प्रश्नोत्तर P7-0075 · भाग 7
सुधारक अपनी पूरी जिंदगी पहले तप में लगाता है, फिर समाज के कल्याण में। जैसे वृक्ष जितना ऊंचा होता है, जड़ें उतनी गहरी होती हैं। बीज का आवरण टूटे बिना पौधा नहीं बनता, और वो टूटना हमें सहन नहीं होता, क्योंकि आगे क्या होगा, पता नहीं। हम उसी आदत में जीते रहते हैं और भीड़ का अनुसरण करते हैं। भीड़ सुंदरता का या किसी और चीज का पैमाना रख दे, तो कमी छुपा ली जाती है, जैसे टोपी लगा ली। छुपाकर न हम जिंदगी जी पाते हैं, न सच में खड़े हो पाते हैं। भीड़ का अनुसरण क्यों करते हैं? क्या मेरे अंदर कमजोरी है या खालीपन है? आवरण आखिर क्या चीज है, और हमारे अंदर ये कमजोरी क्यों है कि हम दूसरे की नजर में अपने आप को भरना चाहते हैं?
इसलिए कि आप योग्य नहीं हो, और उसके सहारे योग्य बनना चाहते हो। आप मेरे साथ अभी घूमके आए। आप भी आए, आप भी आए। उनकी उम्र सत्तर साल है। मैं कैसे कपड़ों में हूं। देखो, वो मुझसे कैसे बात कर रहे थे। वहां कोई सहारा नहीं था। वो चालीस साल से वहां बैठे हैं। चालीस साल तक अगर एक जगह रहा, तो कुछ तो व्यक्ति ने समझा होगा। ऐसा नहीं कि एकदम खाली हो। चालीस साल कोई कम समय नहीं होता, एक ही स्थान पर। बिना पाखंड किए, उसी गांव में रहना, और उस तरीके से जीना, कोई साधारण बात नहीं है।
मैं जाता-आता उनकी बारे में जानता हूं। वो ऐसा नहीं कि धागा-धूनी या ऐसा कुछ करते हों। बहुत सरलता से जीते हैं। उनको मिला या नहीं मिला, वो बाद की बात है। लेकिन कुछ तो समझा होगा। पूरी तरह ऐसा नहीं कि चालीस साल में वैसे के वैसे रहे होंगे। चालीस साल जीवन के कम नहीं होते, एक जगह काट देना। तो आप देखिए कि मैं कैसे उनसे जाकर मिला, कैसे मिलता हूं, कैसे रहता हूं।
मैंने ये देखा कि अगर आप कहीं अंदर से कमजोर हो, और उस कमजोरी को दूर करने की आपकी क्षमता नहीं है, और आपको कुछ बनना है, तब आप पावर का सहारा लेते हो। उसे ढकते हो। क्योंकि उस कमी को दूर करने की क्षमता नहीं है, और बनने की एक भनक है, एक जिज्ञासा है, कि मैं कुछ बनके बताऊंगा इनको। और आपको पता है कि बनने की आपकी कैपेसिटी नहीं है। तब कहीं से आवरण का सहारा मिलता है। आप ओढ़कर समाज को बताते हो कि मैं ये हूं। लेकिन एक न एक दिन ऐसा कोई व्यक्ति आता है, और आपके आवरण को ऐसे तोड़ देता है कि आप बिखर जाते हो। आता ही है। कभी न कभी कोई टकरा जाता है, और आपके आवरणों को चकनाचूर कर देता है। कोई न कोई मिल जाएगा।
कहीं न कहीं उसके अंदर कमी है। कमी है, और कमी दूर नहीं कर पा रहा। उसकी सामर्थ्य भी नहीं है। इसलिए वो आवरण का सहारा लेता है। आवरण के सहारे मैं को खड़ा करता है।
वो सामर्थ्य आप तभी लाओगे, जब पढ़ना है तो शिक्षक ढूंढो। कुछ भी सीखना है, तो उससे सीखो जो सीख चुका हो। कुछ भी सीखना है। इस संसार में दो तरह के लोग रहते हैं। एक सीखने वाला, एक सिखाने वाला। आप तय कर लीजिए, आप कौन हो। अगर आप सीखने वाले पक्का हो गए, तो सिखाने वाला कोई न कोई टकरा जाएगा। सीधी बात है।
