आध्यात्मिक प्रत्यक्ष ज्ञान · ऐप में खोलें

प्रश्नोत्तर P6-0012 · भाग 6

गुरु ने जीवन बदला फिर रूप बदल गया — क्या गुरु की स्टेट भी कंप्रोमाइज हो जाती है?

साफ सुथरी बात है। हो सकता है वो आपको गलत दिख रहा हो। हो सकता है कोई, आप जिसे गुरु मान रहे हो, पता चले किसी स्त्री के साथ संबंध कर रहा है। वो तुम्हें गलत लग रहा हो। लेकिन वो दोनों खुश हैं। ये तुम्हें गलत लग रहा है। गलती तुम्हारी है। जिसके साथ वो संबंध कर रहा है, जाके उससे पूछो, ये गलत किया क्या? आपने गुरु को अपने तरीके से जीने का गुलाम बना लिया है। अगर मुझे कोई गुलाम बनाता है तो उसका त्याग करो। ना तो मैं किसी को गुलाम बनाऊंगा, ना तो मैं किसी का गुलाम बनूंगा। सीधी सी बात है। लोगों ने क्या किया है, गुरु को गुलाम बनाना चाहते हैं। सबका जीवन है। आप जिस लिए गए हो, उसकी बात करो। वो व्यक्तिगत अपने जीवन में क्या करता है, उसकी जिंदगी है। लोगों में भ्रांतियां हैं। उसे क्लियर करना पड़ेगा। बात को पूरा करना पड़ेगा। वो क्लियर होगी। उस कुर्सी को जांचना नहीं आता। हमारे में अगर बदलाव हो रहा है, हम जिसके लिए गए हैं। एक डॉक्टर की डिग्री को हम नहीं जांच सकते। लेकिन मेरी बीमारी ठीक हो रही है, ये तो मैं जांच सकता हूं। क्योंकि वो मेरी बीमारी का इलाज कर रहा है। हमें डॉक्टर की डिग्री नहीं जांचना है। स्टेरॉयड दे दिया। कुछ समय के लिए वो बिल्कुल ठीक हो गया। पर स्टेरॉयड देने के बाद बीमारी ठीक तो नहीं हुई। दब तो गई, पर ठीक तो नहीं हुई। वो तो छह महीने बाद, दो महीने बाद, फिर और ज्यादा बड़े लेवल पर उभरना है। उसको छोड़ के किसी और के पास जाओ। मेरा तो कहना है, व्यक्ति विशेष को मत पकड़ो। मेरा कल्याण करना है, और मुझे जहां से होगा वहां से मैं करूंगा। मेरी कंडीशन यह नहीं होनी चाहिए। जब तुम्हारे पास मेरा इलाज ही नहीं है, तो मैं तुम्हें पकड़ के क्या करूंगा? क्योंकि मैं तुम्हारे पास नहीं आया हूं। मैं अपने इलाज को लेके आया हूं। इलाज ने मुझे यहां लाया है। और जब मेरा इलाज ही नहीं होगा, तो मैं तुम्हारे पास रह के क्या करूंगा? मैं तुम्हारे शरीर को देखकर नहीं आया। आप अगर यहां बैठे हैं और मैं यहां बैठा हूं, तो आप जिज्ञासु हो, और मेरे ज्ञान को समझ के आप यहां आए हैं। मेरे शरीर को देखकर थोड़ी ना आए हैं। तो जिस लिए मैं गया हूं, अगर वो मेरा पूरा हो रहा है, ये मुझे पता चल जाएगा। उस कुर्सी को तो मैं नहीं जांच सकता। लेकिन जिसके लिए मैं गया हूं, वो हो रहा है कि नहीं हो रहा है, ये तो मैं जान सकता हूं। वहां से यही समझना चाहिए कि गुरु है ही नहीं। गुरु हमेशा आपको देता है। लेने की तो बात ही नहीं करता। नाराज होगा जब तुम नहीं लोगे। लेने की बात वो करता ही नहीं। और लेने की बात करे तो गुरु नहीं। गुरु की पहचान करने का एकदम साफ सुथरा तरीका है। मेरी सफाई