वाला। बात ही खत्म हो जाएगी।

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शून्य में ऊर्जा होती है क्या? ऊर्जा क्या है? और शून्य से दो कैसे आए, और क्यों?

शून्य भी कुछ है। शून्य लेकर बैठो, कोई आएगा। एक मारेगा, हो गया, बढ़ गया।

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दर्शन का अर्थ दोबारा समझाइए।

दर्शन इसलिए करना है कि दर्शन करने से भी मुक्त होना है। और दर्शन मुक्त व्यक्ति का करना है, बंधन वाले का नहीं, क्योंकि वह बाँध देगा। दर्शन भी इसलिए करना है कि दर्शन से मुक्ति हो। और दर्शन उसी का करो जो मुक्त स्थिति में हो।

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देश से बाहर रहते हों तो सत्कर्म किस प्रकार कर सकते हैं?

जरूरतमंद की सेवा करो। हर जगह है क्या। देश के बाहर लोग रास्ते पर नहीं गिरते, बीमार नहीं होते क्या। जरूरत नहीं पड़ती क्या। कितनी भी व्यवस्था कर दो, आदमी गिर तो जाता ही है। चलते-चलते उठा दो। सत्कर्म का मौका मिलता ही है। दुनिया में कितनी भी व्यवस्थाएँ कर लो, यह होता ही रहता है।

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बच्चों को कैसा संस्कार देना चाहिए?

जरूरत में जीना, और जरूरतमंद की सेवा करना। जिस लायक आप हों, अपनी आत्मरक्षा और स्वाभिमान की रक्षा करते हुए।

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एक झटके में जीवन के कष्ट कुछ नहीं दिखे, अब बहुत कुछ दिमाग में अपने आप आ रहा है और डर लग रहा है। क्या करें?

कोई बात नहीं। मजबूत करो अपने आप को। कमजोरी दूर करो।

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कर्म का सिद्धांत क्या है?

अभी बताया तो था। बेईमानी और दुष्कर्म छोड़ दो। ईमानदारी और सत्कर्म अपना लो। आगे का बंधन बंधेगा नहीं। पिछला खत्म होगा।

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हमारा भ्रम कब दूर होगा?

जब आप उम्मीद छोड़ दोगे।

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कोई कह रहा था कि आपके पास जाने से भटक जाओगे, कुछ नहीं मिलेगा, फालतू में जा रहे हो। पाइपलाइन के विवाद और गालियों की बात भी हुई। लाइव में गालियाँ मिलती हैं, क्या करें? क्या उसकी बात सही थी?

यहाँ एक विवाद हुआ था, पाइपलाइन का। मेरे ऊपर केस भी किए थे। कुछ हुआ नहीं। यहाँ सबको पता है, सबको मालूम है। उस विषय में बोलने से क्या फर्क पड़ता है। एक नया आया। हफ्ता सत्संग सुना है आपका, उतना नहीं समझ पाया, चला गया। चला वापस तो चला जाए ना। क्या फर्क पड़ेगा मुझे उसका यहाँ आने से और वापस चला जाने से। अपनी समस्या लेकर आएगा तो आएगा। रास्ते से ही चला गया, यहाँ से नहीं। समझ नहीं पाया, तो चला जाए। आपने सत्संग सुने हैं, और देखो, उसने आपको भी छोड़ा। इतना कम है उसका छोड़ना कि असर नहीं पड़ रहा। अपना बस यह पचना है। उसने सही कहा। अभी हमारा कितना विरोध होगा। इतिहास में एक व्यक्ति आया और इधर-उधर की बात को खत्म कर दिया। अभी मुझे कितनी गालियाँ मिलेंगी, आपको पता है। सारी विधियों को, मन को, सबको कहा जा रहा है। आज तक दुनिया ने चिल्ला-चिल्ला के बोला है, हजारों साल से, मन को बस में करो। एक आदमी आया, खत्म कर दिया। ध्यान करो, इसको भी खत्म किया। बोल रहा हूँ, कोई ध्यान की जरूरत नहीं है, कोई ध्यान नहीं करना। अब गाली नहीं मिलेगी तो क्या मिलेगी। तो यह बात उसने सही कही, कि वहाँ जाकर आपको कुछ नहीं मिलेगा। यह बात उसने सही कही। यहाँ आकर आपको कुछ नहीं मिलने वाला। यही तो बात है। इसलिए तो मैं लाइव में खुद कहता हूँ, जिसे कुछ चाहिए वह मत आना। रास्ते में उसने कह दिया, कुछ चाहिए तो मत जाना उसके पास। यह सही बात है। इधर का एक आदमी, जब मैं जाता हूँ तो रास्ता बदल देते हैं, कि पकड़ के ज्ञान ही देगा। ईमानदारी और सत्कर्म मेन है। मैं लोगों को यही कहता हूँ। लेकिन अगर मैंने उन्हें देख लिया, वे मुझे देख लें, तब रास्ता नहीं बचता। तब आएँगे। और फिर मैं पकड़ के समझाऊँगा। क्या बोल रहा था। बस यही। सब सही बोल रहा है। सब अपनी-अपनी जगह सही हैं। लाइव में गालियाँ देते हैं। तो छोड़ो। लाइव कभी, वीडियो देखते हो नहीं। गाली आती है, क्या करें। समाज में तीन प्रवृत्ति हैं। देव प्रवृत्ति, राक्षस प्रवृत्ति, मानव प्रवृत्ति। आप कुछ भी करोगे, गाली तो सुनोगे। या तो आप कुछ मत करो। मन-बुद्धि के हो जाओ, पागल हो जाओ, तब कोई गाली नहीं देगा। अभी तो हमको कितनी गालियाँ मिलने वाली हैं, पता है। ध्यान वाले कहेंगे, देखो क्या कर रहा है। पहले कहता था ध्यान करो, अब कह रहा है ध्यान मत करो। फिर कितनी गालियाँ मुझे मिलने वाली हैं, पता है। बहुत। समझ गए तो थोड़ी देंगे। मैं जिन लोगों की बात कर रहा हूँ, जो एक-दूसरे को भटका रहे हैं, व्यापार कर रहे हैं, उनकी बात कर रहा हूँ। और मुझे तो इसका कोई फर्क नहीं पड़ता। मैं तब भी हँसता था, अब भी हँस रहा हूँ, और आगे भी हँसता ही रहूँगा। यही तो मेरी जिंदगी है। हँसना मैंने छोड़ा नहीं। इस इलाके में दो हजार उन्नीस से घूम रहा हूँ। फिर भी उसने आपको छोड़ा, तो कहाँ तक छोड़ा। उसका साथ छोड़ दिया। वहाँ एक व्यक्ति था, उससे भी मिला, बात करने लगा। कहीं भड़काया कि हमें ले ना चलें, हमें कहीं और जाना है। पाइपलाइन एक जन की टूट गई थी, उसमें विवाद हुआ था, केस हुआ था, टूटने का आदेश आ गया था। आठ तारीख का टूटने का आदेश था, सात तारीख को रोक दिया गया। तो गाली नहीं देगा तो क्या देगा। आपके बारे में ऐसा बोला। हमने सोचा, कहीं भटका के कहीं और ना ले जाए। नहीं छोड़ा आपको। वही वीडियो सुनाई। वही तो बोल रहा है। हम तो अपना काम करते हैं। हमें कोई फर्क नहीं पड़ता। अच्छा है। कम से कम लोग भड़काएँ तो आपकी स्थिति का भी पता चलेगा, कि मैं उनके बारे में क्या समझता हूँ। क्या सच में आप अपनी समझ से समझ के आए, या ऐसे ही आ गए। तभी पता चलेगा। समझ नहीं होगी तो चला जाएगा। पहली बार अनजान जगह जा रहे हो तो जगह अनजान हो सकती है। लेकिन जिसको सुन के आ रहे हो, वह अनजान कहाँ रहा। जो था वह कह दिया। उसने यह बात सही कही कि यहाँ कुछ मिलेगा नहीं। यह बात सही कही कि बेमतलब में जा रहे हो। यह अच्छी बात बोली उसने। किसी ने दुकान बंद करके, कैसे करके समय निकाल कर वहाँ जा रहे हो, ऐसा कहा था। लोग काम की भी बात करते हैं। ठीक है।

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हर पल अपने स्वरूप में रहने के लिए क्या किया जाए?

उम्मीद छोड़ दो।

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क्या गृह त्याग से ही मोक्ष मिलेगा, या गृहस्थ में भी मिल सकता है?

कहीं भी रहो। बेईमानी और दुष्कर्म छोड़ के ईमानदारी और सत्कर्म अपना लो। बस बात खत्म करो।

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भगवद्गीता हर किसी को क्यों पढ़ना चाहिए?

मैंने कब कहा? मैंने कहा, अपने आप को पढ़ो।

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इच्छा को कम करने की आवश्यकता है क्या?

जरूरत में जियो। जरूरत से ज्यादा में अगर हो तो छोड़ दो। आपकी मर्जी।

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समय खराब आ गया है, साधना करनी है। कैसे करें? मार्गदर्शन करें।

अपने आप को सुधारो। सुधारना ही साधना है।

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साधना में विधान क्या है?

बेईमानी छोड़ो। और कुछ कहना है? बस इतना ही। जो था वह कह दिया।

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पाप और पुण्य क्या है?

किसी की भावनाओं को बिना मतलब ठेस पहुँचाना पाप है। और किसी की भावनाओं को समझकर उसे सत्मार्ग बताना पुण्य है।

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शिव और शक्ति पर आपके विचार क्या हैं?

मेरे विचार कुछ नहीं हैं।

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अपने आप में कैसे रहें?

उम्मीद छोड़ दे। अब कुछ नहीं चाहिए। मैं आ जाऊँगा।

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किसी को सुधारने के लिए सुधारक को कितनी मेहनत करनी पड़ती है? जब लगता है कि कोई गलत काम कर रहा है, उसका जीवन भी खराब हो रहा है, रिजल्ट नहीं आ रहे, और वो काम अननेसेसरी है, जबकि उसे लगता है कि वो बहुत मेहनत कर रहा है, और हम ऊर्जा और समय देकर सलाह देते हैं, तो वो कह देता है कि सलाह की जरूरत नहीं। वो और बिगड़ जाता है, कई बार लड़ाई हो जाती है। सुधारक का स्वभाव है कि वो बोलता रहता है, पूरा दम लगाता है। उसे खुद कुछ नहीं चाहिए। वो ये देख रहा है कि अगर काम इस ढंग से हो जाए तो बहुत अच्छे रिजल्ट आ जाएंगे, पर सामने वाला समझ नहीं पा रहा। आदत शुरू में किसी कारण से बनी होगी, जैसे उस समय गर्मी हो या ऑफिस जाना हो, इसलिए लगा लिया। पर दो प्रश्न आने चाहिए, मैंने ये क्यों किया, और वो कारण हट जाए तो ये क्यों नहीं हटेगा? जैसे हेमंत खुद गाड़ी चला रहा है, टायर में हवा कम है, ये फील भी हो रहा है, पेट्रोल पंप पर तेल भरवा लिया, और हवा भरवाना भूल गया। जब खुद दिक्कत महसूस हो रही हो, हल भी पता हो, और कोई बता भी रहा हो, तब भी व्यक्ति हल क्यों नहीं करना चाहता? इसका क्या कारण है?

अगर कोई ऐसा करता है, तो वो व्यक्ति लापरवाह होता है। और अगर वो हमेशा अपने साथ यही करता है, तो वो सामने वाले की वैल्यू नहीं करता। ये दो में से एक बात होती है। या तो वो लापरवाह है। उसकी आदत ही ऐसी है कि उसका काम है डांट सुनना और भूल जाना। या फिर वो सामने वाले को वैल्यू नहीं करता। उसकी बात की वैल्यू नहीं करता। उसे कोई फर्क नहीं पड़ता कि मैं रहूं या मैं जाऊं। उसे लगता है, अगर कुछ होगा तो मैं निकल लूंगा। मतलब उसे सामने वाले की कोई फिक्र नहीं है। इस स्थिति में व्यक्ति ऐसा करता है। अब उसकी क्या स्थिति है, वही बता सकता है। और वो तब बताएगा, जब सामने वाला खुलकर उससे बात करेगा। जरा सा भी दबाव नहीं होगा, जरा सा भी संकोच नहीं होगा। तब वो अपनी स्थिति बता देगा। उसके बाद जैसा कर्म होगा, वैसा होगा। अगर वो कह दे कि मैं आपको नहीं जानता, तो समझ लो कि वो आपकी वैल्यू नहीं करता था। वो किसी वजह से, किसी कारण से आपके पास था। जरा सा मौका मिला, और वो निकल गया। और अगर आपसे प्रेम होगा, तो एक बार नहीं, हजार बार गलती मांगेगा, कि आगे से ऐसा नहीं होगा। अगर प्रेम होगा, लगाव होगा, अगर वो कुछ समझना चाहेगा, कुछ सीखना चाहेगा, तो आप उसे भगाओगे तब भी नहीं जाएगा। मैं जहां तक समझता हूं, मैं कई सालों से काम कर रहा हूं। आज मैं आपको बता दूं। जैसे समाज में एक सेकंड होता है, वैसे मैंने जीवन का एक पल भी, एक क्षण भी फालतू नहीं गवाया। एक क्षण मैंने कभी फालतू नहीं गवाया। तब जाकर मैं यहां पहुंचा हूं। आप लोग भी देख रहे हो, घूम रहे हो। लोगों की स्थितियां देखो। लोग जिंदगी बिता दे रहे हैं, और उनकी स्थिति देखकर उनको बोलना तक नहीं आ रहा। इसलिए हमें खुलकर बात करनी चाहिए। जैसे अभी मैं आया। रात है, ठंडा मौसम है। मैंने कहा, टोपी लगाने की क्या जरूरत है। इन्होंने कहा, आदत है। आदत नहीं है। इन्होंने पहले तुरंत झूठ बोला। इस झूठ का इन्हें पता भी नहीं। ऐसा नहीं कि इस व्यक्ति ने मुझसे झूठ बोलने की कोई प्लानिंग की। मुझसे झूठ बोलेगा ही क्यों। लेकिन कहीं न कहीं ये झूठ ही है। फिर मैं इनसे पूछूंगा कि रात में भी टोपी क्यों लगाए हो। वो जवाब अगर पूरी ईमानदारी से दोगे, तो मैं उसमें से बात निकाल लूंगा। आपने बताया कि बाल पहले उठे हुए नहीं थे। बाल घिस गए, तो अच्छा फील होता था, इसलिए लगा लेते थे। फिर वो रूटीन बन गया। अपनी दुकान है, रात को ग्यारह बजे तक बैठते हो, काफी रोशनी रहती है। कभी ऐसा फील नहीं होता कि अभी रात हो रखी है या दिन हो रखा है। जब लगता है, निकाल लेता हूं। फिर खालीपन सा लगता है, तो उठाकर लगा लेता हूं। यहां दुकान नहीं है, टोपी हाथ में है, तो लगा लेता हूं। एक हैबिट सी बन गई है। मैं वही कह रहा हूं। कुछ देर पहले आपने कहा कि आदत है। बाद में आपने बताया कि ऐसी स्थिति थी, इसलिए लगाने लगा। ये सही है। ये नेचुरल है। पर हम किसी को धोखे में रखकर इज्जत क्यों पाएं? मैं किसी को धोखे में रखकर खूबसूरत क्यों बनूं? मेरी बात समझ रहे हो? मैं जैसा हूं, वैसा हूं। लोग मुझे कह रहे हैं कि तुम सुंदर हो। लेकिन मुझे तो अपनी कुरूपता का पता है। और वो कुरूपता मान लो कभी सामने आ गई, तो फिर क्या होगा, पता है? फिर आप बहुत गिर जाओगे। इसलिए आप जैसे हो, वैसे रहो। अगर आपको लग रहा है कि इसकी जरूरत मेरे शरीर को है, मुझे है, तब लगाओ। नहीं है, तो मत लगाओ। नहीं तो आप गिर ही रहे हो। आपको समझ में नहीं आ रहा। लेकिन कभी न कभी, जब ये पूरी तरह समाज के सामने आएगा, क्योंकि नया आदमी आपको टोपी में देखेगा, आपके बारे में अपनी फीलिंग बना लेगा, और कभी टोपी निकली, तो दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा। भौचक्का रह जाएगा। जैसे हो, वैसे जियो। आप कह रहे हो कि एक प्रतिशत भी कोई फर्क नहीं पड़ता, कौन क्या सोच रहा था। अभी मैंने बाहर ऐसे ही निकाल दी थी। अगर सोच नहीं रहा था, तो शुरुआत में टोपी क्यों लगाई? लोगों की सोच कही, तभी टोपी पहननी पड़ी। लोगों की सोच की वजह से टोपी पहन ली, और आज कह रहे हो कि मुझे सोच का फर्क नहीं पड़ता। दो जगह खड़े होकर मुझसे बात कर रहे हो। इस बात को ध्यान से समझना। अभी कुछ देर पहले क्या कहा? सीधी बात है, आगे का बाल झड़ गया है, तुझे शर्म आती है। वो समाज की सोच ही तो थी। उसी सोच ने तुम्हें टोपी पहना दी। और आज कह रहे हो कि मुझे सोच का फर्क नहीं पड़ता। अगर सोच का फर्क नहीं पड़ता, तो तुम टोपी पहनते ही नहीं। हो सकता है हम खुद को स्वीकार न कर पाएं। यहां स्वीकार और अस्वीकार की बात नहीं है, समझने की बात है। आपके स्वीकार या अस्वीकार करने से कुछ होने वाला नहीं है। आप समझिए कि जब आपने शुरुआत में टोपी पहनी, तो किसके लिए पहनी? क्या आपको जरूरत थी? नहीं थी। आपने समाज की सोच की वजह से टोपी पहनी। और आज कह रहे हो कि मुझे समाज की सोच से क्या मतलब। अगर सच में आपकी ये स्थिति होती, जो आप अभी बोल रहे हो, तो आप टोपी पहनते ही नहीं। आप टोपी से मुक्त हो जाइए। मैं यही कहूंगा, ये टोपी आपको बहुत गिरा देगी। इसे साधारण मत समझना। जितने आवरण हैं, उन्हें उतारकर फेंक दो। जैसे हो, वैसे जियो। मैं जैसा हूं, वैसा मुझे स्वीकार करते हो, तो ठीक है। नहीं करते, तो जाओ। क्या फर्क पड़ता है। आप मुझे देखिए। अभी कुछ देर पहले आपका और मेरा मिलना हुआ। मैं कैसे आया, मैं कहां बैठा, पहले आके मैं कहां गया, इसके बाद मैंने कैसे स्नान किया, और कैसे आपके सामने खड़ा हूं। आप मेरे काम के लिए आए हो। ये मेरा व्यक्तिगत जीवन है। मैं कैसे नहाऊं, मैं कहां बैठूं, मैं किसके साथ खेलूं, ये मेरी लाइफ है। आप जिस काम के लिए आए हो, जब हम उस काम की बात करेंगे, तो उस काम में मैं आपको मार्ग बताऊंगा। मेरे कपड़े देख लो, मेरा पहनावा देख लो। मैं जैसा हूं, वैसा स्वीकार करो, तो ठीक है। नहीं, तो जाओ। जरूरत में वस्तुओं का उपयोग करो। अगर आप किसी को प्रभावित करने के लिए, किसी के दबाव में, किसी के संकोच में, इज्जत पाने के लिए करोगे, तो आप गिर जाओगे। मुझे क्या फर्क पड़ता है कि आप टोपी लगाओ या न लगाओ। लेकिन ये टोपी आपको बहुत गिरा देगी, ये बात मुझे मालूम है। और जब आप इसे अपने अंदर से हटा दोगे, तब आपको खुद पता चलेगा कि आप कितने दबे हुए थे। अभी तो बाहर से हमारी और आपकी बात हो रही है। अभी आप समझने का प्रयास कर रहे हो। जिस दिन ये टोपी आपके अंदर से हटेगी, उस दिन देखना, आप कितना खुला महसूस करोगे। ऐसे ही दबाव और संकोच में, लोगों को आकर्षित करने के लिए, व्यक्ति अपनी जिंदगी को नर्क कर देता है। लोगों को प्रभावित करने के लिए अपनी लाइफ को नाश कर देता है। पूरी तरह नर्क बना देता है। आप देखो, मैं किसी में नहीं लगता। न गृहस्थ में लगता हूं, न इसमें लगता हूं। मैं किसी से कुछ बोलता ही नहीं। मैं बस अपना काम करता हूं। आप मेरे साथ आदिवासी क्षेत्र में घूमे। देखा, कैसे लोग बात करते थे। भीड़ के चक्कर में हम अपनी जिंदगी क्यों नष्ट करें। भीड़ का सोचने का क्या पैमाना है। वो हमें कैसे स्वीकार करें। वो करें या न करें। आपने कहा कि मुझे सोच का क्या फर्क पड़ता है। काश तुम इसमें जीते। काश तुम सच में इसमें जीते, तो तुम्हारा अस्तर बहुत ऊंचा चला जाता। आप कह तो दिए, पर जी कहीं और रहे। इसलिए जितने आवरण आपने लोगों को आकर्षित करने के लिए, लोगों को प्रभावित करने के लिए लगाए हैं, उनको फेंक दो। और जैसे हो, वैसे जीओ। मर्यादा जरूर रखो। मर्यादा बहुत जरूरी है। ऐसा नहीं कि हम किसी का अपमान करने लगें। हमें जिंदगी जीने के लिए मिली है। जीवन जीने के दो रास्ते हैं। एक ईमानदारी और सत्कर्म। दूसरा बेईमानी और दुष्कर्म। आप चुनाव करिए। ईमानदारी और सत्कर्म में आप अकेले हो। बेईमानी और दुष्कर्म में झुंड है। और जहां झुंड है, वहां अशांति है। सीधी बात है। और जहां आप अकेले हो, वहां आनंद है। अब आप देख लो, किसमें रहना चाहते हो। ये आपके ऊपर है। सबके ऊपर है। इसमें मैं भी आता हूं, आप भी आते हो, सब आते हैं। ये आपको देखना है।

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ऐसे लोगों को आप कैसे झेलते हो? जो ईमानदार हैं, आवेशी हैं, बात नहीं मानते, डांट भी देते हैं, उन्हें सुधारक क्यों सहता है, और उन्हें संवारने में कितना सहना पड़ता है?

आपको लगता है कि आप ऐसे लोगों को कैसे झेलते हो। अब मैं बताता हूं कि मैं क्यों झेलता हूं। मान लो, कुछ समय पहले ये स्थिति नहीं होती। ये मुझे डांट देता था कि मुझे ये काम नहीं करना है। मैंने कहा, बेटा, इसकी ईमानदारी की वजह से ये मुझ पर चढ़ जाता था। क्या करूं। मैंने कहा, बेटा, तू सीख। क्योंकि इसकी ईमानदारी की वजह से इसे झेलना पड़ता था। मतलब ये बात करने लायक है, मेरे साथ बैठने लायक है। हर व्यक्ति हर स्थिति से ऐसा नहीं होता। आपको भी पता चल गया। इसे भी पता है। पर इसके अंदर एक ईमानदारी थी। और ऐसे लोगों का समाज शोषण कर लेता है। इन्हें यूज कर लेता है। क्योंकि ये आवेशी हैं, जज्बाती हैं, ईमानदार हैं। ये तुरंत छोड़कर चले जाएंगे। तो समाज के लोग क्या करते हैं? कोई एक महीना, कोई एक साल, इन्हें यूज कर लेता है। जब मुझे ऐसे लोग मिलते हैं, तो मैं उन्हें झेलता हूं। बस उन्हें उठाने के लिए झेलता हूं। कैसे भी इन पर से वो असर उतर जाए, अगर ये मेरे जीवन में मिले हैं। ये बहुत अच्छे लोग हैं। अगर आप थोड़ी देर के लिए ये मत देखो कि ये किस तरीके से काम करते हैं, क्या करते हैं, वो हटाकर इन्हें देखो, तो आप कहोगे कि ये इतने अच्छे इंसान इस पृथ्वी पर हैं। हां, हैं। बस अपना काम मत देखिए। थोड़ी देर के लिए छोड़िए कि ये कैसे करते हैं। इन्हें देखिए। आप कहोगे, इनमें इतनी शुद्धता है। ऐसे लोगों को झेलना पड़ता है। इनके लिए झेलना ही पड़ता है। इनमें एक अच्छाई है। वो अच्छाई जल्दी लोगों में मिलती नहीं। समझदार आपको बहुत मिल जाएंगे। टैलेंटेड बहुत मिल जाएंगे। ईमानदार और सच्चा इंसान जल्दी नहीं मिलता। अगर वो मिल जाए, तो उसकी गलती मत देखिए। वो गलती सुधारेगा। प्यार से, धीरे-धीरे, प्रेम से सुधारेगा। पहले उसे प्रेम में उतारिए, फिर वो सुधरेगा। मैं आपको बता दूं, इनसे मुझे दबकर बात करनी पड़ती थी। ये मेरे सामने किसी स्थिति में खड़े नहीं हो सकते। लेकिन इनसे मैं दबकर बात करता हूं। क्योंकि ये हमारी क्षमता बर्दाश्त ही नहीं कर सकते। मेरी आवाज बर्दाश्त ही नहीं कर सकते। इन्हें मुझे सहना पड़ता है। मैं इन्हें उतना ही बोलता हूं, उतना ही प्रेशर देता हूं, जितना ये बर्दाश्त कर सकें। अगर मैं पूरी ताकत से, जिस तरीके से मैं जीता हूं, उसी तरीके से बोलूं, तो ये मेरे पास रह ही नहीं पाएंगे। और ये जब समाज में जाएंगे, तो समाज इनका शोषण करेगा। मुझे मालूम है समाज कैसा है। सबको मालूम है। इसलिए जब जीवन में ऐसे लोग मिलते हैं, तो मैं इनको संवारता हूं। इनके सत्य के लिए मैं बहुत सहता हूं। कभी-कभी मुझे आंसू आ जाते हैं। क्योंकि मैंने कहा था कि मैंने अपनी जिंदगी का एक क्षण भी बर्बाद नहीं किया। आप देखो, मैं कितनी भागमभाग करता हूं। आपने मुझे देर तक सोते हुए देखा है? हर समय मैं भागता रहता हूं। कभी मानसिक, कभी शारीरिक। अभी आया, तो बैठते हुए नहीं देखा गया। कूदकर आया, स्नान किया, और लग गया काम पर। पानी भी रहा। अभी बैठकर पिया नहीं। एक-आध घूंट गया, नर्मदा जी का पी लिया, बात अलग है। हर समय काम। आज मुझे लायक बन रहे हैं। बहुत सहना पड़ता है। एक सामर्थ्यवान व्यक्ति को बहुत सहना पड़ता है। कमजोर व्यक्ति थोड़ी सह पाता है। वो तो भाग जाएगा। सामर्थ्यवान ही सहता है, कमजोर नहीं। इसलिए बहुत समझकर बोलना पड़ता है कि ये कितना प्रेशर बर्दाश्त कर सके। क्योंकि सबकी बुद्धि का स्तर, सबकी समझ का स्तर अलग-अलग होता है। अगर किसी को संवारना है, तो एक मां भी बच्चे को पूरी ताकत से नहीं पकड़ सकती। वो धीरे-धीरे उसे संवारती है। वो पूरा ज्ञान एक दिन में नहीं दे सकती। धीरे-धीरे संवारती है। और धीरे-धीरे एक दिन ऐसा आता है कि वो सब कुछ करने लायक हो जाता है। यहां सबकी बुद्धि अलग है, सबका आत्मविश्वास अलग है, सबका कॉन्फिडेंस लेवल अलग है। और जब आपको समाज के लिए काम करना है, विश्व के लिए काम करना है, तो बहुत कुछ सोचकर बात करनी पड़ती है। क्योंकि हम एक-दो व्यक्ति के लिए काम नहीं कर रहे। मैं एक-दो व्यक्ति के लिए काम नहीं कर रहा। मैं काम विश्व के लिए कर रहा हूं। जब विश्व के लिए काम कर रहा हूं, तो उसी तरीके से काम भी करना पड़ेगा। बहुत कुछ समझना पड़ता है। इसीलिए आज भी मैंने मन से कहा, चलो, अब मैं जा रहा हूं। अब एक काम करना। तुम सोचना। इस बेटी के बारे में जरूर सोचना। बैठकर, आराम से सोचना। किस तरीके से, हर बात को सहते हुए, सब कुछ सहते हुए, वो काम कर रही है। कभी सोचना। क्योंकि यहां अगर मुझे कोई सबसे करीबी है, मतलब सबसे ज्यादा मुझे जानने वाला, कई वर्षों से, तो हेमंत है, दो हजार उन्नीस से। राजेश भी मुझे दो हजार बाईस से लगभग जान रहा है। सबसे पुराना अगर कोई है, तो हेमंत। और ये मेरी हर स्थिति को जानते हैं। मैं कैसे काम करता हूं। इन्होंने इस काम में बहुत सपोर्ट दिया है। चाहे चैनल चलाकर, चाहे आर्थिक। कभी मुझे पैसे की जरूरत होती है, इनको फोन कर देता हूं। मैं और लोगों से कर्जा लेता हूं। लेकिन इस व्यक्ति से मैं लेता हूं, और ये देता ही नहीं मांगता। मुझे कभी ऐसा हुआ ही नहीं कि वापस करना पड़े। इनका बहुत सहयोग रहा। आदमी का मतलब, बहुत कुछ देखना पड़ता है। अगर काम करना है, तो बहुत कुछ देखना पड़ता है। और काम नहीं करना है, तो निकालो, जाओ। तुम भी जाओ, तुम भी जाओ। यार, रहेंगे, पड़ेंगे अभी। लेकिन विश्व के लिए काम करना है, तो किसी न किसी को तो उस काम में जोड़ोगे। इनको क्यों नहीं? ये तो मिले हैं। प्राकृतिक रूप से मिले हैं। इनको मौका क्यों नहीं दे रहे? ये अभी नहीं समझ रहे। कुछ साल बाद समझेंगे। अभी इन्हें पूरा समझ नहीं आ पा रहा कि इन्हें क्या मिला है, करने को। लेकिन कभी न कभी जीवन में समझ में आएगा।

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सुधारक अपनी पूरी जिंदगी पहले तप में लगाता है, फिर समाज के कल्याण में। जैसे वृक्ष जितना ऊंचा होता है, जड़ें उतनी गहरी होती हैं। बीज का आवरण टूटे बिना पौधा नहीं बनता, और वो टूटना हमें सहन नहीं होता, क्योंकि आगे क्या होगा, पता नहीं। हम उसी आदत में जीते रहते हैं और भीड़ का अनुसरण करते हैं। भीड़ सुंदरता का या किसी और चीज का पैमाना रख दे, तो कमी छुपा ली जाती है, जैसे टोपी लगा ली। छुपाकर न हम जिंदगी जी पाते हैं, न सच में खड़े हो पाते हैं। भीड़ का अनुसरण क्यों करते हैं? क्या मेरे अंदर कमजोरी है या खालीपन है? आवरण आखिर क्या चीज है, और हमारे अंदर ये कमजोरी क्यों है कि हम दूसरे की नजर में अपने आप को भरना चाहते हैं?