और मैंने देखा, इस संसार में अस्सी प्रतिशत से ज्यादा लोग सीखने वाले और सिखाने वाले, दोनों बनकर घूमते हैं। वो जाते हैं सीखने, और सिखाने की बात करने लग जाते हैं। एक बन जाओ। अगर आप सीखने गए हो, तो सिखाने की बात मत करो। और सिखाने गए हो, तो सीखने की बात मत करो। बोल दो, भैया, मैं ये हूं, पक्का। मैं समझौता नहीं करूंगा।
मान लो, एक शिक्षक पढ़ाने गया, और विद्यार्थी कोई उठकर उसे पढ़ाने लगे, तो शिक्षक कैसा रहेगा? फिर शिक्षक की क्या जरूरत है? शिक्षक एक होना चाहिए। विद्यार्थी अनेक होने चाहिए। तो पहले ये पक्का करिए कि आप हो कौन।
मैंने ये देखा कि लोग जाते हैं, जाना कहीं और है, पता कहीं और का पूछते जाते हैं। उन्हें खुद नहीं पता कि सच में जाना कहां है। बस यूं ही चले जा रहे हैं। देखो, यहां इतने लोग हैं। अभी तक कोई पक्का करता है क्या? मुझे बस इसके अलावा कुछ नहीं चाहिए, कि पक्का करे। हो नहीं पा रहा। पक्का तो पक्का। पीछे जाना नहीं है। अपने लक्ष्य तक पहुंचने के बाद ही कुछ होगा। ये पक्का करना पड़ेगा। आज तक तो हमें ये पक्का करवाया गया है कि गाड़ी चाहिए, ये वाली चीज चाहिए, वो चाहिए। चाहिए-चाहिए तो सिखाया गया।
पॉइंट को भी पकड़िए। मुर्दे के पीछे राम नाम सत्य बोला जाता है। तो ये भी पकड़ लो। अपनी समझ से आप बहुत कुछ पकड़ते हो, तो ये भी पकड़ लो, कि राम नाम सत्य है। अब राम नाम सत्य है, तो इस राम को वो साकार रूप वाला राम मत समझ लेना। क्योंकि इनके पहले भी मुर्दे जाते रहे हैं। उस परम ब्रह्म राम की बात हो रही है। राम जपो, राम का नाम जपो, उस राम की बात हो रही है। साकार रूप वाले राम की बात मत पकड़ लेना। ये गलती मत करना, नहीं तो एक रूप में फंस जाओगे।
रूप ही भटकाव है। दर्शन, दृश्य और द्रष्टा। जब तक दर्शन की कामना है, तब तक आप दृश्य में उलझे हुए हो। और जब तक रूप में उलझे हुए हो, तब तक उपलब्धि नहीं होगी। भक्त बनकर रह जाओगे। क्योंकि रूप में हो, तो द्वैत है। और रूप का कभी नाश होगा। संसार में कोई भी रूप हो, कोई भी पिंड हो, उसका नाश होगा। नाश का मतलब नष्ट होना नहीं। नाश का मतलब परिवर्तन। किसका नाश होगा? रूप का नाश होगा, तत्व का नहीं। हम रूप में फंसे हैं, तत्व में नहीं। इसलिए कहा गया कि इस जगत का नाश हो जाएगा। जगत आपके लिए क्या है? रूप जगत है। ये तत्व थोड़ी है। आप रूप में फंसे हुए हो, तत्व में नहीं। तो रूप का नाश होता है। तत्व का नहीं। आज आप छोड़कर चले जाते हो।
किसी के घर का व्यक्ति मर गया। वो चिल्लाता है, रोता है, कहता है मैं इसके बिना नहीं रह पाऊंगा। फिर जाता है, जला देता है। फिर बोलता है, कब जल जाए। लेकिन वो व्यक्ति अभी भी मौजूद है। रूप अलग हुआ है। राख में मौजूद है। रखो न अपने पास। अभी भी वो है। कहां गया वो? कहीं नहीं गया। अगर आप उसे शरीर मानते हो, तो कहां गया? बस परिवर्तन हो गया। शरीर से राख हो गया। राख को अपने पास, अपने घर में रखो।
