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प्रश्नोत्तर P4-0166 · भाग 4

(वही साधिका) आप कहते हो सचेत रहो, समझ को विकसित करो — लेकिन सचेत रहने के लिए भी समझ चाहिए। समझ विकसित कैसे होगी, और हमें अपना स्तर कैसे पता चलेगा?

इसीलिए तो मैं कहता हूं, अपनी समझ को विकसित करो। (समझ विकसित) कैसे होगी? ऐसे ही होगी ना — (जैसे आज हालात से हुआ)। तुम्हें पता भी नहीं चला कि तुम्हारी परीक्षा चल रही है। (साधिका ने कहा कि ये आंतरिक एजुकेशन आसान नहीं है, आप जैसा कोई ही पता लगा सकता है —) यहां तो हालत ये है शिष्यों की कि चलो तुम नहीं तो हम जाके कोई और गुरु ढूंढ लेंगे। तुम मना तो करो, हम तो तैयार हैं जाने के लिए — मेरी क्या गलती होगी इसमें यार, गुरु भाई से ना बोलना, अभी इसमें भी आप नाराज हो रहे हो! दूसरा गुरु ढूंढ लेंगे — गुरु की कमी है क्या, ऑनलाइन गुरु हैं — इस समय यही हाल है। (ऑनलाइन में समझ में आएगा या नहीं —) नहीं, ऐसा नहीं है; हम कुछ भी समझते हैं, ऑनलाइन भी समझते हैं, ऑफलाइन भी समझते हैं, लेकिन ये ऐसा नहीं है। अब जैसे इस बालक ने कहा — हरियाणा में आ गया, गलती किया था, गलती का एहसास हुआ; इसने कहा कि अगर आप वहां नहीं रुकने दोगे, तो मैं घर तो नहीं जाऊंगा, और कहीं चला जाऊंगा। तो ये भी कह सकता था कि मैं उसी आश्रम में रहूंगा, नहीं तो कहीं नहीं रहूंगा — ये इसका आखिरी होता। तो इसने क्या ऑप्शन दिया? आप माफी दे दोगे तो सही है, नहीं तो हम और कहीं चले जाएंगे — मतलब इसका 'और कहीं' भी है। गुरु मिलना क्या खाने का काम है? जिंदगी में अगर आप कबीर की बात करते हो, तो उन्होंने कहा — गर्दन कटाने से गुरु मिले, तो सस्ता सौदा जान। तुम तो हर समय गुरु बदल रहे हो। तो इसके शब्द तो ये होते कि भाई, हमें जगह तो मिलेगी, लेकिन आप जैसा गुरु नहीं मिलेगा; हमें तो गुरु चाहिए, जगह थोड़ी ना; अगर आप नहीं मिले तो मेरा क्या होगा मुझे भी नहीं पता, और मैं आपके बिना नहीं रह सकता। ये कुटिया कल्याण कर देगी क्या? ये जगह कल्याण कर देगी? ये जगह तो पहले भी थी, बाद में भी रहेगी। कल्याण तो गुरु-स्थिति में है, उसके द्वारा होगा। ये बड़ का पेड़ आज बहुत अच्छा लगता है — क्या बड़ का पेड़ और कहीं नहीं है? बहुत हैं दुनिया में, श्मशान घाट में बहुत पुराने-पुराने खड़े हैं। जरा समझो इस बात को — अभी (ये) देवता बन गया क्या? यहां कोई बैठता भी नहीं था। हमें बड़ के पेड़ में कुछ आकर्षण दिखता है — तो बड़ का पेड़ और कहीं नहीं है क्या? बड़ का पेड़ उपलब्धि करा देगा? तो इसके शब्द तो ये होते कि जहां आप रहोगे, उसके पास ही रहने का प्रयास करूंगा, मैं आश्रम के बाहर रहूंगा, लेकिन मैं कहीं नहीं जाऊंगा — ये इसका आखिरी होता। फिर इसने ऑप्शन दिया कि अगर आप वहां नहीं आने दोगे, तो मैं और कहीं चला जाऊंगा — इसका मतलब तुम्हें अभी मैं नहीं चाहिए। तो आजकल के लोगों को बात समझ में आ रही है? ये तो बस इंतजार कर रहे हैं कि तुम मना तो करो — गुरु ऑनलाइन लिस्ट में हमारे हैं, तुम सिर्फ मना करो। परीक्षा तो दूर, परीक्षा तो मैं दूंगा नहीं, तुम बताओ — नहीं तो हम आगे जा रहे हैं, गुरुओं की कमी नहीं है। ये हाल है आज का। अब बुल्ले शाह जिस गुरु की तलाश में (था कि) बस मुझे अपना ले — 12 साल लगे; क्या उस समय और गुरु नहीं होंगे पृथ्वी पर? तो बुल्ले शाह कहते कि छोड़ो यार, उनके जैसे कितने मिल जाएंगे — तो बुल्ले शाह, बुल्ले शाह ही नहीं बन पाते। एक के हो जाओ, तो हो जाओ; होने के पहले जांच लो। लेकिन एक के बन गए, तो बन गए, बात खत्म। रोज मुंह मार रहे हो — कभी इधर, कभी उधर। बनने से पहले जांच लो, लेकिन जब बन ही गए, तो बात खत्म करो। हमारी तो चाटने की आदत है — हम तो चाटने आए, तुम्हारे बनने थोड़ी ना आए हैं। कहा गया है — गुरु खोज लो; लेकिन पूरी तरह समर्पण के पहले पूरी तरह जांच लो, क्योंकि प्रत्यक्ष होगा तभी कुछ हो सकता है। इसलिए कहा गया है — पानी पियो छान के, गुरु करो जान के। ऐसे ही मत (करो)। मैंने आज तक (बहुतों को) 'गुरु जी' कहा, क्योंकि संस्कार में पला-बढ़ा था, लेकिन गुरु-भाव में किसी को स्वीकार नहीं किया। एक बार ट्रेन में ऐसा हो ही गया — मैं संन्यासी नहीं हुआ था, ज्योतिष का गुरु बनाया था; ट्रेन में खड़े होकर जा रहा था, गुरु जी बैठे थे, एक आदमी और बैठा था; बोले — रवि, तुम पता नहीं इनको कब तक गुरु कहोगे? मैंने कहा कि मैं इनको कुछ समझ के गुरु जी बोलता हूं — वो रहा तो कहूंगा, नहीं तो नहीं कहूंगा। हम इनके पास आए हैं तो कुछ लेने आए हैं; पहले मैं समझूंगा, पूरी तरह जांचूंगा। वो मेरी जांच नहीं — मैं उनकी जांच पहले करूंगा; मैं तो उस लायक हूं ही नहीं (कि वो मेरी जांच करें)। मैं आया हूं ना उसके पास, (तो) मैं अज्ञानता से उसे जांचूंगा, क्योंकि ज्ञान तो मेरे पास सही नहीं है ना।

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वीडियो: आखिर मेरा कल्याण कैसे हो ?#योगीजी_का_सत्संग · 2025-09-30