प्रश्नोत्तर P5-0011 · भाग 5
(वही साधिका) ऐसी जगह रहने का मन करता है, पर ये भी रहता है कि अपनी जगह हो। क्या यहां रह सकते हैं? और दूसरों के यहां जाओ तो कुछ बंधन होते हैं, उनके नियम के अनुसार चलना पड़ता है।
आपको जगह में रहना है, कि अपनी जगह में रहना है — अहंकार को पोषण देना है? आपको (बस) जगह में रहना है, तो यहां रह सकते हैं — आजीवन रहो; एक दिन से लेकर आजीवन रहो, यही व्यवस्था है। (अगर ये भी साथ चल रहे हैं, तो हम भी रह लेंगे —) अरे, तो हम हैं ना संभालने के लिए। (यहां के नियम —) सब बेचवा के आओ, और रहो — बेच के आओ, रख के आओ, चाहे जैसे आओ — (पर अगर) वो पीछे का रहेगा, तो वो बांधेगा ना, बार-बार मुंह खींचेगा — वो देख लो। पीछे की नाव जला के आना। लोन पे लिया हुआ घर, चाहे जितना भी है — एक सुई भी है, लेकिन है, तो पीछे खींचेगा ना, आगे बढ़ने से खींचेगा। तो उससे मुक्त होके यहां पे आएंगे — आपकी मर्जी, आप चाहे बंधन में आओ, चाहे मुक्त (होकर) आओ। यहां के नियम में रहोगी, तो रहो, आजीवन रहो। आपको देखना है — अगर शिद्दत से कहीं पे रहना है, तो पीछे का जलाना पड़ेगा; अपने बनाए हुए अस्तित्व को मिटाना पड़ेगा, तभी आप आगे बढ़ सकते हो, नहीं तो वो आपका अस्तित्व पीछा नहीं छोड़ेगा, खींचता रहेगा।
(दूसरों के यहां नियम के बंधन —) साधना हमेशा 'तेरा' में होती है, 'मेरा' में (नहीं) — ये ध्यान रखना। क्योंकि 'मेरा' में तो आप अपने तरीके से जिओगी, और अपने तरीके से अगर निकालना हो, तो घर पे ही निकाल लेतीं, फिर यहां आने की जरूरत नहीं। तो जब आप साधना करो, तो किसी की शरण में करो — इसलिए कहा गया है, जीवंत गुरु की शरण में रहो। (और अगर हम भटक-भटक के, जैसे आपने किया, वैसे कर लें —) करो, रोक कौन रहा है? एकदम भटको, जो मन करे वो करो — पहले कर लो, देख लो, करके देख लो कि कुछ है कि नहीं; ये ना हो कि (बाद में लगे) मैंने ये नहीं किया। यहां पे आए थे दो जन, बोले — हम अनुभव लेना चाहते हैं। जाके ठंडी में एक दिन कांपे; वहीं (गिट्टी पे) खड़े रहे, ठंडी में बैठे रहे। दूसरे दिन पूछा गया कैसा (रहा), बोले — अरे, अद्भुत! लेकिन दोबारा कभी नहीं किए। वो तो बातों में फंस के किए। अगर कुछ अनुभव हुआ (होता), तो दूसरी रात भी नहीं छोड़ते, तीसरी भी नहीं छोड़ते, जब तक उपलब्धि नहीं हो जाती। रात भर तुम कांपे, रात भर सूर्य का इंतजार करते रहे कि कब सुबह हो जाए — तुम्हारी स्थिति का पता तब चल गया, जब तुम दूसरे दिन नहीं गए। रात भर तुम रोए, चिल्लाए, चीखे, लेकिन किसी से बताए नहीं — (कि) हंसी हो जाएगी; बोले — बहुत अद्भुत अनुभव हुआ, शब्दों में बता नहीं सकते — लेकिन दूसरे दिन नहीं गए। अगर कुछ हुआ (होता), आगे कुछ (मिला होता), तब तो तुम जब तक मूल तक नहीं पहुंच जाते, तब तक वहीं बैठे रहते। (बस) जबान दे चुका हूं — (इसलिए एक रात बैठे)।
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