करे, वो गुरु है। अगर मेरे पास जो है उसकी सफाई करे, तो बना हुआ गुरु है। बस यही एक तरीका है। और मुझे डरना नहीं चाहिए। पहले तो अपना डर निकालो। कहीं ना कहीं हम डरे हैं, तभी वो लाभ ले रहा है। वो बना हुआ गुरु है। अगर मेरे पास है, उसकी सफाई की बात कर रहा है, तो वो फिर बना हुआ गुरु है। और मेरी सफाई की बात करे हर वक्त, तो वो गुरु है। और उसी गुरु से मेरा कल्याण होगा। गुरु जांचने का एकदम ये सरल तरीका है। और ये देखना है कि जिस उद्देश्य को मैं लेके गया हूं, मेरा उद्देश्य पूरा हो रहा है कि नहीं। त्याग कर दो। ये गुरु है नहीं। आप लोग समझिए कि गुरु को आपके बदलाव की जरूरत है। आपके पास क्या है, उसकी जरूरत गुरु को नहीं है। और अगर आपके पास है, उसके लिए वो आपको श्राप दे रहा है, तो गुरु तो है ही नहीं। क्योंकि गुरु का तो सिर्फ एक ही काम है, आपका कल्याण करना। और फिर हर चीज को आप यही कह देते हो। अगर मैं कहूं कि आपने क्या बोला? आपने ही कहा कि संत कभी किसी को श्राप नहीं देते। और जब मैं कह रहा हूं कि आपने क्या बोला, तो आप कह रहे हो, मैं तो बोलता नहीं, वो बोलता है। नहीं तो आप त्याग तो कर दो। इसे बहुत आराम से समझिए। त्यागोगे नहीं तो क्या करोगे, और भी समय बर्बाद करोगे। क्योंकि अब तो समझ में आ गया। और ये कैसा शिष्य था कि बीस साल तक कुछ सीखा ही नहीं। ये कौन सा शिष्य था? वो शिष्य था ही नहीं। वो टाइम पास कर रहा था। उसे जरूर कोई व्यवस्था चाहिए थी। वो शिष्य ही कैसा, कि बीस साल तक वो सीखा ही नहीं, और पढ़ा रहा। ऐसा हो सकता है। संभव है। आप उसे शिष्य कह सकती हैं? बिल्कुल नहीं सीखा। मैं तो इनसे कह रहा हूं। आपने तो कहा, मैंने सीखा है। वो तो मैं समझ गया। लेकिन क्या हो सकता है कि बीस साल तक वो पढ़ा रहा, और उसका शिष्य एक नंबर का आलसी होगा, खा पी के पढ़ा रहा। कुछ और भी उसे गुरु से मिल रहा था। वो जाने। बीस साल तक कैसे वो पढ़ा रहा, इतनी श्रद्धा के साथ, इतना समय दिया। बीस साल तक कोई रुक ही नहीं सकता। बीस साल भी, चाहे वो बीस दिन क्यों ना हो। वो कैसा शिष्य? शिष्य तो जाते ही अपनी जिज्ञासा रखेगा। शिष्य तो जाते ही, जैसे ही उससे मिलना होगा, अपनी जिज्ञासा की बात करेगा। बीस साल वो कैसे, बीस दिन कैसे इंतजार कर सकता है? बीस साल के बाद समझ में आए, तो त्यागने के अलावा रास्ता क्या है? मैं आपसे बहस नहीं कर रहा। आप इसे समझिए। बहस की बात नहीं है। इसे समझना है। यहां बहस की बात ही नहीं है। त्यागने के अलावा कोई रास्ता है क्या? कोई रास्ता नहीं है। त्याग ही आपको आगे बढ़ा सकता है। और नहीं त्याग करोगे तो वहीं सड़ जाओगे। तो कम से कम कुछ तो जिंदगी बची है। वो तो उसे छोड़ने के बाद कहीं तो जाएगा। उसके पास एक ही चीज है, त्याग करके कहीं आगे बढ़े। वहां पहुंचने के बाद साधक वाली हरकत, संसार वाला कर्म, कर ही नहीं सकता। गुरु