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प्रश्नोत्तर P4-0198 · भाग 4

(वही साधिका) एक आखिरी सवाल — गुरु की जरूरत कब तक पड़ेगी? आपके भी तो कोई गुरु रहे होंगे? और गुरु और सद्गुरु में क्या अंतर है — वीडियो में भी समझ नहीं आया।

जब तक पहुंच नहीं जाते। मेरी तो बात ही खत्म हो गई। मेरे गुरु ने ही मुझे जवाब दे दिया कि जो तुझे चाहिए, मैं नहीं दे सकता, जा सद्गुरु ढूंढ। सद्गुरु मतलब जो उस परम स्थिति पे हो, और तुझे पहुंचा दे। (ऐसे मिले क्या?) मैं वो क्लियर कर देता हूं — पहले मुझे भी क्लियर नहीं था, तो सद्गुरु की परिभाषा (खोजने) मैं निकल गया, कि मैं तो ढूंढ लूंगा। गुरु ज्ञान का प्रतीक है। गुरु (के) शब्दों को लेके आप सत् — सत्य तक पहुंच जाते हो; तो फिर गुरु वहां छूट जाता है। आप सत् (में पहुंचे), और फिर आप किसी के लिए बोलते हो, तो (हो) गए सत् और गुरु। आप इसे और गहराई से समझ लीजिए — जब वो पहुंचने के बाद बोलेगा, तो सत् वो स्वयं के लिए है, (और जो) बोला, तो (वही) गुरु है। गुरु के द्वारा पहुंचे, गुरु वहां छूटा, आप पहुंच गए; फिर आप बोले, तो गुरु निकला आपके मुखारविंद से; फिर कोई उसको लेके निकलेगा, फिर उसे सद्गुरु मिलेगा। (फिर गुरु को छोड़ देना चाहिए क्या?) अरे, छूट जाएगा! छत पे चढ़ जाओगे, सीढ़ी छूट जाएगी, छोड़नी नहीं पड़ेगी; पेट भर जाएगा, थाली छूट जाएगी, छोड़नी नहीं पड़ेगी। छोड़ना पड़ रहा है, इसका मतलब पहुंचे नहीं। (साधिका ने अपनी समझ दोहराई — गुरु मतलब ज्ञान, कोई इंडिविजुअल आइडेंटिटी नहीं; उस ज्ञान से मूल तक पहुंची, तो मेरे भीतर से जो निकलेगा वो सत्, और दूसरों के लिए वो गुरु —) सत्य तो अंदर ही है, सत्य दिखता नहीं। जिस गुरु के द्वारा आप पहुंचे, वो गुरु छूट गया। (गुरु तो ज्ञान ही था —) तो वो ज्ञान छूट गया ना; अब आपका ज्ञान प्रकट हुआ, आपके ज्ञान का जन्म हुआ — आपके लिए जन्म ही है, ये पहले नहीं था। अब आत्म-ज्ञान हो गया, तो वो छूट गया। (जो मेरे से नया निकलेगा, मेरी अपनी किताब —) वो नया ही होगा — ये एक बात ध्यान रखना — इतिहास में ऐसा नहीं होगा। जैसे एक बच्चे का जन्म होता है, (तो) इतिहास में (कोई उससे) मैच नहीं होता — उसका अंगूठा मैच नहीं होता, कितना भी जुड़वा हो, कैसे भी रहे। तो हमेशा, जब आपका सद्गुरु से मिलना होगा, तो नया ज्ञान होगा; वो फिर पीछे इतिहास में वैसा नहीं होगा। वो जब बोलेगा, तो अपने तरीके से (बोलेगा) — शब्द घुमा-फिरा के वही रहेंगे। जैसे पांच तत्व हर सब में वही हैं, लेकिन रूप अलग-अलग। तो जब भी ज्ञान मिलेगा, तो नया होगा। (ज्ञान तो एक जैसा ही होगा —) मैं वही कह रहा हूं, फिर से समझिए — शब्द वैसे होंगे, बताने का तरीका वैसा नहीं होगा, नया तरीका होगा। जैसे पांच तत्व वही हैं, जब भी किसी बच्चे का जन्म होता है, लेकिन रूप हमेशा अलग होता है। (वो अपने बताने का ढंग चेंज कर देगा?) करेगा नहीं — वो हो ही जाएगा। उसका रहना, उठना, बैठना किसी से मैच ही नहीं खाएगा। और (अगर) मैच खाया, तो फिर वो पहुंचा नहीं है, बनावटी है — (उसने) किसी की नकल की है। वो नया ही होगा, एक अनोखा होगा — उसका उठना-बैठना, कपड़े का पहनावा, उसका रहने का ढंग, बोलने का ढंग, सब अलग होगा। अगर किसी से मैच खा रहा है, तो समझ लेना वो नकल है, बनावटी है, वो अभी पहुंचा नहीं। सत्य तो एक ही है, लेकिन व्यक्त करने का तरीका अलग-अलग होगा। समझने वाले भी अलग-अलग होते हैं — आप जो मेरे सामने बैठे हो, सब अलग-अलग तरीके से समझ रहे हो; हो सकता है कोई समझ भी ना रहा हो। लेकिन मुझे उससे मतलब नहीं है कि कौन समझ रहा है, कौन नहीं समझ रहा। अगर नहीं समझ रहे हो, तो पूछो — आपकी जिम्मेदारी बनती है। मेरा काम है बोलना। अगर आपको नहीं समझ में आया, तो आप पूछो, मैं आपको अलग तरीके से बताऊंगा। नहीं पूछे, तो आपकी जिम्मेदारी है। मैं ये नहीं पूछूंगा कि आपके समझ में आया या नहीं आया, क्योंकि इतना मेरे पास समय नहीं है। मेरे पास तरीकों की कमी नहीं है। और अगर आपने नहीं बोला, तो ठीक है, (मान लूंगा) समझ में आ गया।

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वीडियो: अगर भक्त न हो तो भगवान का क्या होगा ? क्या भगवान भक्त पर निर्भर हैं ? #bhakt #bhagvan · 2025-07-17