प्रश्नोत्तर P4-0179 · भाग 4
(वही साधिका) प्रोफेसर साहब (जिनकी अच्छी पेंशन है) ने कहा कि उन्हें चटाई-कंबल ही पसंद है, घर पर भी गद्दे पसंद नहीं थे — क्या यह त्याग है? और मुझे लग्जरी लाइफ में कुछ नहीं लगा; एक फाइव स्टार होटल में बहुत सारी चीजें लगाई गईं, मैंने सब हटाकर सिर्फ चावल और सांभर लिया — इसे आप कैसे समझाएंगे?
चटाई-कंबल इस चीज का प्रतीक (समझा गया) कि इनको अपने शरीर से मोह ही नहीं है। (लेकिन) इन्हें गद्दा पसंद आता, रजाई आती, और ये चटाई पे आ जातीं, तब (त्याग होता)। इन्होंने कहा मुझे चटाई-कंबल पसंद आता है; और ये गद्दे के लायक हैं, इनकी योग्यता है — तो ये इनका त्याग नहीं है। त्याग तो तब होता, जब गद्दा पसंद आता, और वो त्याग करके चटाई पे आ जातीं — तब इसको त्याग कहते। ये तो इन्हें पसंद ही है, ये त्याग थोड़ी ना है। आप इसे त्याग मत समझिए। गद्दा इन्हें पसंद ही नहीं है, इन्हें पसंद चटाई है — तो त्याग कहां हुआ गद्दे का? एक आदमी को गद्दा पसंद है, एक आदमी को जमीन पसंद है — गद्दे वाला जमीन पे आ जाए, जमीन वाला गद्दे पे आ जाए — इसे त्याग कहते हैं, क्योंकि दोनों को नींद नहीं आने वाली है। (त्याग तब है) जब आप अपनी पसंद छोड़ते हो। आप तुलना मत करो — हमारी गड़बड़ी यही है, हम तुलना कर देते हैं। आप (जो) पसंद करते हो, उसे छोड़ दो। चटाई-कंबल तो इन्हें पसंद है, तो इसमें ये थोड़ी ना त्यागी होते हैं — ये तो इनकी पसंद का मिला इन्हें। अब आपने इसे त्याग समझा, मैंने तो कुछ नहीं (कहा)। हमारी चॉइस की चीजें हमें मिल ही जाएं, तो त्याग कहां? आप तुलना मत करिए, (चीज की) कीमत की तुलना मत करिए — हम इसी में तो फंस जाते हैं कि देखो कितना त्याग किया; त्याग क्या किया? अपनी चॉइस का मिला। जैसे आप प्रोफेसर हैं, पीएचडी हैं, आपकी इतनी सैलरी थी, 90,000 पेंशन है, और आपने कहा कि मुझे चटाई-कंबल पे रहना पसंद है — ये मेरी चॉइस थी; तो (लोग) आपको त्यागी समझ गए कि आपने त्याग किया, क्योंकि आप गद्दे के लायक थे। तो अब आपको आज समझ में आया, तो आप त्यागी हैं कि नहीं हैं? (नहीं —) अपनी चॉइस का मिला।
(फाइव स्टार होटल —) तो सब कुछ कहां हटा दिया? अपनी चॉइस का ले लिया। लगाने वाले को भी पता था कि ये सारा नहीं खा पाएंगी; लेकिन बहुत सारा सब लगा दो, अपनी चॉइस का ले लेंगी। तो आपकी चॉइस थी सांभर और चावल। आप सब छोड़ के उस दिन भूखी सो जातीं, तब यह त्याग होता। आप इस पॉइंट को समझिए — आप क्या सारा खा जातीं? नहीं; ये लगाने वाले को भी पता था कि आप सब नहीं खाओगे। तो आपने अपनी चॉइस का ले लिया। उस दिन आप पूरा छोड़ के ही सो जातीं, (तो) इसे छोड़ना (कहते)। एक आदमी कितना ही खाएगा, ये उसको भी पता है; एक आदमी (ने) अपनी चॉइस का ही लिया। (बहुत सी वैरायटी, नई-नई स्वीट्स थीं, पर किसी को हाथ लगाने का मन नहीं हुआ —) मैंने कहा ना, आपने अपनी चॉइस का लिया — इसी को चॉइस बोलते हैं।
मैं एक होटल में गया, खजुराहो में — मैंने रिक्शा बुक किया था, पैर से चलाने वाला; तो मैं बोला चलो नाश्ता कर लेते हैं। हमने कहा — मंचो सूप, भाई, 1/2 कर दो; लगभग ₹80 का सूप था, तो 40-40 का हो गया। उसने एक चम्मच लिया, तो उसका मुंह मैंने देखा; उसने दोबारा उठाया, तो मैंने (पूछा) क्या हुआ, अच्छा नहीं लगा? बोला क्या लेगा — बोले समोसा। समोसा दिला दिया, बोला ये कैसा है? बोले ये बहुत अच्छा है। अब ₹40 में खुश नहीं हुआ, ₹10 में खुश हो गया — समझिएगा इस बात को। कहने का मतलब है, वो (थाली में) कितना भी था, आपकी चॉइस थी चावल और सांभर — ये त्याग नहीं है। और आप गद्दे पे सो के थक गई थीं, अब आप चटाई पे सो के देखना चाहती थीं, क्योंकि थक गई थीं ना — इसे त्याग नहीं कहते। (तो त्याग क्या है?) त्याग (भी) आपको यहां समझ में आएगा। एक दिन इसकी भी परीक्षा आएगी, (आपका) त्याग देखा जाएगा। मैं आपको कह रहा हूं, ये सब अपने आप होगा — आप बस लगे रहो, बस पड़े रहो।
तो मैं ये कहना चाहता हूं कि त्याग आप जैसा समझते हो, वैसा नहीं है। इन्होंने घर छोड़ा — आपको दिख रहा है, लोगों को भी दिख रहा है। लेकिन वहां तो सिर्फ शरीर को पोषण था; यहां तो दो बात में इन्होंने घर छोड़ा — एक आत्मज्ञान के लिए, (और) शरीर की भी सुरक्षा ले ली। तो इन्होंने तो ज्यादा के चक्कर में छोड़ा। अगर आज (ये) फाइनल नहीं होता, हम कहते कि नहीं, हम (जिम्मेदारी) नहीं लेंगे, तो ये तो कहतीं कि अब भाई, अभी भी मौका है, चल दूं। (वहां तो) एक ही थी — शरीर की सुरक्षा; यहां दो चीजें हैं; और एक का इधर-उधर हुआ, तो पूरा डगमगा गए। मैं तो अपना ही लिया था — कि भाई, अगर आप लोग इस कार्य में सहयोगी हो, तो आपकी जवाबदारी मेरे ऊपर हो गई; लेकिन आपने कहलवाया।
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वीडियो: आखिर मेरा कल्याण कैसे हो ?#योगीजी_का_सत्संग · 2025-09-30