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प्रश्नोत्तर P7-0019 · भाग 7

कैसे का भेद और कौन का भेद कैसे मिटता है? तुम कौन हो, यह कब पूछा जाता है? जरूरत खत्म होने पर मैं और तुम क्या रह जाते हैं?

कैसे वाला भेद, कैसे मार्ग, बताइए। कौन वाला। कौन का भेद। कौन भेद ही तो है। यह भेद मिटे तो आत्मवत् सर्वभूतेषु। सारे जीव-जगत आपके समान। तुम कौन हो, यह मैं आपसे तभी पूछूँगा जब मुझे आपसे कुछ चाहिए। अगर मुझे आपसे कुछ नहीं चाहिए तो मैं आपसे पूछ ही नहीं सकता कि तुम कौन हो। कोई कह सकता है कि उसमें कुछ स्वार्थ है। कुछ भी तो है। कुछ मुझे चाहिए। बात चाहिए की है। अगर कुछ चाहिए तो मैं आपसे पूछूँगा कि आप कौन, तब मैं बताऊँगा कि मुझे यह चाहिए। और मुझे कुछ नहीं चाहिए तो मुझे पूछने की जरूरत ही नहीं। अगर मैं पूछना भी चाहूँ तो नहीं पूछ पाऊँगा। कैसे पूछूँगा। तुम तुम हो। मैं मैं हूँ। ना तुम हो, ना मैं हूँ। ना मैं हूँ, ना तुम। बस जरूरत में हम और तुम। जरूरत खत्म होते ही खत्म। हम ना, तुम ना। तुम ना, हम ना। हमारी जरूरत की वजह से हमने एक-दूसरे को जन्म दिया। दवा मँगानी है तो दुकानदार है। दुकानदार का परिचय है। अगर वह जरूरत खत्म हुई तो उसके और मेरे में कोई भेद नहीं। जरूरत खत्म। ना तुम तुम, ना मैं मैं। जरूरत ने पैदा किया तुमको। और तुमको बताना पड़ा कि मैं हूँ। क्या भाव पैदा होने लगता है। जरूरत खत्म तो सब खत्म। तुम भी खत्म। प्रकृति यह प्रत्यक्ष कराती है। शरीर नष्ट हो गया। सारी जरूरत खत्म हो गई। सारे लोग खत्म हो गए। कोई संबंध बना बचा ही नहीं। लेकिन वहाँ तक पहुँचने से पहले बोध नहीं हो पाता। उसके बाद कौन बचा। मरने वाले के अंदर कोई स्मृति नहीं है। जीने वाले के अंदर भी मरने तक स्मृति है। उसके बाद दिखाती है। हर बार पिक्चर दिखाती है। पिक्चर ही तो देख रहे हैं। काश इस पिक्चर को देखने से मुक्त हो जाते। लेकिन पिक्चर देखने में लगे हैं। हर बार जीवन में एक नई कहानी साथ आ जाती है। पता है कि शुरुआत क्या है और आखिरी क्या है। पता है। आदि और आखिरी। और शायद पूरा पता नहीं है। तभी तो थोड़ा सा अटका है। अगर वह बहुत ज्यादा पता चल जाता तो बुद्ध हो गए होते। इतना तो पता है कि आप जिस जगह पर हो, आपका क्या परिणाम होगा। कुछ ढीला-ढाला पता है। ज्यादा ठोस पता नहीं है। आइडिया की तरह पता है। विचार की तरह पता तो है। जरूरत खत्म, सब खत्म। जरूरत में तुम। जरूरत खत्म, तुम भी खत्म। और तुम खत्म तो मैं खत्म। क्योंकि तुम्हारे लिए तो मैं पैदा हुआ। तुम्हारे बगैर तो मैं था ही नहीं। मैं अकेले कौन सा। इसलिए मैं कहता हूँ कि जरूरत में जियो। और एक समय ऐसा आएगा कि कहोगे, अरे मेरी जरूरत ही नहीं है। यह तो शरीर की जरूरत है। इसलिए मैं कहता हूँ, अभी जरूरत में जियो। एक समय ऐसा आएगा कि समझ में आ जाएगा, मेरी कोई जरूरत ही नहीं है। शरीर रहने तक शरीर की जरूरत तो है। लेकिन आपने अपनी जरूरत बना के रखी है। इससे निकलने के लिए आपको जरूरत में जीना पड़ेगा। एक समय ऐसा आएगा, कहोगे, अरे मेरी जरूरत ही नहीं है। ऐसा समझ में आए। इसलिए हम कहते हैं, जरूरत में जीना चालू कर दो। बस।

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वीडियो: आध्यात्म को ना जानते हुए ईमानदारी सत्कर्म के साथ क्या आत्मज्ञान संभव है ? #livesatsang · 2025-03-13