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प्रश्नोत्तर P4-0132 · भाग 4

(कुटिया में साधक, पेंशनर) मैं जहां रहता था वहां धन से सेवा करता था — खाने-पीने के अलावा बाकी पैसे मैं रखता नहीं था, सेवा-सत्संग में लगा देता था। परिवार से विवाद हुआ तो निकल गया, आठ महीने बागेश्वर में रहा, वहीं आपका वीडियो मिला और तुरंत सब समझ में आ गया। अब यहां आ गया तो मेरा पैसा किसी काम में नहीं आ रहा; परिवार वाले उसे खा जाएंगे। मैं चाहता हूं कि वह पैसा यहां सेवा में लगा दूं — किसको, कैसे दूं?

पहले रहो आराम से। (वो सब) अभी रखे रहो। अभी जिसके लिए आए हो, वो करो। आपको जो चाबी मिल गई है, आप उसी में रख दो। आप जिसके लिए आए हो, पहले उसमें लगो, उसमें पूरी तरह अपने आप को घिसो। चाहे वहां का पैसा हो, चाहे यहां का — तुम निकल लोगे तो ताला तोड़ के हम ले लेंगे, यहीं लगा देंगे, कोई छोड़ेगा नहीं। आप इसकी चिंता ना करना। ना यहां का पैसा बचेगा, ना वहां का — वहां के वो लोग लूट लेंगे, और यहां अगर तुम निकल गए तो हम ताला तुड़वा ही देंगे। तो आप अपनी चिंता करो। अरे, आप इसमें से निकल गए तो इस शरीर का भी प्रकृति उपयोग कर लेगी; यहां कुछ बचने वाला नहीं है। मेरा तो बस इतना कहना है कि आप अपनी चिंता कर लो। यह बहुत अच्छी बात है आपकी कि भाई, यहां कार्य हो रहा है, मैं भी इस कार्य में सहयोग देना चाहता हूं — बहुत अच्छा है, इसी को सत्कर्म कहते हैं, क्योंकि आप भी समझ के बोल रहे हो। तो आप पहले अपने आप में लगो। (पैसा तो) रखा रहेगा — कभी भी, 100 साल बाद भी उपयोग हो जाएगा। अगर वो नोट चलती होगी तो ठीक है, और कैंसिल हो गई तो सरकार उपयोग कर लेगी, उसी के नंबर का नोट बना देगी। कोई ना कोई कर लेगा। यहां हर चीज का कोई ना कोई उपयोग कर लेगा। तुम तो बस अपनी चिंता करो। मेरा यही कहना है कि आप बस अपने बारे में लग जाओ और अपना कल्याण करो, फिर लगा देना — यही सेवा हो रही है।

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वीडियो: 25 जनवरी 2026 रविवार प्रश्नोत्तरी#योगी · 2026-01-25