इसलिए कि आप योग्य नहीं हो, और उसके सहारे योग्य बनना चाहते हो। आप मेरे साथ अभी घूमके आए। आप भी आए, आप भी आए। उनकी उम्र सत्तर साल है। मैं कैसे कपड़ों में हूं। देखो, वो मुझसे कैसे बात कर रहे थे। वहां कोई सहारा नहीं था। वो चालीस साल से वहां बैठे हैं। चालीस साल तक अगर एक जगह रहा, तो कुछ तो व्यक्ति ने समझा होगा। ऐसा नहीं कि एकदम खाली हो। चालीस साल कोई कम समय नहीं होता, एक ही स्थान पर। बिना पाखंड किए, उसी गांव में रहना, और उस तरीके से जीना, कोई साधारण बात नहीं है। मैं जाता-आता उनकी बारे में जानता हूं। वो ऐसा नहीं कि धागा-धूनी या ऐसा कुछ करते हों। बहुत सरलता से जीते हैं। उनको मिला या नहीं मिला, वो बाद की बात है। लेकिन कुछ तो समझा होगा। पूरी तरह ऐसा नहीं कि चालीस साल में वैसे के वैसे रहे होंगे। चालीस साल जीवन के कम नहीं होते, एक जगह काट देना। तो आप देखिए कि मैं कैसे उनसे जाकर मिला, कैसे मिलता हूं, कैसे रहता हूं। मैंने ये देखा कि अगर आप कहीं अंदर से कमजोर हो, और उस कमजोरी को दूर करने की आपकी क्षमता नहीं है, और आपको कुछ बनना है, तब आप पावर का सहारा लेते हो। उसे ढकते हो। क्योंकि उस कमी को दूर करने की क्षमता नहीं है, और बनने की एक भनक है, एक जिज्ञासा है, कि मैं कुछ बनके बताऊंगा इनको। और आपको पता है कि बनने की आपकी कैपेसिटी नहीं है। तब कहीं से आवरण का सहारा मिलता है। आप ओढ़कर समाज को बताते हो कि मैं ये हूं। लेकिन एक न एक दिन ऐसा कोई व्यक्ति आता है, और आपके आवरण को ऐसे तोड़ देता है कि आप बिखर जाते हो। आता ही है। कभी न कभी कोई टकरा जाता है, और आपके आवरणों को चकनाचूर कर देता है। कोई न कोई मिल जाएगा। कहीं न कहीं उसके अंदर कमी है। कमी है, और कमी दूर नहीं कर पा रहा। उसकी सामर्थ्य भी नहीं है। इसलिए वो आवरण का सहारा लेता है। आवरण के सहारे मैं को खड़ा करता है। वो सामर्थ्य आप तभी लाओगे, जब पढ़ना है तो शिक्षक ढूंढो। कुछ भी सीखना है, तो उससे सीखो जो सीख चुका हो। कुछ भी सीखना है। इस संसार में दो तरह के लोग रहते हैं। एक सीखने वाला, एक सिखाने वाला। आप तय कर लीजिए, आप कौन हो। अगर आप सीखने वाले पक्का हो गए, तो सिखाने वाला कोई न कोई टकरा जाएगा। सीधी बात है। और मैंने देखा, इस संसार में अस्सी प्रतिशत से ज्यादा लोग सीखने वाले और सिखाने वाले, दोनों बनकर घूमते हैं। वो जाते हैं सीखने, और सिखाने की बात करने लग जाते हैं। एक बन जाओ। अगर आप सीखने गए हो, तो सिखाने की बात मत करो। और सिखाने गए हो, तो सीखने की बात मत करो। बोल दो, भैया, मैं ये हूं, पक्का। मैं समझौता नहीं करूंगा। मान लो, एक शिक्षक पढ़ाने गया, और विद्यार्थी कोई उठकर उसे पढ़ाने लगे, तो शिक्षक कैसा रहेगा? फिर शिक्षक की क्या जरूरत है? शिक्षक एक होना चाहिए। विद्यार्थी अनेक होने चाहिए। तो पहले ये पक्का करिए कि आप हो कौन। मैंने ये देखा कि लोग जाते हैं, जाना कहीं और है, पता कहीं और का पूछते जाते हैं। उन्हें खुद नहीं पता कि सच में जाना कहां है। बस यूं ही चले जा रहे हैं। देखो, यहां इतने लोग हैं। अभी तक कोई पक्का करता है क्या? मुझे बस इसके अलावा कुछ नहीं चाहिए, कि पक्का करे। हो नहीं पा रहा। पक्का तो पक्का। पीछे जाना नहीं है। अपने लक्ष्य तक पहुंचने के बाद ही कुछ होगा। ये पक्का करना पड़ेगा। आज तक तो हमें ये पक्का करवाया गया है कि गाड़ी चाहिए, ये वाली चीज चाहिए, वो चाहिए। चाहिए-चाहिए तो सिखाया गया। पॉइंट को भी पकड़िए। मुर्दे के पीछे राम नाम सत्य बोला जाता है। तो ये भी पकड़ लो। अपनी समझ से आप बहुत कुछ पकड़ते हो, तो ये भी पकड़ लो, कि राम नाम सत्य है। अब राम नाम सत्य है, तो इस राम को वो साकार रूप वाला राम मत समझ लेना। क्योंकि इनके पहले भी मुर्दे जाते रहे हैं। उस परम ब्रह्म राम की बात हो रही है। राम जपो, राम का नाम जपो, उस राम की बात हो रही है। साकार रूप वाले राम की बात मत पकड़ लेना। ये गलती मत करना, नहीं तो एक रूप में फंस जाओगे। रूप ही भटकाव है। दर्शन, दृश्य और द्रष्टा। जब तक दर्शन की कामना है, तब तक आप दृश्य में उलझे हुए हो। और जब तक रूप में उलझे हुए हो, तब तक उपलब्धि नहीं होगी। भक्त बनकर रह जाओगे। क्योंकि रूप में हो, तो द्वैत है। और रूप का कभी नाश होगा। संसार में कोई भी रूप हो, कोई भी पिंड हो, उसका नाश होगा। नाश का मतलब नष्ट होना नहीं। नाश का मतलब परिवर्तन। किसका नाश होगा? रूप का नाश होगा, तत्व का नहीं। हम रूप में फंसे हैं, तत्व में नहीं। इसलिए कहा गया कि इस जगत का नाश हो जाएगा। जगत आपके लिए क्या है? रूप जगत है। ये तत्व थोड़ी है। आप रूप में फंसे हुए हो, तत्व में नहीं। तो रूप का नाश होता है। तत्व का नहीं। आज आप छोड़कर चले जाते हो। किसी के घर का व्यक्ति मर गया। वो चिल्लाता है, रोता है, कहता है मैं इसके बिना नहीं रह पाऊंगा। फिर जाता है, जला देता है। फिर बोलता है, कब जल जाए। लेकिन वो व्यक्ति अभी भी मौजूद है। रूप अलग हुआ है। राख में मौजूद है। रखो न अपने पास। अभी भी वो है। कहां गया वो? कहीं नहीं गया। अगर आप उसे शरीर मानते हो, तो कहां गया? बस परिवर्तन हो गया। शरीर से राख हो गया। राख को अपने पास, अपने घर में रखो। सीधा देखो। पैरों के नीचे छोड़कर चला आता है। अपने मां-बाप, भाई-बहन, सबको। क्योंकि अब आप इस संसार में काम के नहीं रहे। जो काम का नहीं है, वो राम का है। अब तुम जाओ, राम के बन जाओ, क्योंकि अब तुम काम के नहीं हो। इसलिए बिस्तर पर पड़ने के बाद पूरा परिवार प्रार्थना करता है कि इनके प्राण छूट जाएं। ये बहुत परेशान हैं। परेशान वो नहीं है। पूरा परिवार है। अपनी परेशानी से छुटकारा पाने के लिए प्रार्थना करता है कि प्राण छूट जाएं। वो कहां गया? वो है तो। मैं कह रहा हूं, शरीर में नहीं रहा, तो राख में है। क्या फर्क है? राख रखो। सामने देखने की वही जगह है। एकदम वही तो है। लोग सोचते हैं, कब छोड़कर जाऊं। राख करने की भी जरूरत नहीं है। बॉडी जैसी सोती अवस्था में होती है, वैसी तो है। कहोगे, महक जाएगा, बर्दाश्त नहीं कर पाएंगे। ठीक है। लेकिन रात को रख लो। रात की छुट्टी आते ही उससे लग जाएगा। राख में तो मौजूद है वो, अगर आप उसे शरीर मानते हो। लेकिन काम का नहीं। बस इतनी बात है। हाथ में कैंसर हो जाए, तो क्या हम काटने का पैसा नहीं देंगे? कटवा देंगे। दोनों कटवा देंगे। नाक भी कटवा देंगे, गाल भी कटवा देंगे। जब अपना नंबर आएगा, कहेंगे, बस, अब नहीं। ये रहने दो। जितना जिएगा, चलेगा। यहां नहीं काटना। क्योंकि कटवाते हम तब हैं, जब हम हैं। जब हमारा नंबर आएगा, हम नहीं कटवाएंगे। मैं अपने ही शरीर के अंग-अंग, जीने के लिए कटवा सकता हूं। आज जिसे मैं तेल लगा रहा हूं, मुझे पता चल जाए, कोई डॉक्टर कह दे कि कैंसर है, ये उंगली लगी है, हाथ कटवाना पड़ेगा, तो क्या करोगे? काटने का पैसा भी दोगे। और काटने के बाद बड़े खुश हो जाओगे कि कट गया, अपनी ही उंगली। पूरे शरीर में कैंसर फैल जाए, तो हाथ भी कटवा दोगे, कान भी, आंख भी, अंग भी। अपने ही। और जब आपकी बारी आएगी, कहेगा गर्दन थोड़ी कटनी पड़ेगी। फिर बचेगा क्या? बचेगा किसके लिए? कैंसर तो एक घर से काटकर दूसरे घर निकाल देगा। लेकिन तुम इसमें रह नहीं पाओगे। जब तुम्हारी बारी आती है, कहते हैं, भाई, अब रहने दो। मतलब तुम्हें शरीर की भी फिक्र नहीं है। ये शरीर जब तक आपका काम का है, तभी तक इसकी फिक्र है। इस बात को गहराई से समझो। यहां कोई किसी की फिक्र नहीं करता। इसे बहुत गहराई से समझो। मैं यही कहना चाहता हूं। आप यूज होना ही होना है। ये संसार ही ऐसा है। तो क्यों न हम सदुपयोग में यूज हो जाएं। आज मैं बता दूं। शायद मैं विवाह करता, शादी करता, तो मुझे कम मेहनत करनी पड़ती। आठ घंटे कहीं नौकरी करता, या व्यापार करता, अपने घर आकर बीवी-बच्चों के साथ अच्छी लाइफ जीता। जितनी मगजमारी आज मेरी जिंदगी में है, उतनी तो नहीं करनी पड़ती। मैं दिन-रात इसमें लगा हूं, पागल की तरह। कभी तुमसे विनती कर रहा हूं, कभी तुम्हें समझा रहा हूं, कि तुम छोड़कर मत चले जाना। उस आदमी की जिंदगी कैसी होगी? उसे तुमसे कुछ नहीं चाहिए। वो तुम्हें संभाल रहा है। और तुम हमेशा उसे डराए रखते हो कि मैं कभी भी छोड़कर चला जाऊंगा। उसकी क्या मनोदशा होगी? वो आदमी तुम्हारे लिए पागल है, और तुम उसे हमेशा डराके रखते हो कि तुम कभी भी छोड़कर जा सकते हो। उस आदमी की स्थिति समझ सकते हो? वो पागल नहीं हो रहा। क्योंकि उसे विश्व के लिए काम करना है। वो पागल नहीं हो सकता। अगर मैं वहां काम करता, तो आज मुझे इतनी मगजमारी नहीं करनी पड़ती। कभी तुम्हें संभालो, कभी तुम्हें संभालो। जरा इस बात को सोचो। तुम कहीं न कहीं यूज होगे, संसार में। मुझे भी पता है, मैं भी यूज हो रहा हूं। मैंने कहा, संसार में तो यूज होना ही है। शादी करो, बच्चे होंगे, परिवार होगा, नोच देंगे। मैं उन्हें नोचूंगा, वो मुझे नोचेंगे। ऐसा नहीं कि केवल वो नोचेंगे। मैं बहुत सच्चा हूं, ऐसा नहीं। वो नोचेंगे, मैं देखूंगा। मैं भी नोचूंगा। वो भी नोचेंगे। नोचना-नोचवाना है ही। अब मैं एक काम करता हूं। मुझे समाज के लिए काम करना है। कुछ लोग ही क्यों नोचें? सब नोचें। अपने अंदर कुछ ऐसा लाओ, कि समाज के सदुपयोग में यूज हो जाओ। यूज होना ही होना है। यहां कोई भाग नहीं सकता। आप दुनिया में कहीं भी जाओ, आपका उपयोग होना ही होना है। कहीं भी चले जाओ, तुम्हारा यूज होगा ही। बच ही नहीं सकते। कहने का मतलब है, सदुपयोग में यूज हो जाओ। संसार के हित में उपयोग हो जाओ। सेवा में उपयोग हो जाओ। यूज तो होना ही होगा। आप चाहे कहीं भी चले जाओ। उस दिन इनसे यही कहा था। हमारी बात हो रही थी। मैंने कहा, अगर एक प्रतिशत भी लगे कि ये सत्कर्म नहीं है, सेवा नहीं है, तो चले जाना। मत करना। कभी भी, कहीं भी, जहां भी रहो, अपने अस्तर को उठाओ। मैं बाहरी आदमी हूं। मैं सबको सलाह देता हूं। सबको खुलकर बोलता हूं। मुझे इतना पता है। बाद में मैं भी नहीं रहूंगा। ये किसी एक के सहारे नहीं रुकता। हमें संवारने का बस मौका मिला है। मैंने कभी नहीं मांगा था कि मुझे सेवा का मौका दे। प्रकृति ने दे दिया। तुम नहीं करो, कोई और करेगा। जगह हमेशा भर जाती है। आप सामान उतार लो, हवा जगह भर देती है। यहां कुछ खाली नहीं रहता। आप गए, कोई और आएगा। इंतजार हो रहा है। एक लाइन में नहीं, कई लाइनें लगी हैं, कि मुझे सेवा का मौका मिले। तुम छोड़ो, कोई और आ जाएगा। जगह हमेशा भरती रहती है। मेरा कहने का सीधा मतलब ये है कि आप यूज होंगे। बच ही नहीं सकते। सृष्टि ही ऐसी है। भगवान आए, वो यूज हुए। राम हुए, कृष्ण हुए। कौन नहीं यूज हुआ? इसलिए उस छोटे दायरे में यूज होने से अच्छा है कि पूरे समाज के लिए अपने अंदर कुछ ऐसा लाओ। सीधी बात है। नहीं तो मैं वो जीवन ही जीता। मेरे समझ से आठ घंटे ड्यूटी करके, या नौकरी-वकरी करके, बिजनेस करके, बढ़िया लाइफ जीता। इतनी मगजमारी नहीं रहती, जितनी आज मुझे करनी पड़ रही है। फिर जिनके लिए करो, उनमें से एक आदमी आगे निकलकर आप पर बड़ा गुस्सा करता है। अरे, तू रह। जरा आ। तुझे बताता हूं गुस्सा क्या होता है। जरा आकर यहां रह। कुछ दिन काम कर, समझकर। तुझे आ जाएगा। सारी चर्बी निकल जाएगी। तू उस जगह जरा आकर कुछ दिन रह। तब तुझे पता चलेगा गुस्सा क्या होता है। वहां से कह देना बड़ा आसान है। आगे एकदम बढ़िया सा बैग रखा है। कहां है शौचालय, फट से चले गए। कहां है बाथरूम। कहां है भोजन, फट से बना। सब व्यवस्था। आप गुस्सा बहुत करते हो। पता है, तुम्हारी इस व्यवस्था के लिए इस व्यक्ति ने क्या किया? पूरी जिंदगी लगा दी है। तुम्हारे शौचालय के लिए, तुम्हें एक-एक व्यवस्था देने के लिए, पूरी लाइफ लग गई है उसकी। वो गुस्सा नहीं होगा, जब तुम दुरुपयोग करोगे? गुस्सा भाव में से निकला है। क्या वो लोगों को दिखावा करेगा, लाइन में देखो कितना सज्जन है, और कमरे में जाकर मां-बहन करेगा? ऐसा आदमी मैं नहीं हूं। मुझे अगर कहना होगा, तो मैं लाइव में बोलूंगा। अगर मुझे गुस्सा करना होगा, तो लाइव में करूंगा। ऐसा नहीं कि आपके सामने मीठा-मीठा बढ़िया बोलूं, और कमरे में जाकर गालियां दूं। मुझे नहीं आता। मुझे अगर बोलना होगा, तो मुंह पर बोलूंगा। तुम्हें आना है, आओ। जाना है, जाओ। सहयोग देना है, दो। नहीं देना है, मत दो। कोई फर्क नहीं पड़ता। काम हो, चाहे न हो। होगा, तो ईमानदारी से होगा। नहीं होगा, तो जाने दो। छोड़ो। सीधी बात है। विश्व के लिए काम करना है, तो बहुत सहना पड़ता है। और सबको साथ लेकर चलना होता है। इनको भी चलना है, इनको भी चलना है, सबको चलना है। सबको देखना पड़ता है। मैं इसीलिए इनको कहा कि आपको समय मिलेगा, तो जरा चिंतन करना। अब तो आपको मौका मिल रहा है। चिंतन करना। जैसे मंसूर कौन थे। जब सबने पत्थर मारे, तो उन्हें चोट नहीं लगी। उन्हें जानने वाले एक ने जरा सा मारा, तो वो चीख पड़े। क्या हुआ? इतने पत्थर बरस रहे थे, मुंह लहूलुहान हो गया था, आपको चोट नहीं लगी। और इसने जरा सा कंकड़ मार दिया, तो इतनी चोट? बोले, ये मेरे बारे में सब जानता है। ये जानते हैं कि ये व्यक्ति कैसा है, इस व्यक्ति ने कितनी मेहनत की है। आपको पता है, एक प्रश्न का उत्तर पाने के लिए मैं मुंबई से इंदापुर गया। पता नहीं कितना, सौ किलोमीटर में गया। वहां महाराज थे। मैंने उनका घंटों इंतजार किया। वो कहीं गए हुए थे। बाद में आने के बाद मैंने साष्टांग प्रणाम किया। मैं रो रहा था। उन्होंने एक ही बात कही। बोले, जिसके लिए आप आए हो, वो नहीं होगा। आंखों में आंसू आ गए। मैंने कहा, मैं किसके लिए आया हूं? मैं तो आध्यात्म के लिए आया हूं। बोले, नहीं होगा। मैंने उनसे नहीं कहा। लेकिन मन में आया, तुम कर क्या रहे हो? कुर्सी पर क्यों बैठे हो? हमारा कितना समय बर्बाद हुआ। तुम्हारे पास जवाब नहीं था। एक शिक्षक के पास विद्यार्थी जाए, और वो कहे कि मैं पढ़ाने का काम नहीं करता, सब्जी बेचता हूं, तो सब्जी का ठेला लगा। काहे को अपने आप को शिक्षक बोलता है। मेरा कितना समय बर्बाद हो गया। मैं रोते हुए, साष्टांग करके आया। आप लोगों को तो बहुत आसानी से, इज्जत से, उत्तर मिल रहा है। मैं तो मां-बहन की गालियां सुनने के बाद भी उत्तर नहीं पाता था। मैं देख रहा हूं, ये बड़े ताव में आते हैं, ताव में चले जाते हैं। ये जिज्ञासा की शुरुआत है। हम तो मां-बहन की गालियां और थप्पड़ खाने के बाद भी ऐसे खड़े रहे, कि मुझे उत्तर मिल जाए। भूखे-प्यासे। अब मेरे अतीत में कभी घूम लो। देखो, मैंने कैसे जीवन काटा है। यहां तो लोग ताव में आएंगे। ऐसा बात करेंगे जैसे बाप की बपौती हो। नहीं तो मैं चला जाऊंगा। मुझे कोई तकलीफ है क्या? मैं तो ऐसे ही आ गया। ऐसे ही आ गए, तो ऐसे ही भटकते रहोगे। क्योंकि तुम जिज्ञासु हो ही नहीं। जिज्ञासु व्यक्ति अपने उत्तर के लिए आता है, और उस पर काम करता है, सरलता और सहजता से। किसी को दोषी नहीं ठहराता, और आगे बढ़ता है। मैं आज के साधकों की हालत देखता हूं, तो बड़ी बदतर है। इन्हें ज्ञान का मतलब ही मालूम नहीं। आप इतने गुस्से से क्यों बात कर रहे हो? आप दबा क्यों रहे हो? जब ये बात पक्की हो गई कि ये व्यक्ति तुम्हें दबा रहा है, तो उसी समय उस जगह को छोड़ देना चाहिए। उसके पास एक सेकंड भी खड़े नहीं होना चाहिए। क्योंकि अब वो व्यक्ति तुम्हें कभी उठाएगा नहीं। तुमने उठाने से पहले ही समझ लिया कि तुम्हें दबा रहा है। एक तरफ से वो उठा रहा है, और आपने उसे दबाना समझ लिया। तुम भ्रमित हो गए। अब वो क्या करे? उसकी क्या गलती? यहां सब अपने-अपने तरीके से काम करते हैं। लोग अपने तरीके से काम करवाना चाहते हैं। हो सकता है वो आपको दबाकर ही उठाना चाह रहा हो। वो दबा रहा है, तो तुम्हारा स्तर दिखाना चाहता है। अगर वो विपरीत परिस्थितियां पैदा कर रहा है, तो उससे तुम्हारी स्थिति का पता चलेगा। तुम्हारी मानसिक स्थिति क्या है, शारीरिक स्थिति क्या है, मनोदशा क्या है। उसका जांचने का तरीका कुछ अलग होगा। और सबके साथ अलग-अलग जांचेगा। क्योंकि एक ही तरीके से जांचेगा, तो सब एक-दूसरे को बता देंगे कि भैया, देखो, ऐसे जांचेंगे। नमो नारायण थे। उनसे ऐसी ही बात हुई। मैंने कहा, ये जाला निकाल दो। वो कहते थे, आप कुछ भी करो, मैं कर दूंगा। फिर बोले, मैं तो नहीं निकाल पाऊंगा। मैंने कहा, ठीक है। उस समय अशोक भी थे, तो अशोक ने निकाला। बाद में मैंने उनसे पूछा, आपने क्यों नहीं निकाला? बोले, इसमें जीव थे। मैंने कहा, आपने कहा था कुछ भी करो, मैं कहूं। जीव कहां से आ गया? क्या जीव मुझे नहीं दिख रहा था? उसी जीव को बचाने के लिए तो मैं जाला निकलवा रहा था। और मैं उस जाले को इसलिए निकलवा रहा था, क्योंकि उसका मालिक नहीं था। अगर उसका मालिक होता, खाने वाला होता, तो मैं नहीं निकलवाता। तब निकलवाना प्राकृतिक हो जाता। लेकिन मैंने देखा, जाला खाली है। ये मर जाएंगे। इन्हें खाने वाला कोई है नहीं। तो ये बेमतलब मारे जा रहे हैं। क्यों न इसे बचा लें। और तुम तो कहते थे, कुछ भी करो, आप कुछ भी कहो, कर दूंगा। तो क्या हुआ? मैं ये बताना चाहता हूं। जब आप किसी को गुरु कह रहे हो, तो उसकी परीक्षा लेने का तरीका बहुत अलग होता है। एक दिन यहां पति-पत्नी आए थे। एक दिन ऐसा बासी चावल था, दूसरे दिन का, लेकिन ठीक था। मैं तो तीन-तीन दिन का खा लेता हूं। मैंने कहा, अनाज मत फेंको। आप एक बात बोलो। बिस्किट खा रहे हो, कितने महीने का बना है? पाव खाते हो, ये सब कितने महीने का बना है? क्रीम पाव क्या तुम्हें ताजा, फैक्ट्री से तुरंत पहुंचा दिया जाता है? भोजन अगर सड़ा नहीं है, बास नहीं मार रहा, तो कई दिन तक खा सकते हो। नमकीन वगैरह, जितनी चीजें लाते हो, क्या तुरंत बनकर आती हैं? और भोजन के लिए नाटक करते हो। वो बासी नहीं खाए। सबको देना था, बाद में कुछ झंझट हो गया। बाद में मुझे बोले, पति चावल नहीं खाते। बाबा, इनको मत देना। दूसरे दिन मैंने कहा, इतना दूध लाओ। हमें भी पता नहीं था। दूध लाओ, फिर दूध की खीर बनाओ। काजू, किशमिश, बादाम, मखाना डालो। डल गया सब। और पति-पत्नी दोनों ने खाया। तब मुझे पता चला कि यहां इच्छा उन्हीं चीजों की है। मैंने पूछा, क्या हुआ, चावल तो खाते थे। बोले, नहीं, हम तो चावल नहीं खाते। खीर में चावल ही तो था। वो भौचक्का रह गया। ये तरीका है लोगों का। चावल नहीं खाते, खीर खाते हैं। चावल नहीं पचता, तो खीर कैसे पचेगी? खीर में तो चावल है। आप लोगों को बेवकूफ बना रहे हो। मैं आपको बताऊं। मैंने ऐसी परिस्थितियों में साधना की है। मुझे कोई मारा है, तो मैं वहीं रहकर साधना किया हूं। गाली भी खाई। ऐसा नहीं कि यूं ही बोल रहा हूं। मुझे मार भी पड़ी है, बिना मतलब। बिना गलती के। कोई गलती ही नहीं थी मेरी। गाली तो आम बात थी। आदत पड़ गई। अभी भी लाइव में सुनता हूं। फटे कपड़े पहने थे, तब भी सुन रहा था। अच्छे कपड़े पहनूंगा, तो भी सुनूंगा। पैदल चल रहा हूं, तो भी सुनूंगा। गाड़ी चलाऊंगा, तो भी सुनूंगा। समाज भी ऐसा है। उसका काम ये भी है, कि कुछ बताकर आपको नीचा गिराए। लेकिन आप बस अपना काम करो, ईमानदारी से। आप क्या करने निकले हो, बस उतना करो। और अपने आप को संवारो। समाज में कुछ काम करो। संवारने के लिए बड़ी मेहनत करनी पड़ती है। बहुत मेहनत करनी पड़ती है। समाज के लिए काम करना इतना आसान नहीं है। अपमान का खून पीना पड़ता है। अपमान का खून पीते रहना पड़ता है। इतना आसान नहीं है। बातें करना बड़ा आसान है। आज आप उजाला ले रहे हो। इसके लिए किसी की जिंदगी लग गई है। आप इतना आसान मत समझिए। आज बहुत सरलता से लाते हो, बल्ब लगा देते हो। लेकिन एक व्यक्ति का इसके लिए जीवन लग गया है। संसार में कुछ भी नया आता है, तो उसके लिए एक पूरी जिंदगी लगती है। उसकी पूरी लाइफ चली जाती है। और लोग उसके सहने को समझ ही नहीं पाते। वो करे तो क्या करे? ये छोड़े, तो ये करेगा, वो करेगा। वो पागल हो जाता है। करे तो क्या करे। क्योंकि बहुत कुछ करना है। मैंने कहा, एक परिवार को संभालना बड़ा आसान है। क्योंकि वो कहीं जाएंगे नहीं। तुम पर निर्भर हैं। डांट-डपट करो, कैसे भी। वो तुम्हें डांटेंगे, तुम उन्हें डांटोगे। लेकिन विश्व के लिए काम करना आसान नहीं है। और मैं देख रहा हूं। काम करना है, तो बहुत सहना है। और बस अपनी लाइफ जीनी है, तो फिर अकड़कर जियो। आवेश में जियो, जज्बात में जियो। जानवर भी अपनी लाइफ जीते हैं। कभी यहां खाकर, कभी वहां खाकर। समाज में जीना कोई बहुत कठिन नहीं है। लेकिन समाज में काम करना बहुत कठिन है। समाज के हित के लिए तो बहुत कठिन है। मेरा तो कहना है, जिंदगी मिली है। ईमानदारी से, सत्कर्म से, किसी के काम आओ। और एक-दूसरे की भावनाओं को समझो। एक-दूसरे की भावनाओं को समझना बहुत जरूरी है। मैं आपको बता दूं। हमें कोई भोजन का निमंत्रण दे, और वो शाम को न आए, तो मैं शाम को भोजन नहीं करता था। फिर दूसरे दिन करता था। और मैं उसे दोषी भी नहीं ठहराता था। लोग भोजन लेकर खड़े हो जाते थे, कि आप यहीं भोजन कर लो। मैं कहता, नहीं। उस व्यक्ति ने मुझे बोलकर गया है। अब नहीं करूंगा। फिर दूसरे दिन आता। कहता, माफ करो, मैं कल नहीं आ पाया। मैं कहता, कोई बात नहीं। माफ किस बात की। मैंने भोजन किया ही था, दूसरे दिन। कम से कम मुझे कुछ तो समझ में आया। मेरी स्थिति जांचने का मौका तो मिला, कि मेरी स्थिरता कितनी है। तुम तुरंत ला देते, तो मुझे कैसे पता चलता कि मेरी व्याकुलता कैसी है। मेरी स्थिरता का तब पता चलेगा, जब मेरे सामने विपरीत परिस्थितियां बनेंगी। जब परिस्थितियां मेरे अनुकूल हैं, तो मेरी स्थिति का जीवन में कभी पता ही नहीं चलेगा। वो व्यक्ति दूसरे दिन आता था। मैं उससे एक प्रतिशत भी नाराज नहीं होता था। वो खुद आकर कहता, कल बड़ी गलती हो गई। मैं ज्यादा पी गया था। आज नहीं आ पाया। मैं कहता, कोई बात नहीं। वो कहता, आज कर लेना। मैं कहता, आज रहने दो। आज नहीं। आज कहीं और है। तू आज रहने दे। कुछ दिन बाद देखेंगे। क्योंकि आज आना नहीं हुआ, तो बात दो दिन की हो जाएगी। इससे क्या होता था? इससे मेरी स्थिति का मुझे पता चलता था। अगर एक रात भोजन नहीं मिला, उस व्यक्ति ने कहा था और नहीं आया, तो मेरी क्या प्रतिक्रिया निकल रही है। क्या मुझे उस पर गुस्सा आ रहा है। क्या आ रहा है। लेकिन मैं जानता था, मुझे हंसी आ रही थी। अभी भी हंसी आती है। दूसरे दिन आकर कहता, कल मैं आ नहीं पाया। एक बाबा पूछता, क्या खाओगे। मैं कहता, आज कुछ नहीं खाऊंगा। बहुत हंसी आती थी। पीने का नशा उतरने के बाद उनका नाटक भी अजीब रहता है। वो उस नाटक में सब कुछ लुटा भी देंगे। मैंने कहा, तू जा। वो कहता, सुबह मैं बाबा को पैसा लेकर आता हूं। मैंने कहा, तू पैसा लेकर मत आ। मुझे कुछ नहीं चाहिए, भाई। कुछ नहीं चाहिए। कहने का मतलब है, जब आपके विपरीत परिस्थितियां बनें, तो जांच करना। किस स्थिति में उस व्यक्ति ने आपको लाकर नहीं दे पाया। और नहीं लाया, तो आपकी स्थिति क्या हुई। क्योंकि शरीर से ऊपर उठना है। जब तक आपको पूरी तरह शरीर के स्वास्थ्य का ख्याल रहेगा, हर पल चिंतन शरीर बनाने में ही रहेगा, तब तक आप इसके ऊपर कभी उठ ही नहीं पाओगे। उठ ही नहीं सकते। शरीर को सुरक्षित रखो। ऐसा नहीं कि छोड़ दो। लेकिन आप उसके लिए पागल भी मत हो जाओ। स्वास्थ्य का ख्याल रखना बहुत अच्छी बात है। लेकिन उसी चक्कर में पागल मत हो जाओ।

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राजेश की समझ को लेकर ये घटनाएं सामने हैं। एक बार रिचार्ज कहा, तो पैसे दूसरे नंबर के अकाउंट में चले गए, और कहा कि आप देख रहे थे, जबकि कर रहा खुद था। एक बार बड़वानी से आए, सामने हजार रुपये दे दिए गए, फिर भी रास्ते में पेट्रोल के पैसे नहीं हैं, ऐसा नहीं बताया। पेट्रोल खत्म हुआ, खेत की तरफ जाना पड़ा, फिर गांव से व्यवस्था करनी पड़ी। जब कोई सिखाने को मिला है, तो कब तक सिखाएं? और ईमानदार, सच्चा इंसान आवेश, जज्बात और अकड़ की वजह से बार-बार क्यों लुटता और भटकता रहता है?

एक दिन की बात बताता हूं, फिर जाना। राजेश से कहा, इस नंबर पर रिचार्ज कर दो। दूसरे नंबर के अकाउंट में पैसा चला गया, उतना ही। मैंने कहा, ये तूने क्या किया। बोला, आप तो देख रहे थे। मैंने कहा, मैं देख रहा था। कर तो तू रहा था। बोला, आप तो देख रहे थे न। मैं क्या देख रहा था। तेरा नंबर था, तूने डायल किया। बोला, मैं क्या करूं। मैंने कहा, मैं करूंगा। अकाउंट में पैसा भी मंगवाओ। तुझे जो करना है, कर। अब मुझे फिर से मंगाना पड़ेगा। एक और दिन की घटना। मैं वहीं सामने उसे हजार रुपये दे रहा हूं। बड़वानी से आया था। हजार रुपये दे रहा हूं। रास्ते में बोला, पेट्रोल का पैसा है? बोला, मेरे पास तो नहीं है। बोले, मेरे पास भी कुछ नहीं है। जब मैंने सामने दिए, तो तूने क्यों नहीं बोला? मेरा परिचय तो ऐसा है कि मैं जहां खड़ा हो जाऊं, पट से फूल हो जाए। लेकिन अब मैं खड़ा भी नहीं हो सकता, क्योंकि वो मेरे से पैसे नहीं लेता, और मैं मांग भी नहीं सकता। जहां दुकान से सामान आता है, वो सामान लिया था। मैंने कहा, इनको देकर जाता हूं। मेरे पास थे, इनको देकर जाता हूं। मुझे पैसे की क्या जरूरत। अब जा रहा हूं, इनका हिसाब खत्म करूं। आऊंगा या नहीं आऊंगा, मुझे क्या मालूम। इनके पास नहीं है, बताया भी नहीं। रास्ते में पेट्रोल खत्म हो गया। मैंने कहा, चल, खींचो। हम उतर गए। ये खेत की तरफ जाने लगे। अब क्या करें। मैंने कहा, तू कर ले तो ठीक है, नहीं तो मैं व्यवस्था कर दूंगा। इसने अपनी व्यवस्था की। फोन करके, गांव में था, तो मंगवाया। ऐसी समझ है। इसे भी बहुत कुछ सीखने को मिला। हमें भी सीखने को मिलता है। आपको कोई सिखाने के लिए मिला है, तब तक सिखाइए, जब तक वो है। चला गया, कोई बात नहीं। लेकिन ऐसा नहीं कि उसे अनदेखा कर दो। वो बेचारा चला ही जाए, इस भाव से नहीं। कहीं पता चल जाए कि आप उसे सच में भगाना चाहते हो, और वैसा बर्ताव कर रहे हो। ऐसा नहीं। अच्छे इंसान, ईमानदार इंसान, सच्चे इंसान बड़े बेवकूफ होते हैं। ये बहुत बेवकूफ होते हैं। इनके पास आवेश, जज्बा, अकड़ भरा होता है। और इनका दुष्ट लोग उपयोग कर लेते हैं। बहुत बुरी तरीके से। जो लालची हैं, लोभी हैं, बनावटी बातें करते हैं, ये इनका उपयोग कर लेते हैं। ये कहीं एक महीने, कहीं दो महीने, कहीं एक साल यूज होकर ऐसे ही जीते रहते हैं। और लुटते रहते हैं। इनमें से अगर आवेश, जज्बात और अकड़ हटा दो, तो ये बहुत आगे जा सकते हैं। क्योंकि इनके अंदर ईमानदारी है। ईमानदारी तपस्या है। सच्चाई तपस्या है। उसे तब भी कभी जल नहीं सकती। लेकिन इनके अंदर सबसे बड़ा माइनस पॉइंट आवेश, जज्बात और अकड़ है। ये इसे नहीं निकाल पाते। और इसी में आकर, आवेश में, जज्बात में, कभी इधर, कभी उधर, ऐसे ही भटकते रहते हैं। इसलिए अपने अंदर से आवेश, जज्बात और अकड़ निकालो। ये बहुत जरूरी है। ये नहीं निकालोगे, तो ये आपको बर्बाद कर देगा। फिर वही, जवानी ज्यादा दिन बिकती थोड़ी है। चालीस के बाद रोने लगेंगे। क्योंकि वो तरंग, उमंग, ऊर्जा शरीर में नहीं रह जाएगी। तो फिर वही यूज होगा। पेट के लिए रोटी चाहिए। यूज तो होना ही पड़ेगा, क्योंकि पेट है, तो भेंट है। किसी न किसी के पास तो जाना ही पड़ेगा, इस पेट के लिए। पर मैं बता दूं, आश्रम में मैंने देखा। जवानी में आ गए। ठीक है, हुआ कुछ नहीं। अब कहानी सुनकर वही पड़े हैं। बात बस रोटी की है। अब जाएगा क्यों। पसीना कौन खोले। समझ रहे हो। समझकर जीवन जियो। आवेश में नहीं, जज्बात में नहीं। एकदम समझ के साथ। गलतियां तो देखो, पांचों पांडव ने भी कर दीं, कृष्ण के साथ रहने पर भी। कृष्ण ने पूछा, आपने रोका क्यों नहीं। बोले, मुझसे पूछा कहां। मेरे से चोरी-छिपे तो ये जा रहे थे। जब चोरी से जा रहे थे, तो मैं रोकूं क्यों। तो बड़ा समझकर जीवन जिए। एक झटके में पत्नी तक हार गए। इतने वीर योद्धा होते हुए भी। बहुत समझकर जीवन जियो, आवेश और जज्बात में नहीं। वो भी उनके साथ कृष्ण थे। क्या-क्या नहीं हुआ। दुर्दशा हुई, देश निकाला हुआ। बस मात्र एक जुए के लिए पत्नी तक दांव पर लग गई। काश वो उनसे पूछ लेते, कि भैया, मैं करने जा रहा हूं। ऐसी गलतियां हम करते रहे। ऐसी-ऐसी गलतियां व्यक्ति करता है।

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टोपी वाली बात समझ में आ रही है। हो सकता है मेरी मानसिकता शुरू से ऐसी रही हो। घर पर भी खालीपन और अधूरापन लगता है, तो लगा लेता हूं। अब ऐसा नहीं कि लोग मुझे अच्छा समझेंगे। शुरुआत वही पहली भावना से हुई थी, और अब आदत बन गई है। वो पहला भाव छूटता नहीं। जब साथ में टोकने वाला नहीं रहेगा, और समाज के पास हर बात का जवाब देने का समय नहीं है, तो इस आदत से कैसे निकलें?

मैं तो बस आपको इतना कहूंगा। जब आपको लगे, जरूरत है, तो लगाना। लेकिन अपने आपको जवाब देना। मैं वहां रहकर टोकने वाला नहीं रहूंगा। और समाज के पास इतना समय नहीं है कि आपकी किस-किस बात पर, कैसे-कैसे जवाब देता रहे। अगर आपको लगे कि जरूरत है, तो लगाना। लेकिन अपने आप को जवाब देना। जरूरत हो, तभी लगाना। आदत में नहीं। ये मेरी तरफ से आपके लिए सलाह है। ये बहुत अच्छी बात है। जब आपने बाद में डिटेल से बताया, तो बात समझ में आई। चीजें फील होती हैं। चार लोग हैं, तो लगा ही लेते हैं। मैं वही कह रहा हूं। बस अपने आप को जवाब देना। जरूरत में लगाना, आदत में नहीं। फिर आप देखना। धीरे-धीरे, जब ये पूरी तरह आपके अंदर से निकलेगा, तो आप बहुत खुलापन महसूस करोगे। काम बस इतना है। जब भी लगाना हो, तो अपने आप से प्रश्न करना। क्या जरूरत है। धूप लग रही है, तो लगा दूंगा। नहीं तो नहीं। जब आप इससे निकलोगे, तो बहुत खुलापन पाओगे। क्योंकि मैं ये समझ पा रहा हूं। मैं इन्हीं सब पर काम करता हूं, सोचने के लिए। जब भी रखना हो, तो अपने आप से प्रश्न करना कि क्या जरूरत है। जरूरत हो तो लगाना, नहीं तो मत लगाना। बात खत्म। इसमें बस इतना ही काम करना है। इससे ज्यादा नहीं।

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समाज और परिवार के लिए व्यक्ति सब कुछ करता है। खाना हो तो पहले परिवार खाए, कपड़ा हो तो पहले परिवार पहने, और फिर भी सहना उसे खुद पड़ता है। उस समय गुस्सा आता है, उसे पीना और कंट्रोल करना पड़ता है। क्या ये गुस्सा हमारा स्वभाव है? गुस्सा क्यों आता है, जब हम कुछ कर रहे होते हैं और परिणाम नहीं आ रहा? परिवार को सौ प्रतिशत देते हैं, हमसे अच्छा खाने और पहनने को देते हैं, पर कहते हैं वो काम मत करना जो बहुत दुखाता है। तब गुस्सा होता है, नाराजगी होती है। कितनी बार कोई ये सहेगा? एक दिन टूट जाएगा, रोते हुए कहेगा, जैसे जीना है जियो। न अलग हो सकता है, न हिला सकता है। अगर समझाने के बाद भी कोई छत से कूदने की बात करता है, जानकर खतरा मोल लेता है, तो उस स्थिति में क्या करना चाहिए?

गुस्सा इसलिए आ रहा था कि मैं कुछ कर रहा हूं, और उसका परिणाम नहीं आ रहा। तब गुस्सा आ रहा है। लेकिन वो मेरा स्वभाव नहीं है। आएगा ही आएगा। आप उसे बस पी सकते हो, दोबारा। फिर आए, तो पी लो। नहीं पीना है, तो उसी को पीना है। क्योंकि वो आदमी फिर दूर हो जाएगा। अगर आपको उससे प्रेम है, तो पीना पड़ेगा। उसके लिए आपको पीना पड़ेगा। क्योंकि उसकी क्षमता नहीं है। वो प्यार को संभाल नहीं पा रहा। गुस्से को क्या संभालेगा। अगर सामने वाला दुरुपयोग कर रहा है, तो मैंने कुछ देर पहले क्या कहा। सदुपयोग में करो। अगर आपका दुरुपयोग हो रहा है, तो मत करो। ये कहीं न कहीं लायक बनेंगे, तो समाज में क्या फैलाएंगे। आने वाले समय में इनके पास ताकत हुई, तो ये उस ताकत का सदुपयोग करेंगे। समाज में ऐसे लोग हैं। ऐसे लोगों को ताकत बहुत जरूरी है। पर परिवार में भी यही है। कोई भाई ऐसा कह रहा है कि ये काम ऐसे नहीं करना। और कोई कह रहा है कि छत से कूदने में अच्छा लग रहा है। आप कहते हो, भाई, मत कूद। चुपके से तेरे हाथ-पैर टूट जाएंगे। वो नहीं कर रहा, नहीं मान रहा, समझाने के बाद भी। उस परिस्थिति में उस इंसान को क्या करना चाहिए। शब्द नहीं बोलना चाहिए। नहीं तो कहेगा, तुम्हारे कहने से कूद गया। फिर आप जिंदगी भर अपने आप को कोसोगे। आप उसे समझा दीजिए। और बोल दीजिए, फैसला तेरे हाथ में है, और मैं जा रहा हूं। अब उसके हाथ है। वो कूद गया, पीछा छूट गया, तो क्या करोगे। कब तक आप उसकी चौबीस घंटे रक्षा करोगे। फिर वो बोलेगा कि अब तेरा फर्ज बनता है। उसे डॉक्टर के पास उठाकर ले जाओ। कौन सा फर्ज बनता है। फर्ज बनता ही नहीं। जब कोई काम करते हुए गिर जाता है, छिटक जाता है, तब फर्ज बनता है। वो जानकर कर रहा है। हमें उसके पास जाना ही नहीं चाहिए। क्यों। क्योंकि वो दोबारा कूदेगा। अगर आप एक बार नहीं बचाओगे, तो वो दोबारा नहीं कूदेगा। क्योंकि उसने समझकर किया है। तो उसका साथ मत दीजिए। अगर जाने-अनजाने में हुआ है, छिटककर गिर गया है, तब आपका कर्तव्य बनता है। तब उसकी पूरी सहायता करना, चाहे कोई भी व्यक्ति हो। लेकिन वो समझकर, पूरी तरह जानकर कर रहा है। धमकी देकर कर रहा है। तो ठीक है, जा। तू कभी न कभी तो करेगा। तेरे जैसे आदमी को लेकर क्या करेंगे। तू तो मेरे दुख का कारण रहेगा। एक ही बार अगर गया, तो गया। कम से कम सारा दुख खत्म तो हो जाएगा। नहीं तो पता चला, मैं कहीं भी रहूं, कूद न जाए, मार न डाले। तू जिंदगी भर मुझे मारेगा क्या। तू तो नहीं मरेगा, लेकिन तू मुझे मारेगा। और हां, शारीरिक मरना ठीक है। लेकिन मानसिक मरना बड़ी तकलीफदायक होता है। क्योंकि शारीरिक दर्द एक बार होता है। मानसिक पीड़ा पूरी जिंदगी देती है। तो ऐसे व्यक्ति को छोड़ देना चाहिए। क्योंकि ऐसे व्यक्ति बहुत गिरे होते हैं, जो मरने की धमकियां देते हैं। ये बहुत नीचे स्तर के लोग होते हैं। चाहे भाई हो, चाहे कोई भी हो। ऐसे लोगों का त्याग कर देना चाहिए। क्योंकि इनका अस्तर बहुत गिरा हुआ है। ये आपको दुख ही दुख देंगे। फिर इमोशनल ब्लैकमेल। अगर मुझे कहीं भी करना है, तो उसका क्या सही है। नहीं। एक बार इनके झांसे में पड़ गए, तो ये जिंदगी भर, कुछ भी होगा, मर जाऊंगा, कहकर तुम्हारी जिंदगी नर्क बना देंगे। तुम्हें जीने ही नहीं देंगे। क्योंकि तुम कहीं भी रहोगे। उनकी जरा सी इच्छा पूरी नहीं कर पाए, तो तुम सोचोगे, मर न जाए यार। तुम एक काम करो। मर जाओ। मरने में तुम भी खुश, और मैं भी खुश। तुम्हें मरना है, तो मरो। एक दिन पक्का तुम मरोगे। तुम्हारे जैसे लोग रहकर करेंगे क्या। ऐसे लोगों का त्याग कर देना चाहिए। चाहे साथी हो, चाहे परिवार हो, चाहे समाज के लोग हों। मैंने इनका प्लस पॉइंट भी बताया। ईमानदार आदमी कहां जल्दी मिलते हैं। सच्चा इंसान। अपने घर में भी देखो, कितने लोगों को बोल सकते हो। क्या पूरे परिवार को बोल सकते हो। कोई-कोई मिलता है। मेरा कहना है, अगर ईमानदार और सच्चा व्यक्ति मिल जाए, तो समझ लेना कि वो परमात्मा के बहुत करीब है। बस वो अकड़ की वजह से, आवेश की वजह से, जज्बात की वजह से दूर है। इतनी सी बात है। वो बहुत करीब है। उसे बहुत मेहनत नहीं करनी। उसे बस इतनी मेहनत करनी है कि अपनी अकड़ को, अपने आवेश को, अपने जज्बात को हटा दे। बस। और ये जल्दी नहीं हटता। क्योंकि उसी को वो सब कुछ समझता है। वो जल्दी ये छोड़ता नहीं। वो सोचता है, ये है तो मैं हूं। वो उसे पाल-पालकर अपने आप को ताकतवर समझता है। आवेश को, जज्बात को, अकड़ को। ऐसा ईमानदार और सच्चा व्यक्ति ही परमात्मा को देख पाता है। और कौन देख पाता है। इतिहास में अगर परमात्मा के बारे में किसी ने बोला है, तो कौन बोला है। वो सच्चे लोग थे, ईमानदार लोग थे। और क्या थे। तो आपका परिवार हो, चाहे समाज का कोई व्यक्ति हो। अगर वो आपके धन का, तन का, और आपकी समझ का सदुपयोग करे, तो उसकी सहायता दो। और नहीं करे, तो त्याग कर दो। दुरुपयोग अगर कोई भी करे, तो तुरंत त्याग ही परम सुख है। ऐसे व्यक्ति का तुरंत त्याग कर दो। कोई भी हो। आपके धन का, आपके तन का, आपके ज्ञान का सदुपयोग करे, उसकी सहायता करो। वो चाहे कोई भी हो। और नहीं करता, उसका त्याग करो। बात खत्म।

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जिस व्यक्ति का त्याग कह रहे हो, उसका क्या हो जाएगा? जिस वजह से उससे मोह हो गया है, उस मोह का त्याग कैसे होगा? अपनापन कैसे पैदा होता है? जब लगता है कि उसे मेरी जरूरत नहीं, मेरे प्यार की औकात नहीं, फिर भी अपनापन के कारण दुख होता है, तो मोह कैसे छूटे? गलत आदमी का साथ देने से तो उसकी जिंदगी और समाज दोनों खराब होते हैं। हमारा काम समाज को साफ करना होना चाहिए। तब क्या करें?

उस व्यक्ति से मोह क्यों हुआ। क्योंकि आपको कुछ चाहिए था। आपको उससे कुछ चाहिए था। अपनापन चाहिए था। अपनापन क्या होता है। एक सामान्य अपनापन कैसे पैदा होता है। या तो वो खून का रिश्ता हो। या उसके शब्द, दृश्य, गंध, रस, स्पर्श से, इन पांच इंद्रियों में से किसी इंद्रिय से सुख मिल रहा हो। तभी किसी व्यक्ति के लिए अपनापन महसूस होता है। इसी स्थिति में चाहिए का त्याग कर दो। बात खत्म। इसमें समझ काम करेगी। आपकी समझ काम करेगी। मैं कह रहा हूं, ऐसे व्यक्ति का साथ दोगे, तो आप उसे और गिरा रहे हो। मान लो आपका भाई है। आपने उसे सौ रुपये दिए, पीकर आ गया। तो उसको न देना ही ठीक है। एक व्यक्ति मेरे पास आया। बोला, मैं बहुत परेशान हूं। मैंने कहा, परेशान है। मुंह में गुटखा था। बोला, गुटखा खाते हो? बोला, हां। पीते भी हो? बोला, हां। मैंने कहा, भगवान के लिए तू और परेशान हो जा। क्या बोल रहे हो। अरे, तू परेशान हो जाएगा, तो तेरा स्वास्थ्य तो खराब नहीं होगा, ऐसा थोड़ी है। तो अगर आपका भाई हो, चाहे पत्नी हो, चाहे बच्चे हों। आपके धन का, आपके तन का, आपके शरीर का अगर गलत उपयोग करते हैं, तो आप उनका क्या करो। ऐसे को ताकत क्यों गंवाना। ऐसी जगह ताकत क्यों गंवाना। जब उसको मेरी जरूरत नहीं है। जब उसको मेरे दुख का, मेरे प्यार की औकात मालूम नहीं है। तभी तो मरने की बात करता है। ये तो समानांतर चलना चाहिए। अगर मुझसे उसे प्रेम होता, तो कूदने की बात ही नहीं करता। वो मुझे छोड़कर मरने की बात कैसे करता। वो मुझे छोड़कर जाने की बात कैसे करता। मोह का त्याग नहीं। चाहिए का त्याग। मोह किससे है। आपको कुछ मिल रहा है। बिना मिले तो हो ही नहीं सकता। अपनापन कैसे हुआ। या तो खून का रिश्ता है। या कुछ खिल रहा है। अपनापन कैसे पैदा हुआ। तो आप गलत आदमी का साथ दोगे। आपका भाई सौ रुपये दारू पीने को मांग रहा है। क्या उसे दोगे? रोज उसे और बिगाड़ोगे? उसे और गिराओगे? कहोगे, अपनापन है। तो अपनापन के नाम पर किसी की जिंदगी बर्बाद कर दोगे।

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अच्छा कर्म करना है, ऐसा कहा गया। कर्म भी अच्छा और बुरा होता है, ये बात समझ में आ रही है। लेकिन धर्म और अधर्म क्या होता है? रास्ते में किसी को खाना दे दिया, तो धर्म लग रहा है। अनदेखा कर दिया, तो अधर्म। अगर उसे अच्छा या बुरा मान लिया, तो अटैचमेंट हो जाएगा, फिर मोह हो जाएगा। क्या उसे अपना कर्तव्य मानकर करना चाहिए, न अच्छा मानें न बुरा, ताकि फंसें नहीं? भाव ये है कि अच्छा-अच्छा कहते हुए मैं भोग में न फंस जाऊं। मुझे मुक्ति का मार्ग चाहिए, बंधन नहीं। मैं मानवता और कर्तव्य से काम करूं, पर अच्छा कहकर वहीं न अटक जाऊं।

भाई ने कहा, अच्छा कर्म करना है। कर्म भी अच्छा और बुरा होता है। जब आप किसी की भावनाओं को समझते हो, उसे सही रास्ता बताते हो, तो अच्छा कर्म होता है। और आप बिना मतलब किसी को सताते हो, भटकाते हो, तो बुरा कर्म होता है। आप सही कह रहे हो। धर्म और अधर्म क्या होता है। आप कह रहे हो, हम रास्ते जा रहे हैं। दो खरीदारी हुई, तो आपको लगा कि इनको खाना दे दो। आपने खाना दे दिया, ये धर्म में आ गया। और आपने इनको अनदेखा कर दिया, ये अधर्म में आ गया। अगर हम उसे अच्छा या बुरा मान लेंगे, तो अटैचमेंट हो जाएगा। उसे हमें अपना कर्तव्य मानना चाहिए। मैं गलत भी हो सकता हूं, सही भी। हमें अपना कर्तव्य मानकर काम करना चाहिए। अगर अटैचमेंट हो गया, फिर मोह हो जाएगा। मोह हो गया, फिर हम यहीं रह जाएंगे। उससे निकलने के लिए कर्म से अटैचमेंट खत्म करना पड़ेगा। उसे न अच्छा मानो, न बुरा। ये मेरा धर्म ही है। ध्यान से समझो। आप कह रहे हो, जब आप किसी की सहायता करते हो, तो ये धर्म है। जब आप किसी को सताते हो, तो ये अधर्म है। लेकिन उसी को सामान्य भाषा में अच्छा और बुरा ही बोला जाता है। भाषा में हर समय वही शब्द इस्तेमाल नहीं कर सकते। अब कहोगे, मेरे से मुक्त हो जाओ। और बस में जा रहे हो, ट्रेन में जा रहे हो। किसका उपयोग है, तो कहोगे क्या। वहां मेरे का उपयोग करना पड़ेगा। लोग कहते हैं, मैं का उपयोग मत करो। मैं को मैं नहीं कहोगे। लेकिन व्यावहारिक जीवन में ऐसी भाषाओं का उपयोग जीवन जीने के लिए करना पड़ता है। अच्छा करने दो। प्रसन्नता होती है, आज अच्छा कर्म कर दिया, किसी को खाना खिला दिया, किसी के जन्म पर। किया। फंस गया क्या। नहीं। ऐसा लगता है कि फंस गया। तुमने किया, तभी बोल रहा है। कम से कम शुरुआत तो हुई, कहीं से। वो फंसा तो है ही। अब निकलना चाहता है। अभी फंस नहीं गया। वो फंसा है ही। इसलिए तो अच्छा कर्म करना पड़ रहा है। अगर फंसा नहीं होता, तो अच्छा कर्म करने की जरूरत नहीं थी। अब वो निकल रहा है। बिल्कुल। शुरुआत तो कर रहा है। देखो, पिंजरा लोहे का हो या सोने का। पिंजरा पिंजरा होता है। लेकिन सोने के पिंजरे की कीमत अलग मिलेगी, लोहे की अलग। अगर एक जगह उसका उपयोग वैभव के लिए किया जाए, तो क्या दोनों पिंजरों का एक ही रेट मिलेगा? उसके लिए तो पिंजरा पिंजरा है। मैं वही कह रहा हूं। पिंजरा पिंजरा है। लेकिन हम उस पिंजरे का उपयोग कहीं और कर देंगे, तो पिंजरे में एक ताकत है। लोहे के पिंजरे में अलग ताकत है। सोने के पिंजरे में अलग ताकत है। मेरी बात समझ रहे हो। पिंजरा पिंजरा है, लेकिन ताकत अलग है। तुम भी मानो, तुम भी मानो। क्या दोनों की एक ही ताकत है? दोनों का एक ही वैल्यूएशन है, इस संसार में? अगर एक ही होता, पिंजरा लोहे का हो या सोने का, तो राम और कृष्ण क्यों पूजनीय हैं, और बाकी मनुष्य क्यों नहीं? ये बताओ। कितने महात्मा हुए, वो पूजनीय हैं। वही शरीर, वही खून, मांस, मज्जा तुम्हारे मां-बाप में भी है। वो क्यों पूजनीय नहीं होते। जरा बताओ। अब इसे ध्यान से समझिए। मान लो, एक बालक ने पढ़ने की शुरुआत की। और एक बालक को किताब पढ़ना आ गया। एक चिल्लाकर बोल रहा है, क से कबूतर। तो दूसरा कह रहा है, कबूतर पढ़ने की अब तुझे जरूरत नहीं। छोड़। अब तू किताब पढ़। लेकिन उसे क से कबूतर से ही शुरुआत करनी पड़ेगी। जिस दिन वो किताब पढ़ना चालू करेगा, वो कबूतर को भी छोड़ देगा, और क को भी छोड़ देगा। वो सीधा किताब पढ़ लेगा। शुरुआत में अच्छे और बुरे का उपयोग करना ही पड़ता है। शुरुआत यहीं से होती है। शुरुआत सीधे धर्म से करोगे, तो एक आदत बन जाएगी, एक नाटक बन जाएगा। शुरुआत आपको क से ही करनी पड़ेगी। और बाद में क भी छूट जाएगा, कबूतर भी छूट जाएगा। आप सीधा पढ़ोगे। फिर आप पढ़ते हो। अगर कुछ लिखा हुआ है, तो आप ये नहीं बोलोगे, क से कबूतर, ख से खरगोश। सीधा पढ़ोगे। लेकिन जब शुरुआत करनी पड़ती है, तो हमें ये करना पड़ता है। सामान्य व्यक्ति तो अच्छा करता है। अब वो छूटता चला जाएगा। जब करते रहोगे, तो अपने आप छूटता जाएगा। जैसे क छूट गया, कबूतर छूट गया। अब आप एक बात बताइए। मान लो कमल पढ़ना है। क्या आप पढ़ते हो, क से कबूतर, म से महल, ल से लड्डू? ऐसे पढ़ते हो क्या? सीधा कमल पढ़ देते हो। क भी नहीं पढ़ते कि क है, म है, ल है। लेकिन जब शुरुआत की थी, तो तुम यही कहते थे, याद करने के लिए, क से कबूतर। जब मिलावट के अक्षर पढ़ने लगे, तो सीधा कमल पढ़ दे रहे हो। आप ऐसा भी नहीं कर रहे कि ये क है, ये म है, ये ल है। क्योंकि तब कमल बन नहीं पाएगा। हां, ये तरीका है। तो शुरुआत में ठीक है। आपको समझ में आ गया, तो आप लिख लो। लेकिन किसी को रोको मत। वो अभी कम है। तो उसे पढ़ने दो। वो अच्छा कर्म कर रहा है, करने दो। अब उसे कर्तव्य कहोगे, तो उसे कर्तव्य समझ में नहीं आ रहा। तुम कहोगे, कर्तव्य अपने परिवार के लिए करना है, किसी के लिए नहीं। वो जाल में फंस जाएगा। और जब उससे कहोगे, बेटा, अच्छा कर्म करो, तो वो सबके साथ करेगा। और तुम कहोगे, कर्तव्य करो, तो वो अपने परिवार के जाल में फंस जाएगा। क्योंकि मेरा कर्तव्य इतना ही है। मेरी बात समझ पा रहे हो। कर्तव्य एक दायरे में बांध देता है। और अच्छा कर्म, बुरा कर्म, ये पूरे विश्व के लिए कर सकते हो। सही बात है। आप कर्तव्य की बात कर रहे हो। अभी आपका कर्तव्य क्या है, बताइए। किसी के लिए? कर्तव्य कहां से ला रहे हो। यही तो है। यही बांट दिया, तुरंत। इस चीज के लिए कर्तव्य तो नहीं। हम लोगों को समझ में आ रहा है। आप सही कह रहे हो। लेकिन समाज के लिए कितना कर्तव्य है। रास्ते में हुए, फिर आपने समाज को अलग कर दिया। यही बात है, बांट दिया। जब मैं कहूंगा, अच्छा कर्म करो, तब आप ये नहीं पूछोगे कि किसके लिए। कर्म में सब आते हैं। कर्तव्य की बात समझ रहे हो। कर्तव्य शब्द एक दायरा है। कर्तव्य शब्द का एक दायरा है। लेकिन अच्छे कर्म का दायरा नहीं है। जब आपसे कहा जाएगा, बेटा, अच्छे कर्म करो, तो उसका दायरा नहीं है। दायरे से परे का शब्द है। और जब आप कहोगे, कर्तव्य करना है, तो कर्तव्य में कितने लोग आते हैं। मेरा परिवार? सुनने में ही पार्टीशन हो रहा है। वही बात। जैसे पूछा, किसके प्रति बताएं। कर्तव्य मेरी फैमिली के लिए है, या समाज के लिए। जैसे हम सड़क से जा रहे हैं। हमें लगा, कोई घायल पड़ा है। हमने उसका इलाज कराया। उसको हम अच्छा कर्म मानेंगे, या अपना इंसानी कर्तव्य मानेंगे। इंसानी कर्म मानेंगे, ऐसा नहीं। ये अच्छा कर्म है। नए के लिए, जिसकी समझ में नहीं आया, उसके लिए। या जिसको समझ में आता है कि इंसान का धर्म इतना है, मानव का धर्म एक-दूसरे की सहायता करना है। वहां कर्तव्य शब्द इस्तेमाल नहीं होगा। वहां मानवता शब्द इस्तेमाल होगा। आपके अंदर मानवता होनी चाहिए। एक-दूसरे के दुख-सुख को समझने के लिए। जब जरूरत पड़े, तो एक-दूसरे की सहायता करो। हम एक-दूसरे के पूरक हैं। वहां कर्तव्य शब्द नहीं होगा। मेरे कहने का तरीका अगर कर्तव्य कहे, तो गलत तरीका होगा।

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इस मानव शरीर में आए हैं, तो कुछ न कुछ कर्म करना ही है। वो मजबूरी नहीं, जरूरत है। कर्म करते हुए अपनी समझ से देखना है कि समाज के लिए, हमारे लिए, और परिवार के लिए क्या हित है, वही करना है। इस जीवन को लगाना कहां है, और सदुपयोग कैसे हो?

