प्रश्नोत्तर P7-0078 · भाग 7
समाज और परिवार के लिए व्यक्ति सब कुछ करता है। खाना हो तो पहले परिवार खाए, कपड़ा हो तो पहले परिवार पहने, और फिर भी सहना उसे खुद पड़ता है। उस समय गुस्सा आता है, उसे पीना और कंट्रोल करना पड़ता है। क्या ये गुस्सा हमारा स्वभाव है? गुस्सा क्यों आता है, जब हम कुछ कर रहे होते हैं और परिणाम नहीं आ रहा? परिवार को सौ प्रतिशत देते हैं, हमसे अच्छा खाने और पहनने को देते हैं, पर कहते हैं वो काम मत करना जो बहुत दुखाता है। तब गुस्सा होता है, नाराजगी होती है। कितनी बार कोई ये सहेगा? एक दिन टूट जाएगा, रोते हुए कहेगा, जैसे जीना है जियो। न अलग हो सकता है, न हिला सकता है। अगर समझाने के बाद भी कोई छत से कूदने की बात करता है, जानकर खतरा मोल लेता है, तो उस स्थिति में क्या करना चाहिए?
गुस्सा इसलिए आ रहा था कि मैं कुछ कर रहा हूं, और उसका परिणाम नहीं आ रहा। तब गुस्सा आ रहा है। लेकिन वो मेरा स्वभाव नहीं है। आएगा ही आएगा। आप उसे बस पी सकते हो, दोबारा। फिर आए, तो पी लो। नहीं पीना है, तो उसी को पीना है। क्योंकि वो आदमी फिर दूर हो जाएगा। अगर आपको उससे प्रेम है, तो पीना पड़ेगा। उसके लिए आपको पीना पड़ेगा। क्योंकि उसकी क्षमता नहीं है। वो प्यार को संभाल नहीं पा रहा। गुस्से को क्या संभालेगा।
अगर सामने वाला दुरुपयोग कर रहा है, तो मैंने कुछ देर पहले क्या कहा। सदुपयोग में करो। अगर आपका दुरुपयोग हो रहा है, तो मत करो। ये कहीं न कहीं लायक बनेंगे, तो समाज में क्या फैलाएंगे। आने वाले समय में इनके पास ताकत हुई, तो ये उस ताकत का सदुपयोग करेंगे। समाज में ऐसे लोग हैं। ऐसे लोगों को ताकत बहुत जरूरी है।
पर परिवार में भी यही है। कोई भाई ऐसा कह रहा है कि ये काम ऐसे नहीं करना। और कोई कह रहा है कि छत से कूदने में अच्छा लग रहा है। आप कहते हो, भाई, मत कूद। चुपके से तेरे हाथ-पैर टूट जाएंगे। वो नहीं कर रहा, नहीं मान रहा, समझाने के बाद भी। उस परिस्थिति में उस इंसान को क्या करना चाहिए।
शब्द नहीं बोलना चाहिए। नहीं तो कहेगा, तुम्हारे कहने से कूद गया। फिर आप जिंदगी भर अपने आप को कोसोगे। आप उसे समझा दीजिए। और बोल दीजिए, फैसला तेरे हाथ में है, और मैं जा रहा हूं। अब उसके हाथ है। वो कूद गया, पीछा छूट गया, तो क्या करोगे। कब तक आप उसकी चौबीस घंटे रक्षा करोगे। फिर वो बोलेगा कि अब तेरा फर्ज बनता है। उसे डॉक्टर के पास उठाकर ले जाओ। कौन सा फर्ज बनता है। फर्ज बनता ही नहीं।
जब कोई काम करते हुए गिर जाता है, छिटक जाता है, तब फर्ज बनता है। वो जानकर कर रहा है। हमें उसके पास जाना ही नहीं चाहिए। क्यों। क्योंकि वो दोबारा कूदेगा। अगर आप एक बार नहीं बचाओगे, तो वो दोबारा नहीं कूदेगा। क्योंकि उसने समझकर किया है। तो उसका साथ मत दीजिए। अगर जाने-अनजाने में हुआ है, छिटककर गिर गया है, तब आपका कर्तव्य बनता है। तब उसकी पूरी सहायता करना, चाहे कोई भी व्यक्ति हो।
