आध्यात्मिक प्रत्यक्ष ज्ञान · ऐप में खोलें

प्रश्नोत्तर P2-0108 · भाग 2

धन्यवाद प्रभु जी, मैं आपकी वाणी को मानूंगा।

नहीं, आप समझो कि मैं क्या कह रहा हूं, किसके लिए बोल रहा हूं, मेरा भाव क्या है, और भाव के बाद जो शब्द निकलते हैं वे क्या हैं — क्या कह रहा हूं, किसलिए कह रहा हूं, उससे क्या होगा। जीवन मिला है, तो उसे सोच-समझकर जियो। जब भी आप कुछ करते हो, दो ही बातें होती हैं — हर क्षण या तो आपका स्तर उठता है या गिरता है; या तो आप गिरने की प्लानिंग कर रहे हो या उठने की। जैसे विचार बनाओगे, जैसी जानकारियां लोगे, जिसके साथ रहोगे, वैसा काम भी होने लगेगा। आप किसके साथ हो, यह मायने रखता है, क्योंकि जिसके साथ रहोगे उसका असर आपके जीवन पर होगा, आप चाहो या न चाहो। ठंडी जगह रहोगे तो शरीर ठंडा हो जाएगा, गर्म जगह रहोगे तो गर्म; ठंडी जगह रहकर सोचो कि शरीर गर्म हो जाए, तो संभव नहीं। कुछ व्यवस्था कर भी लो, तो वह कब तक टिकेगी? आना तो अकेले ही पड़ेगा; बाहर के आधार के सहारे कब तक खड़े रहोगे? तो मेरा यही कहना है कि आप खुद उस स्थिति में पहुंचो। प्रत्यक्ष ज्ञान आपको यही सिखाता है कि अधीनता छोड़ो, गुलामी छोड़ो। आपने किसी समूह, किसी व्यक्ति की गुलामी कर ली है — उसे छोड़िए, अपने आप को निकालिए। समझिए कि आपका कर्म आपको कहां ले जाएगा। आपके जीवन पर आपका अधिकार है, और यह अधिकार इसलिए दिया गया है कि आप अपना कल्याण कर लो। यह मत कहना कि मेरा जीवन, मेरा अधिकार, मैं चाहे जो करूं — फिर ‘अब पछताए होत क्या, जब चिड़िया चुग गई खेत’। ऐसी जगह मत जीना जहां से आप गिर जाओ। यह शरीर मिला है, मौका मिला है — अपने आप को मुक्त करा लो; मौका हाथ से न जाए, क्योंकि एक दिन यह शरीर छीन लिया जाएगा, उसके पहले कुछ कर लो। आप जहां हो, जिसके साथ हो, उसका असर आप पर पड़ेगा; तो देखो कि वहां रहकर क्या कर रहे हो, और जिसके साथ हो उसका आपके जीवन में क्या महत्व है।

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वीडियो: अपनों की कुटिया के दृश्य सत्संग क्रोध #योगी · 2026-04-18