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प्रश्नोत्तर P7-0141 · भाग 7

आठ तारीख को जाऊँगा। जो यहाँ तीस दिन में जिया हूँ, उसे अपने जीवन में लगातार जारी रखना चाहता हूँ, पूरी तरह, कोई भूल चूक न हो। जैसे काढ़ा पीते समय चाय कॉफी नहीं ले सकते। बाहर जाकर क्या हम खुद चाय कॉफी पी सकते हैं, होटल में खा सकते हैं?

ऐसा नहीं है कि हम नहीं पीते। हम पीते हैं। हम भी खाते पीते हैं। हम भी होटल में खाते हैं। लेकिन क्या होता है? यह आप साधना करने आए हो। साधना तभी होगा, जब भोजन पर नियंत्रण होगा। घर में एक रोगी है, और सब स्वस्थ आदमी हैं। तो आप देखते नहीं कि रोगी को अलग तरीके का भोजन बनाया जाता है। उसी परिवार में हो। क्यों? क्योंकि रोगी को ठीक करना है। रोगी को ठीक करना है। आप उसी परिवार में हो, रोगी अलग खा रहा है और आप अलग खा रहे हो। उसी रसोई में उसको अलग भोजन बनाया जा रहा है, और स्वस्थ लोगों के लिए अलग। तो अगर आपको निकलना है, तो ये नियम अपनाना पड़ेगा। और निकल गए, तो बात खत्म हो गई। रोगी भी एक दिन अगर ठीक हो गया, तो सबकी तरह वो भोजन करेगा। उसका भोजन अकेले थोड़ी ना बनेगा। तो आप यहाँ से जाके जितना कर सकते हो, करो। वो आपके ऊपर है। एक समय भोजन करो। एक समय भोजन करो। अगर शरीर का काम ज्यादा आपके पास है, तो कोई हल्का नाश्ता कर लेना, नहीं तो चक्कर आने लगेगा। शरीर को उतना पोषण दो, जितना इससे काम ले रहे हो। जैसे गाड़ी में उतना डीजल और पेट्रोल भरवाते हो, जितनी दूर जाना है। अगर आप एवरेज नहीं देखोगे, तो गड़बड़ा जाओगे। तो ऐसे शरीर का एवरेज देखो। देखो, हम गए थे। हम इनके साथ ही गए थे। ये लोग यह नहीं कह सकते कि मुझे कभी भोजन की प्रॉब्लम हुई। क्या आपने मुझे कभी फील किया? मैं तो सिर्फ आपको ही देख रहा था। आप लोगों को देख रहा था, कि भोजन ग्रहण करते वक्त आपका क्या भाव है। पानी पीते क्या भाव है। चलते क्या भाव है। आप क्या कर रहे हो। विदेश छोड़ दो। हम तो आपको ही देख रहे थे। हमारे लिए क्या। आप क्या कर रहे हो। आप खा रहे हो तो क्या भाव है। आप पानी पी रहे हो तो क्या भाव है। आप नहीं खा रहे हो तो क्या भाव है। आप दुकान पर क्या पूछ रहे हो। किस भाव से पूछ रहे हो। ना बोलने पर क्या भाव है। हाँ बोलने पर क्या भाव है। आपका भोजन, जैसा माँगा, मिल गया तो क्या भाव था। नहीं मिला तो क्या भाव था। मैं तो आपको देख रहा था। हम तो हर जगह आप लोगों को देख रहे थे। और आप लोगों से कुछ समय बचा, तो रात को हम कुटिया में देखने लगे। अब इन लोगों ने गलती की, तो किसी ने थोड़ी ना बताया। वो तो मैंने ही पकड़ा। मैंने ही पकड़ा, क्योंकि मैं देख रहा था, कैमरे से क्या हो रहा है। रात को भी उठ के देखूँ, कौन सोया है, कहाँ गया। सब देखता रहता हूँ। तो मेरे पास तो यही है, देखने के लिए। और क्या है? मुझे थोड़ी ना कुछ और देखने के लिए है, क्योंकि जैसा यहाँ, वैसा विदेश। हमारे लिए कुछ अलग थोड़ी ना है। चाहे विदेश हो, चाहे यहाँ हो। हम तो आपको देख रहे थे, हर क्षण, हर पल, कि आपको भोजन मिला तो कैसा फील हुआ, नहीं मिला तो कैसा फील हुआ। आपके मन का मिल गया, कैसा लगा। आपके मन का नहीं मिला, कैसा लगा। आप जब विदेश से आकर उतरकर खाए, तो आप क्या फील कर पाए। हम