प्रश्नोत्तर P6-0001 · भाग 6
जबान का स्वाद / खाने की इच्छा ईमानदारी से — कहां तक?
अगर ईमानदारी से खाने की इच्छा है, तो खाओ। भले कितना ही खाओ, कुछ भी खाओ, उसमें कुछ नहीं। ईमानदारी से, बिना किसी को तकलीफ दिए, उसमें आत्मिक नहीं गिरते। क्यों गिरेंगे? आत्मिक तो तब गिरते हैं, जब हम छीन के खाते हैं, बेईमानी से खाते हैं।
ईमानदारी में कोई निग्रह की जरूरत नहीं। और इस रस की कभी पूर्ति हो सकती है, जब खाने का रस है? हो सकती है। समझ के छोड़ देना। समझ के छोड़ देना। तो ये समझ कब आती है, छोड़ने की? ये आ तो रही है। यही तो समझ है। यही समझ है, कि हम जरूरत में जिएं। जरूरत में जिएं।
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वीडियो: रविवार प्रश्नोत्तरी 23 अगस्त 2026 #योगी · 2026-08-23