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प्रश्नोत्तर P4-0167 · भाग 4

(वही साधिका) दूर रहकर आपके नियमों का पालन करते हुए भी मुझे अपना स्तर पता नहीं चलता था — मैं सोचती थी कि आत्मज्ञान के बहुत करीब हूं; आपके सामने आकर पता चला कितना डिस्टेंस है। (और आज) मेरी जांच हुई, बाबूलाल भाई की क्यों नहीं हुई?

अब देखो, जांच आप ही की हुई, बाबूलाल की नहीं हुई — क्योंकि बाबूलाल ने कभी कहा ही नहीं। अगर कोई कहता है ना कि बस आप ही आप, तभी जांच होती है। बाबूलाल को सीधा कह दिया गया कि जवाबदारी हम ले रहे हैं। अब उसे तो डर भी नहीं है। वो तो ये भी नहीं कहता — जैसे कल की बात थी, तो बाबूलाल ने कहा अगर मुझे अकेले ही रहना पड़ गया तो सही है, मैं रह लूंगा; इसके मुंह से दो बार आया। मैं कहता हूं कि अब तो उसके शरीर की चिंता भी चली गई है — बिना जांच किए, क्योंकि उसने कभी जताया ही नहीं कि हम आपको समर्पण करते हैं, हमें आत्मज्ञान के अलावा कुछ नहीं चाहिए; ऐसा कभी जताया ही नहीं, प्रश्न ही नहीं (किया)। आपने जताया, तो आपकी जांच हुई, उसमें आप फेल हो गईं। उसने जताया नहीं, उसको कह दिया गया — तू चिंता मत कर, तू पास है। उसने जताया नहीं, वो अपने कर्म से ही कहता है — वो कर रहा है; उसके कर्म को देखते हुए मैंने (उसके लिए) कहा, उसके काम को देख के कहा। इसकी परीक्षा भी नहीं हुई। ज्यादा कूदने वाले की परीक्षा होती है। कूदने वाले — चुप बैठने वाले नहीं — भाई, इसको ज्यादा जल्दी है, तो दे दो परीक्षा! तुझे बहुत जल्दी है? चल, आजा, पेपर तैयार रखा है, क्वेश्चन पेपर — ले बेटा, बैठ! इसलिए यहां एक बुजुर्ग आए थे — एक माताजी आई थीं, उनके साथ उनके पति आए थे। तो हुआ क्या कि हम तो चार दिन का भी भोजन कर रहे थे, क्यों फेंकना; तो दूसरे दिन का चावल था, हमने कहा (उन्हें भी) देना। तो उन्होंने मना किया, लेकिन मेरा आदेश था कि सबको देना, सब खाएंगे; तो उन्होंने झगड़ा कर लिया, नाराज हो गए — बोले हम ऐसे-वैसे थोड़ी ना हैं, हम महका हुआ खाएंगे! भाई, हम भी खाते हैं यार, लेकिन हम भी ऐसे-वैसे नहीं — हम किसको बोलें? हम तो जरा सा मिट्टी लग जाए तो थाली ऐसे (फेंक) देते थे; पहले बर्तन मिट्टी से साफ होते थे, जरा सी मिट्टी लगी रहे तो थाली को यूं फेंक देते थे; और बासी तो मैं खाता नहीं था — आज चार दिन का खा रहा हूं, क्योंकि मुझे समाज के लिए काम करना है। मैं भी ऐसी जगह का था भाई, लेकिन स्थिति-परिस्थिति को देख के समझौता करना पड़ता है। लेकिन तुम तो मुझसे कह रहे हो — मैं किससे कहूं? तो सत्संग में बैठे तो (मैंने) पूछा — बाबा, ऐसा क्यों हुआ? बोले — हम चावल नहीं खाते। कोई बात नहीं भाई। पत्नी भी बोलीं — हम चावल नहीं खाते, चावल मुझे नुकसान करता है। बहुत अच्छी बात है भाई। पता नहीं क्या, दूसरे दिन भाव आया — दूध लेके आना — तो खीर बनवा दिया, काजू-किशमिश-बादाम-छुआरा-मुनक्का बढ़िया डाल के खीर बन गई, सब लोग प्रसादी ग्रहण किए। शाम को सत्संग में (पूछा) — बाबा, चावल तो खाते नहीं, (तो) खीर भी नहीं खाई होगी, खीर तो चावल से बनती है? बोले — नहीं, खीर तो खाई, बहुत अच्छी (थी)। बोला — क्यों, खीर में चावल नहीं था? बाबा, तुम तो कहे चावल आपको नुकसान करता है, तो खीर में भी तो चावल था! ये हालत है हमारी। (बासी नहीं खाना था, बहाना लगा रहे थे —) कुछ ना कुछ तो बोल लेंगे ना। तो परीक्षा तो देनी पड़ी। तो परीक्षा तो देनी ही पड़ेगी ना भाई। ये रास्ता आसान नहीं है। परीक्षा देनी ही पड़ेगी — फेल होना पड़ेगा, पास होना पड़ेगा; ऐसे ही प्रयास करते रहना पड़ेगा, अंत तक। (साधिका ने कहा, इसे पीएचडी की तरह लगाएं तो कुछ होता है —) ये तो आखिरी है। आखिरी जगह आप खड़े हो — आपको लगता नहीं क्या? ये आखिरी जगह है। ये पार कर गए, तो कर गए; फिर आपको इस सृष्टि में किसी से कुछ पूछने की जरूरत नहीं पड़ेगी। (साधिका ने कहा, अंत तक यहां रहना है, कुछ भी होने दो —) लेकिन किसके लिए — आत्मज्ञान के लिए, या शरीर की सेवा के लिए? वो तो (फॉर्म) भरवा दिया! (साधिका ने कहा, शरीर का इतना लगाव है, मुझे पता नहीं था —) जो हो गया, हो गया; (हां,) अब शरीर की फिक्र थोड़ी ना है, फॉर्म तो भरवा दिया गया। (कहती थीं) चाहे शरीर अभी चला जाए — नॉर्मल रैंडम में कह देते हैं ना कि हमें शरीर से क्या मतलब — (पर हालात से ही पता चलता है)। ये बरगद के पेड़ के पीछे चुपचाप बैठ जाते, तो (स्तर) पता चलता क्या? नहीं चलता।

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वीडियो: आखिर मेरा कल्याण कैसे हो ?#योगीजी_का_सत्संग · 2025-09-30