प्रश्नोत्तर P4-0082 · भाग 4
(लाइव) गुरु जी प्रणाम। कुटिया में रहने वाले जिज्ञासु को जब उसकी गलती के लिए आप बोलते हो, तो उसकी गलत आदत नहीं निकलती और वही कुटिया से निकल जाता है। कुटिया में बने रहकर सधने के लिए उसे क्या करना चाहिए?
नहीं जाना चाहिए, नहीं जाना चाहिए। जैसे दिल्ली का एक साधक था — वहां बात कर रहा था। मैं यहां से पहुंचा, मैंने उसे डांटा, बोला तुरंत कुटिया जाओ। (उसने कहा) इन्होंने पूछा कि आप कहां के हो? मैंने कहा दिल्ली से, बस इतना ही। (मैंने कहा) बस इतना ही नहीं है — आज दिल्ली बताए, कल आएंगे और कुछ पूछेंगे, उनका काम ही यही है। तुम और बताओगे; फिर नहीं बताओगे तो द्वेष पैदा हो जाएगा उस व्यक्ति का कि कल बात किया तो आज क्यों नहीं कर रहा है। हम कहे — अभी कुटिया से जाओ, तुरंत। फिर मैं वहां से यहां आ गया। वो व्यक्ति — लड़का था — उसकी आंखों में आंसू आ गए, रोने लगा, फिर बोला कि मुझे क्षमा करें, माफ करें। देखो, यहां तुमने मेरे साथ गलती थोड़ी नहीं की; तुम तुम्हारे साथ गलती कर रहे हो। मेरा क्या?
ये (महाराज जी) मुझे छोड़ के कुछ समय पहले चले गए थे — मेरा क्या ले गए? ये अपना ही बहुत कुछ खो दिए। मुझे क्या कोई कमी थी? तब भी कोई कमी थी क्या? मैं तो जहां भी इनके साथ बैठ जाता था, वहां सारी व्यवस्थाएं चली आती थीं। रात भर आग जलती थी, हम कभी माचिस भी नहीं मारते थे; आलू भून के खा के — हम भोजन भी नहीं करते थे — इनको ज्ञान देते थे। और ये लोग बिस्तर में रहते, हम बिना बिस्तर के। मुझे तो कुछ चाहिए ही नहीं। लेकिन जब ये गए तो हमारी आंखों में आंसू आ गए — अफसोस ये हो गया कि इसकी पूरी प्यास बुझ जाती, क्योंकि मैं इनके साथ पूरी परिक्रमा तक चलता। अगर ये सीखते तो 3600 किलोमीटर मैं इनके साथ पैदल चलता। इनके लिए — मैं कभी किसी को छोड़ता नहीं; मैं ना पकड़ता हूं, ना छोड़ता हूं। रात को इनके लिए जरा ऊंची आवाज में सत्संग कर दिया था — हम कहे, अगर सन्यासी है तो समझ लेगा, क्योंकि मुझे मालूम है भटक रहा है। ये सुबह हमसे खुद मिले। (मैंने) बोला — चलो, मैं साथ चलता हूं, तुम्हारी जरूरत है ना; तुम मेरे पीछे ना आओ, क्योंकि तुम कुछ संकल्प ले के चल रहे हो — तुम्हारा संकल्प भी ना टूटे और तुम्हें ज्ञान भी मिल जाए। तो ये छोड़ के गए तो अफसोस मुझे इस बात का हुआ कि यार, बहुत कुछ खो दिया इसने, ये बहुत कुछ खो के जा रहा है। तो मैं इन्हें क्या माफ करूं? दोबारा भी इन्होंने प्रार्थना की तो मैं दोबारा भी मिला, लेकिन दोबारा भी मेरे साथ नहीं हुए, वहां भी हाथ जोड़ के चले गए। ये खा-पी के बिस्तर में रात गुजारे, और हम एक जंगल में मंदिर में बिना खाए, ठंडी जनवरी का महीना, बिना बिस्तर के आग के सामने।
