आध्यात्मिक प्रत्यक्ष ज्ञान · ऐप में खोलें

प्रश्नोत्तर P5-0009 · भाग 5

(वही साधिका) बहुत से थॉट्स आते हैं — कुछ बनना है, कुछ करना है — तो फैमिली का थॉट आता है कि इन्हें छोड़कर जाएंगे तो पीछे इनका ध्यान कौन रखेगा; बाहर निकल भी जाते हैं तो लगता है वहां ठीक नहीं चल रहा, और टारगेट रुक-रुक जाता है। मदर का केयर करना मेरी प्रायोरिटी है, पर फिर आवाज आती है कि आत्मा की भूख का क्या हुआ। जिम्मेदारी लेना चाहते हैं पर हैंड-ओवर नहीं की जा रही, और जो (परिवार का) शिप चला रहा है वो अच्छे से नहीं चला रहा — तो क्या किया जाए?

आप देखिए कि आप जिम्मेदारी को (पकड़ रही हैं, या) भावनाएं आपको पकड़ रही हैं — कि जिम्मेदारी है भी? ये आपको देखना है कि आपने जिम्मेदारी ली है (या नहीं)। (कैप्टन शिप डुबो रहा है, तो सब डूब रहे हैं —) तो छोड़ दो ना शिप। (अपना ही शिप था, अपने ही लोग हैं —) अपने लोग कहां हैं? (अपनी मां है — पर) वो समझ भी तो नहीं रहे, मेरे तरीके से चल भी तो नहीं रहे हैं — मतलब उन्हें मेरी जरूरत नहीं है, हम जबरदस्ती कर रहे हैं। अगर वो मुझ पे निर्भर होते, तो पूरी तरह मेरे तरीके से ही चलते। अगर वो मेरे तरीके से नहीं चल रहे हैं, तो हो सकता है कि वो मुझे ढो रहे हों। आप उन्हें छोड़ दीजिए। (तो ये रिस्पांसिबिलिटी छोड़ना हुआ —) (जिम्मेदारी) है ही नहीं, आप जबरदस्ती लेके रखी हैं; अगर होती, तो आपके बताए अनुसार चलता — नहीं चल रहा है। (ज्ञान का अभाव है वहां —) ज्ञान का अभाव है, तो ज्ञान दीजिए फिर — पहले ज्ञान दीजिए, बाद में दायित्व पूरा करना; पहले बैठा के उनको ज्ञान ही दो; ज्ञान का अभाव है, तो पहले ज्ञान दो, भोजन बाद में देना। (वो कहते हैं, अपना-अपना देखो —) अब देखिए, आ गई ना उसी पे — फिर अपना देख लो; अब क्या डंडा मार के भगाएं आपको? उन्होंने तो बोल दिया ना। जैसे अपनी बहन की अभी मैंने बात बताई — कहा 'लड़कियन के टेंशन बा', तो (मैंने कहा) तू भोग, हम क्या करें — बालक तेरा, कर्म तेरा। हमने सुन लिया, कहा भोग ले। और अगर वाकई में दुख है, तो मेरे तरीके से चलो। अरे भाई, हम क्यों (जिम्मेदारी) लें? उसका पति है, उसका परिवार है — मैं क्यों उसका जवाबदार (बनूं)? (हमें) सुना रहे हैं, हमसे पूछ रहे हैं, हमें बता रहे हैं — तो मेरे पास तो एक ही तरीका है — भोग ले, और जा हॉस्पिटल में इलाज करा ले। (हम लोगों का दुख दूर करें और अपनी बहन का नहीं —) अरे भाई, वही तो कह रहा हूं — वो बहन करवाना भी चाहती है कि नहीं? (हम तो समझदार हैं —) वही तो बात है — इतने समझदार हैं, फिर परेशान क्यों हैं? इतनी समझदार होतीं, तो फिर परेशान क्यों होतीं? परेशान है, तो समझदार नहीं है — दोनों बातें तो नहीं हो सकतीं। उनके पास समझ नहीं, तो परेशान हैं; आप समझ के साथ परेशान हैं — तो फर्क क्या है? दोनों तो एक ही जगह खड़े हो। (साधिका ने कहा, ज्ञान नहीं होता तो परेशान नहीं होते —) आपने जिम्मेदारी अगर ली, ठीक है; जिम्मेदारी जबरदस्ती मत ढोओ। अगर वो कर सकता है, तो छोड़ दीजिए, और आप अपना कल्याण कर लीजिए। (हमारा पहला कर्तव्य —) आप देखिए, आपकी बहन है — चलिए, उस रिश्ते में जाते हैं — माता की, भाई की, बहन की — अरे भाई, सब अपाहिज हैं क्या? फिर तुम्हारे ऊपर कैसे सबकी जवाबदारी है? मतलब सब मंदबुद्धि हैं, पागल हैं तुम्हारे घर में? तब कैसे आ गई जवाबदारी? बोलिए। (बिजनेस अच्छे से रन करने की) अगर भाई की जिम्मेदारी है, वो नहीं कर रहा है, तो आप (अपनी) रिस्पांसिबिलिटी छोड़ो ना — नहीं कर रहा है, (तो) भोगेगा। पागल है क्या? मंदबुद्धि है क्या? अपाहिज है क्या? अगर ये अवस्था है, तब आपकी जिम्मेदारी बनती है कि उनका सहयोग करो। (बीमार का सहयोग करना भी तो कर्तव्य है —) देख लो, वो बीमार की स्थिति क्या है — पता चला जिंदगी भर अपाहिज रहेगा, और पता चला उसके और भी बच्चे हैं, पति है, सब है — तो हम क्यों करें? (हमें फिक्र हो रही है —) फिक्र, तो दुनिया में और लोग हैं, वहां भी जाओ — एक हॉस्पिटल में चली जाओ, अपाहिज वाले हॉस्पिटल में; आपके पास तो एक-दो लोग हैं, वहां तो सैकड़ों-हजारों हैं, फिर उनकी फिक्र करो, इतनी फिक्र है तो। फुटपाथ पे बहुत लोग सोए हैं, अपाहिज बेचारे — जाके उनका पांव दबाओ, उनका लैट्रिन साफ करो। (चैरिटी बिगिन्स फ्रॉम होम —) तो करो पहले घर वालों की; (पर) तब तो बाहर वालों का नहीं (करोगी)। घर वालों का, तो आपने (उनसे) कुछ लिया है, इसलिए कर रही हैं। (उनसे प्रेम ज्यादा है —) तो (घर पर ही) करते रहो ना, फिर फंसे कहां हो?

सत्संग वीडियो देखेंऐप में खोलें

वीडियो: अगर भक्त न हो तो भगवान का क्या होगा ? क्या भगवान भक्त पर निर्भर हैं ? #bhakt #bhagvan · 2025-07-17