स्थिति में पहुंचने वाला कभी गलत सोच भी नहीं सकता। करने की तो बात बहुत दूर की बात है। गलत कर ही नहीं सकता। वो इससे मुक्त हुआ, तभी तो स्थिति उसको मिली। यह संभव नहीं है। और मैं तो अपने जीवन में यही समझा, खोज में भी, अभी भी मैं यही कहता हूं कि आप जहां गए हो, अपने काम की बात करो। सीधी सी बात है। और अगर आपको लग रहा है कि मैं जिस उद्देश्य को लेके गया हूं, मेरा पूरा हो रहा है, तो मैं रहूंगा, नहीं तो मैं जा रहा हूं। सीधी सी बात है। क्योंकि मैं आपके पास आया था, आपके लिए नहीं आया हूं। अपने लिए आया हूं। अगर कोई कहे कि मैं आपके लिए सुबह से बैठा हूं, तो यह गलत है। आप अपने लिए बैठे हो। अगर आपको लग रहा है कि आप जिसके लिए बैठे हो वो हो रहा है, तो आप बैठो, नहीं तो चले जाओ। आप रुके क्यों हो? पहले तो ये है कि हमें अपनी क्षमता और अधिकार से ज्यादा देना ही चाहिए। गुरु यही कहता है कि जब आपकी सारी व्यवस्था हो, आप जरूरत में जियो। अगर आपको कुछ बचता है, तब आप दो। आप सब कुछ तो देना ही नहीं चाहिए, क्योंकि आपका भी जीवन है। ऐसी हरकत हो ही नहीं सकती। मैं तो सीधा पहले भी कहा, अभी भी कहा, हो ही नहीं सकता। अगर उस स्थिति में आ गया है, तो आप जैसी घटना बता रहे हो वो नहीं हो सकता। मैं साफ सुथरी बात कह रहा हूं। हो ही नहीं सकता। संभव ही नहीं है। क्योंकि गुरु हमेशा शिष्य का कल्याण चाहता है। वही गुरु है। ऐसा तो सोच भी नहीं सकता। वो तो अपने प्राण को भी देके उसका कल्याण चाहता है। वही गुरु है। तो देखिए कहां गड़बड़ी है। कह क्या रहा है, और व्यक्ति कर क्या रहा है, क्या वो दोनों एक हैं? पता चला कह तो कुछ और रहा है, कर कुछ और रहा है, कोई मतलब नहीं है। आप कह रहे हो वही कर रहे हो, तब तो मतलब है। पता चला कह कुछ और रहा है, कर कुछ और रहा है। क्योंकि मैं तो परिणाम देखूंगा। आप क्या कह रहे हो, उससे मुझे मतलब नहीं। आपका परिणाम क्या आ रहा है करने का, वो मैं देखूंगा। मेरा तो यही कहना है कि विश्वास करना छोड़ दो। प्रत्यक्ष ज्ञान का यही कहना है। मैं भी बहुत भ्रमण किया। मेरा यही कहना है कि आप जिसके लिए गए हो, आप अपना काम करो। बस, जिसके लिए हमारा आपका मिलना हुआ है, वो काम करो। अगर वो आपका काम होता है, तब आप उसके पास रुको। नहीं, छोड़ दो उसे। कोई और ढूंढो। मेरा तो इतना कहना है। क्योंकि हम किसी के पास जाते हैं तो हम उस व्यक्ति के लिए तो जाते नहीं हैं। हम अपने कार्य की सिद्धि के लिए जाते हैं। ना आप हमारे लिए आए हो, ना हम आपके लिए आए हैं। तो जिसके लिए हमारा आपका मिलना हुआ है, वो होना चाहिए। और वो आपके साथ हो रहा है कि नहीं हो रहा है। क्योंकि कार्य की सिद्धि आप लेके गए हो, तो आपका कार्य हो रहा है कि नहीं हो रहा है, वो तो पहले आपको पता चलेगा। आपकी बीमारी ठीक हो रही है कि नहीं हो रही है, यह डॉक्टर से