प्रश्नोत्तर P7-0023 · भाग 7
जो मिटने के लिए तैयार है वही आ सकता है और रुक सकता है। गहरे पानी में डूबने, मीरा के पदों और बोध के बाद वाले प्रेम का क्या अर्थ है?
जो मिटने के लिए तैयार है, वही आ सकता है, और वह हमेशा रुक सकता है। और जिसे बचाने का कोई अपना कारण हो, तो वहाँ से आया हुआ हो सकता है। एकदम। तुरंत भी जा सकते हो। कोई कहता है जाओ, ठीक, जाओ। स्वतंत्र हो आप। आप आ भी सकते हो, जा भी सकते हो।
जिन्हें डूबा तिन पाइया। डूबेगा वही पाएगा। जिन्हें खोजा तिन पाइया, गहरे पानी पैठ। रहीम की बात है। डूबने के डर से किनारे ही बैठे रह गए। क्योंकि जब तक डूबेंगे नहीं, तब तक पाएँगे नहीं।
काव्य में मीराबाई के पद थे। घायल की गति घायल जाने। जो घायल होए, सो जाने। दर्द के मारे बन-बन भटके, वैद्य मिला नहीं कोई। उसमें दर्द था। उसके बाद जो मिलन था, उसे भी उन्होंने प्रकट किया। चोला छोड़कर। तन के सारे पंचतत्व का जो चोला है, उससे मुक्त होकर तब मिला। मिलन। जब तक गाँठ है, बंधन है, तब तक मिलन नहीं। गाँठ और बंधन रसपान का है। किसका है? संसार का है? संसार का नहीं। आपके रस का है। संसार ने रस दिया? संसार ने तो आनंद भी दिया। आपने अपना संसार का निर्माण किया। संसार ने थोड़ी दिया, आपने अपनाया। संसार तो सब कुछ दे रहा है। अगर वह बंधन भी दे रहा है तो मुक्ति भी दे रहा है, अवसर दे रहा है। बंधन तो आप बाँध रहे हो। अगर संसार दे रहा है तो मुक्ति ही दे रहा है। बंधन तो आप बाँधते हो, जबरदस्ती।
ना मैं जानूँ आरती वंदन, ना पूजा की रीत। हरि में तो दर्द दिया। प्रेम दीवानी में तो जाने कोई।
क्या वही प्रेम है जो बोध के बाद आता है? जिसमें मेरा-तेरा कुछ है नहीं। मेरे से पहले तुम। हाँ, पहले तुम, बाद में मैं। वही। और अज्ञानता में पहले मैं, बाद में तुम। बस इतनी सी बात।
एक और सुना था। लकड़ी जलकर कोयला बनी। मैं पापी ऐसी जली, कोयला बनी। अधूरा। अधूरापन वही है। पूरा रस नहीं आया। डर-डर के रहे, हिचक-हिचक के। वही होता है। डूब जाएँगे, डूब जाएँगे, इस वजह से हम कभी कूदे ही नहीं। और कूदे नहीं तो तैरना नहीं सीखा। और ना उसकी गहराई समझ पाए।
मुक्ति भी बहुत निर्भय है। निर्भयता। जिसे कुछ नहीं चाहिए। सीधी सी बात। डर भी नहीं है। ना हार है, ना जीत। मैंने इसी बात को कहा। कुछ नहीं चाहिए, और निकल लो। बस बात खत्म। उसमें सारी बात आ गई। उसमें हर तरह से सारी नदियाँ आकर संगम बन गईं। एकदम।
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