प्रश्नोत्तर P9-0042 · भाग 9
ईमानदारी और सत्कर्म, यह मूल मंत्र बताया, बहुत अच्छा लगता है। लेकिन यह सदा टिकता क्यों नहीं? विस्तार से समझाएं। अगर सड़क पर पैसा पड़ा दिखता है, तो लालच आ जाता है।
सड़क पर पैसा अगर दिखता है, तो आप उसे उठा लीजिए। प्रयास करिए कि आप उसे उसके मालिक तक पहुंचाएं।
मैं एक घटना बता रहा हूं। बहुत समय पहले की बात है, लगभग दो हजार सात के पहले की बात है। मुंबई में एक स्टेशन पर एक व्यक्ति ट्रेन पकड़ रहा था, लोकल, और उसका पर्स गिर गया। मैंने उसे उठाया। उसमें कई क्रेडिट कार्ड थे, और उसमें कुछ लाइसेंस वगैरह था। उस पर पता था, और उस पर फोन नंबर था। फिर मैंने उसे संपर्क किया। कैसे भी करके फोन लगाया, बात हुई, और फिर मैंने उसे उस जगह पर बुलाया, और फिर मैंने उसे दिया। वह बहुत खुश हुआ। अपनी दुकान का पता दिया, बोला कभी आइएगा। मैं नहीं गया।
फिर एक बार नाला सोपारा में ऐसे जा रहा था, एक मोबाइल मिल गया। तुरंत मैंने उसे उठाया। अब वह बंगाल का था। मैंने उसके नंबर पर फोन लगाया। कोई महिला उठी। अब वह बंगाली बोल रही है, और मैं कह रहा हूं कि मुझे यह मोबाइल मिला। अब मुझे तो बंगाली आती नहीं। मैंने कहा, मुझे मोबाइल मिला है, मैं इस स्टेशन पर हूं। लेकिन वह क्या बोल रही है, हमें पता ही नहीं चला। तो मैंने उस फोन को ऑन रखा। कुछ देर के बाद उसका ही फोन आया। तो मैंने बोला, आ जाओ, मैं उस स्टेशन पर बैठा हूं। उसी के लिए मैं बैठा रहा, ट्रेन भी नहीं पकड़ी। मैंने कहा, मैं उस स्टेशन पर बैठा हूं, आप आ जाओ। फिर वह दूसरी ट्रेन पकड़कर आया। मैंने उसको मोबाइल दे दिया।
कहने का मतलब यह है कि प्रयास करिए। अगर आपको कुछ मिलता है, क्योंकि वह एक ताकत है। अगर ताकत गिरी हुई है, तो आप उसे उठाइए। प्रयास करिए, जिसकी ताकत है, वहां पहुंचाइए। और अगर आप वहां पहुंचाने में सक्षम नहीं हो, तो आप उस ताकत का कहीं सत्कर्म में उपयोग कर दीजिए। लेकिन ताकत को ऐसे जमीन पर न छोड़िए। वह ताकत है। धन एक ताकत है। भोजन एक ताकत है। हम जा रहे हैं, रास्ते में कांटा आया, तो हमारा कर्तव्य है, लोग आ-जा रहे हैं, कम से कम मैं तो उठा दूं। तो उठाकर उसे साइड में रख दीजिए। जहां उचित है, वहां पहुंचा दीजिए। यही तो मानवता है।
अब ऐसा नहीं कि रास्ते में जा रहा हूं, और पैसा गिर गया, तो उठाना नहीं। उठाना ही है उसे। पहले प्रयास करना है कि मैं सही आदमी तक पहुंचाऊं, उसके मालिक तक। प्रयास करूं कि मैं उसके मालिक तक उसे पहुंचा दूं। और मालिक, प्रयास करने के बाद भी, न मिल पाए, तो मेरा कर्तव्य है कि देखो, जरूरतमंद कौन है। कहीं मैं तो जरूरतमंद नहीं, कि दवा लेने जा रहा था, मेरे पास पैसे नहीं थे, मुझे दवा की जरूरत थी, पैसे मिल गए। लेकिन पैसे मिलने के बाद पहले मालिक तक पहुंचाओ। फिर सत्कर्म में लगाना है। सत्कर्म का मतलब क्या है? जरूरतमंद। तो अगर आपको भी जरूरत है, तो उसका उपयोग कर लो। दोष नहीं लगेगा। दोष तब लगेगा जब आप प्रयास नहीं करोगे मालिक तक पहुंचाने में, और आपने उपयोग कर लिया।
पहले प्रयास करिए, अपनी क्षमता के अनुसार, कि मैं इस ताकत को, जिसका है, वहां पहुंचा दूं। अगर नहीं पहुंचा सकते, तो किसी जरूरतमंद के उपयोग में ला दूं। अगर जरूरतमंद मैं ही हूं, तब कहीं और खोजने की जरूरत नहीं है। तब तो खुद उसका उपयोग कर लेना है। और पता चला कि नहीं, मैं जरूरतमंद नहीं हूं, मैं तो सामर्थ्यवान हूं, तो आप कहीं और उसका उपयोग कर लीजिए।
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वीडियो: Live के प्रश्न और उत्तर स्वयं के सामर्थ को जांच कर आगे बढ़े । #योगी · 2026-06-05