प्रश्नोत्तर P2-0199 · भाग 2
गृहस्थ जीवन में डर और असुरक्षा सताती रहती है — कल मेरा क्या होगा। जवानी में दौड़कर पैसे, घर, बैंक बैलेंस, जानकारियां और सोशल सर्कल इकट्ठे किए ताकि सुरक्षित महसूस हो, फिर भी एकांत या दुख में लगता है कोई किसी का नहीं। आपकी व्यक्तित्व में जो निश्चितता-स्थिरता आई है, वह मैं अपने अंदर कैसे लाऊं? अपूर्णता से पूर्णता की तरफ जल्दी कैसे बढ़ूं? अध्यात्म में बाहर जैसी प्रगति नहीं दिखती, तो डर लगता है कहीं मैं नई दुनिया तो नहीं बसा ली — मार्गदर्शन करें।
पहले तो ये देखना है कि हम अगर अपूर्णता से पूर्णता में आना चाहते हैं, इसका मतलब मैं कभी पूर्णता में था। अब मैं पूर्णता में होते हुए अपूर्णता में कैसे गए? पहले तो मुझे ये समझना पड़ेगा।
शुरुआत मेरी कहां से हुई? जरूरत से। मेरी जैसी जरूरत होती थी, जरूरत मैं पूरा करता था, अपने आप में आ जाता था। ना मुझे कोई चिंता थी, ना कुछ था — बचपन की हमारी हालत यही थी। फिर आगे मुझे कुछ जिम्मेदारियां थोपी गईं, कुछ मैंने लीं। पहले जरूरत के लिए काम किया; लेकिन फिर समाज का मान का चक्कर, बड़ा बनने का चक्कर मुझ पर थोप दिया गया — कुछ घर वालों ने, कुछ सताने वाले लोगों ने कि तू मुझसे कमजोर है, अब मुझे इससे ताकतवर बनना है। फिर माहौल ऐसा मिला कि मैं बेईमानी करने लगा, क्योंकि मुझे जीतना था, अपमान से नहीं जीना था, बड़ा बनना था।
जैसे जल है उसे अशुद्ध कौन करता है? गंदगी। गंदगी बेईमानी है। बेईमानी करके मैं बाहर से मजबूत होता गया लेकिन अंदर से गंदा होता गया। दौड़ते-दौड़ते एक समय रुकना पड़ेगा, थक जाओगे। जब रुका तो देखा — अपने आप को गंदा, विवश, मजबूर, लाचार, अशांत बना लिया। पहले दौड़ बड़ा बनने की थी; रुका तो अब शांति के लिए दौड़ने लगा। अशांति का कारण मेरी बेईमानी है; शांति मेरे पास पहले से ही थी, बेईमानी करके खो दी।
अब क्या करना होगा? बहुत सीधी बात है। अब मुझे ईमानदारी अपनानी है। एक समय ऐसा था जीवन में कि ना मैं ईमानदार था ना बेईमान — एक जिंदगी थी और मैं जी रहा था। लेकिन अब बेईमानी इतनी कर ली कि वहां से निकलने के लिए ईमानदारी पकड़नी होगी। बेईमानी करोगे तो हर व्यक्ति-जीव का कहीं न कहीं श्राप लगेगा। ईमानदारी पकड़ लूंगा तो आगे अशुद्ध नहीं होऊंगा; लेकिन पीछे का मैल धोने के लिए सत्कर्म करना पड़ेगा। सत्कर्म से आशीर्वाद मिलेगा, श्राप कटेगा — जिस दिन श्राप कट गया, अपूर्णता से मुक्त होकर पूर्ण में स्थिर।
गड़बड़ ये है कि परिणाम हम अपने तरीके से चाहते हैं, बड़े जल्दी में हैं। जल्दबाजी कर रहे हो तो ईमानदारी-सत्कर्म में करो; परिणाम का इंतजार करो। मैल छूटेगा तो साफ हो ही जाओगे। जब अकेले बैठते हो तो कर्म याद आते हैं — उनमें मैल है, वही तकलीफ देता है। आप अपने आप को अभी भी देख पा रहे हो, लेकिन गंदा देख पा रहे हो — जैसे मैला कपड़ा: साफ भी दिखता है, मैल का प्रभाव ज्यादा है। कपड़े की गंदगी तब दिखती है जब काम से खाली होते हो; धोने के लिए समय देना पड़ता है। जीवन इतना बिजी बना लिया कि गंदा लगता रहा, चलते रहे; रुके तो इतना गंदा कि बास बर्दाश्त नहीं। धुलाई में समय लगेगा — ईमानदारी, सत्कर्म, सत्संग सुनते रहो; बल मिलेगा, कैसे जीना है तरीका मिलेगा। रोज सत्संग सुनो और सत्संग में जीना चालू करो।
सत्संग वीडियो देखेंऐप में खोलें
वीडियो: अपूर्ण से पूर्णता की तरफ कैसे जाएं #योगी · 2026-01-10