सीधा देखो। पैरों के नीचे छोड़कर चला आता है। अपने मां-बाप, भाई-बहन, सबको। क्योंकि अब आप इस संसार में काम के नहीं रहे। जो काम का नहीं है, वो राम का है। अब तुम जाओ, राम के बन जाओ, क्योंकि अब तुम काम के नहीं हो। इसलिए बिस्तर पर पड़ने के बाद पूरा परिवार प्रार्थना करता है कि इनके प्राण छूट जाएं। ये बहुत परेशान हैं। परेशान वो नहीं है। पूरा परिवार है। अपनी परेशानी से छुटकारा पाने के लिए प्रार्थना करता है कि प्राण छूट जाएं।
वो कहां गया? वो है तो। मैं कह रहा हूं, शरीर में नहीं रहा, तो राख में है। क्या फर्क है? राख रखो। सामने देखने की वही जगह है। एकदम वही तो है। लोग सोचते हैं, कब छोड़कर जाऊं। राख करने की भी जरूरत नहीं है। बॉडी जैसी सोती अवस्था में होती है, वैसी तो है। कहोगे, महक जाएगा, बर्दाश्त नहीं कर पाएंगे। ठीक है। लेकिन रात को रख लो। रात की छुट्टी आते ही उससे लग जाएगा। राख में तो मौजूद है वो, अगर आप उसे शरीर मानते हो। लेकिन काम का नहीं। बस इतनी बात है।
हाथ में कैंसर हो जाए, तो क्या हम काटने का पैसा नहीं देंगे? कटवा देंगे। दोनों कटवा देंगे। नाक भी कटवा देंगे, गाल भी कटवा देंगे। जब अपना नंबर आएगा, कहेंगे, बस, अब नहीं। ये रहने दो। जितना जिएगा, चलेगा। यहां नहीं काटना। क्योंकि कटवाते हम तब हैं, जब हम हैं। जब हमारा नंबर आएगा, हम नहीं कटवाएंगे। मैं अपने ही शरीर के अंग-अंग, जीने के लिए कटवा सकता हूं। आज जिसे मैं तेल लगा रहा हूं, मुझे पता चल जाए, कोई डॉक्टर कह दे कि कैंसर है, ये उंगली लगी है, हाथ कटवाना पड़ेगा, तो क्या करोगे? काटने का पैसा भी दोगे। और काटने के बाद बड़े खुश हो जाओगे कि कट गया, अपनी ही उंगली। पूरे शरीर में कैंसर फैल जाए, तो हाथ भी कटवा दोगे, कान भी, आंख भी, अंग भी। अपने ही। और जब आपकी बारी आएगी, कहेगा गर्दन थोड़ी कटनी पड़ेगी। फिर बचेगा क्या? बचेगा किसके लिए? कैंसर तो एक घर से काटकर दूसरे घर निकाल देगा। लेकिन तुम इसमें रह नहीं पाओगे। जब तुम्हारी बारी आती है, कहते हैं, भाई, अब रहने दो। मतलब तुम्हें शरीर की भी फिक्र नहीं है। ये शरीर जब तक आपका काम का है, तभी तक इसकी फिक्र है। इस बात को गहराई से समझो। यहां कोई किसी की फिक्र नहीं करता।
इसे बहुत गहराई से समझो। मैं यही कहना चाहता हूं। आप यूज होना ही होना है। ये संसार ही ऐसा है। तो क्यों न हम सदुपयोग में यूज हो जाएं।
आज मैं बता दूं। शायद मैं विवाह करता, शादी करता, तो मुझे कम मेहनत करनी पड़ती। आठ घंटे कहीं नौकरी करता, या व्यापार करता, अपने घर आकर बीवी-बच्चों के साथ अच्छी लाइफ जीता। जितनी मगजमारी आज मेरी जिंदगी में है, उतनी तो नहीं करनी पड़ती। मैं दिन-रात इसमें लगा हूं, पागल की तरह। कभी तुमसे विनती कर रहा हूं, कभी तुम्हें समझा रहा हूं, कि तुम छोड़कर मत चले जाना। उस आदमी की जिंदगी कैसी होगी? उसे तुमसे कुछ नहीं चाहिए। वो तुम्हें संभाल रहा है। और तुम हमेशा उसे डराए रखते हो कि मैं कभी भी छोड़कर चला जाऊंगा। उसकी क्या मनोदशा होगी? वो आदमी तुम्हारे लिए पागल है, और तुम उसे हमेशा डराके रखते हो कि तुम कभी भी छोड़कर जा सकते हो। उस आदमी की स्थिति समझ सकते हो? वो पागल नहीं हो रहा। क्योंकि उसे विश्व के लिए काम करना है। वो पागल नहीं हो सकता।