मैंने कहा था, सतयोग करो, और सतयुग हो जाओ। दोनों करना पड़ेंगे। यहां सब उपयोग हो रहे हैं। कोई बचता नहीं है। ये कर्मभूमि है। आप बच ही नहीं सकते। उपयोग में सदुपयोग हो जाए, और दुरुपयोग हो, तो बंधन। अब पहले हमें डिसाइड करना है कि इस लाइफ को लगाना कहां है। अपने आपको लगाना कहां है। जहां लगा दोगे, वैसा परिणाम आपके सामने आएगा। लगाना पड़ेगा, क्योंकि ये पेट है। लगाना पड़ेगा। जाओगे, तो भी लगाना पड़ेगा। कुछ भी हो। हर समय आपका लेन-देन चालू है। सांस से ही आप ऑक्सीजन ले रहे हो, और कार्बन डाइऑक्साइड दे रहे हो। आप ये मत समझो कि आपके द्वारा लेन-देन नहीं हो रहा। हर सांस में लेन-देन हो रहा है। हर सांस में तुम दे रहे हो और ले रहे हो। सृष्टि ऐसी है। कोई ये नहीं कह सकता कि मैं केवल लूंगा। हमेशा आप दे रहे हो, और ले रहे हो। हर पल, हर क्षण। यही बात है। हम एक-दूसरे के पूरक हैं। हमें समझ बढ़ानी पड़ेगी। और अपनी लाइफ में क्लैरिटी लानी पड़ेगी, कि आखिर इन सांसों का क्या करना है। इस एनर्जी का आगे क्या करना है। इस लाइफ का करना क्या है। उपयोग कहां करें। बस वो डिसाइड हो जाएगा, तो उधर ही बढ़ने लग जाएगा। और दो ही रास्ते हैं। सदुपयोग और दुरुपयोग। उपयोग तो आपको होना ही है। मेरे हिसाब से सदुपयोग में हो जाओ।

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त्याग की क्षमता हर इंसान में नहीं होती। कोई इतना फंसा होता है कि उसे लगता है अब जीने का फायदा नहीं, और वो अपने आप को सही जगह इस्तेमाल होने के लिए तैयार ही नहीं कर पाता। समाज भी दबाव डालता है कि कुछ भी हो, वो तुम्हारा भाई है, मां-बाप हैं, चाचा हैं, परिवार है। मां-बाप और भाई भी गलत हो सकते हैं। जरूरत पड़े तो माफी मांग लेते हैं, वरना कहते हैं पुरानी बात छोड़ो। व्यक्ति उस दबाव को नहीं झेल पाता। भीड़ में जहां धोखा मिला, वहीं चला गया। अपनी जिंदगी का फैसला नहीं किया, अपने आप से प्यार नहीं किया। परिवार को कर्तव्य कहकर संभालें, तो जब परिवार ही गलत चल रहा हो, तब क्या करें?

वो तो या तो उसकी समझ पड़ जाए, या कुछ नहीं हो सकता। जैसे बुद्धि मंद हो, उसे कितना भी पढ़ाया जाए। जब प्रकृति ने दिया ही नहीं है, तो आप उसका कुछ भी नहीं कर सकते। मैं तो कहूंगा, चाहे आप तैयार भी क्यों न हों। वो दबाव नहीं झेल पाता। मैं नहीं झेल पाता, ऐसा नहीं। वो नहीं झेल पाता। भाई ने कहा था कि ये हमारा कर्तव्य है, परिवार को संभालो। लेकिन परिवार वैसा चले, तो प्रह्लाद ने अपने बाप का विरोध कर दिया। बेटा ही बाप के मारे जाने का कारण बना, और बेटा भक्त हो गया। आज भी उसका नाम लिया जा रहा है। किसका विरोध किया था, बताओ। अपने बाप का ही। ये छोड़ो। बहुत दूर की बात है। मां अहिल्याबाई। महेश्वर में उन्होंने अपने बेटे को, जो गलत कर रहा था, समाज के लोगों ने शिकायत की। अपने बेटे को अपने हाथी से मरवा दिया। क्योंकि बेटा दुष्ट था। आज उन्हें मां अहिल्या का नाम दिया जाता है। इसलिए। इतना बड़ा निर्णय ले पाना। आम आदमी नहीं ले पाता। आम आदमी, तू बेईमान है। तू बेईमान है, इसलिए निर्णय नहीं ले पा रहा। अपनी बेईमानी को अपनी समझदारी मत समझ। तू एक बेईमान व्यक्ति है। समाज इधर-उधर ले गया। तू एक बेईमान व्यक्ति है, इसलिए फैसला नहीं ले रहा। अगर तू ईमानदार व्यक्ति होता, तो अपने बेटे को भी दंड दे देता, अगर वो गलत हो गया। अगर दूसरे के बेटे को दंड दे सकते हो, तो अपने को क्यों नहीं। दूसरे को कुछ भी। अपनी बेईमानी को मत ढको। कहो, मैं एक बेईमान हूं। बेईमान हूं। बस, ताकत अपने अंदर नहीं। मैं एक बेईमान हूं, इसलिए मैं अपने परिवार को ऐसा दंड नहीं दे सकता। सीधी बात है। जब इस कर्म पर दंड होना चाहिए, तो फिर अपने परिवार वाले भी करें, तो उन्हें भी होना चाहिए। मुझे भी होना चाहिए। हां, मुझे भी। उसी बात से। कल ही की बात है। वहीं पर हमारी और आपकी यही बात हो रही थी। अगर मेरे द्वारा कुछ भी गलत किया हो, तो समाज के सामने आना चाहिए। क्योंकि मैं समाज के लिए काम कर रहा हूं। यही बात हो रही थी। अगर मैंने जीवन में कुछ भी ऐसा गलत किया हो, तो समाज के सामने आना चाहिए। समाज भी समझे कि मैं क्या बोल रहा हूं, क्या कर रहा हूं। आना ही चाहिए। कल ही इस विषय पर बात हो रही थी। मैंने अपने आप को रखा। मैंने कहा, मैं विश्व के लिए काम कर रहा हूं। तो जैसा हूं, वैसा सबके सामने आना चाहिए। इसीलिए अगर मुझे गुस्सा करना होता है, तो मैं लाइव में करता हूं। मुझे किसी को भगाना है, तो मैं लाइव में भगाता हूं। नहीं तो मैं उस समय बात बोल देता। शांत माहौल करके, लाइव बंद करके, आराम से इनसे बोलता। मैं अपना नाम भी आगे नहीं करता। राज से काम करके भगा देता। ये बड़े आराम से सुन लेते। मेरा नाम भी नहीं आता। नहीं। मैं अपने आप को पहले खड़ा करता हूं। भगाओ, ये नहीं रहे। ये तो सेवा दे रहे हैं। अगर भगाने में मैं गलत होऊंगा, तो मुझे दंड मिलेगा। इनकी स्थिति ऊपर उठेगी। क्योंकि इन्होंने आज्ञा का पालन किया है। अगर एक अधिकारी ने अपने जूनियर से कहा, गोली मार दो। अगर उसने गलत गोली मरवाई है, तो सीनियर पकड़ा जाएगा, जूनियर नहीं। क्योंकि उसे तो आज्ञा का पालन करना है। तो अगर मैं किसी को ऐसे गलत भगाऊंगा, तो इनका स्तर उड़ जाएगा, मेरा गिर जाएगा। इसलिए जब मैं किसी को भगाता हूं, तो मैं पूरी तरह भगाने लायक रहता हूं। तभी भगाता हूं। क्योंकि ऐसे अगर आपने किसी को भगा दिया, तो आप गिर जाओगे। एकदम। मैंने इसीलिए आपसे कहा। कल हमारी ही बात हो रही थी। अगर मैंने भी कुछ ऐसा गलत किया हो, तो समाज के सामने आना चाहिए। आना ही चाहिए। क्योंकि मैं आप लोगों के लिए काम कर रहा हूं। और मेरे जीवन में सब कुछ खुला है। मेरी लाइफ, पर्सनल लाइफ, ये आध्यात्मिक लाइफ, सब खुला हुआ है। मैं एकदम खुलकर जीता हूं। खुला हुआ है। कभी खुलेगा। अगर मैंने कहीं कवर किया हुआ है, तो मुझे पता रहता है कि मैंने कवर किया हुआ है। वो बात निकल नहीं पाती।

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अपनी जिंदगी की क्लैरिटी क्यों नहीं हो पा रही? अंदर गुणों की ताकत नहीं है, शारीरिक बल नहीं है, अधूरापन है, कमियां हैं। जिन पर काम नहीं करना चाहता, उन्हें ढक रहा हूं। भाई कवर कर ले, इधर से कुछ मिल जाए। जहां कमी है, वहां पचहत्तर बार नमस्ते करूंगा, घरवालों की चापलूसी करनी पड़ती है। आज परिवार के साथ, कल पति-पत्नी के साथ, फिर बच्चों के साथ, दादा-दादी बनने तक वही कमजोरी रह जाएगी। जन्म-जन्म डर-डर कर क्यों जी रहे हैं? मैं आपसे डर रही हूं, आप मुझसे डर रहे हो, बात ही नहीं हो रही। कोई किसी को डरा क्यों रहा है?

कमी रहेगी। आज परिवार के साथ कर रहे हो। कल पति-पत्नी के साथ। फिर बच्चों के साथ। फिर दादा-दादी बन जाओगे। तब भी वो कमजोरी तो काम नहीं करेगी। फिर कब करोगे। वो कमजोरी हमेशा बनी रहेगी। कितना भी छुप लो। कोई किसी को डरा नहीं रहा है। हमें कुछ उम्मीदें हैं। वो उम्मीदें हमें डरा रही हैं। सीधी बात है। कोई किसी को डरा नहीं रहा। हमें उम्मीदें हैं। वो डराके रखे हैं। और उम्मीद योग्यता से ज्यादा है। अगर योग्य होते, तो उम्मीद इतनी ज्यादा नहीं रखी होती। हम उस काबिल नहीं हैं, और उम्मीद रखी हुई है। वो डराके रखे है। इसलिए मैं कहता हूं, योग्यता से ज्यादा पाई हुई इच्छा का त्याग कर दो। बात खत्म। और भविष्य में भी मैं वो करना नहीं चाह रहा, इसलिए डरा-डरा नहीं हूं। करने की सामर्थ्य नहीं है। न करने के दो मतलब होते हैं। एक, आप कर नहीं सकते। और एक, आप करने लायक हो, और करना नहीं चाहिए। दोनों बातें होती हैं। बेईमान क्या करे। दिख रहा है। मुझे उसी में मजा आ रहा होगा। इसलिए भी घूम रहा है। और मैं निकल भी नहीं पा रहा।

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चक्कर आ रहा है, इसलिए बैठ गए। थक गए थे। देखभाल करना आपकी जवाबदारी है। अगर कुछ हो गया, तो देखभाल करना कर्तव्य है। फिर भी जब सब खड़े हों, तो क्या बैठना ठीक है?

क्यों भाई, बैठ गए? थक गए क्या? नाश्ता करते क्यों नहीं। एक बार क्यों खा रहे हो। भाई, नाश्ता किया करो। जब शरीर उस लायक नहीं है। शरीर है कहां। चक्कर कैसे आ रहे हैं। चक्कर भी नहीं, ध्यान भटक रहा है। क्यों। कारण बताओ। कहते हो, मेरी जवाबदारी है आपकी देखभाल करना। अगर कुछ आपको होगा, तो मेरा कर्तव्य है देखभाल करना। फिर तो आप नाश्ता भी किया करो। कमजोरी अपने अंदर मत लाओ। समझ रहे हो। किधर क्यों बैठ गए। हम तो खड़े हैं। मेरे सामने आपको बैठना ही नहीं चाहिए। मौज के लिए बैठ गए। हम पागल हैं क्या। अगर हम खड़े हैं, और आप लोग ऐसे बैठ जाओ, तो फिर हमारे बोलने का क्या मतलब है। इससे अच्छा है, इस खंभे के सामने चिल्ला दो। तुम्हें खड़ा तो रखेगा। चक्कर आ रहा है, तो दोनों समय बढ़िया से नाश्ता करो। और खड़े रहो। अपने आप को मजबूत बनाओ। जितना आपका शरीर काम कर सके, उतना इसे तपाओ। ज्यादा नहीं। खड़े तो अभी हो। मैं खड़ा हूं, तो मैं भी हूं। खड़े तो लोग भी हैं। इनको चक्कर क्यों नहीं आ रहा। क्योंकि दोनों समय खा रहे हैं। तो तुम भी नाश्ता किया करो। फिर बैठोगे नहीं।

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गर्मी लग रही है, इसलिए गंजी उतार दी। कहा था पहनो, पहनी हुई थी। अब क्या करें, गर्मी है। नंगे भी हो जाएंगे। तौलिया भी निकाल देंगे। आप भी तो पहने हो, सब पहने हैं। फिर क्यों निकाली? दो लोग पहने हैं, तो मेरे लिए अलग व्यवस्था क्यों?

मैंने कहा था, गंजी पहनो। पहनी हुई थी। तो क्या करें, गर्मी लगे, तो नंगे भी हो जाओगे। अभी तौलिया भी निकाल दोगे। पूछो क्यों। बोलोगे, गर्मी लग रही है। नंगे हो जाओ। निकाल दो। हम भी तो पहने हैं। फिर वही बात। सब तो पहने हैं। आपको मना किया था, या नहीं किया था। तो क्यों निकाली। फिर वही बात। कुछ देर में तुम बोलोगे, गर्मी है, नंगे हो जाओगे। क्यों हुए। गर्मी लग रही है। ये कोई बात होती है क्या। और सबको गर्मी नहीं लग रही। लगता है, तुम्हारे लिए अलग व्यवस्था है। दो पहने हुए हैं, तो क्यों दो पहने हैं। वो तुम्हारा टेंशन है। तुम चार पहन लो। इसके लिए दो क्यों पहने हैं। आप जरा बात समझिए। अगर एक बार कुछ बोल दिया गया, तो दोबारा रिपीट मत करवाइए। ये पहने हैं, इनको कर देंगे। इनके नीचे क्या है। इनके नीचे एसी है। तुम्हारे नीचे क्या, हीटर है। बात को समझिए। अगर एक बार कोई बात बोल दी गई, तो फाइनल होनी चाहिए। ऐसे निकालूंगा, वो निकालूंगा। आप देखो, आप चार भी पहनो। लेकिन जैसी व्यवस्था दी गई है, जितना नियम है, उसमें जियो। फिर वही सफाई दे रहे हो। गलती की या नहीं की। स्वीकार क्यों नहीं कर रहे। अभी तो गलती हुई। अभी गर्मी का क्यों। फिर वही गर्मी। हम गर्मी में नहीं खड़े हैं क्या। ये नहीं खड़े हैं क्या। क्यों नहीं समझ रहा बात को। सफाई पर सफाई दिए चले जा रहे हो। क्यों। गर्मी का। मतलब सब नंगे हो जाएं। हां, गर्मी का मतलब सब नंगे हो जाएं। हम भी हो जाएं, और कहें गर्मी लग रही है। तुम ही एक एयर कंडीशन में रहकर आए हो। बाकी तो सब गर्मी में रहकर आए हैं। इतना एयर कंडीशन में मत जाओ। क्या साधोगे अपने आप को। यहां गर्मी लग रही है। मुझे तो जरा सा भी नहीं लग रही। और लग रही है, तो लग रही है। इन्हें नहीं लग रही, इन्हें लग रही है। जरा समझो। सहना सीखो। फिर कैसे कल्याण होगा। जरा सा पसीना बर्दाश्त नहीं कर पा रहे। फिर आगे अस्तर कैसे उठाओगे। बताओ। ऐसे थोड़ी अस्तर उठता है। बहुत अपने आप को लगाना पड़ता है। जरा सा पसीना आया, गंजी निकाल दी। क्या साधना करोगे। और हमने मना किया था। तुम्हें पर्सनली मना किया था। फिर उसके बाद नहीं किया। मैं कैसे मानूं। तूने मेरे सामने ही कर दिया। फिर वही बात। तूने मेरे सामने ही किया। उसके बाद किया या नहीं किया। मेरे सामने ही तो किया। अभी आज मैं आया, आपके सामने किया, और फिर भी बोलना पड़ रहा है। इसलिए मैं आपसे एक ही बात कहूंगा। अगर साधना करने गए हो, तो पूरी तरह साधक बनो। जितना कह दिया गया, एक प्रतिशत भी इधर-उधर मत करना। अगर अस्तर उठाना है, तो पूरी तरह सिस्टम को समझो, और उसमें जियो। तब देखो, आपका अस्तर कैसे उड़ता है। अगर कोई नियम, कोई सिस्टम बनाया गया है, तो ऐसे ही थोड़ी बनाया गया है। ऐसे ही रख दिया गया हो, ऐसा नहीं। उसमें कुछ तो रहस्य होगा। जब उसमें जिओगे, तब समझ में आएगा।

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दो दिन ऐसे किया तो कैसे चलेगा, भोजन कम है, चक्कर आते हैं। घर पर मंगलवार का व्रत रहता था, आज नहीं लिया। शरीर को सहने के लिए थोड़ा काढ़ा ले लें, सुबह वाला काढ़ा पी लें, तो क्या ठीक है? गर्मी में काढ़ा बनाने से मना था, फिर भी क्यों बनाया गया, और सबने क्यों पिया?

काढ़ा किसने बनाया। किसने बनाया। क्यों बनाया। मना किया था। क्यों बनाया काढ़ा। आपने मना किया था, हां या ना, कि काढ़ा नहीं बनेगा। तो क्यों बनाया। आपको पता है कितनी गर्मी है। क्यों बनाया। और फिर बनाया, तो आप लोगों ने, सबने, क्यों पिया। क्यों बनाया। जवाब दो। जल्दी बोलो। क्यों बनाया। मैंने क्यों कहा था बनाने को। आपको मना किया था न। गर्मी भर काढ़ा नहीं बनेगा। किसने आपको कहा बनाने को। क्यों बनाया। आपको मना किया था, या नहीं किया था। पता था, हां या ना। तो क्यों बनाया। अब तुम भगाने वाला काम कर रहे हो। अब ऐसा मत करना। नहीं तो मैं तुरंत भगा दूंगा। तुरंत मतलब तुरंत। उसी समय। आपको पता है, काढ़ा पीकर लोग बीमार हो जाएंगे। कितनी गर्मी पड़ रही है। तुम्हें कुछ पता है। उसमें बहुत गर्मी है। एक तो ऐसी गर्मी पड़ रही है। हालत खराब हो जाएगी। लोगों को चक्कर आने लगेंगे। शरीर को साधना है, तो पसीना सहन नहीं कर पा रहे। फिर काढ़ा। काढ़ा ठंड में पिया जाता है। गर्मी में नहीं पिया जाता। ऐसी गलती मत करना।

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लाइव पर प्रश्न है। डर किस स्थिति में खत्म होगा?

डर क्यों है, पहले ये पता करना पड़ेगा। और उस डर को निकालने के लिए उस कमी को दूर करना पड़ेगा। डर के पीछे कोई कारण होता है।

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देवेंद्र सिंह का प्रश्न है। ऐसा कौन सा कर्म करूं, जिससे अपने आप से मिलन हो जाए? मुझको मुझसे मिलने के लिए क्या करूं? मार्गदर्शन कीजिए।

ईमानदारी से कर्म अपना लो। उम्मीद का त्याग करो। उम्मीद में आप बाहर हो। उम्मीद छोड़ दो। अपने आप में आ जाओ।

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अगर गुरु गलत हो, जैसे राजा बल के गुरु गलत थे, तो क्या करें? और अगर कोई भी, परिवार का हो या रिश्तेदार, भटकाने वाला या गिराने वाला काम करा रहा हो, तो क्या करें?

गुरु को देखो। उन्होंने गुरु को अस्वीकार किया है। उनका कल्याण हो गया। कोई भी, अगर आपको भटकाने वाला काम कर रहा है, तो उसे तुरंत त्याग कर दीजिए। इतनी समझ आपकी होनी चाहिए। कोई भी हो, परिवार हो, रिश्तेदार हो, कोई भी हो। गिरने वाला काम जीवन में कभी मत करना। क्योंकि हिसाब-किताब अकेले का होगा। वहां कोई नहीं होगा।

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निवेदन है। ध्यान में आपका प्रवचन सरस होता है, फिर यहां से वहां अचानक पैर पड़ता है, खड़ा नहीं रहा जाता। जब ध्यान में बैठते हैं, तो क्या श्वास के साथ ओम की ध्वनि करनी चाहिए? क्या मानसिक ओम जाप करना चाहिए? और ये पैर पड़ना किस कारण हो रहा है, पहले नहीं पड़ता था?

नहीं। कुछ नहीं करना। अगर कुछ भी किया, तो आप बाहर हो जाओगे। बाहर नहीं होना है। आप कुछ न करने में बैठिए। कुछ न करने में तभी कुछ समझ में आएगा। कर-करके तो थक गए। अब कुछ न करने में जरा विश्राम करो। बहुत कुछ समझ में आ जाएगा। पैर किस कारण पड़ रहा है। इसके पहले नहीं पड़ता था। बाहर खड़े थे, तब हुआ। अभी हो रहा है। कोई बात नहीं। होने दीजिए।

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भाग्य क्या है? भाग्य में जो लिखा है वह कैसे मिलता है, प्रारब्ध से या कर्म से? भाग्य कौन तय करता है?

भाग्य का मतलब है कि आपको कुछ मिल रहा है, चाहे वह अच्छा हो, चाहे बुरा हो, उसे भाग्य कहते हैं। उसका नाम भाग्य है। अब मिलता कैसे है? प्रारब्ध क्या है, उसे समझते हैं। हमने कुछ किया है और हमें मिल रहा है, वह प्रारब्ध है। उसे प्रारब्ध कहते हैं। और फिर कर्म है। अगर हमारे साथ कुछ भी हो रहा है, मुझे कुछ भी मिल रहा है, तो वह मेरे कर्म का परिणाम है। जैसा मैंने कर्म किया है, उसी का परिणाम मुझे मिल रहा है। जैसे कोई व्यक्ति फैक्ट्री में काम करता है, उसे पेमेंट मिलता है। जितने दिन का किसी ने काम किया है, उतने दिन का उसको पेमेंट मिल जाता है। अब पेमेंट मिला, उसके भाग्य से मिला। भाग्य कैसे बना? कर्म से बना। जिसने जितने दिन की हाजिरी लगाई थी, मेहनत किया था, कर्म किया था, वही प्रारब्ध बनकर भाग्य के वजह से उसे मिल गया। उसका नाम भाग्य रख दिया गया है। कहने का तात्पर्य यह है कि आपके साथ कुछ भी हो रहा है, उसके जिम्मेदार आप हो। जैसा आपने कर्म किया है, वैसा आपको परिणाम मिल रहा है। अब जीवन जीने के लिए दो रास्ते हैं इस दुनिया में। भाग्य का मतलब यह मत सोचिए कि आप प्लानिंग से कुछ बुरा कर रहे हो, तो कह दो मेरे भाग्य में यही था। नहीं। जब आप करते हो तो आपको पता है कि क्या गलत है, क्या सही है। गलत में आपको प्रयास करना पड़ता है। अब वह भाग्य में है नहीं, लेकिन आप उसे बना रहे हो। अंतरात्मा कह रही है कि मत करो, क्योंकि आपको कर्ता का अधिकार दिया गया है। आप यह मत सोचना कि आप किसी के साथ बुरा काम कर रहे हो और आपको लगा कि मेरे भाग्य में था। ऐसा नहीं है। आपने प्लानिंग से किया है। उसका भी परिणाम आपको मिलेगा। क्योंकि जब आप कोई भी कर्म करते हो, तो आपके पास उस समय दो रास्ते होते हैं कर्म करने के। एक ईमानदारी और एक बेईमानी। यह स्वतंत्रता आपके हाथ में है। आपको कर्ता का अधिकार दिया गया है। इसलिए कोई भी काम सोच समझ के करें, क्योंकि जब उसका परिणाम मिलेगा तो उस समय आपको ही उसका सामना करना पड़ेगा। फिर आपको कोई बचा नहीं पाएगा। वहां सेटिंग नहीं चलती है। हर व्यक्ति सेटिंग लगाना चाहता है कि मैं बच जाऊंगा, लेकिन वहां सेटिंग नहीं लगती है। इसलिए कुछ भी कर रहे हैं, सोच समझ के करिए, क्योंकि आने वाले समय में आपको उसका सामना करना पड़ेगा। करना ही पड़ेगा, चाहे कुछ भी हो जाए। जैसा आपने किया है, वैसा आपको मिलेगा। कहने का मतलब है, भाग्य वही है, आपका किया गया कर्म का परिणाम। आपने किया है, वही आपको मिल रहा है। उसी को आप चाहे प्रारब्ध कहिए, चाहे भाग्य कहिए, कुछ भी कह दीजिए। जितना भी आपको मिल रहा है, आपके कर्म से मिल रहा है। इस सिद्धांत को समझ लीजिए। इसलिए कुछ भी करने से पहले सोच समझ कर करिए, क्योंकि उसका परिणाम भी कभी न कभी आएगा आपके सामने, और उसका सामना आपको करना ही पड़ेगा। भाग्य को लेकर, प्रारब्ध को लेकर, कर्म को लेकर कोई प्रश्न हो तो पूछ लेना। हमने बता दिया। अपने घर में जो भी प्राणी आया है, वह भी उसी से ही आया है। लेनदेन आपका कुछ था। उस लेनदेन को पूरा करने के लिए आया है। अब वह लेनदेन में ईमानदारी करेगा तो आपसे छूट जाएगा। बेईमानी करेगा, दोनों तरफ से बेईमानियां होंगी, तो दोनों फिर मिलने के लिए तैयारी कर रहे हैं। अगर एक तरफ से ईमानदारी हुई और एक तरफ से बेईमानी हुई, तो ईमानदार वाला छूट जाएगा। वह अपने बेईमानी का परिणाम कहीं और भोगेगा। अगर लेनदेन खत्म करना है तो ईमानदारी और सत्कर्म के साथ जीवन जियो। अगर आपको निकलना है इस भवसागर से, तो सबसे आसान रास्ता है ईमानदारी और सत्कर्म। यह आसान रास्ता आपको चुनना पड़ेगा। यही रास्ता है निकलने के लिए। और बाद में बड़ी उम्मीदें हैं आपकी। मैं यह देख रहा हूं कि लोग इस मार्ग में भी चल रहे हैं, तो कुछ अनुभव करना चाहते हैं। यह नहीं समझ पा रहे हैं कि अगर आपने किसी शक्ति का कुछ भी अनुभव किया, तो वह आपसे अलग होगा। आप उसमें फंस जाओगे। मैं यह देख रहा हूं कि अध्यात्म में भी लोग पागलपन कर रहे हैं। वह कुछ अनुभव करना चाहते हैं। उन्हें समझ में नहीं आ रहा है कि आप अगर अनुभव करोगे, तो अनुभवकर्ता और जिसके द्वारा अनुभव हो रहा है, दोनों अलग हैं। फिर द्वैत में फंस गए। अनुभव से मुक्त होना है मुझे। मुझे अपने आप में, स्व में, स्थिर होना है। मुझे कुछ नहीं चाहिए में आना है। लेकिन मैं यह देख रहा हूं कि ज्यादा देर तक व्यक्ति टिक नहीं पा रहा है। कुछ नहीं चाहिए का भाव तो बना रहा है, लेकिन टिक नहीं पा रहा है। अगर इस भाव को आप रखो, चाहे महीने लगें, चाहे साल लगें, चाहे कई वर्ष लग जाएं, अगर कुछ नहीं चाहिए में आप जियो, ईमानदारी और सत्कर्म के साथ, तो कभी न कभी आप स्व में स्थिर हो जाओगे। लेकिन मैं यह देखता हूं कि लोग बातें तो करते हैं, कुछ नहीं चाहिए, फिर कहते हैं कुछ हुआ नहीं, क्या होगा। होने से ही तो मुक्त होना है। क्या करवाना चाहते हो? कुछ नहीं चाहिए मतलब हमें अपने तरीके से कुछ नहीं चाहिए। हमें जरूरत में जीना है। शरीर की जितनी आवश्यकता है, उसमें जीना है। मान का चक्कर छोड़ना है, शान का चक्कर छोड़ना है। हमारी शरीर की जितनी जरूरत है, उतने में मुझे जीना है।

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हम सरकारी नौकरी से अभी रिटायर हुए हैं। अब उस पैसे का क्या करना चाहिए? मैं उसे सत्कर्म में लगाना चाहती हूं, पर घर के दूसरे प्राणी सहमत न हों तो क्या करें? उस पैसे पर मेरा हक है या उनका? जरूरतमंद पात्र है या नहीं, यह कैसे पता चले? कई संस्थाएं सेवार्थ में लगी रहती हैं, क्या उनके माध्यम से भी यह कार्य हो सकता है? वृद्धाश्रम में जो गलत देखा, उसे बताना चाहिए या नहीं?

उस पैसे को ईमानदारी से सत्कर्म में लगाओ। जरूरतमंद की सेवा करो। और क्या करोगे? परिवार के और सदस्य भी इसी सहभागिता में होंगे, तभी यह कार्य आगे होगा। जो पैसा सरकार दे रही है, वह आपके काम का दे रही है। आगे आप चाहती हो कि मैं सत्कर्म में लगाऊं, और घर के दूसरे प्राणी सहमत न हों। उसमें और प्राणी से क्या मतलब है? हमें उद्धार अपना करना है, या और प्राणी का करना है? पैसे पर मेरा हक है, या उसका हक है? पहले देख लो। उसका हक है तो छोड़ दो। आपका हक है तो जहां लगाना है, आपकी मर्जी। जितनी उसकी जरूरत है रोटी के लिए, उसको दे दो। उसके पास है तो मत दो। जहां आपको लगे कि बहुत जरूरतमंद है। भूखे को भोजन, प्यासे को पानी, कपड़ा, जिस लायक आप हैं। आप समाज में करिए, अगर निकलना है तो। घर वाले तो कुछ भी कहेंगे। कल्याण अगर आपको करना है, तो आपको इस तरीके से करना है। यह सबसे तेज रास्ता है और आसान रास्ता है, जरूरतमंद की ईमानदारी से सेवा। सामने वाले को जरूरत नहीं और आप जबरदस्ती थोपो, तो कोई मतलब नहीं है। यह पात्र है या नहीं, वह जब आप करोगे तब समझ में आएगा। जब आप नौकरी पर गई थीं तब कुछ पता था क्या? जब आप करने लगीं, सब पता चल गया। वैसे ही जब आप करने लगोगे, कई लोगों को भोजन कराओगे, तो समझ में आएगा कौन पात्र था और कौन नहीं था। कई लोगों को कपड़ा दो, उसकी फीलिंग से समझ में आ जाएगा। जब वह आपकी आंखों में आंख देखेगा, तब समझ में आएगा कि इसकी जरूरत कितनी थी, एक कंबल के लिए कितनी व्याकुलता थी, क्या इसने कई दिन से ठंड में रात काटी थी। भोजन कराओगे तो उसके चेहरे से समझ में आ जाएगा कि कितने समय से भूखा है। यह तब पता चलेगा जब कराओगे। बिना कराए ही सब समझना चाहती हो, तो समझ में नहीं आएगा, क्योंकि एहसास कराने के बाद पता चलता है। उनकी आंखों में देखकर, जब करोगी तब समझ में आएगा। आपको ढूंढ ढूंढ के करना होगा। उनके पास जाना होगा, उनसे मिलना होगा। मेहनत करनी पड़ेगी। टिफिन लेकर निकलना पड़ेगा। आज भूखे को भोजन कराना है, तो निकलना पड़ेगा। कपड़े लेकर निकलना पड़ेगा। घूम के देखना पड़ेगा, किसको जरूरत है, किसको नहीं। यह आपको जाना पड़ेगा। मेहनत करनी पड़ेगी। ऐसे ही नहीं हो जाएगा। इसके लिए काम करना पड़ेगा। समय देना पड़ेगा। कई संस्थाएं सेवार्थ में लगी रहती हैं। क्या उनके माध्यम से भी यह कार्य हो सकता है? हां, अगर आप पूरा जांच लो। दो बातें देखो। एक तो वहां जरूरत है या नहीं, और क्या पक्का वही काम हो रहा है। पता चला कि लगी तो हैं, पर पैसा अपार हो गया है। पता चला कहीं लगे हैं, उनके पास पैसे नहीं हैं, तो खोजो। कर रहे हैं क्या? उनके पास अथाह तो नहीं हो गया। अगर सौ का भोजन करा रहे हैं और उनके पास हजार का भोजन है, सौ जरूरतमंद को करा रहे हैं, तो हजार का आप उसमें क्यों दे रही हो? आप आगे बढ़ो। जांच करके करो। अगर कोई संस्था इस तरीके से सेवा कर रही है, तो देख लो उस संस्था को जरूरत है या नहीं। आवश्यकता देख लीजिए। उस संस्था के व्यवस्थापक से जाकर बातचीत करिए कि क्या आपको जरूरत है। नहीं है, तो हम और कहीं दें। बहुत लोग सेवा कर रहे हैं, और इसमें आपको काम करना पड़ेगा, मेहनत करनी पड़ेगी। आप देखिए कि वह व्यक्ति वही काम कर रहा है या नहीं। पता चला कि वह वीडियो बना के कुछ और डाल रहा है, उसके पीछे कुछ और कर रहा है। जाइए वहां, रहिए, जांचिए। जरूरी नहीं कि वह बातें कह रहा हो और वही कर रहा हो। इसमें काम करना पड़ेगा, मेहनत करनी पड़ेगी। वृद्धाश्रम में कितने केस आ रहे हैं। कहीं लोगों को नर्क की तरह रखा जाता है, एक कपड़े पर बांध के रखा जाता है। आपने जो देखा, वह बताना चाहिए। आप बताओगे तो समाज जागरूक होगा। हम हर बात लाइव में बताते हैं। अगर मैं किसी को गुस्से से भगाता भी हूं, वह भी लाइव में बताता हूं। बताओ, समाज में क्या हो रहा है। अगर कुछ आपको दिखता है, तो आपको बताना चाहिए, जैसे आपने अभी बताया। गंगानगर के वृद्धाश्रम की बात भी वही है। दानदाता खूब देते हैं, पर वहां तक पहुंचता नहीं। देखने की मुख्य बात यही है। जैसे मान लीजिए यहां साधक के लिए निशुल्क भोजन और रहने की व्यवस्था रख दी। यह क्या पक्का है? यह तो आने पर पता चलेगा। वीडियो तो कोई भी, कई लोगों को खड़ा करके बना देगा। भाड़े के आदमी मिल जाएंगे। भैया, वीडियो बनाना है, तुम्हें बस इतना बोलना है, दो चार सौ या हजार ले लो, बस इतना बोलना है। मिल ही जाते हैं। कोई बहुत बड़ी बात नहीं है। यहां तो लोग एक क्वार्टर पर अपना वोट बेच देते हैं। एक थाली भोजन में, एक क्वार्टर में, गाड़ी का पेट्रोल टंकी भरवा दो, पूरा वोट बेच देते हैं। यह देश ऐसा है। वीडियो बनाने में क्या है? कई लोगों को खड़ा कर दो और बोल दो, हम सालों से रह रहे हैं। बोलने में क्या जाता है? जिसे कुछ मिनट बोलने के हजार रुपये मिल जाएं। यह मेरे परमात्मा हैं, भगवान हैं। बोलने में कुछ नहीं जाता। ऐसा लोग करते हैं कि कोई आए तो दो सौ ले लेना, साष्टांग प्रणाम करना, और बोल देना कि यह मेरे भगवान हैं। सेवा तीन तरह से होती है। शरीर से, धन से, और अपनी समझ से, मानसिक। अब देखिए उस स्थान पर क्या जरूरत है। धन की, तन की, या ज्ञान की। एक व्यक्ति गिर गया, तो वहां आपका धन काम नहीं करेगा। वहां शरीर की ताकत काम करेगी, उसको उठा के अस्पताल ले जाना। वहां पैसा फेंक रही हो, वह पैसा काम नहीं आएगा। कोई कुएं में, गड्ढे में गिर गया हो, हाथ पांव टूट गया हो, तो लाखों करोड़ों रुपया वहां काम आएगा क्या? नहीं आएगा। उसको सुरक्षित उठाकर अस्पताल तक ले जाना है। वहां जाकर पैसा काम आएगा। सलाह भी काम आएगी। पर गड्ढे में गिर के पांव टूट गया हो और आप सलाह दे रहे हो कि हिम्मत लाओ, उड़ जाओ, घसीटो, नहीं। वहां शरीर की मेहनत चाहिए। वहां पैसा काम नहीं करेगा। तो देखिए, किसी संस्था को, किसी व्यक्ति को जरूरत क्या है, आवश्यकता क्या है। अपनी समझ से करिए। व्यवस्थापक को जरूरत होगी तो वह आपसे कहेगा। जरूरत नहीं तो जहां जरूरत मिले वहां जाओ। बिना समझे कुछ मत करो। जब आप किसी गलत व्यक्ति को ताकतवर बनाओगी, वह समाज को नीचे गिराएगा। गलत आदमी गलत काम करेगा। उसे कहीं भी खड़ा कर दो, गलत काम करेगा। और सही आदमी को गलत जगह भी खड़ा कर दो, तो सही काम करेगा। जब भी किसी की सहायता करो, देखो कि वहां कार्य कैसा हो रहा है।

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शरीर को कैसे स्वस्थ रखें, ताकि जहां धन नहीं, शारीरिक बल चाहिए, वहां सेवा कर सकें? दिनचर्या और खानपान कैसा हो? जोड़ों का दर्द उम्र के साथ हो रहा है। और कहीं सहयोग दें तो क्या देखें? पारदर्शिता कहां हो?