आज भी (मैंने) बोला कि यार मुझे क्या चाहिए? मैं कभी-कभी सोचता हूं — तू इतना लोगों के लिए परेशान होता है, तुझे चाहिए क्या, फाइनल? तो देखता हूं, फाइनल कुछ नहीं चाहिए — नाम भी नहीं, शोहरत भी नहीं, पैसे भी नहीं। तो सच में, और सब भागते रहते हैं — तू क्यों दौड़ रहा है लोगों के लिए? सोचने पे मजबूर हो जाता हूं कभी-कभी। हमारे साथ रहने वाले को पता भी चल जाता है कि इस व्यक्ति को कुछ नहीं चाहिए। सेवक राम मुझे कई सालों से देख रहे हैं नर्मदा तट पे — लगभग 2021 से तो वीडियो बना रहा हूं। क्या लगता है मुझे कुछ चाहिए? मैं तो अकेले 12 साल ऐसे ही घूमा; ये तो आप लोगों के लिए कुटिया बनाया, नहीं तो मुझे कुटिया की भी जरूरत है ही नहीं। मैं तो ऐसे ही कहीं पड़ा रहता था; ना बिस्तर से मतलब था, ना भोजन से। मिल जाए तो खा लिया, नहीं तो कभी-कभी पानी पी के सो जाता था।
तो जब ऐसे लोग मिलते हैं कि यार, यह जिसलिए निकले थे, इन्हें मिल रहा है और यह छोड़ के जा रहे हैं — तो हमें अफसोस होता है, किसके लिए? इनके लिए। और कहीं ना कहीं इनके कर्मों से ही मिला है। तो मुझे अफसोस ये होता है कि यार, यह क्या छोड़ के जा रहे हैं? जिसके लिए निकला था, वही तो इसको मिल रहा है, और यह उसको लात मार के जा रहा है। यह कितना पछताएगा। मुझे अगर कुछ चाहिए होता तब तो मुझे तुमसे राग-द्वेष होता, तो मैं तुम्हें क्षमा भी करता। मुझे तो अफसोस इसका — क्योंकि एक व्यक्ति के लिए 16 घंटा सत्संग। अभी भी इतना मिल रहा हूं; आने वाले समय में इतना भी नहीं मिल पाओगे, इतनी देर हम नहीं कर पाएंगे — ये बात मुझे मालूम है। तो आज मैं यही कह भी रहा था कि यार, अपने को कुछ नहीं चाहिए और हम इतने परेशान रहते हैं। लेकिन कोई बात नहीं — इस परेशानी से अगर किसी भी जीव आत्मा का कल्याण, एक का भी हो गया, तो मैं समझूंगा कि मैं परेशान नहीं हुआ। बस वही इस शरीर के द्वारा देखना चाह रहा हूं कि कोई एक व्यक्ति भी उपलब्ध हो जाए, बस मेरा काम पूरा हो गया, मेरा अफसोस खत्म हो गया।
मैं इनको पहले भी यही बात बोला था, आज भी यही बोला — भाई, जिसलिए कपड़ा पहना, वो काम कर रहे हो कि नहीं? बस इतनी सी बात है, वो अपने आप से पूछो, मुझे बताने की जरूरत नहीं। मैं कौन हूं? मैं थोड़ी ना इस कपड़े का मालिक हूं। मैं तो सिर्फ आपको एक संकेत दे सकता हूं — मानवता के नाते, हमारी समझ विकसित हो गई, इसलिए बोल रहा हूं। अब आप जैसा करोगे, आपको मिलेगा; मैं जैसा करूंगा, मुझे मिलेगा। मैं तो सिर्फ आपको मार्ग बता सकता हूं — वो भी सन्मार्ग, जिससे आपका कल्याण हो जाए। बाहर का मार्ग बताने वाले तो अनेक लोग हैं, क्योंकि उन्हें आपसे कुछ चाहिए — चाहे आपके माता-पिता हों, चाहे भाई-बंधु हों, सब ने आपको सिखाया। क्या सिखाया? बाहर की चीजें। क्यों? आपको यूज़ करने के लिए। और मैं तो जब भी आप मेरी जिंदगी में मिलोगे, मैं आत्मिक कल्याण के अलावा कोई बात ही नहीं करूंगा। इतने सालों से (सेवक राम) कभी बोल नहीं सकते कि हमने आज तक इनसे — किसी से भी — कभी एक भी मांग की हो। हम भूखे रह लिए, लेकिन हमने कभी हाथ नहीं फैलाया। हम निकले थे तभी कहे कि जिस दिन ये हाथ फैलेगा, उसके पहले मौत देना; वो मेरे स्वाभिमान का होगा। मुझे जहां भी रखना, जिसके सामने रखना, सिर्फ ऐसे रखना कि मैं देना चाहता हूं — चाहे मेरा जीवन हो, चाहे मेरे पास कुछ भी