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प्रश्नोत्तर P4-0169 · भाग 4

(वही साधिका, गोयल जी के प्रसंग पर) आपने गोयल जी को तुरंत क्यों कह दिया कि जितना सुना है उससे ज्यादा है? और एक छोटी सी गलती से (गुरु के प्रति) जो भाव निकल गया, वो लौटने में कितना समय लगेगा?

एक जरा सी नासमझी ने 12 साल मेहनत करवाई — गुरु ने तो पहले स्वीकार कर लिया था, (फिर) 'अब गुरु मुझे स्वीकार कर ले बस' — 12 साल लग गए। क्योंकि एक बार वो स्वीकार किया और अस्वीकार किया, तो फिर आप ये ना समझना कि वो (फिर से आसानी से) स्वीकार कर लेगा। ये छोटी गलती नहीं है। गलती भी छोटी-बड़ी नहीं होती है — गलती गलती है, और पूरा गिरा देती है हमें। इसलिए हमने आपके भ्रम को तुरंत तोड़ा। अगर मैं कहूंगा 'जांचो', तब तो इनकी जिंदगी जांचने में लग जाएगी, और ये जांच नहीं पाएंगे, ये मेरे बारे में जांच ही नहीं पाएंगे। तो मैंने इनसे कह दिया कि जितना तुमने सुना है, उससे ज्यादा है, अभी जाओ — इसलिए कि जांचने में समय ना चला जाए। अगर मैं उस पे नहीं बोलता, तब तो जांचने में ही आपकी बुद्धि लगी रहती, आपकी जांचने में ही ताकत लगती, खत्म हो जाती। जांचते-जांचते मिलता तो कुछ नहीं, और आपकी जिंदगी तो चली जाती। और मिलता भी, तो आप क्या करते उसका? जिसको जांचने आए ही हो, वो मिल भी जाता, तो आपको क्या लाभ मिलता? दोनों स्थिति में — चाहे मिलता, चाहे नहीं मिलता — जिंदगी बर्बाद हो जाती। मैं चाहता था कि आपका बचा हुआ समय बर्बाद ना हो। तो मैंने कहा कि यार, उसने तो कम बताया है, उससे ज्यादा है। अब बताओ — तब आपकी जांचने की इच्छा वहीं पे खत्म हो गई। (लेकिन) जितनी गलती है, उसका दंड तो ठोकना पड़ेगा — वो तो मैंने उसी समय खत्म कर दिया। मैं अस्वीकार करता, तो आपकी ताकत पूरी जिंदगी जांचने में लग जाती। आप इसे गहराई से समझिए — जांच तो आप पाते नहीं, लेकिन जांचने में जिंदगी लगती है, क्योंकि जब तक नहीं जानते, जा भी नहीं पाते — (मन कहता है) उसने जो कहा था, वो सही तो होगा, लेकिन पक्का अभी नहीं हुआ। (साधिका ने कहा, खत्म तो हो गया, लेकिन पहले वाला भाव तो नहीं रहा, वो तो भारी नुकसान है —) क्या आपको लगता है कि बुल्ले शाह ने 12 साल तक इंतजार किया, तो वो गुरु इंतजार नहीं किया होगा? क्योंकि उसका प्रेम था। गुरु भी तड़पता है। आप तो कह सकते हो (अपनी बात), गुरु किससे कहे? आप लोगों ने तो मुझसे ही हामी भरवा ली — हम किससे हामी भरवाएं? आपको (अपना) जीवन दिखता है, ये जीवन नहीं दिखता — यही तो गड़बड़ है ना। आप ये मत समझना कि (बुल्ले शाह ने) 12 साल मेहनत किया; कहीं ना कहीं गुरु ने भी 12 साल इंतजार किया, क्योंकि उसने उससे प्रेम किया था, उसकी योग्यता को देख के। लेकिन गुरु किसी से (कह) नहीं सकता, गुरु प्रयास भी नहीं कर सकता, क्योंकि प्रयास से मुक्त हो चुका है — वो सिर्फ इंतजार करता है। छोटी-मोटी गलती नहीं होती है, गोयल जी, जिंदगी में। इसीलिए मैं कहता हूं, 99 पे ये आदमी गिर जाता है। इसलिए मैंने आपसे कहा — हर वक्त सचेत रहो, हर वक्त, हर क्षण। वही मूल तक पहुंच सकता है। एक सेकंड के चौथे भाग में (गिर) चले — सेकंड भी ज्यादा है। एक विचार ऐसा आया, तो उसकी तो कोई मेजरिंग भी नहीं कर सकता। और गिराने वाला कौन? आप खुद कह रहे हो सामने वाला डिप्रेशन में है। देखिए जरा, हम किसके द्वारा गिर रहे हैं — मुझसे भी उसका स्तर नीचे है; हम उसे समझाने गए थे, उसने मुझे ही समझा के गिरा दिया। हम गए थे उसको समझाने कि हमारे समझाने से उसका स्तर उठ जाएगा, उसने मुझे ही लपेट लिया — तो मेरा तो कोई लेवल ही नहीं है। एक मानसिक रुग्णता वाला भी मुझ पर काम कर गया — समझिए इस बात को। जैसे एक बालक दीया लेके जा रहा था, तो (किसी ने) फूंक मारी, बुझ गया; बोले — बेटा, कहां गया? वो बेटे को उलझाना चाहते थे। (बालक) बोला — जहां से आया था, वहीं चला गया। बालक तो चला गया, बोल के, (लेकिन) ये जिंदगी भर उलझ गए — यार, गया कहां, आया कहां से? किसलिए निकले थे, वो हुआ ही