प्रश्नोत्तर P7-0091 · भाग 7
भाग्य क्या है? भाग्य में जो लिखा है वह कैसे मिलता है, प्रारब्ध से या कर्म से? भाग्य कौन तय करता है?
भाग्य का मतलब है कि आपको कुछ मिल रहा है, चाहे वह अच्छा हो, चाहे बुरा हो, उसे भाग्य कहते हैं। उसका नाम भाग्य है। अब मिलता कैसे है? प्रारब्ध क्या है, उसे समझते हैं। हमने कुछ किया है और हमें मिल रहा है, वह प्रारब्ध है। उसे प्रारब्ध कहते हैं। और फिर कर्म है। अगर हमारे साथ कुछ भी हो रहा है, मुझे कुछ भी मिल रहा है, तो वह मेरे कर्म का परिणाम है। जैसा मैंने कर्म किया है, उसी का परिणाम मुझे मिल रहा है। जैसे कोई व्यक्ति फैक्ट्री में काम करता है, उसे पेमेंट मिलता है। जितने दिन का किसी ने काम किया है, उतने दिन का उसको पेमेंट मिल जाता है। अब पेमेंट मिला, उसके भाग्य से मिला। भाग्य कैसे बना? कर्म से बना। जिसने जितने दिन की हाजिरी लगाई थी, मेहनत किया था, कर्म किया था, वही प्रारब्ध बनकर भाग्य के वजह से उसे मिल गया। उसका नाम भाग्य रख दिया गया है।
कहने का तात्पर्य यह है कि आपके साथ कुछ भी हो रहा है, उसके जिम्मेदार आप हो। जैसा आपने कर्म किया है, वैसा आपको परिणाम मिल रहा है। अब जीवन जीने के लिए दो रास्ते हैं इस दुनिया में। भाग्य का मतलब यह मत सोचिए कि आप प्लानिंग से कुछ बुरा कर रहे हो, तो कह दो मेरे भाग्य में यही था। नहीं। जब आप करते हो तो आपको पता है कि क्या गलत है, क्या सही है। गलत में आपको प्रयास करना पड़ता है। अब वह भाग्य में है नहीं, लेकिन आप उसे बना रहे हो। अंतरात्मा कह रही है कि मत करो, क्योंकि आपको कर्ता का अधिकार दिया गया है। आप यह मत सोचना कि आप किसी के साथ बुरा काम कर रहे हो और आपको लगा कि मेरे भाग्य में था। ऐसा नहीं है। आपने प्लानिंग से किया है। उसका भी परिणाम आपको मिलेगा। क्योंकि जब आप कोई भी कर्म करते हो, तो आपके पास उस समय दो रास्ते होते हैं कर्म करने के। एक ईमानदारी और एक बेईमानी। यह स्वतंत्रता आपके हाथ में है। आपको कर्ता का अधिकार दिया गया है। इसलिए कोई भी काम सोच समझ के करें, क्योंकि जब उसका परिणाम मिलेगा तो उस समय आपको ही उसका सामना करना पड़ेगा। फिर आपको कोई बचा नहीं पाएगा। वहां सेटिंग नहीं चलती है। हर व्यक्ति सेटिंग लगाना चाहता है कि मैं बच जाऊंगा, लेकिन वहां सेटिंग नहीं लगती है। इसलिए कुछ भी कर रहे हैं, सोच समझ के करिए, क्योंकि आने वाले समय में आपको उसका सामना करना पड़ेगा। करना ही पड़ेगा, चाहे कुछ भी हो जाए। जैसा आपने किया है, वैसा आपको मिलेगा।