लेकिन वो समझकर, पूरी तरह जानकर कर रहा है। धमकी देकर कर रहा है। तो ठीक है, जा। तू कभी न कभी तो करेगा। तेरे जैसे आदमी को लेकर क्या करेंगे। तू तो मेरे दुख का कारण रहेगा। एक ही बार अगर गया, तो गया। कम से कम सारा दुख खत्म तो हो जाएगा। नहीं तो पता चला, मैं कहीं भी रहूं, कूद न जाए, मार न डाले। तू जिंदगी भर मुझे मारेगा क्या। तू तो नहीं मरेगा, लेकिन तू मुझे मारेगा।
और हां, शारीरिक मरना ठीक है। लेकिन मानसिक मरना बड़ी तकलीफदायक होता है। क्योंकि शारीरिक दर्द एक बार होता है। मानसिक पीड़ा पूरी जिंदगी देती है। तो ऐसे व्यक्ति को छोड़ देना चाहिए। क्योंकि ऐसे व्यक्ति बहुत गिरे होते हैं, जो मरने की धमकियां देते हैं। ये बहुत नीचे स्तर के लोग होते हैं। चाहे भाई हो, चाहे कोई भी हो। ऐसे लोगों का त्याग कर देना चाहिए। क्योंकि इनका अस्तर बहुत गिरा हुआ है। ये आपको दुख ही दुख देंगे।
फिर इमोशनल ब्लैकमेल। अगर मुझे कहीं भी करना है, तो उसका क्या सही है। नहीं। एक बार इनके झांसे में पड़ गए, तो ये जिंदगी भर, कुछ भी होगा, मर जाऊंगा, कहकर तुम्हारी जिंदगी नर्क बना देंगे। तुम्हें जीने ही नहीं देंगे। क्योंकि तुम कहीं भी रहोगे। उनकी जरा सी इच्छा पूरी नहीं कर पाए, तो तुम सोचोगे, मर न जाए यार। तुम एक काम करो। मर जाओ। मरने में तुम भी खुश, और मैं भी खुश। तुम्हें मरना है, तो मरो। एक दिन पक्का तुम मरोगे। तुम्हारे जैसे लोग रहकर करेंगे क्या। ऐसे लोगों का त्याग कर देना चाहिए। चाहे साथी हो, चाहे परिवार हो, चाहे समाज के लोग हों।
मैंने इनका प्लस पॉइंट भी बताया। ईमानदार आदमी कहां जल्दी मिलते हैं। सच्चा इंसान। अपने घर में भी देखो, कितने लोगों को बोल सकते हो। क्या पूरे परिवार को बोल सकते हो। कोई-कोई मिलता है।
मेरा कहना है, अगर ईमानदार और सच्चा व्यक्ति मिल जाए, तो समझ लेना कि वो परमात्मा के बहुत करीब है। बस वो अकड़ की वजह से, आवेश की वजह से, जज्बात की वजह से दूर है। इतनी सी बात है। वो बहुत करीब है। उसे बहुत मेहनत नहीं करनी। उसे बस इतनी मेहनत करनी है कि अपनी अकड़ को, अपने आवेश को, अपने जज्बात को हटा दे। बस। और ये जल्दी नहीं हटता। क्योंकि उसी को वो सब कुछ समझता है। वो जल्दी ये छोड़ता नहीं। वो सोचता है, ये है तो मैं हूं। वो उसे पाल-पालकर अपने आप को ताकतवर समझता है। आवेश को, जज्बात को, अकड़ को।
ऐसा ईमानदार और सच्चा व्यक्ति ही परमात्मा को देख पाता है। और कौन देख पाता है। इतिहास में अगर परमात्मा के बारे में किसी ने बोला है, तो कौन बोला है। वो सच्चे लोग थे, ईमानदार लोग थे। और क्या थे।
तो आपका परिवार हो, चाहे समाज का कोई व्यक्ति हो। अगर वो आपके धन का, तन का, और आपकी समझ का सदुपयोग करे, तो उसकी सहायता दो। और नहीं करे, तो त्याग कर दो। दुरुपयोग अगर कोई भी करे, तो तुरंत त्याग ही परम सुख है। ऐसे व्यक्ति का तुरंत त्याग कर दो। कोई भी हो। आपके धन का, आपके तन का, आपके ज्ञान का सदुपयोग करे, उसकी सहायता करो। वो चाहे कोई भी हो। और नहीं करता, उसका त्याग करो। बात खत्म।
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