प्रश्नोत्तर P7-0112 · भाग 7
एक कुत्ता मर गया था। उस रात आप चैन से सो नहीं पाए, सुबह भी बेचैन रहे। चेहरे पर थकान के साथ ऐसा दुख था, जो हमारे दुख जैसा नहीं। एक कुत्ते के लिए अंदर से इतना प्रेम और तड़प है, तो यहाँ रहने वालों के लिए अंदर से कितना गहरा प्रेम रहा होगा? हम समझ नहीं पाते। गलतियाँ समझ के साथ और बिना समझे होती रहती हैं। कुछ भी हो, हाथ पकड़कर रखिए।
जब मैं यहाँ से गया, और जब मैंने वहाँ मंदिर के पास गाड़ी रोकी, तो वो बिल्ला दौड़ के आया। मैं बाहर निकला और वो दौड़ के आए। उस पिल्ले में और अपने आप में, मैं बोल रहा हूँ, मैं शरीर का फर्क समझता हूँ। मेरा यही भाव रहता है कि ये जितने भी पिल्ले हैं, अब इन्हें कुत्ता, पिल्ला तो कहना ही पड़ता है। आदमी तो बोल नहीं सकते। लेकिन मैं इनमें और अपने आप में कोई फर्क नहीं समझता। जितना प्रेम मैं अपने आप से करता हूँ, मैं इन पिल्लों से भी करता हूँ। बस इतना है कि यह शरीर छोड़ के वो जहाँ भी गया, वो आया। कुछ दिन तक सत्संग उसके कान में गए। तो बस मेरा यही भाव है, उसे भी मुक्ति का रास्ता मिले।
और मैं सबसे पहले अपने जीवन में मैंने अपने आप से प्रेम किया, इसलिए मैं यहाँ हूँ। और अब मैं जितना अपने आप से प्रेम करता हूँ, मेरे साथ रहने वाले, चाहे वो साधक हो, कोई भी हो, मैं उनसे वही प्रेम करता हूँ, हर वक्त।
पहले जब मैं खोज में निकला था, तो मैं हर वक्त कुछ भी काम करता था अपने आप को निकालने के लिए। कैसे मैं अपने आप को निकाल दूँ। अब अगर मैं कुछ भी काम करता हूँ, तो मैं आप लोगों को कैसे निकाल दूँ। बस यही मेरा जीवन है। पहले मैं अपने लिए लगा, और हर वक्त एक ही बात सोचता था। मैं सोता था, उठता था, बैठता था, कहीं भी जाता, आता, खाना पीना, कुछ भी करता था, तो मेरा एक ही भाव था कि मैं कैसे ज्ञान खोजूँ, प्रत्यक्ष ज्ञान खोजूँ, और कैसे मैं अपने आप को निकाल लूँ। क्योंकि जब मैं अपने आप को निकाल पाऊँगा, तभी मैं आपको निकाल पाऊँगा। यह मुझे पता था। तो मैंने अपने आप से इतना प्रेम किया कि मैंने अपने आप को निकाल लिया। और हर वक्त मैंने निकालने के लिए काम किया। मेरा कहीं आना जाना हुआ, तो सिर्फ अपने आप को निकालने के लिए।
अब मेरे जीवन में आप लोग हो। मेरा सोना, उठना, बैठना, खाना, पीना, कुछ भी अगर हो रहा है, तो आपके लिए हो रहा है। क्योंकि मेरे लिए कुछ बचा नहीं। अगर मैं अपने लिए करना भी चाहूँ, तो मैं करूँगा क्या? मैं करूँगा भी क्या? आपने विदेश देखा, आप मेरे साथ गए। मैं कैसे जिया? मैं अपने लिए क्या करूँगा? मेरे लिए करने के लिए कुछ है, यह नहीं है। मेरे लिए अगर कुछ करने के लिए है, तो आपके लिए है। मेरा हर क्षण, हर पल, हर सोच, हर विचार, कुछ भी अगर है, तो आपके लिए है। मेरा कहीं भी आना जाना, कुछ भी हो रहा है, बातचीत, कुछ भी मेरे जीवन में है, तो सिर्फ आप लोग हैं। बस यही रहता है कि आप लोगों के लिए क्या मैं कर दूँ, कि आप लोग निकल जाओ। क्या मैं कर दूँ? क्या मैं ला दूँ? कहाँ मैं आपको ले जाऊँ, आपको दे दूँ, कि आप निकल जाओ।