बढ़िया काजू, किशमिश, बादाम, छुआरा, मुनक्का, दूध खाओ, केसर खाओ। स्वस्थ रहो। अच्छा भोजन करो। स्वस्थ रहने का एक ही उपाय है। कोई मशीन सही रखनी हो तो उसमें अच्छा तेल डालते हो। गाड़ी है तो बढ़िया मोबिल ऑयल देती हो। वैसे ही शरीर को बढ़िया भोजन कराओ। बढ़िया मतलब बाहर से महंगा नहीं, पौष्टिक भोजन। स्वस्थ रहने के लिए दिनचर्या देखो। क्या खाती हो, कितना आहार लेती हो। न ज्यादा लेना है, न कम लेना है। जोड़ों का दर्द समय के साथ, उम्र के साथ हो रहा है। खानपान पर ध्यान दीजिए। कैल्शियम की कमी से भी हड्डी में दर्द होता है, तो कैल्शियम खाइए। कैल्शियम की दवा ले लीजिए, या कैल्शियम वाला कोई फल हो तो फल खाइए। कहीं भी सहयोग दो, तो देखो कि वहां जरूरत है, और उसके बाद वही काम हो रहा है या नहीं जितना वह समाज को बता रहा है। यह देखने के बाद सहयोग दीजिए। मैं सबको यही कहता हूं। यहां भी सहयोग देना हो तो जांच लो। मैं नहीं चाहता कि आपका एक भी नुकसान हो। यहां लोग सहयोग देते हैं, तो मैं उनको भी कहता हूं कि जांच करके करो। ऐसे मत करो। खूब जांच लो। अपनी समझ से समझ लो, तब सहयोग करना। जांच के ही आगे बढ़ो। बिना जांचे बाद में पछताना पड़ेगा। जांचना आपका काम है। हमारे यहां कोई माचिस मांगने आता है तो मैं कहता हूं, क्या करोगे, पहले बताओ। बीड़ी पियोगे तो नहीं देंगे। पहले उससे पूछता हूं। एक जगह हम बैठे थे, एक व्यक्ति आया और महाराज जी से बोला, माचिस दे दो। वह देने लगे। कहा, पूछो तो, करेगा क्या। माचिस का क्या करेगा, क्योंकि आप एक ताकत दे रहे हो। वह माचिस आग लगाएगी। उसने कहा, खेत में आग लगाऊंगा। कहा, महाराज जी, कितने जीव की हत्या होगी। आप निमित्त क्यों बन रहे हो। माचिस नहीं देंगे, जाओ। नहीं दी। महाराज जी ने नहीं दी। अगर नहीं पूछते, तो जिम्मेदार वह भी होते। जब किसी को सामान दे रहे हो तो पूछ लो, भैया इसका करोगे क्या। झूठ बोलता है तो जिम्मेदार वह होगा। पर आपका इतना कर्तव्य है कि एक रुपया भी दो, तो पूछ लो, इस पैसे का क्या करोगे, मुझे इतना बताओ। सौ रुपये दे रहे हो तो पूछ लो, क्या करोगे। पता चला क्वार्टर पीने जा रहा है, तो जिम्मेदार आप हो। आपने पूछा क्यों नहीं। परिवार का सदस्य ही क्यों न हो। भैया, मेरी मेहनत की कमाई है, आपको दे रही हूं, बताओ लेकर क्या करोगे। उसके बाद वह कुछ अलग करता है, तो जिम्मेदार वह होता है। आप पूछकर निकल गईं। इसलिए कुछ भी देने से पहले, लेनदेन से पहले, पूछताछ कर लीजिए।

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घर गृहस्थी में रहते हुए साधना कैसे हो सकती है? साधना का मतलब अपने आप को सुधारना है क्या? शेड्यूल इतना व्यस्त है कि अपने लिए थोड़ा समय नहीं निकलता। अभी रिटायर हुई हूं, पहले टीचर थी।

साधना अपने आप को सुधारना ही है। पहले देखो, बिगड़ी कहां है। बिगड़ी टाइम टेबल पर बिगड़ी है। बस सुधार लो। जैसे घर में एक मशीन बिगड़ जाए, तो कैसे सुधारोगे? जब पकड़ पाओगे कि कहां बिगड़ी है। यह नहीं पकड़ पाए तो सुधार नहीं होगा। शेड्यूल इतना बिजी है कि थोड़ा समय नहीं निकलता, यह कह रही हो। क्या बिजी है शेड्यूल? आप रिटायर हो चुकी हो। अब कहां शेड्यूल बिजी है? अभी तो आपके पास टाइम ही टाइम है। आप टीचर थीं। आपके पास तब भी समय मिलता था, घर गृहस्थी का भी था, साधना के लिए जितना बनता था। अब तो मिल गया। अब शिकायत मत करिए। अब पूरी तरह लग जाइए। पूरी कोशिश करिए। या तो नाती के नाती खिलाइए। दो में से एक ही काम हो सकता है। या अपने उद्धार के लिए पूरी तरह लग जाओ, या नाती के नाती खिलाने का ख्वाब देखो। दो ही रास्ते हैं। बेटे को खिलाया, वही हाल नाती खिलाने में भी होगा। ज्यादा नहीं होगा। बेटे को तो खिला चुकी। नाती खिलाओगे तो वही हाल होगा। इस उम्र में दो ही रास्ते होते हैं। या लड़के के लड़के के लड़के को खिलाओ, उसकी शादी विवाह करो, या अपना कल्याण करो। देख लो। आप तो अब खाली हो गईं, पेंशन भी आ रही है। आप बहुत तेजी से अपना आत्मिक कल्याण कर सकती हो, क्योंकि आपके पास धन भी है। एक बल है आपके पास। उस बल का सदुपयोग करिए। समाज सेवा में लगाइए। जहां जरूरतमंद मिले, अच्छा मौका मिला है। किसी से मांगने की जरूरत नहीं पड़ेगी। लग जाइए धन से, तन से, ज्ञान से। अपनी आत्मरक्षा और स्वाभिमान की रक्षा करते हुए, अपनी समझ के साथ, पूरी तरह लग जाइए। आत्मिक कल्याण करना हो तो यह करो। और नहीं तो कोई बात नहीं। ऐसे ही जिंदगी मिली है, और ऐसे ही निकल जाती है।

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जिज्ञासा तो बचपन से ही रही। फिर भी आत्मिक कल्याण पूरा नहीं हो पाया। जिज्ञासा से क्या होता है?

जिज्ञासा के बाद काम करना पड़ेगा। आप शिक्षक हुईं। इसके लिए मेहनत किया था कि नहीं? कोई जिज्ञासा करे कि मैं शिक्षक बनूंगा, तो बन जाएगा क्या? उसके लिए काम करना पड़ेगा। जिज्ञासा से क्या होता है? उस परिणाम के लिए आपने कभी काम किया क्या? तब मतलब है। जिज्ञासा ही जिज्ञासा रही, तो जिज्ञासा से क्या होगा? काम भी तो करना पड़ता है। तो काम करिए। बचपन से जिज्ञासा रही, किया क्या? किया उतना ही जितना समर्थ था। यह जिज्ञासा प्रबल नहीं थी। आपकी प्रबल जिज्ञासा शादी की थी, शादी की। शिक्षक बनने की थी, प्रॉपर्टी की थी, बच्चे पैदा करने की थी। आत्मिक कल्याण की जिज्ञासा प्रबल नहीं थी। ऐसे ही बन गई थी। प्रबल होती तो आप शादी भी नहीं करतीं, पहले यही करतीं।

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आत्मिक कल्याण की जिज्ञासा प्रबल नहीं थी, शादी परिवार वालों ने कर दी। क्या यह जबरदस्ती नहीं थी?

जबरदस्ती कोई नहीं करता। आप मुझसे छोटी हो, मैं जबरदस्ती यहां रोकूं, तो रुक जाओगी क्या? दूसरी बार पूछता हूं। मैं रोक दूं तो रुक जाओगी? पक्का बताओ। फिर मैं रोक ही लूंगा। मेरा वीडियो देखा होगा तो मेरा नेचर पता है। रुकोगी क्या? जबरदस्ती कोई किसी से कुछ नहीं करवा सकता। यह गलत बात है। लोग थोपते हैं। कोई किसी से जबरदस्ती कुछ नहीं करवा सकता। कहीं न कहीं हमारी हां होती है। हां नहीं है तो नहीं करवा सकता। कहीं न कहीं हां है, तभी करवा सकता है। आपको जीवन में जितना करना था, करते हुए देखा, होता गया। अब मैं कह रहा हूं, अब लग जाइए। कोई और जिज्ञासा बाकी हो तो जल्दी से जल्दी पूरा कर लीजिए। शादी भी हो गई, बच्चे भी हो गए, नौकरी भी हो गई, रिटायर भी हो गईं। अब कुछ बाकी हो तो वही, नाती की शादी, नाती को खिलाओ, नाती के नाती को। अब और कोई नहीं है। देख लो। पूरी तरह लग जाओ। अभी भी मौका है। कहा गया है, जब जागो तब सवेरा।

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हम दोनों सेंट्रल गवर्नमेंट से रिटायर हैं, दोनों सक्षम हैं। अब क्या करें? परिवार के लिए कितना ईंट पत्थर जोड़ें? पति कहते हैं कहीं अच्छा कार्य में लगा न दूं, सब लुटा दूंगी। कोई भी गेरुआ वस्त्र पहन के आ जाए तो देने का डर है। गेरुआ वाले को कैसे समझें, जरूरत कैसे देखें?

दोनों रिटायर हो, दोनों सक्षम हो। फिर क्या, सेवा में लगा दो अपने आप को। कितना ईंट पत्थर जोड़ोगे? ईंट पत्थर जोड़ने से अच्छा है किसी की भूख मिटाओ, किसी की प्यास मिटाओ। कहीं ईंट पत्थर की भी जरूरत हो तो सार्वजनिक जगह पर बनाओ। परिवार के लिए कितना बंगला, कितना घर बनाओगे? एक से दो बहुत है। उतना तो होगा ही। ज्यादा जोड़ने की जरूरत नहीं है। अब सत्कर्म में लगो। जरूरत देखिए, आवश्यकता देखिए। गेरुआ रंग को जिसने सच में समझा होगा, वह पेट से ज्यादा कभी मांग ही नहीं सकता। बहुत गेरुआ वाले पेट के लिए भी नहीं मांगते। जितने में जी सके, उतने से ज्यादा वह ले ही नहीं सकता। इससे ज्यादा लिया तो वह भिखारी है। आजकल गेरुआ पहन के जो घूम रहे हैं, उन्हें देखकर पता चल जाता है। गेरुआ रंग में कोई निकला, तो उसका मतलब है कि वह उसके लिए निकला। बस जितने में जी सके उतने में। भोजन के अलावा उसे क्या चाहिए? पैसे की मांग करे, कपड़े की मांग करे, तो मेरी समझ से उसने गेरुआ रंग को समझा नहीं। भीख मांगने के लिए, अपनी इच्छा पूरी करने के लिए, उस कपड़े को जरिया बना लिया। आज गेरुआ रंग में लोग भिखारी बन गए। मुझे शर्म आती है। देखता हूं तो कभी हंसी आती है, कभी आंखों में आंसू आ जाते हैं, कभी शर्म आती है। जिस कपड़े को देखने के बाद, चाहे जैसा भी हो, परमात्मा की याद आती है। उसको हमने देखा भी नहीं, पर उस कपड़े को देखने के बाद कहीं न कहीं जुड़ाव हो जाता है। उस कपड़े में कितनी ताकत है। उसके लिए लोगों ने कितनी मेहनत की होगी। शादी विवाह में, किसी भी प्रोग्राम में, व्यक्ति हर रंग पहनता है। गेरुआ रंग नहीं पहनता। कुछ तो है उसमें। उस रंग को इस समाज में जागृत करने के लिए लोगों ने कितना त्याग किया, कितना बलिदान दिया। और ये लोग एक क्वार्टर के लिए उसका उपयोग कर रहे हैं। यह शर्म की बात है। मैं गंगासागर गया था। देख रहा था, लोग नंगे होकर भभूत लगा के, बुला बुला के आशीर्वाद दे रहे हैं। आंसू भी थे, शर्म भी आ रही थी कि ये क्या कर रहे हैं। बस पैसे के लिए बुला बुला के आशीर्वाद दे रहे हैं। लाइन से बैठे रहते हैं। कोई कहता है इधर आओ, कोई कहता है उधर आओ। देख के हंसी भी आ रही थी, शर्म भी आ रही थी। और कहते हैं कि हम सनातन को जिंदा रखे हैं। क्या जिंदा रखोगे? जरूरत देखिए। आवश्यकता देखिए। क्या सच में उस व्यक्ति को जरूरत है? आप एक ताकत दे रहे हो। जांच आपकी होनी ही चाहिए।

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आप कहते हो, सुनो, समझो, और समझ कर उन शब्दों में जीना चालू करो। कोशिश कर रहे हैं, पर पूरा लागू नहीं हो पा रहा। राग द्वेष अभी छूट नहीं पा रहा। रुकावट कहां है? हमारे लिए तो यह आसान होना चाहिए।

मान का चक्कर छोड़ दो। आपकी उतनी सामर्थ्य है। आप भी रिटायर हो, आप भी रिटायर हो। अर्थ की कोई ऐसी कमी नहीं है। तो फिर कहीं न कहीं मान का चक्कर होगा। मान के चक्कर में राग द्वेष आ रहा होगा। मान का चक्कर छोड़ो। जहां गए, जैसा उसने दिया, उसमें जी लेना। जैसा जिसने व्यवहार किया, उसमें जी लेना। अपने व्यवहार को न छोड़ना। अपने आचरण को न छोड़ना। कहीं न कहीं मान की इच्छा होगी। परिवार में रहते हो, तो उसको छोड़ो। सुनने के बाद फिर समाज में आ जाते हो। नहीं। उसी समय इस ज्ञान को रखिए। इस ज्ञान को रखिए, अपनी समझ को।

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घर पर थोड़ा बोलो तो गुस्सा आ जाता है। बाहर कोई बोल दे तो टाल देते हैं। ऑफिस में अफसर डांटते थे तो हंसते हुए निकल आता था। घर पर इधर उधर घूमकर समय बरबाद करते हैं, इससे अच्छा कोई बुनियादी काम करो, यह कहने पर बुरा लग जाता है। मैं समय का पक्का हूं। बाहर खा पीकर आते हैं। आप कहते हो खिलाने वाले बनो, तो कोई कह देता है हम क्यों खाएं। इस गुस्से और इस समय को कैसे देखें?

ऐसा नहीं होना चाहिए। आप लोगों को तो कोई गाली नहीं देता। मैं गाली पर भी हंसा हूं, नहीं तो मैं यहां खड़ा नहीं होता। इतना तो आपके साथ नहीं होता होगा। खिलाने वाले बनो। खाने वाले क्यों बनो? उनकी भी इतनी समझ होगी कि अगर कहीं खाते होंगे तो कुछ समझ के खाते होंगे। मैं जहां तक देख रहा हूं, ऐसा नहीं है। समझ सकते हैं। खिलाते भी हैं। बस साथ में बैठ के खाते हैं, इकट्ठे खाते हैं, तो खिला दिया। खाते खिलाते भी होता है जीवन में। एक दिन, दो दिन। रोज रोज खिलाने के लिए जीवन नहीं मिला हमें। खाने पीने के लिए जीवन नहीं मिला। अपना लक्ष्य और होना चाहिए। आप आगे बढ़िए। फिर आपको देख के वह भी आगे बढ़ेंगे। आपसे प्रेरणा लेंगे। आप पूरी तरह लग जाइए। कभी कभी खाना भी बनता है। ऐसा नहीं है। खाना भी, और खिलाना भी।

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पत्नी घर के कामधंधे में लगी रहती हैं। मैं कहता हूं अब छोड़ दो, मैं चुपचाप पुस्तक पढ़ना चाहता हूं, अध्यात्म में लगना चाहता हूं, पर काम नहीं छूट रहा। सुबह सबको उठा देती हैं, पांच बजे जगाकर कपड़े धोने में लगा देती हैं। कई बार कहा, दो तीन घंटे पुस्तक पढ़ो या वीडियो सुनो, नहीं सुनतीं। रिटायर हो गए, फिर भी काम करवाती हैं। बाहर गईं तो काम वाली से काम करवा लेना कह जाती हैं। क्या यह ठीक है?

मालकिन बनने का बड़ा नशा होता है, एक जुनून। जिसको उठना होगा, वह उठेगा। सोने दो। सुबह उठ के क्या कर लेंगे? जरा सोने दो इंसान को। कोई सोना चाहता है तो सो लेने दो। यह पुराने लोगों का हाल था कि बस सुबह उठो। नींद पूरी होने दो। नींद पूरी होगी तो उठ जाएगा। जरा सोने तो दो उसे। आलतू फालतू मत सुनो। हम कहते हैं, गुरु जी का सुनो और करो। बाकी आलतू फालतू के लिए नहीं। अब आप पूरी तरह लग जाओ। आपको देख के वह भी लगेंगे। सोए हों तो जगाओ मत। जरा सोने दो। जगाने की जरूरत नहीं। सोने दो, उठ जाएगा। पांच बजे उठ जाओ, यह लोगों का नशा है। चार बजे उठ जाओ, यह नशा है, एक परंपरा है। कोई एक बजे सोया हो तो चार बजे कैसे उठेगा? कोई आठ नौ बजे सोया हो तो चार बजे उठ सकता है। लोग कहते हैं सुबह चार बजे जागो। मैं कहता हूं, किसी की नाइट ड्यूटी हो तो वह क्या करेगा। सामान्य दिन में जो रूटीन है, उसके अनुसार चलो। अब तो रिटायर हो गए। उन्हें छोड़ दो। फिर साधना कब करेंगे? वह करेंगे। उन्हें छोड़ो। पहले उन्हें जीने दो। आप पूरी तरह चलिए। आपको देख के वह चलेंगे। उन्हें छोड़ दो। पूरी तरह न जगाइए, न सुलाइए। जरा छोड़िए उन्हें। ऐसा तो नहीं कि वह नशेड़ी हैं। सो रहे हैं तो सोने दो। सोने गए तो उठ ही जाते हैं जल्दी। आप कहती हो बिस्तर छोड़ के काम धंधे में लगो। वही गड़बड़ है। यह मानसिकता है। यह परिवार से पाई होगी, कहीं न कहीं से मिली होगी। पुराने लोग ऐसे ही करते थे। उनका एक ही नशा रहता था, तुम्हें सुबह उठना है। कोई काम हो तो अभी उठना ठीक है। पर ऐसा नहीं करना चाहिए। वह नींद भर सोएगा, तब उठेगा। और ये तो रिटायर हो गए। क्या इनको काम पर इतना पैसा आता है? एक आदमी रख लो। इतना काम करवाने की क्या जरूरत है? इतना तो पेंशन आ रहा है। रखे भी हुए हैं। तो छोड़ो न। फिर भी उनके साथ लगी रहोगी। किचन में हमको भी लगाओगी, उनको भी। एक एक व्यक्ति को नौकरी लग जाएगी। मदद कम है तो एक और रख लो। इन्हें तो छोड़ो। रिटायर हैं। इतने समय तक काम ही तो किया है, समय व्यतीत किया है। अब विश्राम करने दो। जिसे आप उठा रही हो, वह सुबह से शाम तक खटा है। ड्यूटी नौ से पांच थी। आप टीचर हो, सुबह ही उठती थीं। पैंतीस साल नौकरी की। पैंतीस साल सुबह से शाम तक। अब विश्राम करो। अब आराम करो। खा पी के। क्या काम है? आप यहां आए, क्या मैंने कोई काम बोला? यहां मैं किसी से सेवा नहीं करवाता। मैं कहता हूं, विश्राम करिए। अभी आपको विश्राम की जरूरत है। जब से पैदा हुए, लोगों ने एक ही काम किया, आपको खटाया। व्यक्ति जरा सा बड़ा होता है, उसे परिवार के काम पर लगा देते हैं। जरा उसे समझने लायक होने दो। जरा जीने दो। रिटायर के बाद भी आप इन्हें नहीं छोड़ रही। इनसे काम करवाने की क्या जरूरत है? बाहर गईं, काम वाली आ गई, तो उससे काम करवा लेना कह देती हो। काम वाली ऐसा रखो कि उसका काम फिक्स हो। आपको एक एक बात बतानी पड़े, ऐसा क्यों? वह घर घर का देखा हुआ होता है, दिमाग होता है, इसीलिए साथ लगना पड़ता है, यह कहती हो। इतना मत लगो। मैं देख रहा हूं, लोग बिना मतलब के काम में लगे हैं। इसीलिए यहां मैं कोई सेवा नहीं देता। सारा काम मैं खुद करवाता हूं। कोई सेवा मांगता भी है तो मैं कहता हूं, नहीं। आप सेवा मत करो। आप यही करके तो आए हो। आप बस अपना काम करो। यहां कोई सेवा नहीं है। विश्राम करो। लोगों को विश्राम की बहुत जरूरत है। इतने साल नौकरी की। अब तो जीने दो। आप भी बढ़िया जीवन जियो, और इनको भी जीने दो। पेंशन आप भी पा रही हो, आप भी पा रहे हो। ईमानदारी से सत्कर्म में लग जाओ। एक दूसरे को सहयोग दो। निकलो, और निकालो। एक दूसरे की सहायता करो। एक दूसरे के बंधन मत बनो, कि तुम लेट उठे, तुम जल्दी उठे। जब नींद खुले तब उठ जाना। मुझे लगता है आदमी दिन भर सो नहीं सकता, चाहे तो भी नहीं सो सकता। नींद किसी के बस में नहीं है। अच्छी नींद छह सात घंटे हो जाए, तो फिर बिस्तर पर सो नहीं पाएगा। पर कोई नींद में है, करवट बदल रहा है, और आप उठो उठो कह रही हो, तो उठाना नहीं चाहिए। इमरजेंसी आ जाए, आपातकाल आ जाए, जान की बात आ जाए, तब तुरंत उठा सकती हो। कहने का तात्पर्य यह है कि विश्राम कर लीजिए। यह अकेले आपकी बात नहीं। मैं हर व्यक्ति से कह रहा हूं। बस काम काम। नाम, शोहरत, पैसे, प्रॉपर्टी। एक से दो बंगला, दो से चार, पूरी बिल्डिंग। पता नहीं पूरा संसार खरीदना चाहते हो। समझ में नहीं आता, जीने के लिए हमें क्या चाहिए। प्रॉपर्टी पर प्रॉपर्टी बनाते चले जा रहे हैं। मैं देख के आ रहा हूं, लोग कहते हैं मैं परेशान हूं। उनके पास करोड़ों की जायदाद है। यही देख के अभी आया हूं। वह कहते हैं मैं परेशान हूं, और मुझे हंसी आ रही है। करोड़ों की जायदाद है। बेच के अपनी परेशानी दूर कर लो। उसको लेकर क्या करोगे? नहीं, रखेंगे। इस परेशानी से लड़ेंगे। रख के क्या करोगे? कहते हैं, बच्चों के लिए। रखेंगे, जाने नहीं देंगे, क्योंकि खानदानी है, पुश्तैनी है। बेचेंगे तो नाम खराब हो जाएगा। और खुद सड़ रहे हैं, शारीरिक भी, मानसिक भी। करोड़ों की जायदाद है, मैं देख के आ रहा हूं। कहते हैं मैं परेशान हूं। हम कहते हैं बेच दो, बेचकर अपने जीवन में उपयोग करो। नहीं बेचेंगे। नाम खराब हो जाएगा। अरे भाई, तेरा नाम है कहां अभी? होता तो खराब होता। तुम्हारा नाम ही नहीं है। नाम होने का तुम्हें भ्रम है। आपने भी ऐसी घटना देखी होगी। करोड़ों की प्रॉपर्टी है, और दस बीस हजार के लिए परेशान हैं। कहते हैं नहीं बेचूंगा, बेचूंगा तो नाम खराब हो जाएगा। अरे, तेरा नाम कहां रहा, जो दस बीस हजार मांग रहा है। नाम तो उसी समय खत्म हो गया। तुझे लग रहा है मेरी शान है। जैसे ही हाथ फैलाया, शान वहीं खत्म हो गई। अभी भी शान बाकी है क्या? यह मैं अभी देख के आ रहा हूं। हमारे संपर्क में ऐसे लोग हैं, जिनके पास आठ दस किलो सोना है, और खुद उधार लेते हैं। दुकान वाले पीछे घूमते हैं, मुझसे नंबर मांगते हैं। उनका नंबर क्या है? क्यों भाई, पेमेंट लेनी है? मैंने उनसे कहा। मुझे हंसी आती है, भाई यह क्या कर रहे हो। इसलिए इन्हें आराम करने दो। आप भी साधना करिए। पूरी तरह लग जाइए।

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बच्चों और बहुओं में तालमेल और शांति के लिए क्या करना चाहिए? बहू कह चुकी है कि पापा जी, इंदौर प्रोग्राम में जाने दो। घर में अभी फंक्शन भी है।

कैसे समझ आए? यही सत्संग सुनाओ। या दोनों को कुछ दिन यहां रखो। बच्चा तो सुनता है। बहू भी सुनती होगी। बहू ने कहा भी था कि पापा जी, इंदौर जाने दो। जब प्रोग्राम में जाओ, उसको भी ले जाओ, और उस दिन रुको। जरा समय दो। आप रिटायर हो गए। अब ऐसी जगह रुकना चाहिए। अभी घर में फंक्शन है, तो जब खाली हो, जब लगे, तब चले आना। कुछ दिन रुकोगे तो आपको अच्छा लगेगा। समझ में आएगा, जब बच्चों से दूर रहोगे और एकांत में रहोगे। यहां रह के भी आपस में दोनों बात नहीं करोगे। जब एक दो हफ्ता कटेगा, तब बहुत कुछ समझ में आएगा। कितनी आसक्ति है, कितना मोह है, कितना बंधन है, कितनी तड़प है। तब यह सब समझ में आएगा। एकांत में रहना चाहिए। आप लोग रिटायर हो, आपको तो रहना चाहिए। समय मिले तो एकांत में रहो। एकांत में रहने से बहुत बारीक बातें समझ में आती हैं, जो साथ रहने में नहीं आतीं। बारीक से बारीक बात समझ में आएगी। इस अवस्था में यह जरूरी है। एकदम जरूरी है। एकांतवास में रहिए। अपने आप को समझने के लिए, और लोगों को समझने के लिए। कभी भी आइए।

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हमारे ऊपर हाथ रखिए, कि जीवन जितना भी है, जिसके लिए आए हैं उसी में रहें। आपका संकल्प और हमारा संकल्प एक हो जाए।

पूरी तरह लगे रहो। शब्द तो दे दिए आपको। आपको सब दे दिया। थोड़ा दूर से लग जाओ, पूरी तरह। अब बस। इसका भी कभी समय आएगा। लगो। पहले मेहनत तो करो।

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गृहस्थ आश्रम में जो भी मिलता है वह अपोजिट क्यों मिलता है? थोड़ा अंतर तो होना चाहिए, पर इतना अंतर क्यों मिला? मैं बचपन से गुरु के घर जाने वाली थी। इन्होंने साफ कह दिया था कि हम खाते पीते प्राणी हैं, और मैं लहसुन प्याज न खाने वालों में से थी। गुरु को छोड़ना नहीं चाहती थी, क्योंकि छोड़ती तो विवाह के लिए कहीं और जाना पड़ता। बड़ों की सहमति से, गुरु के कारण, इन्हीं से किया। अब रोती क्यों हूं?

अपोजिट नहीं मिले, तो मान लीजिए आप कहो एक गिलास पानी लाओ, और सामने वाला आप ही जैसा हो, तो वह भी तुरंत कहेगा तुम एक गिलास पानी लाओ। तब दोनों का चलेगा ही नहीं। अपोजिट में ही कुछ पैदा होता है। दोनों माइनस माइनस मिला दो तो बल्ब जलेगा क्या? सौ प्रतिशत यही है। यूनिवर्सल है। अपोजिट में ही कुछ पैदा होगा। एक ही जैसे रहेंगे तो जरूरत क्या है? नेचर भी इतना अपोजिट है। तभी तो कुछ समझ में आएगा। एक ही जैसे हो जाएं तो कुछ पैदा कैसे होगा? एक जैसे नहीं होते। ऐसा लगता है एक दूसरे को समझते होंगे। एक जैसा यहां कोई नहीं है। एक जैसे पेड़ के पत्ते भी नहीं हैं। नेचर एक जैसा कभी हो ही नहीं सकता। थोड़ा अंतर होना चाहिए, यह कहते हो। अंतर है तो समझो। अंतर क्यों है? उसके पीछे कुछ होगा। बेस होगा, आधार होगा, कुछ तो होगा। अंतर क्यों है? इन्होंने जितना था, साफ साफ बता दिया था। आपने तब छोड़ दिया। खाते पीते को पीछे छोड़ दिया था, तभी स्वीकार किया था। तो अब रो क्यों रही हो? बच्चों को बोलोगे, तब समझ में आएगा।

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मैं शिक्षक रही, बाहर से जीवन में कमी नहीं रही। अब बहू बेटे को देखती हूं। उनकी जिंदगी अच्छी है, पर कंप्रोमाइज बहुत कम है। हमने नीचे से मेहनत की, उन्हें बिना मेहनत सब मिल गया। क्या करें? बहू कहती है हम भी चलेंगे। उन्हें यहां लाना चाहिए था क्या? घर पर समय कैसे दें, जब बात नहीं सुनते और दूरियां बढ़ जाती हैं?

आप बढ़िया जीवन जियीं, शिक्षक रहीं। बाहर से जीवन में कोई कमी नहीं रही। अब बहू बेटे को देखती हो। जिस तरीके से वह जीते हैं, आप उस तरीके से अब भी साथ में जी सकती हो। शौक है तो अपनी समझ से पूरा कर लो। ऐसा न हो कि शौक दबा का दबा रह जाए। उनमें कंप्रोमाइज कम है, और आप में ज्यादा रहा, क्योंकि आप दोनों ने मेहनत की। उन्हें बिना मेहनत सब कुछ मिल गया। आपने मेहनत की, और उनको बिना मेहनत सब हाथ लग गया। वह कंप्रोमाइज क्यों करेंगे? उन्होंने दुख नहीं देखा, तकलीफ नहीं देखी। कंप्रोमाइज कैसे करेगा व्यक्ति? आपने इसलिए किया कि नीचे से शुरुआत की। नीचे से शुरुआत करने वाला कंप्रोमाइज करता है। जो कई रात भूखा सोया है, उसे एक दिन कहो भोजन नहीं है, तो आराम से सो जाएगा। जो कभी भूखा नहीं सोया, उसे एक दिन कहो भोजन नहीं है, वह पूरा हंगामा कर देगा। क्योंकि उसने तकलीफ झेली नहीं। आपके बच्चों के साथ यही रहा। उन्होंने वह स्थिति देखी नहीं, इसलिए कंप्रोमाइज नहीं करेंगे। सब मिल गया, कंप्रोमाइज क्यों करें? अभाव देखा नहीं उन्होंने। आप दोनों बनाने में लगे। उन्हें बनाना नहीं था। बना बनाया मिला, तो कंप्रोमाइज क्यों करेंगे? वह कंप्रोमाइज नहीं करेंगे। क्या करना चाहिए? उनको आपने ताकत दे दी। अब समझ देने की जरूरत है। या ताकत छीन लो। कुछ दिन छोड़ो, फिर देखो, समझ में आ जाएगा। सुधारने के लिए इतना त्याग, इतनी हिम्मत हो तो करो। ताकत कम होगी तभी व्यक्ति समझेगा। समझ भी क्यों लेगा? उनको समझ चाहिए, ज्ञान चाहिए, संस्कार चाहिए। इसके लिए प्रयास करोगी तो होगा। क्यों नहीं होगा? बहू कहती है हम भी चलेंगे। बहू को लाना चाहिए था। ऐसी जगह कुछ दिन छोड़ देना चाहिए। एक आध हफ्ता, एक महीना। समय तो देना पड़ेगा। किसी के जीवन में बदलाव करना है, तो जैसे एक बीज को वृक्ष बनाना हो तो जमीन में डालना पड़ता है। वैसे ही सुधारना है, बदलना है, तो ऐसी जगह ले जाओगे तभी होगा। ऐसे नहीं होगा। वह अपनी समझ से जितना समझना था, समझ के कर ही रहे हैं। अब समझ विकसित करनी है, तो जहां समझ का स्तर उठे, वहां ले जाकर रखो। समय देना पड़ेगा। जहां लगे कि यहां से समझ उठेगी, वह सत्संग सुनाओ, वहां ले जाओ। धीरे धीरे बदलाव होगा। पर आपको लगना पड़ेगा। एक में बदलाव आया तो दूसरे में आ जाएगा। बहू पूरी तरह समझ गई, तो लड़का भी समझ जाएगा, क्योंकि उसे जवाब नहीं मिलेगा, वह प्रक्रिया नहीं मिलेगी। सरलता से वह भी समझ जाएगा। लाना चाहिए था। कभी ऐसा हो तो बच्चे को भी लाना। सत्संग सुनाना। मोबाइल पर स्पीकर लगा लो। रोज एक दो घंटे, सुबह शाम, पूरे घर में आवाज हो। न सुनना चाहें तब भी शब्द कान में पड़ेगा। शब्द अपना काम करेगा। यह ध्यान रखना। स्पीकर लगाओ, एक दो घंटा सुनाओ। देखना, बदलाव कैसे नहीं होगा। कान में शब्द पड़ेगा, न चाह के भी सुनना पड़ेगा। शब्द बदलाव करेंगे। सुनेंगे तो समझना पड़ेगा। समझ गए तो और सुनेंगे। आप घर पर समय देने को कहती हो, इसी समझ के लिए। सत्संग सुनाइए। कहीं न कहीं वह अपसेट होते होंगे, इसलिए समय नहीं दे पाते, क्योंकि उनकी बात कोई नहीं सुनता। यह भी बात है। समझो। व्यक्ति दूर कब जाता है? जब वह समझाना चाहता है और बच्चे नहीं समझ रहे होते हैं, तो चला जाता है। कितना प्रयास करे? अब उनके अपने बच्चे हो गए। एक बार में, दो बार में समझना चाहिए। तीसरी बार न समझे, तो ऐसे व्यक्ति का त्याग कर देना चाहिए। कितना पीछे पड़ोगे? बच्चा सुनता है। बहू भी सुनेगी। ऐसा नहीं है। समझ के समझाइए। सत्संग सुनाइए। जीवन में आएगा।

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अशोक कुमार पूछते हैं, साधना का मतलब क्या है? क्या साधना स्वयं पर नियंत्रण करना है?

नहीं। स्वयं पर नियंत्रण नहीं करना है। हमारे द्वारा कुछ ऐसा हो रहा है जिससे मेरा स्तर गिर रहा है। वह मुझे कार्य नहीं करना है। साधना का मतलब यही है। हमें वह काम करना है जिससे हमारा स्तर ऊपर उठे। यही साधना है। बाहरी भी और आंतरिक भी, दोनों स्तर पर यही साधना है।

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लक्ष्मण पूछते हैं, गुरु जी, माया से कैसे निकलें?

पहले माया को समझना है कि माया क्या है। एक प्रभु की माया है। उसमें आनंद है। एक आपकी माया है, जो बेईमानी और दुष्कर्म से तैयार हुई है। उसमें दुख है। तो एक काम करो। ईमानदारी और सत्कर्म अपना लो, निकल जाओगे। बेईमानी सबसे ज्यादा कहां होती है, पता है? बोलचाल में। बोलचाल में सबसे ज्यादा बेईमानी होती है। मान के चक्कर में आकर हम अपनों के साथ भी दिखावा करते हैं। परिवार में ही अपना मैं खड़ा करने के लिए बोलते हैं। परिवार में मैं क्यों खड़ा कर रहे हो? परिवार में भी यह कि मैं तुमसे ज्यादा जानता हूं। जानते हो तो उसे बताओ। ऐसा कुछ करो कि वह तुमसे ज्यादा जानने लगे। तब आपकी महानता है। यहां सब मालिक बनने के चक्कर में परेशान हैं। सब टैलेंटेड बनने के चक्कर में परेशान हैं। सब बड़ा बनने के चक्कर में परेशान हैं। और तो छोड़ो, परिवार में ही अपनी समझदारी दिखा रहे हैं। समझदारी का जीवन में तब महत्व है, जब आपकी समझदारी से किसी का स्तर उठे। किसी का स्तर गिर रहा है, तो उस समझदारी का क्या मतलब है? कोई मतलब नहीं। आपकी समझदारी का मतलब तब है जब उससे किसी का स्तर उठे। पता चला कि आपकी समझदारी से कोई नीचे गिर रहा है, तो उस समझदारी का क्या मतलब रहा? कोई मतलब नहीं। ऐसी समझदारी किस काम की?

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सत्य पूछते हैं, गुरु जी, जड़ और चेतन क्या है? शरीर, मन, बुद्धि, चित्त जड़ हैं या चेतन?

शरीर, मन, बुद्धि और चित्त जड़ हैं। हमें चेतन की स्थिति पर पहुंचना है। हम जड़ में फंस चुके हैं। पूरे ब्रह्मांड में जितना कुछ है, उसमें चेतनता है। जड़ का मतलब जो अपने से चल नहीं सकती, उठ नहीं सकती, बोल नहीं सकती, उसे हम जड़ कहते हैं। जो अपने से चलायमान है, अपने से चल रही है, उठ रही है, बोल रही है, बैठ रही है, उसे हम चेतन कहते हैं।

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पुखराज सिंह कहते हैं, महाराज जी, आप इतनी बारीकी से समझा रहे हैं, मैं मूर्ख हूं, समझ नहीं पा रहा। क्या करूं?

समझ रहे हो। तभी तो पता चला कि इतनी बारीकी से समझा रहे हो। बस इसे आचरण में उतारो।

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विवेक राठौड़ पूछते हैं, गुरु जी, मैं शिक्षक हूं। तीन चार बार समझाता हूं, फिर भी कुछ बच्चे नहीं समझते। स्कूल में समय सीमित है, जिसमें बच्चों को समझाना होता है। ऐसे में क्या करूं? सरकार और सब रिजल्ट चाहते हैं, सबको सौ प्रतिशत चाहिए।

समझाने का प्रयास करिए, पर समझाना थोपिए मत। सबका बुद्धि स्तर अलग अलग है। अपनी तरफ से जितना कर सकते हो, करिए। बहुत ऐसे बच्चे हैं, जिनकी मन और बुद्धि ऐसी है कि वह नहीं समझ सकते। आप कितना भी प्रयास करो। तो अपना काम ईमानदारी से करिए। बस। आप कहोगे, नहीं, मैं इसे समझा के ही छोड़ूंगा। तब उसमें बहुत बुराइयां आ जाती हैं। नहीं। अपना काम ईमानदारी से करो। बात खत्म। जिसे समझना होगा, वह समझ लेगा। नहीं समझना होगा, तो आप कुछ भी नहीं कर सकते। इतना है कि अपना काम ईमानदारी से करिए। सरकार रिजल्ट चाहती है। वह सब रिजल्ट चाहते हैं। मैं वही कह रहा हूं। सबकी बुद्धि का स्तर अलग अलग है। कहते हो, सबको सौ प्रतिशत रिजल्ट चाहिए। उन्हें भी पता है कि नहीं आएगा। उन्हें यह बात पता है। पर प्रयास हमारा लाने का रहेगा। जब हम सौ का लक्ष्य रखेंगे, तब जाकर थोड़ा कम आएगा। सबको पता है, पूरा नहीं आएगा। होता भी नहीं है। पर प्रयास तो करेंगे। नहीं तो लोग मेहनत ही नहीं करेंगे। सबको पता है कि पूरा नहीं आएगा।

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ठाकेश पूछते हैं, अष्टावक्र गीता में कहते हैं कि अंदर वाले को पकड़ो। जो दिखाई नहीं देता, उसे कैसे पकड़ें?

हां। अंदर वाले को तब पकड़ोगे, जब बाहर वाले को छोड़ोगे। बाहर वाला तो दिखाई दे रहा है। पहले उसे छोड़ो। राख दो इसमें। बाहर वाले को छोड़ोगे, तो अंदर वाला पकड़ा जाएगा। पहले बाहर वाले को तो छोड़ दो।

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कार्तिक पूछते हैं, गुरु जी, सत्कर्म में समर्पण करने पर निकलना है, यह भाव भूल जाता हूं। क्या करूं?