अगर मैं वहां काम करता, तो आज मुझे इतनी मगजमारी नहीं करनी पड़ती। कभी तुम्हें संभालो, कभी तुम्हें संभालो। जरा इस बात को सोचो। तुम कहीं न कहीं यूज होगे, संसार में। मुझे भी पता है, मैं भी यूज हो रहा हूं। मैंने कहा, संसार में तो यूज होना ही है। शादी करो, बच्चे होंगे, परिवार होगा, नोच देंगे। मैं उन्हें नोचूंगा, वो मुझे नोचेंगे। ऐसा नहीं कि केवल वो नोचेंगे। मैं बहुत सच्चा हूं, ऐसा नहीं। वो नोचेंगे, मैं देखूंगा। मैं भी नोचूंगा। वो भी नोचेंगे।
नोचना-नोचवाना है ही। अब मैं एक काम करता हूं। मुझे समाज के लिए काम करना है। कुछ लोग ही क्यों नोचें? सब नोचें। अपने अंदर कुछ ऐसा लाओ, कि समाज के सदुपयोग में यूज हो जाओ। यूज होना ही होना है। यहां कोई भाग नहीं सकता। आप दुनिया में कहीं भी जाओ, आपका उपयोग होना ही होना है। कहीं भी चले जाओ, तुम्हारा यूज होगा ही। बच ही नहीं सकते। कहने का मतलब है, सदुपयोग में यूज हो जाओ। संसार के हित में उपयोग हो जाओ। सेवा में उपयोग हो जाओ। यूज तो होना ही होगा। आप चाहे कहीं भी चले जाओ।
उस दिन इनसे यही कहा था। हमारी बात हो रही थी। मैंने कहा, अगर एक प्रतिशत भी लगे कि ये सत्कर्म नहीं है, सेवा नहीं है, तो चले जाना। मत करना। कभी भी, कहीं भी, जहां भी रहो, अपने अस्तर को उठाओ। मैं बाहरी आदमी हूं। मैं सबको सलाह देता हूं। सबको खुलकर बोलता हूं। मुझे इतना पता है। बाद में मैं भी नहीं रहूंगा। ये किसी एक के सहारे नहीं रुकता। हमें संवारने का बस मौका मिला है। मैंने कभी नहीं मांगा था कि मुझे सेवा का मौका दे। प्रकृति ने दे दिया। तुम नहीं करो, कोई और करेगा। जगह हमेशा भर जाती है। आप सामान उतार लो, हवा जगह भर देती है। यहां कुछ खाली नहीं रहता। आप गए, कोई और आएगा। इंतजार हो रहा है। एक लाइन में नहीं, कई लाइनें लगी हैं, कि मुझे सेवा का मौका मिले। तुम छोड़ो, कोई और आ जाएगा। जगह हमेशा भरती रहती है।
मेरा कहने का सीधा मतलब ये है कि आप यूज होंगे। बच ही नहीं सकते। सृष्टि ही ऐसी है। भगवान आए, वो यूज हुए। राम हुए, कृष्ण हुए। कौन नहीं यूज हुआ? इसलिए उस छोटे दायरे में यूज होने से अच्छा है कि पूरे समाज के लिए अपने अंदर कुछ ऐसा लाओ। सीधी बात है। नहीं तो मैं वो जीवन ही जीता। मेरे समझ से आठ घंटे ड्यूटी करके, या नौकरी-वकरी करके, बिजनेस करके, बढ़िया लाइफ जीता। इतनी मगजमारी नहीं रहती, जितनी आज मुझे करनी पड़ रही है।
