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प्रश्नोत्तर P4-0134 · भाग 4

(वही साधक, पेंशनर) मैंने निरंतर नाम जाप भी किया, 18–20 घंटे सीताराम जपता था, फिर भी विचार नहीं बदले। फिर किसी के सत्संग से सांस पर ध्यान करना सीखा — वो कुछ समय के लिए काम करता है, शरीर के विकार भी सुधरते हैं, लेकिन परमानेंट नहीं। और आत्मिक चिंतन में आंख बंद करके क्या करना है?

उसका (सांस पर ध्यान का) प्रभाव सिर्फ शरीर पर पड़ता है। अगर आप सच में अपना कल्याण चाहते हो तो बस ईमानदारी-सत्कर्म अपना लो, बस इसी को पकड़ लो। और नहीं चाहते तो बहुत कुछ है, बहुत लाइनें हैं — कोई काम में आने वाली नहीं हैं। इसे पूरी तरह पकड़ लो। (आंख बंद करके क्या करना है —) हमें ना आंख बंद करना है, ना खोलना है। मुझे सिर्फ अपने कार्य को निपटा कर एकांत में जाना है — (देखना है) कि कोई काम बाकी तो नहीं है। पता चला कहीं आपकी जरूरत है, तो पहले काम को निपटा दो, और फिर उसके बाद चले जाओ, फिर आत्मिक चिंतन ही होगा। जैसे शौचालय में चले गए, तो बैठने के बाद लैट्रिन (के लिए) थोड़ी ना (प्रयास) करना पड़ेगा, वो अपने आप होगा। अब तुम बिस्तर पे ही सोच रहे हो कि लैट्रिन हो जाए, तो वहां प्रयास करना पड़ेगा। अब शौचालय में चले गए और बैठ गए, फिर प्रयास करना पड़ेगा? अपने आप हो जाएगा। एकदम साफ-सुथरी, प्रत्यक्ष बात है। तो आप सारे काम को निपटा के जाके बैठ जाओ, आत्मिक चिंतन ही होगा। समझ के बाद — अब समझ नहीं है तो अबोध बालक कहीं भी सोया है तो भी कर देगा, उसे लैट्रिन-फैट्रिन का कोई लेना-देना नहीं है। और आप में समझ आ गई है, समझ विकसित हो गई है — अच्छे-बुरे का, राग-द्वेष, मोह-आसक्ति, इच्छा-अपेक्षा का ज्ञान हो गया है — तो आपको एक तरीके से जीना पड़ेगा, उस जगह पे जाना पड़ेगा। और आप वहां पे जाके, काम करके बैठ गए, तो आत्मिक चिंतन ही होगा, और कुछ नहीं होगा। तो बस जाके हमें बैठ जाना है, कान में कुछ नहीं करना है। इसमें पढ़ाई-लिखाई से कोई मतलब नहीं है। आपकी जिंदगी आपको पढ़नी है। आपने जितना किया है, उससे निकलना है — इसमें क्या पढ़ाई काम आएगी? अब मैं गया और यहां फंस गया हूं, तो अब मुझे गांठ छुड़ाना भी तो आना चाहिए — इसलिए जीवंत गुरु चाहिए, सत्संग। ज्ञान की तलवार लेके आत्मिक चिंतन करना है। ऐसे भी जाके मत बैठ जाना एकांत में, डिप्रेशन के शिकार हो जाओगे। खा के बैठे हो ना — दो-चार हफ्ता खाते ना, और जाके शौचालय में बैठे तो क्या निकलेगा? दो हफ्ते से भोजन ही नहीं है और टेंशन है कि कुछ निकल ही नहीं रहा — तो जब पेट में कुछ है ही नहीं तो निकलेगा क्या? छोटी-छोटी बात लगती है, लेकिन यही सब मूल बात है। तो कहने का मतलब मेरा ये है कि जब आत्मिक चिंतन में जाना तो सत्संग ले जाना, ज्ञान की तलवार ले जाना — तब अपने आप को छुड़ा पाओगे।

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वीडियो: 25 जनवरी 2026 रविवार प्रश्नोत्तरी#योगी · 2026-01-25