कोई बात नहीं। याद तो आ जाती है। काम तो कर रहे हो। पता चल रहा है कि काम कर रहे हो। आपने पानी पिया तो प्यास बुझ ही जाएगी। याद नहीं रहा, तो यह थोड़ी है कि प्यास नहीं बुझाएंगे। पानी पी लिया तो प्यास बुझ ही जाएगी। याद रहने से क्या होगा? वैसे ही निकलने के लिए ईमानदारी और सत्कर्म अपना लो। निकलना भूल भी जाओगे तो भी निकल जाओगे, क्योंकि ऐसा कर्म अपना लिया। और मैं यह कह रहा हूं, निकलना याद भी रहे, पर ईमानदारी और सत्कर्म न अपनाकर बेईमानी और दुष्कर्म अपना लिया, और केवल निकलना याद रखा, तो क्या कभी निकल पाओगे? कभी नहीं निकल पाओगे। बंधन वाला काम कर रहे हो, तो निकलने वाला काम करना पड़ेगा।

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एक कुत्ता मर गया था। उस रात आप चैन से सो नहीं पाए, सुबह भी बेचैन रहे। चेहरे पर थकान के साथ ऐसा दुख था, जो हमारे दुख जैसा नहीं। एक कुत्ते के लिए अंदर से इतना प्रेम और तड़प है, तो यहाँ रहने वालों के लिए अंदर से कितना गहरा प्रेम रहा होगा? हम समझ नहीं पाते। गलतियाँ समझ के साथ और बिना समझे होती रहती हैं। कुछ भी हो, हाथ पकड़कर रखिए।

जब मैं यहाँ से गया, और जब मैंने वहाँ मंदिर के पास गाड़ी रोकी, तो वो बिल्ला दौड़ के आया। मैं बाहर निकला और वो दौड़ के आए। उस पिल्ले में और अपने आप में, मैं बोल रहा हूँ, मैं शरीर का फर्क समझता हूँ। मेरा यही भाव रहता है कि ये जितने भी पिल्ले हैं, अब इन्हें कुत्ता, पिल्ला तो कहना ही पड़ता है। आदमी तो बोल नहीं सकते। लेकिन मैं इनमें और अपने आप में कोई फर्क नहीं समझता। जितना प्रेम मैं अपने आप से करता हूँ, मैं इन पिल्लों से भी करता हूँ। बस इतना है कि यह शरीर छोड़ के वो जहाँ भी गया, वो आया। कुछ दिन तक सत्संग उसके कान में गए। तो बस मेरा यही भाव है, उसे भी मुक्ति का रास्ता मिले। और मैं सबसे पहले अपने जीवन में मैंने अपने आप से प्रेम किया, इसलिए मैं यहाँ हूँ। और अब मैं जितना अपने आप से प्रेम करता हूँ, मेरे साथ रहने वाले, चाहे वो साधक हो, कोई भी हो, मैं उनसे वही प्रेम करता हूँ, हर वक्त। पहले जब मैं खोज में निकला था, तो मैं हर वक्त कुछ भी काम करता था अपने आप को निकालने के लिए। कैसे मैं अपने आप को निकाल दूँ। अब अगर मैं कुछ भी काम करता हूँ, तो मैं आप लोगों को कैसे निकाल दूँ। बस यही मेरा जीवन है। पहले मैं अपने लिए लगा, और हर वक्त एक ही बात सोचता था। मैं सोता था, उठता था, बैठता था, कहीं भी जाता, आता, खाना पीना, कुछ भी करता था, तो मेरा एक ही भाव था कि मैं कैसे ज्ञान खोजूँ, प्रत्यक्ष ज्ञान खोजूँ, और कैसे मैं अपने आप को निकाल लूँ। क्योंकि जब मैं अपने आप को निकाल पाऊँगा, तभी मैं आपको निकाल पाऊँगा। यह मुझे पता था। तो मैंने अपने आप से इतना प्रेम किया कि मैंने अपने आप को निकाल लिया। और हर वक्त मैंने निकालने के लिए काम किया। मेरा कहीं आना जाना हुआ, तो सिर्फ अपने आप को निकालने के लिए। अब मेरे जीवन में आप लोग हो। मेरा सोना, उठना, बैठना, खाना, पीना, कुछ भी अगर हो रहा है, तो आपके लिए हो रहा है। क्योंकि मेरे लिए कुछ बचा नहीं। अगर मैं अपने लिए करना भी चाहूँ, तो मैं करूँगा क्या? मैं करूँगा भी क्या? आपने विदेश देखा, आप मेरे साथ गए। मैं कैसे जिया? मैं अपने लिए क्या करूँगा? मेरे लिए करने के लिए कुछ है, यह नहीं है। मेरे लिए अगर कुछ करने के लिए है, तो आपके लिए है। मेरा हर क्षण, हर पल, हर सोच, हर विचार, कुछ भी अगर है, तो आपके लिए है। मेरा कहीं भी आना जाना, कुछ भी हो रहा है, बातचीत, कुछ भी मेरे जीवन में है, तो सिर्फ आप लोग हैं। बस यही रहता है कि आप लोगों के लिए क्या मैं कर दूँ, कि आप लोग निकल जाओ। क्या मैं कर दूँ? क्या मैं ला दूँ? कहाँ मैं आपको ले जाऊँ, आपको दे दूँ, कि आप निकल जाओ। और आप लोग भी अपने आप से इतना प्रेम करो कि आप अपने आप को निकाल लो। अगर आप अपने आप से प्रेम करोगे, तो निकाल लोगे। इसलिए मेरा कहना है कि आप लग जाओ पूरी तरह, और निकाल लो अपने आप को, चाहे जैसे भी। पहले आपने बाहरी वैभव के लिए, समृद्धि के लिए, मान सत्कार के लिए कुछ भी किया। अब निकालने के लिए कुछ कर लो। आप कुछ भी करो, आपको यह लगना चाहिए कि इससे मेरी मुक्ति है। बस, कुछ भी करो। और अगर मुक्ति है तो करो, नहीं तो रुक जाओ। अगर आपको लग रहा है कि नहीं, यह मुझे बंधन देगा, तुरंत रुक जाओ, और समझ के करो। नहीं समझ में आ रहा है, मत करो। समझ के ही करो, कोई काम। अगर नहीं समझ में आए, तो मत करना। छोड़ देना। रुक जाना। कोई भी आपके द्वारा कार्य हो रहा है, तो वो मुक्ति के लिए हो, और नहीं तो ना हो। रुक जाओ। जब तक ना समझ में आए, मत करो। अगर जरूरत होगी तो समझ लोगे, या तो जिसको जरूरत होगी, मुझे समझा देगा। क्योंकि आपने अपने आप को बहुत उलझा दिया है, बहुत बंधन में फँसा दिया है। अब मत फँसाओ। समझ के करो। या तो आपकी जरूरत होगी तो समझ लोगे। जिसको जरूरत होगी, वो समझा देगा। जैसे आप विदेश गए, जीने के लिए खा ही ले रहे थे, खोज खोज के कैसे खा ले रहे थे। अब अगर वैसा भोजन मिले तो थोड़ी ना खाओगे, क्योंकि अनेक ऑप्शन हैं। लेकिन जीने के लिए कैसे खाते थे। जब जीना होता है, तो सारा नाटक चला जाता है। तो जब तक ना समझ में आए, मत करो, करो ही मत। और समझ में आए तो करो। या तो जरूरतें सिखा देंगी आपको, या तो जिसको जरूरत होगी वह सिखा देगा। लेकिन अपनी जिंदगी को दलदल में आप मत फँसाओ। कहीं भी आओ, कहीं भी जाओ, किसी के साथ रहो। बस मुक्ति के लिए। मुक्ति के अलावा कुछ नहीं। क्योंकि हमने करके देख लिया है, करके समझ लिया। मिलाकर देखो तो वही है। मिलाकर देखो तो वही बातें। अगर आप किसी के साथ रहे हो, आप जितने वर्ष तक रहोगे और आगे भी रहोगे, तो वही होगा। उससे ज्यादा कुछ नहीं होने वाला है। तो आप देखिए, किसके साथ रहने से मेरी मुक्ति होगी। क्योंकि मैं अपने आप को इतना बाँध लिया कि छुड़ाने की क्षमता मेरी खत्म हो गई। मेरी ताकत बाँधने में ही लगा दी, क्योंकि बाँधना मेरे लिए सबसे सरल है। गांठ मारना देखो, सबसे सरल होता है। कोई भी फौरन से मार दो, और आपकी गांठ कभी आपसे ही नहीं छूटी। ऐसा अनुभव तो हुआ होगा। आपने रस्सी की गांठ मारी और आपसे ही नहीं छूटी होगी। तो आपने चाकू का प्रयोग किया, या किसी ताकतवर व्यक्ति का उपयोग किया। तो हमारी ताकत बंधन बाँधने में, दलदल में फँसाने में लगी हुई है। हम इस समय दलदल में हैं, तो हमारी ताकत नहीं। हमें ऐसे ताकतवर आदमी के साथ रहना है, जो मुझे निकाल दे। अब देखना यह है कि हम ऐसे आदमी के साथ तो नहीं रह रहे, कि वो भी दलदल में है और मैं भी दलदल में हूँ, दोनों और नीचे जा रहे हैं। क्योंकि आप जैसी संगत करोगे, उसकी ऊर्जा आप पर काम करेगी, आपकी ऊर्जा उस पर काम करेगी। साथ का मतलब हाथ पकड़ना। तो देखो, जिसका मैं हाथ पकड़ रहा हूँ, वो कहाँ खड़ा है? क्योंकि वही खींचेगा। जीवन में मुक्त पुरुष का हाथ पकड़ना, क्योंकि जहाँ वो रहेगा, वही खींचेगा। याद रखना, आपके पास ताकत थोड़ी ना है। वो आपको अनेक तरह का लालच देगा, और लालच तो हमारे पास भरपूर है। आप देखो, प्रोफेसर जी फल के लिए कैसे लालायित हैं, कि काट के हमें खड़ा ही दे देना। और इनके पास कोई कमी नहीं है। यात्रा भी इनके पैसे से ही हो रही है, लाखों रुपए। देखिए लालच। लाखों रुपए खर्च कर रहा है व्यक्ति, और कितने का फल रहा था, हजार सौ नहीं, हजारों में गिर जा रहा है। उसके पास कोई कमी ही नहीं है। जिसके साथ वो भी हैं, वो भी कह रहे हैं, कोई कमी नहीं है। आपके पास कोई कमी नहीं है। आप निमित्त बने। विदेश यात्रा की कहीं ना कहीं व्यवस्था आपके द्वारा ही हुई। लेकिन आप देखिए कि आप कहाँ गिर रहे हो। आपके लालच का आपको पता भी नहीं। और यही अगर आप बंधन वाले व्यक्ति के साथ रहते, तो वो आपको सपोर्ट दे देता, आपको पता भी नहीं चलता। हमारे गिरने का भी हमें पता नहीं चलता। क्योंकि आप जिसके साथ हो, वो खींचेगा। कहेगा, यह जगह एकदम सेफ है। यह जगह सेफ है। क्योंकि मेरे ग्रुप से एक आदमी कम हो रहा है, इसका मतलब मेरा ग्रुप कमजोर हो रहा है। व्यक्ति अपने ग्रुप को बढ़ाना चाहता है। एक व्यक्ति का हटना मतलब उसकी ताकत कम होना। तो कहता है, नहीं, मैं जहाँ हूँ ठीक है, तुम मत जाओ आगे। क्यों मत जाओ? क्योंकि मैं कमजोर हो रहा हूँ। मैं कहीं ना कहीं कमजोर हो रहा हूँ। एक ग्रुप से आदमी हट रहा है। यहाँ सब अपने ग्रुप में खींच रहे हैं, अपने बल को बढ़ाना चाहते हैं। लेकिन आप देखो कि आप जिसके साथ जा रहे हो, वो कहाँ खड़ा है। क्योंकि जहाँ खड़ा होगा, वही लपेटेगा आपको। यह स्वाभाविक है। तो मेरा यही कहना है कि आप अपने आप से प्रेम कर लो, अपने आप को निकाल लो। कोई भी काम आपके द्वारा हो, सोना, जागना, उठना, बैठना, कुछ भी हो, बस मुक्ति के लिए। नहीं तो रुक जाओ। समझ कर करो। नहीं तो जरूरतें समझा देंगी, या जिसको जरूरत होगी वो समझा देगा। तो अपने आप से प्रेम कर लो, अपने आप को मुक्त करा लो। और उसके लिए आपको मेहनत करनी पड़ेगी। समझ के चलना पड़ेगा, समझ के जीना पड़ेगा। हर काम सोच, समझ और सूझबूझ के साथ करना पड़ेगा। यह बातों से बात नहीं बनने वाली। हर वक्त, हर पल, हर क्षण आपको सचेत रहना पड़ेगा। ऐसे नहीं होने वाला है। आपको अपने ऊपर काम करना पड़ेगा। और हाथ उसका पकड़ना है, जहाँ आप जाना चाहते हो। संगत करनी पड़ेगी आपको। बिना संगत के कुछ होने वाला नहीं है। यहाँ हम एक दूसरे के पूरक हैं। यहाँ आपको कुछ चाहिए, तो आपको किसी की संगत करनी पड़ेगी। बिना संगत के कुछ मिलेगा ही नहीं। बिना संगत के कुछ होगा ही नहीं। तो आप देखिए कि संगत किसकी कर रहे हो। जिसका संगत करोगे, उसी से बल मिलेगा, और वहाँ आप चले जाओगे। यह आपको देखना है, संगत किसकी कर रहे हो। क्योंकि संगत आप कर सकते हो। अभी साथ लेने लायक तो आप हो नहीं। किसी को साथ तो ले नहीं सकते। क्योंकि जब खुद का उद्धार नहीं हुआ, तो किसी और का थोड़ी ना कर सकते हो। तो आप सोच समझ कर संगत करिए, कि आप संगत किसकी कर रहे हो।

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गुरु जी, क्या अवधूत की स्थिति आने से पहले मुझे मालूम पड़ जाए? अगर हाँ, तो उस समय क्या करें?

अवधूत स्थिति एक पीड़ा की स्थिति होती है, जहाँ कुछ नहीं रहता। वहाँ कोई प्लानिंग नहीं होती। एक स्त्री ने गर्भ धारण कर लिया। बोले, मैं बच्चे को जन्म देने वाली हूँ, तो उस समय क्या करूँ? उस समय दर्द से इतनी पीड़ित रहेगी कि उसकी समझ खत्म हो जाएगी। समझ के पार की स्थिति है वह। तो अवधूत स्थिति में प्लानिंग हो ही नहीं सकती। एक माँ को अगर बताया जाए कि तुम माँ बनने वाली हो, तो यह यह ध्यान रखना। क्या आपको लगता है उस पीड़ा में वो कुछ ध्यान रख पाएगी? अवधूत स्थिति में सब खत्म हो जाता है। कोई इच्छा नहीं, कोई अपेक्षा नहीं। ना राग, ना द्वेष। ना बुरा, ना अच्छा। यहाँ तक कि खोज भी खत्म हो जाती है। खोज भी खत्म हो जाती है। आत्मज्ञान तक की खोज खत्म हो जाती है। वो पूरा खत्म हो जाता है। यही अवधूत स्थिति है। सब कुछ खत्म हो जाता है। यहाँ तक कि जिसके लिए निकला था, वो खोज भी खत्म हो जाती है। यह अवधूत स्थिति है। तो इसलिए यह प्लानिंग की बात नहीं। बस उस स्थिति में आने के लिए काम करते रहो, करते रहो। एक दिन ऐसा आएगा, अवधूत स्थिति बन जाएगी।

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गुरु जी, मेरा प्रश्न है कि आत्मज्ञानी में क्या क्या गुण आ जाते हैं?

आत्मज्ञानी में मुक्ति से मोक्ष तक का रास्ता बताता है। और वो हर पल, हर क्षण संसार के लिए रहता है। हमेशा, हर वक्त, आपको मुक्ति का मार्ग बताएगा। बस यही है।

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जब मैं अपनी स्थिति में कार्य को सही तरीके से कर रहा हूँ, और वहाँ कोई मुझे रोकता है, तो मुझे क्रोध आ जाता है, बहस हो जाती है। मैं अपनी स्थिति को कैसे बनाए रखूँ?

आप उसको उचित तरीके से जवाब दो। अगर कोई क्रोध कर रहा है, तो इसका मतलब उसे लग रहा है कि आप उसके विपरीत कर रहे हो। तो आप सिद्ध कर दीजिए कि आप उचित कार्य कर रहे हो।

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गुरुदेव, जीवन का उद्देश्य क्या बनाना चाहिए, और उस पर कैसे काम करना चाहिए?

जीवन के उद्देश्य को आपको समझना है। आपको अपने आप से प्रश्न करना है कि मेरे जीवन का उद्देश्य क्या है? मेरा जन्म किस लिए हुआ है? यह प्रश्न आपको करना है। देखिए, दो ही रास्ते हैं। एक रास्ता यह है कि पढ़ाई लिखाई करो, शादी विवाह करो, बच्चे पैदा करके अपने जीवन को खत्म कर दूँ। और एक रास्ता यह है कि राग, द्वेष, मोह, आसक्ति, इच्छा, अपेक्षा और मेरा, कर्ता के भाव से मैं कैसे मुक्त हो जाऊँ। ये दो रास्ते हैं। तो दोनों में आपको चुनाव करना पड़ेगा कि मेरा जन्म किस रास्ते के लिए हुआ है। मेरा जन्म वंश को बढ़ाने के लिए हुआ है, बच्चों को पैदा करने के लिए हुआ है, प्रॉपर्टी बनाने के लिए, नाम और सूरत के लिए, पैसे के लिए हुआ है, या मेरा जन्म राग, द्वेष, मोह, आसक्ति, इच्छा, अपेक्षा, मेरा, कर्ता, मान और दिखावा, इनसे मुक्त होने के लिए हुआ है। अब आपको देखना है कि इन दो में से कौन से रास्ते के लिए आपका जन्म हुआ है। इस उद्देश्य को आपको स्वयं समझना पड़ेगा, क्योंकि स्वयं समझोगे तभी आप चल पाओगे।

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गुरुदेव, भगवान में विश्वास कैसे करें? मुझे जरा सा भी भगवान पर विश्वास नहीं होता।

नहीं, भगवान पर विश्वास करने की जरूरत नहीं है। इसलिए कि जिसको आपने देखा नहीं, उसका विश्वास क्या करोगे। विश्वास को छोड़ दो। आप देखिए, जहाँ हो, आप खुश हो क्या? आप अपने जीवन के उद्देश्य को पूरा कर पा रहे हो क्या? वो देख लीजिए। भगवान पर, परमात्मा पर आपको विश्वास करने की जरूरत नहीं है। आपका जन्म किस उद्देश्य से हुआ है? आप जहाँ हो, खुश हो, तब तो ठीक है। खुश नहीं हो, तो कैसे खुश हो सकते हो, वो देखो। बस, बात खत्म।

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गुरु जी, क्या आत्मज्ञान के बाद व्यक्ति को अपने पूर्व जन्म का ज्ञान भी हो जाता है? क्या आप अपने पूर्व जन्म को देख पाते हो?

नहीं। मुझे ना तो देखने की अवस्था है, और ना जरूरत है, वहाँ देखने की, जहाँ से मैं आया हूँ। वहाँ देखने की क्या जरूरत है? क्योंकि आप अगर यहाँ खड़े हो, और पीछे जाकर कुछ देखते हो, तो आपकी ऊर्जा तो लगेगी। जैसे भीष्म पितामह को कितने जन्मों का दिखा दिया कृष्ण भगवान ने, लेकिन ज्ञान नहीं हुआ। कोई मतलब हुआ क्या? लेकिन अर्जुन को ज्ञान हो गया। काश भीष्म पितामह अपने कल्याण के लिए बात करते। उन्होंने पहला जन्म जानकर क्या कर लिया? क्या कर लिया? एक भरोसा उनको हो गया कि यह मेरे कर्मों का परिणाम है। अच्छा, क्या हुआ? कुछ हुआ क्या? नहीं। इसलिए आप यहाँ तक आ गए हो, तो पीछे जाकर क्या करोगे? उसमें भी तो ऊर्जा लगेगी। इसलिए कोई मतलब नहीं है। मुझे अपने पिछले अगले से कोई मतलब नहीं। मुझे इतना पता है कि बस मुझे निकल जाना है। मैंने अपने जीवन में बस इतना सोचा है।

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मैं आपके सानिध्य में रहकर गया हूँ। मेरा स्वास्थ्य ठीक नहीं रहता, अतः मुझे बार बार संसार में लौट आना पड़ता है। मेरे लिए क्या आदेश है?

आप जब स्वास्थ्य ठीक रहे, आ जाया करो। कुछ दिन यहाँ रह के फिर जाओ। कुछ दिन यहाँ रह के फिर जाओ। ऐसा करो।

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जो लोग जुआ और सट्टा खेलते हैं, वे दोनों पक्ष अपनी मर्जी से इस खेल में भागीदारी करते हैं। इसमें हार जीत होती है, और इसके लिए भी दोनों पक्ष स्वयं जिम्मेदार होते हैं। क्या इसे भी बेईमानी कहेंगे?

नहीं, बेईमानी तो नहीं कह सकते। इसे हम बेईमानी नहीं कह सकते। लेकिन मैं यह भी कह सकता हूँ कि जुआ नहीं खेलना चाहिए।

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गुरु जी, अपने आप से कैसे प्रेम करें? थोड़ा और खोलकर समझाएँ।

अपने आप से कैसे प्रेम करें। अगर आप अपने जीवन के उद्देश्य को समझ पा रहे हो, और उस उद्देश्य पर काम कर रहे हो, तो अपने आप से प्रेम है। और अपने जीवन के उद्देश्य को नहीं समझ रहे हो, और उसके लिए काम नहीं कर रहे हो, बस मौज मस्ती कर रहे हो, तो प्रेम नहीं है। सीधी सी बात है।

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गुरु जी, असली गुरु की पहचान क्या है? कृपा करके बता दीजिए।

हर वक्त आपके आत्मिक कल्याण का ही मार्ग बताता रहता है। उसका जीवन पूरी तरह आपके आत्मिक कल्याण के लिए ही लगा रहता है।

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गुरु जी, प्रोफेसर जी के लालच के विषय में क्या अनुभव हुआ? कृपा करके हम साधकों को बताएँ।

यह प्रोफेसर जी बता सकती हैं। आप ही व्यक्त कर दीजिए। लालच बता दीजिए। इस तरीके से व्यक्त कर दीजिए कि समझ में आ जाए। वेस्ट कहाँ जा रहा था? कोई ना कोई तो खा रहा था। वेस्ट कहाँ जा रहा था? अगर वो आपका हिस्सा निकाल के फेंका जाता, आप नहीं खाते और उसको फेंका जाता, तो कह सकते हो कि वेस्ट जा रहा था। वो तो कोई ना कोई यूज कर लेता। और वो आपके लिए नहीं बनता। अगर देखो, तो आप खाते तो और लोगों को मेहनत करनी पड़ती। हर तरीके से देखो, तो आप नहीं खाए, लोगों को ही लाभ हुआ। वेस्ट तो नहीं जाता। हाँ, अगर आपका हिस्सा फेंका जाता, कि आप नहीं खा रहे हो, इसे फेंका जाता। और अगर मैं यह कह रहा हूँ कि फेंका भी जाता, तो वहाँ कीड़े मकोड़े खा जाते। यहाँ वेस्ट कुछ नहीं होता। अब आप व्यक्त कर दीजिए। यह तो बता दीजिए। आप अपनी भाषा में बोलिए।

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गुरु जी, मोक्ष प्राप्त कैसे होगा?

लेन देन से मुक्त हो जाओगे।

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स्त्री जब पीड़ित होती है, तो उसे डॉक्टर के पास ले जाया जाता है। क्या जब मुझे वह पीड़ा होगी, तो गुरु जी के पास मुझे कौन ले जाएगा? क्योंकि उस समय मैं कहीं जाने लायक भी नहीं रहूँगा।

जैसे जगत में बाहर के लोग काम करते हैं, वैसे आंतरिक शक्तियाँ काम करती हैं। कुछ प्रत्यक्ष रूप से, कुछ अप्रत्यक्ष रूप से। जैसे मेरे कार्य में कुछ लोग प्रत्यक्ष रूप से सहयोग कर रहे हैं, कुछ लोग अप्रत्यक्ष रूप से सहयोग कर रहे हैं। तो वैसे ही जब हमें जरूरत पड़ती है, जैसा हमारा कर्म रहता है, कुछ शक्तियाँ प्रत्यक्ष रूप से हमें सहयोग देती हैं, कुछ अप्रत्यक्ष रूप से।

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गुरु जी, किसी पर तंत्र विद्या, तंत्र मंत्र किया गया हो, तो वह कैसे ठीक होगा?

बस ईमानदारी से सत्कर्म अपना लो। बात खत्म। और सत्संग सुनो।

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क्या हम वास्तव में जीवित मनुष्य हैं, या हम केवल उस मानसिक पशु के खोल में कैद हैं, जो विवेक से शून्य हो चुका है, और जिसे अब एक शरीर से दूसरे शरीर में जाने का इंतजार है? यदि मुनि भी भ्रष्ट हो जाए, तो मुक्ति का हिसाब कौन करेगा?

खुद करोगे। मुक्ति और बंधन का हिसाब करने वाला मैं ही हूँ। क्योंकि मैं जहाँ हूँ, अपनी समझ से हूँ, अपने कर्म से हूँ।

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वर्तमान में जो भी कर रहे हैं, उसमें कोई विचार नहीं होता, लेकिन बाद में उस कार्य पर विचार अपने आप होने लगता है। ऐसा क्यों होता है?

कोई बात नहीं। आपने कुछ किया, तो विचार आएँगे। देखना यह है कि उससे होगा क्या। वो कार्य आपको कहाँ ले जाकर खड़ा कर देगा, वो देखना।

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गुरु जी, हमने यहाँ दस एकड़ खेती वाली जमीन कर लीजिए। उसमें हम हर साल चालीस से पचास लाख कमा सकते हैं, आश्रम के लिए। और साधकों को प्रकृति से जोड़कर काम करने को भी मिलेगा।

आश्रम के पास बहुत पैसे हैं, क्योंकि आश्रम के जितने लोग लाभ ले रहे हैं, उतने लोग सहयोग देते हैं। आश्रम के पास वैसे भी कोई कमी नहीं है। आप बस, जो आप कर सकते हो, पर्सनली करो, और इसके बाद आप अपना कल्याण करो। आपका कल्याण जिस में हो, वो काम करो। क्योंकि आश्रम सिर्फ यही काम करेगा। आश्रम का खुद का नियम है। खुद की पूरी प्लानिंग है। पूरा, कि कैसे क्या करना है। यह शरीर छोड़ने के पहले क्या करके तुझे जाना है। सत्य के खोजियों के लिए पूरी प्लानिंग है। तो यह आश्रम किसी बाहरी व्यक्ति की एक भी प्लानिंग स्वीकार नहीं करेगा, क्योंकि यह पूर्णता लेकर आया है। यह पूर्णता लेकर आया है। तो आप सिर्फ इसका लाभ ले लो। और लाभ ले रहे हो, तो इसे धन से पर्सनली जो सहयोग दे सकते हो, वह दो। बस इतना करो। यह पूरी प्लानिंग है, कि मुक्ति के लिए, सत्य के खोजियों के लिए यह मार्ग है, और क्या व्यवस्था दी जाएगी। क्या व्यवस्था करके मुझे जाना है, कि यहाँ रहने वाले, आने वाले, हजारों जिज्ञासु आने वाले हैं। यह मैं बोलता हूँ आप लोगों से। लाखों, करोड़ों लोग इस मार्ग से मुक्ति पाएँगे। तो यह पूरी प्लानिंग है। क्या करके मुझे जाना है, कि सत्य के खोजियों को, यहाँ के जिज्ञासुओं को, यहाँ के साधकों को, कभी किसी के अधीन नहीं रहना पड़ेगा।

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गुरु जी, हमें यह पता होते हुए भी कि जो कर्म कर रहे हैं वह हमारे कल्याण के लिए नहीं है, फिर भी हम अपने मन पर पूरी तरह नियंत्रण नहीं कर पाते। हमें क्या करना चाहिए?

छोड़ दो। अपने आप पर कर लो। क्योंकि काम आपके द्वारा हो रहा है, मत करो। अब करोगे, तो उसका परिणाम भोगने के लिए तैयार रहो।

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पिछली वीडियो, जिसमें ईमानदारी और सत्कर्म के बारे में था, डिलीट कर दी गईं। उन पर आप एक विस्तार से वीडियो बनाएँ। नए और पुराने साधक की मदद होगी।

पुरानी वीडियो में तो ईमानदारी और सत्कर्म के बारे में नहीं है। अभी अभी बहुत वीडियो आ रही हैं। आप देखते रहो, सब समझ में आ जाएगा। मैं हूँ ना। देखो, डिलीट कुछ नहीं किया जा सकता। ऐसा लगता है सामने वाले को कि मैंने डिलीट कर दिया। एक पत्ता गिर गया, तो आपको लगता है पत्ता गिर गया, लेकिन दूसरा आने के लिए तैयार है, क्योंकि वह पेड़ मौजूद है। क्या आपको ऐसा लगा कि मैंने डिलीट कर दिया? नहीं। आपने नहीं डिलीट किया। आपकी ताकत ही नहीं है, क्योंकि पेड़ अभी मौजूद है। वह दूसरा पत्ता देने के लिए तैयार है। क्या आपको लगता है, एक इसका पत्ता तोड़ दोगे तो दोबारा नहीं आएगा? क्या आपको लगता है कि एक डाल काट दोगे, तो वह कई गुना आएगी? एक डाल को काटा, पता नहीं अब उसमें से कितनी शाखाएँ आ जाएँगी। यह आपको भी नहीं पता। तो मेरा वीडियो कोई डिलीट नहीं कर सकता। इसलिए मैं अभी मौजूद हूँ।

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ईमानदारी करने से मुझे किसी ने रोका तो नहीं, पर मैं ही पागल था, जो जिंदगी भर बेईमानियाँ करता चला गया।

इस पागलपन को अब छोड़ दो। इस पागलपन को साथ ना ले जाओ। अब समझ में आया है, अब छोड़ दो।

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लेन देन क्या है, जो मोक्ष में बढ़ा देता है? गुरु जी, कृपया इसके बारे में बताएँ।

ईमानदारी, सत्कर्म, और सत्संग सुनोगे, तो समझ में आ जाएगा कि लेन देन क्या है। क्योंकि लेन और देन, आप जब देते हो, जब बेईमानी करते हो, तो लेन देन बढ़ जाता है। और जब आप ईमानदारी से देते हो, तो सामने वाले की उम्मीद छूट जाती है, और आप भी छूट जाते हो। तो ईमानदारी और सत्कर्म अपनाओ, और ऐसा लेन देन करो, मुक्ति पाओ।

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गुरु जी, शून्य तक की यात्रा का सबसे आसान तरीका क्या है? कृपया बताएँ।

बस, अपने तरीके के चाहिए का त्याग करके उचित तरीका अपनाओ, और आगे बढ़ो। जरूरत में जीना चालू कर दो।

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जब आपका लाइव सत्संग देखता हूँ तो शांत हो जाता हूँ, और उसके बाद फिर मैं अशांत हो जाता हूँ। ऐसा क्यों?

आप पालन नहीं कर रहे। शब्दों को सुनते हो, उसको पालन करो। उसमें जीना चालू करो।

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गुरु जी, कम बोलना, कम सुनना और कम देखना कैसे पूरी तरह संभव हो? कृपया बताएँ।

कम मत देखिए। आप ज्यादा से ज्यादा देखिए, ज्यादा से ज्यादा समझिए। बस सत्संग सुनते रहिए। बस अनुमान मत लगाइए। कम देखोगे, तो कम देखने का भी अहंकार हो जाएगा, कि मैं कम देखने लगा। नहीं। ना कम देखो, ना ज्यादा देखो। जरूरत में जियो।

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गुरुदेव, मोक्ष और आत्मज्ञान में अंतर है क्या?

हाँ। आत्मज्ञान मतलब स्व में स्थिर हो जाना। मोक्ष का मतलब होता है कि आप पूरी तरह लेन देन से मुक्त हो गए।

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आपको सुनते हुए मेरी चेतना में जबरदस्त विस्तार हो रहा है। आपकी ऊर्जा मुझ पर बहुत बरस रही है। जीवन खिला सा हो गया है। पर अभी तक मुझे आपका सानिध्य नहीं मिला। मुझे आप कब बुलाएँगे?

अब जब चाहे आ जाओ। पता दिया गया है। लोकेशन भी दिया गया है। आना आपको है।

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सुनते सुनते लगभग एक साल से प्रेरणा हुई, तभी आ पाया। परिवार के दलदल में ऐसा फँसा हूँ कि चार महीने से आना हो नहीं पा रहा था। एक बार गौतम बुद्ध की तरह बिना बताए चल जाने का मन हुआ, पर आपके वचनों से बिना बताए जाना उचित नहीं लगा। दो बच्चों की शादी करनी है, इसलिए बताकर आया। बड़ा बेटा सपोर्ट कर रहा है, बाकी पत्नी और बच्चे सब खींच रहे हैं। निकलना बहुत कठिन लग रहा था। अब क्या करूँ?

समझ में आ रहा है, तभी तो आए, चल पा रहे हो। उस पर पूरी तरह चल नहीं पा रहे हो। लगभग, मतलब संभावना है, पूरी तरह चल नहीं पा रहे हो। चलो, पूरी तरह चलो। पूरी तरह, हाँ, पूरी तरह चलो। चलो, किसी तरह से प्रयास किए, तो सफल तो रहे। चलो, कोई तो सपोर्ट किया। पूरी तरह लग जाओ। अभी दो बच्चों की शादी करनी है, कोई बात नहीं।

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चेतन और जड़ एक ही हैं, या अलग अलग हैं? जड़ में भी चेतनता है क्या? और जड़ के टुकड़े होते हैं क्या?

इस ब्रह्मांड में जड़ और चेतन कहा गया है। चेतन बोला गया है आत्मा को। आत्मा हमेशा चेतन में आती है, जड़ में नहीं। जड़ में नहीं आ सकती। चेतन, चेतन को चेतन करता है। जैसे मुर्दे से बच्चे पैदा नहीं होते। यह शरीर चेतन है। और यह कब से चेतन है? जब से पृथ्वी पर पहला नर और मादा आया है, तब से इसकी चेतनता गई नहीं है। अगर एक बार इसकी चेतनता चली जाएगी, तो इस शरीर से शरीर नहीं निकलेगा। जड़ मतलब अपने से चल नहीं सकता, उठ नहीं सकता, बोल नहीं सकता। उसको कोई निमित्त चाहिए। और चेतन अपने से चलने लगता है। चेतन जड़ वस्तुओं का उपयोग करके अपने शरीर को बढ़ाता है। जो कुछ ग्रहण करता है, वो जड़ ही ग्रहण करता है, और वह शरीर में जड़ ही हो जाता है। अपने शरीर को बढ़ाता है। तो ये अलग अलग हैं। चेतनता जड़ में भी है। लेकिन जड़ में क्या होता है? उसमें काम भाव नहीं होते। चेतन में पाँचों होते हैं। काम, क्रोध, मद, लोभ, मोह। तो चेतन और जड़ अलग अलग हैं। अब हम चेतन में फँस चुके हैं। अब हमें चैतन्य में होना है। चेतन में हम फँस गए हैं। कैसे? शरीर को हम अपने आप समझ लिए। चेतन क्या है? शरीर है। और मैंने अपने आप को यही समझ लिया। अब इसी रूप को मैं सोच रहा हूँ, इसका नाम हो जाए, शोहरत हो जाए। फोटो कहीं लगा देता हूँ। नहीं, यह रूप पहले नहीं था, बाद में नहीं रहेगा। लेकिन हम इस रूप को सिद्ध करना चाहते हैं, कि यह मैं हूँ। आप कहीं प्रतिमा बना देते हो। अपनी कहीं मूर्ति बनवा दे रहे हो। अपना फोटो लगा दे रहे हो, कि ये मैं हूँ। लेकिन ये ना पहले था, ना बाद में रहेगा। लेकिन तुम यही बताना चाहते हो। तुम यही होना चाहते हो। तुम्हें लगता है, मैं यह हूँ। तो तुम चेतन में फँस गए हो। चेतन में कैसे फँस गए? इसे सिद्ध करना चाहते हो, कि मैं हूँ। आप सिद्ध करने में लगे हो। अब सिद्ध करने के लिए आप अनेक तरह की बेईमानियाँ करते हो। यह रूप पहले नहीं था, बाद में नहीं रहेगा। लेकिन आज तक आप इस रूप को ही सिद्ध करना चाहते हो, कि ये मैं हूँ। तो आप चेतन होकर चेतन में फँस गए। अपने आप को चेतन समझ लिया। चेतन मतलब यह शरीर। अब अपने आप को इससे छुड़ाना पड़ेगा। अब हम एक रूप में इसमें फँसे, और इस रूप को सिद्ध करने के लिए अनेक रूपों में फँस गए। बाहर के रूप से मुक्त होंगे, स्वरूप में आएँगे, तो आत्मा का बोध होगा। इसे आत्मज्ञान कहते हैं। और जब मैं इस रूप से पूरी तरह मुक्त हो जाऊँगा, तब मुझे ब्रह्म का ज्ञान होगा। तो मुझे चेतन से चैतन्य में होना है। चैतन्य ज्ञान की स्थिति है, आत्मज्ञान की स्थिति है। और यह तभी छूटेगा, जब आप इसको सिद्ध करने की लालसा छोड़ दोगे, कि ये मैं हूँ, ये मैं हूँ। यहाँ तक ठीक है, क्योंकि व्यावहारिक जगत में बताना पड़ेगा कि मैं यह हूँ। लेकिन इसे सिद्ध करने में लग गए। इसे छोड़कर जाना चाहते हो, और साथ में यही जताना चाहते हो कि यह मैं हूँ। यह गड़बड़ हो गया। तुम इस रूप के चक्कर में, इस पिंड के चक्कर में फँस गए। और तुम इस पिंड को समझने लगे कि मैं यह पिंड हूँ। यहाँ गड़बड़ी हो गई। तो जड़, चेतन और चैतन्य। आपको चैतन्य में आना है। आप चेतन में फँस चुके हो। अब यह तभी होगा, जब राग, द्वेष, मोह, आसक्ति, इच्छा, अपेक्षा, मेरा और कर्ता के भाव से, और मान की इच्छा से, अपने आप को मुक्त कराओगे। तभी संभव है। नहीं तो नहीं होगा। जब तक आप सिद्ध करने में लगे हो कि मैं यह हूँ, और आप इसे छोड़ के जाना चाहते हो इस रूप को, कि मेरे जाने के बाद भी लोग देखें कि मैं यह हूँ, और उसी को बनाने में लग गए हो, तब तक आपका कल्याण संभव नहीं। तो कुछ बनने और बनाने की इच्छा का त्याग करना पड़ेगा। मान की इच्छा का त्याग करना पड़ेगा। क्योंकि मान के चक्कर में ही तो आप सिद्ध करना चाहते हो कि मैं यह हूँ। आपने देखा ना, वो परी की तरह फोटो निकाल रही थी। तो वो जिस रूप में थी, उसमें खुश नहीं थी। वो बता रही थी, देखो मैं यह हूँ, हवा में उड़ रही हूँ। नहीं, वो अपने आप को सिद्ध कर रही थी। रूप उसका था, कपड़े दूसरे थे। कपड़े पर कपड़ा लगा के अपने आप को सिद्ध करना चाहते हैं। तो जड़, चेतन और चैतन्य। आपको चैतन्य में होना है। और यह तभी संभव है, जब आप पूरी तरह उम्मीद से अपने आप को मुक्त करा पाएँगे। जड़ परिवर्तनशील है। और चेतन, चेतन को पैदा करता है। उससे वैसा ही पैदा हो जाएगा। वो वैसा ही रहेगा, और उसी तरह कई पैदा हो जाएँगे। लेकिन जड़ के टुकड़े होते हैं। चेतनता उसमें भी है, सूक्ष्म रूप में। चेतनता पूरे ब्रह्मांड में है। तो लग जाइए पूरी तरह। अपने आप को देखिए, समझिए। संयम और धैर्य से पूरी तरह लग जाओ। और हाथ उसका पकड़ो, साथ उसी का करो, जो मुक्त अवस्था में हो। क्योंकि जिसका साथ करोगे, वहीं चले जाओगे। तो सूझबूझ और समझ के साथ करो, कि मैं किसका साथ कर रहा हूँ।

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आठ तारीख को जाऊँगा। जो यहाँ तीस दिन में जिया हूँ, उसे अपने जीवन में लगातार जारी रखना चाहता हूँ, पूरी तरह, कोई भूल चूक न हो। जैसे काढ़ा पीते समय चाय कॉफी नहीं ले सकते। बाहर जाकर क्या हम खुद चाय कॉफी पी सकते हैं, होटल में खा सकते हैं?

ऐसा नहीं है कि हम नहीं पीते। हम पीते हैं। हम भी खाते पीते हैं। हम भी होटल में खाते हैं। लेकिन क्या होता है? यह आप साधना करने आए हो। साधना तभी होगा, जब भोजन पर नियंत्रण होगा। घर में एक रोगी है, और सब स्वस्थ आदमी हैं। तो आप देखते नहीं कि रोगी को अलग तरीके का भोजन बनाया जाता है। उसी परिवार में हो। क्यों? क्योंकि रोगी को ठीक करना है। रोगी को ठीक करना है। आप उसी परिवार में हो, रोगी अलग खा रहा है और आप अलग खा रहे हो। उसी रसोई में उसको अलग भोजन बनाया जा रहा है, और स्वस्थ लोगों के लिए अलग। तो अगर आपको निकलना है, तो ये नियम अपनाना पड़ेगा। और निकल गए, तो बात खत्म हो गई। रोगी भी एक दिन अगर ठीक हो गया, तो सबकी तरह वो भोजन करेगा। उसका भोजन अकेले थोड़ी ना बनेगा। तो आप यहाँ से जाके जितना कर सकते हो, करो। वो आपके ऊपर है। एक समय भोजन करो। एक समय भोजन करो। अगर शरीर का काम ज्यादा आपके पास है, तो कोई हल्का नाश्ता कर लेना, नहीं तो चक्कर आने लगेगा। शरीर को उतना पोषण दो, जितना इससे काम ले रहे हो। जैसे गाड़ी में उतना डीजल और पेट्रोल भरवाते हो, जितनी दूर जाना है। अगर आप एवरेज नहीं देखोगे, तो गड़बड़ा जाओगे। तो ऐसे शरीर का एवरेज देखो। देखो, हम गए थे। हम इनके साथ ही गए थे। ये लोग यह नहीं कह सकते कि मुझे कभी भोजन की प्रॉब्लम हुई। क्या आपने मुझे कभी फील किया? मैं तो सिर्फ आपको ही देख रहा था। आप लोगों को देख रहा था, कि भोजन ग्रहण करते वक्त आपका क्या भाव है। पानी पीते क्या भाव है। चलते क्या भाव है। आप क्या कर रहे हो। विदेश छोड़ दो। हम तो आपको ही देख रहे थे। हमारे लिए क्या। आप क्या कर रहे हो। आप खा रहे हो तो क्या भाव है। आप पानी पी रहे हो तो क्या भाव है। आप नहीं खा रहे हो तो क्या भाव है। आप दुकान पर क्या पूछ रहे हो। किस भाव से पूछ रहे हो। ना बोलने पर क्या भाव है। हाँ बोलने पर क्या भाव है। आपका भोजन, जैसा माँगा, मिल गया तो क्या भाव था। नहीं मिला तो क्या भाव था। मैं तो आपको देख रहा था। हम तो हर जगह आप लोगों को देख रहे थे। और आप लोगों से कुछ समय बचा, तो रात को हम कुटिया में देखने लगे। अब इन लोगों ने गलती की, तो किसी ने थोड़ी ना बताया। वो तो मैंने ही पकड़ा। मैंने ही पकड़ा, क्योंकि मैं देख रहा था, कैमरे से क्या हो रहा है। रात को भी उठ के देखूँ, कौन सोया है, कहाँ गया। सब देखता रहता हूँ। तो मेरे पास तो यही है, देखने के लिए। और क्या है? मुझे थोड़ी ना कुछ और देखने के लिए है, क्योंकि जैसा यहाँ, वैसा विदेश। हमारे लिए कुछ अलग थोड़ी ना है। चाहे विदेश हो, चाहे यहाँ हो। हम तो आपको देख रहे थे, हर क्षण, हर पल, कि आपको भोजन मिला तो कैसा फील हुआ, नहीं मिला तो कैसा फील हुआ। आपके मन का मिल गया, कैसा लगा। आपके मन का नहीं मिला, कैसा लगा। आप जब विदेश से आकर उतरकर खाए, तो आप क्या फील कर पाए। हम तो आपको ही देख रहे थे। आपको देखेंगे, तभी तो आपको निकाल पाएँगे। आप थोड़ी ना खुद को देख पाओगे। आपको देख पाएँगे, तभी तो आपकी कमी को दिखा पाएँगे। अगर हम आपको सीधा बोलते कि आपके अंदर लालच है, तो थोड़ी ना मानती आप। हमने इनसे कहना पड़ा। जब आप उधर गईं, तो हमने इनसे कहना पड़ा कि भैया, आप एक काम करो। क्या आपको लगता है, प्रोफेसर जी नाश्ता नहीं करेंगी? बोले, नहीं नहीं, वो नहीं जाएगी। मैंने कहा, जाएगी। तो मुझे कहना पड़ा कि आप बोलना, कि मैं करूँगी, मैं तो जा रही हूँ। नहीं तो आपका लालच निकलता ही नहीं। तब पहली बार तो आपने कह ही दिया कि नहीं, हम तो नहीं खाएँगे, साथ चल सकते हैं। क्योंकि तुम्हें गिराने के लिए। देखो, आप उसे भी नहीं रोक रहे हो। पहली बार आप कितनी चालाकी की, कि मैं तो नहीं गिरूँगी, लेकिन तेरा साथ दूँगी। कितनी दुष्टता है। यह दुष्टता आपको दिखी, आपके अंदर की? नहीं। आपने पहली बार क्या कहा, कि चल, तेरे साथ चलूँगी, तू खा लेना, मैं नहीं। इसका मतलब कि वो खाने से गिरेगा, इसीलिए मैं नहीं। तो पहली बार आपने अपने आप को सँभाला कैसे? नहीं। लेकिन आप यह नहीं देख रहे थे कि कम से कम मैं नहीं गिरूँ, तो इसे भी तो सलाह दूँ कि मत खा। लेकिन नहीं। तू खा, मैं चलूँगी साथ में। अपनी दुष्टता देखिए। इसे दुष्टता कहेंगे। क्योंकि आप पहली बार सचेत थीं। पहली बार सचेत थीं, लेकिन उस सचेतता में इसे नहीं बचा सकीं, कि नहीं, तू भी मत खा। तूने क्या कहा। नहीं, तू गिर, हम तेरा साथ देंगे। मैं तो बच लूँगी। लेकिन कुछ देर बाद तुम्हारी भी बुद्धि भ्रष्ट हो गई, कि चल, तू खाएगी तो मैं भी खाऊँगी। तुझसे मैं कम थोड़ी ना हूँ। मुझे तो बस इंतजार था कि कोई बहाना मिल जाए। तो ऐसे ही हमारी दुष्टता हमारे अंदर बहुत है। उस समय तो आप इसे सलाह तो दे सकती थीं। पहली बार में आप सचेत रहीं, दूसरी बार में आप भी भ्रष्ट हो गईं। अगर पहली बार में आपने कहा होता कि नहीं, तू भी मत खा, तब आपकी सज्जनता रहती। लेकिन देखो, हम कैसे गिराते हैं। साथ भी रहते हैं, और कैसे गिराते हैं, कि तू गिर, हम तेरे साथ हैं। लेकिन तुम्हें यह नहीं पता कि तुम साथ हो, तो तुम भी गिर ही रहे हो। अपनी लालच देखो, अपनी दुष्टता देखो। इसे दुष्टता कहेंगे। हमारे अंदर कूट कूट के भरा हुआ है। यह तो कोई दिखाने वाला चाहिए। हमने इतनी लिपाई पुताई कर दी है, कि अंदर के कचरे को हमने लिपाई पुताई करके अपने आप को इतना सज्जन बना लिया है। बातों से, शब्दों से इतने सज्जन बन गए हैं, कि अंदर की पूरी गंदगी को हमने छिपा दिया। अपनी गंदगी को इतना हमने ढक दिया है, इतनी चालाकी से, इतनी सज्जनता से, कि हमारी गंदगी का पता मुझे भी नहीं है। क्यों नहीं है? पहले तो पता नहीं था। लेकिन हमने ऐसा छिपा दिया कि लोग कह रहे हैं, तुम कितने सज्जन हो। लोग कहते हैं, अरे तुम कितने सज्जन हो। हम उनकी बात मान लेते हैं। मीठा बोलना सीख लेते हैं। तो भैया, मत गिरो। मत किसी को गिराओ। अपना कल्याण करो। किसी को अगर आप उठाने में साथ नहीं दे सकते, तो कम से कम जहाँ वो खड़ा है, वहीं तो खड़ा रहने दो। गिरने में तो साथ मत जाओ। अगर तुम साथ नहीं जाओगे, तो हो सकता है वो भी ना जाए।

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हम दुष्कर्म और अंदर आने वाले विचारों से निकलना चाहते हैं, पर पैर-पैर पर गिरते हैं। ग्रंथों में पढ़ा है कि गुरु हमारे किए हुए सारे कर्म काट देगा और हमें सच्चे मार्ग पर चलाएगा। हमसे बन नहीं पा रहा, इसीलिए गुरु की जरूरत है। हम क्या करें, जब हमसे हो ही नहीं रहा? गुरु किसे मानें, शरीर को या शब्द को? और जब गलत काम होने लगता है, तो क्या वहां गुरु अपनी पावर से हमें हटा लेगा? रस में ऐसे लिप्त हो जाते हैं कि लगता है बुद्धि काम ही नहीं करती।

गुरु शब्द है, शरीर नहीं। गुरु तब कल्याण करेगा, जब आप उन शब्दों पर चलोगे। आप जब शब्दों में जियोगे, तो आपका कल्याण संभव है। सीधी सी बात है। लेकिन आप उन शब्दों को अपनाओगे ही नहीं, तो कोई मतलब नहीं है। जैसे आपको किसी ने रास्ता बताया, या आपने किसी को रास्ता बताया, और उस लक्ष्य तक जाने के लिए बता दिया कि कब, कहां से, कैसे मुड़ना है। लेकिन अब उसने किसी और रास्ते से चल दिया। तो क्या आपका दिया हुआ एक शब्द भी उसके काम का है? नहीं। आपका शब्द, या किसी और का शब्द, काम का तब है, जब वह उसी रास्ते पर चलेगा। जब गुरु ने जितना बताया है, उतना करोगे, तब गुरु की ऊर्जा भी काम करेगी। करना तो घुमा-फिरा के आपको ही है। जब आप करोगे, तब आपकी ऊर्जा भी काम करेगी, और गुरु की ऊर्जा भी आपके ऊपर काम करेगी। जब आप करोगे ही नहीं, तो कोई मतलब ही नहीं है। तो आप उस पर चलो। ईमानदारी किसके बस में है? आपके बस में है। गुरु थोड़ी ना करवाएगा। जब गलत काम होने लगे, तो मत करो। गुरु शब्द है। गुरु ने बोला है कि जब गलत काम हो, तो मत करना। पावर क्या है? जब हमें यही जानकारी मिल गई कि यह गलत है और यह सही है, यही पावर है। यह हमारे बस में है कि गलत ना करें। जब यह जानकारी दे दी गई, तो ऊर्जा क्या है, पावर क्या है? आपको जब यह मालूम पड़ गया कि यह सही है और यह गलत है, तो गलत ना करना आपके हाथ में है। मत करो। और करो, तो उसका परिणाम भोगो। गलत ना करना आपके हाथ में है। बस गलत मत करो, बात खत्म। रस में लिप्त होकर यह मत कहो कि बुद्धि काम नहीं करती, पता ही नहीं लगता। बुद्धि काम कर रही है, तभी रसपान कर रहे हो। बुद्धि काम नहीं करेगी, तो रसपान ही नहीं करोगे। बुद्धि जब काम करती है, तभी रसपान करते हो। बुद्धि नहीं काम करेगी, तो आप कुछ कर ही नहीं पाओगे। एक मंदबुद्धि कुछ कर पाता है क्या? एक बालक की बुद्धि उस स्तर पर काम नहीं करती। उसके सामने सोने की गाड़ी रख दो और एक प्लास्टिक की गाड़ी रख दो, तो कौन सी उठाएगा? प्लास्टिक। क्योंकि उसकी जरूरत वही है। तो रसपान तुम तभी कर पाते हो, जब तुम्हारी बुद्धि काम करती है। अगर बुद्धि काम ना करे, तो आपके सामने संसार का सारा भोग ऐसे पड़ा रहे, आप कुछ नहीं करोगे। जैसे मंदबुद्धि, पागल, उनके सामने कभी देखा है कि वे किसी भोग की तरफ भागते हों? वे कचरे में भी अपना भोजन कर लेते हैं, किसी भी तरीके से भोजन कर लेते हैं। तो रसपान आप तभी करते हो, जब आपकी बुद्धि काम करती है। बुद्धि काम ना करे, तो आप रसपान ही नहीं कर पाओगे। आप पूरे जिम्मेदार व्यक्ति बनिए, और आप गलत मत करिए। अभी भी आपके पास मौका है। आपके पास जानकारी आ गई कि यह गलत है, यह सही है। यह करने से मैं गिरूंगा, यह करने से मैं उठूंगा। तो आप उठने वाला काम करिए, गिरने वाला काम मत करिए। और यह पूरा आपके हाथ में है। आपके कंधे पर कोई बंदूक रख के, कनपटी पर रख के थोड़ी ना कह रहा है कि गलत करो। ऐसा है क्या? आप अपनी कामनाओं में, अपनी इच्छाओं में आकर गलत करते हो। तो आप मत करिए। बहुत साफ-सुथरी बात है।

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संत कबीर दास, दादू दयाल और गुरु नानक ने कहा है कि अपने जीवन में जीते जी मरना चाहिए। साधक के लिए जीते जी मरना क्या है?