कहने का मतलब है, भाग्य वही है, आपका किया गया कर्म का परिणाम। आपने किया है, वही आपको मिल रहा है। उसी को आप चाहे प्रारब्ध कहिए, चाहे भाग्य कहिए, कुछ भी कह दीजिए। जितना भी आपको मिल रहा है, आपके कर्म से मिल रहा है। इस सिद्धांत को समझ लीजिए। इसलिए कुछ भी करने से पहले सोच समझ कर करिए, क्योंकि उसका परिणाम भी कभी न कभी आएगा आपके सामने, और उसका सामना आपको करना ही पड़ेगा। भाग्य को लेकर, प्रारब्ध को लेकर, कर्म को लेकर कोई प्रश्न हो तो पूछ लेना। हमने बता दिया।
अपने घर में जो भी प्राणी आया है, वह भी उसी से ही आया है। लेनदेन आपका कुछ था। उस लेनदेन को पूरा करने के लिए आया है। अब वह लेनदेन में ईमानदारी करेगा तो आपसे छूट जाएगा। बेईमानी करेगा, दोनों तरफ से बेईमानियां होंगी, तो दोनों फिर मिलने के लिए तैयारी कर रहे हैं। अगर एक तरफ से ईमानदारी हुई और एक तरफ से बेईमानी हुई, तो ईमानदार वाला छूट जाएगा। वह अपने बेईमानी का परिणाम कहीं और भोगेगा। अगर लेनदेन खत्म करना है तो ईमानदारी और सत्कर्म के साथ जीवन जियो। अगर आपको निकलना है इस भवसागर से, तो सबसे आसान रास्ता है ईमानदारी और सत्कर्म। यह आसान रास्ता आपको चुनना पड़ेगा। यही रास्ता है निकलने के लिए।
और बाद में बड़ी उम्मीदें हैं आपकी। मैं यह देख रहा हूं कि लोग इस मार्ग में भी चल रहे हैं, तो कुछ अनुभव करना चाहते हैं। यह नहीं समझ पा रहे हैं कि अगर आपने किसी शक्ति का कुछ भी अनुभव किया, तो वह आपसे अलग होगा। आप उसमें फंस जाओगे। मैं यह देख रहा हूं कि अध्यात्म में भी लोग पागलपन कर रहे हैं। वह कुछ अनुभव करना चाहते हैं। उन्हें समझ में नहीं आ रहा है कि आप अगर अनुभव करोगे, तो अनुभवकर्ता और जिसके द्वारा अनुभव हो रहा है, दोनों अलग हैं। फिर द्वैत में फंस गए। अनुभव से मुक्त होना है मुझे। मुझे अपने आप में, स्व में, स्थिर होना है। मुझे कुछ नहीं चाहिए में आना है। लेकिन मैं यह देख रहा हूं कि ज्यादा देर तक व्यक्ति टिक नहीं पा रहा है। कुछ नहीं चाहिए का भाव तो बना रहा है, लेकिन टिक नहीं पा रहा है। अगर इस भाव को आप रखो, चाहे महीने लगें, चाहे साल लगें, चाहे कई वर्ष लग जाएं, अगर कुछ नहीं चाहिए में आप जियो, ईमानदारी और सत्कर्म के साथ, तो कभी न कभी आप स्व में स्थिर हो जाओगे।
लेकिन मैं यह देखता हूं कि लोग बातें तो करते हैं, कुछ नहीं चाहिए, फिर कहते हैं कुछ हुआ नहीं, क्या होगा। होने से ही तो मुक्त होना है। क्या करवाना चाहते हो? कुछ नहीं चाहिए मतलब हमें अपने तरीके से कुछ नहीं चाहिए। हमें जरूरत में जीना है। शरीर की जितनी आवश्यकता है, उसमें जीना है। मान का चक्कर छोड़ना है, शान का चक्कर छोड़ना है। हमारी शरीर की जितनी जरूरत है, उतने में मुझे जीना है।
सत्संग वीडियो देखेंऐप में खोलें
वीडियो: भाग्य कौन तय करता हैं प्रारब्ध या कर्म ? Aadhyatmik Pratyasth Gyan Yogi · 2025-07-03