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प्रश्नोत्तर P4-0052 · भाग 4

(कुटिया में, जबलपुर से आए साधक, जो पहले भी दो-तीन बार आ चुके थे) मुझे लगा कि ज्यादा बाहर जाने की आवश्यकता नहीं है; यात्रा निरंतर बनी रहती है। बस (अपने आप में) होना है।

चलो, अच्छा है। यात्रा तो चल रही है ना। बस यात्रा से मत मुड़ना, चाहे जहां भी रहो — ये लगे कि मैं अपने आप में होने की यात्रा कर रहा हूं। बहुत अच्छी बात है। बस इसे निरंतर याद रखो कि अपने आप में स्थित होना है। और अब ऐसा कोई कर्म ना हो कि मैं और कहीं फंसूं। अब तो फंस चुका जितना फंसना था; लेकिन अब ऐसा कोई कर्म ना हो कि मैं फंसूं। क्योंकि आगे (बंधन) नहीं होगा, तो छूटने वाला होगा; अगर कोई नया कर्म-बंधन नहीं बना, तो पिछले से तो अपने आप को धीरे-धीरे तुम निकालोगे। होना है अपने आप में — बस इसको याद रखो, और इसके लिए काम करो; दोनों बातें हैं। राजा बनना है, याद है; लेकिन राजा बनने के लिए वो काम भी तो करना पड़ेगा। तो मुझे अपने आप में होना है — इसका मतलब मैं कहीं हूं, तो वहां से बिना हटे अपने आप में नहीं हो पाऊंगा। तो अब मुझे याद रखना है कि मुझे अपने आप में होना है, लेकिन मुझे यह भी याद रखना है कि मुझे वहां से हटना है। अब मुझे हटने के लिए काम करना पड़ेगा; सिर्फ याद ही रखने से कुछ नहीं होगा। ऐसा ना हो कि याद रखते-रखते हम चले जाएं। इसी बात पर बहुत गौर से चिंतन करना कि मुझे अपने आप में होना है, इसका मतलब मैं कहीं हूं, तो मैं कैसे वहां से हटूं, क्योंकि तभी मैं अपने आप में हो पाऊंगा ना; मैं जहां हूं, वहां से बिना हटे अपने आप में नहीं हो पाऊंगा। तो हटने के लिए काम जरूर करना। ऐसा ना हो कि जिंदगी में सिर्फ शब्द ही रह जाएं और मैं वहीं पड़ा का पड़ा रह जाऊं, कल्पनाओं में। तो इसका विशेष ध्यान रखना, क्योंकि ऐसे में बहुत लोग जिंदगी गुजार देते हैं।

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वीडियो: रविवार प्रश्नोत्तरी 1 मार्च 2026 #योगी · 2026-03-01