आध्यात्मिक प्रत्यक्ष ज्ञान · ऐप में खोलें

प्रश्नोत्तर P4-0060 · भाग 4

(कुटिया में साधक) गुरु जी, अपने आप में ओंकार का नाद (ओंकार-सतनाम की ध्वनि) — यह कब (सुनाई देती है)? क्या ओंकार की ध्वनि आत्मज्ञान के पहले सुनाई देती है या आत्मज्ञान के बाद? वह तो खुद-ब-खुद बजता है, उसे अनाहत कहते हैं।

भाई, हमें इसके बारे में कोई नॉलेज नहीं; हम पढ़े नहीं। आप पढ़े हो, सही है; लेकिन अगर मुझे नहीं पता है, तो मैं कैसे बता दूं? और मुझे (यह) लेना भी नहीं है। और अगर आपको इसके बारे में जानकारी चाहिए, तो अनहद नाद खोलने वाले, खुलवाने वाले बहुत लोग हैं — आप वहां जाइए। मैं तो आपसे एक ही बात कहना चाहता हूं — इस बात को बहुत ईमानदारी से समझो। पहले तो आप खुद ईमानदार बनो। इस दुनिया में जीने के लिए दो रास्ते हैं — एक बेईमानी-दुष्कर्म, एक ईमानदारी-सत्कर्म; सीधी सी (बात)। तीसरा कोई रास्ता है? नहीं। बेईमानी-दुष्कर्म करके हम फंस गए; ईमानदारी-सत्कर्म करके हम निकल जाएंगे — बस, एकदम आसान। तीसरी बात करने की कोई आवश्यकता ही नहीं है; तीसरी बात करना मतलब समय को बर्बाद करना। अगर मेरे चक्र — चाहे सात चक्र हों, चाहे 7 लाख चक्र हों — तो क्यों बंद हुए हैं? बेईमानी-दुष्कर्म करके। सीधी सी बात समझ में भी आती है। तो ताला जिस चाबी से बंद हुआ है, उसी चाबी से खुलेगा — बस ऐसे करके घुमाना है; और (चाबी) उसी छेद में जाएगी। सोचोगे कि किसी और छेद में घुमा के कर दूं, तो नहीं होगा। तो भैया, बेईमानी-दुष्कर्म करने से हम एकदम नीचे आ गए हैं; अब हम ईमानदारी-सत्कर्म अगर करेंगे, तो हम धीरे-धीरे उठकर यहां पर आ जाएंगे, बात ही खत्म हो जाएगी। और अगर आपने यह नहीं अपनाया, तो (ताला) खुल ही नहीं सकता। तो मेरा कहना एक ही बात है भैया — यह सब के चक्कर में ना पड़ के, अगर निकलना है, तो एकदम सीधा-सरल रास्ता है, अपना लो; और बिना ये अपनाए कल्याण नहीं है। ये प्रत्यक्ष ज्ञान में जो बताया जा रहा है, ये सबमें मिल जाएगा, (लेकिन) इसमें कोई नहीं मिलेगा — याद रखना। आप जिस मार्ग से चल रहे हो, ये सबमें सहायक है, लेकिन इसमें आप कुछ मिक्स नहीं कर सकते। इसको पकड़ लिया, तो बातें खत्म हुईं। अगर आप कुछ पकड़े हो, और इसको अपना लिया, तो वो आपको उठाने में सहायक हो जाएगा; और नहीं तो आप गिर तो रहे हो। यह मूल है — प्रत्यक्ष ज्ञान, ईमानदारी, सत्कर्म — और यह सबमें मिल जाएगा, इसमें कोई नहीं मिलेगा। अगर आपने यह पकड़ लिया, तो कुछ करने की जरूरत नहीं है; लेकिन कुछ कर रहे हो और इसको पकड़ लिया, तो कुछ भी सहायक बन जाएगा, और धीरे-धीरे वो छूट जाएगा। तो आप प्रत्यक्ष ज्ञान को समझो, और अगर निकलना है तो निकल जाओ। अगर सिद्धि के चक्कर में (चक्र) ऐसे ही खोलना है, तो खुलवाते रहो। (ओंकार की ध्वनि आत्मज्ञान के पहले या बाद —) किताब में (लिखा है)? आप उस किताब के राइटर हो? जिसने भी लिखा, उससे मिलना पड़ेगा। और मेरे जीवन में तो इसका कोई मतलब ही नहीं है, क्योंकि अगर मुझे कोई धुन भी (सुनाई दे रही) है, तो वो मुझसे अलग है। अगर वो धुन कहीं से आ रही है, तो वो जहां से आ रही है, वो बदल जाएगा; वो धुन भी बदल जाएगी — धुन सुनने वाला, धुन, और जहां से आ रही है, सब बदल जाएगा। तो मुझे धुन से क्या मतलब? क्योंकि अगर मैं धुन सुन रहा हूं, तो धुन सुनने वाला और धुन अलग हैं ना, और जहां से धुन आ रही है, वो भी (अलग है)। इसीलिए कहा गया है — शब्द; धुन तो शब्दों में ही है ना — शब्द, दृश्य, गंध, रस, स्पर्श। क्योंकि अगर आप धुन में भी पड़े हो, तो कहीं ना कहीं रूप है। क्या बिना रूप के धुन पैदा हो सकती है? धुन कब पैदा होती है? जब कोई चीज टकराती है; और कोई चीज बिना रूप के टकराएगी ही नहीं। (वह खुद-ब-खुद बजता है, अनाहत —) मैं आपसे वही कह रहा हूं — इस बात को बहुत गहराई से समझिए। (आप) उसको अनहद का नाम दे दो, कुछ भी नाम दे दो; लेकिन अगर धुन आ रही है, तो कुछ दो चीजें टकरा रही हैं, और दो चीजें टकरा रही हैं, तो रूप में ही टकराएंगी; बिना रूप के टकरा ही नहीं सकतीं। तो अगर मैं धुन में फंसा हूं, मतलब उस रूप में फंसा हूं; और जिस रूप से धुन आ रही है, उस रूप में बदलाव आएगा, तो वैसे धुन में बदलाव आएगा। और अगर मैं धुन का आदी हो गया, और जैसे ही धुन में बदलाव आया, तो मैं तो पागल हो जाऊंगा उस धुन के लिए — एकदम मैं आश्रित हो गया ना उस पे। इसलिए धुन के चक्कर में मत पड़ो।

सत्संग वीडियो देखेंऐप में खोलें

वीडियो: रविवार प्रश्नोत्तरी 1 मार्च 2026 #योगी · 2026-03-01