पहले पेशेंट को ही पता चल जाता है। आप जिस कार्य को लेके गए हो, आपको ये देखना है कि मेरा कार्य हो रहा है तो ये आदमी ठीक है, और नहीं हो रहा है तो हमसे क्या मतलब। मैं चला, और कहीं ढूंढ लूंगा। प्रत्यक्ष ज्ञान का यही कहना है, विश्वास मत करो। हम पहुंच गए, वहीं विश्वास खत्म हो गया। अब काम की बात करो। जिसके लिए मैं आया हूं, उसकी बात करो। अगर मेरा काम होगा तो ठीक है, नहीं तो मैं जा रहा हूं। बात खत्म। इतना साफ सुथरा आपको जीवन जीना पड़ेगा। और सीधी बात करनी पड़ेगी कि भाई, मैं आपके पास आपके लिए नहीं आया हूं। पहले तो चापलूसी हटाओ। मैं आपके पास आपके लिए नहीं आया हूं। आपके पास कुछ है, वो लेने मैं आया हूं। सीधी सी बात करो। मिलावट की बात मत करो कि मैं आपके लिए आया हूं। हम आपके पास इसलिए आए हैं, आपके पास कुछ है, वो दो, क्योंकि उसकी मुझे जरूरत है। दो तो ठीक है, नहीं तो मैं और कहीं जा रहा हूं। इतना स्पष्ट बोलना पड़ेगा। इतना साफ सुथरा जीवन जीना पड़ेगा। क्योंकि हम कहीं जाते हैं तो लगता है कि हम किसी व्यक्ति के पास, किसी व्यक्ति के लिए जाते हैं। हम उससे कुछ लेने ही जाते हैं। तो लेने की बात करो, सीधा। क्या जरूरत है। वो कहे कि नहीं, हम तुम्हारे लिए आए हैं। भैया, हम तुम्हारे लिए नहीं आए हैं। हम अपनी जरूरत के लिए आए हैं। और अगर आप मेरी जरूरत पूरी करते हो तो ठीक है। आप मेरी जरूरत पूरी करोगे, तो आपकी भी कोई जरूरत रहेगी तो मैं भी पूरी करूंगा। सीधी सी बात है। लेनदेन है। ये लेनदेन संसार है। ऐसे तो छोड़ दो। क्योंकि भाव भी आपकी समझ से ही पैदा होता है। समझ थी, तभी तो भाव था। आपकी समझ से भाव पैदा होता है। अगर आप में समझ नहीं है तो भाव भी पैदा नहीं होगा। आप कुछ समझे, तभी तो भाव पैदा हुआ। और जितना आप समझ रहे हो, उससे भाव पैदा हुआ। और जितना आपने समझा, वो अगर है तो ठीक है, नहीं तो त्याग करो। हमारे पास यही ऑप्शन है कि आगे बढ़ जाओ, उसका त्याग करो। जब पता चल जाए, त्याग करो। हम जिसके लिए निकले हैं, हम उसी की बात करेंगे। अगर हमारा पूरा होगा तो हम रुकेंगे, और जिस दिन पूरा होना बंद हो जाएगा, मैं आगे चला जाऊंगा। यहां पछताने की भी जरूरत नहीं है। अगर आप बीस दिन भी रुके, तो बीस दिन में कुछ तो आपको मिल रहा था। बिना कुछ मिले, मैं आपको बताऊं, एक जोंक होती है। अगर उसे खून ना मिले तो वो छोड़ देगा। बिना कुछ मिले आप कहीं रह ही नहीं सकते। जानवर तक नहीं रहता। आप तो मानव हो। अगर मैं कहीं बीस साल रहा, और बीस साल बाद कह रहा हूं कुछ नहीं मिला, बीस साल तक तुझे मिला। तू रुक ही नहीं सकता। बिना मिले आप रुक ही नहीं सकते। तो अब उसे छोड़ दो। अब अगर मिलना बंद हो गया, तो जाने दो, छोड़ो उसे, और कहीं से लो। गुरु ज्ञान का प्रतीक होता है। अगर एक नल से पानी पी रहा था, वो खराब हो गया, तो दूसरी बोरिंग करा के पानी पी