प्रश्नोत्तर P6-0150 · भाग 6
गृहस्थ में रहकर विषय और विकारों से कैसे बचें? विकार क्या है?
कल मैंने अपने लिए भोजन बनाया था। आपके लिए तो बनाया नहीं था। आपके मना करने के बाद भी मैंने उसमें से भोजन दिया। दो रोटी बनाई थी तो एक आपको दी। चावल बनाया था तो उसमें से आपको दिया। दाल बनाई थी तो उसमें से आपको दी। दाल तो ठीक थी, दाल उतनी थी। पर रोटी और चावल उतना ही था कि मैं खा लूँ। मैंने अपने हिस्से से दिया। पहले भी समझा था, कल भी यही समझा, कि देना इतना आसान नहीं है जितना आसान हम समझते हैं।
आप मना भी कर रहे थे, फिर भी मैंने आपको दिया। आपने आधी इसलिए माँगी कि मुझे कमी न पड़े। मुझे पता था यह बात। आपको एक चाहिए था। आपने आधी माँगी ताकि मुझे कमी न पड़े। मैंने देखा, देना इतना आसान नहीं है जितना आसान आप समझते हो। आपके पास ज्यादा है तो फिर वह देना भी नहीं है। सच में जितनी भूख है, उसमें से दो, तभी समझ में आएगा। दो दिन भूखे हो, जरूरत का न हो, उसमें से देना, जैसे मैंने कल महसूस किया। इतना आसान नहीं है देना, जितना आसान हम समझते हैं।
समाज के लिए जीना भी इतना आसान नहीं है जितना लोग समझ लेते हैं कि हम समाज की सेवा करेंगे। इस संसार में जिसने भी समाज की सेवा की है, देख लेना, वह खत्म हो जाता है। उसके पास कुछ नहीं मिलता। तन पर एक वस्त्र मिलता है, जहाँ तक मैंने समझा, अगर उसने सच में समाज सेवा की होगी। और अगर समाज के द्वारा अपनी सेवा करवाई होगी, तो गाड़ी, बँगला, नौकर चाकर, सब मिलेंगे। सेवा एक ही जगह हो सकती है। या तो आपके द्वारा समाज की, या समाज के द्वारा आपकी। अपनी सेवा करोगे तो समाज को लूट लोगे। समाज की सेवा करोगे तो तुम लुट जाओगे। दो में से एक ही होता है। यह मैं प्रत्यक्ष अनुभव कर रहा हूँ।
कल भोजन के बाद बिस्कुट बाँटे गए थे। साधुओं की जरूरत नहीं थी, फिर भी ऐसे ही बाँट देते हैं। भाव रहता है। बिना जरूरत का खा लो। ऐसे ही बाँट देते हैं।
विषय और विकार। विकार क्या है? जब आप बेईमानी और दुष्कर्म करती हो तो विकार आते हैं। आप जहाँ भी रहो, बेईमानी और दुष्कर्म मत करो। बात खत्म। और सबसे ज्यादा बेईमानी बातचीत में होती है। झूठ, बढ़ाई, चापलूसी, यह छोड़ दो। इतना तो छोड़ो। बातचीत में सबसे ज्यादा बेईमानी होती है। मूल ईमानदारी और सत्कर्म अपना लो, जिससे कल्याण होगा।
पर आप यह हो कि अनेक साधनाएँ कर लोगे, और इसको पकड़ने नहीं आ रहे जिससे कल्याण होगा। यह आपको भी पता है। सबको पता है। कुछ लोग बैठे हैं, आओ हम तुम्हें बचाएँगे। तुम दूसरों की जेब काटो, इतना प्रतिशत तुम रखना, इतना हमें देना। इतने कम में बात कर रहा हूँ। हम तुम्हें बचाएँगे। जिसके द्वारा वे यह कह रहे हैं, समझना, वह अपने बाप को भी नहीं बचाए। जैसे राम अपने पिता को भी नहीं बचाए। एक साधारण पिता के शाप की वजह से पुत्र के वियोग में तड़प तड़प कर मरे। राम ने बचाया क्या? कोई उपाय करा क्या? कृष्ण भगवान के सामने उनका भांजा मारा गया। बचाया क्या? जरा सोचो। और तुम जाकर वहाँ प्रार्थना करते हो कि मुझे बचा लो। हँसते होंगे। देखो क्या मूर्खता कर रहा है।
काश प्रार्थना यह होती कि आपसे मिलना चाहता हूँ। जल्दी से जल्दी मेरा भोग खत्म करो। दो मुझे, मैं भोगूँ, और खत्म हो। खत्म तभी होगा जब मैं भोगने के लिए तैयार हो जाऊँगा। काश अपने भोग को भोगने के लिए प्रार्थना करते, कि मैं जल्दी से जल्दी आपके नजदीक आना चाहता हूँ, मिलना चाहता हूँ। यह तभी हो सकता है जब आप सारे कर्मों के फल को पूरी तरह भोग लोगे, चाहे पाप हो चाहे पुण्य। तभी उससे मिलना होगा। पर आप हो कि भोग बढ़ाए जा रहे हो।
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