प्रश्नोत्तर P7-0161 · भाग 7
मैं इस कुटिया को अपनी मानता हूं। छोटी-छोटी बिगड़ने वाली चीजें, जो औरों को नहीं दिखतीं, उन पर ध्यान रखता हूं। पहले लगता था लोग मेरे तरीके से नहीं कर रहे, गलत लगता था। अब समझ आया कि सबकी समझ अपनी है। खाना बनाने में मन लगता है। सारा छोड़ दूं तो कमजोरी आ जाएगी, इसलिए अपना काम भी करता रहता हूं। बोलचाल में गलती हो जाती है। यह कुटिया किसकी है, और यहां कैसे रहें?
जरूर ध्यान देना चाहिए। आप छोटी-छोटी चीजें बचाया करो। ये लोग बड़ी-बड़ी बचाया करेंगे। जितनी समझ है, सबकी अपनी समझ है। अच्छा ही काम कर रहे हैं। कोई खराब काम नहीं करते। थोड़ा-बहुत हो जाता है।
समझा सकते हो। अगर वे मेरा तरीका समझ जाएं, तो बहुत बढ़िया। ना भी समझें, तो कोई बात नहीं। छोड़ दो। कोशिश करो कि तरीका समझ लें। नहीं समझते, तो छोड़ दो। जितना हो रहा है, उतना बना रहे हो। सेवा अपनी भी करते रहोगे। सारा छोड़ दोगे, तो कमजोरी आ जाएगी। इसीलिए अपना करते रहो। लगे रहो। जहां तुम लगे रहते हो, वहां और लोगों का भी दिल काम करने में बढ़ जाता है। खड़े रहोगे, तो मालिक जैसा लगेगा, उन्हें भी लगेगा। थोड़े करेंगे, तो बराबर में रहेंगे। आराम से रहो।
तुमने कहा ना, मेरी कुटिया है। तो आप ही की है यह कुटिया। आपको लगता है मेरी है। मेरा उद्देश्य यही था। अगर मुझे कुटिया चाहिए होती, तो मैं बारह साल ऐसे नहीं घूमता। कुटिया की जरूरत मुझे जब निकला था, तभी थी, इस तन को, इस शरीर को रखने के लिए। मैं तो बारह साल ऐसे ही घूमा। कभी कुटिया बनाई क्या? कुटिया बनाने का उपदेश आप ही लोगों के लिए है। यह कुटिया मैंने अपने लिए बनाई ही नहीं है। यहां बात यही है, कि यह उसी की कुटिया है, जो यहां के नियम में रहता है, जो नियम चलाए। क्योंकि नियम सर्वोपरि है। उसी की है। और नियम तोड़ा, तो उसकी नहीं रही। फिर यहां रहने के लायक नहीं। तो यह कुटिया आप ही लोगों की है। इसी भाव से मैंने बनाई भी है।
अगर मैं इस भाव से नहीं बनाता, तो आज यह ऐसी नहीं होती। कभी ऐसा होता है कि यह फट जाएगी। यहां पक्का नहीं है, और पतरा उधर नहीं है। अगर मुझे अपने लिए बनाना पड़ता, तो पक्का इधर होता, और पतरा उधर होता। शेड इधर बनती, और अपने लिए पक्का रहता। भले छोटा ही बनाते, पर जैसे भी बनाते, बढ़िया बनाते। आज गर्मी में आग लग रही है। यहां मैं अपने लिए नहीं बनाता। मुझसे कोई पूछने वाला था नहीं। मैं आप लोगों के लिए बनाया, इसीलिए यह इधर है, और वह उधर है। अपना छोड़ के आ गया। यह आप लोगों का है। छोड़ के आया, और उसका कोई एहसास अंदर नहीं है। जो रखा है, उन्हीं की कीमत है।
धीरे-धीरे सब हो जाएगा। अपना मकान ये अपनी दम से छोड़ना नहीं चाहते। अभी सोचता हूं, कभी इसको हटा दूं यहां से। पर ये हटने वाले हैं। धीरे-धीरे सब हो जाएगा। आप लगे रहो।
एक-दो दिन में लोग भागते थे। इसलिए सात दिन रखा। अभी पंजाब वगैरह से मैसेज आया था। उन्होंने कहा, हमें आना है। मैंने कहा, आ जाओ। फिर उन्होंने कहा, सात दिन से कम रुक सकते हैं क्या। मैंने कहा, सात दिन से ऊपर की बात करो। नीचे की बात तो कतई मत करना। कोई फायदा भी नहीं है। सात दिन से ऊपर की बात करो, नीचे की बात मत करो। सात दिन आओ, रहो, और जाओ। मुझे रखना है, तभी तो सात दिन कहा। नहीं तो एक-दो दिन में लोग भागते थे, पता भी नहीं चलता। तो आप लोग रहो, और कल्याण करो। मैं नहीं चाहूंगा कि कोई जाए।
सत्संग वीडियो देखेंऐप में खोलें
वीडियो: रविवार प्रश्नोत्तरी 12 अप्रैल 2026, अपनों की कुटिया में सत्संग समझो #योगी · 2026-04-12