और आप लोग भी अपने आप से इतना प्रेम करो कि आप अपने आप को निकाल लो। अगर आप अपने आप से प्रेम करोगे, तो निकाल लोगे। इसलिए मेरा कहना है कि आप लग जाओ पूरी तरह, और निकाल लो अपने आप को, चाहे जैसे भी। पहले आपने बाहरी वैभव के लिए, समृद्धि के लिए, मान सत्कार के लिए कुछ भी किया। अब निकालने के लिए कुछ कर लो। आप कुछ भी करो, आपको यह लगना चाहिए कि इससे मेरी मुक्ति है। बस, कुछ भी करो। और अगर मुक्ति है तो करो, नहीं तो रुक जाओ। अगर आपको लग रहा है कि नहीं, यह मुझे बंधन देगा, तुरंत रुक जाओ, और समझ के करो।
नहीं समझ में आ रहा है, मत करो। समझ के ही करो, कोई काम। अगर नहीं समझ में आए, तो मत करना। छोड़ देना। रुक जाना। कोई भी आपके द्वारा कार्य हो रहा है, तो वो मुक्ति के लिए हो, और नहीं तो ना हो। रुक जाओ। जब तक ना समझ में आए, मत करो। अगर जरूरत होगी तो समझ लोगे, या तो जिसको जरूरत होगी, मुझे समझा देगा। क्योंकि आपने अपने आप को बहुत उलझा दिया है, बहुत बंधन में फँसा दिया है। अब मत फँसाओ। समझ के करो। या तो आपकी जरूरत होगी तो समझ लोगे। जिसको जरूरत होगी, वो समझा देगा।
जैसे आप विदेश गए, जीने के लिए खा ही ले रहे थे, खोज खोज के कैसे खा ले रहे थे। अब अगर वैसा भोजन मिले तो थोड़ी ना खाओगे, क्योंकि अनेक ऑप्शन हैं। लेकिन जीने के लिए कैसे खाते थे। जब जीना होता है, तो सारा नाटक चला जाता है। तो जब तक ना समझ में आए, मत करो, करो ही मत। और समझ में आए तो करो। या तो जरूरतें सिखा देंगी आपको, या तो जिसको जरूरत होगी वह सिखा देगा। लेकिन अपनी जिंदगी को दलदल में आप मत फँसाओ। कहीं भी आओ, कहीं भी जाओ, किसी के साथ रहो। बस मुक्ति के लिए। मुक्ति के अलावा कुछ नहीं। क्योंकि हमने करके देख लिया है, करके समझ लिया। मिलाकर देखो तो वही है। मिलाकर देखो तो वही बातें।
अगर आप किसी के साथ रहे हो, आप जितने वर्ष तक रहोगे और आगे भी रहोगे, तो वही होगा। उससे ज्यादा कुछ नहीं होने वाला है। तो आप देखिए, किसके साथ रहने से मेरी मुक्ति होगी। क्योंकि मैं अपने आप को इतना बाँध लिया कि छुड़ाने की क्षमता मेरी खत्म हो गई। मेरी ताकत बाँधने में ही लगा दी, क्योंकि बाँधना मेरे लिए सबसे सरल है। गांठ मारना देखो, सबसे सरल होता है। कोई भी फौरन से मार दो, और आपकी गांठ कभी आपसे ही नहीं छूटी। ऐसा अनुभव तो हुआ होगा। आपने रस्सी की गांठ मारी और आपसे ही नहीं छूटी होगी। तो आपने चाकू का प्रयोग किया, या किसी ताकतवर व्यक्ति का उपयोग किया।
तो हमारी ताकत बंधन बाँधने में, दलदल में फँसाने में लगी हुई है। हम इस समय दलदल में हैं, तो हमारी ताकत नहीं। हमें ऐसे ताकतवर आदमी के साथ रहना है, जो मुझे निकाल दे। अब देखना यह है कि हम ऐसे आदमी के साथ तो नहीं रह रहे, कि वो भी दलदल में है और मैं भी दलदल में हूँ, दोनों और नीचे जा रहे हैं। क्योंकि आप जैसी संगत करोगे, उसकी ऊर्जा आप पर काम करेगी, आपकी ऊर्जा उस पर काम करेगी। साथ का मतलब हाथ पकड़ना। तो देखो, जिसका मैं हाथ पकड़ रहा हूँ, वो कहाँ खड़ा है? क्योंकि वही खींचेगा। जीवन में मुक्त पुरुष का हाथ पकड़ना, क्योंकि जहाँ वो रहेगा, वही खींचेगा। याद रखना, आपके पास ताकत थोड़ी ना है।
