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प्रश्नोत्तर P4-0061 · भाग 4

(कुटिया में साधक) आज का युवा — जो यूपीएससी या कोई बड़ी तैयारी कर रहा है, या कॉर्पोरेट में जॉब कर रहा है — उसमें एक ट्रेंड देख रहा हूं कि अपने कर्तव्यों को छोड़कर कहीं एकांत में, या किसी की शरण में भाग जाता है; और जानने-समझने के बाद भी वापस नहीं आता। अगर किसान खेती छोड़ दे, सब ऐसे अकर्मण्य हो जाएं, तो व्यवस्था कैसे चलेगी? वे भटक रहे हैं; आप उन्हें कुछ मार्गदर्शन देंगे?

देखो, जिसको जहां कुछ मिल रहा है, वहां जा रहा है। (आपको) लगता है भटक रहा है। तो मैं यह कह रहा हूं कि अगर उसको भोजन की जरूरत होगी, तो खुद पैदा कर लेगा, अगर कहीं से नहीं मिलेगा। वो भटक नहीं रहा है, कुछ खोज रहा है। हर व्यक्ति कुछ पाने में ही घूम रहा है, और ज्यादा पाने में ही वो जा रहा है। आप जहां हो, वहां से देख पा रहे हो (कि) यार, ये ज्यादा था, वो कम में घूम रहा है। ना ना — उसे वो ज्यादा लगा है, इसे ये कम लगा है, तभी वो गया। (फैमिली को छोड़कर गया और) वापस नहीं आ रहा, क्योंकि फैमिली से ज्यादा कुछ मिल गया। देखो, मैं वही कह रहा हूं — व्यवस्था को चलाने वाला कौन है? वो जाने। मुझे तो निकलना है ना। मैं इस दुनिया का व्यवस्थापक थोड़ी ना हूं; यह तो व्यवस्था करने वाला जाने। मैं तो अपने जीवन के उद्देश्य पर काम करूंगा ना; मुझे जहां ज्यादा मिलेगा, मैं तो वहां जाऊंगा। भाई, उसको अपनी पीढ़ी नहीं चलानी है, तुमको चलानी है — तुम सोचो ना। लेकिन तुम अपने लिए उसको क्यों जिम्मेदार ठहराते हो? तुम भी पीढ़ी बढ़ाओ; उसे नहीं बढ़ानी है भाई। आप पीढ़ी बढ़ा के खुश हो, वो पीढ़ी नहीं बढ़ा के खुश है। वो व्यवस्थापक थोड़ी ना है; वो तो जिंदगी में आया है, उसे जहां समझ में आ रहा है, वहां जी रहा है। हमें ऐसा लग रहा है कि वो भटक रहा है; ना ना, वो भटक नहीं रहा है, वो कुछ ना कुछ समझ रहा है; और यहां सब अपनी समझ से ही समझेंगे। तो आप परिवार में रहकर खुश, वो परिवार छोड़ के खुश। जीव वहीं जाता है जहां उसके मन का मिलता है — याद रखना। आपके पहले क्या यह दुनिया नहीं चल रही थी? (अकर्मण्यता —) वो अपनी जरूरत में जी रहा है, उससे आपकी व्यवस्था कहां बिगड़ रही है? कैसे नहीं चल पाएगी? अपने जीने के लिए तो करेगा। और अपने जीने के लिए नहीं करेगा, तो व्यवस्था लेके ही क्या करेगा? जब सब ऐसे ही हो जाएंगे, और व्यवस्था किसी को नहीं चाहिए, तो व्यवस्था बिगड़ी कहां? व्यवस्था तो तब बिगड़ती जब मुझे चाहिए और व्यवस्था ना मिले। और जब सब ऐसे ही हो गए कि मुझे कुछ नहीं चाहिए, तो व्यवस्था की जरूरत कहां है? नहीं चाहिए को अगर हम मानसिक रूप से नहीं समझ पाते हैं, तब अकर्मण्यता है; अगर नहीं समझे, तो बात अलग है। मुझे देखना है कि मैं कहां हूं, मुझे यह नोट करना है कि मैं कहां हूं। हर व्यक्ति अपनी जरूरत की पूर्ति के लिए काम (करता है)। पहले वह ज्यादा करता था, ज्यादा भोग करता था; अब वो जरूरत में ही जी रहा है, तो जरूरत से ज्यादा काम क्यों करे? आप सोच रहे हो कि वो जरूरत में जिए, लेकिन काम पहले जैसा करे — क्यों करे भाई? क्योंकि उसने अपनी जरूरतें एकदम दायरे में कर लीं, अपने आप को सिकोड़ लिया, अपनी जरूरत में जी रहा है; बहुत फैला लिया था। वो जरूरत में जीने लगा, तो ज्यादा काम क्यों करेगा? वो तो चिंतन करेगा ना अपने आप को निकालने के लिए। और यहां हर व्यक्ति — आप देख लो — अपनी जरूरत के लिए काम कर ही लेता है; कोई शरीर से करता है, कोई बातों से करता है; कोई शरीर से मेहनत करके अपनी भोजन-व्यवस्था, कपड़े, रहने की व्यवस्था कर लेता है, कोई सेवा करके कर लेता है; लेकिन अपनी जरूरत के लिए करता है। वह किसी के लिए करे या ना करे, अपने लिए तो करेगा ही करेगा। व्यवस्था कभी नहीं बिगड़ती। गड़बड़ इस बात की है कि आप तुलना में हो। व्यवस्था कभी बिगड़ ही नहीं सकती भाई; लेकिन आप ज्यादा के चक्कर में हो। वो कह रहा है कि जितनी हमारी जरूरत है, हम उसमें रहेंगे; और तुम कह रहे हो कि नहीं, बगल वाले के मकान से बड़ा मकान बनाओ — गड़बड़ी यहां इस बात की है। व्यवस्थाएं कभी नहीं बिगड़तीं, क्योंकि हर जीव — चाहे वो चींटी ही क्यों ना हो — अपना भोजन ढूंढ लेता है। यहां हर जीव अपने लिए तो काम कर ही रहा है — हम तुम्हारे लिए नहीं काम करेंगे, तुम जानो; लेकिन मैं दुनिया में कहीं भी रहूंगा, मुझे अपने लिए तो काम करना ही पड़ेगा ना। तो व्यवस्थाएं कभी नहीं बिगड़ सकतीं। (जंगल चला गया, पर जरूरी नहीं उसे आत्मज्ञान हो जाए —) वह जाने ना। आपने कहा कि वो जंगल चला गया — क्या जंगल जाने से आत्मज्ञान हो जाएगा? तो क्या जंगल नहीं जाता तो हो जाता? क्या यहां रहने से आ जाता? वहां भी आ सकता है, यहां भी आ सकता है, क्योंकि आत्मज्ञान समझ की बात है। मेरी समझ कहां विकसित होगी, ये मैं तय करूंगा, ये तुम नहीं तय करोगे; आप तय करोगे तो मेरी समझ विकसित नहीं हो सकती। यह मैं तय करूंगा कि मेरी समझ घर में विकसित होगी या जंगल में। अगर सामने वाले ने तय कर लिया कि मेरी समझ जंगल में विकसित होगी, तो घर में कभी विकसित होगी नहीं, क्योंकि विकसित होने के लिए वो (घर में) काम ही नहीं करेगा; और उसकी समझ जंगल में विकसित हो जाएगी, क्योंकि उसने तय कर लिया है। पहले तो धारणा बना ली है कि मेरी समझ जंगल में ही विकसित होगी, यहां होगी ही नहीं; अब उसने पक्का कर लिया है, तो (यहां) उस समझ को बढ़ाने के लिए कोई काम ही नहीं करेगा। तो जिसकी समझ जहां विकसित हो रही है, वो वहां जा रहा है। आप किसी को पकड़ो मत; उसको जाने भी देना चाहिए, और जाने ही देना चाहिए। और जिसको जहां पहुंचना होता है, वो पहुंच जाता है। यह प्रकृति कल्पवृक्ष की तरह है — आपको जो चाहिए, उसके लिए आप काम करते हो; और आप आज जहां हो, अपने काम से ही हो, और आगे भी आप जहां भी जाएंगे (अपने काम से ही जाएंगे)। क्योंकि अगर देखा जाए, दो-चार साल पहले आप कहीं और थे, तो क्यों थे? आपको वो चाहिए था। अब वहां से क्यों हटे? क्योंकि आपको और कुछ चाहिए। पहले वो सही लग रहा था, तो उसके लिए खूब प्रयास किया, खूब मेहनत की; लेकिन अब लगा कि नहीं, इसमें कुछ नहीं है, तो जिसमें है, आप उसकी ओर चलिए। तो यहां पे हर जीव अपनी जरूरत में घूम रहा है। किसी ने बस अपनी जरूरत शरीर तक देखी, किसी ने अपनी जरूरत मान तक देखी — मान, सम्मान, नाम, शोहरत, पैसा — वो भी एक जरूरत है। आपके हिसाब से कोई काम का नहीं है, लेकिन ये आपके हिसाब