प्रश्नोत्तर P4-0133 · भाग 4
(वही साधक) गुरुदेव, एक श्लोक में कहा गया है — 'कोटि नाम संसार में, ताते मुक्ति न होय; आदि नाम जो गुप्त जपे, बूझे बिरला कोय।' इसका मतलब — वो आदि नाम क्या है?
बस वही सच — वही है। उसी को गुप्त रूप में बताया गया है, गुप्त है वो। (आदि नाम —) वो सत्कर्म है। आपको थोड़ी पता रहता है कि आप सत्कर्म करने वाले हो। जब कोई गिर गया, आप उठाते हो — तो क्या आपको पता था कि ये गिरेगा और मैं उठाऊंगा? सेवा आप कह सकते हो। सत्कर्म का मौका प्रकृति देती है — यही गुप्त है। सत्कर्म का मौका प्रकृति देती है।
आप चाह के (सत्कर्म) नहीं कर सकते। आप रास्ते में जा रहे हो, कोई गिर गया, आपने उठाया — यह सत्कर्म है, यही गुप्त है; और इसको अगर कोई समझ लिया तो निकल गया। (साधक ने कहा कि कथावाचक ये दो शब्द — ईमानदारी और सत्कर्म — खोल के नहीं बताते —) कोई बात नहीं, अब तो मिल गया ना, अब पकड़ लो। ये सत्कर्म को पकड़ लो। गुप्त रहस्य ही है सत्कर्म — यह आपको भी पता नहीं चलता कि आपको मौका मिला। (भिखारी को देना सत्कर्म नहीं —) जो जरूरत में आ जाए; ऐसे भी नहीं कि अपनी ओर से दे दे, तो वो भी कोई सत्कर्म नहीं हुआ; जहां जरूरत प्राकृतिक हो। अब ऐसा (नहीं कि) किसी को पहले मार दो, घाव लग जाए, और चलो सत्कर्म कर दिया — वो भी गलत है। और दूसरा, भाव भी नहीं होना चाहिए कि उससे फिर कुछ चाहिए। सत्कर्म का मौका प्रकृति देती है, और जब आप सत्कर्म करते हो तो उस समय इच्छा और अपेक्षा दोनों काम नहीं करतीं। और जब आपको सत्कर्म की कोई कीमत दे देता है ना, तो कहते हो — मैं बिकाऊ नहीं हूं। आप ₹200 के लिए दिन भर काम करोगे, लेकिन कोई गिर जाए और आपने उठाया, और वो कहे बेटा कुछ रख लो, तो कहोगे — ना ना, इसका पैसा हम नहीं लेंगे, हम बिकाऊ नहीं हैं। 12 घंटे काम करेंगे (पैसे के लिए) चलेगा, (लेकिन यहां नहीं) — क्योंकि सत्कर्म किए हो। सत्कर्म में इच्छा और अपेक्षा दोनों काम नहीं करतीं, और यही गुप्त रहस्य है। और जिसने सत्कर्म को पकड़ लिया, समझ लो उसने परमात्मा को पकड़ लिया।
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वीडियो: 25 जनवरी 2026 रविवार प्रश्नोत्तरी#योगी · 2026-01-25