नहीं; जिंदगी भर इसी खोज में लगे रहे कि आखिर ये उजाला गया कहां। ज्यादातर यही होता है। और सामने वाले को आप देख रहे थे, हम कितना डांट रहे थे, कितना उसे झकझोर रहे थे। ये छोटी गलती थोड़ी ना होती है — आपको लगती है जरा सी गलती; जिसलिए मैं निकला था, (वो) होने ही वाला था, (और) हम हट गए। (वो भाव लौटने में कितना समय लगेगा —) वो तो तुम्हारे ऊपर अब है, उसके ऊपर थोड़ी ना है; अब तो तुम्हारे ऊपर है, क्योंकि तुमने तोड़ा है ना, अब तुम जोड़ोगे। (अब मैं भागा हूं तो मुझे आना पड़ेगा —) हां, वो तो बैठा है, उसका फिर इंतजार चालू; वो तो इंतजार में ही है भाई। (बल्कि उसकी मेहनत पे पानी फेर दिया —) वो तो फेर दिया। यही तो बात है कि वो जो मेहनत करे, (अगर) तुम उस लायक नहीं होते, तो बात ही नहीं होती। कितने लोग यहां से — हजारों लोग — चले गए, रात को 12 बजे भगा दिया; उनकी चर्चा मैं कभी करता हूं क्या? उस लायक थे ही नहीं, तो उनकी क्या चर्चा करना? चर्चा उसकी होती है, अगर वो कुछ लायक है, उसमें संभावना दिखती है — तब उसकी छोटी-छोटी गलतियों पर ध्यान दिया जाता है। वो छोटी गलती नहीं है, वो आपको (छोटी) लग रही है। और (जो) लायक नहीं है, तो उसकी बड़ी गलती पे भी ध्यान नहीं दिया — जा यार, तू लायक तो है ही नहीं, तेरा तो कुछ हो ही नहीं सकता, जा पहले घूम ले। जिसमें पूरी तरह संभावना दिखती है ना, उसे ही पूरी तरह जांचा जाता है — उसकी जरा सी भी गलती नहीं (चलती), क्योंकि वही छोटी सी गलती उसे रोक देती है। उसे लग रही है छोटी सी है, लेकिन ये छोटी सी गलती तेरी नैया डुबा दी। उसकी 99 (गलतियां) थीं, तेरी एक छोटी सी थी — लेकिन तुम उससे मिल गए। वो जल्दी (डूबेगा), तुम लेट; (पर) एक छोटी सी गलती से आपकी नैया वहीं डूबी, जहां उसकी थी। आप इसे छोटी सी गलती ना समझो — नैया तो उसके साथ ही डूबेगी ना; उसकी आगे, तुम्हारी पीछे, लेकिन दोनों एक ही जगह डूबोगे — पाताल में तो मिल ही लोगे। इसलिए भाई, एक छोटा सा भी छेद ना रहे, छोटी सी भी गलती की संभावना ना रहे। मैं आपसे बोलता हूं ना कि मुझसे गलती हो ही नहीं (सकती) — मैं तो कहता हूं, वो चाहेगा तो भी नहीं हो सकती। क्योंकि अगर वो चाहेगा, तो उसकी गलती — मेरी क्या? मैं नहीं कर सकता। मैं तो अपने आप को इतना कहता हूं कि अगर परम सत्ता चाहेगी, तो भी गलती नहीं होगी। और वो चाहेगा, तो फिर उसकी गलती वो भोगेगा; हमको भटकाने वाला भोगेगा। मैं नहीं भटकूंगा; लेकिन अगर भटका, तो तू भोगेगा। मैं गलती नहीं करूंगा — मैं यह जिम्मेदारी लेता हूं। मैं थोड़ी ना कहूंगा कि तू चाहेगा तो गलती हो जाएगी — कैसे तू चाहेगा यार, करता मैं हूं। जब पूरी स्वतंत्रता दी गई है, तो गलती होगी, नहीं होगी — मेरे बस में है, तेरे बस में नहीं; और मैं पूरी जिम्मेदारी लेता हूं, गलती हो ही नहीं सकती — सीधी सी बात है। फिर अगर आप कह रहे हो कि नहीं, वो (परमात्मा) करवा दिया — तो फिर अधिकार मुझे दिया ही नहीं गया, तो मैं गुलाम हूं, मेरा रिमोट ही किसी और का; फिर तो तू जवाबदार है, और तू भोग फिर — मैं क्यों भोगूं? तो भाई, पूरी जिम्मेदारी लो। अगर आपके द्वारा कुछ हो रहा है, तो जिम्मेदारी (आपकी)। अब तुम कहोगे — नहीं, (मैं) नहीं था, परमात्मा ने चाहा — उसको क्या पड़ी है यार? या तो कर्ता तुम हो, या तो वो — दो में से एक ही है। तुम कभी कहते हो कर्ता मैं हूं, कभी कहते हो वो है — यही तो बेईमानी है; एक तरफ नहीं होते। आप पूरी तरह जिम्मेदारी लो कि मैं अगर यहां पे हूं, मैं जिम्मेदारी लेता हूं, और मैं जहां भी पहुंचूंगा, उसकी जिम्मेदारी मैं लेता हूं — सीधी सी बात है। तब आपका ग्रोथ होगा। इसीलिए मैं कहता हूं, सचेत होकर — नींद में भी सचेत रहो, जागने में तो छोड़ दो। ये भाव रखो कि मुझे नींद में भी सचेत रहना है — जागने की बात छोड़ दो, सोने पे भी मैं सचेत रहूंगा — तब जाके जागने पे सचेत हो सकते हो।

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वीडियो: आखिर मेरा कल्याण कैसे हो ?#योगीजी_का_सत्संग · 2025-09-30