फिर जिनके लिए करो, उनमें से एक आदमी आगे निकलकर आप पर बड़ा गुस्सा करता है। अरे, तू रह। जरा आ। तुझे बताता हूं गुस्सा क्या होता है। जरा आकर यहां रह। कुछ दिन काम कर, समझकर। तुझे आ जाएगा। सारी चर्बी निकल जाएगी। तू उस जगह जरा आकर कुछ दिन रह। तब तुझे पता चलेगा गुस्सा क्या होता है। वहां से कह देना बड़ा आसान है। आगे एकदम बढ़िया सा बैग रखा है। कहां है शौचालय, फट से चले गए। कहां है बाथरूम। कहां है भोजन, फट से बना। सब व्यवस्था। आप गुस्सा बहुत करते हो।
पता है, तुम्हारी इस व्यवस्था के लिए इस व्यक्ति ने क्या किया? पूरी जिंदगी लगा दी है। तुम्हारे शौचालय के लिए, तुम्हें एक-एक व्यवस्था देने के लिए, पूरी लाइफ लग गई है उसकी। वो गुस्सा नहीं होगा, जब तुम दुरुपयोग करोगे? गुस्सा भाव में से निकला है। क्या वो लोगों को दिखावा करेगा, लाइन में देखो कितना सज्जन है, और कमरे में जाकर मां-बहन करेगा? ऐसा आदमी मैं नहीं हूं। मुझे अगर कहना होगा, तो मैं लाइव में बोलूंगा। अगर मुझे गुस्सा करना होगा, तो लाइव में करूंगा। ऐसा नहीं कि आपके सामने मीठा-मीठा बढ़िया बोलूं, और कमरे में जाकर गालियां दूं। मुझे नहीं आता। मुझे अगर बोलना होगा, तो मुंह पर बोलूंगा। तुम्हें आना है, आओ। जाना है, जाओ। सहयोग देना है, दो। नहीं देना है, मत दो। कोई फर्क नहीं पड़ता। काम हो, चाहे न हो। होगा, तो ईमानदारी से होगा। नहीं होगा, तो जाने दो। छोड़ो। सीधी बात है।
विश्व के लिए काम करना है, तो बहुत सहना पड़ता है। और सबको साथ लेकर चलना होता है। इनको भी चलना है, इनको भी चलना है, सबको चलना है। सबको देखना पड़ता है। मैं इसीलिए इनको कहा कि आपको समय मिलेगा, तो जरा चिंतन करना। अब तो आपको मौका मिल रहा है। चिंतन करना।
जैसे मंसूर कौन थे। जब सबने पत्थर मारे, तो उन्हें चोट नहीं लगी। उन्हें जानने वाले एक ने जरा सा मारा, तो वो चीख पड़े। क्या हुआ? इतने पत्थर बरस रहे थे, मुंह लहूलुहान हो गया था, आपको चोट नहीं लगी। और इसने जरा सा कंकड़ मार दिया, तो इतनी चोट? बोले, ये मेरे बारे में सब जानता है। ये जानते हैं कि ये व्यक्ति कैसा है, इस व्यक्ति ने कितनी मेहनत की है।
आपको पता है, एक प्रश्न का उत्तर पाने के लिए मैं मुंबई से इंदापुर गया। पता नहीं कितना, सौ किलोमीटर में गया। वहां महाराज थे। मैंने उनका घंटों इंतजार किया। वो कहीं गए हुए थे। बाद में आने के बाद मैंने साष्टांग प्रणाम किया। मैं रो रहा था। उन्होंने एक ही बात कही। बोले, जिसके लिए आप आए हो, वो नहीं होगा। आंखों में आंसू आ गए। मैंने कहा, मैं किसके लिए आया हूं? मैं तो आध्यात्म के लिए आया हूं। बोले, नहीं होगा। मैंने उनसे नहीं कहा। लेकिन मन में आया, तुम कर क्या रहे हो? कुर्सी पर क्यों बैठे हो? हमारा कितना समय बर्बाद हुआ। तुम्हारे पास जवाब नहीं था। एक शिक्षक के पास विद्यार्थी जाए, और वो कहे कि मैं पढ़ाने का काम नहीं करता, सब्जी बेचता हूं, तो सब्जी का ठेला लगा। काहे को अपने आप को शिक्षक बोलता है। मेरा कितना समय बर्बाद हो गया। मैं रोते हुए, साष्टांग करके आया।