लो। क्या कसम खाए हो कि वही बोरिंग का पीऊंगा। अब वो बोरिंग खराब हो गया। छोड़ो, जाने दो। बोरिंग खराब भी हो जाती है। छोड़ दो। मूल से आदमी भटक के नीचे आ सकता है। हम आ गए यहां, मूल से नीचे आ गए। लेकिन गुरु एक ऐसी स्थिति है। गुरु कभी गलत नहीं कर सकता। ये पक्का है। आप यहां सत्संग के लिए आए हो। बैठना है तो बैठो, नहीं तो जाओ। बाबूजी का मतलब क्या है? किस लिए आए हो यहां पे? मेरे लिए आए हो? मेरे से बात करो। आप जिसके लिए आए हो, वो बात करो। आप मेरे लिए आए हो तो मेरे से बात करो। यही तो बात है। हम उद्देश्य से ही भटक जाते हैं। हम जिसके लिए जाते हैं, वो बात ही नहीं करते। और मेरा कहना है कि भाई, तुम्हें जरूरत है तो आओ, नहीं तो कतई मत आओ। क्योंकि तुम्हारा भी समय बर्बाद होगा, मेरा भी होगा, और तुम्हारा हो या ना हो, कई लोगों का तो बर्बाद हो जाएगा। हम जिसके लिए गए हैं, हमें सिर्फ उससे बात करनी चाहिए। अगर हम जिसके लिए गए हैं, उसके लिए बात करें, तो हमें दुनिया में कोई पैदा होकर भटका नहीं सकता। कभी कोई भटका ही नहीं सकता। ये मेरे जीवन का व्यक्तिगत अनुभव है। लेकिन हम क्या करते हैं, पता है? जाते कुछ और के लिए हैं, करने कुछ और लगते हैं। और कुछ दिन बाद कहते हैं, कुछ हुआ ही नहीं। तुम जिसके लिए गए थे, वो किया ही नहीं। नहीं तो तुम वहां रुकते ही नहीं। अगर आप रुके, तो जिस लिए गए थे वो ना करके कुछ और कर रहे थे, मिल रहा था। और बाद में पता चला कि कुछ मिला नहीं। क्योंकि उसके लिए तुमने कुछ किया ही नहीं। एकदम साफ सुथरी बात है। अगर मुझे कोई धोखा दे रहा है, कहीं ना कहीं उस धोखे का जिम्मेदार मैं हूं। कहीं ना कहीं हमने उससे कुछ और उम्मीद बना के रखी थी। मैं यही देखता हूं कि लोग जिसके लिए जाते हैं, वो छोड़ के कुछ और करने लगते हैं। आप यहां मेरे लिए आए हो तो मेरे से सिर्फ बात करो। बात खत्म। और आपको जरूरत नहीं है तो मत बैठो। क्योंकि यहां सम्मान अपमान के लिए नहीं बैठे। हम यहां कुछ समझने के लिए बैठे हैं। और समझेंगे तब, जब मूल पे बात करेंगे। जिसके लिए हम बैठे हैं, जब वो बात करेंगे। और ये मेरे जीवन का अनुभव है कि हम जिसके लिए गए हैं, अगर हम वही काम करें, तो हमें कोई ठग ही नहीं सकता। हमें कोई भटका ही नहीं सकता। अगर मैं भटक रहा हूं, मेरे साथ धोखा हुआ, उसका जिम्मेदार कहीं ना कहीं मैं हूं। और मैं कह रहा हूं, बीस साल बाद धोखा हो गया। बीस साल तक क्या कर रहे थे? बीस साल तक तुम और कुछ वहां ले रहे थे। यहां कोई किसी को धोखा नहीं दे सकता। कोई किसी को ठग नहीं सकता। ये मेरा अनुभव है। आपका क्या अनुभव है, देख लो। मेरा तो एकदम पक्का कहना है कि जिसके लिए अगर हम गए हैं, अगर वो बात करें, तो मुझे कोई भटका ही नहीं सकता।

सत्संग वीडियो देखेंऐप में खोलें

वीडियो: दिल्ली में पहला सत्संग पार्ट 2 #योगी · 2026-02-01