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प्रश्नोत्तर P4-0187 · भाग 4

(कुटिया में एक साधक) हम महात्माओं की बहुत सी किताबें पढ़ते हैं, कहानियां अच्छी लगती हैं, पर उनमें क्या खोज करना है यह नहीं सोचते। कोई कहता है किताब पढ़ना छोड़ दो — किताब में बारिश का वर्णन है, पर किताब निचोड़ने से बारिश नहीं होती। क्या यहां आने के बाद भी किताबें पढ़ सकते हैं? जिज्ञासु बनने के लिए कुछ आधार तो चाहिए।

प्रश्न अपने अंदर से निकालिए। अर्जुन प्रश्न निकाल रहे थे, तो कोई किताब नहीं (थी)। किताबों से प्रश्न नहीं आने चाहिए, आपके अंदर से आने चाहिए — आपके प्रश्न हों। किताबों में पानी नहीं है, लेकिन पानी तक पहुंचने के लिए एक मार्ग छिपा हुआ है। देश-काल-स्थिति-परिस्थिति से वो मार्ग बदल गया है, लेकिन पानी वहीं है। मार्ग जीवंत गुरु बताएगा। आज अगर भारत का 20 साल पहले का, 30 साल पहले का नक्शा लेके चलो, तो क्या आप भारत-भ्रमण कर पाओगे? नहीं। लेकिन जिस जगह पे (जो) कुछ था — रास्ते बदल गए — वो जगह अभी भी है; वहां की बनावट का रूप बदल गया, लेकिन जगह वहीं की वहीं है, जगह घिसती नहीं है। तो किताबों में पानी का रास्ता है, जहां पानी है; लेकिन रास्ता बदल गया, पानी लेकिन वही है, और मुझे मतलब पानी से ही था। अब नक्शा बदल गया, अब कोई जीवंत गुरु के पास जाओ, वो बताएगा नया रास्ता। इसलिए लोगों ने जोड़ दिया कि जीवंत गुरु जीवन में ढूंढना — क्योंकि देश-काल-स्थिति-परिस्थिति में सब (बदलेगा, पर) गुरु एक — बदलेगा नहीं, सत्य नहीं बदलेगा। गुरु ज्ञान का प्रतीक है, तो ज्ञान कभी नहीं बदलता; रूपांतरण रूप का होता है, तत्व का नहीं। (गुरु मतलब तत्व — हमें गुरु के शरीर को नहीं देखना?) नहीं, शरीर नहीं — ज्ञान। गुरु एक है, दो है भी नहीं। जैसे पृथ्वी पर पानी आता है, तो नल अनेक हैं, निमित्त बनते हैं, लेकिन एक ही जगह से आता है। वैसे ही गुरु ज्ञान का प्रतीक है — आप उसका शरीर मत देखो; शरीर अनेक हैं, जैसे नल अनेक हैं, लेकिन ज्ञान एक ही जगह से आ रहा है। अगर हम तत्व को पकड़ें, तो आगे चल सकते हैं। आप रूप को मत पकड़ो, ज्ञान को पकड़ो, और ज्ञान एक ही है, दो नहीं। हो सकता है इस नल का कुछ स्वाद अलग हो, आगे वाले नल का कुछ अलग हो, लेकिन प्यास दोनों बुझाएंगे। कभी-कभी हमें वहां का पानी अच्छा लगता है, वहां का नहीं; लेकिन (जो) आपको अच्छा नहीं लग रहा है, वहां से (भी) कई लोग प्यास बुझा रहे हैं — आपको नहीं पसंद है। तो वैसे ही अनेक शरीर से जब ज्ञान निकलता है, तो अलग-अलग तरीके से निकलता है; तो मुझे किसी का ज्ञान समझ में आता है, किसी का नहीं आता। लेकिन जहां आपको समझ में आए, लेके निकल लो। ज्ञान एक ही होता है, दो नहीं — इस बात को समझो। जैसे मान लीजिए आप कहीं पे रास्ता पूछते हो, तो अलग-अलग भाषा में बताते हैं; तो हो सकता है जो भाषा आपको नहीं समझ में आ रही, किसी को आ गई, वो चल दिया। तो आपके लिए तो गुरु एक ही होता है, दो तो होता ही नहीं। यहां तो लोग गुरु भी 'मेरा-तेरा' बोलते हैं — मेरा गुरु, तेरा गुरु। अरे, मेरा-तेरा से मैंने जो अहंकार धारण किया, उस अहंकार से मुक्त करा दे, वो गुरु है। गुरु (अगर) मेरा-तेरा बता रहे, फिर गुरु कहां है? गुरु तत्व है, गुरु की स्थिति है, गुरु कोई व्यक्ति-विशेष थोड़ी ना है। नल से (नल का) एक बूंद पानी आता है क्या? नल निमित्त है; वैसे ही शरीर निमित्त है। मैं कह रहा हूं — कोई कथा कह रहा है, कोई प्रवचन कर रहा है, कोई सत्संग कर रहा है — उसके शरीर से नहीं आ रहा है; तीनों में — एक किताबों से बोल रहा है, एक महापुरुषों की वाणी बोल रहा है, और एक (में) सीधा उससे आ रहा है। आप ये मत समझना कि ज्ञान शरीर से आता है, ऐसा नहीं है। आप कुछ भी बोलते हो, उसका आधार-बेस है। क्या आपको लगता है आपने बोला? नहीं — अगर ये देख पाओ, तो आप कभी नहीं बोले, कभी नहीं चले; अगर आप देख पाओ, तो जब से आपका जन्म हुआ, आपने आज तक एक शब्द भी नहीं बोला। आप कहीं से लेके बोल रहे हो, आप बोल ही नहीं रहे हो — यहां कोई नहीं बोल रहा है, अगर ये देख पाओ। आप स्थिर थे, स्थिर हो, स्थिर रहोगे; आप कहीं आए-गए ही नहीं, अगर ये देख पाओ। आप कहीं से बोल रहे हो, आपका आधार-बेस है। आप तो बोल ही नहीं रहे हो। (तो फिर इस 'आप' को कैसे समझें?) तो 'तुम' को छोड़ दो, 'मेरा' को छोड़ दो। आपको समझने के लिए 'मेरा' को छोड़ दो। 'मेरा-मेरा' आपने क्यों पकड़ा? लालच में पकड़ा। लालच को छोड़ दो — 'मेरा' भी छूट जाएगा, और अहम 'मैं' भी गिर जाएगा।

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वीडियो: अगर भक्त न हो तो भगवान का क्या होगा ? क्या भगवान भक्त पर निर्भर हैं ? #bhakt #bhagvan · 2025-07-17