प्रश्नोत्तर P6-0023 · भाग 6
घंटों ध्यान बैठने से आचरण बदलेगा? कर्म तो कर ही रहे हैं।
इसमें टाइम पीरियड बढ़ाने की भी कोई जरूरत नहीं है। घंटों ध्यान बैठने की कोई जरूरत नहीं। उससे क्या होगा? मैं कह रहा हूं, उससे क्या आपके आचरण में बदलाव आ जाएगा? होगा क्या? आपके शरीर को रिलैक्स मिलेगा, एक सुकून मिलेगा। लेकिन उठने के बाद तो आप वहीं आओगे। तो आपको अपने कर्म को बदलने की जरूरत है। आप समझिए इस बात को।
उसी में आ जाओगे ना। तो पहले ध्यान को समझो कि मुझे बैठकर क्या करना है। जब मुझे बैठना है तो पहले मुझे भाव बनाना है कि भाई मुझे निकलना है। निकलना कहां से है? लोगों के पिंड में, वस्तुओं में, मैं राग में फंसा हूं। तो जब मैं बैठूं तो मुझे ध्यान करना है कि मैं कहां-कहां, क्यों फंसा हूं, और वहां से अपने आप को छुड़ाना है। तब बैठने का मतलब है।
विचारों को रोकने में यही तो गड़बड़ है। विचारों को रोकने से क्या उन विचारों से तुम मुक्ति पा सकते हो? किन विचारों को रोक रहे हो? क्या उन विचारों को रोकने से उन विचारों से मुक्ति पा सकते हो? विचार ही तो तुम्हारे कर्म के परिणाम हैं। अगर तुम्हें कोई विचार ग्रसित कर रहा है, उस विचार से आप छिप रहे हो, उस विचार को दबा रहे हो, तो उस विचार के लिए आपने कर्म किया है। तो क्या वो विचार दबाने से उस विचार से मुक्त हो गए?
किसी से कर्ज आपने लिया, तो कर्ज देने से मुक्त होगे कि उस व्यक्ति से छिपने से मुक्त होगे? कर्ज जो लिया है, उससे मुक्त होने के लिए देना पड़ेगा ना। तो फिर उसको तो जैसे लिया है वैसे देना पड़ेगा ना, कि उस कर्जदार से छुप के भाग जाओगे?
हां, उसी को काटने का ईमानदारी और सत्कर्म ही रास्ता है। यही एक रास्ता है और कोई रास्ता नहीं। यही रास्ता है। बेईमानी और दुष्कर्म में भटके हैं, ईमानदारी और सत्कर्म में निकल जाएंगे। बस यही बहुत साफ सुथरा रास्ता है।
तो विचारों को दबाओ मत। विचारों में जीना सीखो। विचारों के साथ जाओ। ये विचार मुझे ग्रसित कर रहे हैं तो क्यों कर रहे हैं? क्योंकि ये विचार आज ग्रसित कर रहे हैं, लेकिन इसके पीछे कोई व्यक्ति विशेष है, कोई जीव है। नहीं तो फिर वो ध्यान में आने बंद हो जाएंगे।
जैसे आपने जिससे कर्ज लिया था, दे दिया, तो वो आपके सामने हो और वो कुछ नहीं कर सकते। अब छुपने की जरूरत नहीं है।
विचारों को कभी मत दबाओ। विचारों के साथ जाओ। विचार का जन्म कहां से हो रहा है? क्योंकि उस विचार के लिए आपने कोई काम किया है। ऐसे थोड़ी ना विचार आ गया। अगर कोई विचार आपको परेशान कर रहा है तो वो विचार आज परेशान कर रहा है, लेकिन उसका आपने कभी मजा लिया। तो आप उन विचारों के साथ जाओ, और जब आखिरी में चले जाओगे तो अपने आप को छुड़ा पाओगे। आपको पश्चाताप होगा कि नहीं, अब मुझे अपने स्वभाव को बदलना है। मुझे ऐसे लोगों से मतलब नहीं रखना है, क्योंकि मुझे निकलना है। लेकिन आखिरी तक जाना पड़ेगा। विचार दबाने से विचारों से मुक्ति नहीं मिलती, क्योंकि विचार आपके कर्म का परिणाम हैं।
वो गांठ है, जो पुरानी है। आप ये मत सोचो मैं छुप जाऊंगा। किसी विधि द्वारा, चलो एक काम करते हैं, चेहरा ही बदलवा लेते हैं, चाहे तो दूसरे स्टेट में चला जाता हूं, भारत को ही छोड़ देता हूं। लेकिन तू कर्जदार तो है, देना ही तो पड़ेगा। कब तक छिपोगे? कब तक, कहां भागोगे? जहां जाओगे, अपने आप को ही पाओगे। इसलिए विचारों का सामना करो। और मैं इसकी भरपाई कैसे करूं, उसके लिए तैयार हो जाओ। भैया, मेरे कर्म हैं। अपने आप से ही कहना है, मेरे कर्म हैं और मैं इसकी भरपाई करने के लिए तैयार हूं। बस खत्म।
एक बात बताओ। जिसको तुमने देखा नहीं, अगर मैं कहूं उसका ध्यान लगाओ, लगा सकते हो? तब, परमात्मा को देखा नहीं, तो कहां परमात्मा के ध्यान में बैठे? आप इसे गौर से समझिए। लोग कहते हैं ध्यान में बैठ जाओ परमात्मा के। परमात्मा का जिंदगी में ना अता पता है, तो कैसे हम बैठ जाएंगे? उनका तो कोई रूप ही नहीं है ना। वो रूप से परे होंगे, लेकिन वो देखा जा सकता है, तभी तो कहा गया है। रूप नहीं है, लेकिन किसी से तो देखा गया होगा। ये खुली आंखों से नहीं, किसी और से देखा गया होगा। कुछ चीजें ऐसी होती हैं हमारे जीवन में कि खुली आंखों से नहीं देख सकते। जैसे तरंग आ रही है, खुली आंखों से नहीं दिखती, लेकिन किसी के द्वारा तो देखा जा सकता है। तो कोई तो पैमाना होगा। अगर किसी ने कहा ये है, तो इसका मतलब उसने देखा। ऐसे थोड़ी बोल दिया। देखा जा सकता है, तभी तो बोला। तो अभी तो परमात्मा की बात मत करो। अभी एक काम करो। इस पर ध्यान करो कि मैं कैसे अपने आप को राग और द्वेष से छुड़ा दूं। ईमानदारी से काम करो।
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