साधक के लिए जैसे मुर्दे की कोई इच्छा नहीं होती, कोई कामना नहीं होती। जब आप इस मार्ग में निकल गए, तो अपने आप को जीते जी मरा समझो। जब हम इस मार्ग को समझ गए, तो हमें अपने आप को मरा समझना चाहिए। मरा होने का मतलब है कि पीछे नहीं जाता। मरा हुआ व्यक्ति पीछे नहीं जाता, वह सिर्फ आगे जाता है। इसी को कहते हैं अपने आप को मरा समझना। जीते जी अपने आप को मरा समझ लो। मरा इसलिए समझ लो, कि मरे हुए व्यक्ति की कोई कामना नहीं होती। एक मरा हुआ व्यक्ति हो, उसके सामने सारा भोग रख दो, वह करेगा क्या? तो अपने आप को इस मार्ग में मरा हुआ समझ लो, तब आप आगे निकल जाओगे। और मरा हुआ नहीं समझोगे, तो अपने सारे पिछले संबंध निभाते रहोगे, और उसी में फंसते रहोगे, आगे जा ही नहीं पाओगे। जीते जी मरना मतलब अपने आप को इस समझ से देखना, कि भैया मैं मर गया, अब इस मार्ग में जा रहा हूं। मेरी कोई कामना नहीं है। अब मैं कोई भी वासना, कामना, यह सब त्याग करता हूं। मैं कोई बेईमानी नहीं करूंगा। बस मैं इसी मार्ग पर चलूंगा, जिस मार्ग के लिए मैं निकला हूं।

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नाम जप साधक के लिए क्या काम करता है? मैंने पढ़ा है, अनुभव नहीं है। क्या नाम जप गलत कामों से बचाता है? संतों ने कहा है कि आत्मा नीचे धंसी पड़ी है, ऊपर आकर तीसरे तिल, आज्ञा चक्र पर आती है, और वहां परमात्मा में लीन हो जाते हैं। गुरु नानक देव जी बार-बार नाम जपने को कहते हैं। नाम, शब्द क्या है?

गुरु नानक जी बता चुके हैं ना। क्या वे पूरा बता के नहीं गए? क्या उन्होंने मेरे लिए छोड़ दिया है? क्या गुरु नानक जी ने मेरे लिए यह छोड़ दिया है कि नाम जपो, नाम जपो, और नाम हमारे लिए छोड़ दिया कि तुम आकर सबको बता देना कि नाम ऐसा होता है? जब आप गुरु नानक को सुन रहे हो, तो गुरु नानक को पूरी तरह सुनो। गुरु नानक जी अगर बोलें नाम जपो, नाम जपो, तो नाम जप भी बताए होंगे। ऐसा तो नहीं कि मेरे लिए छोड़ गए हैं, कि तुम आना और सबको नाम जप देना। वे शब्द डिस्चार्ज हो चुके हैं। उस शब्द को चार्ज करने के लिए कोई पूर्ण गुरु चाहिए, तो उसको ही क्यों चार्ज कर रहे हो? जब मैं शब्द कुछ लेकर आया हूं, तो उसको ले लो ना। तरीके अलग भी हो सकते हैं, पर है वही। मैं उनके शब्द चार्ज करूं, या मेरे अंदर से जो शब्द आ रहे हैं, वे दूं? जो आपके सामने शब्द है, आप उस पर चलो ना। एक व्यक्ति से आप पता पूछ रहे हो, और उसने आपको पता अच्छे से बता दिया। और आप कह रहे हो कि नहीं, एक जन ने मेरे को और पता बताया था। तो उसका समय क्यों बर्बाद कर रहे हो? आपसे कोई पता पूछे, और आपने बड़ी ईमानदारी से पता बता दिया, और वह कहे कि नहीं, उन्होंने तो इस तरीके से बताया था। तो आप क्या करोगे? अपना काम करोगे, या उसको समय दोगे? जिसने बताया, उसके बताए पर मैं काम करूंगा। आपने किसी व्यक्ति को रास्ता बताया, और वह आपकी बात सुनने के बाद बोले कि मेरे को और लोगों ने भी रास्ता बताया है, और आपको सुनाने लगे। तो क्या आप खड़े होकर सुनोगे? ऐसा मत करो, कि आपको भी भगाना पड़े। इस बात को समझो। पहले मैं सोलह-सोलह, अठारह घंटे सत्संग करता था। लेकिन लोग समय पास करते थे। कुछ भी पूछते थे, कोई मतलब ही नहीं था। इसलिए अब मैंने सत्संग करना एकदम कम कर दिया। पहले के वीडियो देखो। यहां लोग रहते थे, उन्हें पता है। सोलह-अठारह घंटे में आदमी सोता क्या था। खुद बनाता था, खाता था। अभी भी बनाता हूं, खा रहा हूं। लेकिन लोगों ने ऐसे ही टाइम पास किया, तो हमने सत्संग कम कर दिया, जितना कम हो सके। कल तुम जाने वाले थे, और कुछ लोग थे, इसलिए मैंने आज ले लिया। नहीं तो मेरी इच्छा नहीं थी। क्योंकि वही फालतू के लोग प्रश्न करते हैं, टाइम पास के। अगर आप मूल पर बात करो, बस। कुछ ना कुछ बकना नहीं है। हमें एक ही प्रश्न पूछना है, जितना हमारा प्रश्न है, क्योंकि मुझे जाना है। अगर गुरु नानक जी के शब्दों से जा रहे हो, तो जाओ, और किसी से मत पूछो। नहीं तो मिक्स हो जाएगा सब। और अगर आपको कोई मिला है, तो उसका पूछो। और जिसका आपको समझ में आ जाए, वो शब्द ले चलो। तुम्हें इस भवसागर को पार करना है। आपको आत्मिक कल्याण करना है। हमें कोई व्यक्ति विशेष को नहीं पकड़ना है। हमें शरीर को नहीं पकड़ना है। हमें शब्द ले चलना है, जिसका शब्द समझ में आ जाए। भाई, आपको दो लोग पता बता रहे हैं। एक की भाषा समझ में आ गई, वह आपकी भाषा में, ठेठ बता रहा है। और एक का समझ में नहीं आ रहा है। तब क्या करोगे? क्या कहोगे कि नहीं, इसी का कोई और समझाए? हमें तो अपनी जगह पर पहुंचना है ना। हमें कहां पहुंचना है? अपनी जगह पर पहुंचना है। हमें भाषा समझनी नहीं है, हमें जगह पर पहुंचना है। तो अगर मैं आपको बता रहा हूं, कर्म के सिद्धांत को समझो। जैसा आप करोगे, वैसा बनते चले जाओगे।

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एक संदेह है। आपने कुत्ते क्यों रखे हैं?

कुत्ते इसलिए रखे हैं, क्योंकि कुत्ते हैं, इसलिए रख लिए हैं। जानवर हैं, रख लिए हैं। यहां क्या है? तेंदुआ वगैरह आते हैं। तो साधकों के लिए एक तरह की सुरक्षा है। पूरा जंगल है। आप आसपास देख रहे हो, माहौल कैसा है? पूरा घना जंगल है। तो एक सुरक्षा है। और सबसे वफादार, मानव का अगर कोई होता है, तो यह कुत्ता है। इसलिए रखे हैं, एक सुरक्षा के तौर पर।

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दूसरा संदेह यह है कि आपने मिस्त्री को डांटा। डांटने से मेरे अंदर संदेह पैदा हो गया कि गुरु ऐसे डांटते हैं। वह अच्छा नहीं लगा। गुरु को ऐसा क्रोध क्यों करना पड़ता है?

डांटेंगे नहीं, तो काम नहीं करेगा। पैसा देता हूं। फ्री में थोड़ी ना करवाते हैं काम। शौचालय बन रहा है। लोगों को बाहर जाना पड़ता है। अभी बारिश आ जाएगी, तो कैसे क्या होगा। फिर ये सब आए हैं, आप लोग आए हैं। किसके भरोसे आए हैं? मेरे भरोसे ना? तो यहां की व्यवस्था अगर नहीं रहेगी, तो आपको प्रॉब्लम नहीं होगी? आप बताओ, क्या करें? उसकी आरती-पूजा करें? क्या करूं? आप ही बताओ। उसको पैसा दे रहा हूं, समय-समय पर पैसा दे रहा हूं। वो हमारे काम को कितना टाइम लगा दिया है। ये लोग देख रहे हैं। तो क्या करूं? अभी बारिश आ जाए, तो लोगों को बाहर जाने का कहां से, कैसे जाएंगे। और फिर कितनी प्रॉब्लम होगी इन लोगों को। ये लोग तो मेरे भरोसे यहां पर हैं ना। जब काम करोगे, तो बहुत कुछ करना पड़ता है। और जब नहीं करोगे, निठल्ला रहोगे, तो एकदम सज्जन बन के जी सकते हो। जब आपको कुछ नहीं करना है, तो सज्जन रह सकते हो। मुझे सज्जन नहीं बनना है, और ना मुझे दुर्जन बनना है। मैं अपने काम के लिए कुछ भी कर सकता हूं। उससे मेरा व्यक्तिगत कुछ थोड़ी ना है। मैंने वो काम दिया है, और मैं उसका पैसा देता हूं, तो मेरा काम समय पर होना चाहिए। अगर गलती मेरी हो, तो बात अलग है। अगर मैं समय पर पैसा दे रहा हूं, और वह हमेशा कहता है कि इतने दिन में कर दूंगा, इतने दिन में कर दूंगा, तो आप बताओ, परेशानी लोगों को होगी। ये लोग हमारे भरोसे आते हैं। आप हमारे भरोसे आए। आज यहां ऐसी व्यवस्था है, तभी शांति से रह पाए। अगर यह नहीं होता, कंबल नहीं होते, चटाई नहीं होती, भोजन नहीं होता, तो आप कैसे रहते? दो दिन रहना कितना भारी पड़ता? पड़ता कि नहीं पड़ता? तो इसके लिए काम करना पड़ता है। जब काम करना पड़ता है, तो गुस्सा भी करना पड़ता है। हो सकता है मारपीट भी करनी पड़े। आज हमारे देश के क्रांतिकारियों की बात करो। क्या उन्होंने गुस्सा करके कितनों की हत्या की? लेकिन आज वो पूजनीय हैं कि नहीं हैं? किसके लिए की? देश के लोगों को बचाने के लिए की। लेकिन उस बचाने में किसी को मारना भी तो पड़ा। देश को बचाने में, देशवासियों को बचाने के लिए, किसी को मारना भी तो पड़ा। अब लोग बोलते हैं, हम तो सज्जन हैं, मारे क्यों? तो फिर क्या हम ऐसे ही खड़े होते? कहीं गुलामी की जंजीर में जकड़े होते, गुलामी करते होते। तो भाई, जब काम करना पड़ता है, तो बहुत कुछ करना पड़ता है। ये बातों से बात नहीं बनती। आप निठल्ले बन जाओ। सज्जन हो जाओ। कुछ मत करो। आपको क्रोध करने की जरूरत पड़ेगी क्या? अगर आपको कुछ ना करना हो, तो क्रोध करने की जरूरत नहीं। जब आप कुछ करोगे, तो उसमें संघर्ष होगा। लोग मिलेंगे, तो क्रोध करना पड़ेगा, क्योंकि वे क्रोध पर ही काम करने वाले हैं। मैं अपने काम के लिए कुछ भी कर सकता हूं। यह पिल्ले भी इसीलिए पाले हैं। ये भी सुरक्षा के मामले में काम आते हैं। ऐसे थोड़ी पाले हैं। क्रोध वाली बात समझ में आ गई? करना पड़ता है। जब काम करना है, तो करना पड़ता है। काम नहीं करना है, तो ऐसे ही पड़े रहो। तब तुम्हें गुस्सा करने की कोई आवश्यकता ही नहीं है। आज देखो, इतना सब जल रहा है। कितना लाइट का बिल आएगा, कितना खर्च है। ऐसे ही चल रहा है क्या? लोग बड़ा आसानी से लिख देते हैं, आपको पैसे की क्या जरूरत है? मुझे जरूरत नहीं। लेकिन आज इतनी यहां व्यवस्था फैल रही है। कल ही प्रोफेसर जी से बात हो रही थी, कि यह जितना फैलेगा, उसके पीछे उतना खर्च भी तो फैलेगा। जितना फैलाव होगा, एक बल्ब जलेगा तो एक बल्ब का बिल आएगा। दो होंगे तो दो का आएगा। जितना बढ़ता जाएगा, बिल भी बढ़ता जाएगा। यह जितना फैल रहा है, उतनी मानसिक मेहनत बढ़ती जाती है। शारीरिक मेहनत तो मैंने कर ली। मानसिक मेहनत बढ़ती जाती है। जैसे घर के सारे सदस्य बड़े आराम से सोते हैं, लेकिन गार्जियन से पूछो, उसकी क्या हालत है। वैसे ही आश्रम चलाने वाले को पता है, उसकी क्या हालत है। यह कहना बड़ा आसान है, आपको क्या चाहिए, आपको क्या जरूरत है। हमें जरूरत नहीं। लेकिन हम कुछ कर रहे हैं, उसमें तो जरूरत है। इसलिए लोगों से कहता हूं कि भाई, जितने लोग मेरे काम का उपयोग करते हो, धन की सेवा दो। नहीं तो मेरे काम का उपयोग करना बंद कर दो। तब काम फैलेगा ही नहीं, और जरूरत ही नहीं होगी। तो हमने उसको काम के लिए डांटा। और मैं अपनी जगह सही था, क्योंकि मैं उसे समय पर पेमेंट करता हूं। मैं फ्री में काम थोड़ी ना ले रहा हूं। ऐसा नहीं कि तू सेवा करेगा, तू इतना कम कर दे, आश्रम है। मैं आपको बताऊं। एक दिन सामान लेने धामनौत, यही जगह है, एक व्यक्ति आया था। सामने वाले ने उसे कुछ चार सौ रुपए दिए थे। मुझे भाड़ा कम लगा। मैंने दो सौ रुपए उसे अपनी जेब से दिए। और मैंने फोन करके उस दुकानदार से कहा कि मैंने दो सौ इसे एक्स्ट्रा दिए। क्यों दिए? क्योंकि वह भूल में आ गया था। उसे पता नहीं होगा। रास्ता ऐसा खराब है। चार सौ तो पास से ही लोग लेते हैं। वह दूर से आया था, तो मैंने दो सौ दिए। मैंने उससे पूछा, कितना ज्यादा चाहिए? उसने बताया, तो मैंने दो सौ दिए। तो मैं गलत ना करता हूं, ना सहता हूं। उसके लिए चाहे मुझे मारपीट करनी पड़े, तो मैं तैयार हूं। और जब से मैं यहां हूं, तब से मेरा सत्संग भी चलता है, मैं आश्रम का काम भी करता हूं, व्यवस्था भी करता हूं, और झगड़े भी चलते रहते हैं। ऐसे थोड़ी ना है कि यहां कुछ नहीं होता। पुलिस की गाड़ी आकर गई। कितनी धमकियां आकर गईं। जान से मारने की धमकी आकर गई। यह सब चल रहा है। तुम तो कुछ नहीं देखे। तुम तो यह डांटना देखे। यहां तो इसको तोड़ने के लिए क्या-क्या, कितने लोग आए। पुलिस की गाड़ियां आईं। जान से मारने की धमकी मिली। बहुत कुछ होता है, जब आप कुछ काम करोगे तब।

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गुरबानी कहती है कि अगर परमात्मा बीच में खड़ा है, तो सेवक का कुछ नहीं होने देगा, चाहे दुनिया कुछ भी करे। तो क्या विरोध की जरूरत नहीं? गुरु अर्जुन देव जी को जहांगीर ने तवे पर बिठा दिया, ऊपर से रेत डाली गई, उन्होंने विरोध नहीं किया। संत को प्रेम से रहना चाहिए, या गलत का विरोध करना चाहिए? और जो मिस्त्री था, वह नशे में भी था।

इन्हीं बातों पर ना अपना देश गुलाम बन गया। मंदिरों को लूट के चले गए, और लोग ऐसे खड़े रह गए। क्यों? वो भगवान उठ के मंदिर से सबको मार नहीं दिया। अंग्रेजों से कौन छुड़ाया? कोई देवी-देवता आया था? तैंतीस करोड़ देवी-देवता आए थे क्या? मंदिरों को लूटा गया, देवदासियों के साथ कितने लोगों पर दुष्कर्म हुआ। कौन देवता निकला मंदिर से? इस धरती का राक्षस भी मनुष्य है, देवता भी मनुष्य है, और महापुरुष भी मनुष्य है। अच्छा बताओ, बचाना चाहिए कि नहीं बचाना चाहिए? सब सेवक तो थे। सब ऐसे लाइन से मारे गए। क्या हो गया? इतिहास में है ना? जब बाबर ने हमला किया था, गुरु नानक देव जी उस समय थे। गुरु नानक देव जी ने प्रेम भाव से कोई विरोध नहीं किया। उन्होंने देखा, हमला हुआ। मर्दाना जी साथ थे। लोग मारे गए। वहां गुरबानी भी कही गई है। लेकिन उनका कहना यह था कि जो हुआ है, करता करने वाला है। यह होना ही था, तो यह होना था। जब यह होना है, तो सामने वाले का भी करना होना है ना? एक तरफ का होना है, तो जो अपने बचाने के लिए प्रयास कर रहा है, जो मार रहा है, वह भी तो होना है। एक का होना है और दूसरे का नहीं होना है, ऐसा नहीं। जब होना है, तो सब होना है। संतों के हिसाब से शायद नहीं होना चाहिए, क्योंकि संत प्रेम से भरे होते हैं, वे क्यों उतरेंगे। तो जाओ, ऐसे संत ढूंढो। मैं ऐसा नहीं हूं। मैं तो बड़ा खतरनाक हूं। राम को गुस्सा नहीं करना पड़ा? कृष्ण को कितनों को मारना पड़ा? कृष्ण संत नहीं थे क्या? योगी नहीं थे? उन्होंने कितनों को मार दिया? अर्जुन ने कितनों को मार दिया? अर्जुन ज्ञानी नहीं थे? गुरु गोविंद सिंह जी ने भी मारा। उन्होंने क्यों मार दिया? फिर वे संत नहीं थे क्या? संत किसे कहते हैं, पता है? गलत होने पर उसका विरोध करे, और उस गलत को हटाए, उसके लिए लड़े, वो संत है। कपड़ा पहनने से, दाढ़ी रखने से, बाल रखने से कोई संत नहीं हो जाता। कर्म संत का होना चाहिए। संत का मतलब है किसी को बचाए, किसी की आत्मिक उन्नति करे, किसी कमजोर की सहायता करे। ऐसा नहीं कि गलत हो रहा है और ऐसे पड़ा रहे, और उसे संत कह दो। तो आपके हिसाब से फिर गुरु गोविंद सिंह या कृष्ण भगवान संत नहीं थे क्या? जरा अपनी समझ का उपयोग करो। किसी ने कुछ कहा है, तो किस स्थिति में कहा है, वह देखो। कब कहा है, क्यों कहा है। देश, काल, स्थिति, परिस्थिति अलग होती है। ऐसे वाणी पकड़ कर, जैसे आपने कहा कि बस प्रेम से हो जाना चाहिए। इसे नपुंसकता कहते हैं। और इसी से हमारा देश गुलाम हो जाता है। कि भैया, प्रेम से होगा, कुछ बोलो मत। दूसरा आया, क्या-क्या कर्म करके चला जाता है, और हम देखते रहते हैं कि हमें तो प्रेम से जीना है। हमें तो यही सिखाया गया है, अहिंसा, अहिंसा परमो धर्म। नहीं भाई। अहिंसा परमो धर्म का मतलब है हिंसा नहीं करनी है। लेकिन अगर मेरे ऊपर भी कोई हिंसा कर रहा है, तो उसे रोकना है। आत्मरक्षा। और उस आत्मरक्षा में उसे मार भी देना है। अगर वह बातों से मान गया, तो ठीक है। नहीं माना, तो उसे मार देना है, क्योंकि आत्मरक्षा सर्वोपरि है। गुरु अर्जुन देव जी ने क्या किया, क्या नहीं किया, वह छोड़ दो। अब मेरा इतना समय बर्बाद मत करो। मैं तो कल जाने वाला था, इसलिए आया। यह सब जाकर किसी सिख गुरु से पूछो। वे आपको बहुत अच्छे से समझा देंगे। आप पंजाब चले जाओ। वहां सिख गुरु बहुत हैं। जाकर उनसे पूरा पूछो कि उन्होंने ऐसा क्यों नहीं किया, क्यों किया। वे सारी बात बताएंगे। अगर मैं उनके बारे में बताऊंगा, तो मैं क्या बताऊंगा? मुझसे अपने बारे में पूछो। मेरे बारे में पूछो। इस आश्रम के बारे में पूछो, इस कुटिया के बारे में पूछो। और अगर आपको उन सब के बारे में जानकारी चाहिए, तो पंजाब चले जाओ, और खूब जानकारी लो। वहां सिख गुरु खूब हैं, आपको अच्छे से समझा देंगे। मैंने अभी कुछ देर पहले इसीलिए यह बात समझाई, क्योंकि उसका कोई मतलब भी नहीं है। वे किस स्थिति में थे, उन्हें क्या करना था, कि वे चुप रहे, जवाब नहीं दिया। वह तो वही बता सकते हैं, या उनके लोग बता सकते हैं, क्या परिस्थिति रही होगी। जैसे कृष्ण भगवान ने बहुत लोगों को मारा, लेकिन एक जगह भाग भी गए। भाग किस लिए गए? क्योंकि उनको शाप था, मार सकते नहीं थे। तो वे वहां गए, फिर वह जल उठा। किस स्थिति में उन्होंने नहीं बोला होगा। देश, काल, स्थिति, परिस्थिति अलग है। लेकिन अपने को इतना समझना है, कि गलत करना नहीं है, और गलत सहना नहीं है। हमारे लोग जितने भी हैं, हम जिसके पास गए, या हमारे पास कोई आया है, तो उसकी रक्षा करना ही संतता है। संत को यह मत समझ लेना कि दाढ़ी बढ़ गई, बाल बढ़ गए, कहीं कुटिया बना ली। ऐसे बहुत भगोड़े रह रहे हैं। मैं बारह साल पागल की तरह घूमा। ऐसे कितने भगोड़े कुटिया बना के रह रहे हैं, खा-पी के पड़े हैं। उनको कोई मतलब नहीं। उनसे पूछो, जीवन का उद्देश्य क्या है? बस भजन। भजन क्या है? बस हरि नाम। खा-पी के पड़े रहो, राम-राम करते रहो। ऐसे भगोड़े लाखों की संख्या में हैं। मैं बारह साल घूम के यही देखा। आप घूमो, भ्रमण करो, तब पता चलेगा। और जब काम करना है, तो काम सिर्फ प्रेम से नहीं होता। काम के लिए सब कुछ करना पड़ता है। जब किसी काम को परिणाम तक ले जाना है, जब किसी पौधे को वृक्ष तक ले जाना है, तो पता नहीं उस वृक्ष तक पहुंचाने में कितने जीवों की हत्या करनी पड़ेगी। किसान लोग किसानी करते हो? फसल में कितने जीव की हत्या होती है? फसल क्यों डालते हो? उपदेश फसल पाने का है, कीट मारने का नहीं। लेकिन मार तो रहे हो। किस लिए मार रहे हो? कीड़े को कीड़े के लिए मार रहे हो? नहीं, फसल के लिए। वैसे ही जब कोई काम करोगे, तो लड़ाई-झगड़ा सब करना पड़ेगा। अगर कोई फसल नहीं बोता, तो क्या उसे जीव मारने की जरूरत है? नहीं। लेकिन अगर कोई किसान है, और आप उससे कहो कि फसल में कीड़े क्यों मारते हो, तो वह क्या करेगा? कीड़े लग गए और मारे नहीं, तो क्या करे? फसल बिगड़ जाए, बर्बाद हो जाए। उसे स्प्रे मारना ही पड़ेगा। नहीं तो वो मरे, उसका परिवार मरे। फसल उसकी है। उसने अपने लिए लगाई है, कीड़ों के लिए थोड़ी लगाई है। और जो किसान नहीं है, कुछ नहीं बोता, वह रास्ते से निकलते हुए गालियां देता है, देखो यह कितने जीवों की हत्या कर रहा है। लेकिन तुम्हें क्या मालूम? तू उस जगह होता, तो तू भी यही करता। आप उस जगह पर होकर देखो, करके देखो। तब समझ में आएगा कि करना क्या होता है। मैं कहीं दूर से देख रहा हूं। ना उसके भाव को समझ पा रहा हूं, ना उसके उद्देश्य को समझ पा रहा हूं। वह नशे में था, यह बात छोड़ो। वह क्या था, क्या नहीं था, छोड़ो। आप जब उस जगह पर होगे, तब समझ में आएगा कि क्या होता है। वह वहां है, मैं यहां हूं। अंदर से भी, बाहर से भी, तब वह गलत लग रहा है। जरा वहां जाओ, तब समझ में आएगा कि किस तरीके से क्या काम करना पड़ता है। और पाओगे कि यह तो बहुत सही है। किसी काम को परिणाम तक ले जाना इतना आसान नहीं है।

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ईमानदारी की बात तब कठिन हो जाती है, जब स्थिति आती है। मान लो एक सरकारी विभाग है। सिस्टम चलाने के लिए कहीं ना कहीं बेईमानी में शामिल होना पड़ जाता है। परिवार भी चलाना है, आदमी उसी नौकरी पर निर्भर है। सरकार तो तय तनख्वाह दे रही है, पर आदमी सिस्टम के बीच में पिस जाता है। तब क्या करे?

इस्तीफा है। मैं आपको सीधी बात बताता हूं। इसमें ज्यादा समय बर्बाद नहीं करेंगे। आत्मिक कल्याण की बात करो। हमें ईमानदारी से काम करना है, और उतनी सैलरी मुझे मिल रही है। सिस्टम कभी बेईमानी नहीं करता। सिस्टम में बैठने वाले लोग बेईमान होते हैं। अगर बैठने वाला कह रहा है कि बेईमानी करो, तो आप बोलो, हम तो नहीं करेंगे। हमारे पास इस्तीफा है। फिर उस नौकरी पर घर क्यों टिका हो? जितने लोग दुनिया में जी रहे हैं, क्या सबकी सरकारी नौकरी है? तुम्हारी सरकारी नौकरी है, इनकी भी सरकारी है, इनके पिताजी की सरकारी थी, तुम्हारे पिताजी की थी। तब बताओ, तुम्हें कैसे पाल लिया? बेईमानी करोगे, तो उसका परिणाम तुम्हें मिलेगा। तुम्हारे हाथ में इस्तीफा है। बहुत काम है, वह करो। और नहीं, तो बेईमानी का परिणाम तुम्हें भोगना पड़ेगा। उससे कोई बचा नहीं पाएगा। सीधी सी बात है।

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यहां सात दिन ऐसे ही साधना होती है, या कोई और विधि भी है?

नहीं। यही है, ऐसे ही। यहां सात दिन रहो, चाहे सात साल रहो, चाहे सत्तर साल रहो, ऐसे ही। यही यहां का सिस्टम है, और इसी में कल्याण छिपा हुआ है। इसलिए कि बाहर से यहां कुछ जमा नहीं होता। बाहर परिवर्तनशील संसार है। पिछला तुम्हारा खत्म हो रहा है, आगे तैयार नहीं हो रहा है। तो एक समय ऐसा आएगा कि आप अपनी मूल स्थिति में पहुंच जाओगे। यहां से दोबारा संसार में जाओ, तो वहां फिर से मत जमा करना। जितना बताया गया है, उसी में जियो। ईमानदारी, सत्कर्म और सत्संग। बस यही करो, और सुनो।

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कीटनाशक दवाओं से कीट मारे जाते हैं, और वही अन्न हम भी खाते हैं, उनका परिवार भी उसी पर चलता है। कीट मारने का दोष हमें भी लगता है क्या?

नहीं लगता। इसलिए कि उसने फसल बोई। पहले किसने फसल बोई? उसने बोई। उसने अपने लिए बोई। आप आकर खा रहे हो। और वह बचाने के लिए मार रहा है, सीधा मारने के लिए नहीं मार रहा। सही है। करे क्या? और ऑप्शन क्या है?

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दवाई को अंतिम अवस्था तक ले जाने से पहले खरगोश, बंदर जैसे जीवों पर प्रयोग होते हैं, और उनकी मौत बड़ी दर्दनाक होती है। फिर वही दवाई बाजार में आकर हम भी खाते हैं। क्या उसका दोष हमें भी लगता है? यह आधुनिक बात है, शास्त्रों में नहीं मिलती। आदमी करे क्या?

हां, बिल्कुल मैं उस बात को मानता हूं। यह बात सही है कि खरगोश, बंदर, ये सब मारे जाते हैं, और उनकी मौत दर्दनाक होती है। मन को कष्ट होता है कि दवाई मैं भी ले रहा हूं, तो दोष का अंश मुझे भी मिलना चाहिए। कोई बात नहीं। अब मिले तो मिले। अब क्या करोगे? अब जीने के लिए। जैसे किसी जीव को फोड़ा हो जाए, उसमें अनेक कीड़े पड़ जाते हैं। उन कीड़ों को अगर नहीं मारोगे, तो वह फोड़ा ठीक नहीं होगा। एक जीव को बचाने के लिए लाखों जीव मारे जाते हैं। जीते-जागते मारते हैं। फोड़ा हमें भी होता है, जीव-जंतुओं को भी होता है। मारना ही पड़ेगा।

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अहम भाव को पूरी तरह कैसे खत्म करें? आपने कहा था कि दूसरों से अपने हिसाब से काम लेने की उम्मीद छोड़ दो, उससे आधी समस्या हल हुई। पूरी तरह अहम कैसे मिटे? काम, क्रोध, मद, लोभ, मोह में काम किसे कहते हैं, कामना को या वासना को? मोह और लोभ किस स्थिति में होते हैं? इन्हीं दो पर सबसे ज्यादा संदेह रहता है।

काम, क्रोध, मद, लोभ, मोह। काम का मतलब सिर्फ शरीर का संबंध नहीं है। काम का मतलब होता है कोई भी कार्य। लोगों ने काम का मतलब बस शरीर के काम को दे दिया है। लेकिन ऐसा नहीं है। काम का मतलब कोई भी काम है। मेरे द्वारा कुछ भी हो रहा हो, अपनी कामना पूरी करने के लिए, या किसी और की कामना पूरी करने के लिए, या किसी और की इच्छा पूरी करने के लिए, उसे काम कहा गया है। फंसते हम तब हैं, जब हम अपने तरीके से करते हैं। अगर हम कोई भी काम ईमानदारी से, उचित तरीके से करें, तो हम कभी फंस नहीं सकते। हमारे द्वारा कोई भी कार्य हो, चाहे वह संबंधी के साथ क्यों ना हो। अगर हम सामने वाले के विरोध में कर रहे हैं, तो पाप है। चाहे वह खुद की स्त्री क्यों ना हो। यह बहुत सूक्ष्म बात है। अगर हम जबरदस्ती किसी के साथ करते हैं, उसकी भावनाओं को मानसिक पीड़ा दे रहे हैं, तो वह गलत है। वह भी एक बेईमानी है। और अगर उसकी सहमति से कर रहे हैं, उसमें हम बेईमान नहीं हैं, तो दोष नहीं है। इसलिए राम ने भी शादी की, तो बच्चे पैदा हुए। कृष्ण ने भी किया। गुरु नानक के भी दो लड़के थे। कितने महापुरुष हुए। लोगों ने क्या किया? काम इसी को पकड़ लिया, और इसी को सबसे गलत ठहरा दिया। लोगों के दिमाग में यह डाल दिया है कि यही सबसे गलत है, और लोगों की मानसिकता बन गई है। लेकिन ऐसा नहीं है। आप अगर छीन के किसी का भोजन भी कर रहे हो, तो वह भी पाप है। निस्संदेह। आप कोई भी काम ईमानदारी से करो। बस। कोई भी काम। अहम तब उठता है, जब लगता है कि मेरे विरोध में कोई जा रहा है। ऐसे नहीं उठेगा। जब मुझे लगेगा कि मेरे तरीके से नहीं हुआ, मेरे विरोध में कोई जा रहा है, तब अहम अहंकार का रूप ले लेता है। अहंकार कब होता है? जब हम किसी को दबाते हैं। मद मतलब अहंकार। क्रोध अलग है। क्रोध अहम नहीं है। यह मत समझना कि आप किसी पर गुस्सा करते हो तो अहम है। नहीं। उसके पीछे आपका भाव क्या है, वही मुख्य है। अगर क्रोध आप सामने वाले के हित के लिए कर रहे हो, तब तो उसका भी स्तर उठेगा, आपका भी उठेगा। और अगर आपने क्रोध उसे दबाने के लिए किया, तो वह क्रोध अहम बन गया। तो किसी को दबाने के लिए कभी भी गुस्सा मत करना। दबाने के लिए गुस्सा कभी नहीं। यह तो क्रोध वाला एक पहलू हो गया। दोनों स्थिति में क्रोध ही दिखता है। अहम करोगे तो भी क्रोध दिखेगा, और क्रोध करोगे तो भी क्रोध दिखेगा। इसलिए गहराई से समझो। मद, लोभ, मोह जब हटेंगे, तो आपको आत्म का ज्ञान होगा, मतलब खुद का ज्ञान होगा। और जब आपके अंदर से काम और क्रोध पूरी तरह हट जाएंगे, तो ब्रह्म का ज्ञान होगा। मैंने कहा था, तब से मेरे मद, लोभ और मोह, ये तीन हट गए। दो अभी भी मेरे अंदर बाकी हैं, काम और क्रोध। हमें लगता है कि हम परे हो गए। जिस दिन परे हो जाएंगे, अवधूत स्थिति बन जाएगी। जब ये तीन हटेंगे, तो आत्म का ज्ञान होगा। और जब ये दो हट जाएंगे, तो ब्रह्म का ज्ञान होगा। आपको पहले मद, लोभ और मोह, इन तीन से छुटकारा पाना है। मोह हमें तब होता है, जब हमारे तरीके से कोई हमें देता है, और मैं उस लायक नहीं रहता। ध्यान से रखना। योग्यता से बाहर, जब भी योग्यता से ज्यादा मिलेगा, और आपने ले लिया, तो उस व्यक्ति का एहसान हो जाएगा, और उससे मोह हो जाएगा। तो योग्यता से ज्यादा लो ही मत। तब आप मोह के जाल में नहीं फंस पाओगे। जैसे ही आपने योग्यता से ज्यादा लिया, और आपको पता है, वैसे ही आप मोह के जाल में फंसे। मोह में आसक्ति हो जाती है। फिर वह हमारे आसपास नहीं रहता, दूर जाता है, तो हम उसे याद करते हैं। आसक्ति हो जाती है, बंधन हो जाता है। लोभ हमें किस स्थिति में होता है, यह देखना है। मेरे पास जितना था, मैं खुश था। लेकिन जैसे ही मैंने अपने सामने वाले के पास कुछ देखा, जो मेरे पास नहीं था, लोभ हो गया कि मेरे पास भी होना चाहिए। उसमें साथ-साथ मत्सर भी जुड़ा होता है, ईर्ष्या। उसमें सब हो जाता है। तो जब भी ऐसा हो, हमें समझना है कि मेरे जीवन में इसकी जरूरत है क्या, और क्या मैं इस लायक हूं। जब भी आप कुछ देखो, और लोभ हो कि मेरे पास भी होना चाहिए, तो देख लो कि आप उस लायक हो क्या। जैसे ही आप अपने आप को देखोगे, आपका लोभ हट जाएगा। और अपनी जरूरत के अंदर रहो। जरूरत से ज्यादा चाहेंगे, तभी उस अतिरिक्त पैसे की जरूरत पड़ेगी। अगर हम अपनी जरूरत में जी रहे हैं, तो किसी के करोड़ों-अरबों में खेलने से हमें क्या लेना-देना। हमारी जरूरत पूरी हो रही है। बस, बात खत्म।

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चिंतन क्या होता है, यह मैं बीच में पूछना चाहता था। आप किसी और से बात कर रहे थे, तब पूछ लिया। अभी पूछ लें क्या?

जब मैंने आपको मौका दिया था, तो क्यों नहीं पूछा? अब यह पूरा हो जाने दो, फिर मैं तुम्हारे पास आऊंगा। लाइव में भी बहुत प्रश्न हो गए हैं। इसीलिए तुम्हें बोला था। ध्यान नहीं रहता। तो अगली बार आकर पूछना। जब पूरा मौका मिला, उसी समय बात खूब करनी चाहिए। हमने पूरा मौका दिया था। उस समय आपने लाभ क्यों नहीं लिया? अभी हो जाने दो। फिर लाइव में तुम्हारे प्रश्नों का जवाब देखेंगे। लाइव में भी बहुत आ गए हैं। आपका भोजन नहीं हुआ, यही सबसे बड़ी बात है। शरीर मेरा जितने में चल जाता है, उतने में चल जाता है। आप जिस व्यक्ति से बात कर रहे हो, उसने आपको पूरा समय दिया है। आप भोजन कर चुके हो, उसने नहीं किया। तो फिर अपराध की भावना आ जाएगी। मुझे कोई जरूरत भी नहीं। मैं यह बता रहा हूं कि कभी भी किसी ने आपको मौका दिया, तो उसी समय लाभ लो। जब मौका मिला, तब लाभ क्यों नहीं लेते? उस समय आप कहां रहते हो? इसलिए दूसरे के समय को भी समझो।

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प्रयास दो दिन से बढ़ाया है, तो चक्कर आने लगे हैं, कमजोरी बहुत आ रही है, थोड़ा स्पिनिंग सा हो जाता है। क्या करूं?

हो जाएगा। जब ऐसा हो, तो आराम कर लिया करो। धीरे-धीरे हो जाएगा। फायदा मिल रहा है, यही बढ़िया है।

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कभी-कभी ध्यान होता है, तो कोई कहती है कि आंख खोल लेती हूं तो अपनी ऊर्जा बाहर निकल जाती है। क्या ध्यान में आंख खुलने से ऊर्जा चली जाती है?