आप लोगों को तो बहुत आसानी से, इज्जत से, उत्तर मिल रहा है। मैं तो मां-बहन की गालियां सुनने के बाद भी उत्तर नहीं पाता था। मैं देख रहा हूं, ये बड़े ताव में आते हैं, ताव में चले जाते हैं। ये जिज्ञासा की शुरुआत है। हम तो मां-बहन की गालियां और थप्पड़ खाने के बाद भी ऐसे खड़े रहे, कि मुझे उत्तर मिल जाए। भूखे-प्यासे।
अब मेरे अतीत में कभी घूम लो। देखो, मैंने कैसे जीवन काटा है। यहां तो लोग ताव में आएंगे। ऐसा बात करेंगे जैसे बाप की बपौती हो। नहीं तो मैं चला जाऊंगा। मुझे कोई तकलीफ है क्या? मैं तो ऐसे ही आ गया। ऐसे ही आ गए, तो ऐसे ही भटकते रहोगे। क्योंकि तुम जिज्ञासु हो ही नहीं। जिज्ञासु व्यक्ति अपने उत्तर के लिए आता है, और उस पर काम करता है, सरलता और सहजता से। किसी को दोषी नहीं ठहराता, और आगे बढ़ता है।
मैं आज के साधकों की हालत देखता हूं, तो बड़ी बदतर है। इन्हें ज्ञान का मतलब ही मालूम नहीं। आप इतने गुस्से से क्यों बात कर रहे हो? आप दबा क्यों रहे हो? जब ये बात पक्की हो गई कि ये व्यक्ति तुम्हें दबा रहा है, तो उसी समय उस जगह को छोड़ देना चाहिए। उसके पास एक सेकंड भी खड़े नहीं होना चाहिए। क्योंकि अब वो व्यक्ति तुम्हें कभी उठाएगा नहीं। तुमने उठाने से पहले ही समझ लिया कि तुम्हें दबा रहा है। एक तरफ से वो उठा रहा है, और आपने उसे दबाना समझ लिया। तुम भ्रमित हो गए। अब वो क्या करे? उसकी क्या गलती?
यहां सब अपने-अपने तरीके से काम करते हैं। लोग अपने तरीके से काम करवाना चाहते हैं। हो सकता है वो आपको दबाकर ही उठाना चाह रहा हो। वो दबा रहा है, तो तुम्हारा स्तर दिखाना चाहता है। अगर वो विपरीत परिस्थितियां पैदा कर रहा है, तो उससे तुम्हारी स्थिति का पता चलेगा। तुम्हारी मानसिक स्थिति क्या है, शारीरिक स्थिति क्या है, मनोदशा क्या है। उसका जांचने का तरीका कुछ अलग होगा। और सबके साथ अलग-अलग जांचेगा। क्योंकि एक ही तरीके से जांचेगा, तो सब एक-दूसरे को बता देंगे कि भैया, देखो, ऐसे जांचेंगे।
नमो नारायण थे। उनसे ऐसी ही बात हुई। मैंने कहा, ये जाला निकाल दो। वो कहते थे, आप कुछ भी करो, मैं कर दूंगा। फिर बोले, मैं तो नहीं निकाल पाऊंगा। मैंने कहा, ठीक है। उस समय अशोक भी थे, तो अशोक ने निकाला। बाद में मैंने उनसे पूछा, आपने क्यों नहीं निकाला? बोले, इसमें जीव थे। मैंने कहा, आपने कहा था कुछ भी करो, मैं कहूं। जीव कहां से आ गया? क्या जीव मुझे नहीं दिख रहा था? उसी जीव को बचाने के लिए तो मैं जाला निकलवा रहा था। और मैं उस जाले को इसलिए निकलवा रहा था, क्योंकि उसका मालिक नहीं था। अगर उसका मालिक होता, खाने वाला होता, तो मैं नहीं निकलवाता। तब निकलवाना प्राकृतिक हो जाता। लेकिन मैंने देखा, जाला खाली है। ये मर जाएंगे। इन्हें खाने वाला कोई है नहीं। तो ये बेमतलब मारे जा रहे हैं। क्यों न इसे बचा लें। और तुम तो कहते थे, कुछ भी करो, आप कुछ भी कहो, कर दूंगा। तो क्या हुआ?
