आध्यात्मिक प्रत्यक्ष ज्ञान · ऐप में खोलें

प्रश्नोत्तर P7-0041 · भाग 7

आत्मज्ञान होने पर क्या अनुभव होता है? और दिन-प्रतिदिन जो दुख-सुख का घर्षण है, उसके साथ कैसा तालमेल रहे?

अनुभव कहाँ रहा। आत्मज्ञान होता है, अरे जो होता था वह खत्म हो जाता है। बस होता क्या है। कुछ नहीं। कुछ नहीं होता। वही आत्मज्ञान। होना खत्म हो जाता है। आप इसे समझिए। जब तक कुछ है, तब तक ज्ञान नहीं है। वह जानकारी दूसरों की जानकारी है। संशय ही ना। उसे कुछ चाहिए नहीं। ना दुख, ना सुख। शरीर तो अनुभव करेगा। शरीर को देखो। शरीर से आँखों से आँसू भी आएँगे। एक दिन की बात बता रहा हूँ। इस उंगली में बहुत तेज दर्द हो रहा था। अंदर कुछ हो गया था। हमने सत्संग किया, चला गया, सो गया। लेकिन नींद नहीं आ रही थी। उस पीड़ा को भी देख रहा था। एकदम देख रहा था। करवट भी बदल रहा था, वह भी देख रहा था। सुबह सत्संग करना था। शरीर को आराम देना बहुत जरूरी था। जो व्यक्त हो रहा है, शरीर से ही तो हो रहा है। मैं वही देख रहा था। मैंने देखा कि पीड़ा किसको है। तो पता चला, मुझे नहीं। बस यही। देखा, तो उस पीड़ा में मैं नहीं था। एक प्रतिशत भी मैं यह नहीं बोल सकता कि मुझे पीड़ा हुई। लेकिन करवट बदल रहा था, वह भी देख रहा था। नींद नहीं आ रही थी, वह भी देख रहा था। हँस भी रहा था। मेरी पीड़ा नहीं है, इसलिए हँसी आ रही थी। फिर भी पीड़ा थी। उस पीड़ा से बेचैनी कहीं थी। बेचैनी यह थी कि सुबह सत्संग करना था। अगर नहीं सोऊँगा तो सही से शरीर काम नहीं करेगा। मेरे पास कुछ नहीं था, मोटी सी सलाई ली। चुभने में भी दर्द था। देखा कि दर्द मेरा नहीं है। उस दर्द में मैं नहीं था। यह मैं देख पाया। हम उसे साक्षी भाव भी नहीं कह सकते। देख रहा था। सीधा दिख रहा था। साक्षी भाव का मतलब है जो हो रहा है उसको देखना। लेकिन कोई कर भी तो रहा है। साक्षी भाव कर्म में होता है। यहाँ तो सिर्फ यह शरीर था और मैं था। जब इस शरीर के द्वारा कुछ कार्य होता है, तब एक करने वाला और एक देखने वाला। कहीं गलती ना हो जाए, उसे साक्षी भाव कहते हैं। वहाँ तो साक्षी भी कोई नहीं था। साक्षी भाव बाहर होता है। यहाँ तो शरीर था और मैं था। सीधा दिख रहा था। साक्षी भाव तो तीन में होता है। मैं हूँ, शरीर है, और कोई और। अगर कोई और है तो साक्षी भाव बोलो। लेकिन मैं और शरीर, और शरीर में पीड़ा देख रहा था। यह पीड़ा तो मेरी नहीं। बहुत हँसा। मुझे सुबह सत्संग नहीं करना होता तो मैं रात भर उस पीड़ा को देखता रहता। लेकिन सुबह सत्संग करना था, इसलिए मैंने उस पीड़ा को हटाया। उसे फोड़ दिया। जो भरा था निकल गया, तो आराम हो गया। सत्संग करना था इसलिए। कुछ समय पहले आप लोगों को बताया भी था। ऐसी घटना हुई। एक दिन मैंने देखा। बचपन से देखा था, लेकिन उस दिन का देखना अलग था। मैं सोया था। देखा तो एक चिड़िया बगल में रखी कढ़ाई को चोंच मार रही थी। खट-खट। मेरी नजर गई, और मैं उसे देखता रहा। यही हालत हमारी है। हम समझ रहे हैं, हमारे अलावा कोई है। कढ़ाई की वजह से उसे लग रहा है कि मेरे अलावा कोई है। लेकिन सही पूछो तो कढ़ाई है। कुछ चाहिए की वजह से कोई लग रहा है, लेकिन है नहीं। वह कढ़ाई में सोच रही है दूसरी चिड़िया है, और मार ही रही है। बचपन से देखा था, लेकिन यह एहसास नहीं हुआ था। हमारी हालत यही है। प्रतीति को सत्य मान लिया। यही हालत तो हमारी है। मतलब कढ़ाई हटना चाहिए, तभी कुछ समझ में आएगा। नहीं हटी तो भ्रम नहीं टूटेगा। इच्छा, अपेक्षा, चाहिए, यही है।

सत्संग वीडियो देखेंऐप में खोलें

वीडियो: आध्यात्म को ना जानते हुए ईमानदारी सत्कर्म के साथ क्या आत्मज्ञान संभव है ? #livesatsang · 2025-03-13