प्रश्नोत्तर P21-0121 · भाग 21
गुरु जी, आप जो सात दिन कुटिया में रहने का बता रहे थे — वहां क्या चर्चा होती है, कोई पाठ्यक्रम होता है क्या?
पहले लोग आते थे, एक-दो दिन रहकर चले जाते थे; तो मैंने किया कि सात दिन पक्का रहना है, सात दिन से ज्यादा चाहे आजीवन रहो — आजीवन की व्यवस्था है, सत्य के खोजियों के लिए, जिज्ञासुओं के लिए। वहां मोबाइल स्विच ऑफ हो जाता है, व्यवहारिक बातें नहीं होतीं, नाम भी कोई किसी से नहीं पूछता; अपना भोजन सब मिलकर स्वयं बनाकर खाते हैं और अपने आप में रहते हैं; मैं हूं तो हफ्ते में एक दिन, रविवार को सत्संग हो जाता है। दिन भर क्या होता है? कुछ नहीं — कुछ ना करना ही साधना है। कुछ करके जगत की वस्तुएं मिलती हैं, सुख-दुख मिलता है; कुछ ना करके परमात्मा, परमानंद मिलता है। कुछ ना करना क्या हुआ? जब आपके द्वारा सत्कर्म हो रहा है — किसी व्यक्ति के लिए नहीं, समाज के लिए, धन-तन-ताकत से — कर्ता का भाव नहीं है, तो कुछ हो रहा है लेकिन कुछ ना करना हो रहा है; निष्काम सेवा कुछ ना करने में आती है। वहां कोई जगाता नहीं, पर उठकर स्नान के बाद दिन भर सो नहीं सकते; कुटिया के दायरे में कहीं भी पेड़ के नीचे अपने आप में बैठो; पौधों को पानी देना है तो अपनी मर्जी से दो, नहीं दोगे तो दिलाया जाएगा — पता नहीं उसका फल कौन खाएगा, पर उससे आपको ऊर्जा मिलेगी। जैसे बैंक में मूल पड़ा है तो ब्याज आता रहता है, वैसे ही आपने कोई पेड़ सींचा तो जब तक वो पेड़ रहेगा, समाज उसका उपयोग करेगा, आप चाहे किसी भी शरीर में रहो, आशीर्वाद-ऊर्जा जाती रहेगी। तो ऐसा काम करके इस धरती से जाओ — या मोक्ष पा जाओ, या कोई और शरीर धारण करो तो वो आशीर्वाद और साधन की व्यवस्थाएं मिलती रहें।
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वीडियो: मुझे कहां होना है ? कलबुर्गी कर्नाटक में पुनः सत्संग 12 जुलाई 2026 #योगी · 2026-07-14