ऐसा कुछ नहीं है। इन सब भ्रांतियों से दूर रहो। अपने आप को ऊर्जा का केंद्र बनाओ, किसी और को नहीं। ऊर्जा अगर इस दुनिया में कुछ भी है, तो आपसे है। आपसे है। आप किसी और से नहीं हो। इस बात का विशेष ध्यान रखो। इस दुनिया में अगर कुछ है, तो आपसे है। और जो आपसे नहीं है, वह आपके लिए है भी नहीं। जिस देश को आप नहीं जानते, वह देश आपके लिए थोड़ी ना है। जितना है, आप ही से है। तो ऊर्जा का कोई टेंशन मत लेना। ऊर्जा का केंद्र आप ही हो। तो ऊर्जा जाएगी कहां?

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घर में मच्छर रहते हैं, लोग उन्हें खाट पर मारते हैं। उनका बचाव कैसे हो? सीधे मारना क्या उचित है? चलते हुए पैरों के नीचे भी तो जीव मर जाते हैं।

हम भी बचाने के लिए बहुत कुछ करते हैं। आप भी बचाने के लिए कुछ करो। सीधा मार कर ना, अपना कुछ जला लो, वे चले जाएं। मैं आपको सीधा बता दूं। अपने को जीना है, और उसके लिए कुछ भी करना पड़ेगा। सीधा प्रहार ना करके, उन्हें भगाने के बहुत उपाय हैं। सीधा प्रहार ना करिए। अपनी खिड़कियां बंद करिए। कुछ जला दीजिए। गांव में हो, तो ऊपर ही जला दो। भाग जाएंगे क्या? नीम का पत्ता ही जला दो। मच्छरदानी लगा लो। घर में जलाने की जरूरत नहीं, कुछ भी कर लो। मच्छरदानी है, तो फिर क्या टेंशन है? लड़के मच्छर मारते रहते हैं। जाने दो। मान गए तो ठीक है। नहीं माने, तो सब अपने कर्मों का परिणाम है। सीधे हमें किसी को नहीं मारना चाहिए। जितना हो सके, बचो और बचाओ। आखिरी उपाय क्या है? अभी हम लोग यहां सत्संग कर रहे हैं। पता नहीं पैरों के नीचे कितने जीव मर गए। लेकिन हम उन्हें मारने के लिए थोड़ी ना खड़े हैं। अब मर गए, तो क्या करें? हम आसमान पर भी तो नहीं चल सकते। दोष तब है, जब आप उसे देख रहे हो, और कदम उठा के मार रहे हो। तब दोष है। और आप ऐसे ही चल रहे हो, तो लाखों जीव रोज आपके चरणों के नीचे मरते हैं। यहां तक कहा जाता है कि सांस लेने-छोड़ने में लाखों जीव मर जाते हैं। करवट बदलने में, उतना तो मुझे नहीं दिखता। लेकिन इतना पक्का दिखता है कि जब हम चलते हैं, तो लाखों जीव मर जाते हैं। गाड़ी से चलते हैं, तो लाखों-करोड़ों जीव मर जाते हैं। तो उसका दोष नहीं लगता, क्योंकि हम कुछ और कर रहे हैं। हमारा उद्देश्य उन्हें मारना थोड़ी ना है। तो सीधा मत मारिए। बस, बात खत्म।

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यहां जो लिखा है, मतलब हो तो आना, इसका क्या मतलब है?

मतलब हो, तो आना। मतलब ना हो, तो बेमतलब से आना नहीं। मतलब है, तो आना। यह आपके लिए लिखा है। आप लोग इसका खोजो। यही तो खोज रहे हो। आप खोजो। बस पढ़ा करो। यही आपके लिए लिखा है।

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मैं कौन हूं, इसकी उपलब्धि कैसे हो? बहुत बार बताया गया है, पर हो नहीं पा रहा। मैंने अपनी तरफ से छोड़ दिया है, पर उधर से नहीं छोड़ रहे। शादी-विवाह का चक्कर है, वे खींच रहे हैं। मेरी तरफ से आसक्ति नहीं है।

मैं कौन हूं, इसकी उपलब्धि तभी होगी, जब आपका सब छूट जाएगा। बड़ा आसान है। छूट गया है, ऐसा लगता है, पर छूट जाएगा। हो जाएगा। तुमने छोड़ दिया है, पर वे अभी उधर से नहीं छोड़ रहे। भाई, तुम छोड़ो। मैं तो छोड़ चुका। उनके छोड़ने का इंतजार करो। उधर से आसक्ति नहीं है, पर वे लोग अभी खींच रहे हैं। शादी-विवाह का चक्कर है तो चलो, कोई बात नहीं। लगे रहो। जब छूट जाओगे, तब हो जाएगी। बहुत साफ-सुथरी बात है। कोशिश करो। कोशिश कभी मत छोड़ना। जब अपना ही पता नहीं, तो क्या जानकर करेंगे। लगे रहो।

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रोज पांच-छह बार चक्कर आ रहा है। आत्मचिंतन नहीं होता, बस खाली सेवा ही लगती है, खाली-खाली लगता है। जो सूझता है, वही करते रहते हैं। तब क्या करें?

आत्मचिंतन का मतलब है, मैं अपने आप को कैसे निकालूं। जब और सब चीजें नहीं होतीं, कुछ भी नहीं सूझता, बस खाली लगता है, तब ठीक है, तब सेवा करो। और क्या? जिंदगी लगा दो सेवा में। ना आता है, ना जाता है, ना कुछ तंग कर रहा है। जिंदगी सेवा में लगा दो। करते हुए चले जाना है। शरीर के हिसाब से जो सूझता है, उसमें यह देख लेना कि मेरे द्वारा किया गया कर्म उचित है या अनुचित। अपना ऐसा ना हो कि जो सूझ जाए, कर ही दें। ऐसा करोगे तो बेकार हो जाएगा। उचित वाला कर्म हमें यहां करना है।

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बोलने की आदत बहुत थी, अब कम हुई है। फिर भी ऊंचा बोलता हूं, तो साथ वालों को लगता है कि गुस्से में हूं। अंदर से दबाव डालने का भाव नहीं है, बस आवाज ऊंची है। क्या यह गुस्सा है?

ऐसा नहीं है। गुस्सा करते, तो यहां टिक ही नहीं सकते। गुस्सा वाला आदमी यहां एक दिन भी नहीं टिकेगा। वह चला जाता है। भीतर से गुस्सा होगा, तो नहीं टिकेगा। यह बाहर से तो चलता रहता है। कामकाज है, तो उसमें बोलना पड़ जाता है, जरूरत पड़ जाती है।

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मैं इस कुटिया को अपनी मानता हूं। छोटी-छोटी बिगड़ने वाली चीजें, जो औरों को नहीं दिखतीं, उन पर ध्यान रखता हूं। पहले लगता था लोग मेरे तरीके से नहीं कर रहे, गलत लगता था। अब समझ आया कि सबकी समझ अपनी है। खाना बनाने में मन लगता है। सारा छोड़ दूं तो कमजोरी आ जाएगी, इसलिए अपना काम भी करता रहता हूं। बोलचाल में गलती हो जाती है। यह कुटिया किसकी है, और यहां कैसे रहें?

जरूर ध्यान देना चाहिए। आप छोटी-छोटी चीजें बचाया करो। ये लोग बड़ी-बड़ी बचाया करेंगे। जितनी समझ है, सबकी अपनी समझ है। अच्छा ही काम कर रहे हैं। कोई खराब काम नहीं करते। थोड़ा-बहुत हो जाता है। समझा सकते हो। अगर वे मेरा तरीका समझ जाएं, तो बहुत बढ़िया। ना भी समझें, तो कोई बात नहीं। छोड़ दो। कोशिश करो कि तरीका समझ लें। नहीं समझते, तो छोड़ दो। जितना हो रहा है, उतना बना रहे हो। सेवा अपनी भी करते रहोगे। सारा छोड़ दोगे, तो कमजोरी आ जाएगी। इसीलिए अपना करते रहो। लगे रहो। जहां तुम लगे रहते हो, वहां और लोगों का भी दिल काम करने में बढ़ जाता है। खड़े रहोगे, तो मालिक जैसा लगेगा, उन्हें भी लगेगा। थोड़े करेंगे, तो बराबर में रहेंगे। आराम से रहो। तुमने कहा ना, मेरी कुटिया है। तो आप ही की है यह कुटिया। आपको लगता है मेरी है। मेरा उद्देश्य यही था। अगर मुझे कुटिया चाहिए होती, तो मैं बारह साल ऐसे नहीं घूमता। कुटिया की जरूरत मुझे जब निकला था, तभी थी, इस तन को, इस शरीर को रखने के लिए। मैं तो बारह साल ऐसे ही घूमा। कभी कुटिया बनाई क्या? कुटिया बनाने का उपदेश आप ही लोगों के लिए है। यह कुटिया मैंने अपने लिए बनाई ही नहीं है। यहां बात यही है, कि यह उसी की कुटिया है, जो यहां के नियम में रहता है, जो नियम चलाए। क्योंकि नियम सर्वोपरि है। उसी की है। और नियम तोड़ा, तो उसकी नहीं रही। फिर यहां रहने के लायक नहीं। तो यह कुटिया आप ही लोगों की है। इसी भाव से मैंने बनाई भी है। अगर मैं इस भाव से नहीं बनाता, तो आज यह ऐसी नहीं होती। कभी ऐसा होता है कि यह फट जाएगी। यहां पक्का नहीं है, और पतरा उधर नहीं है। अगर मुझे अपने लिए बनाना पड़ता, तो पक्का इधर होता, और पतरा उधर होता। शेड इधर बनती, और अपने लिए पक्का रहता। भले छोटा ही बनाते, पर जैसे भी बनाते, बढ़िया बनाते। आज गर्मी में आग लग रही है। यहां मैं अपने लिए नहीं बनाता। मुझसे कोई पूछने वाला था नहीं। मैं आप लोगों के लिए बनाया, इसीलिए यह इधर है, और वह उधर है। अपना छोड़ के आ गया। यह आप लोगों का है। छोड़ के आया, और उसका कोई एहसास अंदर नहीं है। जो रखा है, उन्हीं की कीमत है। धीरे-धीरे सब हो जाएगा। अपना मकान ये अपनी दम से छोड़ना नहीं चाहते। अभी सोचता हूं, कभी इसको हटा दूं यहां से। पर ये हटने वाले हैं। धीरे-धीरे सब हो जाएगा। आप लगे रहो। एक-दो दिन में लोग भागते थे। इसलिए सात दिन रखा। अभी पंजाब वगैरह से मैसेज आया था। उन्होंने कहा, हमें आना है। मैंने कहा, आ जाओ। फिर उन्होंने कहा, सात दिन से कम रुक सकते हैं क्या। मैंने कहा, सात दिन से ऊपर की बात करो। नीचे की बात तो कतई मत करना। कोई फायदा भी नहीं है। सात दिन से ऊपर की बात करो, नीचे की बात मत करो। सात दिन आओ, रहो, और जाओ। मुझे रखना है, तभी तो सात दिन कहा। नहीं तो एक-दो दिन में लोग भागते थे, पता भी नहीं चलता। तो आप लोग रहो, और कल्याण करो। मैं नहीं चाहूंगा कि कोई जाए।

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संयम का मतलब क्या है? लोग कहते हैं संयम रखो। क्या यह शरीर से संबंधित है, या धैर्य है? संयम मानसिक है, या शरीर और मन दोनों से? एक बार अहंकार आहत हो जाए, तो हम जैसे लोग पीछे हट जाते हैं। उस वक्त संयम कैसे रखें?

संयम का मतलब है, जिसके लिए आप आए हो, उसे करके इंतजार करो। आप जिस कार्य के लिए आए हो, कार्य करते रहो, और फल का, परिणाम का इंतजार करो। पेशेंस रखो। संयम मतलब, आप जिसके लिए आए हो, लगे रहो, और संयम रखो। भागो मत। शरीर से किया, तभी मानसिक हुआ। हम कुछ शरीर से करते हैं, तभी वह मानसिक होता है। पांच इंद्रियों से जितना हमने अर्जित किया है, वही मानसिक विचार बनते हैं। बाहर से जैसा आपने किया है, वही मानसिक विचार आते हैं। बिना गुरु के ज्ञान भी तो नहीं मिला। गुरु भी तो है। शिक्षक ही नहीं रहेगा, तो विद्यार्थी क्या करेगा। तो संयम का मतलब है, अगर आपने कुछ कर दिया, तो करने के बाद इंतजार करिए। संयम रखो। एक बार ईगो हर्ट हो गया, तो हम जैसे लोग पीछे हटते हैं। फिर गिरोगे। सीधी सी बात है, गिरना हो तो। उस वक्त भी अपने आप को देखना पड़ता है। अगर ईगो आ जाए, तो उसकी प्रतिक्रिया बाहर शरीर से मत दो। पी जाओ उसे। पीने के लिए अलर्ट रहना पड़ता है। यह मत रखो कि सामने वाले को बदले का भाव रख लूं, मौका आएगा तो इन्हें जवाब दूंगा। नहीं। पी जाओ। ईगो हो रहा है, तो भी उचित तरीके से काम करो। ऐसा ना हो कि सामने अनुचित हो रहा है, और आप कहो कि हमें तो ईगो नहीं करना है। वहां रोकने के लिए कुछ भी करो। जैसे इस स्थान पर हो, और आपके सामने कुछ गलत हो रहा हो, और वह व्यक्ति नहीं माने। अब आपको क्रोध का उपयोग करना पड़ेगा। उसे रोकने के लिए कुछ भी करना पड़े। कुछ भी करो। यहां तक कि या तो उसकी जान ले लो, या अपनी दे दो। संदर्भ के अनुसार संयम यही सीखना है। वीर किसे बोला गया है? वीर युद्ध में मरते हैं। क्या भगोड़ों को वीर कहा गया? जो चुप हो गया, रुक गया, उसे? जिसने अपने अधिकार के लिए लड़ा, और मारा गया, उसे वीर कहा गया। आपका अधिकार यही है, कि आप जहां भी हो, अगर गलत हो रहा है, तो उस गलत को होने ना दो। चाहे उसके लिए मार दो, या मर जाओ। मारने में भी वीर हो, और मरने में भी वीर हो। युद्ध में जिसने मारा, वह भी वीर है। मारते-मारते मर भी गया, तो भी वीर है। लड़ाई से हटे नहीं। वहां यह देखा जाता है कि दोनों में गलत कौन था, सही कौन था। मरने वाला अगर गलत था, तो उसे वीर नहीं कहा जाता। मरने वाला अगर सही है, तो उसे वीर कहा जाएगा, क्योंकि अपने अधिकार के लिए लड़ा। मारने वाला अगर गलत है, और मरने वाला सही है, तो मरने वाले को वीर कहा जाएगा। मरने वाला गलत है, और मारने वाला सही है, तो मारने वाले को वीर कहा जाएगा। तो अपने अधिकार के लिए लड़ जाओ, चाहे सामने कोई भी हो।

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एक बार गुरु मिल जाए, तो रुक ही जाना चाहिए क्या? श्रीलंका में आपने कहा था कि ईमानदारी, सत्कर्म, सत्संग, और भ्रमण भी जरूरी है। क्या भ्रमण करना जरूरी है? भ्रमण की इच्छा घुटन से होने लगती है, कुछ समझ में नहीं आता।

बस रुक जाओ। भ्रमण अगर तेरे अंदर लालसा है, तो भ्रमण तो कर ही रहे हो। जब से हम पैदा हुए हैं, क्या भ्रमण नहीं कर रहे? भ्रमण हम किस लिए करते हैं? जब हमारे प्रश्न होते हैं। जहां हमारे जवाब मिल जाएं, वहीं रुक जाएंगे। जैसे भूख लगी, तो भोजन कब तक ढूंढना है? जब तक भोजन ना मिल जाए। भोजन मिलने के बाद तो सो जाना है, विश्राम करना है। अगर मेरे जवाब नहीं मिल रहे, तो आगे निकल जाना चाहिए। मैंने इससे कहा था, भ्रमण करना है तो कर ले। घूमने की, भ्रमण करने की इच्छा हो, कि हम यहां नहीं समझ पा रहे, हम वहां जाएंगे, समझ लेंगे। जाकर देख लो। लेकिन वहां जाओगे, तो आपका समय भी जाएगा। ऐसा नहीं है कि कुछ नहीं जाता। इस मार्ग में बहुत सोच-समझ के चलना है। घुटन क्यों हो रही है, वह देखो। आकर्षण है। कुछ समझ में आता है, तो बस खत्म करो। जब कुछ नहीं है, तो ठीक है।

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बाबूलाल कहता है, अब यही लगा रहता है कि क्या करूं।

जितना कर सकता है, कर। और जितना मिले, उतना। दोनों बात है। जितना मिले, और जितना कर सकता है।

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कब तक प्रयास करना चाहिए, और कब प्रयास छूट जाता है, समर्पण हो जाता है? साधक को कैसे पता चले?

जब तक समर्पण ना हो जाए, तब तक प्रयास करना चाहिए, समझ के साथ। कैसे पता चले, यह ढूंढो भैया।

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मार्ग में प्रयास कब तक करें? कोई कल्याण का मार्ग बताएं। क्या करना अच्छा होता है?

ईमानदारी, सत्कर्म और सत्संग। बहुत सिंपल है। सीधी बात है।

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जिसके पास हम आए हैं, उसके नियम में रहना बहुत जरूरी है। प्रतीक पूछता है, नियम क्या है, कैसे करें?

सर्वप्रथम नियम समझिए। ईमानदारी, सत्कर्म और सत्संग।

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आप कहां जा रहे हैं?

अभी तो कुटिया में हैं। अभी कहीं नहीं जा रहे हैं।

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सेवा देने की हैसियत नहीं है, तो क्या हम आपका सत्संग नहीं सुन सकते?

नहीं। मत सुनिए। जरूरत ही नहीं है। रिचार्ज कराने का, मोबाइल लेने का पैसा है। मत सुनो। अभी अनसब्सक्राइब करके चले जाओ।

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मैं पक्षियों के लिए पानी रखता हूं। उसमें कीड़े मर जाते हैं। क्या दोष लगता है?

नहीं लगता। लेकिन आप ऐसी जगह रखिए, कि ना मरें।

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अगर कोई मुझ पर विश्वास नहीं करता, तो क्या करूं?

अगर कोई आप पर विश्वास नहीं करता, तो उसे छोड़ दो। या काम छोड़ के उसके पास ही हो जाओ। उसकी गोदी में रहो, कंधे पर बैठ जाओ। बोलो, भैया, सारा खर्चा तू देख, मैं काम ही छोड़ देता हूं। ऐसे लोगों को छोड़ दो।

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उनसे नाराज होकर दुखी होता हूं। समझ नहीं आ रहा। क्या ऐसे आध्यात्मिक मार्ग में नीचे गिर जाएंगे?

नहीं। आप नाराज होने से, अपने कर्म पर ध्यान दीजिए। आप नाराज वाला कर्म मत करिए। कोई नाराज हो या खुश हो, उससे क्या मतलब है? आप अपने कर्म पर ध्यान दीजिए।

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जीवात्मा कैसे होती है? जीव को कैसे मारें, ताकि अपने आप स्थिर हो जाए? जैसे पानी फ्रिज में बर्फ बन जाता है।

जैसे पानी फ्रिज में जाने से बर्फ बन गया, वैसे इच्छा और अपेक्षा में आत्मा जीव बन गई। जैसे आप बर्फ को फ्रिज से बाहर रख दोगे, तो वह धीरे-धीरे सामान्य होकर पानी में स्थिर हो जाएगी। बर्फ का नाश हो जाएगा। वैसे ही, जैसे ही आप अपने आप को कामनाओं से, इच्छा और अपेक्षा से मुक्त कराओगे, जीव का नाश हो जाएगा, आत्मा बच जाएगी। जैसे बर्फ का नाश होता है, और पानी बच जाता है।

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कोई अनुचित शब्द या व्यवहार हो, तो भीतर बेचैनी होती है। अगर सामने वाले को जवाब दे दिया, तो कैसे दें?

अनुचित शब्द या व्यवहार पर भीतर बेचैनी होती है। यदि सामने वाले को जवाब दो, तो उचित तरीके से जवाब दो। जब जवाब देते हो, तो सोच-समझ के दो।

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कुटिया में पहुंचने के बाद क्या बात कर सकते हैं, फोन कर सकते हैं?

कुटिया में पहुंचने के बाद आप एक बार बात कर सकते हैं। और जितने दिन रहेंगे, फिर बात नहीं कर सकते। आने के बाद बात करके बता सकते हैं कि आप पहुंच गए। उसके बाद आप कभी बात नहीं कर सकते।

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हम जो कुछ करते हैं, या बोलते हैं, उसका आधार क्या होता है?

हम लोग जो भी कुछ करते हैं, या बोलते हैं, उसका एक आधार होता है, ज्ञान। कुछ भी करो, यह देखो कि तुम्हारे करने से इसका क्या परिणाम आएगा।

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खालीपन को कैसे जिएं?

सत्संग सुनते रहें।

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मोह कैसे छूट जाएगा?

मोह तब छूटेगा, जब योग्यता से ज्यादा पाने की इच्छा का त्याग करोगे।

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श्रद्धा क्यों नहीं होती? हमेशा संशय क्यों बना रहता है?

जब आपको जवाब मिल जाएगा, प्रत्यक्ष हो जाएगा, तब संशय हट जाएगा।

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हमारे अंदर जो छुपा हुआ है, उसे पूरी तरह कैसे छोड़ें?

बस वह कर्म मत करो। अंदर छोड़ दो। कर्म कैसा करते हो, उस पर ध्यान दो। जो अंदर छुपा है, वह सब छोड़ दो।

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आपकी पुरानी वीडियो सुनने को नहीं मिल रही हैं, जैसे किसी ने डिलीट कर दिया हो।

हैं। आप इसी चैनल पर जाओ। लाइव में जाओ। पुराने वीडियो बहुत हैं। हजारों वीडियो हैं।

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बेईमानी एक तरफ की बात है, पर आपका क्या विचार है? हम अपने घर में मूर्तियां रखते हैं। क्या इनका हम पर कोई प्रभाव पड़ता है?

नहीं। ऐसा कुछ नहीं है।

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मन बिना कारण उदास क्यों होता है?

कारण है। उदासी के पीछे कारण है।

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सत्संग करना चाहिए, या सत्संग सुनना चाहिए?

सत्संग सुनना चाहिए, करना नहीं चाहिए। अपने प्रश्न लेकर बैठो, तब सुनो।

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ध्यान में क्या रखना चाहिए? हम बैठे-बैठे सोचते नहीं। आत्मिक चिंतन किसे कहें?

ध्यान में बस यह रखना चाहिए, कि अपने आप को मैं कैसे निकाल लूं। इसका ध्यान रखो। जैसे आप कहीं जा रहे हो, तो आपको यह याद रखना है कि मुझे जाना कहां है। लोग रास्ता बता देंगे। लेकिन जाना भूल जाओगे, तो क्या होगा? एक किलोमीटर पर ही भूल गए कि मुझे कहां जाना है, और आप सौ किलोमीटर चले गए। कहां जाना है, यह भूल गए, तो वह सौ किलोमीटर जाना भी बेकार हो जाएगा। आपको यह ध्यान रखना है, कि मुझे इस भवसागर से निकालना है। मुझे इस बंधन से अपने आप को छुड़ाना है। यही आत्मिक चिंतन है। यह चिंतन करोगे, तो आगे का सब जवाब मिलता जाएगा, किसी के द्वारा। आप यह याद रखो कि मुझे जाना कहां है। तो कोई ना कोई आपको पता बता देगा। कोई ना कोई कुछ दूरी तक मदद कर देगा। और एक दिन आप लक्ष्य तक पहुंच जाओगे। हम बैठे सोचते नहीं, ऐसा नहीं। यह सोचना है, कि मेरा आत्मिक कल्याण कैसे हो। क्या करूं। कैसे अपने आप को निकाल लूं। इस प्रश्न को प्रबल करना है। यही आत्मिक चिंतन है।

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जो महापुरुष चले गए, उनसे संबंध हो सकता है क्या? उनकी वाणी, उनकी आवाज को कैसे वापस लाया जाए? जैसे मोबाइल सिग्नल पकड़ता है, वैसे उनकी गूंज पकड़ी जा सकती है क्या?

करके देखो, बता देंगे। यह मोबाइल ही एक्सपेरिमेंट है। यह सिग्नल पकड़ रहा है। हम यहां बात कर रहे हैं, और किसी और देश में सुनी जा रही है। इसका मतलब आवाज जा रही है कहीं। इसने पकड़ लिया। आवाज तो गूंज रही है। अब उन महापुरुषों के वचन गूंज रहे हैं। तो वही, अपने पास सिस्टम लाओ। तुम लाओ, खोज करो। यह काम तुम ही करो। उनकी आवाज पकड़ो। आप इस पर काम करो। लोगों को अगर लग रहा है कि इससे लाभ होगा, तो तुम इस पर पूरी तरह लग जाओ। लगकर देखो। कामकाज छोड़ो, इसी खोज में लग जाओ। ऐसा नहीं है क्या होता? करना-धरना तो कुछ है नहीं। बस बातों से बात चाहिए। भैया, आत्मिक कल्याण कर लो। ऐसा ना हो कि इनकी आवाज, उनकी आवाज, यह पत्ता हरा क्यों है, इसका रंग क्यों है, इसकी बनावट ऐसी क्यों है। इसी में मत उलझो। इज्जत से, समझदारी से, बुद्धिमानी से अपना कल्याण कर लो, अगर चाहते हो। नहीं तो बाहर गए, तो ऐसे ही फंस जाओगे, और कर कुछ नहीं पाओगे। अभी जिस प्रश्न को तुमने किया, इसका तुम्हारे जीवन में कोई मतलब है क्या? जो महापुरुष हैं, इस समय, उनसे तो जुड़े हुए नहीं हो। मान लो उनकी वाणी मिल जाए। यह वाणी तो तुमको मिल ही रही है। तो क्या कर लोगे तुम? चलो, जिस महापुरुष की बात कर रहे हो, वही आकर प्रत्यक्ष तुम्हारे सामने आ जाए, तो क्या कर लोगे? क्या तुम्हें लगता है कि तुम्हारा कल्याण हो जाएगा? सोच-समझ के आगे बढ़ो। उनकी वाणी को कैसे वापस लाया जाए, इस चक्कर में मत पड़ो। फिर आराम करो।

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संसार में चिंतन नहीं होता। मैंने बहुत प्रयास किया। आठ दिन तक लगा रहा, कुछ नहीं हुआ। हार गया। यहां से चार्ज होकर गया था, पर धीमे-धीमे डाउन होता गया। शब्द याद रखकर, साक्षी भाव में, कहीं भी रहें तो क्या गिरना रुकता है? यहां और संसार में फर्क क्यों है?

संसार में पूरी तरह नहीं होता। नहीं होता। मैंने देखा है। आठ दिन लगे रहो, और कुछ नहीं हुआ, तो हार जाते हो। संसार में नहीं हो पाता। यहां से चार्ज होकर गए, और धीमे-धीमे डाउन होते गए। होता है। कुछ नहीं हुआ। कुछ भी नहीं है। जैसे तेरा मोबाइल है। चार्ज तभी तक रहेगा, जब तक यह लगा रहेगा। और जैसे ही तूने निकाल के हटाया, डिस्चार्ज होना चालू हो जाएगा। जैसे ही निकाला, डिस्चार्ज चालू। या तो चार्ज हो रहा था, या डिस्चार्ज होगा। दो में से एक होगा। यूज करो, चाहे। तुमने बस निकाल लिया। या तो चार्ज होगा, या डिस्चार्ज होगा। यहां हर चीज ऐसी होती है। तो या तो तुम्हारा स्तर ऊपर जा रहा है, या नीचे जा रहा है। दो में से एक हो रहा है। लगे रहोगे, तो हो जाएगा। तुम लगे रहोगे, तो एक दिन उस मूल तक पहुंच जाओगे। बातें खत्म हो जाएंगी। परिणाम तक पहुंच जाओगे। यहां हर चीज परिवर्तनशील है। अपने आप कमरे में कुछ मत करो, बंद कर दो। कुछ दिन बाद आओ, गंदा पाओगे। यहां हर चीज परिवर्तनशील है। चार्जर भी लगा रहे, तो बैटरी बेकार हो जाती है, खुल जाती है। बिल्कुल शून्य हो रहे हो, तो इसका मतलब तुम इन शब्दों पर चल नहीं रहे। यहां प्रभाव साक्षात है। एकदम तेजी से होगा, क्योंकि यहां कोई प्रपंच नहीं है। यहां सत्य का अनुशासन है। जब मौन धारण कर लेते हो, और भय से बोलो या जो भी बोलो, उसमें जब रहते हो, तो दूसरा ही प्रभाव होता है। ऊर्जा भी साथ-साथ काम करती है। अगर शब्दों को याद रखोगे, और उनमें जियोगे, तो कहीं भी रहो, उन्नति ही होगी। होगा क्यों नहीं होगा? लग जाओ कल्याण के लिए। मौका मिला है। जिंदगी ने मौका दिया है। समय भी है, समझ भी है। सब साथ चलता क्यों? जो कर रहे हो, वह किसी अपनी जरूरत में किया जा रहा है। भगवान मिल गए। अब देख लो। आप देखो कि आप कैसे रह रहे हो। लोगों की फिक्र करना छोड़ दो। पहले अपनी फिक्र करो, कि आप कैसे रह रहे हो।

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आपका सत्संग सुनता हूं, तो आत्मज्ञान का अनुभव होने लगा है। आपके बताए अनुसार ध्यान में कुछ समय बैठने के बाद अलग-अलग क्रियाएं धीरे-धीरे खुलने लगती हैं। तब क्या करें? अगर बर्दाश्त नहीं हो रहा, तो?

जितना हो सके, आप अपने आप में बैठे आत्मिक चिंतन करें। अगर बर्दाश्त नहीं हो रहा है, तो खुजलाना ही पड़ेगा। क्या करोगे।

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इस वक्त इस दुनिया में सबसे कठिन कार्य क्या है?

किसी को लगता है बच्चों को संभालना, पढ़ाई-लिखाई, काम-धंधा। नहीं, यही सब लगता है। लेकिन इस समय हमारे लिए दुनिया का सबसे कठिन कार्य है ईमानदारी। कठिन था, नहीं, लेकिन हमने कर लिया ईमानदारी। इसके अलावा आपने कठिन से कठिन कार्य करने में सफलता पा ली। इसको छोड़कर कोई कहता है मैं सत्तर प्रतिशत हूं, कोई कहता है मैं निन्यानवे हूं, कोई कहता है मैं इतना प्रतिशत। लेकिन तुम कहते हो मैं सत्तर प्रतिशत ईमानदार। या तो तुम ईमानदार हो या बेईमान हो। अगर तुम निन्यानवे भी कह रहे हो तो तुम सिर्फ बेईमान हो, ईमानदार एक प्रतिशत भी नहीं हो। बहुत सीधी बात है। तो इस समय हमारे लिए दुनिया का सबसे कठिन कार्य ईमानदारी है। पूजा, भक्ति, साधना, तपस्या खूब हो रही है। लेकिन हमारा मूल स्वभाव ईमानदारी थी, वह नहीं हो रहा है, और यही मूल है। आज हम इतनी बेईमानी की गहराई में चले गए हैं कि कभी-कभी बेईमानी भी हमें ईमानदारी लगती है। और ईमानदारी से ही आप इस भवसागर को पार करोगे। सत्कर्म की भी जरूरत इसलिए है क्योंकि बेईमानी करके आप बहुत लोगों की बद्दुआ ले चुके हो, इसलिए सत्कर्म की जरूरत आपके कल्याण के लिए है। आप यह मत समझना कि उसको आपकी जरूरत है। आप नहीं पूरा करोगे तो कोई और कर देगा। आप यह मत समझना कि मुझे मौका मिला है और मैं नहीं करूंगा तो वैसे ही रहेगा। नहीं, आप नहीं करोगे तो कोई और करेगा। आप लाइन में थे इसलिए आपको मौका मिला। जैसे टिकट की लाइन में हों तो मौका इसलिए मिला कि आप लाइन में थे, लेकिन काउंटर जाने के बाद बोल रहे हो, नहीं मुझे नहीं लेना है, तो ठीक है, साइड हटो, पीछे कोई खड़ा है। ऐसे ही सत्कर्म है। आप साइड हटो। आपने कभी कहा था कि मुझे सत्कर्म का मौका दो, मैं भी सेवा करना चाहता हूं। लेकिन सेवा के नाम पर ज्यादातर क्या होता है। शुरुआत सेवा से होती है, लेकिन मेवा खाने में समय नहीं लगता, क्योंकि सेवा करने में लोग सपोर्ट करते हैं। सेवा करने वाला एक घर बनाने में पूरी जिंदगी लग जाती है। लेकिन अगर कोई समाज की सेवा का आश्वासन लोगों को देता है तो कई आश्रम बना लेता है। लोगों ने सहयोग किया कि इसमें सहयोग करने से मेरा भी कल्याण होगा। तो आपको यह देखना है। करने वाले ने तो कर दिया। जिसके द्वारा यह कार्य हो रहा है, अगर वह ईमानदार है तो वह भी तर जाएगा, लोग भी तर जाएंगे। और वह अगर बेईमान होगा तो उसका पतन हो जाएगा, सहयोग करने वाले तर जाएंगे। जिसने जैसा किया है उसे परिणाम मिलेगा। परिणाम हमेशा अकेले भोगना पड़ता है। चाहे आप कुछ भी करते हो, आप मत समझना मेरे साथ मेरी मां जाएगी, पति जाएगा, बीवी जाएगी, बच्चे जाएंगे। सब लात मार देंगे। जब तक जवानी है, जब तक काम के लायक हो, पापा, मम्मी, पति, पत्नी, जब तक जवानी है, जब तक लायक हो। अगर जवानी भी हो और निठल्ले हो तो किसी काम के नहीं, फिर जूते खाओगे, घर में ही शब्दों के जूते। और कमजोर रहोगे तो और भी मारेंगे। तो मैं यह कह रहा हूं कि कुछ धन के चक्कर में, इन झूठे रिश्तों के चक्कर में, क्योंकि जरूरत के रिश्ते हैं। यह कोई रिश्ते नहीं हैं। आज हमें एक मैसेज आया, फेसबुक पर पुराना। दोस्त तो मैं नहीं कह सकता, लेकिन फिर भी हम पढ़ रहे थे तो हमारी जान-पहचान हुई थी। हमारे गांव के बगल के ही थे। बहुत समय से हमारे फेसबुक पर कमेंट कर रहे थे, मैं जवाब नहीं दे रहा था। वह विदेश रहते हैं, अभी भारत आए हैं, तो मिलना चाह रहे थे। मैंने नंबर दे दिया। उन्होंने कॉल किया। बात करते-करते, वो लाखों रुपए महीने कमाते हैं, उन्होंने कहा कि आप हमारे मित्र हैं। मैंने कहा, देखो, यह कहना बड़ा आसान है। क्या तुमने मित्रता को निभाया? एक बार मुझे जीवन में जरूरत पड़ी, जब मैंने उनसे कहा तो मना कर दिया, और वह उस लायक थे। मैंने कहा, रिश्ते बनाना आसान है, निभाना नहीं। क्या मैं उस रिश्ते को ईमानदारी से निभा रहा हूं? तो हमने कहा, मित्र वगैरह नहीं, मित्र की पहले परिभाषा समझो। आप पढ़ाई-लिखाई में प्रोफेशनल हो, वह सिर्फ पैसा कमाने के काम आता है। व्यावहारिक जगत में आपको सिर्फ आपका व्यवहार काम आता है, आपके संस्कार काम आते हैं। आप यह मत समझना कि आपने पीएचडी कर लिया तो आपका कल्याण हो जाएगा। हो सकता है अनपढ़ अपना कल्याण कर ले। जैसे कबीर क्या थे? अनपढ़ ही थे। कालिदास कौन से ग्रेजुएट थे? आज उनको लोग फॉलो कर रहे हैं, उनसे कुछ सीख रहे हैं। तो मैंने कहा, तू पढ़ाई-लिखाई छोड़। तू ग्रेजुएट है, लाखों कमाता है। तू एक काम कर, पढ़ाई-लिखाई छोड़। तुझसे मेरी समझ बहुत आगे निकल चुकी है। और रही बात, तू मेरे मित्र के लायक नहीं, क्योंकि मित्र की परिभाषा यही है कि एक-दूसरे को जिस लायक मैं हूं साथ देना, जरूरत पड़ने पर। वो तो तुमने किया नहीं। मेरे तरफ से कोई कमी है तो बता। तब तो दोनों एक ही जैसे हैं। मेरे तरफ से कोई कमी है तो बता। एक बार मैं तुझे मित्र बोल सकता हूं, लेकिन तू नहीं बोल सकता। मैं इसलिए बोल सकता हूं कि मैं खरा उतरा हूं। लेकिन मैं तुझे मित्र लायक नहीं समझता, कि तू उस लायक नहीं है। मेरा यह कहना है, कोई भी रिश्ते हैं, ईमानदारी से निभाओ। किसी रिश्ते को बनाओ तो ईमानदारी से निभाओ। और मूल अपना कल्याण करो। कल्याण सबसे जरूरी है। लोग कहते हैं देश संविधान से चलता है। लेकिन संविधान लिखने वाले, भीमराव अंबेडकर जी ने संविधान को लिखा। आज उनके द्वारा लिखे गए संविधान से देश की कानून-व्यवस्था में उपयोग हो रहा है। वो भी आखिरी में बौद्ध धर्म को अपनाए। लोग बड़े आसानी से कह देते हैं, आत्मिक कल्याण के लिए किसी गुरु के शरण में जाना ही पड़ेगा। तो आखिर उन्होंने अपनाया। लोग तर्क दे देते हैं, देश संविधान से चलता है। लेकिन आत्मिक कल्याण संविधान से थोड़ी ना होगा। देश चलेगा। एक नियम है, एक सिस्टम है, एक रूल है, देश का अनुशासन है। जिस देश में हमें रहना है, हम अगर संवैधानिक तौर-तरीके से रहेंगे तो हम सुरक्षित रहेंगे। लेकिन मेरा आत्मकल्याण थोड़ी ना होगा। आत्मकल्याण के लिए किसी गुरु के शरण में जाना पड़ेगा। आप देखो, जिन्होंने संविधान लिखा वो भी गए, बौद्ध धर्म को अपनाया। क्यों अपनाया? क्या जरूरत थी? वो तो योग्य थे, ग्रेजुएट थे, विदेश पढ़ के आए थे। उनको क्यों जरूरत पड़ी? क्योंकि उन्हें भी लगा कि मेरा आत्मिक कल्याण किसी गुरु के शरण में जाने से ही होगा। मैं बाहरी तो कुछ कर चुका हूं, लेकिन अंदर के लिए मुझे किसी के शरण में जाना पड़ेगा। अब वो शरण गुरु का होगा। पढ़ाई-लिखाई हमें अंदर साथ नहीं दे सकती। पढ़ाई-लिखाई सिर्फ बाहर की व्यवस्थाओं के लिए है, पैसा कमाने के लिए, देश चलाने के लिए। लेकिन आत्मिक कल्याण के लिए किसी गुरु के शरण में जाओ। और गुरु कौन? गुरु ज्ञान का प्रतीक है। नामधारी ऐसे गुरु नहीं। आज सट्टा देने वाले को भी गुरु कह देते हैं। गुरु ज्ञान का प्रतीक है। जिसके शब्दों के द्वारा मेरा आत्मिक कल्याण होगा, जिनके शब्दों के द्वारा मैं इस जाल से छूट पाऊंगा। राग, द्वेष, मोह, आसक्ति, इच्छा, अपेक्षा, मेरे कर्ता के भाव से मैं छूट पाऊंगा। ऐसे गुरु के सानिध्य में। और यह मुझे समझना पड़ेगा कि जब मैं किसी के शरण में जा रहा हूं तो मुझसे क्या बातचीत कर रहा है, शब्दों के द्वारा क्या दे रहा है। ये शब्द लेकर मैं समाज में उलझूंगा या समाज से सुलझूंगा। इतना समझ अपने में भी होना चाहिए। अरे भाई, किसी ने तलवार दे दिया, चलाना तो सीखोगे तब ना चलाओगे। बड़ी-बड़ी तलवार लेने से थोड़ी ना, किताब लेने से थोड़ी ना। ऐसे ही शब्द का उपयोग कैसे, कहां करना है। जैसे गुरु बताता है कि तलवार को कैसे चलाना है, तलवार को किस जगह कैसे उपयोग करना है, सामने वाला कैसे प्रहार करेगा और तुम्हें कैसे रोक के कैसे जवाब देना है। तो वैसे गुरु सिखाएगा कि इन शब्दों का उपयोग कहां करना है। नहीं तो क्या ये शब्द वहां नहीं हैं क्या? किताबों में नहीं भरे हैं क्या? हम जितना घुमा के फिरा के बोल रहे हैं, क्या यह शब्द किताबों में नहीं है? लेकिन किताबों में तरीका नहीं है। तलवार चलाने का तरीका किताबों में नहीं है। किसी गुरु के सानिध्य में रहकर आपको सीखना पड़ेगा। तलवार आप बाजार से खरीद सकते हो, सिखाना बाजार से नहीं खरीद सकते। दुकान पर मिलता है क्या? जीवंत गुरु चाहिए। वो जीवंत गुरु यह सिखाएगा किस तरीके से कौन से शब्द का कहां उपयोग करना है। और जब आप उसके सानिध्य में रहोगे, अब एक ही दिन गए, तलवार ले ली, बोलो आज सिखा दो, बस आज के बाद नहीं आऊंगा, तलवार हाथ में रह जाएगी, चलाना कभी नहीं आएगा, युद्ध के मैदान में मार दिए जाओगे। गुरु के सानिध्य में आपको रहना पड़ेगा, समर्पण से। तो गुरु अगर कोई शब्द दे रहा है तो उन शब्दों को कैसे, कहां उपयोग करना है, जब उसके सानिध्य में रहोगे, उसकी जीवन-शैली देखोगे, उसका जीवन जीने का तरीका देखोगे, तब समझ में आएगा। आप अगर किसी स्थान पर रह रहे हो तो सिर्फ गुरु को देखो। तुम्हें उसके अलावा कोई दिखना ही नहीं चाहिए। और किसी के आचरण को धारण ही मत करो। सिर्फ एक को देखो, गुरु को, क्योंकि वो मुक्त है। और अगर तुम अपने आसपास और कुछ दिख रहा है तो तुम जिज्ञासु नहीं हो। और किसी की बात सुनाई देकर तुम उस बात में जा रहे हो तो तुम गुरु के सानिध्य में फिर नहीं हो। तुम्हें गुरु के अलावा कोई दिखना ही नहीं चाहिए। भीड़ में होकर भीड़ को मत देखो। सिर्फ आप केंद्रित रहो। गुरु कैसे जी रहा है, गुरु क्या कह रहा है, गुरु का आचरण कैसा है, गुरु हमें बता क्या रहा है। हमें जीवन जीने के लिए देखो, जैसे विज्ञान है। हम जब कोई काम करेंगे तो विज्ञान का सहयोग लेना पड़ेगा। विज्ञान क्या है? जब आप कुछ करते हो तो आप वो विज्ञान ही हो, क्योंकि आप कुछ अलग तरीके से करना चाहते हो। मिस्त्री ने छत पर चढ़ने की सीढ़ी बना दी, विज्ञान ही तो है। आपने गेहूं से रोटी बना के खा ली, तो विज्ञान ही तो है। आपको अगर कुछ करना है तो विज्ञान का भी सहयोग लेना पड़ेगा। सिर्फ जीने के लिए नहीं। जीने के लिए तो पशु विज्ञान का उपयोग नहीं ले रहे हैं। क्या वे नहीं जी रहे हैं? पशु थोड़ी ना विज्ञान का उपयोग कर रहे हैं। जंगल में इतने जीव-जंतु जी रहे हैं, क्या विज्ञान का उपयोग कर रहे हैं? वो तो जी रहे हैं। लेकिन वह जी रहे हैं, कुछ कर नहीं पा रहे हैं। वह सिर्फ भोग, भोजन और बच्चे पैदा करना, कोई कर्म नहीं कर पा रहे हैं। जब आपको समाज के लिए काम करना है तब आपको विज्ञान का सहयोग लेना पड़ेगा। और विज्ञान का योगदान हर व्यक्ति का है, क्योंकि हर व्यक्ति कुछ नया करता ही है, कुछ नए तरीके से करता ही है। हर व्यक्ति जितना बताया गया उतना नहीं करता, कुछ अलग करता है। अच्छे से मैं कैसे कर सकूं, यही विज्ञान है। तो मेरा यह कहना है। तब मैंने उसको बोला जिन्होंने मुझे मित्र बोला। मैंने कहा कि देखो, आप पढ़ाई-लिखाई को साइड में रखो। आप पढ़ाई-लिखाई करके पैसा कमाए हो। जब आत्मिक कल्याण होगा, तो वहां आपका संस्कार काम आएगा, आपका व्यावहारिक जीवन काम आएगा। आपने किस तरीके से जिया है वो काम आएगा। आपका पढ़ाई काम नहीं आएगा। पढ़ाई का काम समाज तक, व्यवस्था तक है। आज देखो, कई सौ वर्ष पहले के लोगों को लोग फॉलो कर रहे हैं। वो अनपढ़ थे। क्या उन्होंने पा लिया, क्या समझ लिया, अपने स्तर को कहां ले गए कि आज भी उनकी बातें हो रही हैं, कालिदास की, कबीर की। अगर आप बाहरी जगत से देखोगे तो पढ़े-लिखे नहीं। लेकिन राजा भी उनके यहां जाकर मस्तक टेकते थे। क्या था उनके पास? वह अपने को अपनी समझ से कहां ले गए और कैसे ले गए, किस तरीके से जीवन जिया कि वो उस स्तर पर पहुंच गए। वो थी ईमानदारी और सत्कर्म, और गुरु का अनुसरण। हम जब किसी गुरु के शरण में गए तो उसके अलावा मुझे कोई नहीं दिखना चाहिए। हमें उसके ही संस्कार ग्रहण करने चाहिए, उसके ही आचरण ग्रहण करने चाहिए। हमें उसको देखना चाहिए। मुझे थोड़ा सा सेवा का मौका मिला, मैं उसमें राग-द्वेष पैदा कर रहा हूं। और वह पूरे सिस्टम को चलाते हुए एकदम शांत, ऐसे पड़ा है पागल की तरह। मुझे थोड़ा सा सेवा का अवसर मिला अपने आप को संवारने का, तो हम कुछ लोग मिलकर वही राग-द्वेष पैदा कर लिए, वही सब आपस में गिरा लिए। और वो पूरा सिस्टम चला रहा है और एकदम आराम से, आनंद से पड़ा है। सोचो, मुझे बस तिनके जितनी सेवा मिली, वो भी तुम्हें तारने के लिए मिली है, तो मैं उसमें भी मिलकर राग-द्वेष पैदा कर रहा हूं। और वो पूरा सिस्टम कैसे चला रहा होगा, और हंसता पागल की तरह पड़ा रहता है। क्या पा लिया? कुछ तो पाया, सब कुछ पाया। कि यार पागल की तरह पड़ा है और ऐसे चल रहा है। और मैं एक घर चलाने में एकदम परेशान रहता हूं। दो-चार परिवार को पालने के लिए कितनी बेईमानियां कीं, कितनों को लूटा। और वो जंगल में मस्त पड़ा है और चल रहा है। क्या पाया उसने? कुछ तो पाया है। और मैं उसी आश्रम में, उसी कुटिया में एक सेवा में राग-द्वेष पैदा कर रहा हूं, और वो पूरा चलाते हुए भी एकदम आनंद से है, कुछ कह ही नहीं रहा। तो तुम उस स्तर पर तब पहुंचोगे जब उसके आचरण को अपनाओगे। एक डॉक्टर बनना है तो डॉक्टर का आचरण अपनाना पड़ेगा। इंजीनियर बनना है तो इंजीनियर का आचरण अपनाना पड़ेगा। उसी तरीके से पढ़ाई-लिखाई करनी पड़ेगी। अगर आप किसी को देखे हो और सोच रहे हो मैं भी ऐसा बन जाऊं, तो उसने जैसे-जैसे किया है वैसे-वैसे करोगे तभी बन पाओगे। करना पड़ेगा। अक्ल लगाने की जरूरत है। आप समझो अपने आप को। आप जिसके लिए बेईमानी कर रहे हो, करने की जरूरत ही नहीं है। ये रिश्ते सिर्फ जरूरत के हैं। आप अपनी समझ को विकसित करो। और आप अगर किसी भी रिश्ते में जी रहे हो, चाहे वो गुरु और शिष्य का रिश्ता हो, चाहे पत्नी और पति का रिश्ता हो, चाहे मां-बाप का रिश्ता हो, चाहे बाप-बेटे का रिश्ता हो, आप उस रिश्ते को ईमानदारी से निभाओ। चाहे वो मित्र का रिश्ता हो। अगर किसी को दोस्त बोल रहे हो तो फिर वो दोस्ती निभाओ। दोस्ती की परिभाषा समझो, मित्रता की परिभाषा समझो। बस कुछ भी बोल दिया। बोल-वचन से पेट थोड़ी भरता है। आपके घर कोई आ जाए, आप किसी घर चले जाओ और बढ़िया-बढ़िया बोल-वचन मारो और गद्दा लगा दो, क्या नींद आएगी? फिर वहां दोबारा जाना चाहोगे? पूरा परिवार खा-पी के सो जाए और तुम्हें गद्दा लगा दे, तो क्या दोबारा वहां जाओगे? तो मेरा यही कहना है कि भाई, किसी भी रिश्ते को अगर आप बता रहे हो तो आप पहले उस रिश्ते की परिभाषा समझो। हवा-हवाई में सिर्फ रिश्ते उछल रहे हैं। यह देखना बड़ा जरूरी है। तो मेरा यही कहना है कि सबसे कठिन हमने बना दिया ईमानदारी को। ईमानदारी अपना लो। और जहां भी जिस उपदेश से गए हो, जिस उपदेश से मिलना हुआ है, उसी उपदेश पर काम करो, उसी के लिए काम करो। आप उसी पर काम करो जिसके लिए गए हो। और काम करना है तो फिर और जगह चले जाओ, जहां जैसी व्यवस्था है वहां वैसा काम करो। अगर कोई जगह बनाया गया है तो उस जगह पर वही काम करो। अगर वह काम नहीं करना है, अगर कुछ और करना है तो उस जगह चले जाओ। भाई, आप बियर बार में जाके राम-राम कहोगे तब भी लोगों को तकलीफ है। और पीने वाला मंदिर में आ जाए तो भी तकलीफ है। राम-राम कहना है तो मंदिर जाओ, एकांत जाओ। और दारू पीना है तो बार में जाओ या कोई ऐसी जगह जाओ, तुझे कोई नहीं बोलेगा। लेकिन तुम उल्टा चाल चलते हो, सबको परेशान कर रहे हो। अब जगह है। यहां पतन की भी जगह है, उद्धार की भी जगह है। दोनों जगह हैं, जाओ। लेकिन अब उद्धार वाली जगह पर आकर तुम और लोगों का पतन करना चाहते हो। खुद तो सही चाल चल नहीं रहे हो। तो एक काम करो, पतन वाली जगह पर चले जाओ। तुम संसार में खूब बातचीत करो, तुम्हें कोई रोकेगा ही नहीं। वहां लोग इंतजार कर रहे हैं। तुम दुनिया में कहीं भी चले जाओ, तुम्हें कोई ना कोई मिल ही जाएगा तुम्हारे जैसा बातचीत करने वाला। तो साधना के स्थान पर आए हो, इतनी तो ईमानदारी रखो कि मैं जिसके लिए आया हूं, जितने क्षण में हूं, मैं वही करूं। नहीं तो चला जाओ, और जाके खूब जितना प्रपंच करना है बाहर करो। लोग तो इंतजार कर रहे हैं। इसलिए मैं बता रहा हूं कि आप वहां गिरे तो यहां उठ जाओगे। आश्रम, कुटिया इसलिए बनाया गया है। लेकिन अगर यहां से गिरे तो फिर कहां जाओगे? अगर यहां बेईमानी कर ली तो फिर तुम्हारा क्या होगा, तुम सोच भी नहीं सकते। आप एक घर बनाए, कुछ बच्चों को पढ़ा रहे हो, खिला रहे हो, पूरी जिंदगी लग गई इस बनाने में। एक व्यक्ति का पूरा जीवन लग गया है। वो जता नहीं रहा है। तो इसका मतलब यह नहीं कि आप कुछ भी करोगे। और यह मत समझना कि आप आड़ी-तिरछी बात करो, उसे पता नहीं। तुम कहीं भी बात करो, उसे चेहरा देख के पता चलता है कि तुम क्या कर रहे हो। इतना अनुभव उसके पास हो गया है, क्योंकि तुम्हारी समझ से बहुत आगे निकल गया है। जैसे जानवर के व्यापारी देख के बता देते हैं गर्भवती है कि नहीं। वो गर्भ के समय वहां नहीं थे, लेकिन पेट देख के बता देते हैं गर्भ है कि नहीं। कुछ लक्षण होते हैं। वैसे ही अगर दो साल के बाद भी गुरु आए तो साधक को देख के बता देगा कि दो साल तक इसने क्या किया। क्योंकि सुधार देखेगा। एक डॉक्टर की तरह पेशेंट को देखेगा। अगर दवा देकर गया है तो वो दोबारा आएगा तो पता चल जाएगा कि राहत में है कि नहीं। अगर कोई भी काम करता है व्यक्ति, और उसमें वह जानकार पूरी तरह है, पूरी तरह सक्षम है, तो वह आपको देख के बता देगा। जांच की जरूरत थोड़ी ना है। तो मेरा यही कहना है कि आप जहां हो, जिस रिश्ते में हो, जहां भी हो, आप जिसके लिए हो वही काम करो। अगर आप देखोगे तो आप फालतू, पूरा दिन-रात, काम कम और बर्बाद ज्यादा करते हो। बेमतलब की बातें करते हो, गपसड़ मचाते हो, जिसका जीवन में कोई मतलब ही नहीं है। आप समझो, आप जैसा बातचीत करते हो वैसा कर्म होने लगता है, फिर वैसा आप बनने भी लगते हो। तो अपनी समझदारी से रहो। और जिस उपदेश को ले आए हो उस पर पूरी तरह काम करो। मत घूमो और मत लोगों को घुमाओ। नहीं तो फिर जिंदगी, एक दिन ऐसे शरीर छूटेगा, कहां जाओगे, कुछ है तो पता ही नहीं। इतना तो पता है कि इतना गलत कर दिया हूं कि बुरा ही मिलेगा, अच्छा तो नहीं मिलेगा। अब मुंह के चक्कर में आकर तो अभी भी संभल जाओ। अभी भी मौका है। आज जिस उपदेश को ले आए हो पूरी तरह काम करो। बगल वाला कर रहा है या नहीं कर रहा है, उससे लेना-देना आपका नहीं है। उसका लेना-देना उसके पास है जिसके पास वो गया है। आप वो मत संभालो कि यह नहीं कर रहा है। तुम कर रहे हो क्या? वो नहीं कर रहा है, जिसके पास गया वो देखेगा, तुम क्या देखोगे? लेकिन हम इसी चक्कर में पड़ जाते हैं कि यार यह नहीं कर रहा है। तो तुम कर रहे हो क्या? कहां कर रहे हो? अगर तुम करते तो वह कहां दिखता तुम्हें? उसको तो वह दिखेगा जिसके शरण में आया है। या तो आपको जवाबदारी देकर गया हो, तब आप देखो। नहीं तो आप जिसके लिए आए हो वो करो, जिससे आपका उद्धार हो, जिससे आपका आत्मिक कल्याण हो।