मैं ये बताना चाहता हूं। जब आप किसी को गुरु कह रहे हो, तो उसकी परीक्षा लेने का तरीका बहुत अलग होता है।
एक दिन यहां पति-पत्नी आए थे। एक दिन ऐसा बासी चावल था, दूसरे दिन का, लेकिन ठीक था। मैं तो तीन-तीन दिन का खा लेता हूं। मैंने कहा, अनाज मत फेंको। आप एक बात बोलो। बिस्किट खा रहे हो, कितने महीने का बना है? पाव खाते हो, ये सब कितने महीने का बना है? क्रीम पाव क्या तुम्हें ताजा, फैक्ट्री से तुरंत पहुंचा दिया जाता है? भोजन अगर सड़ा नहीं है, बास नहीं मार रहा, तो कई दिन तक खा सकते हो। नमकीन वगैरह, जितनी चीजें लाते हो, क्या तुरंत बनकर आती हैं? और भोजन के लिए नाटक करते हो। वो बासी नहीं खाए। सबको देना था, बाद में कुछ झंझट हो गया। बाद में मुझे बोले, पति चावल नहीं खाते। बाबा, इनको मत देना।
दूसरे दिन मैंने कहा, इतना दूध लाओ। हमें भी पता नहीं था। दूध लाओ, फिर दूध की खीर बनाओ। काजू, किशमिश, बादाम, मखाना डालो। डल गया सब। और पति-पत्नी दोनों ने खाया। तब मुझे पता चला कि यहां इच्छा उन्हीं चीजों की है। मैंने पूछा, क्या हुआ, चावल तो खाते थे। बोले, नहीं, हम तो चावल नहीं खाते। खीर में चावल ही तो था। वो भौचक्का रह गया। ये तरीका है लोगों का। चावल नहीं खाते, खीर खाते हैं। चावल नहीं पचता, तो खीर कैसे पचेगी? खीर में तो चावल है। आप लोगों को बेवकूफ बना रहे हो।
मैं आपको बताऊं। मैंने ऐसी परिस्थितियों में साधना की है। मुझे कोई मारा है, तो मैं वहीं रहकर साधना किया हूं। गाली भी खाई। ऐसा नहीं कि यूं ही बोल रहा हूं। मुझे मार भी पड़ी है, बिना मतलब। बिना गलती के। कोई गलती ही नहीं थी मेरी। गाली तो आम बात थी। आदत पड़ गई। अभी भी लाइव में सुनता हूं। फटे कपड़े पहने थे, तब भी सुन रहा था। अच्छे कपड़े पहनूंगा, तो भी सुनूंगा। पैदल चल रहा हूं, तो भी सुनूंगा। गाड़ी चलाऊंगा, तो भी सुनूंगा। समाज भी ऐसा है। उसका काम ये भी है, कि कुछ बताकर आपको नीचा गिराए। लेकिन आप बस अपना काम करो, ईमानदारी से। आप क्या करने निकले हो, बस उतना करो। और अपने आप को संवारो। समाज में कुछ काम करो।
संवारने के लिए बड़ी मेहनत करनी पड़ती है। बहुत मेहनत करनी पड़ती है। समाज के लिए काम करना इतना आसान नहीं है। अपमान का खून पीना पड़ता है। अपमान का खून पीते रहना पड़ता है। इतना आसान नहीं है। बातें करना बड़ा आसान है। आज आप उजाला ले रहे हो। इसके लिए किसी की जिंदगी लग गई है। आप इतना आसान मत समझिए। आज बहुत सरलता से लाते हो, बल्ब लगा देते हो। लेकिन एक व्यक्ति का इसके लिए जीवन लग गया है। संसार में कुछ भी नया आता है, तो उसके लिए एक पूरी जिंदगी लगती है। उसकी पूरी लाइफ चली जाती है। और लोग उसके सहने को समझ ही नहीं पाते। वो करे तो क्या करे?