वो आपको अनेक तरह का लालच देगा, और लालच तो हमारे पास भरपूर है। आप देखो, प्रोफेसर जी फल के लिए कैसे लालायित हैं, कि काट के हमें खड़ा ही दे देना। और इनके पास कोई कमी नहीं है। यात्रा भी इनके पैसे से ही हो रही है, लाखों रुपए। देखिए लालच। लाखों रुपए खर्च कर रहा है व्यक्ति, और कितने का फल रहा था, हजार सौ नहीं, हजारों में गिर जा रहा है। उसके पास कोई कमी ही नहीं है। जिसके साथ वो भी हैं, वो भी कह रहे हैं, कोई कमी नहीं है। आपके पास कोई कमी नहीं है। आप निमित्त बने। विदेश यात्रा की कहीं ना कहीं व्यवस्था आपके द्वारा ही हुई। लेकिन आप देखिए कि आप कहाँ गिर रहे हो। आपके लालच का आपको पता भी नहीं।
और यही अगर आप बंधन वाले व्यक्ति के साथ रहते, तो वो आपको सपोर्ट दे देता, आपको पता भी नहीं चलता। हमारे गिरने का भी हमें पता नहीं चलता। क्योंकि आप जिसके साथ हो, वो खींचेगा। कहेगा, यह जगह एकदम सेफ है। यह जगह सेफ है। क्योंकि मेरे ग्रुप से एक आदमी कम हो रहा है, इसका मतलब मेरा ग्रुप कमजोर हो रहा है। व्यक्ति अपने ग्रुप को बढ़ाना चाहता है। एक व्यक्ति का हटना मतलब उसकी ताकत कम होना। तो कहता है, नहीं, मैं जहाँ हूँ ठीक है, तुम मत जाओ आगे। क्यों मत जाओ? क्योंकि मैं कमजोर हो रहा हूँ। मैं कहीं ना कहीं कमजोर हो रहा हूँ। एक ग्रुप से आदमी हट रहा है। यहाँ सब अपने ग्रुप में खींच रहे हैं, अपने बल को बढ़ाना चाहते हैं। लेकिन आप देखो कि आप जिसके साथ जा रहे हो, वो कहाँ खड़ा है। क्योंकि जहाँ खड़ा होगा, वही लपेटेगा आपको। यह स्वाभाविक है।
तो मेरा यही कहना है कि आप अपने आप से प्रेम कर लो, अपने आप को निकाल लो। कोई भी काम आपके द्वारा हो, सोना, जागना, उठना, बैठना, कुछ भी हो, बस मुक्ति के लिए। नहीं तो रुक जाओ। समझ कर करो। नहीं तो जरूरतें समझा देंगी, या जिसको जरूरत होगी वो समझा देगा। तो अपने आप से प्रेम कर लो, अपने आप को मुक्त करा लो। और उसके लिए आपको मेहनत करनी पड़ेगी। समझ के चलना पड़ेगा, समझ के जीना पड़ेगा। हर काम सोच, समझ और सूझबूझ के साथ करना पड़ेगा। यह बातों से बात नहीं बनने वाली। हर वक्त, हर पल, हर क्षण आपको सचेत रहना पड़ेगा। ऐसे नहीं होने वाला है। आपको अपने ऊपर काम करना पड़ेगा। और हाथ उसका पकड़ना है, जहाँ आप जाना चाहते हो।
संगत करनी पड़ेगी आपको। बिना संगत के कुछ होने वाला नहीं है। यहाँ हम एक दूसरे के पूरक हैं। यहाँ आपको कुछ चाहिए, तो आपको किसी की संगत करनी पड़ेगी। बिना संगत के कुछ मिलेगा ही नहीं। बिना संगत के कुछ होगा ही नहीं। तो आप देखिए कि संगत किसकी कर रहे हो। जिसका संगत करोगे, उसी से बल मिलेगा, और वहाँ आप चले जाओगे। यह आपको देखना है, संगत किसकी कर रहे हो। क्योंकि संगत आप कर सकते हो। अभी साथ लेने लायक तो आप हो नहीं। किसी को साथ तो ले नहीं सकते। क्योंकि जब खुद का उद्धार नहीं हुआ, तो किसी और का थोड़ी ना कर सकते हो। तो आप सोच समझ कर संगत करिए, कि आप संगत किसकी कर रहे हो।
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