हो, मैं देते जाना चाहता हूं, मैं कभी लेना नहीं चाहता। क्योंकि जिस जीवन को मैं अपना रहा हूं, ऐसे जीवन जीने वाले को लोग महान कहते हैं, तो महान व्यक्ति का काम है देना। ये (महाराज जी) भी आश्रम चलाते हैं, इनके आश्रम में भी मैं कई बार गया; रात-रात हमारी बातें होती थीं, लेकिन कभी हमने कुछ मांग नहीं की, सिर्फ ज्ञान की बातें ही कीं; कभी भी कोई व्यवस्था की मांग नहीं की, जैसा आसन दे दिए वैसा सो गया।
तो मैं देना चाहता हूं, और आप छोड़ के जाते हो तब अफसोस (होता है) — और आपको एक दिन यहीं मुड़ना है। काश, अगर आप जहां जा रहे हो, वहां मिल जाता, तो मुझे अफसोस नहीं होता; यहां से ज्यादा उसको वहां मिला तो मैं तो बड़ा खुश हो जाता — अच्छा हुआ चला गया। लेकिन मैं यह देख पा रहा हूं कि तुम बहुत कुछ छोड़ के जा रहे हो, और कुछ समय बाद इसी के लिए लौटोगे, और वो मिलेगा नहीं। इस समय तो जबरदस्ती दिया जा रहा है। तो मुझे अफसोस इस बात का होता है कि जब व्यक्ति बहुत कुछ खोता है, और बाद में आना उसको वही है, उसी के लिए — और जब वो आया, पता चला कि प्यास लगी थी, बहुत पानी बह रहा था, और सामने वाला पिलाने के लिए तैयार था, और मैं एकदम अहंकार में छोड़ के चला गया; और जब मैं फिर वापस आया तो पानी बहुत दूर जा चुका था, सिर्फ जगह रह गई थी। पानी तो बह रहा है ना, वो आपके लिए थोड़ी रुकेगा, वो आपका इंतजार थोड़ी ना करेगा — अनेक लोग प्यासे हैं। तो यह अफसोस होता है मुझे, बाकी कुछ नहीं। मैं तो अभी भी लोगों से यही कहता हूं कि भाई, जिसके लिए निकले हो — लोग पाखंडी हैं, ढोंगी हैं — वो तुम छोड़ो, तुम ईमानदारी से अपनी यात्रा करो। बस, बात खत्म।
और प्रकृति का एक नियम है। प्रकृति में कौन जीता है? हम लोग प्रकृति में थोड़ी जीते हैं, हम प्रकृति के विरोध में जीते हैं। हमारे अलावा जितनों का जीवन है, सबका प्राकृतिक जीवन है; हमारे द्वारा कुछ भी होता है तो प्रकृति को नुकसान ही होता है। तो जैसे मादा गर्भधारण करने के लिए तैयार रहती है तो अनेक नर आ जाते हैं — आप भगाओ तो भी नहीं जाएंगे। लेकिन अगर तैयार नहीं है तो अनेक नर लाओ, वो सूंघ-सांघ के, जायजा लेंगे कि मादा तैयार है कि नहीं, और तैयार नहीं है तो चले जाएंगे। तो नर मतलब गुरु — गुरु हमेशा तैयार है। एक नर एक ही दिन में कई मादा को गर्भधारण करवा देता है, लेकिन जैसे ही गर्भ धारण हुआ, दूसरा नर उसे नहीं पूछेगा, हट जाएगा। मतलब गुरु इस सृष्टि में हमेशा तैयार है — तुम बस अपनी तैयारी कर लो। अगर शिष्यपन का भाव पूरी तरह आ गया तो गुरु आपके सामने (है)। यह जितने लोग कहते हैं ना कि यह पाखंड है — यह एक नंबर के पाखंडी खुद हैं; इनको यात्रा नहीं करना है, बस एक मौका मिल जाता है।
