आध्यात्मिक प्रत्यक्ष ज्ञान · ऐप में खोलें

प्रश्नोत्तर P4-0054 · भाग 4

(वही साधक) ये विचार कितने खेल खेलते हैं — अनुभूति को भी हम ‘अनुभूति’ बोलकर खराब कर देते हैं। तो क्या मौन रहें?

लेकिन आपस में बात करोगे, तो बोलना पड़ेगा ना; संबोधन तो करना पड़ेगा। करोगे क्या — मौन? मौन तो तभी कर पाओगे जब किसी और से नहीं बोलोगे। और अगर आप जरूरत में बोल रहे हो, तो बोल के भी मौन हो। तो जब आपस में बात करनी है, तो शब्दों का संबोधन तो करना ही पड़ेगा; बिना संबोधन के सामने वाला कैसे समझेगा, और सामने वाले को आप कैसे समझोगे? आदान-प्रदान जब होता है, तो हमें शब्दों का सहारा लेना पड़ता है; और आदान-प्रदान अगर खत्म हो गया, तो फिर शब्द आप (किसके लिए) निकालोगे? अगर आपके सामने कोई और ना हो, तो आप अपना नाम लोगे ही नहीं — लोगे कहां, किसके लिए लोगे? अगर लोगे, तो आपको हंसी आएगी। तो जब आपस में बात होती है, तो हर शब्द का संबोधन करना पड़ता है बताने के लिए। (इसमें) समस्या नहीं है — जब आपको बताना हो, तो संबोधन कर दो, और फिर अपने आप में रहो, बात खत्म। देखिए, अगर आपसे कोई रास्ता पूछ रहा है, तो आपको लेफ्ट-राइट तो बोलना पड़ेगा। (आप कहो कि) मैं मौन हूं — तो आपके मौन होने से वो थोड़ी पहुंच जाएगा? अब तुम कहोगे, मैं मौन हूं, मेरे अंदर तो रास्ते का पता है, तुम निकाल लो — तो बिना आपके बोले थोड़ी निकलेगा? आप बोलो कि मैं मौन हूं, रास्ता मेरे अंदर है, तुम मुझे देख के निकाल लो — तो थोड़ी निकाल पाएगा। रास्ते के लिए आपको लेफ्ट-राइट बोलना ही पड़ेगा; लेकिन आप रास्ता बताने में थोड़ी ना फंस जाओगे। फंसोगे तब, जब रास्ते का पता नहीं होगा और रास्ता आप बता दोगे — तब फंस गए, क्योंकि आपको फिर आत्मग्लानि होने लगेगी ना, अगर वो चल दिया। हो सकता है आपने गलत रास्ता बता दिया, वो चला तो गया, लेकिन आत्मग्लानि ले ढोते रहोगे। और अगर आपको पता है और नहीं बताओगे, तो भी आत्मग्लानि होगी। तो बोलना तो पड़ेगा। बोलने में फंसना नहीं है; फंसना तब है जब पता नहीं है और बोलते हैं। और जब ना पता हो, तो इतना कह दो कि नहीं पता है — तब नहीं फंसोगे। मतलब, जैसा है वैसा बता दो, तब आप कभी नहीं फंसोगे। ईमानदारी ये भी है — पता है, बता दो; नहीं पता है, यह भी बोल देना कि नहीं पता है; यह भी एक ईमानदारी है।

सत्संग वीडियो देखेंऐप में खोलें

वीडियो: रविवार प्रश्नोत्तरी 1 मार्च 2026 #योगी · 2026-03-01