तो आपको ही देख रहे थे। आपको देखेंगे, तभी तो आपको निकाल पाएँगे। आप थोड़ी ना खुद को देख पाओगे। आपको देख पाएँगे, तभी तो आपकी कमी को दिखा पाएँगे। अगर हम आपको सीधा बोलते कि आपके अंदर लालच है, तो थोड़ी ना मानती आप। हमने इनसे कहना पड़ा। जब आप उधर गईं, तो हमने इनसे कहना पड़ा कि भैया, आप एक काम करो। क्या आपको लगता है, प्रोफेसर जी नाश्ता नहीं करेंगी? बोले, नहीं नहीं, वो नहीं जाएगी। मैंने कहा, जाएगी। तो मुझे कहना पड़ा कि आप बोलना, कि मैं करूँगी, मैं तो जा रही हूँ। नहीं तो आपका लालच निकलता ही नहीं। तब पहली बार तो आपने कह ही दिया कि नहीं, हम तो नहीं खाएँगे, साथ चल सकते हैं। क्योंकि तुम्हें गिराने के लिए। देखो, आप उसे भी नहीं रोक रहे हो। पहली बार आप कितनी चालाकी की, कि मैं तो नहीं गिरूँगी, लेकिन तेरा साथ दूँगी। कितनी दुष्टता है। यह दुष्टता आपको दिखी, आपके अंदर की? नहीं। आपने पहली बार क्या कहा, कि चल, तेरे साथ चलूँगी, तू खा लेना, मैं नहीं। इसका मतलब कि वो खाने से गिरेगा, इसीलिए मैं नहीं। तो पहली बार आपने अपने आप को सँभाला कैसे? नहीं। लेकिन आप यह नहीं देख रहे थे कि कम से कम मैं नहीं गिरूँ, तो इसे भी तो सलाह दूँ कि मत खा। लेकिन नहीं। तू खा, मैं चलूँगी साथ में। अपनी दुष्टता देखिए। इसे दुष्टता कहेंगे। क्योंकि आप पहली बार सचेत थीं। पहली बार सचेत थीं, लेकिन उस सचेतता में इसे नहीं बचा सकीं, कि नहीं, तू भी मत खा। तूने क्या कहा। नहीं, तू गिर, हम तेरा साथ देंगे। मैं तो बच लूँगी। लेकिन कुछ देर बाद तुम्हारी भी बुद्धि भ्रष्ट हो गई, कि चल, तू खाएगी तो मैं भी खाऊँगी। तुझसे मैं कम थोड़ी ना हूँ। मुझे तो बस इंतजार था कि कोई बहाना मिल जाए। तो ऐसे ही हमारी दुष्टता हमारे अंदर बहुत है। उस समय तो आप इसे सलाह तो दे सकती थीं। पहली बार में आप सचेत रहीं, दूसरी बार में आप भी भ्रष्ट हो गईं। अगर पहली बार में आपने कहा होता कि नहीं, तू भी मत खा, तब आपकी सज्जनता रहती। लेकिन देखो, हम कैसे गिराते हैं। साथ भी रहते हैं, और कैसे गिराते हैं, कि तू गिर, हम तेरे साथ हैं। लेकिन तुम्हें यह नहीं पता कि तुम साथ हो, तो तुम भी गिर ही रहे हो। अपनी लालच देखो, अपनी दुष्टता देखो। इसे दुष्टता कहेंगे। हमारे अंदर कूट कूट के भरा हुआ है। यह तो कोई दिखाने वाला चाहिए। हमने इतनी लिपाई पुताई कर दी है, कि अंदर के कचरे को हमने लिपाई पुताई करके अपने आप को इतना सज्जन बना लिया है। बातों से, शब्दों से इतने सज्जन बन गए हैं, कि अंदर की पूरी गंदगी को हमने छिपा दिया। अपनी गंदगी को इतना हमने ढक दिया है, इतनी चालाकी से, इतनी सज्जनता से, कि हमारी गंदगी का पता मुझे भी नहीं है। क्यों नहीं है? पहले तो पता नहीं था। लेकिन हमने ऐसा छिपा दिया कि लोग कह रहे हैं, तुम कितने सज्जन हो। लोग कहते हैं, अरे तुम कितने सज्जन हो। हम उनकी बात मान लेते हैं। मीठा बोलना सीख लेते हैं। तो भैया, मत गिरो। मत किसी को गिराओ। अपना कल्याण करो। किसी को अगर आप उठाने में साथ नहीं दे सकते, तो कम से कम जहाँ वो खड़ा है, वहीं तो खड़ा रहने दो। गिरने में तो साथ मत जाओ। अगर तुम साथ नहीं जाओगे, तो हो सकता है वो भी ना जाए।

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