प्रकृति का एक सिस्टम है कि जैसे आप हो, वैसे लोग आपको मिल जाएंगे। आप राजा हो तो राजा का साथ मिल जाएगा; गरीब हो तो गरीब का साथ; शिक्षक हो तो शिक्षक के साथ आपका उठना-बैठना। यह दुनिया आप ये मत समझो जैसी दिख रही है — जैसे आप हो, वैसी दुनिया है; जैसी संगत, वैसी रंगत। जानवरों में देखो — हिरण हिरण के झुंड में, शेर शेर के झुंड में, हाथी हाथी के झुंड में, कुत्ते कुत्ते के झुंड में। वैसे ही आपका जैसा चरित्र है, जैसा आचरण है, वैसा झुंड आपका है, आप उसमें शामिल हो। आप अगर परेशान हो तो आपके जितने लोग हैं, सब परेशान हैं। इस रहस्य को समझो। तो अगर आप शिष्य हो तो गुरु उपलब्ध है — सीधी सी बात है; गुरु पहले से मौजूद है। ये लोग शिकायत करते हैं ना कि पाखंड है — ये खुद एक नंबर के धूर्त और लालची होते हैं, इनको यात्रा-वात्रा नहीं करना है, इन्हें सिर्फ मजा लेना है। और जिसको यात्रा करनी है — जैसे जिस बच्चे को पढ़ना है, कुछ बनना है, वह फालतू काम थोड़ी करता है; सिर्फ स्कूल से घर और पढ़ता रहता है। वो आकर थोड़ी कहेगा — मम्मी ये नहीं पढ़ता, वो नहीं पढ़ता, इसने ये बोला। अगर किसी के अंदर शिष्यपन का भाव है, तो उसके मुंह से अपने आत्मिक कल्याण की ही बात निकलेगी; ये निकलेगी ही नहीं कि पाखंड है। उससे क्या मतलब? पाखंड क्या पहले से नहीं है, नया है क्या? और पाखंड का जिम्मेदार कौन — समाज। आपके लालच की वजह से पाखंडी पैदा होते हैं; कोई आसमान से गिरता है क्या? मां के गर्भ से ही जन्म लेते हैं। वो आपसे ज्यादा लालची था, इसलिए वो कुर्सी पर बैठ के लूटने लगा; तुम कम थे, इसलिए लुटवाने जा रहे हो। तो किसी को जिम्मेदार मत ठहराओ। मैं जहां हूं, वहां मैं अपने कर्म से हूं, इसकी जिम्मेदारी पूरी मेरी है, और मुझे आगे जहां जाना है, उसके लिए मुझे काम करना है। यह कर्म भूमि है, यहां फ्री में कुछ मिलता नहीं है।
अगर मादा तैयार ना हो और जबरदस्ती गर्भधारण करवाओ, तो क्या गर्भधारण हो जाएगा? नहीं होगा ना। लेकिन तैयार है तो हो जाएगा। अगर आप तैयार हो तो आपका आत्मिक कल्याण पक्का है; और आप तैयार नहीं हो तो हजारों गुरु आकर क्या उखाड़ लेंगे आपका? कुछ नहीं हो जाएगा। मादा तैयार नहीं है तो हजारों नर ला के खड़ा कर दो, क्या कर लेंगे? सब नर को उठा के पटक देगी, लेकिन गर्भधारण नहीं होगा। तो शिष्यपन का भाव लाओ। जैसे आपको कहीं नहीं मिल रहा था, तो जब आखिरी में आप उतावले हो गए, व्याकुल हो गए, या फैसला ले लिया कि अब तो जंगल भाग जाऊंगा, तो आपको मिल गया। क्यों? क्योंकि प्रबल जिज्ञासा हो गई, और आपको आपकी रुचि का मिला, आपकी भाषा का मिला। बात ये है कि मैं जा रहा हूं, मुझे (कोई) पता बता रहा है, सही भी बता रहा है, लेकिन मेरी भाषा में नहीं बता रहा — मुझे उस भाषा का ज्ञान नहीं है, तो मैं उसका मुंह ही देखूंगा, उससे मेरा कल्याण नहीं होगा। आपकी भाषा वाला आपको मिलना चाहिए। तो जिस दिन आप तैयार हो जाओगे, उसके बाद गुरु मिल जाएगा और आपका कल्याण भी पक्का — पहले तैयार तो हो जाओ। एक बेईमान को सब पाखंडी ही दिखते हैं; और जिसको यात्रा करनी है, वो इन फालतू चीजों में नहीं उलझता, वो अपने लक्ष्य पे काम करेगा। तो अपने लक्ष्य पे काम करो, जिसके लिए निकले हो।
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वीडियो: 25 जनवरी 2026 रविवार प्रश्नोत्तरी#योगी · 2026-01-25