ये छोड़े, तो ये करेगा, वो करेगा। वो पागल हो जाता है। करे तो क्या करे। क्योंकि बहुत कुछ करना है। मैंने कहा, एक परिवार को संभालना बड़ा आसान है। क्योंकि वो कहीं जाएंगे नहीं। तुम पर निर्भर हैं। डांट-डपट करो, कैसे भी। वो तुम्हें डांटेंगे, तुम उन्हें डांटोगे। लेकिन विश्व के लिए काम करना आसान नहीं है। और मैं देख रहा हूं। काम करना है, तो बहुत सहना है। और बस अपनी लाइफ जीनी है, तो फिर अकड़कर जियो। आवेश में जियो, जज्बात में जियो। जानवर भी अपनी लाइफ जीते हैं। कभी यहां खाकर, कभी वहां खाकर।
समाज में जीना कोई बहुत कठिन नहीं है। लेकिन समाज में काम करना बहुत कठिन है। समाज के हित के लिए तो बहुत कठिन है। मेरा तो कहना है, जिंदगी मिली है। ईमानदारी से, सत्कर्म से, किसी के काम आओ। और एक-दूसरे की भावनाओं को समझो। एक-दूसरे की भावनाओं को समझना बहुत जरूरी है।
मैं आपको बता दूं। हमें कोई भोजन का निमंत्रण दे, और वो शाम को न आए, तो मैं शाम को भोजन नहीं करता था। फिर दूसरे दिन करता था। और मैं उसे दोषी भी नहीं ठहराता था। लोग भोजन लेकर खड़े हो जाते थे, कि आप यहीं भोजन कर लो। मैं कहता, नहीं। उस व्यक्ति ने मुझे बोलकर गया है। अब नहीं करूंगा। फिर दूसरे दिन आता। कहता, माफ करो, मैं कल नहीं आ पाया। मैं कहता, कोई बात नहीं। माफ किस बात की। मैंने भोजन किया ही था, दूसरे दिन। कम से कम मुझे कुछ तो समझ में आया। मेरी स्थिति जांचने का मौका तो मिला, कि मेरी स्थिरता कितनी है। तुम तुरंत ला देते, तो मुझे कैसे पता चलता कि मेरी व्याकुलता कैसी है। मेरी स्थिरता का तब पता चलेगा, जब मेरे सामने विपरीत परिस्थितियां बनेंगी। जब परिस्थितियां मेरे अनुकूल हैं, तो मेरी स्थिति का जीवन में कभी पता ही नहीं चलेगा।
वो व्यक्ति दूसरे दिन आता था। मैं उससे एक प्रतिशत भी नाराज नहीं होता था। वो खुद आकर कहता, कल बड़ी गलती हो गई। मैं ज्यादा पी गया था। आज नहीं आ पाया। मैं कहता, कोई बात नहीं। वो कहता, आज कर लेना। मैं कहता, आज रहने दो। आज नहीं। आज कहीं और है। तू आज रहने दे। कुछ दिन बाद देखेंगे। क्योंकि आज आना नहीं हुआ, तो बात दो दिन की हो जाएगी।
इससे क्या होता था? इससे मेरी स्थिति का मुझे पता चलता था। अगर एक रात भोजन नहीं मिला, उस व्यक्ति ने कहा था और नहीं आया, तो मेरी क्या प्रतिक्रिया निकल रही है। क्या मुझे उस पर गुस्सा आ रहा है। क्या आ रहा है। लेकिन मैं जानता था, मुझे हंसी आ रही थी। अभी भी हंसी आती है। दूसरे दिन आकर कहता, कल मैं आ नहीं पाया। एक बाबा पूछता, क्या खाओगे। मैं कहता, आज कुछ नहीं खाऊंगा। बहुत हंसी आती थी। पीने का नशा उतरने के बाद उनका नाटक भी अजीब रहता है। वो उस नाटक में सब कुछ लुटा भी देंगे। मैंने कहा, तू जा। वो कहता, सुबह मैं बाबा को पैसा लेकर आता हूं। मैंने कहा, तू पैसा लेकर मत आ। मुझे कुछ नहीं चाहिए, भाई। कुछ नहीं चाहिए।
कहने का मतलब है, जब आपके विपरीत परिस्थितियां बनें, तो जांच करना। किस स्थिति में उस व्यक्ति ने आपको लाकर नहीं दे पाया। और नहीं लाया, तो आपकी स्थिति क्या हुई। क्योंकि शरीर से ऊपर उठना है। जब तक आपको पूरी तरह शरीर के स्वास्थ्य का ख्याल रहेगा, हर पल चिंतन शरीर बनाने में ही रहेगा, तब तक आप इसके ऊपर कभी उठ ही नहीं पाओगे। उठ ही नहीं सकते। शरीर को सुरक्षित रखो। ऐसा नहीं कि छोड़ दो। लेकिन आप उसके लिए पागल भी मत हो जाओ। स्वास्थ्य का ख्याल रखना बहुत अच्छी बात है। लेकिन उसी चक्कर में पागल मत हो जाओ।
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