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चंडीगढ़ से एक साधक चार-पाँच महीने से ईमानदारी और सत्कर्म सुनकर प्रभावित होकर आया। कहता है कि सभी बताते हैं, पर आप इस पर अलग से जोर देते हैं, इसलिए हृदय में बैठ गया कि इसे अपनाना ही चाहिए। अभी से शुरू किया है। सुबह की सैर में रोज़ दस-बीस रुपये के कुत्तों को खिलाता है। सैर के बाद घर से बाहर नहीं निकलता, इसलिए मनुष्य कम मिलता है, मिल जाए तो उसकी भी सेवा करता है। ईमानदारी कैसे पूरी तरह अपनाएँ, और सत्कर्म किसे-किसे करें?

चार-पाँच महीने में आपने सुना। मैं बहुत सीधी बात करता हूं। जवाब हां या ना में। आपने ईमानदारी पूरी तरह अपना ली, हां या ना? बस बात खत्म। कब से अपनाया? अभी से शुरू हुआ था। भाई, ये तो अपनाना ही चाहिए। इसको मां-बाप भी कहते हैं। सभी कहते हैं। कहते तो हैं। लेकिन ये जो कहा, इन्होंने अलग से कहा, तो इसको तभी से हो गया हृदय में कि इसको अपना ही चाहिए। तभी इससे उद्धार होगा। और सत्कर्म। जरूरतमंद की सेवा वगैरह करते हो। चलो। उसी दिन से दस-बीस रुपये रोज कुत्तों को। मैं सैर करने जाता हूं, तो वो कुत्तों को खिलाता हुआ चला जाता। कुत्तों को खिलाओ। अगर इंसान भी मिल जाए भूखा तो उनको भी खिलाना। कोई भी जीव मिल जाए। ऐसा नहीं कि कुत्ते ही। क्या होता है, लोग एक समूह पकड़ लेते हैं। समूह मत पकड़ो। अगर करो तो सबके लिए करो, नहीं तो राग-द्वेष पैदा हो जाएगा। बात ऐसी है कि सुबह सैर करने के बाद घर से बाहर नहीं निकलता, कोई काम पड़ता नहीं, तो मनुष्य की कमी हो जाती है। अगर कोई मिल गया तो उसको करता हूं। एकदम जरूर करिए। कहीं मौका मिल जाता है तो उसको करो।

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एक साधक दो-तीन महीने पहले वीडियो देखकर आया। पहले और लोगों के प्रवचन जंच नहीं रहे थे। आपका वीडियो पहले अटपटा लगा, फटे वस्त्र में बैठे किसी को सवाल पूछते देखा, आगे निकल गया, फिर लौटकर पूरा सुना तो लगा यही आत्मकल्याण का रास्ता है। पत्नी रोकती थी, बच्चों की शादी के बाद साथ चलने की बात हुई। दादी की गति देखकर लगा कि बच्चों के लिए कमाते रहने के बाद भी वही गति हो सकती है। संसार सबको लात मारता है, फिर भी लोग संसार के लिए पागल हैं। वह पूछता है, संसार में रहते हुए कर्म कैसे करें कि जीवन आत्मकल्याण की ओर जाए?

पूरी तरह नियम में रहना। नियम में रहने वाले का ही उद्धार होगा। और नियम तोड़ने वाला नीचे जाएगा। याद रखना। तो नियम में ही रहना। बगल वाला रह रहा है कि नहीं, उससे तुम्हें मतलब नहीं है। तुम्हें सिर्फ किससे मतलब है? एक अपने आप से, और एक जिसके पास आए हो उससे। बस। तो उसके बनाए हुए नियम में रहो। बस उसी में कल्याण छिपा हुआ है। देख, ईमानदारी और सत्कर्म और सत्संग। अब सत्कर्म क्या है? जरूरतमंद की सेवा। और एक, जहां से मैं लाभ ले रहा हूं उसको सहयोग करूं। जैसे यहां से कितने समय से वीडियो सुन रहा है? लगभग तीन महीने। अब तीन महीने में कुछ तो लाभ लिया होगा ज्ञान का। बहुत लाभ। तो जिसका ज्ञान ले रहा है वह व्यक्ति भी काम कर रहा है। तो देख, उसको क्या सहयोग दिया, उसके काम में हमने क्या सहयोग दिया। जिस लायक मैं हूं, चाहे एक रुपया, चाहे सौ रुपए, जिस लायक मैं हूं वहीं से सहयोग करूंगा ना। एक तो सामने वाले की जरूरत, और अपनी योग्यता। तो मेरे काम में भी सहयोग करना। किया कि नहीं? अभी तक किए नहीं। बस करते रहना। हर महीने, जैसे तुम अपने बच्चों के लिए निकालते हो, क्योंकि मैं भी तो समाज के लिए काम कर रहा हूं। अगर मैं यह काम नहीं करता, सिर्फ वीडियो बनाता, तब जरूरत नहीं थी। तब तो अपने पेट के लिए चाहिए था, तो इतना मेहनत कर लेता, कहीं भी मिल जाता। लेकिन अब काम लाखों से, हजारों से, लाखों-करोड़ों का है। तो देखना यह है कि मैं इनके काम का लाभ ले रहा हूं और यह समाज के लिए काम कर रहे हैं, दिख भी रहा है। तो मुझे भी, मेरी जितनी योग्यता है, मुझे भी हर महीने सहयोग करना चाहिए। अगर मैं सिर्फ वीडियो बनाता, ये सब काम नहीं करता, तब कोई जरूरत नहीं थी। तब तो वीडियो देखने से मिल जाता। हमको पता नहीं था कि कैसे हम क्या सहयोग करें। लेकिन जब से आप श्रीलंका गए थे, वहां से लाइव हुए, वहां से बाली गए, वहां भी लाइव देखे। तो उस समय सुनने से क्या फायदा होगा? जैसे हम सेवा करें, हमको अगर करें तब ना हम और कुछ आगे बढ़ेंगे। वही तो हमको लगा। तो हम फिर लिख के भेजे कि हमको कैसे सहयोग करें। तो आप बोले कि जाओ चैनल पर जाओ, इसमें व्हाट्सएप दिया हुआ है, स्कैनर दिया हुआ है। स्कैनर से हम अपना योगदान दिए। हां, हर महीने, जिस लायक आप हो, जहां से आप हो वहां से करो जरूर। यही तो सत्कर्म है। अगर कोई व्यक्ति किसी के काम से मुझे लाभ हुआ, अगर मैं उसे सहयोग करके ताकतवर बनाऊंगा तो मेरे लिए और कुछ कर सकता है ना वो। तो बिना लिए जब इतना कर दिया, तो जब मैं दूंगा तो क्या करेगा वो। जब उस व्यक्ति ने बिना लिए मेरे लिए इतना कर दिया जिससे मेरे जीवन में बदलाव हो गया, तो अगर मैं उसे ताकतवर बनाऊंगा तो फिर वह तो मेरे लिए और करेगा ना। आज जैसे आकर यहां कितने आनंद से रह रहे हो। कोई कमी है? कोई कमी इसलिए नहीं कि लोग सहयोग दे रहे हैं। और मैं उन्हीं लोगों से बोलता हूं जो लोग मेरे काम का लाभ लेते हैं। काम का लाभ नहीं ले रहे हैं तो वह तो सहयोग ना करें, क्योंकि वह करने के बाद फिर पछताएंगे, क्योंकि मिलेगा कुछ नहीं। हां, जितने लोग काम का लाभ ले रहे हैं, मैं उनसे यही कहना चाहता हूं। जितने लोगों को भी लग रहा है कि नहीं, इनके काम से मुझे लाभ हुआ, तो सहयोग करना चाहिए। कोई भी हो दुनिया का, सिर्फ मैं नहीं। एक होता है वीडियो बना देते हैं। तो उन्हें आप अगर नहीं सहयोग करोगे तो वीडियो देखने से ही उनको मिल जा रहा है। लेकिन अगर वीडियो बनाने के अलावा वह और भी काम कर रहा है, तो उसमें अर्थ लग रहा है। अब यहां क्या, करोड़ों का खर्च है। तो करोड़ों चैनल से थोड़ी ना आ रहे हैं। इतना वह थोड़ी ना है। तो करोड़ों का काम लोगों के सहयोग से होगा ना, क्योंकि वह बाहर काम कर रहा है। उस बाहर काम में उसे सहयोग करो। और वो आप ही के लिए तो कर रहा है भाई। ज्ञान आपने सुना, आपको समझ में आया, तो आज जगह पर व्यवस्था है, तभी तो आकर सुकून से, आनंद से रह रहे हो। अगर ये व्यवस्था नहीं होती, पेड़ के नीचे रहना होता, थोड़ी ना आप इतने आनंद से रह पाते। अगर भोजन नहीं होता, व्यवस्था नहीं होती, तो आप इतने समय से यहां रह पाते क्या? भाग जाते ना, क्योंकि भूख है ना, पेट है। धर्म भी तभी समझ में आता है जब पेट में रोटी होती है। तन पर कपड़ा होता है, बिस्तर होता है। तभी धर्म समझ में आता है। तभी सत्कर्म समझ में आता है। तभी सेवा, तब सब समझ में आता है। लेकिन तन पर कपड़े ना हों, पेट में रोटी ना हो, रात को बिस्तर ना हो, तो आपको लगता है कुछ समझ में आएगा? कुछ नहीं समझ में आएगा रे। समझ में तब आएगा जब शरीर की जरूरत की पूर्ति होगी, तब वहां सारी बात समझ में आएगी। अब शरीर की जरूरत की पूर्ति ही नहीं हो रही तो कुछ फिर समझना भी नहीं है। पहले तो शरीर, जब साधन ही खत्म होने वाला है जिससे मैं समझना चाहता हूं। यही जब खत्म हो जाएगा तो समझने की क्षमता कहां है? तो इसलिए हर महीने, जैसा भी आपका इनकम हो, हर महीने जिसके भी काम से मैं लाभ ले रहा हूं, अगर वह बाहर का कुछ काम कर रहा है तो उस कार्य में सहयोग करो। वही सत्कर्म है। और अपनी योग्यता के अनुसार, अपनी सामर्थ्य के अनुसार। पीछा मत छुड़ाना। अपने सामर्थ्य के अनुसार।

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प्रवीण कुमारी ने पूछा, एक जीव आध्यात्मिक यात्रा कैसे शुरू करता है?

एक जीव आध्यात्मिक यात्रा तब शुरू करता है, शुरुआत करता है, जब उस समझ में आता है कि यार जहां मैं हूं उसका परिणाम क्या है? जहां मैं हूं उसका क्या परिणाम है? क्या मुझे यही चाहिए? क्या मैं इसी के लिए जन्म हुआ हूं? जब ये देख पाता है कि जहां मैं हूं, वहां तो कुछ है ही नहीं मेरे लिए। यह तो सिर्फ शरीर तक के लिए है। तो मेरे लिए क्या है? जब यह प्रश्न खड़ा होता है कि मेरा क्या? यहां तो सब हमारे शरीर के साथ ही हैं। मेरा क्या होगा? शरीर छूटने के बाद मैं कहां से आया हूं? मैं कहां जाऊंगा? मेरा क्या है? मेरा आदि और अंत क्या है? ये तो मैं जितना कर रहा हूं, शरीर के लिए कर रहा हूं। शरीर तक सब साथी हैं। लेकिन शरीर के बाद क्या? जब यह सब प्रश्न खड़े होते हैं तब जाके आध्यात्मिक यात्रा की शुरुआत होती है। यार मेरा क्या? मेरा क्या होगा? ये रिश्ते भी शरीर तक। वैभव भी शरीर तक। मेरा क्या होगा? जब मैं इस शरीर से छूटूंगा तो कहां जाऊं? उसे कहीं रस नहीं आता है। ना वैभव में, ना भोग में, ना विलासिता में, ना नाम में, ना शोहरत में, ना मान में, ना सम्मान में, ना लड़ाई में, ना झगड़े में। कहता है, ये क्या है? मेरा क्या होगा? जब मेरी बात आती है। जब तक उसे लगता है कि नहीं, सब यही है, तब नहीं। जब वह खड़ा होता है कि यार ये तो सब शरीर तक है, मेरा क्या होगा? छूटना भी तो, जाते लोग छोड़ते हैं। कोई नहीं पकड़े है। सबको तुमने पकड़ा है, यूज किया है। कोई तुम्हें नहीं। तुम रोड पर एकांत में चले जाओ, तुम्हें कोई पूछेगा भी नहीं। तुम्हें वही लोग पकड़े हैं जिनको तुमने यूज किया है। ऐसे थोड़ी बुला रहे हैं तुमको। तुमने कहीं ना कहीं, किसी तरीके से, देश, काल, स्थिति, परिस्थिति में तुमने उनको यूज किया है। तो अभी समझ जाएगा तो क्या करेंगे? तो वो तो कह रहे हैं, जाओ भरपाई कर दो। वो तो कह रहे हैं, भाई जा ना, तेरे को कौन रोक रहा है? लेकिन भरपाई करके जा। और तुम्हें लग रहा है मैं भर दिया हूं, तो निकल जाओ। और निकलने में कानून का सहारा ले लो। अगर तुम्हें लग रहा है, क्योंकि कानून तभी सहारा देगा ना जब तुम भर दोगे। भर दिए हो तो सम्मान के साथ निकल जाओ। छुप के भागने की क्या जरूरत है? आप नहीं भाग पा रहे हो। इसका मतलब करो ने मुझे पकड़े हैं? नहीं। तुम्हें पता है मुझे लौटाना है, इसलिए तुम चिल्ला भी नहीं सकते। कोई नहीं किसी को पकड़ रहा है रे। यह बिना मतलब का हम दोष दे दें। मैं यहां खड़ा हूं। मुझे कोई पूछने वाला नहीं है। क्यों? क्योंकि मैंने किसी को यूज ही नहीं किया है। मैं यहां खड़ा हूं। मुझे आज तक एक भी व्यक्ति मुझसे यहां मिलने नहीं आया। मेरे रिश्ते में, रिश्तेदार, घर-परिवार, कोई नहीं। कोई नहीं। कोई बुलाता भी नहीं, ना कोई आता भी। क्यों? क्योंकि मैंने यूज ही नहीं किया। अगर मैंने भी यूज किया होता, उनका खाया-पिया होता, तो जरूर मुझे ढूंढते। वो मुझ पर निर्भर रहते। लेकिन मैंने किसी को आश्वासन ही नहीं दिया, क्योंकि आश्वासन तब देता जब उनका खाता। मैं सामने प्रत्यक्ष हूं। मुझे कोई नहीं ढूंढता। आज तक ये चिल्ला-चिल्ला के लाइव में बोल रहा हूं। मेरे घर वाले भी देखते हैं। उनमें से एक व्यक्ति भी आज तक मिलने नहीं आया, क्योंकि उन्हें पता है कि मिलेगा कुछ नहीं। और वहां जाके नियम में रहना पड़ेगा, क्योंकि यह आदमी ऐसा है, किसी को छोड़ता नहीं, क्योंकि मेरा नेचर जानते हैं। मिलेगा कुछ नहीं, फिर रिश्तेदारी भी खत्म हो जाती है। मैं कह तो रहा हूं कि मैं इसका प्रत्यक्ष प्रमाण हूं। सामने, मुझे एक व्यक्ति भी आज तक, चलो पहले पता नहीं था, अब पता है क्या? लेकिन आज तक एक व्यक्ति भी मिलने नहीं आया। एक व्यक्ति भी मेरे घर का, रिश्तेदार, कोई भी नहीं। क्यों नहीं आया? क्योंकि ना मुझसे कुछ मिलेगा ही नहीं। और यह आदमी ऐसा है कि वहां जाकर नियम में रहना पड़ेगा, क्योंकि सुनने वाला भी नहीं, क्योंकि खाया ही नहीं है। खाया ही नहीं तो सुनेगा क्यों? इसमें वो जो आपकी दृढ़ता है, वो दृढ़ता हमारे पास नहीं है। इसलिए नहीं है कि आप खाए हो सामने वाले का। सर वही झुकता है जिसका हमने खाया है। समझना इस बात को। जिसका नहीं खाया, उसके सामने सर झुकाने की जरूरत है क्या? झुकेगा ही नहीं। और तुम बाहर से कितना भी अकड़ो, अगर तुम खाए हो तो अंदर से झुक ही रहा है। बाहर से भले तुम ऐसे सीना ताने हो, लेकिन अंदर से झुक ही रहे हो। तो ऐसा नहीं रे कि तेरे को कोई आने नहीं दे रहा है। ऐसा नहीं है। कौन किसको रोकने वाला है रे। मैं तो खुद हूं। मैं भी तो किसी मां के गर्भ से ही पैदा हुआ। मेरी भी कोई पूछता ही नहीं रे। जब समझ आई तब समय चला गया। और अभी भी समय है। ऐसा थोड़ी ना है। अभी भी पूरा कर। बस पूरा ही। अभी भी पूरा कर और निकल ले। ईमानदारी करके निकलना चाहिए।

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एक साधिका कहती है कि चालाकियां इस तरीके से खत्म नहीं होतीं। यहां आने के लिए जुगाड़ किया, कई लोगों से झूठ बोला, सिर्फ पति से सच बोला कि मैं जा रही हूं। पूछती है, उस झूठ से किसी की हानि तो नहीं हुई?

भाई, चालाक रहोगे तो ऐसे भटकोगे। ईमानदार बनो, समझदार बनो। चालाक भी बनो ना, आत्मिक कल्याण के लिए। बेईमानी में चालाक क्या बनते हो? चालाकी जरूरी है आत्मिक कल्याण के लिए। इसमें बाप नहीं लगेगा। बेईमानी करेगा तो क्या। आत्मिक कल्याण में बेईमानी हो ही नहीं सकती। मैं तुझसे यह पूछ रहा हूं कि जिससे तुमने झूठ बोला, क्या उसको कोई हानि है? नहीं। तो बस बात खत्म। बस यही पूछना था। कितने लोगों को झूठ बोल के, और एक को ही सच बोला कि मैं जा रही हूं। हां, एक पति को ही सच बोला। तो बस, और कौन है रे? शादी नहीं हुई तो मां-बाप, और शादी हो गई तो पति। तो पति को तो बता के ही आई है। तो बस खत्म। तुम लोग कहते हो, यार मुझे लोग रोकते हैं। मुझे तो कोई नहीं रोका। मैं सामने हूं। मैं तो कह रहा हूं, कोई मिलने आज तक नहीं आया। दो साल यहां होने वाले हैं। पूरा पता है, लोकेशन है, लाइव देखते हैं। ऐसा नहीं है, सब है। हजारों लोगों ने फायदा लिया है, जिनको फायदा पहुंचाया है। काफी बीमारियों में लाभ पहुंचाया है। कोई एक भी मिलने नहीं आया भाई। क्योंकि उन्हें पता है, मिलेगा ही नहीं अब। दुनिया जिसको लाभ देखती है उसको ज्यादा पकड़ती है। अरे भाई, जिस जानवर में दूध है उसी को लोग पकड़ेंगे। अब दूध नहीं है, भूल से भी दरवाजे पर चले जाए तो डंडा मार के भगा देंगे। दूध है क्या? तुम्हें कोई पकड़ रहा है क्या? तो तुम काम के हो। बिना काम के तो एक ही पकड़ता है तुम्हें, गुरु। लेकिन तुम मुझसे भी भागते हो। वो कहता है, तुम रुको, मैं सब देता हूं। क्या चाहिए तेरे को? खाना, पीना, रहना। इसी के लिए संसार में तू उपयोग हो रहा है ना? चल, मैं तुझे सब देता हूं, रुक जा। कहते हो, नहीं, यहां मन नहीं लग रहा है। क्यों? क्या चाहिए? खाना, पीना, रहना, फ्री ना? खाना, पीना, रहना तो गुरु तो दे रहा है। लेकिन वहां मन नहीं लगता, क्योंकि वहां प्रपंच नहीं है। वहां दिल नहीं लगता, क्योंकि आपकी चलने नहीं देगा वो। लोग तो आपको समाज में चलने देते हैं, क्योंकि आपका उपयोग कर रहे हैं। लोग चलने देंगे क्योंकि आपको यूज कर रहे हैं। और गुरु चलने नहीं देगा। क्यों नहीं चलने देगा? क्योंकि तुम्हारी चली तो तुम अपना पतन करोगे। तो वो कहता है, तुम मेरे तरीके से चलो, जिसमें तेरा उद्धार हो जाए। अब निशुल्क व्यवस्था है, सत्संग है, सब है। कितने लोग हैं खड़े, देख लो, गिन लो। और हम चौदह हैं, इधर खड़े रहे आपके साथ। मुझे छोड़ दो। मुझे क्या लोगे? हम तो सिर्फ आपके लिए। अगर मैं यहां हूं तो आप लोगों के लिए। आप लोगों के लिए मैं यहां खड़ा हूं। मुझे पता नहीं होता कि मैं कहां होता। अगर मेरा ये काम नहीं होता तो मैं भी बता नहीं सकता कि मैं कहां होता। या तो कहीं पागल की तरह पड़ा रहता, या तो कैसे भी शरीर को छोड़ता। और कोई तो काम इस दुनिया में था नहीं। क्योंकि रिश्तों की तो बात हमने बता दी। एक आदमी भी मेरा इंतजार नहीं कर रहा है। पता नहीं आप लोग कैसे कहते हो कि मुझे लोग पकड़ रहे हैं। तूने उनको पकड़ कर उपयोग किया। किसी ने किसी को पकड़ा नहीं। पकड़ा और उपयोग किया। अब उपयोग हो रहे हैं। वही समझ गई तो। अगर हम शादी नहीं करते तो जबरदस्ती कौन करता है? कोई नहीं करता रे। शादी भी तुमने की, अपने लिए की, अपनी शरीर की जरूरत के लिए की। अब शादी वाली कह रही है कि ठीक है तू जा, लेकिन हमारी व्यवस्था करके जा। व्यवस्था तो कर दी, फिर भी मत जा। तो उसे जरूरत होगी तेरी। जो भी अभी शरीर में कुछ जान बाकी होगा, कैसे जाने देगी। अभी कुछ बाकी होगा। भाई, भोजन के साथ भोग भी तो चाहिए। सब चाहिए ना। सिर्फ रोटी थोड़ी चाहिए। भोग, भोजन, सब चाहिए।

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एक श्रोता ने कहा कि डॉक्टर भीमराव अंबेडकर को हिंदू धर्म में निराशा हाथ लगी, इसलिए वे दूसरे धर्म में गए। गुरु जी, आप अंबेडकर का प्रसंग किस बात के लिए लाए थे?

यह अभी मैं कुछ देर पहले बात किया था ना, डॉक्टर भीमराव अंबेडकर जी का। तो मैं यह नहीं कह रहा हूं। मैं धर्म की बात ही नहीं कर रहा हूं, कि उन्हें हिंदू धर्म, मुस्लिम धर्म, सिख धर्म, ईसाई धर्म। मैं कह रहा हूं कि वो भी तो गए, अपने आत्मिक कल्याण के लिए किसी धर्म को अपनाया। मेरा कहना यह है कि इतना पढ़ने-लिखने के बाद, इतना विदेश जाकर पढ़े, इतनी योग्यता होने के बाद भी अपने आत्मिक कल्याण के लिए किसी धर्म को तो अपनाया। किसी महापुरुष के शरण में, सानिध्य में तो गए। मैं यह कहना चाहता हूं। मैं यही कहना चाहता हूं कि संविधान से देश चलता है। आत्मिक कल्याण संविधान से नहीं होता। आत्मिक कल्याण के लिए किसी गुरु के सानिध्य में जाना पड़ेगा। मैं यह कहना चाहता हूं। आप लोग इस बात को समझो। बात यह नहीं कि वो किस धर्म में गए, कहां गए। कहीं तो गए। तो मैं यही तो कह रहा हूं कि आप लोग भी अपना आत्मिक कल्याण जहां आपको लगता है कर लो। मैं थोड़ी ना कह रहा हूं कि आप ये धर्म अपनाओ, ये धर्म अपनाओ। अरे, धर्म क्या है? परोपकार धर्म है। जहां मेरे आत्मिक कल्याण का मार्ग बताया जाए, वही धर्म है। धर्म क्या है? जो नहीं कर रहा है वो कौन सा धर्म है? वो भी तो वैसे ही है। करने से धर्म हो जाता है। मेरा यह कहना है कि वो गए ना अपने आत्मिक कल्याण के लिए। मैं यह कहना चाहता हूं। आप यह बात समझने का प्रयास करिए। अरे भाई, बुद्ध शासन चलाने के अधिकारी थे। वो भी भिक्षुक बनके अपने आत्मिक कल्याण के लिए गए ना। कितने सालों तक जाकर तपस्या की, कितने गुरुओं का शरण लिया। वो भी तो गए। कोई भी, किसी का भी नाम ले लो। स्वामी विवेकानंद इतने पढ़े-लिखे। अब रामकृष्ण परमहंस उनके सामने तो अनपढ़ ही थे, स्वामी विवेकानंद के सामने। लेकिन अब रामकृष्ण परमहंस जी ने स्वामी विवेकानंद को शिक्षा दी। बताइए, अब उनकी बाहरी शिक्षा रामकृष्ण परमहंस के सामने रही क्या? वो तो जिस पेज को ऐसे देखते थे, स्कैन कर लेते थे। उनको लाइन पढ़नी थोड़ी पड़ती थी। स्वामी विवेकानंद को पेज ऐसे देखना पड़ता था। वो तो जिस पेज को ऐसे देखते थे, स्कैन कर लेते थे, जैसे आपका मोबाइल स्कैन कर लेता है। एक जगह तो था कि किसी ने कई किताबें दीं, तो उन्होंने ऐसे पलट के कहा, मुझे सब याद हो गया। सामने वाला आश्चर्यचकित हो गया। बोले, इतनी किताबें तुम पढ़ लिए? उन्होंने पेज पूछा, इस पेज पर क्या लिखा है? तो उन्होंने पेज सही-सही बता दिया। तो आप बताइए, इतना पढ़ा-लिखा विद्वान व्यक्ति, बाहर के लिए, वो किसके पास जाता है? रामकृष्ण परमहंस के शरण में जाता है, और वह उन्हें पढ़ाते हैं। अब आप समझिए कि रामकृष्ण परमहंस ने फिर कौन पढ़ाई पढ़ी? बाहरी पढ़ाई तो नहीं। बाहरी पढ़ाई में तो स्वामी विवेकानंद से आगे वो नहीं थे। लेकिन बहुत आगे थे, कि स्वामी विवेकानंद समर्पण कर देते हैं और फिर उनसे सीखते हैं। स्वामी विवेकानंद को कई वर्ष लगे रामकृष्ण परमहंस के शरण में रहकर। एक दिन में थोड़ी ना ज्ञान उनको हो गया। उन्होंने कुछ आत्मानुभूति कराई थी, अपनी शक्ति के द्वारा, कुछ करा दिया था। लेकिन उनको उस स्थिति में होने के लिए कई वर्ष साधना करवाया। एक-दो दिन में थोड़ी ना हो गया। भाई, गुरु के पास आप जाते हो तो कुछ झलक दिखा देता है, अपने तरीके से। अगर कोई उसे गुरुभाव से स्वीकार करता है, तो चाहे उसके पास हो, चाहे नहीं हो, आपको कुछ झलक दिखा देगा। झलक क्यों दिखा देगा? कि तुम अपने आत्मिक कल्याण में लग जाओ। इसलिए झलक दिखाता है तुम्हारे लिए, कि तुम्हारा भरोसा थोड़ा मजबूत हो जाए। लेकिन आत्मिक कल्याण में कई वर्ष लगेंगे, जैसा आपका कर्म होगा। लेकिन मेरा कहना है भाई, लग जाओ पूरी तरह। अगर आप लग गए तो कभी ना कभी तो होगा। लग जाओ। तो मेरा यही कहना है कि आत्मिक कल्याण के लिए किसी जीवंत गुरु के शरण में जाओ और करो अपना आत्मिक कल्याण। और मैं यह काम कर रहा हूं मानव समाज के लिए। ना कि मैं हिंदू धर्म के लिए कर रहा हूं। ना तो मैं मुस्लिम धर्म के लिए कर रहा हूं। ना तो मैं सिख धर्म के लिए कर रहा हूं। ना मैं ईसाई धर्म के लिए कर रहा हूं। मैं उन लोगों के लिए काम कर रहा हूं जो लोग अपना आत्मिक कल्याण चाहते हैं। मुझे किसी धर्म से मतलब ही नहीं है। मेरा कोई धर्म का ठप्पा ही नहीं है। मैं किसी समूह, किसी समुदाय, किसी पंथ, किसी मजहब के लिए काम नहीं कर रहा हूं। मैं मानव का उद्धार कैसे हो जाए। मैं प्रत्यक्ष ज्ञान ले आया हूं। तो इस ज्ञान का कोई भी उपयोग कर सकता है। तो मेरा यही कहना था कि वह कहीं ना कहीं तो गए। मैं यह बताना चाहता हूं कि इतने पढ़े-लिखे भी लोग कहीं ना कहीं अपने आत्मिक कल्याण के लिए गए। उनके पास क्या कमी थी, बताइए? बुद्ध के पास, स्वामी विवेकानंद के पास। ये सब शिक्षित में भी शिक्षित, एकदम ऊपर के थे। डॉक्टर भीमराव अंबेडकर जी। क्या कमी थी इनकी जिंदगी में? क्या कोई कमी थी? गए ना अपने आत्मिक कल्याण के लिए। इस बात को जरा समझो। आप अपना उद्धार चाहते हो तो किसी जीवंत गुरु के शरण में जाकर, सानिध्य में रहना पड़ेगा, तभी होगा। नहीं तो ऐसे ही कभी देवता, कभी राक्षस, फिर कभी पशु बनके जीते रहो।

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एक साधक कहता है, मैं सोचता हूं आपके पास आना है, पर होता ही नहीं। क्या करूं?

आपको मेरे पास आना है तो आ जाओ।

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एक श्रोता श्री गुरु ग्रंथ साहिब का जिक्र करके पूछता है कि आप खोज-शब्द क्या बोल रहे हैं, आप क्या कह रहे हैं?

आप सुनो। चैनल पर जाकर कुछ वीडियो सुनो। फिर मैं क्या बोल रहा हूं, क्या कर रहा हूं, आपको समझ में आएगा। पता दिया गया है। और समझना है तो अपनों की कुटिया में आ जाओ। आपको राम की तरह, कबीर की तरह होना चाहिए। जिसमें आपका कल्याण हो जाए, वह बन जाओ। ईमानदारी शब्द में सब कुछ छुपा है।

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डॉक्टर बसीर अहमद पूछते हैं, कर्म अच्छे से करना है, मूल मंत्र क्या है?

कर्म अच्छे से करना है। मूल मंत्र एकदम ईमानदारी से। कुछ भी, सब छूट जाए, ईमानदारी ना छूटे। बस। सब छूट जाए, क्योंकि ईमानदारी में तुम हो, बेईमानी में लोग हैं।

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स्वामी जी कहते हैं कि सफाई में देश का कल्याण छुपा है, आसपास साफ-सफाई हो। इस पर क्या कहना है?

साफ-सफाई अंदर की होनी चाहिए। अगर अंदर की साफ-सफाई हुई तो बाहर गंदगी होना बंद हो जाएगा। आप बाहर कितना भी साफ करवाओगे, फिर गंदा करने वाले गंदा कर देंगे। गंदा क्यों किया जा रहा है? उस गंदा करने वाले को रोक दो। प्रकृति तो हर साल पूरी सफाई कर देती है। गंदगी कहां से हो रही है? जिस व्यक्ति के द्वारा गंदगी हो रही है, उस व्यक्ति को रोको। तो हमें अंदर की सफाई करना बहुत जरूरी है।

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गुरु से बंधन में फंस गया हूं। अपने आप को कैसे निकालूं? बंधन हाथ के विकारों में है।

बस ईमानदारी और सत्कर्म अपनाओ। विकारों वाला काम मत करो। और सत्संग सुनते रहो।

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आप अपनी व्यवस्था अलग बनाना चाहते हैं। फिर क्यों नहीं सरकारी व्यवस्था में शामिल होते, किसी राजनीतिक पार्टी में? आपकी योग्यता ज्यादा रहेगी तो साधकों को ज्यादा लाभ होगा।

मेरे काम में जितने लोग लाभ ले रहे हैं, इतने लोग सहयोग करें तो मैं काम बहुत अच्छे तरीके से करके निकल जाऊंगा। मुझे किसी बाहर की जरूरत नहीं है। जितने लोग लाभ ले रहे हैं, बस वह सहयोग करें।

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