से है ना। कुत्ता हड्डी चूस रहा है, तो आपको लग रहा है कि यार, इसके ही मुंह से खून आ रहा है; लेकिन उसे बड़ा मजा आ रहा है। उसकी जरूरत है, तभी तो चूस रहा है, और उसे खून भी मिल रहा है। यह तो तुम्हें लग रहा है कि उसे कुछ नहीं मिल रहा है; लेकिन उसे बहुत कुछ मिल रहा है; अगर बहुत कुछ नहीं मिलता, तो चूसता ही नहीं। अज्ञान तुम्हें लग रहा है; उसे तो मिठास लग रही है; उसका ही खून सही, खून तो उसे मिल रहा है। समझना इस बात को — उसने हड्डी चूसने की शुरुआत कहां से की? खून के लिए की ना, क्योंकि कभी ना कभी उसने वो टेस्ट लिया है, उस हड्डी से कभी ना कभी खून निकला है; तो अभी भी तो निकल रहा है। वैसे हर व्यक्ति को हर चीज मिल रही है; अगर नहीं मिलता, तो पकड़ता नहीं। आप चींटी को पकड़ो — नमक भी सफेद, शक्कर भी सफेद; एक जगह नमक रख दो, एक जगह शक्कर रख दो, और आप (चींटी को) नमक पे डालो, तो रुकेगी क्या? क्योंकि उसमें उसे कुछ मिल नहीं रहा है; और शक्कर से भगाओ, तो भी नहीं जाएगी। यहां हर जीव अगर कुछ पकड़ रहा है, तो इसका मतलब उसे कुछ मिल रहा है; और वो तब तक पकड़े रहेगा जब तक मिलता रहेगा; ऐसे नहीं छोड़ने वाला है। वो तब छोड़ेगा जब उसको समझ में आ जाएगा — या तो (कहीं) इससे ज्यादा है, तब छोड़ देगा; या तो समझ में आ जाएगा कि इससे कुछ नहीं मिल रहा है, तब (जहां) मिलेगा उसके लिए छोड़ देगा। ऐसे नहीं छोड़ने वाला है; ऐसे छुड़ाओगे, तो चोरी से करेगा — तुम्हारे सामने नहीं करेगा, तो आड़ में करेगा। बात उसे समझ में आनी चाहिए; आपके समझाने से वो नहीं छोड़ेगा। उसकी जिंदगी उसकी समझ से है, और अपनी-अपनी समझ से जीव जहां है, वहां है, और उसे कुछ ना कुछ मिल रहा है। तो व्यवस्थाएं कभी बिगड़ नहीं सकतीं, क्योंकि हर जीव किसी के लिए करे या ना करे, अपने लिए तो करेगा। यहां पे सब अपने-अपने जीने के लिए काम कर रहे हैं; जितनी जरूरत है, उतना काम कर ही (रहे हैं)। कोई शरीर से मेहनत करके अपना खा-पी रहा है, कोई दिमाग से मेहनत करके खा-पी रहा है, कोई अपने पूर्वजों का ही खा रहा है, कोई मेहनत ही नहीं कर रहा है — ऐसे लोग बहुत मिलेंगे आपको; वो कहते हैं, हमको करने की क्या जरूरत है? उसने सही-गलत अपने आप में मान रखा है; उसे मिल रहा है, ऐसे ही नहीं पकड़ा है। गड़बड़ ये है कि आपको लग रहा है कि उसे कुछ नहीं मिल रहा है, ये क्या कर रहा है; (उसे) मिल रहा है, तभी कर रहा है। और यहां व्यवस्थाएं कभी बिगड़ नहीं सकतीं, क्योंकि सबको अपने-अपने लिए तो करना ही पड़ेगा; वो चाहे जंगल भी जाए, तो खाने के लिए तो वो वही मेहनत कर रहा है ना जो तुम कर रहे हो। और अगर वो जंगल में भी है, और उस जंगल में अगर आप उसे कुछ देने जा रहे हो, तो आपको उससे कुछ मिल रहा है, ऐसे थोड़ी देने जा रहे हो। वही कह रहा हूं कि यहां पे हम एक-दूसरे के पूरक हैं, और हम अपने लिए काम कर लेते हैं; बस काम करने का तरीका अपना-अपना है — कोई शरीर के द्वारा कर रहा है, कोई मानसिक कर रहा है, तो कोई बस ऐसे ही बैठ के कर रहा है; लेकिन कर रहा है। तो अगर कोई जंगल जा रहा है, तो जाने देना।

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वीडियो: रविवार प्रश्नोत्तरी 1 मार्च 2026 #योगी · 2026-03-01