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प्रश्नोत्तर P4-0050 · भाग 4

(कुटिया में साधक) श्री कृष्णा गुरु जी। आपने एक प्रसंग में बोला था कि आत्मज्ञान के बाद फिर परमात्मा की यात्रा शुरू हुई; हम तो अभी तक यही समझते थे कि आत्मज्ञान के बाद सब खत्म हो जाता है। (ओशो ने भी एक सत्संग में यह बोला है।) क्या इसका भी कोई टाइम पीरियड है?

हां, तो मैं भी यही समझता था; जब चला था, तो (यही सोचा)। ये तो बाद में, जब यहां पहुंचा, तब पता चला कि अब तो यात्रा शुरू हुई मूल की; अभी तो यात्रा छूटने की हो रही थी। मुझे जहां तक पता था — जैसे आपको पता है, वैसे मुझे पता था — कि आत्मज्ञान, बस बात खत्म। लेकिन नहीं, आत्मज्ञान के बाद ही शुरुआत होती है मूल की यात्रा की; अभी तो इस भवसागर से छूट के आने की (यात्रा) है। (टाइम पीरियड —) किसी का कुछ टाइम नहीं है। क्योंकि आप कितने टाइम में फंसे हो — है आपके पास फंसने का टाइम? तब निकलने का टाइम क्या पूछ रहे हो? निकलने का टाइम क्या बताया जाए? (शिष्य गुरु को नहीं ढूंढता, गुरु शिष्य को ढूंढता है —) आप लोग भले ही हजारों किलोमीटर की यात्रा करके आए हुए हैं, लेकिन वास्तविक रूप से (बुलाया) मैंने ही आपको यहां पे। जितने लोग आए हैं, मुझे सुनकर ही तो आए हैं। अगर मैं बोलता ही नहीं, तो तुम मेरे बगल से भी निकल जाते; अगर मैंने तुम्हें बुलाया, तभी तो तुम आए, नहीं तो यहां पहुंच ही नहीं पाते। अगर मैं बोलता ही नहीं, कहीं पड़ा रहता, तो हो सकता है मैं तुम्हारे घर के बगल में ही (होता)। तो गुरु बुलाता है, तभी लोग पहुंच पाते हैं; अगर बोले ही नहीं, तो पहुंचोगे कैसे? उसने पहले पुकारा, तभी तो तुम आए; अगर वो पुकारे ही नहीं, तो तुम आओगे कहां?

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वीडियो: रविवार प्रश्नोत्तरी 1 मार्च 2026 #योगी · 2026-03-01